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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 4

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वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास (All Parts)
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मत्स्य पुराण में मनु की कथा”
तब भगवान् मनु से यूँ बोले ‘ठीक है, ठीक है. तुमने मुझे भलीभांति पहचान लिया है, हे भूपाल ! थोड़े ही समय में पर्वत वन और उपवन से सहित यह पृथ्वी जल में मग्न हो जायेगी. इस कारण हे पृथ्वीपते! सभी जीव समूहों की रक्षा करने के लिए समस्त देवगणों द्वारा इस नौका का निर्माण किया गया है. सुव्रत ! जितने पसीने से उत्पन्न, अण्डों से उत्पन्न, और पृथ्वी से उत्पन्न जीव हैं तथा जितने गर्भ से उत्पन्न जीव हैं, उन सभी को इस नौका में चढ़ा कर तुम सबकी रक्षा करना. इसके बाद पृथ्वीपते प्रलय की समाप्ति में तुम जगत के अचल चल प्राणियों के प्रजापति होगे.तब सातों समुन्द्र एकमेव हो जायेंगे और इन तीनों लोकों को पूर्णरूप से एक ही आकार में रूपांतरित कर देंगे. सुव्रत उस वक़्त तुम इस वेद रुपी नौका को ग्रहण करके इस पर समस्त जीवों और बीजों को लाद देना.

देखा आपने कहानी एक ही है बस फ़र्क़ है तो बस उच्चारण का! नूह और मनु !! दोनों एक ही है!!!
और लीजिये भविष्य पुराण की कथा जिसमें यह फ़र्क़ भी नहीं है.

भविष्य पुराण में नाम का भी फ़र्क़ भी नहीं

एक बार विष्णु (ईश्वर) ने स्वप्न में कहा ‘हे वत्स न्युह ! यह मेरा वचन सुन लो, आज के सातवें दिन में प्रलय होगा और और तुम नाव में शीघ्र समारोहन करके जीवन की रक्षा करना. हे भक्तेंद्र! तू सर्वश्रेष्ठ हो जायेगा. उस ख्वाब में दी गयी आज्ञा को तू स्वीकार करके उस ने मज़बूत और बड़ी और नाव बनाई जो ३०० हाँथ लम्बी थी और ५० हाँथ चौड़ी थी. यह तीस हाँथ ऊँची और बहुत आकर्षक थी समस्त जीवों से भरी हुई थी. उस नौका पर अपने कुलों के साथ प्रवेश किया और विष्णु (ईश्वर) के ध्यान में लीं हो गए. वहां ४० दिन तक घोर वर्ष हुई. यह सम्पूर्ण भारत वर्ष जालों मेंप्लावित होकर सिन्धु बन गया. चारो सागर मिल गए. चारो ओर कोई जीव नज़र नहीं आ रहा था सिवाय न्युह व ब्रह्मवादी मुनि! न्युह अपने कुलों के साथ वहां था और जल की वर्ष समाप्त हो गयी….

अगले अंक में पढ़े:
तो क्या बाइबल और कुर-आन में मनु की कथा की पुराणों से नक़ल की गयी है?

::चलते चलते::
ईश्वर के नियम नहीं बदलते– ऋग्वेद (१:२४:१०)
अर्थात जो यह कहते है कि हमारा धर्म परिवर्तनशील है वह अन्धकार में है, क्यूंकि यह स्पष्ट है कि ईश्वर के नियम कभी नहीं बदलते बल्कि हर युग हर काम में यकसां ही होते हैं.

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>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 3

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वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास – Part 1
वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास – Part 2
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वेदों का ईशदूत कौन था?
कुछ दिन पहले मैंने इस विषय पर लेख लिखा था जिसमें यह सवाल किया था कि हिन्दू बताएं कि वेदों का ईशदूत कौन है?? अब मैं आपको बता दूं कि अगर आप वेदों, बाइबल, तौरेत और कुर-आन का विस्तृत रूप से गहन अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वह ईशदूत कोई और नहीं बल्कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ही थे, जिसे अन्य ग्रन्थों मनु या न्युह आदि कहा जाता है. आईये जाने कुर-आन, बाइबल और मत्स्य पुराण में इनका किस तरह ज़िक्र है, आपको पढ़ते पढ़ते ही समझ आ जायेगा कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ही मनु हैं….

