स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

Icon

सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>भारत में मुसलमानों का इतिहास Muslims in India – An Overview

>

भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था. इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे.
मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दहिर के राज्य में आता था. जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे. मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहाँ वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है. राजा दहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दुसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की. जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया. मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी. तब से (713 CE) आगे सदियाँ गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था. मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहाँ की जनता ने उसका नम आँखों से विदाई दी थी. भारत की जनता निराश थी क्यूंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था.

मलबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी. सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों,अफ़गान हों, मंगोल की संताने हों या मुग़ल.

ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया. अल्हम्दुलिल्लाह, दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है. दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहाँ रुकने की इजाज़त दी गयी थी. इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गाँठ कर ली और मुग़ल और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया.

भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही है, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दुसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं. मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहाँ की जनता से बेहत मुहब्बत भरा था और यहाँ की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकार और साथ-साथ रहे. वो लोग जो ये कहते है कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे है कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिन्दू बचे होते अर्थात नहीं. भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिन्दू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई. मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है.

भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहाँ के इतिहास पढने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दुसरे धर्मों के प्रति प्रेम-भावः, दुसरे धर्मों के लोगों के प्रति प्रेम-भावः, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की.

उस वक़्त जब यहाँ मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है. अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहाँ मुसलमानों की जनसँख्या सबसे ज्यादा होती. मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल ने भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए. “लम्हों ने की खता और सदियाँ भुगत रही है…”

जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए. भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया. जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया.

Filed under: मुसलमान

>भारत में मुसलमानों का इतिहास Muslims in India – An Overview

>

भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था. इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे.
मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दहिर के राज्य में आता था. जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे. मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहाँ वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है. राजा दहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दुसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की. जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया. मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी. तब से (713 CE) आगे सदियाँ गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था. मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहाँ की जनता ने उसका नम आँखों से विदाई दी थी. भारत की जनता निराश थी क्यूंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था.

मलबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी. सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों,अफ़गान हों, मंगोल की संताने हों या मुग़ल.

ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया. अल्हम्दुलिल्लाह, दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है. दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहाँ रुकने की इजाज़त दी गयी थी. इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गाँठ कर ली और मुग़ल और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया.

भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही है, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दुसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं. मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहाँ की जनता से बेहत मुहब्बत भरा था और यहाँ की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकार और साथ-साथ रहे. वो लोग जो ये कहते है कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे है कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिन्दू बचे होते अर्थात नहीं. भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिन्दू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई. मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है.

भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहाँ के इतिहास पढने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दुसरे धर्मों के प्रति प्रेम-भावः, दुसरे धर्मों के लोगों के प्रति प्रेम-भावः, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की.

उस वक़्त जब यहाँ मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है. अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहाँ मुसलमानों की जनसँख्या सबसे ज्यादा होती. मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल ने भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए. “लम्हों ने की खता और सदियाँ भुगत रही है…”

जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए. भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया. जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया.

Filed under: मुसलमान

>मुसलमान नहीं जागा तो, भारत सो जायेगा: जगतगुरु शंकराचार्य

>जगतगुरु शंकराचार्य जी ने इस्लाम धर्म और सनातन धर्म को एक ही कहा. ज्यादा जानने के लिए आप स्वयं वीडियो प्ले कर देख लें.

(उनकी वीडियो की स्क्रिप्ट को मैंने लिखा है उसे भी अगली पोस्ट में लिखूंगा)

Filed under: मुसलमान

>हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए. (Every Muslim should be Terrorist)

>आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो आतंक (भय) का कारण हो. जिसके आतंक अथवा भय से दूसरा डरे. एक चोर जब एक पुलिस वाले को देखता है तो उसे भय होता है. पुलिस वाला चोर की नज़र में आतंकवादी है. उसी तरह से हर एक मुस्लिम को असामाजिक तत्वों के लिए आतंकवादी ही होना चाहिए, मिसाल के तौर पर हर एक मुस्लिम को आतंक का पर्याय होना चाहिए, उनके लिए जो चोर हैं, डाकू हैं, बलात्कारी हैं…


जब कभी उपरोक्त क़िस्म के असामाजिक तत्व किसी मुसलमान को देखें तो उनके मन-मष्तिष्क में आतंक का संचार हो. हालाँकि यह सत्य है कि “आतंकवादी” शब्द सामान्यतया उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो जन-सामान्य में आतंक का कारण हो लेकिन एक सच्चे मुसलमान के लिए चाहिए कि वह आतंक का कारण बनें, चुनिन्दा लोगों के लिए जैसे असामाजिक तत्व ना कि निर्दोष के लिए. वास्तव में एक मुसलमान को जन-सामान्य के लिए शांति का पर्याय होना चाहिए.

