स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ and स्वच्छ सन्देश: विज्ञान की आवाज़

>नए वर्ष की शुभकामनाओं के साथ मैं सहर्ष आप सभी ब्लागर बन्धुवों को यह सूचित करना चाहता हूँ कि मैंने एक नए ब्लॉग को शुरू किया है जो कि विज्ञान विषयक रहेगा! ब्लॉग  का  नाम है:

यहाँ चटका लगा कर आप नए ब्लोग पर पहुँच सकते हैं  !

आप सबके स्नेह का आकांक्षी !

सलीम ख़ान
9838659380

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>अगर कल सलीम ख़ान की मृत्यु हो जाती, तो !!! Saleem Khan injured yesterday!!!

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एकबारगी तो मुझे लगा कि आज मेरी मौत हो जायेगी और आँखों के सामने कुछ सेकंड तक अँधेरा भी छ गया था. जो हुआ वह इतनी रफ़्तार में हुआ कि सँभालने का मौक़ा ही नहीं मिला. कल हो सकता था कि मेरी मृत्यु हो जाती लेकिन शायेद नियति को यह मंज़ूर नहीं था
हुआ यूँ कि कल मैं ऑफिस के काम से कहीं जा रहा था. और एक जगह पर बाईक रोक दी थी. जहाँ बाईक रोकी थी उसी के दाहिनी तरफ एक कार खड़ी थी और वह भी रुकी हुई थी. मैं वहां मात्र दो या तीन सेकंड ही रुका था. और आगे बढ़ने के लिए पहला गियर लगाया ही था कि अचानक कार ड्राईवर ने बिना अपने बाएं तरफ देखे गाड़ी पीछे की तरफ़ हलकी सी बढ़ा दी थी. वह कार मुझसे सिर्फ हलकी सी स्पर्श ही कर पाए थी, लेकिन मेरा खड़े खड़े ही बैलेंस बिगड़ गया और मैं अपने दाहिने तरह गिर गया. यहाँ तक ठीक था बस घुटनों के बल गिरने की वजह से घुटनों में ही चोट आई थी लेकिन जिस वक़्त मैं नीचे गिरा उसी वक़्त एक टैक्सी बहुत तेज़ी से आ रही थी और उस टैक्सी का बम्पर मेरी बाईक से लड़ता हुआ मेरी खोपड़ी (हेलमेटशुदा) में बहुत ज़ोर से लगा और मैं दूर छिटक कर गिर पड़ा…
यह पूरा हादसा महज़ चंद सेकंडों में हुआ. तभी दो लोग आये और उन्होंने मुझे उठाया और सहारा देकर बाईक पकड़ा दी. मेरे घुटने में बहुत दर्द हो रहा था. और मेरी हथेली भी थोड़ी सी छिल गयी थी…
अब मैं संभल चुका था टैक्सी वाला जा चुका था और कार वाला भी जा चुका था. मेरी जो हालत थी वह तो थी ही लेकिन मुझे अपनी बाईक की हालत देखी नहीं गयी… बाईक के आगे वोयिज़र एक तरफ़ से पूरी तरह से टूट चुका था और और क्लच हैंडिल टूट गया था (गनीमत थी कि क्लच वायर नहीं टुटा था) आगे का मडगार्ड टूट गया था… कुल मिला कर गाडी की पूरी तरह से वाट लग गयी थी…
ख़ैर! हिम्मत करके मैंने अपनी टूटीफूटी बाईक स्टार्ट की और अपने ऑफिस आ गया. फ़िर मैंने पड़ोस के डॉ एजाज़ क्लिनिक से ट्रीटमेंट कराया और अपनी गाडी दुरुस्त करके को क़ैसरबाग़ के मशहूर मामू मकेनिक के यहाँ अपनी गाडी बनवाई. पुरे 900 रूपये का चुना लग गया….
अब आप सोच रहे होंगे कि यह आपबीती सूना कर कहना क्या चाहता है….
तो भैया मैं आपको बता दूं अगर मैंने हेलमेट नहीं लगाया होता तो मेरा सिर पके खरबूजे की तरह फट गया होता जब टैक्सी का बम्पर मेरी खोपड़ी से टकराया था…

ब्लोगर बन्धुवों अगर आप बाईक चलाते वक़्त हेलमेट यूज़ नहीं करते तो करना शुरू कर दीजिये क्यूंकि हेलमेट पर खर्च की गए क़ीमत सिर्फ एक टक्कर में ही वसूल हो जाती है…

अगर हेलमेट न होता तो पता नहीं मैं किस अस्पताल में पड़ा होता !!!

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>वह पहला भिखारी तो मैं ही था: सलीम ख़ान (A Short Story by Saleem Khan)

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एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ भोजन करने बैठा उसके सामने पूरी भूनी हुई मुर्गी थी, उसी समय एक भिकारी द्वार पर आकर कुछ माँगने लगा, उसने दरवाज़ा खोला और भिकारी को डाँट कर भगा दिया।
अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि कुछ ही दिनों में वह व्यक्ति भी निर्धन हो गया, सारी सम्पत्ती जाती रही यहाँ तक कि उसने अपनी पत्नी को तलाक़ भी दे दिया, उस महिला ने किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया। एक दिन जब अपने दूसरे पति के साथ जलपान हेतु बैठी तो उसी समय एक भिकारी दरवाज़े पर आ गया। दोनों के सामने पूरी भूनी हुई मर्ग़ी थी, भिकारी की आवाज़ सुनते ही पति ने पत्नी से कहा : द्वार खोलो और यह मुर्गी उस भिखारी को दे दो !
पत्नी भिकारी को भुनी मुर्गी देने के लिए जब द्वार पर आई तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गई कि भिकारी कोई दूसरा नहीं बल्कि उसी का पहला पति है ( जिसने भिकारी को डाँट कर भगाया था) मुर्गी उसे दे दिया और रोती हुई अपने पति के पास लौटी.
 जब पति ने रोने का कारण पूछा तो बोली : वह भिकारी मेरा पहला पति था, फिर उसने सारी घटना सुनाई कि किस प्रकार उसके पति ने एक भिकारी को डाँट कर भगा दिया उसके तुरन्त बाद उसकी सारी संपत्ति जाती रही यहाँ तक कि उसने हमें तलाक़ दे दिया, और मैंने आप से विवाह कर लिया.
पति ने कहा:

वह पहला भिखारी तो मैं ही था

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>मेरी आँखों का ख़्याल रखना: सलीम खान Just take care of my eyes Please!!!