कुर-आन में नूह (अ.) की कथा:
प्रश्न यह है कि यह ह. नूह (अ.) कौन थे? कुर-आन में दर्शाई गयी निम्न पंक्तियों से यह सहज ही पता चल जाता है–

… और नूह के पास वाणी भेजी गयी कि “तुम्हारी जाति में से अब तक जो आस्तिक हो चुके हैं उन के अतिरिक्त अब कोई और आस्था रखने वाला न होगा तो इन नकारने वालों की करतूतों पर तुम उदास न हो और हमारी देख रेख में तथा हमारे निर्देशन में एक नौका बनाओं औत उम मुझसे उनकी शिफारिश न करना जिन्होंने आतंक और अत्याचार किया. वे डूब कर रहेंगे.” और नूह ने नौका बनानी शुरू कर दी और जब कभी उनकी जाति के मुखिया उनके पास से गुजरते तो उन पर हंसते. उनकी हंसी उड़ाते. नूह ने उनसे कहा कि ” अगर तूम हम पर हंसते हो तो हम भी तुम पर हंसते हैं जैसे तुम हंस रहे हो” शीघ्र ही तुन्हें पता चल जायेगा कि किस पर प्रकोप आएगा.”…. यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ पहुंचा और पृथ्वी से पानी उबलने लगा तो हमने कहा कि “इस नौका में हर प्रकार के जोड़ों में से दो दो को चढ़ा लो और जिनके लिए आदेश हो चुका है उनको छोड़ कर अपने घरवालों और आस्तिकों को भी बैठा लो”. और उनके साथ आस्था करने वाले बहुत कम थे. और नूह ने कहा कि “इसमें (नौका में) सवार हो जाओ, अल्लाह ही के नाम से इसको चलना है और इसको ठहरना है. निसंदेह मेरा प्रभु बड़ा क्षमाशील है और बहुत दयालू है” और वह नौका में उन्हें लेकर पहाड़ जैसी मौजों में चलने लगी… और आदेश हुआ कि “हे पृथ्वी अपना पानी निगल जा और हे आकाश थम जा” और पानी घट गया और कार्य पूरा हो गया नौका “जूदि” नामक पड़ी पर आ ठहरी और कहा गया कि अत्याचार करने वाले दूर हो गए…” आदेश हुआ कि “हे नूह! हमारी ओर से सुरक्षा और आर्शीवाद लेकर उतरो, अपने ऊपर भी और उन जातियों पर भी जो तुम्हारे साथ्यों से उत्पन्न होंगी. और कुछ जातियों तो ऐसी भी होंगी जिन्हें हम कुछ दिन ढील देंगे और फिर उन पर हमारी ओर से प्रकोप होगा”

बाइबल में नूह की कथा

… और परमेश्वर ने पृथ्वी पर दृष्टि की तो देखा कि वह बिगड़ी हुई है क्यूंकि प्राणियों ने पृथ्वी पर अपने अपने चाल चलन बिगाड़ लिए हैं. तब परमेश्वर ने नूह से कहा कि “सब प्राणियों के अंत करने का प्रश्न मेरे समक्ष आ गया है. क्यूंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गयी है. इसलिए मैं उनका पृथ्वी सहित नाश कर डालूँगा. इसलिए तू इन्जिर वृक्ष की लकडी का एक जहाज़ बना और उसमें कोठरियां बनाना और भीतर बाहर उनमें राल लगाना और इस ढंग से उसको बनाना कि जहाज़ की लम्बाई ३०० हाँथ, चौड़ाई ५० हाँथ, ऊँचाई ३० हाँथ की हो. जहाज़ में एक खिड़की बनाना और उनके एक हाँथ ऊपर उसकी छत बनाना आर जहाज़ की एक तरफ़ एक द्वार रखना, और जहाज़ में पहला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना. और सुनो ! मैं स्वयं पृथ्वी पर जल प्रलय कर सब प्राणियों का नाश कर डालूँगा लेकिन तेरे संग मैं वचन बांधता हूँ इसलिए तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुवों सहित जहाज़ में प्रवेश कर जाओ और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो अर्थात एक नर और एक मादा जहाज़ में ले जाकर उन्हें जीवित रखना. एक एक जाति के पशु, पक्षी, और रेंगने वाले सब में से दो दो तेरे पास आयेंगे और….
…. सात दिन के बाद प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा और पृथ्वी पर ४० दिन तक प्रलय होने लगा और जल पृथ्वी पर अत्यंत बढ़ गया और यहाँ तक कि पृथ्वी के बड़े बड़े पहाड़ जलमग्न हो गए और क्या पक्षी और क्या घरेलू पशु और क्या जंगली पशु और पृश्वी पर सब चलने वाले प्राणी और जितने जंतु और सब मनुष्य मर गए….. केवल नूह के संग जो जहाज़ में थे बच गए. और जल पृथ्वी पर १५० दिन तक प्रबल रहा. … और १५० दिन जल पृथ्वी पर लगातार घटता रहा और जहाज़ “अराफ़ात” नामक पहाड़ पर टिक गया. … तब परमेश्वर ने नूह से कहा कि “तू अपने पुत्रों, पत्नी और बहुवों समेत जहाज़ से निकल आ… तब परमेश्वर ने नूह और उनके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा कि “फूलो फलो और बढो और पृथ्वी में भर जाओ”