एक ही व्यक्ति, एक ही कार्य के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) i.e. आतंकवादी और देशभक्त
भारत को जब फिरंगियों से आज़ादी नहीं मिली थी तब भारत देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश सरकार आतंकवादी कहती थी. उन्हीं लोगो को उसी कार्य के लिए भारतीय देश भक्त कहते थे. इस प्रकार एक ही कार्य के लिए, एक ही व्यक्ति के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) हुआ. एक उन्हें आतंकवादी कह रहा है तो दूसरा देश भक्त. जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के समर्थन में हैं वे उन्हें आतंकवादी ही मानते हैं वहीँ जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ थे वे उन्हें देश भक्त या स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं.


बहुत महत्वपूर्ण है किसी के बारे में इंसाफ करने से पहले या उसके बारे में राय कायम करने से पहले उसे स्वस्थ ह्रदय से सुना जाये, जाना जाये. दोनों तरह के तर्कों को सुना समझा जाये, हालातों को विश्लेषित किया जाये. उसके कृत्य के कारण और इरादे को भली प्रकार समझा और महसूस किया जाये, तब जाकर उसके बारे में राय कायम की जाये.

इस्लाम का अर्थ “शांति” होता है.

इस्लाम शब्द का उद्भव अरबी के “सलाम” शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है “शांति”.यह शांति का धर्म है और हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम के बुनियादी (fundamentals) ढांचें को माने और जाने और उस पर अमल करे और पूरी दुनिया में इसके महत्व को बताये. इस प्रकार हर मुस्लिम को इस्लाम के मौलिक (fundamentals) कर्तव्यों का पालन करते हुए fundamentalist होना चाहिए और terrorist* होना चाहिए.

सलीम खान

Filed under: मुसलमान

>मुसलमान बताएं कि एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति क्यों है? (Why more then one wives in Islam)

>कहते हैं कि मुसलमान चार शादियाँ करते हैं? सच ही है! लेकिन चार शादी और तलाक़ के मसले पर नॉन-मुस्लिम्स मुसलामानों से सवाल पूछते रहते है और मुसलमान इसका कोई जवाब नहीं दे पते. वजह क्यूंकि उन्हें खुद ही इसके बारे में ठीक से पता नहीं.


मैं आपको बता दूं दुनिया में वाहिद (single) ऐसी किताब है कुरआन जिसमें लिखा है और इसके मानने वालों (मुसलमानों) को यह निर्देश भी दिया गया है कि केवल एक से शादी करो. “marry only one”

इसके अलावा कोई ऐसी धार्मिक किताब नहीं जो उनके मानने वालों को यह निर्देश देती नहीं है. हमें मालूम है कि हिन्दू धर्म में भी ऐसी कोई किताब नहीं जो इसके मुताल्लिक़ कोई फैसला करती हो. बाइबल में ऐसे मुद्दे पर नहीं लिखा है कि आपको इसके मुताल्लिक़ क्या करने चाहिए.

हम जानते हैं कि दशरथ के कई बीवियां थीं. इसी तरह और भी बहुत से हिन्दू लोग थे इतिहास पढने पर पता चलता है कि उनकी एक से ज़्यादा बीवियां थीं. आपको पता है श्रीकृष्ण की कितनी बीवियां थीं…. दो…चार…दस….सौ….हज़ार…!!! श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार एक सौ आठ बीवियां थी…. १६,१०८

अगर उनके इतनी बीवियां हो सकती हैं तो हमारी चार क्यूँ नहीं…!!!???

हिन्दू धर्म में एक से ज़्यादा बीवियां रखने पर यह पाबन्दी नहीं है आप कितनी बीवियां रख सकते हैं. ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है कि आप सिर्फ एक से ही शादी करोगे.. एक से ज़्यादा और कितनी भी (कोई गिनती नहीं) बीवी रखने पर कोई पाबन्दी नहीं. ये तो भारत देश के कानून ने HUF एक्ट में इसकी मुमानियत करी है सन १९५१ में… हिन्दू धर्म कि किसी भी किताब में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है. खैर, मैं अब अपने मुद्दे पर आता हूँ कि क्यूँ मुसलमान (या कोई भी) एक से ज़्यादा बीवी रख सकता है?


आईये इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा करते हैं-

बहु-विवाह की परिभाषा-इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति के एक से अधिक पत्नी या पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं-

१. एक पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना। २. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना । (मैं इस विषय पर भी शीघ्र ही लिखूंगा)

इस्लाम में इस बात की इजाजत है कि एक पुरूष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाजत नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।

. पवित्र कुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है ‘केवल एक औरत से विवाह करो।

संसार में कुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो।’ दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे ‘वेद, ‘रामायण, ‘गीता, हो या ‘तलमुद व ‘बाइबल। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है।

बाद में हिन्दुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी। हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ के एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी के भी अनेक पत्नियाँ थीं। प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी। यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाजत है। तलमूद कानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। इनमें बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (९६० ई.-१०३० ई.) ने इसके खिलाफ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज १९५० ई. तक प्रचलित रहा और अन्तत: इसराईल के चीफ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।

२. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं सन १९७५ र्ई. में प्रकाशित ‘इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या ६६, ६७ में बताया गया है कि १९५१ ई. और १९६१ ई. के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह ५.०६ प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल ४.३१ प्रतिशत था।

भारतीय कानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गैर-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गैर कानूनी है। इसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियां होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियां रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन १९५४ ई. में हुआ जब हिन्दू विवाह कानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको गैर-कानूनी करार दिया गया। यह भारतीय कानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ। अब आइए इस पर चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरूष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?

३. पवित्र कुरआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र कुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो’ कुरआन में है- ”अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो”(·कुरआन, ४:३)

कुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नही थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ करने में समर्थ हो। कुरआन के इसी अध्याय अर्थात सूरा निसा आयत १२९ में कहा गया है : ”तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे।” (कुरआन, ४:१२९)

कुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरूष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है.

आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा नहीं करने की दृष्टि से पाँच भागों में बांटा है-

(A) फ़र्ज़ अर्थात अनिवार्य (B) मुस्तहब अर्थात पसन्दीदा (C) मुबाह अर्थात जिसकी अनुमति हो (D) मकरूह अर्थात घृणित, नापसन्दीदा (E) ‘हराम अर्थात निषेध

बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो.

४. औरतों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरूष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज्य़ादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है इसीलिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है.

५. भारत में पुरूषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और भ्रूण हत्या भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबदी पुरूषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक होगी.

६. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक हैअमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अठत्तर लाख ज्य़ादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरूषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरूषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरूषमैथुन) है ओर पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरूषों से चालीस लाख ज्य़ादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल खुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कितनी अधिक है।

७. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएंगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएंगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी। यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत: उस·के सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरूष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह गलत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे.

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इ़ज्ज़त बाकी रखना चाहता है।

सलीम खान

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी, मुसलमान

>मुसलमानों में प्रचलित बुराईयाँ (Bad habits in Muslims)

>

[पिछले महीने (माहे-रजब) में आपने लेख पढ़ा “रजब का महीना बिदआत के घेरे में” अब इसी सीरीज़ में पढें “शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ”]

शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ:

हम जब इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन व सुन्नत और हदीसों) का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि शाबान के महीने में विशिष्ट रूप से पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने केवल इतना प्रमाणित किया है कि आप इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा नफ़्लि रोजा रखते थे और इसके लिए कोई दिन सुनिश्चित नहीं करते थे. किन्तु आजकल बहुत सारे मुसलमान पंद्रहवी शाबान की रात और उसके दिन को बहुत महत्व और विशेषता और प्राथमिकता देते हुए ऐसे अधार्मिक कार्य करते हैं जिनका हमारे पैगम्बर (स.अ व.) की लाई हुई शरीयत से कोई सम्बन्ध नहीं है. बल्कि वो बिदआत की श्रेणी में आते हैं जिनसे इस्लाम ने सख्ती से रोका है. मैं उन बिदआतों में से कुछ का ज़िक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ जिससे कि हमारे समाज में अगर ऐसा कर रहा है तो वह संभल जाये और गुनाहगार होने से बच जाये.

१. पंद्रहवीं शाबान को रोज़ा रखना

२. पंद्रहवीं शाबान की रात को ‘सौ रक़आते’ की नमाज़ (हज़ारी नमाज़) पढना. हर रक़अतों में दस बार ‘सूरतुल इख़लास’ पढना और हर दो रक़अतों के बाद सलाम फेरना. आपको मैं बता दूं कि इस बुराई का जन्म हुआ था ४४८ हिजरी में बैतूल मुक़द्दीस में ‘इब्ने अबील हम्रा’ के द्वारा. इसके पूर्व इसका कोई अस्तित्व नहीं था. (फिर यह कसी वैध हो सकता है)

३. पंद्रहवीं शाबान की रात को औरतें का बन-ठन कर, सज संवर कर क़ब्रिस्तान जाना, वहां क़ब्रों पर चिरागाँ करना, अगरबत्ती जलना, फूल चढ़ाना, मुर्दों के सामने अपनी मुरादें रखना और अपना दुखड़ा सुनाना… आदि

४. घरों, सड़कों, क़ब्रों, मस्जिदों रौशनी करना जो कि मजुसियों की इजाद की हुई चीज़ है, जो आग को पूजते हैं और आग को अपना परमेश्वर मानते हैं.

५. मुसीबत और बला टालने, लम्बी उम्र और लोगों के बेनियाज़ी के लिए छह रक़अत नमाज़ पढ़ना.

६. पंद्रहवीं शाबान को हलवा बनाना (शुबरात का हलवा) इसके पीछे जो आस्था पाया जाता है वह अनाधार है और मात्र अफ़साना.

७. स रात रूहों के आगमन का अक़ीदा रखना और यह गुमान करना कि इस रात मरे हुए लोगों की रूहें घरों में आती हैं और रात भर बसेरा करती हैं. अगर घर में हलवा पातीं हैं तो ख़ुश हो कर लौट जाती हैं वरना मायूस हो कर लौटती हैं. इसलिए उनकी मनपसंद की चीज़ें पकवान बनाये जातें हैं.

८. यह भी भ्रान्ति फैली है कि शुबरात के पहले जो रूहें मरती हैं वे इस दिन आकर क़ब्रों से मिल जातीं हैं… यह अकीदा मात्र परिहास का संचार है और कुछ नहीं.

यह और इनके अतिरिक्त न जाने और कितने ही खुदसाख्ता काम किया जाता है जिसका पैगम्बर (स.अ.व.) ने कहा और न अल्लाह (स.व.त.) ने आदेश दिया और न ही खुलफा-ए-राशिदीन, अन्य सहाबा ताबेईन और सलफ़ ने किये हैं.

ऐ, मुसलमानों तुम अल्लाह का कहा मानों और रसूल (स.अ.व.) की इताअत करो.


-सलीम खान

Filed under: मुसलमान

>सचमुच मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं (Muslims are really insidious) !!!???

>

मैंने दो दिन पहले एक लेख पोस्ट लिखी थी जिसके मज़मून का इरादा यह था कि क्या मुसलमान धोखेबाज़ होते हैं? जैसा कि आजकल मिडिया और इस्लाम के आलोचक यह प्रोपगैंडा फैला रहें हैं. वह कुछ ऐसा ही करते जा रहें हैं कि इस्लाम ही है जो दुनिया के लिए खतरा है, यह जाने बिना यह समझे बिना हालाँकि सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि वे सब इस्लाम का विरोध इसलिए तो कतई भी नहीं करते उन्हें इस्लाम के बारे में मालूमात नहीं है बल्कि इसलिए कि पश्चिम देश (जो कि इस्लाम के दुश्मन हैं) के अन्धानुकरण के चलते विरोध करते हैं, आज देश में जैसा माहौल है और जिस तरह से अमेरिका और यूरोप आदि का अन्धानुकरण चल रहा है, ऐसा लगने लगा है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूलते ही जा रहे हैं और यह सब उन लोगों की साजिश के तहत होता जा रहा है. पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता को आत्मसात करने की जो होड़ लगी है, उससे निजात कैसे मिले? उसे कैसे ख़त्म किया जाये? उसे कैसे रोका जाये? मुझे लगता है कि भारत में मुस्लिम ही ऐसे हैं जो अब पश्चिम की भ्रष्ट सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ बोल रहें हैं और उससे अभी तक बचे हुए हैं. वरना बाक़ी भारतीय (जो गैर-मुस्लिम हैं) अमेरिका आदि देशों की चाल में आसानी से फंसते चले जा रहे हैं.


खैर, ऊपर मैंने जो सवाल उठाये हैं उन्हें आप अपने अंतर्मन से पूछिये? आप सोचें कि इनके क्या जवाब हो सकते हैं? वैसे मेरे दिमाग में एक जवाब है हम अपने हिन्दू भाईयों से यह गुजारिश करते हैं कि वे वेदों को पढें, पुराणों को पढें क्यूंकि जहाँ तक मुझे अपने अध्ययन से मालूम चला है कि केवल वेद ही ऐसी किताब है जिसे हमारे हिन्दू भाई ईश्वरीय किताब कहते हैं. और अगर यही है तो मेरा कहना है कि जो भी किताब वेद के खिलाफ़ जाती है उसका बहिस्कार करें, उसे बिलकुल भी न पढें. मैं इधर बैठ कर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि कुरान और वेद की शिक्षाएं ज़्यादातर सामान ही हैं.

मैं ये नहीं कहता कि हमारे और आपके बीच इख्तिलाफ़ (विरोधाभास) नहीं हैं. इख्तिलाफ़ तो है. लेकिन आज हम आपस में उन चीज़ों को आत्मसात करें जो हममे और आपमें यकसां (समान) हों. समानताओं पर आओ. विरोध की बातें कल डिस्कस करेंगे.

अल्लाह त-आला अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब में फरमाता है: “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं. (ताअलौ इला कलिमती सवा-इम बैनना व बैनकुम)” अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३

वैसे मैं ये पोस्ट लिखी है अपने एक ब्लॉग मित्र सुरेश चिपलूनकर से उन सवालों के जवाब में जिसमें उन्होंने कहा कि

सलीम भाई, द्विवेदी जी की बात को आगे बढ़ाईये और इस बात पर एक पोस्ट कीजिये कि क्या मुस्लिम धर्म, दूसरे धर्मों को पूर्ण आदर-सम्मान देता है? धर्म परिवर्तन अक्सर हिन्दू से ईसाई या हिन्दू से मुस्लिम होता है (अधिकांशतः लालच या डर से) तो विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या होने के बावजूद ईसाईयों और मुस्लिमों को अन्य धर्मों से धर्म-परिवर्तन करवाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? ऐसा क्यों होता है कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों को उतने अधिकार नहीं मिलते जितने भारत में अल्पसंख्यकों को मिले हुए हैं? मुस्लिम बहुल देशों में से अधिकतर में “परिपक्व लोकतन्त्र” नहीं है ऐसा क्यों है? सवाल तो बहुत हैं भाई…” और द्विवेदी जी कि टिपण्णी क्या थी “हर कोई अपने धर्म को सब से अच्छा बताता है। यह आप का मानना है कि इस्लाम सब से अच्छा धर्म है। दूसरे धर्मावलंबी इस बात को कतई मानने को तैयार न होंगे। हमें अपने धर्म को श्रेष्ठ मानने का पूरा अधिकार है। लेकिन दूसरे व्यक्ति के विश्वासों का आदर करना भी उतना ही जरूरी है.”

सुरेश भाई, सबसे पहले तो मैं यह आपको बताना चाहता हूँ कि यह इस्लाम धर्म है ना कि मुस्लिम धर्म. इस्लाम धर्म के अनुनाईयों को मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहते हैं. इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शांति’ और इसका एक और अर्थ होता है ‘आत्मसमर्पण‘ और इस्लाम धर्म को मानने वालों को मुस्लिम कहते हैं, उर्दू या हिंदी में मुसलमान कहते हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने भी लोग हैं वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ? (अर्थात नहीं)” सुरह १०, सुरह युनुस आयत (श्लोक) संख्या ९९

कहो: हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाये जो हम पर उतारी है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक और याक़ूब और उनकी संतान पर उतरी उसपर भी. और जो मूसा और ईसा और दुसरे नबियों को उनके रब के ओर से प्रदान हुईं (उस पर भी हम इमान रखते हैं) हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध में अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं.” सुरह ३, सुरह आले इमरान, आयत (श्लोक) ८४

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं. सही बात, नासमझी की बात से अलग हो कर स्पष्ट हो गयी है…” सुरह २, सुरह अल-बकरह, आयत २५६

इस्लाम अल्लाह त-आला (ईश्वर) के नज़दीक सबसे अच्छा दीन (धर्म) है, अल्लाह त-आला के नज़दीक पूरी दुनिया के मनुष्य उसी के बन्दे और पैगम्बर हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक दुसरे को पहचानों और वास्तव अल्लाह के यहाँ तुममे सबसे प्रतिष्ठित वह है जो तुममे सबसे अधिक डर रखता हो, निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है.” सुरह ४९, सुरह अल-हुजुरात, आयत (श्लोक) १३

ऐसी ही सैकणों आयतें अर्थात श्लोक कुरआन में मौजूद हैं. कुल मिला कर लब्बो-लुआब (सारांश) यह है कि इस्लाम धर्म के अनुनायी जिन्हें मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहा जाता है को अल्लाह की तरफ से हिदायत दी गयी है कि वह दीगर मज़ाहब के लोगों के साथ आदर का भाव रक्खो. हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) ने हमें यह ताकीद किया है कि सभी धर्मों के अनुनायीयों को उनके धर्म को मानने की आज़ादी है. साथ ही अल्लाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है.

ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम की आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे.

यह कहना कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहाँ अल्पसंख्यक (दुसरे धर्म के लोगों) को अधिकार नहीं मिलते, बिलकुल भी गलत है, इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन और सुन्नत) में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि दुसरे धर्म के लोगों को उनके रहन-सहन, धार्मिक आस्था और विश्वाश के प्रति गलत व्यवहार करे, बल्कि यह हिदायत ज़रूर है कि उन्हें सत्य मार्ग का रास्ता बताएं.

रही बात लोकतंत्र के सवाल का तो इसका जवाब थोडा बड़ा है फ़िलहाल इतना मैं बताना चाहूँगा कि हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के ज़माने में भी ख़लीफा लोगों का चुनाव होता था. सभी को अधिकार प्राप्त थे.

मैं अपनी पोस्ट कुरआन की इस बात (अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३) पर ख़त्म करना चाहता हूँ कि “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं.

अल्लाह (ईश्वर) हमें सत्यमार्ग पर चलने की हिदायत दे.
सलीम खान

Filed under: मुसलमान

>मुसलमान धोखेबाज़ होते हैं (Muslims are insidious) !!!???

>


मैंने हिंदुस्तान के दर्द (blog) पर देखा एक जनाब अपने दर्द का इज़हार कर रहे थे, एक नहीं दो नहीं अनेक पोस्ट एक साथ करके यानि जैसे जैसे दर्द उठा उन्होंने बयां कर दिया, दर्द होना भी चाहिए लेकिन उनका एक दर्द बड़ा ही ख़तरनाक उठा जिस पर मुझे यहाँ अपनी बात रखने पर मजबूर कर दिया | बात उन महाशय की नहीं है, मेरे से इससे पहले कई लोगों ने यही सवाल पूछा था |

सबसे पहले तो मैं एक बात कहना चाहूँगा कि आतंकियों का कोई धर्म या मज़हब नहीं होता.| वो सब के सब किसी न किसी राजनैतिक पार्टियों के लिए काम करते हैं| जैसे भारत में भी है और पकिस्तान में भी है, ये सब जानते हैं|


तो मैं बात कर कर रहा था उन महाशय की एक टिपण्णी की जिसमे उन्होंने लिखा कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं | गलती उनकी नहीं है दर असल उन्होंने भी चन्द लोगों की तरह गलती कर बैठी ठीक उसी तरह जैसे एक नयी नवेली ब्रांड न्यू कार को एक अनाडी ड्राईवर चलाये और एक्सीडेंट कर बैठे और लोग दोष दे कार को, ड्राईवर की करतूत पर| अरे! कार को ड्राईवर से मत तौलिये |


इन्ही महाशय की तरह मुझसे एक जनाब ने मुझसे पूछा कि सलीम एक बात बताओ “अगर इसलाम दुनिया का सबसे अच्छा धर्म है तो आखिर बहुत से मुसलमान बेईमान, बेभरोसा क्यूँ हैं और अधिकतर मुसलमान रुढिवादी और आतंकवादी क्यूँ होते है? क्यूँ वो धोखेबाज़ और रिश्वतखोरी और घूसखोरी में लिप्त हैं?

मैं उन सबका जवाब देता हूँ बिन्दुवार- (कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं!?)


(1) मिडिया इसलाम की ग़लत तस्वीर पेश करता है-

(क) इसलाम बेशक सबसे अच्छा धर्म है लेकिन असल बात यह है कि आज मिडिया की नकेल पश्चिम वालों के हाथों में है, जो इसलाम से भयभीत है| मिडिया बराबर इसलाम के विरुद्ध बातें प्रकाशित और प्रचारित करता है| वह या तो इसलाम के विरुद्ध ग़लत सूचनाएं उपलब्ध करता/कराता है और इसलाम से सम्बंधित ग़लत सलत उद्वरण देता है या फिर किसी बात को जो मौजूद हो ग़लत दिशा देता है या उछलता है|

(ख) अगर कहीं बम फटने की कोई घटना होती है तो बगैर किसी बगैर किसी प्रमाण के मसलमान को दोषी मान लिया जाता है और उसे इसलाम से जोड़ दिया जाता है | समाचार पत्रों में बड़ी बड़ी सुर्खियों में उसे प्रकाशित किया जाता है | फिर आगे चल कर पता चलता है कि इस घटना के पीछे किसी मुसलमान के बजाये किसी गैर मुस्लिम का हाथ था तो इस खबर को पहले वाला महत्व नहीं दिया जाता और छोटी सी खबर दे दी जाती है | (जैसा कि तौक़ीर के मामले मिडिया ने किया था)

(ग) अगर कोई 50 साल का मुसलमान व्यक्ति 15 साल की मुसलमान लड़की से उसकी इजाज़त और मर्ज़ी से शादी करता है तो यह खबर अख़बार के पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित की जाती है लेकिन अगर को 50 साल का गैर-मुस्लिम व्यक्ति 6 साल की लड़की के साथ बलात्कार करता है तो इसकी खबर को अखबार के अन्दर के पन्ने में संछिप्त कालम में जगह मिलती है (यहाँ पढें मेरा लेख)| प्रतिदिन अमेरिका में 2713 बलात्कार की घटनाये होती हैं और अपने भारत में हर आधे घंटे में एक औरत बलात्कार का शिकार होती है लेकिन वे खबरों में नहीं आती है या कम प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं| अमेरिका में ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि यह चीज़ें उनकी जीवनचर्या में शामिल हो गयी है |

(2) काली भेंडें (ग़लत लोग) हर समुदाय में मौजूद हैं-

मैं जानता हूँ कि कुछ मुसलमान बेईमान हैं और भरोसे लायक नहीं है | वे धोखाधडी आदि कर लेते हैं| लेकिन असल बात यह है कि मिडिया इस बात को इस तरह पेश करता है कि सिर्फ मुसलमान ही हैं जो इस प्रकार की गतिविधियों में लिप्त हैं | हर समुदाय के अन्दर कुछ बुरे लोग होते है और हो सकते है| इन कुछ लोगों की वजह से उस धर्म को या उस पूरी कौम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जिसके वह अनुनायी है या जिससे वह सम्बद्ध हैं|

(3) कुल मिलाकर मुसलमान सबसे अच्छे हैं-


मुसलमानों में बुरे लोगों की मौजूदगी होने के बावजूद मुसलमान सबसे कुल मिलाकर सबसे अच्छे लोग हैं | मुसलमान ही वह समुदाय है जिसमें शराब पीने वालों की संख्या सबसे कम है और शराब ना पीने वालों की संख्या सबसे ज्यादा | मुसलमान कुल मिला कर दुनिया में सबसे ज्यादा धन-दौलत गरीबों और भलाई के कामों में खर्च करते हैं | भारतीय मुस्लिम हर साल लगभग बारह हज़ार करोड़ (रु. १२,०००,०००,०००/-) खर्च करते हैं| सुशीलता, शर्म व हया, सादगी और शिष्टाचार, मानवीय मूल्यों और और नैतिकता के मामले में मुसलमान दूसरो के मुक़ाबले में बहुत बढ़ कर हैं|

(4) कार को ड्राईवर से मत तौलिये-

अगर आपको किसी नवीनतम मॉडल की कार के बारे में यह अंदाजा लगाना हो कि वह कितनी अच्छी है और फिर एक ऐसा शख्स जो कार चलने की विधि से परिचित ना हो लेकिन वह कार चलाना चाहे तो आप किसको दोष देंगे कार को या ड्राईवर को | स्पष्ट है इसके लिए ड्राईवर को ही दोषी ठहराया जायेगा | इस बात का पता लगाने के लिए कि कार कितनी अच्छी है, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उस के ड्राईवर को नहीं देखता है बल्कि उस कार की खूबियों को देखता है| उसकी रफ्तार क्या है? ईंधन की खपत कैसी है? सुरक्षात्मक उपायों से सम्बंधित क्या कुछ मौजूद है? वगैरह| अगर हम इस बात को स्वीकार भी कर लें कि मुस्लमान बुरे होते हैं, तब भी हमें इस्लाम को उसके मानने वालों के आधार पर नहीं तुलना चाहिए या परखना चाहिए | अगर आप सहीं मायनों में इस्लाम की क्षमता को जानने और परखने की ख़ूबी रखते हैं तो आप उसके उचित और प्रामादिक स्रोतों (कुरान और हदीसों) को सामने रखना होगा |


(5) इस्लाम को उसके सही अनुनायी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के द्वारा जाँचिये और परखिये-

अगर आप व्यावहारिक रूप से जानना चाहते है कि कार कितनी अच्छी है तो उसको चलने पर एक माहिर ड्राईवर को नियुक्त कीजिये| इसी तरह सबसे बेहतर और इस्लाम पर अमल करने के लिहाज़ से सबसे अच्छा नमूना जिसके द्वारा आप इस्लाम की असल ख़ूबी को महसूस कर सकते हैं– पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) हैं |

बहुत से ईमानदार और निष्पक्ष गैर मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस बात का साफ़ साफ़ उल्लेख किया है पैगम्बर सल्ल० सबसे अच्छे इन्सान थे| माइकल एच हार्ट जिसने इतिहास के सौ महत्वपूर्ण प्रभावशाली लोगपुस्तक लिखी है, उसने इन महान व्यक्तियों में सबसे पहला स्थान पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को दिया है|एक इस्लाम का आलोचक ऐसा कर रहा है. गैर-मुस्लिमों द्वारा पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने के इस प्रकार के अनेक नमूने है – जैसे थॉमस कार्लाईल, ला मार्टिन आदि|

सलीम खान

संरक्षक (स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़) लखनऊ व पीलीभीत, यूपी

Filed under: मुसलमान

>हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए

>

आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो आतंक (भय) का कारण हो. जिसके आतंक अथवा भय से दूसरा डरे. एक चोर जब एक पुलिस वाले को देखता है तो उसे भय होता है. पुलिस वाला चोर की नज़र में आतंकवादी है. उसी तरह से हर एक मुस्लिम को असामाजिक तत्वों के लिए आतंकवादी ही होना चाहिए, मिसाल के तौर पर हर एक मुस्लिम को आतंक का पर्याय होना चाहिए, उनके लिए जो चोर हैं, डाकू हैं, बलात्कारी हैं…

जब कभी उपरोक्त क़िस्म के असामाजिक तत्व किसी मुसलमान को देखें तो उनके मन-मष्तिष्क में आतंक का संचार हो. हालाँकि यह सत्य है कि “आतंकवादी” शब्द सामान्यतया उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो जन-सामान्य में आतंक का कारण हो लेकिन एक सच्चे मुसलमान के लिए चाहिए कि वह आतंक का कारण बनें, चुनिन्दा लोगों के लिए जैसे असामाजिक तत्व ना कि निर्दोष के लिए. वास्तव में एक मुसलमान को जन-सामान्य के लिए शांति का पर्याय होना चाहिए.

एक ही व्यक्ति, एक ही कार्य के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) i.e. आतंकवादी और देशभक्त
भारत को जब फिरंगियों से आज़ादी नहीं मिली थी तब भारत देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश सरकार आतंकवादी कहती थी. उन्हीं लोगो को उसी कार्य के लिए भारतीय देश भक्त कहते थे. इस प्रकार एक ही कार्य के लिए, एक ही व्यक्ति के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) हुआ. एक उन्हें आतंकवादी कह रहा है तो दूसरा देश भक्त. जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के समर्थन में हैं वे उन्हें आतंकवादी ही मानते हैं वहीँ जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ थे वे उन्हें देश भक्त या स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं.

बहुत महत्वपूर्ण है किसी के बारे में इंसाफ करने से पहले या उसके बारे में राय कायम करने से पहले उसे स्वस्थ ह्रदय से सुना जाये, जाना जाये. दोनों तरह के तर्कों को सुना समझा जाये, हालातों को विश्लेषित किया जाये. उसके कृत्य के कारण और इरादे को भली प्रकार समझा और महसूस किया जाये, तब जाकर उसके बारे में राय कायम की जाये.

इस्लाम का अर्थ “शांति” होता है.
इस्लाम शब्द का उद्भव अरबी के “सलाम” शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है “शांति”.यह शांति का धर्म है और हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम के बुनियादी (fundamentals) ढांचें को माने और जाने और उस पर अमल करे और पूरी दुनिया में इसके महत्व को बताये. इस प्रकार हर मुस्लिम को इस्लाम के मौलिक (fundamentals) कर्तव्यों का पालन करते हुए fundamentalist होना चाहिए और terrorist* होना चाहिए.

Filed under: मुसलमान

>मुसलमान अज़ान में सम्राट अकबर का नाम क्यूँ लेते हैं?

>गैर मुस्लिम यह समझते हैं कि मुसलमान नमाज़ के लिए बुलाने वास्ते दी जाने वाली पाँचों अज़ान में सम्राट अकबर का नाम लेते हैं!

“एक बार एक गैर मुस्लिम मंत्री भाषण दे रहे थे, वह भारत की उपलब्धियों और सफलताओं में भारतीय मुसलमानों के योगदान के बारे में रौशनी डाल रहे थे वह बता रहे थे भारतीय सम्राटों में महान सम्राट अकबर का स्थान सबसे ऊँचा है यही वजह है कि मुस्लिम अज़ान में सम्राट अकबर का नाम लेते हैं”

हलाँकि वह गैर मुस्लिम मंत्री जी बिलकुल भी सही नहीं कर रहे थे मैं गैर मुस्लिम में फैली इस ग़लतफ़हमी को दूर कर देता हूँ कि मुसलमान नमाज़ के लिए बुलाने वास्ते दी जाने वाली पाँचों अज़ान में सम्राट अकबर का नाम नहीं लेते हैं

अज़ान में लिया जाने वाला शब्द ‘अकबर’ का भारत के सम्राट अकबर से कोई वास्ता नहीं रखता है

अज़ान में लिया जाने वाला शब्द ‘अकबर’ तो भारत के सम्राट अकबर के जन्म से शताब्दियों पहले से प्रयोग किया जा रहा है

‘अकबर’ का अर्थ होता है ‘महान’
अरबी के शब्द ‘अकबर’ का मतलब होता है ‘महान’
जब हम अज़ान में कहते है ‘अल्लाहु अकबर’ तब हम यह संबोधित करते है कि ‘अल्लाह महान है’ यानि ‘Allah is Great’ or ‘Allah is the Greatest’ अर्थात ‘ईश्वर महान है’

और हम मुस्लिम उस एक और केवल एक अल्लाह की पूजा करते हैं, इबादत करते है जो कि बहुत महान है


लेखक: सलीम खान

Filed under: मुसलमान

लेख सन्दर्भ

सलीम खान