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एक अंधी लड़की थी जो अपने आप से इसलिये घृणा करती थी क्योंकि वो अंधी थी। यही नही वो बाकि सभी से भी ऐसी ही घृणा करती थी सिवाय एक शख्स के और वो था उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड। क्योंकि वो हर पल लड़की की मदद के लिये हाजिर रहता था। वो हमेशा कहती थी कि अगर वो दुनिया देख पाती तो अपने ब्वॉयफ्रेंड से शादी कर लेती

उसकी तमन्ना पूरी हुई, एक दिन किसी ने उसे आँखें दान कर दी, अब वो सब देख सकती थी और साथ ही साथ अपने ब्वॉयफ्रेंड को भी। उसके ब्वॉयफ्रेंड ने उससे पूछा कि अब तो तुम दुनिया देख सकती हो!
क्या अब मुझ से शादी करोगी?>
लड़की को बहुत ही बड़ा झटका लगा, ये देख कर कि उसका ब्वॉयफ्रेंड भी अंधा है वो देख नही सकता!! उस लड़की ने शादी से इन्कार कर दिया

उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड आंखों में आँसू लिये चुपचाप वहाँ से चला गया.
और बाद में उसने लड़की को एक खत लिखा जिसमें लिखा था –
प्लीज मेरी आँखों का ख्याल रखना” (Just take care of my eyes Please!!!)
= = =
इस तरह से बदलता है इंसान जब उसका वक्त बदलता है। कुछ ही होते हैं जो ये याद रखते हैं कि वो पहले क्या थे और वो कौन लोग थे जो मुश्किल घड़ी में हमेशा उसकी मदद के लिये तैयार रहते थे।

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>इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली भारत के हित में: RBI निदेशक Islamic Banking System is better for India

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RBI के भूतपूर्व निदेशक का कहना है कि “बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में बदलाव किये बिना ही भारत में इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू की जा सकती है. अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के लिए एवम् अधिकारहीन और हाशिये के लोगों के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली वरदान साबित होगी.”
भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व निदेशक जनाब अब्दुल हसीब मुंबई में जमाते-इस्लामी हिंदी के तत्वाधान में आयोजित एक सेमीनार ‘Global Financial Crisis and Islamic Economic System’ / ‘विश्वव्यापी वित्तीय संकट और इस्लामी आर्थिक प्रणाली‘ में संबोधित कर रहे थे. भारत में इस्लामी आर्थिक प्रणाली की वक़ालत में उनका कहना था कि “रघुराम राजन कमिटी ने आर्थिक सेक्टर में सुधार हेतु जो तथ्य दिए उसमें इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली ही सबसे उपयुक्त बताई है. भारत के आर्थिक क्षेत्र में सुधार हेतु इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली को लागू करना सबसे बेहतर और कारगर काम होगा.” उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली और ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली में भी जानकारी और कहा कि दुनिया के बहुत से देश यह ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वह कारगर भी है. नयी सदी में जबकि दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है और सभी आर्थिक विपत्तियों से जूझ रहे हैं, इसके लिए ज़रूरि है कि इसका हल सोचा जाये.

इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली की ख़ूबी यह है कि वह अप्रभावित है और उससे भी बड़ी विशेषता है कि वह ‘केयरिंग और शेयरिंग’, पारदर्शी एवम् इंसानी सिद्धांत और उसूलों के क़रीब है.”, इस्लामिक बैंकिंग की राष्ट्रीय कमिटी के संयोजक जनाब अब्दुर-रकीब ने टिपण्णी करी, “जबकि जापान, फ्रांस, इंग्लैंड और दीगर मुल्क़ अरबों डॉलर के व्यापार के लिए आर्थिक उदारीकरण को अपनाकर स्वागत कर रहें हैं तो हम क्यूँ नहीं कर सकते”, उन्होंने आगे तर्क दिया.

उन्होंने यह भी सफाई दी कि जिन लोगों के मन में यह है कि यह आर्थिक प्रणाली केवल मुस्लिम के लिए है तो यह गलत है क्यूंकि यह प्रणाली पुरे विश्वस्तर पर कामयाब है और भारत के लिए भी इंशा-अल्लाह होगी. इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली पूरे इंसानियत के हित में है.

अपारदर्शिता और ब्याज ने आर्थिक विपत्तियों को और अधिक बढावा दिया है, जिसके चलते अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है.”, डॉ. शरीक़ निसार (अर्थशास्त्री व इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के ज्ञाता) ने विश्लेषित किया. उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के अंगों व प्रोडक्ट्स को बताते हुए कहा कि इनमें मुख्यतया मुदाराभा (speculation), कर्द-ए-हसना (Interest Free Loan), इजारा (Leasing) आदि हैं. लोगों को वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करना चाहिए ताकी वे जान सकें कि यह मौजूदा बैंकिंग प्रणाली से बेहतर है

इस सेमीनार में मौलाना रियाज़ अहमद खान (उपाध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र), डॉ. रहमतुल्लाह (अर्थशास्त्री), जे. ऍफ़ पाटिल (हेड ऑफ़ इकनॉमिक डिपार्टमेन्ट, कोल्हापुर यूनिवर्सिटी) भी शरीक हुए और अपने विचार प्रस्तुत किये.

-Saleem Khan

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>हिंदू भी मांसाहारी बन सकते हैं- भीष्म पितामह, महाभारत Hindu also eat meat: Bhishm Pitamah, Mahabharat

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अक्सर कुछ लोगों के मन में यह आता ही होगा कि जानवरों की हत्या एक क्रूर और निर्दयतापूर्ण कार्य है तो क्यूँ लोग मांस खाते हैं? जहाँ तक मेरा सवाल है मैं एक मांसाहारी हूँ. मुझसे मेरे परिवार के लोग और जानने वाले (जो शाकाहारी हैं) अक्सर कहते हैं कि आप माँस खाते हो और बेज़ुबान जानवरों पर अत्याचार करके जानवरों के अधिकारों का हनन करते हो.


शाकाहार ने अब संसार भर में एक आन्दोलन का रूप ले लिया है, बहुत से लोग तो इसको जानवरों के अधिकार से जोड़ते हैं. निसंदेह दुनिया में माँसाहारों की एक बड़ी संख्या है और अन्य लोग मांसाहार को जानवरों के अधिकार (जानवराधिकार) का हनन मानते हैं.

मेरा मानना है कि इंसानियत का यह तकाज़ा है कि इन्सान सभी जीव और प्राणी से दया का भावः रखे| साथ ही मेरा मानना यह भी है कि ईश्वर ने पृथ्वी, पेड़-पौधे और छोटे बड़े हर प्रकार के जीव-जंतुओं को हमारे लाभ के लिए पैदा किया गया है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की दी हुई अमानत और नेमत के रूप में मौजूद प्रत्येक स्रोत को किस प्रकार उचित रूप से इस्तेमाल करते है.

आइये इस पहलू पर और इसके तथ्यों पर और जानकारी हासिल की जाये…

1- माँस पौष्टिक आहार है और प्रोटीन से भरपूर है
माँस उत्तम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है. इसमें आठों अमीनों असिड पाए जाते हैं जो शरीर के भीतर नहीं बनते और जिसकी पूर्ति खाने से पूरी हो सकती है. गोश्त यानि माँस में लोहा, विटामिन बी वन और नियासिन भी पाए जाते हैं (पढ़े- कक्षा दस और बारह की पुस्तकें)



2- इन्सान के दांतों में दो प्रकार की क्षमता है
अगर आप घांस-फूस खाने वाले जानवर जैसे बकरी, भेड़ और गाय वगैरह के तो आप उन सभी में समानता पाएंगे. इन सभी जानवरों के चपटे दंत होते हैं यानि जो केवल घांस-फूस खाने के लिए उपयुक्त होते हैं. यदि आप मांसाहारी जानवरों जैसे शेर, चीता और बाघ आदि के दंत देखें तो उनमें नुकीले दंत भी पाएंगे जो कि माँस खाने में मदद करते हैं. यदि आप अपने अर्थात इन्सान के दांतों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे हमारे दांत नुकीले और चपटे दोनों प्रकार के हैं. इस प्रकार वे शाक और माँस दोनों खाने में सक्षम हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे नुकीले दांत क्यूँ देता. यह इस बात का सबूत है कि उसने हमें माँस और सब्जी दोनों खाने की इजाज़त दी है.

3- इन्सान माँस और सब्जियां दोनों पचा सकता है
शाकाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल केवल सब्जियां ही पचा सकते है और मांसाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल माँस पचाने में सक्षम है लेकिन इन्सान का पाचन तंत्र दोनों को पचा सकता है.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमको केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे हमें ऐसा पाचनतंत्र क्यूँ देता जो माँस और सब्जी दोनों पचा सकता है.

4- एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी हो सकता है
एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक अच्छा मुसलमान हो सकता है. मांसाहारी होना एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं.

5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता है
पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-

“ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है” (कुरआन 5:1)

“रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो” (कुरआन 16:5)

“और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो” (कुरआन 23:21)

6- hindoo dhaarmik granth maansaahaar kii anumati deten hai !
बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.

A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-
वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है

(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-
माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है

(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि –
स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 88 में धर्मराज युधिष्ठर और पितामह के मध्य वार्तालाप का उल्लेख किया गया है कि कौन से भोजन पूर्वजों को शांति पहुँचाने हेतु उनके श्राद्ध के समय दान करने चाहिए? प्रसंग इस प्रकार है –

“युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबली!मुझे बताईये कि कौन सी वस्तु जिसको यदि मृत पूर्वजों को भेट की जाये तो उनको शांति मिले? कौन सा हव्य सदैव रहेगा ? और वह क्या जिसको यदि सदैव पेश किया जाये तो अनंत हो जाये?”

भीष्म ने कहा, “बात सुनो, हे युधिष्ठिर कि वे कौन सी हवी है जो श्राद्ध रीति के मध्य भेंट करना उचित है और कौन से फल है जो प्रत्येक से जुडें हैं| और श्राद्ध के समय शीशम, बीज, चावल, बाजरा, माश, पानी, जड़ और फल भेंट किया जाये तो पूर्वजो को एक माह तक शांति मिलती है. यदि मछली भेंट की जाये तो यह उन्हें दो माह तक राहत देती है. भेंड का माँस तीन माह तक उन्हें शांति देता है| खरगोश का माँस चार माह तक, बकरी का माँस पांच माह और सूअर का माँस छह माह तक, पक्षियों का माँस सात माह तक, पृष्ठा नामक हिरन से वे आठ माह तक, रुरु नामक हिरन के माँस से वे नौ माह तक शांति में रहते हैं. “GAWAYA” के माँस से दस माह तक, भैस के माँस से ग्यारह माह तक और गौ माँस से पूरे एक वर्ष तक. प्यास यदि उन्हें घी में मिला कर दान किया जाये यह पूर्वजों के लिए गौ माँस की तरह होता है| बधरिनासा (एक बड़ा बैल) के माँस से बारह वर्ष तक और गैंडे का माँस यदि चंद्रमा के अनुसार उनको मृत्यु वर्ष पर भेंट किया जाये तो यह उन्हें सदैव सुख शांति में रखता है. क्लासका नाम की जड़ी-बूटी, कंचना पुष्प की पत्तियां और लाल बकरी का माँस भेंट किया जाये तो वह भी अनंत सुखदायी होता है. अतः यह स्वाभाविक है कि यदि तुम अपने पूर्वजों को अनंत काल तक सुख-शांति देना चाहते हो तो तुम्हें लाल बकरी का माँस भेंट करना चाहिए

7- हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित
हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.

8- पेड़ पौधों में भी जीवन
कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.

9- पौधों को भी पीड़ा होती है
वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञानं कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं लेकिन उनकी चीख इंसानों के द्वारा नहीं सुनी जा सकती. इसका कारण यह है कि मनुष्य में आवाज़ सुनने की अक्षमता जो श्रुत सीमा में नहीं आते अर्थात 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक इस सीमा के नीचे या ऊपर पड़ने वाली किसी भी वस्तु की आवाज़ मनुष्य नहीं सुन सकता है| एक कुत्ते में 40,000 हर्ट्ज़ तक सुनने की क्षमता है. इसी प्रकार खामोश कुत्ते की ध्वनि की लहर संख्या 20,000 से अधिक और 40,000 हर्ट्ज़ से कम होती है. इन ध्वनियों को केवल कुत्ते ही सुन सकते हैं, मनुष्य नहीं. एक कुत्ता अपने मालिक की सीटी पहचानता है और उसके पास पहुँच जाता है| अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.

10- दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!
एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए.

पवित्र कुरआन में कहा गया है –

ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

-सलीम खान

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>क्या मुसलमानों को आतंकवादी होना चाहिए Should every muslim be terrorist!

>आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो आतंक (भय) का कारण हो. जिसके आतंक अथवा भय से दूसरा डरे. एक चोर जब एक पुलिस वाले को देखता है तो उसे भय होता है. पुलिस वाला चोर की नज़र में आतंकवादी है. उसी तरह से हर एक मुस्लिम को असामाजिक तत्वों के लिए आतंकवादी ही होना चाहिए, मिसाल के तौर पर हर एक मुस्लिम को आतंक का पर्याय होना चाहिए, उनके लिए जो चोर हैं, डाकू हैं, बलात्कारी हैं…


जब कभी उपरोक्त क़िस्म के असामाजिक तत्व किसी मुसलमान को देखें तो उनके मन-मष्तिष्क में आतंक का संचार हो. हालाँकि यह सत्य है कि “आतंकवादी” शब्द सामान्यतया उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो जन-सामान्य में आतंक का कारण हो लेकिन एक सच्चे मुसलमान के लिए चाहिए कि वह आतंक का कारण बनें, चुनिन्दा लोगों के लिए जैसे असामाजिक तत्व ना कि निर्दोष के लिए. वास्तव में एक मुसलमान को जन-सामान्य के लिए शांति का पर्याय होना चाहिए.

एक ही व्यक्ति, एक ही कार्य के लिए दो अलगअलग लेबल (पैमाना) i.e. आतंकवादी और देशभक्त
भारत को जब फिरंगियों से आज़ादी नहीं मिली थी तब भारत देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश सरकार आतंकवादी कहती थी. उन्हीं लोगो को उसी कार्य के लिए भारतीय देश भक्त कहते थे. इस प्रकार एक ही कार्य के लिए, एक ही व्यक्ति के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) हुआ. एक उन्हें आतंकवादी कह रहा है तो दूसरा देश भक्त. जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के समर्थन में हैं वे उन्हें आतंकवादी ही मानते हैं वहीँ जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ थे वे उन्हें देश भक्त या स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं.


बहुत महत्वपूर्ण है किसी के बारे में इंसाफ करने से पहले या उसके बारे में राय कायम करने से पहले उसे स्वस्थ ह्रदय से सुना जाये, जाना जाये. दोनों तरह के तर्कों को सुना समझा जाये, हालातों को विश्लेषित किया जाये. उसके कृत्य के कारण और इरादे को भली प्रकार समझा और महसूस किया जाये, तब जाकर उसके बारे में राय कायम की जाये.

इस्लाम का अर्थ “शांति” होता है.

इस्लाम शब्द का उद्भव अरबी के “सलाम” शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है “शांति”.यह शांति का धर्म है और हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम के बुनियादी (fundamentals) ढांचें को माने और जाने और उस पर अमल करे और पूरी दुनिया में इसके महत्व को बताये. इस प्रकार हर मुस्लिम को इस्लाम के मौलिक (fundamentals) कर्तव्यों का पालन करते हुए fundamentalist होना चाहिए और terrorist* होना चाहिए.

सलीम खान

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>हाँ….मैं, सुरेश चिपलूनकर की ही तरह एक हिन्दू हूँ I am also a Hindu like Suresh Chiplunkar

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‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा

भारत वर्ष में रह कर अगर हम कहें की हिंदू शब्द की परिभाषा क्या हो सकती है? हिंदू शब्द के उद्भव का इतिहास क्या है? आख़िर क्या है हिंदू? तो यह एक अजीब सा सवाल होगा
लेकिन यह एक सवाल ही है कि जिस हिन्दू शब्द का इस्तेमाल वर्तमान में जिस अर्थ के लिए किया जा रहा है क्या वह सही है ?

मैंने पीस टीवी पर डॉ ज़ाकिर नाइक का एक स्पीच देखा, उन्होंने किस तरह से हिंदू शब्द की व्याख्या की मुझे कुछ कुछ समझ में आ गया मगर पुरी संतुष्टि के लिए मैंने अंतरजाल पर कई वेबसाइट पर इस शब्द को खोजा तो पाया हाँ डॉ ज़ाकिर नाइक वाकई सही कह रहे हैं. हिंदू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, कब हुई और किसके द्वारा हुई? इन सवालों के जवाब में ही हिंदू शब्द की परिभाषा निहित है

यह बहुत ही मजेदार बात होगी अगर आप ये जानेंगे कि हिंदू शब्द न ही द्रविडियन न ही संस्कृत भाषा का शब्द है. इस तरह से यह हिन्दी भाषा का शब्द तो बिल्कुल भी नही हुआ. मैं आप को बता दूँ यह शब्द हमारे भारतवर्ष में 17वीं शताब्दी तक इस्तेमाल में नही था. अगर हम वास्तविक रूप से हिंदू शब्द की परिभाषा करें तो कह सकते है कि भारतीय (उपमहाद्वीप) में रहने वाले सभी हिंदू है चाहे वो किसी धर्म के हों. हिंदू शब्द धर्म निरपेक्ष शब्द है यह किसी धर्म से सम्बंधित नही है बल्कि यह एक भौगोलिक शब्द है. हिंदू शब्द संस्कृत भाषा के शब्द सिन्धु का ग़लत उच्चारण का नतीजा है जो कई हज़ार साल पहले पर्सियन वालों ने इस्तेमाल किया था. उनके उच्चारण में ‘स’ अक्षर का उच्चारण ‘ह’ होता था

हाँ ! मैं सलीम खान हिंदू हूँ !!!
हिंदू शब्द अपने आप में एक भौगोलिक पहचान लिए हुए है, यह सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया था या शायेद इन्दुस नदी से घिरे स्थल पर रहने वालों के लिए इस्तेमाल किया गया था। बहुत से इतिहासविद्दों का मानना है कि ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अरब्स द्वारा प्रयोग किया गया था मगर कुछ इतिहासविद्दों का यह भी मानना है कि यह पारसी थे जिन्होंने हिमालय के उत्तर पश्चिम रस्ते से भारत में आकर वहां के बाशिंदों के लिए इस्तेमाल किया था।

धर्म और ग्रन्थ के शब्दकोष के वोल्यूम # 6,सन्दर्भ # 699 के अनुसार हिंदू शब्द का प्रादुर्भाव/प्रयोग भारतीय साहित्य या ग्रन्थों में मुसलमानों के भारत आने के बाद हुआ था

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में पेज नम्बर 74 और 75 पर लिखा है कि “the word Hindu can be earliest traced to a source a tantrik in 8th century and it was used initially to describe the people, it was never used to describe religion…” पंडित जवाहरलाल नेहरू के मुताबिक हिंदू शब्द तो बहुत बाद में प्रयोग में लाया गया। हिन्दुज्म शब्द कि उत्पत्ति हिंदू शब्द से हुई और यह शब्द सर्वप्रथम 19वीं सदी में अंग्रेज़ी साहित्कारों द्वारा यहाँ के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु प्रयोग में लाया गया।

नई शब्दकोष ब्रिटानिका के अनुसार, जिसके वोल्यूम# 20 सन्दर्भ # 581 में लिखा है कि भारत के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु (ईसाई, जो धर्म परिवर्तन करके बने को छोड़ कर) हिन्दुज्म शब्द सर्वप्रथम अंग्रेज़ी साहित्यकारों द्वारा सन् 1830 में इस्ल्तेमल किया गया था

इसी कारण भारत के कई विद्वानों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि हिन्दुज्म शब्द के इस्तेमाल को धर्म के लिए प्रयोग करने के बजाये इसे सनातन या वैदिक धर्म कहना चाहिए. स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्ति का कहना है कि “यह वेदंटिस्ट धर्म” होना चाहिए.

इस प्रकार भारतवर्ष में रहने वाले सभी बाशिंदे हिन्दू हैं, भौगोलिक रूप से! चाहे वो मैं हूँ या कोई अन्य.

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>इस्लाम में नारी की दशा व इसके परिणाम

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क़ुरआने मजीद और नारी

इस्लाम में नारी के विषय पर अध्धयन करने से पहले इस बात पर तवज्जो करना चाहिये कि इस्लाम ने इन बातों को उस समय पेश किया जब बाप अपनी बेटी को ज़िन्दा दफ़्न कर देता था और उस कुर्रता को अपने लिये इज़्ज़त और सम्मान समझता था। औरत दुनिया के हर समाज में बहुत बेक़ीमत प्राणी समझी जाती थी। औलाद माँ को बाप की मीरास में हासिल किया करती थी। लोग बड़ी आज़ादी से औरत का लेन देन करते थे और उसकी राय का कोई क़ीमत नही थी। हद यह है कि यूनान के फ़लासेफ़ा इस बात पर बहस कर रहे थे कि उसे इंसानों की एक क़िस्म क़रार दिया जाये या यह एक इंसान नुमा प्राणी है जिसे इस शक्ल व सूरत में इंसान के मुहब्बत करने के लिये पैदा किया गया है ताकि वह उससे हर तरह का फ़ायदा उठा सके वर्ना उसका इंसानियत से कोई ताअल्लुक़ नही है।

इस ज़माने में औरत की आज़ादी और उसको बराबरी का दर्जा दिये जाने का नारा और इस्लाम पर तरह तरह के इल्ज़ामात लगाने वाले इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि औरतों के बारे में इस तरह की आदरनीय सोच और उसके सिलसिले में हुक़ुक़ का तसव्वुर भी इस्लाम ही का दिया हुआ है। इस्लाम ने औरत को ज़िल्लत की गहरी खाई से निकाल कर इज़्ज़त की बुलंदी पर न पहुचा दिया होता तो आज भी कोई उसके बारे में इस अंदाज़ में सोचने वाला न होता। यहूदीयत व ईसाईयत तो इस्लाम से पहले भी इन विषयों पर बहस किया करते थे उन्हे उस समय इस आज़ादी का ख़्याल क्यो नही आया और उन्होने उस ज़माने में औरत को बराबर का दर्जा दिये जाने का नारा क्यों नही लगाया यह आज औरत की अज़मत का ख़्याल कहाँ से आ गया और उसकी हमदर्दी का इस क़दर ज़ज़्बा कहाँ से आ गया?

वास्तव में यह इस्लाम के बारे में अहसान फ़रामोशी के अलावा कुछ नही है कि जिसने तीर चलाना सीखाना उसी को निशाना बना दिया और जिसने आज़ादी और हुक़ुक का नारा दिया उसी पर इल्ज़ामात लगा दिये। बात सिर्फ़ यह है कि जब दुनिया को आज़ादी का ख़्याल पैदा हुआ तो उसने यह ग़ौर करना शुरु किया कि आज़ादी की यह बात तो हमारे पुराने लक्ष्यों के ख़िलाफ़ है आज़ादी का यह ख़्याल तो इस बात की दावत देता है कि हर मसले में उसकी मर्ज़ी का ख़्याल रखा जाये और उस पर किसी तरह का दबाव न डाला जाये और उसके हुक़ुक़ का तक़ाज़ा यह है कि उसे मीरास में हिस्सा दिया जाये उसे जागीरदारी और व्यापार का पाटनर समझा जाये और यह हमारे तमाम घटिया, ज़लील और पुराने लक्ष्यों के ख़िलाफ़ है लिहाज़ा उन्होने उसी आज़ादी और हक़ के शब्द को बाक़ी रखते हुए अपने मतलब के लिये नया रास्ता चुना और यह ऐलान करना शुरु कर दिया कि औरत की आज़ादी का मतलब यह है कि वह जिसके साथ चाहे चली जाये और उसका दर्जा बराबर होने के मतलब यह है कि वह जितने लोगों से चाहे संबंध रखे। इससे ज़्यादा इस ज़माने के मर्दों को औरतों से कोई दिलचस्बी नही है। यह औरत को सत्ता की कुर्सी पर बैठाते हैं तो उसका कोई न कोई लक्ष्य होता है और उसके कुर्सी पर लाने में किसी न किसी साहिबे क़ुव्वत व जज़्बात का हाथ होता है और यही वजह है कि वह क़ौमों की मुखिया होने के बाद भी किसी न किसी मुखिया की हाँ में हाँ मिलाती रहती है और अंदर से किसी न किसी अहसासे कमतरी में मुब्तला रहती है। इस्लाम उसे साहिबे इख़्तियार देखना चाहता है लेकिन मर्दों का आला ए कार बन कर नही। वह उसे इख़्तियार व इंतेख़ाब देना चाहता है लेकिन अपनी शख़्सियत, हैसियत, इज़्ज़त और करामत का ख़ात्मा करने के बाद नही। उसकी निगाह में इस तरह के इख़्तियारात मर्दों को हासिल नही हैं तो औरतों को कहाँ से हो जायेगा जबकि उस की इज़्ज़त की क़ीमत मर्द से ज़्यादा है उसकी इज़्ज़त जाने के बाद दोबारा वापस नही आ सकती है जबकि मर्द के साथ ऐसी कोई परेशानी नही है।

इस्लाम मर्दों से भी यह मुतालेबा करता है कि वह जिन्सी तसकीन के लिये क़ानून का दामन न छोड़े और कोई ऐसा क़दम न उठाएँ जो उनकी इज़्ज़त व शराफ़त के ख़िलाफ़ हो इसी लिये उन तमाम औरतों की निशानदहीकर दी गई जिनसे जिन्सी ताअल्लुक़ात का जवाज़ नही है। उन तमाम सूरतों की तरफञ इशारा कर दिया गया जिनसे साबेक़ा रिश्ता मजरूह होता है और उन तमाम ताअल्लुक़ात को भी वाज़ेह कर दिया जिनके बाद दूसरा जिन्सी ताअल्लुक़ मुमकिन नही रह जाता। ऐसे मुकम्मल और मुरत्तब निज़ामें ज़िन्दगी के बारे में यह सोचना कि उसने एक तरफ़ा फ़ैसला किया है और औरतों के हक़ में नाइंसाफ़ी से काम लिया है ख़ुद उसके हक़ में नाइंसाफ़ी बल्कि अहसान फ़रामोशी है वर्ना उससे पहले उसी के साबेक़ा क़वानीन के अलावा कोई उस सिन्फ़ का पुरसाने हाल नही था और दुनिया की हर क़ौम में उसे ज़ुल्म का निशाना बना लिया गया था।

औरत की हैसियत

و من آیاته ان خلق لکم من انفسکم ازواجا لتسکنوا الیها و جعل بینکم مودہ و رحمه (سوره روم آيت ۲۱)

उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारा जोड़ा तुम ही में से पैदा किया है ताकि तुम्हे उससे सुकूने ज़िन्दगी हासिल हो और फिर तुम्हारे दरमियान मुहब्बत व रहमत का जज़्बा भी क़रार दिया है।

आयते करीमा में दो अहम बातों की तरफ़ इशारा किया गया है:

1. औरत आलमे इंसानियत का ही एक हिस्सा है और उसे मर्द का जोड़ा बनाया गया है। उसकी हैसियत मर्द से कमतर नही है।

2. औरत का मक़सदे वुजूद मर्द की ख़िदमत नही है मर्द का सुकूने ज़िन्दगी है और मर्द व औरत के दरमियान दोनो तरफ़ा मुहब्बत और रहमत ज़रुरी है यह एक तरफ़ा मामला नही है।

و لهن مثل الذی عليهن بالمعروف و للرجال عليهن درجه (بقره آيت ۲۲۸)

औरतों के लिये वैसे ही हुक़ूक़ है जैसे उनके ज़िम्मे फ़रायज़ हैं मर्दों को उनके ऊपर एक और दर्जा हासिल है।

यह दर्जा हाकिमियत मुतलक़ा का नही है बल्कि ज़िम्मेदारी का है, मर्दों में यह सलाहियत रखी गई है कि वह औरतों की ज़िम्मेदारी संभाल सकें और इसी बेना पर उन्हे नान व नफ़्क़ा और इख़राजात का ज़िम्मेदार बनाया गया है।

فاستجاب لہم ربہم انی لا اضیع عمل عامل منکم من ذکر و انثی بعضکم من بعض (سورہ آل عمران آیت ۱۹۵)

तो अल्लाह ने उनकी दुआ को क़बूल कर लिया कि हम किसी अमल करने वाले के अमल को ज़ाया नही करना चाहते चाहे वह मर्द हो या औरत, तुम में बाज़ बाज़ से हैं।

ولا تتمنوا ما فضل اللہ بعضکم علی بعض للرجال نصیب مما اکتسبوا و للنساء نصیب مما اکتسبن (سورہ نساء آیہ ۳۲)

और देखो जो ख़ुदा ने बाज़ को बाज़ से ज़्यादा दिया है उसकी तमन्ना न करो, मर्दों के लिये उसमें से हिस्सा है जो उन्होने हासिल कर लिया है और इसी तरह से औरतों का हिस्सा है। यहाँ पर भी दोनो को एक तरह की हैसियत दी गई है और हर एक को दूसरे की फ़ज़ीलत पर नज़र लगाने से रोक दिया गया है।

و قل رب ارحمهما کما ربيانی صغيرا (سوره اسراء آيت ۲۳)

और यह कहो कि परवरदिगार उन दोनो (मा बाप) पर उसी तरह से रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह उन्होने मुझे पाला है।

इस आयते करीमा में माँ बाप दोनो को बराबर की हैसियत दी गई है और दोनो के साथ अहसान भी लाज़िम क़रार दिया गया है और दोनो के हक़ में दुआ ए रहमत की भी ताकीद की गई है।

يا ايها الذين آمنوا لا يحل لکم ان ترثوا النساء کرها و لا تعضلوهن لتذهبوا ببعض ما آتيتموهن الا ان ياتين بفاحشه مبينه و عاشروهن بالمعروف فان کرهتموهن فعسی ان تکرهوا شیءا و يجعل الله فيه خيرا کثيرا (نساء ۱۹)

ईमान वालो, तुम्हारे लिये जायज़ नही है कि औरत को ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और न यह हक़ है कि उन्हे अक़्द से रोक दो कि इस तरह जो तुम ने उनको दिया है उसका एक हिस्सा ख़ुद ले लो जब तक वह कोई खुल्लम खुल्ला बदकारी न करें और उनके साथ मुनासिब सुलूक करो कि अगर उन्हे ना पपसंद करते हो तो शायद तुम किसी चीज़ को ना पसंद करो और ख़ुदा उसके अंदर ख़ैरे कसीर क़रार दे।

و اذا طلقتم النساء فبلغن اجلهن فامسکوا هن بمعروف او سرحوين بمعروف ولا تمسکوهن ضرارا لتعتقدوا و من يفعل ذالک فقد طلم نفسه (سوره بقره آيت ۱۳۲)

और जब औरतों को तलाक़ दो और उनकी मुद्दते इद्दा क़रीब आ जाएँ तो उन्हे नेकी के साथ रोक लो वर्ना नेकी के साथ आज़ाद कर दो और ख़बरदार नुक़सान पहुचाने की ग़रज़ से मत रोकना कि इस तरह से ज़ुल्म करोगे और जो ऐसा करेगा वह अपने ही ऊपर ज़ुल्म करेगा।

ऊपर बयान होने वाली दोनो आयतों में मुकम्मल आज़ादी का ऐलान किया गया है। जहाँ आज़ादी का मक़सद शरफ़ और शराफ़त का तहफ़्फ़ुज़ है और जान व माल दोनो के ऐतेबार से साहिबे इख़्तियार होना है और फिर यह भी वाज़ेह कर दिया गया है कि उन पर ज़ुल्म हक़ीक़त में उन पर ज़ुल्म नही है बल्कि अपने ही ऊपर ज़ुल्म है इस लिये कि इससे सिर्फ़ उनकी दुनिया ख़राब होती है और इंसान उससे अपनी आख़िरत खराब कर लेता है जो दुनिया ख़राब कर लेने से कहीं ज़्यादा बदतर बर्बादी है।

الرجال قوامون علی النساء بما فضل اللي علی بعض و بما انفقوا من اموالهم (سوره نساء آيت ۳۴)

मर्द, औरतों के संरक्षक हैं और उस लिये कि उन्होने अपने माल को ख़र्च किया है।

आयते करीमा से बिलकुल साफ़ वाज़ेह हो जाता है कि इस्लाम का मक़सद मर्द को हाकिमे मुतलक़ बना देना और औरत से उसकी आज़ादी छीन लेना नही है बल्कि उसने मर्द को उसकी बाज़ ख़ुसूसियात की वजह से घर का ज़िम्मेदार बनाया है और उसे औरत के जान माल और आबरू का संरक्षक बनाया है। इसके अलावा इस मुख़्तसर हाकिमियत या ज़िम्मेदारी को भी मुफ़्त नही क़रार दिया है बल्कि उसके मुक़ाबले में उसे औरत के तमाम ख़र्चों का ज़िम्मेदार बना दिया है और ज़ाहिर सी बात है कि जब दफ़्तर का आफ़िसर या कारखाने का मालिक सिर्फ़ तन्ख़वाह देने की वजह से हाकिमियत के बेशुमार इख़्तियारात हासिल कर लेता है और उसे कोई आलमे इंसानियत की तौहीन क़रार नही देता है और दुनिया का हर मुल्क इसी पालिसी पर अमल कर लेता है तो मर्द ज़िन्दगी की तमाम ज़िम्मेदारियाँ क़बूल करने के बाद अगर औरत पर पाबंदियाँ लगा दे कि वह उसकी इजाज़त के बिना घर बाहर न जाये और घर ही में उसके लिये सुकून के वसायल फ़राहम कर दे ताकि उसे बाहर न जाना पड़े और दूसरे की तरफ़ हवस भरी निगाह से न देखना पड़े तो कौन सी हैरत की बात है यह तो एक तरह का बिलकुल साफ़ और सादा इंसानी मामला है जो शादी की शक्ल में मंज़रे आम पर आता है और मर्द का कमाया हुआ माल औरत का हो जाता है और औरत की ज़िन्दगी की सरमाया मर्द का हो जाता है मर्द औरत की ज़रुरियात को पूरा करने के लिये घंटों मेहनत करता है और बाहर से सरमाया फ़राहम करता है और औरत मर्द की तसकीन के लिये कोई ज़हमत नही करती है बल्कि उसका सरमाया ए हयात उसके वुजूद के साथ है इंसाफ़ किया जाये कि इस क़दर फ़ितरी सरमाए से इस क़दर मेहनती सरमाया का तबादला क्या औरत के हक़ में ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी कहा जा सकता है जबकि मर्द की तसकीन में भी औरत बराबर की शरीक और हिस्सेदार बनती है और यह जज़्बा एक तरफ़ा नही होता है और औरत के माल ख़र्च करने में मर्द को कोई हिस्सा नही मिलता है। मर्द पर यह ज़िम्मेदारी उसकी मर्दाना ख़ुसूसियात और उसके फ़ितरी सलाहियत की बेना पर रखी गई है वर्ना या तबादला मर्दों के हक़ में ज़ुल्म हो जाता और उन्हे यह शिकायत होती कि औरत ने हमें क्या सुकून दिया है और उसके मुक़ाबले में हम पर ज़िम्मेदारियों का किस क़दर बोझ लाद दिया गया है यह ख़ुद इस बात की दलील है कि यह जिन्स और माल का सौदा नही है बल्कि सलाहियतों की बुनियाद पर काम का बटवारा है। औरत जिस क़दर ख़िदमत मर्द के हक़ में कर सकती है उसका ज़िम्मेदार औरत को बना दिया गया है और मर्द जिस क़दर और की ख़िदमत कर सकता है उसका उसे ज़िम्मेदार बना दिया गया है और यह कोई हाकिमियत व जल्लादियत नही है कि इस्लाम पर नाइंसाफ़ी का इल्ज़ाम लगा दिया जाएँ और उसे औरत के हक़ का बर्बाद और ज़ाया करने वाला क़रार दिया जाये।

यह ज़रुर है कि आलमें इस्लाम में ऐसे मर्द बहरहाल पाये जाते हैं जो मेजाज़ी तौर पर ज़ालिम, बेरहम और जल्लाद हैं और उन्हे अगर जल्लादी के लिये कोई मौक़ा नही मिलता है तो उसकी तसकीन का सामान घर के अंदर फ़राहम करते हैं और अपने ज़ुल्म का निशाना औरत को बनाते हैं कि वह सिन्फ़े नाज़ुक होने की बेना पर मुक़ाबला करने के क़ाबिल नही है और उस पर ज़ुल्म करने में उन ख़तरों का अंदेशा नही है जो किसी दूसरे मर्द पर ज़ुल्म करने में पैदा होते हैं और उसके बाद अपने ज़ुल्म का जवाज़ क़ुरआने मजीद के इस ऐलान में तलाश करते हैं और उनका ख़्याल यह है कि क़व्वामियत निगरानी और ज़िम्मेदारी नही है बल्कि हाकिमियते मुतलक़ा और जल्लादियत है। हालाँकि क़ुरआने मजीद ने साफ़ साफ़ दो वुजूहात की तरफ़ इशारा कर दिया है जिसमें से एक मर्द की ज़ाती ख़ुसूसियत और इम्तेयाज़ी कैफ़ियत है और उसकी तरफ़ से औरत के इख़राजात की ज़िम्मेदारी है और खुली हुई बात है कि दोनो असबाब में न किसी तरह की हाकिमियत पाई जाती है और न जल्लादियत बल्कि शायद बात उसके बर अक्स नज़र आये कि मर्द में फ़ितरी इम्तेयाज़ था तो उसे उस इम्तेयाज़ से फ़ायदा उठाने के बाद एक ज़िम्मेदारी का मरकज़ बना दिया गया और इस तरह उसने चार पैसे हासिल किये तो उन्हे तन्हा खाने के बजाए उसमें औरत का हिस्सा क़रार दिया है और अब और औरत वह मालिका है जो घर के अंदर चैन से बैठी रहे और मर्द वह ख़ादिमें क़ौम है जो सुबह से शाम तक अहले खाने के आज़ूक़े की तलाश में हैरान व सरगरदान रहे। यह दरहक़ीक़त औरत की निसवानियत की क़ीमत है जिसके मुक़ाबले में किसी दौलत, शौहरत, मेहनत और हैसियत की कोई क़दर व क़ीमत नही है।

शादी शुदा ज़िन्दगी

शादी इंसानी ज़िन्दगी का अहम तरीन मोड़ है जब दो इंसान अलग लिंग से होने के बावजूद एक दूसरे की ज़िन्दगी में मुकम्मल तौर से दख़ील हो जाते हैं और हर को दूसरे की ज़िम्मेदारी और उसके जज़्बात का पूरे तौर पर ख़्याल रखना पड़ता है। इख़्तिलाफ़ की बेना पर हालात और फ़ितरत के तक़ाज़े जुदागाना होते हैं लेकिन हर इंसान को दूसरे के जज़्बात के पेशेनज़र अपने जज़्बात और अहसासात की मुकम्मल क़ुरबानी देनी पड़ती है।

क़ुरआने मजीद ने इंसान को इतमीनान दिलाया है कि यह कोई ख़ारेजी राबता नही है जिसकी वजह से उसे मसायल व मुश्किलात का सामना करना पड़े बल्कि यह एक फ़ितरी मामला है जिसका इंतेज़ाम ख़ालिक़े फ़ितरत ने फ़ितरत के अंदर वदीयत कर दिया है और इंसान को उसकी तरफ़ मुतवज्जेह भी कर दिया है। जैसा कि इरशाद होता है:

و من آيايه ان خلق لکم من انفسکم ازواجا لتسکنوا اليها و جعل بينکم موده و رحمه ان فی ذالک لآيات لقوم يتفکرون (سوره روم)

और अल्लाह की निशानियों में से यह भी है कि उसने तुम्हारा जोड़ा तुम ही में से पैदा किया है ताकि तुम्हे सुकूने ज़िन्दगी हासिल हो और फिर तुम्हारे दरमियान मवद्दत व रहमत क़रार दी है इसमें साहिबाने फ़िक्र के लिये बहुत सी निशानियाँ पाई जाती हैं।

बेशक इख़्तिलाफ़ सिन्फ़, इख़्तिलाफ़े तरबीयत, इख़्तिलाफ़े हालात के बाद मवद्दत व

रहमत का पैदा हो जाना एक अलामते क़ुदरत व रहमते परवरदिगार है जिसके लिये बेशुमार शोबे हैं और हर शोबे में बहुत सी निशानियाँ पाई जाती हैं। आयते करीमा में यह बात भी वाज़ेह कर दी गई है कि जोड़ा अल्लाह ने पैदा किया है यानी यह मुकम्मल ख़ारेजी मसला नही है बल्कि दाख़िली तौर पर हर मर्द में औरत के लिये और हर औरत में मर्द के लिये सलाहियत रख दी गई है ता कि एक दूसरे को अपना जोड़ा समझ कर बर्दाश्त कर सके और उससे नफ़रत व बेज़ारी का शिकार न हो और उसके बाद रिश्ते के ज़ेरे असर मवद्दत व रहमत का भी क़ानून बना दिया ताकि फ़ितरी जज़्बात और तक़ाज़े पामाल न होने पाएँ। यह क़ुदरत की हकीमाना निज़ाम है जिससे अलाहिदगी इंसान के लिये बेशुमार मुश्किलात पैदा कर सकती है चाहे इंसाने सियासी ऐतेबार से इस अलाहिदगी पर मजबूर हो या जज़्बाती ऐतेबार से क़सदन

मुख़ालेफ़त करे। अवलिया ए ख़ुदा भी अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी से परेशान रहे हैं तो उसका भी राज़ यही था कि उन पर सियासी, और तबलीग़ी ऐतेबार से यह फ़र्ज़ था कि ऐसी औरतों से निकाह करें और उन मुश्किलात का सामना करें ताकि दीने ख़ुदा फ़रोग़ हासिल कर सके और तबलीग का काम अंजाम पा सके। फ़ितरत अपना काम बहरहाल कर रही थी यह और बात है कि वह शरअन ऐसी शादी पर मजबूर और मामूर थे कि उनका एक मुस्तक़िल फ़र्ज़ होता है कि तबलीग़े दीन की राह में ज़हमते बर्दाश्त करें क्योकि तबलीग़ का रास्ता फूलों की सेज से नही गुज़रता है बल्कि पुर ख़ार वादियों से हो कर गुज़रता है।

उसके बाद क़ुरआने हकीम ने शादी शुदा ज़िन्दगी को मज़ीद बेहतर बनाने के लिये दोनो जोड़े की नई ज़िम्मेदारियों का ऐलान किया और इस बात को वाज़ेह कर दिया कि सिर्फ़ मवद्दत और रहमत से बात तमाम नही हो जाती है बल्कि कुछ उसके ख़ारेजी तक़ाज़े भी हैं जिन्हे पूरा करना ज़रुरी है वर्ना क़ल्बी मवद्दत व रहमत बे असर

हो कर रह जायेगी और उसका कोई नतीजा हासिल न होगा। इरशाद होता है:

هن لباس لکم انتم لباس لهن (سوره بقره آيت ۱۸۷)

औरतें तुम्हारे लिये लिबास हैं और तुम उनके लिये लिबास हो।

यानी तुम्हारा ख़ारेजी और समाजी फ़र्ज यह है कि उनके मामलात की पर्दा पोशी करो और उनके हालात को उसी तरह ज़ाहिर न होने जिस तरह लिबास इंसान की बुराईयों को ज़ाहिर नही होने देता है। इसके अलावा तुम्हारा एक फ़र्ज़ यह भी है कि उन्हे जम़ाने के सर्द व गर्म से बचाते रहो और वह तुम्हे ज़माने की सर्द व गर्म हवाओं से महफ़ूज़ रखें कि यह मुख़्तलिफ़ हवाएँ और फ़ज़ाएँ किसी भी इंसान की ज़िन्दगी को ख़तरे में डाल सकती हैं और उसके जान व आबरू को तबाह कर सकती हैं। दूसरी जगह इरशाद होता है:

نساءکم حرث لکم فاتوا حرثکم انی شءتم (سوره بقره)

तुम्हारी औरते तुम्हारी खेतियाँ हैं लिहाज़ा अपनी खेतियों में जब और जिस तरह चाहो आ सकते हो। (शर्त यह है कि खेती बर्बाद न होने पाये।)

इस बेहतरीन जुमले से बहुत से मसलों को हल तलाश किया गया है। पहली बात तो यह कि बात को एक तरफ़ा रखा गया है और लिबास की तरह दोनो को ज़िम्मेदार नही बनाया गया है बल्कि मर्द को मुख़ातब किया गया है कि इस रुख़ से सारी ज़िम्मेदारी मर्द पर आती है और खेती की सुरक्षा का सारा इंतेज़ाब किसान पर होता है खेत का इसका कोई ताअल्लुक़ नही होता जबकि पर्दा पोशी और ज़माने के सर्द व गर्म बचाना दोनो की ज़िम्मेदारियों में शामिल था।

दूसरी तरफ़ इस बात की वज़ाहत भी कर दी गई है कि औरत से संबंध और ताअल्लुक़ में उसकी उस हैसियत का लिहाज़ बहरहाल ज़रुरी है कि वह खेत की हैसियत रखती है और खेत के बारे में किसान को यह इख़्तियार को दिया गया जा सकता है कि फ़स्ल के तक़ाज़ों को देख कर खेत को वैसे ही छोड़ दे और खेती न करे लेकिन यह इख़्तियार नही दिया जा सकता है कि उसे तबाह व बर्बाद कर दे और समय से पहले या फस्ल के होने से पहले ही फसे काटना शुरु कर दे इसलिये इसे खेती नही कहते बल्कि हलाकत कहते हैं और हलाकत किसी भी क़ीमत पर जायज़ नही क़रार दी जा सकती।

मुख़्तसर यह कि इस्लाम ने शादी को पहली मंज़िल में फ़ितरत का तक़ाज़ा क़रार दिया फिर दाख़िली तौर पर उसमें मुहब्बत व रहमत की इज़ाफ़ा किया और ज़ाहिरी तौर पर हिफ़ाज़त और पर्दा पोशी को उसका शरई नतीजा क़रार दिया और आख़िर में इस्तेमाल की सारी शर्तें और क़ानून की तरफ़ इशारा कर दिया ताकि किसी बद उनवानी, बेरब्ती और बेलुत्फ़ी पैदा न होने पाये और ज़िन्दगी ख़ुश गवार अंदाज़ में गुज़र जाये।

बदकारी

शादी शुदा ज़िन्दगी की सुरक्षा के लिये इस्लाम ने दो तरह के इंतेज़ामात किये हैं: एक तरफ़ इस रिश्ते की ज़रूरत और अहमियत और उसकी सानवी शक्ल की तरफ़ इशारा किया है तो दूसरी तरफ़ उन तमाम रास्तो पर पाबंदी लगा दी है जिसकी वजह से यह रिश्ता ग़ैर ज़रुरी या ग़ैर अहम हो जाता है और मर्द को औरत या औरत को मर्द की ज़रूरत नही रह जाती है। इरशाद होता है:

ولا تقربوا الزنا انه کان فاحشه و ساء سبيلا (سوره اسراء)

और ख़बरदार ज़ेना के क़रीब भी न जाना कि यह खुली हुई बे हयाई और बदतरीन रास्ता है।

इस आयत में ज़ेना की दोनो बुराईयों की वज़ाहत की गई है कि शादी के मुमकिन होते हुए और उसके क़ानून के रहते हुए ज़ेना और बदकारी एक खुली हुई बे हयाई है कि यह ताअल्लुक़ उन्ही औरतों से क़ायम किया जाये जिन से निकाह हो सकता है तो भी क़ानून से ख़िलाफ़ काम करना या इज़्ज़त से खेलना एक बेग़ैरती है और अगर उन औरतों से रिश्ता क़ायम किया जाये जिन से निकाह मुमकिन नही है और उनका कोई पवित्र रिश्ता पहले से मौजूद है तो यह मज़ीद बेहयाई है कि इस तरह उस रिश्ते की भी तौहीन होती है और उसकी पवित्रता भी पामाल होती है।

फिर मज़ीद वज़ाहत के लिये इरशाद होता है:

ان الذين يحبون ان تشيع الفاحشه فی الذين آمنوا لهم عذاب الهم (سوره نور)

जो लोग इस बातो को दोस्त रखते हैं कि ईमान वालों के दरमियान बदकारी और बे हयाई फ़ैलाएँ तो उन के लिये दर्दनाक अज़ाब (सज़ा) है।

जिसका मतलब यह है कि इस्लाम इस क़िस्म के जरायम को आम करने और उसके फ़ैलाने दोनो को नापसंद करता है इसलिये कि इस तरह से एक तो एक इंसान की इज़्ज़त ख़तरे में पड़ जाती है और दूसरी तरफ़ ग़ैर मुतअल्लिक़ लोग में ऐसे जज़्बात पैदा हो जाते हैं और उनमें जरायम को आज़माने और उसका तजरुबा करने का शौक़ पैदा होने लगता है जिस का वाज़ेह नतीजा आज हर निगाह के सामने है कि जबसे फ़िल्मों और टी वी के ज़रिये जिन्सी मसायल को बढ़ावा मिलने लगा है हर क़ौम में बे हयाई में इज़ाफ़ा हो गया है और हर तरफ़ उसका दौर दौरा हो गया है और हर इंसान में उसका शौक़ पैदा हो गया है जिसका मुज़ाहरा सुबह व शाम क़ौम के सामने किया जाता है और उसका बदतरीन नतीजा यह हुआ है कि पच्छिमी समाज में सड़कों पर खुल्लम खुल्ला वह हरकतें हो रही हैं जिन्हे आधी रात के बाद फ़िल्मों के ज़रिये से पेश किया जाता है और उनके अपने गुमान के अनुसार अख़लाक़ियात का पूरी तरह से ख़्याल रखा जाता है और हालात इस बात की निशानदही कर रहे हैं कि आने वाला समय उससे भी ज़्यादा बद तर और भयानक हालात साथ लेकर आ रहा है और इंसानियत मज़ीद ज़िल्लत के किसी गढ़े में गिरने वाली है। क़ुरआने मजीद ने उन्हा ख़तरों को देखते हुए ईमान वालों के दरमियान इस तरह के बढ़ावे को मना और हराम क़रार दिया है ताकि एक दो लोगों की बहक जाना सारे समाज पर असर न डाल सके और समाज तबाही और बर्बादी का शिकार न हो। अल्लाह तआला ईमान वालों को इस बला से बचाये रखे।

Souces: http://www.al-shia.org

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>आतंकवाद पर केवल मुसलमानों का ही एकाधिकार है Muslim monopoly in terrorism

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान