स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था, कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था.

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जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था 
कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था

शाम से सुबह तक बस तेरी तलाश है  
तेरे बिना ज़िन्दगी मेरी जिंदा लाश है

तू नही तो ज़िन्दगी कैसी उदास है 
बुझती नही है ये भी कैसी प्यास है  

अक़्स-ऐ- आरज़ू लिए फिरते रहेंगे हम
पल-पल तेरी याद में मरते रहेंगे हम

मरासिम मुस्तकिल न सही, मिजाजे-आशिक़ी रहे
नगमा नहीं साज़ नही न सही तेरी मौसिक़ि रहे


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

Filed under: ज़िन्दगी की आरज़ू, सलीम खान

लेख सन्दर्भ

सलीम खान