(उत्पत्ति- अध्याय ६, ७, ८, ९)

अब आप निश्चय ही समझ गए होंगे कि कुर-आन और बाइबल में वर्णित नूह कौन थे. जी हाँ महा जल प्लावन वाले “मनु” जिनकी कथाये वैदिक धर्म में विस्तृत रूप से मिलती हैं….

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मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण में मनु की कथा

::चलते चलते::
डूबता हुए सूरज ने कहा- मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो? और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला — मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!

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>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 2

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आखिर फ़िर इतना मतभेद क्यूँ???


फिर यह इतनी भारी भूल कैसे हुई कैसे आखिर? इतने सारे धर्म, सबकी अलग अलग मान्यताएं, यह कैसे हुआ? इसका कारण है, अपने अपने मान्य ग्रन्थों से धर्म को समझ पाना!

मुसलमान केवल 1400 साल पूरानी क़ौम है, पर इन डेढ़ हज़ार सालों में उनमें यह बिगाड़ पैदा हो गया कि वह कुरआन पढ़ते तो हैं मगर उसका अर्थ नहीं जानते हैं. कितने ही मुसलमान हैं जिनको कुरआन ज़ुबानी याद है, कितने ही मुसलमान है जो रोज़ कुरआन पढ़ते हैं, पढ़ते हैं, मगर समझ कर नहीं पढ़ते हैं ! और कितने ही मुसलमान हैं जिनके घर में कुरआन सादर कपडे में लिप्त हुआ तो रखा है मगर वह इसे पढ़ते नहीं है और वैसे भी बिना समझे पढना, पढने के बराबर ही है. वे कुरआन को इतनी इज्ज़तअतिइज्ज़तदे देते हैं कि उसका मकसद ही फ़ौत (ज़ाया) हो जाता है.

उधर हिन्दू सबसे पुरी धार्मिक क़ौम है, कभी उनमें भी यही बिगाड़ आया होगा कि वे वेद पढ़ते तो होंगे मगर उसका अर्थ नहीं जानते होंगे. एक वक़्त ऐसा भी आया होगा कि जब वेद केवल उनके घर की शोभा बढ़ने के काबिल ही रह गए होंगे. उनका पाठ भी बंद हो गया होगा और आज हजारों साल बाद आलम यह है कि करोणों हिन्दू संसार में आते हैं और वेदों के एक बार भी दर्शन करे बगैर ही इस दुनिया से चले जाते हैं. प्रत्येक हिन्दू देववाणी केवल वेद को ही मानता है. रामायण और महाभारत वह स्वयं ऋषियों और मुनियों की कृति कहता है, परन्तु उनके घर में ये पुस्तकें तो होती हैं मगर वेद नहीं होते हैं

यही कारण है कि धर्म को देवकृत धर्म ग्रन्थों से प्राप्त करने से इतने बहुत से धर्म बन गए.

वेद और कुरआन एक दुसरे की पुष्टि करते हैं:

यदि ऐसा न हुआ होता तो सारी मानवजाति आज एक धर्म पर होती क्यूंकि सारे धर्म ग्रन्थ एक दुसरे की पुष्टि करते हैं उदहारण में मैं ईश्वर के पहले और अंतिम ग्रन्थ को पेश करना चाहता हूँ अर्थत वेद और कुरआन को.

कुरआन सभी देव-कृत धर्म ग्रन्थों में सबसे अंत में आया. अपने से पहले सारे ग्रन्थों की पुष्टि करते हुए आया. एक मुसलमान पर उन सभी पिछले ग्रन्थों पे आस्था और यकीन रखना ज़रूरी है. अन्यथा कुरआन के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 285 के अनुसार वह मुसलमान नहीं हो सकता. कुरआन कहता है कि–

और हमने सत्य के साथ (ऐ मुहम्मद सल्ल०) तुम पर किताब (कुरआन) उतारी जो इससे पहले आने वाले सभी ग्रन्थों की पुष्टि करती है और उन पर निगराँ है… (कुरआन- अध्याय 5 श्लोक संख्या 48)

आज तक कुरआन के विद्वानों ने यह न सोचा कि जिस आदि ग्रन्थ के बारे में बताया गया है वह कौन है? उन्होंने तो यह भी विचार नहीं किया कि संसार में मात्र एक ही ऐसी क़ौम है जो आदि ग्रन्थ रखने का दावा करती है उन्होंने वेदों को इस दृष्टि से देखने का प्रयत्न ही नहीं किया कि कुरआन के बताये हुए यह ही तो नहीं!? वह यह हमेशा से समझते चले आ रहे हैं कि जिन आदिग्रन्थों का ज़िक्र कुरआन में है वह अब इस संसार में कभी थे और अब उनका कोई अस्तित्व नहीं है। हालाँकि उनका सोचन भी एक हद तक जायज़ है.

हिन्दू मुसलमानों से भी अधिक बड़े अपराधी है।


हिन्दू मुसलमानों से भी अधिक बड़े अपराधी है क्यूंकि उन्होंने कभी मुसलामानों को यह नहीं बताया कि तुम्हारे कुरआन में वर्णित ग्रंह हमारे पास है। वह यह वेद ही तो है. और सच बात यह है कि वे बताते भी कैसे! वह तो स्वयं वेदों पूर्णतया कट चुके हैं. ख़ैर ! कुरआन वेदों की पुष्टि करता है और वेद उसके बारे में क्या कहते हैं? स्वयं देख ले–

“उर्ध्व मुख वाली अरणी (ज्ञान) पर नीचे मुख वाली अरणी (ज्ञान) को रखो तत्काल गर्भ वाली अरे में कामनाओं की वर्षा करने वाली “अग्नि” को प्रकट किया” (ऋग्वेद- अध्याय ३ हिम संख्या २९ श्लोक संख्या ३)

इस प्रकार हमने देखा कि यह दोनों ग्रन्थ – प्रथम ग्रन्थ (वेद) और अंतिम ग्रन्थ (कुरआन) एक दुसरे की पुष्टि कर रहे हैं.

यही समाधान है:

निष्कर्ष यह निकलता है कि यह समस्त ईश्वरीय ग्रन्थ जिनके एक सिरे पर वेद है दुसरे सिरे पर कुरआन; एक ही धर्म को लेकर आये थे। यह पूरा एक क्रम है। इन सभी में आस्था रखनी सभी के लिए अति आवश्यक है। इनकी सहायता से ही हम सत्य सनातन धर्म को समझा जा सकता है, जो ईश्वर की इच्छा है और जो हमेशा से चला आ रहा है; सत्य धर्म है.

अब संसार का धर्म एक होगा, घृणायें समाप्त हों जाएँगी। यही समाधान है.

तो आईये ! आईये उस सनातन धर्म की खोज करे जो वेदों है और जो कुरआन में है.

(अगले अंक में पढ़े: वेदों का ईशदूत कौन था और मनु (हज़रत नूह अलैहि०) की कहानी सभी धर्म की पुस्तकों में समान है)

:::चलते-चलते:::

“आ गैरियत के परदे एक बार फ़िर मिटा दें, बिछड़े को फ़िर मिला दें, नक्से मिटा दें.
सुनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती, आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें.”

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>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 1

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दीपावली के अवसर पर आपके सबके लिए यह नया लेख जिसका मज़मून है “वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास“. यह लेख एक धारावाहिक (नशिस्त) के अंदाज़ में होगी जिसके हर नशिस्त में हम यह साबित करते जायेंगे की वेद और कुरआन वेद और कुरआन कितने पास-पास हैं.
इस की शुरुआत मैं जमाते इस्लामी हिंद द्वारा जयपुर में आयोजित कार्यक्रम “कुरआन सबके लिए” अभियान के तहत आयोजित कुरआन कॉन्फ्रेन्स में कानपुर के स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य जी के उदघोष से करना चाहता हूँ जिसमें स्वामी जी ने यह उदघोष किया कि वेद और कुरआन की लगभग सभी शिक्षाएं समान ही हैं और हमें समानता की नाव पर सवार होकर हिन्दोस्तान ही नहीं पुरे विश्व को एकसूत्र में पिरो सकते है और सत्यमार्गी बन अपना कल्याण कर सकते है, मानवजाति का कल्याण कर सकते हैं. स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य जी ने कहा कि वेद और कुरआन एक हैं. दोनों में ही इंसानियत और भाईचारे की बात कही गई है. दोनों में ही ईश्वर को अजन्मा, अविनाशी व निराकार कहा गया है. स्वामी ने कहा कि वेद, उपनिषद व गीता की तरह कुरआन में भी बहुदेववाद का घोर विरोध किया गया है.
आज ईश्वर (अल्लाह) को मानते तो सब हैं परन्तु पहचानते बहुत कम लोग हैं. हम सभी जानते हैं कि ईश्वर एक ही है तो फ़िर यह प्रॉब्लम क्यूँ? सभी कहते हैं कि सभी का ईश्वर एक ही है लेकिन…. ये लेकिन कहाँ से आ रहा है? इसके जवाब के लिए हमें अपने सिर जोड़ कर बैठना पड़ेगा. आईये ! सर जोड़ कर बैठे. अपने लिए! इस संसार के लिए!! ईश्वर के लिए!!! यदि धर्म से विश्व की आग ठंडी करनी है तो पहले धर्मों की लडाई शांत करें. संसार में जितने भी आज धर्म हैं वह किसी न किसी रूप में एक अंतिम सत्ता की बडाई में विश्वाश रखते हैं. अल्लाह, लॉर्ड, ईश्वर या परमब्रह्म के नाम से एक सर्वशक्तिमान की मान्यता ही से हर धर्मं शुरू होता है.
हिन्दुओं से पूछिये– “क्या ईश्वर या परमब्रह्म केवल हिन्दुओं का है?” वे कहेंगे- “नहीं सबका है!” मुसलमान से पूछिये – “क्या अल्लाह केवल मुसलमान का है?” वे कहेंगे- “नहीं सबका है!” यही सवाल ईसाई या यहूदी से पूछने पर भी समान उत्तर ही  मिलेगा.
वेद और कुरआन का धर्म एक ही है:
एक ईश्वर ने जो धर्म स्थापित किया था उसमें आगे चल कर अनेक कमियां आ गयीं. अतः उसी प्राचीन, शास्वत, सनातन धर्म को स्थापित करने के लिए मनु (हज़रत नूह अलैहिस्सलाम) को भेजा  जिन्होंने धर्म ग्रन्थ (संभवतः) वेद संसार को दिए. फ़िर उसी ईश्वर की इच्छापूर्ति के लिए हज़रत मुसा अलैहिस्सलाम धर्म ग्रंथ “तौरेत” के साथ आये. हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शान्ति हो) ने कुरआन के साथ उसी सन्देश, उसी धर्म को स्थापित करने आये.
एक ईश्वर की इच्छा प्रत्येक युग के मनुष्यों के लिए भिन्न नहीं हो सकती. मूल मान्यताएं एक ही होंगी. फ़िर यह कैसे हुआ कि आदि काल में मनु (हज़रत नूह अलैहिस्सलाम) ने मनुष्यों को हिन्दू धर्म सिखाया, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने हजारों साल बाद आकर उन्हें यहूदी बना दिया, हजरत ईसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें ईसाई बना दिया और अंत में हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शान्ति हो) ने उन्हें मुसलमान बनाने को कहा. ऐसा हो ही नहीं सकता. यह अतार्किक सा है.
हम से अवश्य ही भारी भूल हुई है, कहीं न कहीं हम ऐसी भूल में फंस चुके है जिससे उबरना अब बेहद ज़रूरी हो गया है. हमारे लिए, मानवता के लिए, इस संसार के लिए, ईश्वर के लिए! यदि यह सभी ईशदूत, यह सभी ऋषिगण सच्चे थे और अवश्य ही सच्चे थे, उनके अपने जीवन इसके साक्षी हैं, उनके लाये हुए ईश्वरीय ग्रन्थ इसके गवाह हैं तो उन सभी ने एक ही धर्म की  शिक्षा दी होगी…
क्रमशः
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वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास” के इस भाग में बस इतना ही, अगली नशिस्त में यह जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर फ़िर इतना मतभेद क्यूँ???
-सलीम खान

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान