स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब! (Non-veg is permmited, reply to critics)

>पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा जिसका मज़मून था “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” मैंने उस लेख में यह बताने की कोशिश की कि “मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है” लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि “मांसाहार क्यूँ जायज़ है”


विमर्श को आगे बढ़ाने से पहले मैं जैसा कि हमेशा अपना एक बात कहना चाहता हूँ तो इस लेख का सन्देश यह है-

मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

आलोचकों ने कई तर्क रखे और आरोप भी मैं उन सभी तर्कों और आरोपों का मैं बिन्दुवार जवाब देता हूँ-

उनका पहला कथन/तर्क या आरोप था कि मैंने मांसाहार को धर्म से जोड़ कर बताया है:

मैं आपसे यह बता दूँ कि धर्म से मैंने जोड़ कर नहीं बताया है यह पहले से ही वेदों, कुरान, मनुस्मृति और महाभारत वगैरह में लिखा है. और यह सत्य है. ऐसा मुझे नहीं लगता कि मैंने यह गलत किया क्यूँ कि एक हमारा हिंदुस्तान ही तो है जहाँ धर्म को इतनी अहमियत दी जाती है. यही वजह थी कि मुझे अपनी बात सार्थक तरीके से कहने के लिए उन महान और मान्य ग्रन्थों का हवाला देना पड़ा अगर मैं सिर्फ यह कहता कि यह मेरा ओपिनियन है तो मेरी बात का असर बिलकुल भी नहीं होता. अगर आपको किसी इस तरह के मुद्दों पर कुछ कहना हो तो आप भी उन सभी हवालों (सार्थक, सत्य और मान्य) का ज़िक्र करना ना भूलें, क्यूंकि हो सकता है कि आपके विचार भले ही आपको सही लग रहें हों, और वह पूर्णतया ग़लत और निरर्थक हों | क्या यह बात सही नहीं है कि मांसाहार और शाकाहार के मुद्दे को हमारे हिंदुस्तान में धर्म की नज़र से देखा जाता? बिल्कुल -सही है, इसे धर्म विशेष से जोड़ कर ही देखा जाता है| इसी वजह से मुझे अपनी बात में उन किताबों के महत्वपूर्ण उद्वरण का उल्लेख करना पड़ा| अंतत मैं आपसे और आप सबसे यह कहना चाहूँगा कि (मेरा मानना यह है कि) मांसाहार और शाकाहार को धर्म के नज़र से नहीं देखना चाहिए.

अगला आरोप था कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है?

दूसरा तर्क यह है कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है. चलिए ठीक है, मैं आपकी बात से हद दर्ज़े तक सहमत हूँ कि जो हम खाते है उसका हमारे स्वाभाव पर सीधा प्रभाव पड़ता है| यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब| हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.
नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful.

अब मैं बहस को आगे बढ़ाता हूँ, मुआफ कीजियेगा. अब मैं वकील की तरह बोलूँगा क्यूंकि बात तर्क की है तो आगे बढ़ना भी ज़रूरी है- आप लोग पेड़-पौधों को खाते हैं, इसीलिए आप पेड़-पौधों की तरह व्यवहार करते हैं. that is, suppression of the senses… a lower species. मैं जानता हूँ कि यह गलत है | मैं सिर्फ एक वकील की तरह व्यवहार कर रहा हूँ| मुझे शर्म महसूस हो रही है इस तरह से लिखकर. यह सत्य नहीं हैं कि अगर आप पेड़-पौधों को खायेगे तो नींम श्रेणी की प्रजाति में गिने जायेंगे या जड़वत हैं| लेकिन जैसा आपने आर्गुमेंट्स दिया उसका यह जवाब था. मुझे मुआफ करें, I really apologize…अगर आप शाकाहारियों का दिल दुखा हो. यह वैज्ञानिक रूप से सत्य नहीं है, यह केवल तर्क था.

बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत ज़्यादा है:

कुछ लोग यह तक भी देतें हैं कि महात्मा गाँधी सरीखे लोग शाकाहारी थे! मैं महात्मा गाँधी की बहुत इज्ज़त करता हूँ क्यूंकि भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया और इंसानियत के लिए भी. लेकिन क्यूंकि महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे, शांतिप्रिय थे, यहाँ यह दर्शाने के लिए लिखा गया कि शाकाहार आपको शांतिप्रिय बनाता है.

तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं.

अब आपसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल जिसका आप जवाब दीजिये! अभी तक के इतिहास में मनुष्य में कौन सा ऐसा व्यक्ति या व्यक्तित्व था जो मशहूर था- सबसे ज्यादा लोगों को मारने के लिए- क्या आप गेस कर सकते है????

….. हिटलर , अडोल्फ़ हिटलर, उसने छह मिलियन यहूदियों को मारा था | क्या वह मांसाहारी था या शाकाहारी?…………शाकाहारी.

खैर! अब आगे आप कहेंगे कि – अडोल्फ़ हिटलर शाकाहारियों के नाम पर धब्बा था और वह एक अपवाद था. वह कभी कभी माँस भी खाता था| आपको यह भी अंतरजाल पर सर्च करने पर मिलेगा कि उसे जब गैस की समस्या होती थी, तब ही वह सब्जियां खाता था. मैं आपको फ्रेंक्ली एक बात बता दूँ कि वैज्ञानिक रूप से अडोल्फ़ हिटलर का छह मिलियन यहूदियों को मारने का सम्बन्ध उसके खानपान से बिल्कुल भी नहीं है और ना ही मैं यह कह रहा हूँ कि वह शाकाहारी था या मांसाहारी था. मैं यह जानने में बिल्कुल भी इंटररेस्टेड नहीं हूँ कि वह क्या खाता था क्यूँ कि इस बात में कोई वज़न नहीं है| मेरा मानना यह है कि अडोल्फ़ हिटलर द्वारा ऐसा करने का कारन कुछ और है जो कि पूर्णतया अमानवीय है और यह वह नहीं जो उनका खानपान है. मैं एक रिसर्च के बारे में बताता हूँ- अमेरिका में कुछ शाकाहारी और मांसाहारी विद्यार्थियों पर शोध किया गया तो पाया गया कि मांसाहारी विद्यार्थी ज़्यादा शांतिप्रिय और सोशल थे और शाकाहारी कम, यानि शाकाहारी ज़्यादा उग्र थे और मांसाहारी कम | लेकिन यह एक रिसर्च था- यह कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं. मैं इसे बिल्कुल भी यह साबित करने के लिए नहीं बता रहा हूँ कि मांसाहारी शांतिप्रिय होते हैं | चूँकि यह एक बहस है, मुझे यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है और आपने जो भी आरोप लगाये वह या तो तर्क थे या रिसर्च, वह कोई वज्ञानिक तथ्य नहीं थे.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शाकाहारियों ने अपनी काबिलियत और बुद्धि का लोहा मनवा लिया है. मैं आपको बता दूं बहुत से ऐसे भारतीय भी है जो बहुत बुद्दिमान थे और भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है लेकिन वे सब मांसाहारी. आपका कहने का मतलब यह था कि शाकाहारी ज़्यादा बुद्धिजीवी होते है, आपने नाम भी गिनवाए जैसे जार्ज बर्नाड- जो सौ साल जिया. मैं आपको कुछ नाम और बताता हूँ जो शाकाहारी थे और बहुत बड़े बुद्धिजीवी भी- अलबर्ट आइंस्टाइन, इसाक न्यूटन. ठीक है…!

आपको मैं एक बात और बता दूं कि यह भी सत्य ही है कि मांसाहारी जानवर ज़्यादा बुद्धिमान होते हैं बनिस्बत शाकाहारी जीव के | लेकिन मैं इसे भी बहस का हिस्सा नहीं बनाऊंगा कि मांसाहार आपको बुद्धिमान बनाता है क्यूंकि यह सब बातें हम इंसानों पर लागू नहीं हो सकती हैं | खानपान का इन्सान पर फर्क पड़ता है या आपके खानपान पर असर नहीं डालता है, यह एक तर्क है ………. तर्क से सत्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

आगे मैं आपसे एक पूछता हूँ क्या आप ‘यदुनाथ सिंह नायक’ के नाम से वाकिफ हैं, नहीं मालूम मैं बताता हूँ |यदुनाथ सिंह नायक एक शाकाहारी थे और सेना में कार्यरत थे | वह कुश्तीबाज़ थे और उन्होंने विश्व चैम्पियनशिप में दो मांसाहारी कुश्तीबाजों को धुल चटा दी थी| तब तो आपको लगेगा कि शाकाहार से इन्सान ज़्यादा ताक़तवर बनाता है| मैं आपको बता दूँ कि कुश्तीबाजी के विश्व चैम्पियंज़ में शाकाहारी भी हैं और मांसाहारी भी | बात को आगे बढाते हैं- अगर आप पुरे विश्व के लिहाज़ से अगर कम्पेयर करेंगे तो आप को पता है सबसे ज़्यादा कुश्तीबाजी में कौन मशहूर है- मांसाहारी!

बोडी बिल्डिंग में कौन सबसे ज़्यादा मशहूर है——अर्नाल्ड श्वार्ज्नेगेर | तेरह बार अर्नाल्ड ने विश्व विजेता का खिताब जीता था और सात बार मि. ओलंपिया और पांच बार मि. यूनिवर्स और एक बार मि. वर्ल्ड | आपको पता है- वह क्या था ??? वह शाकाहारी था या माँसाहारी ??? माँसाहारी !!! बोक्सेर- मोहमम्द अली – माँसाहारी ! कैसियस क्ले- माँसाहारी ! माइक टायसन- माँसाहारी !

कुछ ब्लॉग मित्रों ने यह पूछा था कि चिकन और मटन के साथ चावल और रोटी क्यूँ इस्तेमाल की जाती है?

अब इसका मैं क्या जवाब दूँ| मैं आपसे पूछूँ कि आप खाना खाने पर पानी क्यूँ पीते हैं? तो आप क्या जवाब देंगे | पानी शाकाहारी है या माँसाहारी !!!?

अब मैं निम्न तथ्यों के साथ अपनी बातें ख़त्म करना चाहता हूँ: 1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.
2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?
3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 – अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.
6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.
7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.
8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.
9 – जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना ‘मांसाहार आपको आक्रामक बनता है’ का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.
10 – यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.
11 – शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.
12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.
13 –कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.
14 – और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

उम्मीद करता हूँ कि यह लेख आपकी मांसाहार के प्रति उठ रही जिज्ञासाओं को शांत कर देगा… ईश्वर हम सबको सत्य की खोज का प्यासा बनाये !

सलीम खान
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Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार

>मांसाहार जायज़ नहीं है, यह एक राक्षशी कृत्य है. Non-veg is not-permitted, its an evil task

>इस्लाम धर्म में मांसाहार की रीति दयाभाव के प्रतिकूल है. पशुवध निर्दयता है. धर्म निर्दयता और हिंसा नहीं सिखाता है, फिर इस्लाम निर्दयी क्यूँ है, निर्दयता की शिक्षा क्यूँ देता है? अल्लाह का नाम लेकर पशुवध करने से क्या यह कृत्य वैध हो जाता है, अच्छा बन जाता है? ईद में करोडों जानवरों की हत्या क्यूँ करते है? क्या यह घोर निर्दयता नहीं???


यही कुछ सवाल और इससे मिलते जुलते सवालात मेरे पिछले लेख “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” और “मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब” में लोगों ने किये हालाँकि मेरे वे दोनों लेख अपने आप में पूर्ण थे लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस बात से से सहमत नहीं थे की मांसाहार भी जायज़ है. यह लेख ख़ास उनके लिए…

देखिये ! मैंने पहले ही कहा था कि “”मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

जीव-हत्या अपने आप में न सही है न गलत, न उचित है न अनुचित, न निंदनीय है न सराहनीय. इसका सही या गलत होना इस बात पर निर्भर है कि इसका ‘उद्देश्य’ क्या है? और…जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लाम का दृष्टिकोण भी यही है. मिसाल के तौर पर एक जीवित मेंढक की अनर्थ हत्या करके उसे फेंक दिया जाये तो यह इस्लामी दृष्टिकोण में हिंसा, निर्दयता और पाप है लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों को शल्य-प्रशिक्षण देने के लिए उनके द्वारा मेडिकल कॉलेज में जो मेंढकों को चीरा-फाड़ा जाता है, वह निरर्थक व व्यर्थ कार्य न होकर मनुष्य व मानवजाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा,न पाप बल्कि लाभदायक,वांछनीय और सराहनीय है.


और मेरा यह विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही माप-दंड, सम्पूर्ण मानव-समाज में, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है.यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तकाज़ों के अनुकूल भी.

हालाँकि जीव-हत्या या मांसाहार या पशु-बलि को विश्व के दो बड़े धर्मों सनातन धर्म और इस्लाम धर्म में मान्यता प्राप्त है. सनातन धर्म के अनुसार (कृपया मेरे पिछले लेख देखें) ‘देवताओं’ को प्रसन्न करने के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से पशु-बलि की अनुमति और आदेश मौजूद है. देखें: मनुस्मृति 3/123, 3/268, 5/23, 5/27-28 ऋग्वेद 10/27/2, 10/28/3 अथर्ववेद 9/6/4/43/8 और इस्लाम धर्म में भी अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि का विधान है. अतः सृष्टि के सृजनकर्ता- अल्लाह – अल्लाह ने पृथ्वी के सारे जीवधारी व अजीवधारी वस्तुए मनुष्य के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उपयोग या उपभोग के लिए बनाये गयी हैं. प्रत्यक्ष उपभोग में मांसाहार भी आता है और इसे इस्लाम व गैर-इस्लाम में सामान्य मान्यता मिली हुई है. कुछ व्यक्तिगत या सीमित सामुदायिक अप्वाद्द हैं, जो कि नगण्य हैं. जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लामी दृष्टिकोण को आसानी से समझा जा सकता है. हर जीवधारी (वनस्पति या पशु-पक्षी) को मनुष्य के उपभोग के लिए पैदा किया गया है. पेड़-पौधों, फलों, तरकारियों को काटना, तोड़ना (खाना और उपभोग करना) भी उसी प्रकार की जीव-हत्या है जिस प्रकार की मछलियाँ, पक्षियों एवं पशुओं को खाने के लिए उनकी हत्या करना.

अगर आप अभी भी संतुष्ट नहीं हैं तो आपकी आलोचनाओं का स्वागत है.

-सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार, शाकाहार

>सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है? Why Pork is prohibited?

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(आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं)

इस बार थोडा अलग मगर वास्तविकता के बेहद करीब, यह लेख आप ज़रूर पढ़े, मेरा निवेदन है कि आप ज़रूर पढें और पढने से ज्यादा समझें क्यूँकि केवल पढने से ज़रूरी है उसको पढ़ कर समझना | लेकिन होता क्या है कुछ लोग अगर उनके मतलब का लेख नहीं होता है तो उसे या तो पढ़ते ही नहीं हैं और अगर पढ़ते भी हैं तो बिना जाने बूझे अनाप शनाप कमेंट्स कर देते हैं | उदहारण स्वरुप अगर किसी ने लिखा कि मांसाहार खाना जायज़ है| तो उसके फलस्वरूप उस विषय के विरोध में बहुत कुछ अनाप शनाप बातें लिख डालते है | अपनी बातें बेतुके तर्कों से भर कर सिद्ध कर देतें हैं, मगर वहीँ कुछ लोग अपनी बात सही ढंग से लिखते हैं | मैं मानता हूँ कि मुझे अभी पूर्ण जानकारी हर एक विषय में नहीं है और मैं अभी लेखन में और ब्लॉग में नया और शिशु मात्र हूँ, मगर मुझे इतना पता है कि मैं जो लिखता हूँ वो सत्य है ! अब आप ज़रूर उद्वेलित होंगे कि वाह सलीम बाबू ! आप जो भी लिखते हैं वो सत्य है और बाकी सब झूठ| तो जनाब मेरा हमेशा की तरह एक ही जवाब मैं जो भी लिखता हूँ वो इसलिए सत्य है क्यूंकि मैं केवल वेदों, पुराण, भविष्य पुराण और कुरआन, हदीश और बाइबल आदि में दिए गए विषयों की व्याख्या करता हूँ.


ख़ैर ! मैं बात कर रहा था सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है?

मैं इस विषय पर बिन्दुवार आपको सम्बंधित धर्म ग्रन्थों का हवाला देते हुए समझाने का प्रयास करूँगा कि सूअर का माँस खाना क्यूँ हराम (निषेध) है?

कुरआन में सूअर का माँस का निषेध :

हम सबको पता है कि सूअर का माँस मुख्य रूप से इस्लाम में बिल्कुल ही मना (हराम, निषेध) है | कुरआन में कम से कम चार जगहों पर सूअर के माँस के प्रयोग को हराम और निषेध ठहराया गया है | हवाले के लिए देखें कुरआन की आयतें 2:173, 5:3, 6:145 & 16:115

पवित्र कुरआन की निम्न आयत इस बात को स्पष्ट करने को काफी है सूअर का माँस क्यूँ हराम किया गया है:

तुम्हारे लिए (खाना) हराम (निषेध) किया गया मुर्दार, खून, सूअर का माँस और वह खाना जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो ” – कुरआन 5:3

बाइबल में सूअर का माँस का निषेध:

ईसाईयों को यह बात उनके धार्मिक ग्रन्थ के हवाले से समझाई जा सकती है कि सूअर माँस हराम है | बाइबल में सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख लैव्य व्यवस्था (Book of Leviticus) में हुआ है-

सूअर जो चिरे अर्थात फटे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता इसलिए वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है” “इनके माँस में से कुछ ना खाना और उनकी लोथ को छूना भी नहीं, ये तुम्हारे लिए अशुद्ध हैं” -लैव्य व्यवस्था (11/7-8)

इसी प्रकार बाइबल के व्यवस्था विवरण (Book of Deuteronomy) में भी सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख किया गया है-

फिर सूअर जो चिरे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता, इस कारण वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है| तुम ना तो इनका माँस खाना और ना ही इनकी लोथ को छूना” – व्यवस्था विवरण (14/8)

सूअर का माँस बहुत से रोगों का कारण है:

ईसाईयों के अलावा जो अन्य गैर-मुस्लिम, हिन्दू या नास्तिक लोग है वे सूअर के माँस के हराम होने के सम्बन्ध में बुद्धि, तर्क और विज्ञानं के हवालों से ही संतुष्ट हो सकते हैं. सूअर के माँस से कम से कम सत्तर विभिन्न रोग जन्म लेते हैं. किसी व्यक्ति के शरीर में विभिन्न प्रकार के कीड़े (Helminthes) हो सकते हैं, जैसे गोलाकार कीड़े, नुकीले कीड़े, फीता क्रीमी आदि. सबसे ज्यादा घातक कीड़ा Taenia Solium है जिसे आम लोग फीताकार कीड़ा (Tapworm) कहते हैं. यह कीड़ा बहुत लम्बा होता है और आंतों में रहता है| इसके अंडे खून में सम्मिलित होकर शरीर के लगभग सभी अंगों तक पहुँच जाते हैं. अगर यह कीड़ा दिमाग में चला गया तो इन्सान की स्मरणशक्ति ख़त्म हो जाती है. अगर वह दिल में प्रवेश कर जाये तो इन्सान की ह्रदय गति रुक जाने का ख़तरा हो जाता है. अगर यह कीड़ा आँखों में पहुँच जाये तो इन्सान की देखने की क्षमता समाप्त कर देता है| अगर यह जिगर में में पहुँच जाये तो बहुत भारी क्षति पहुँचाता है. इस प्रकार यह कीड़ा शरीर के अंगों को क्षति पहुँचाने की क्षमता रखता है| एक दूसरा कीड़ा Trichura Tichurasis है.

सूअर के माँस के बारे में यह भ्रम है कि अगर उसे अच्छी तरह पका लिया जाये उसके भीतर पनप रहे उपरोक्त कीडों के अंडे नष्ट हो जाते हैं| अमेरिका में किये गए एक चिकित्सीय शोध में यह बात सामने आयी है कि चौबीस व्यक्तियों में से जो लोग Trichura Tichurasis के शिकार थे, उनमें से 22 लोगों ने सूअर के माँस को अच्छी तरह से पकाया था | इससे मालूम हुआ कि सामान्य ताप में सूअर का माँस पकाने से भी यह घातक अंडे समाप्त नहीं होते ना ही नष्ट हो पाते हैं.

सूअर के माँस में मोटापा पैदा करने वाले वाले तत्व पाए जाते हैं:

सूअर के माँस में पुट्ठों को मज़बूत करने वाले तत्व बहुत कम पाए जाते हैं, इसके विपरीत मोटापे को पैदा करने वाले तत्व बहुत ज्यादा पाए जातें हैं | मोटापा पैदा करने वाले ये तत्व खून की नाणीयों में दाखिल हो जाते हैं और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) और हार्ट अटैक (दिल के दौरे) का कारण बनते हैं| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पचास प्रतिशत से अधिक अमेरिकी लोग हाईपरटेंशन (अत्यंत मानसिक तनाव) के शिकार हैं और इसका मुख्य कारण है कि यह लोग सूअर का माँस प्रयोग करते हैं.

कुछ लोग यह तर्क प्रस्तुत करते है कि सूअर का पालन पोषण अत्यंत साफ़ सुथरे ढंग से और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए अनुकूल माहौल में किया जाता है| यह बात ठीक है कि स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनुकूल और स्वच्छ वातावरण में सूअरों को एक साथ उनके बाड़े में रखा जाता है| आप चाहे उन्हें स्वच्छ रखने की कितनी भी कोशिश करें परन्तु वास्तविकता यह है कि प्राकृतिक रूप से उनके अन्दर गन्दगी पसंदी मौजूद रहती है| इसलिए वे अपने शरीर और अन्य सूअरों के शरीर से निकली गन्दगी का सेवन करने से भी नहीं चूकते.

सूअर संसार का सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है: सूअर ज़मीन पर पाए जाने वाला सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है | वह जानवरों और इन्सान के बदन से निकलने वाली गन्दगी का सेवन करके जीता और पलता-बढ़ता है| इस जानवर को खुदा ने गंदगियों को साफ़ करने के उद्देश्य से पैदा किया है| गाँव और देहातों में जहाँ लोगों के लिए आधुनिक शौचालय नहीं है और लोग इस कारणवश खुले वातावरण (खेत, जंगल आदि) में शौच करते हैं, अधिकतर यह जानवर सूअर ही इन गंदगियों को साफ़ करता है.

सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है:

इस धरती पर सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है| केवल यही एक ऐसा जानवर है जो अपने साथियों को बुलाता है कि वे आयें और उसकी मादा के साथ यौन इच्छा को पूरी करें| अमेरिका में प्रायः लोग सूअर का माँस खाते है परिणामस्वरुप ऐसा कई बार होता है कि ये लोग डांस पार्टी के बाद आपस में अपनी बीवियों की अदला बदली करते हैं अर्थात एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से कहता है कि मेरी पत्नी के साथ तुम रात गुज़ारो और मैं तुम्हारी पत्नी के साथ रात गुज़ारुन्गा (फिर वे व्यावहारिक रूप से ऐसा करते है)| अगर आप सूअर का माँस खायेंगे तो सूअर की सी आदतें आपके अन्दर पैदा होंगी. हम भारतवासी अमेरिकियों को बहुत विकसित और साफ़ सुथरा समझते हैं | वे जो कुछ करते हैं हम भारतवासी भी उसे कुछ वर्षों बाद करने लगते हैं| Island पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार मुंबई में भी पत्नियों की अदला बदली की यह प्रथा उच्च और सामान्य वर्ग के लोगों में आम हो चुकी है.

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है!
सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार, शाकाहार, सुअर, सुवर

>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब! (Non-veg is permmited, reply to critics)

>पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा जिसका मज़मून था “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” मैंने उस लेख में यह बताने की कोशिश की कि “मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है” लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि “मांसाहार क्यूँ जायज़ है”


विमर्श को आगे बढ़ाने से पहले मैं जैसा कि हमेशा अपना एक बात कहना चाहता हूँ तो इस लेख का सन्देश यह है-

मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

आलोचकों ने कई तर्क रखे और आरोप भी मैं उन सभी तर्कों और आरोपों का मैं बिन्दुवार जवाब देता हूँ-

उनका पहला कथन/तर्क या आरोप था कि मैंने मांसाहार को धर्म से जोड़ कर बताया है:

मैं आपसे यह बता दूँ कि धर्म से मैंने जोड़ कर नहीं बताया है यह पहले से ही वेदों, कुरान, मनुस्मृति और महाभारत वगैरह में लिखा है. और यह सत्य है. ऐसा मुझे नहीं लगता कि मैंने यह गलत किया क्यूँ कि एक हमारा हिंदुस्तान ही तो है जहाँ धर्म को इतनी अहमियत दी जाती है. यही वजह थी कि मुझे अपनी बात सार्थक तरीके से कहने के लिए उन महान और मान्य ग्रन्थों का हवाला देना पड़ा अगर मैं सिर्फ यह कहता कि यह मेरा ओपिनियन है तो मेरी बात का असर बिलकुल भी नहीं होता. अगर आपको किसी इस तरह के मुद्दों पर कुछ कहना हो तो आप भी उन सभी हवालों (सार्थक, सत्य और मान्य) का ज़िक्र करना ना भूलें, क्यूंकि हो सकता है कि आपके विचार भले ही आपको सही लग रहें हों, और वह पूर्णतया ग़लत और निरर्थक हों | क्या यह बात सही नहीं है कि मांसाहार और शाकाहार के मुद्दे को हमारे हिंदुस्तान में धर्म की नज़र से देखा जाता? बिल्कुल -सही है, इसे धर्म विशेष से जोड़ कर ही देखा जाता है| इसी वजह से मुझे अपनी बात में उन किताबों के महत्वपूर्ण उद्वरण का उल्लेख करना पड़ा| अंतत मैं आपसे और आप सबसे यह कहना चाहूँगा कि (मेरा मानना यह है कि) मांसाहार और शाकाहार को धर्म के नज़र से नहीं देखना चाहिए.

अगला आरोप था कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है?

दूसरा तर्क यह है कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है. चलिए ठीक है, मैं आपकी बात से हद दर्ज़े तक सहमत हूँ कि जो हम खाते है उसका हमारे स्वाभाव पर सीधा प्रभाव पड़ता है| यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब| हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.
नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful.

अब मैं बहस को आगे बढ़ाता हूँ, मुआफ कीजियेगा. अब मैं वकील की तरह बोलूँगा क्यूंकि बात तर्क की है तो आगे बढ़ना भी ज़रूरी है- आप लोग पेड़-पौधों को खाते हैं, इसीलिए आप पेड़-पौधों की तरह व्यवहार करते हैं. that is, suppression of the senses… a lower species. मैं जानता हूँ कि यह गलत है | मैं सिर्फ एक वकील की तरह व्यवहार कर रहा हूँ| मुझे शर्म महसूस हो रही है इस तरह से लिखकर. यह सत्य नहीं हैं कि अगर आप पेड़-पौधों को खायेगे तो नींम श्रेणी की प्रजाति में गिने जायेंगे या जड़वत हैं| लेकिन जैसा आपने आर्गुमेंट्स दिया उसका यह जवाब था. मुझे मुआफ करें, I really apologize…अगर आप शाकाहारियों का दिल दुखा हो. यह वैज्ञानिक रूप से सत्य नहीं है, यह केवल तर्क था.

बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत ज़्यादा है:

कुछ लोग यह तक भी देतें हैं कि महात्मा गाँधी सरीखे लोग शाकाहारी थे! मैं महात्मा गाँधी की बहुत इज्ज़त करता हूँ क्यूंकि भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया और इंसानियत के लिए भी. लेकिन क्यूंकि महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे, शांतिप्रिय थे, यहाँ यह दर्शाने के लिए लिखा गया कि शाकाहार आपको शांतिप्रिय बनाता है.

तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं.

अब आपसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल जिसका आप जवाब दीजिये! अभी तक के इतिहास में मनुष्य में कौन सा ऐसा व्यक्ति या व्यक्तित्व था जो मशहूर था- सबसे ज्यादा लोगों को मारने के लिए- क्या आप गेस कर सकते है????

….. हिटलर , अडोल्फ़ हिटलर, उसने छह मिलियन यहूदियों को मारा था | क्या वह मांसाहारी था या शाकाहारी?…………शाकाहारी.

खैर! अब आगे आप कहेंगे कि – अडोल्फ़ हिटलर शाकाहारियों के नाम पर धब्बा था और वह एक अपवाद था. वह कभी कभी माँस भी खाता था| आपको यह भी अंतरजाल पर सर्च करने पर मिलेगा कि उसे जब गैस की समस्या होती थी, तब ही वह सब्जियां खाता था. मैं आपको फ्रेंक्ली एक बात बता दूँ कि वैज्ञानिक रूप से अडोल्फ़ हिटलर का छह मिलियन यहूदियों को मारने का सम्बन्ध उसके खानपान से बिल्कुल भी नहीं है और ना ही मैं यह कह रहा हूँ कि वह शाकाहारी था या मांसाहारी था. मैं यह जानने में बिल्कुल भी इंटररेस्टेड नहीं हूँ कि वह क्या खाता था क्यूँ कि इस बात में कोई वज़न नहीं है| मेरा मानना यह है कि अडोल्फ़ हिटलर द्वारा ऐसा करने का कारन कुछ और है जो कि पूर्णतया अमानवीय है और यह वह नहीं जो उनका खानपान है. मैं एक रिसर्च के बारे में बताता हूँ- अमेरिका में कुछ शाकाहारी और मांसाहारी विद्यार्थियों पर शोध किया गया तो पाया गया कि मांसाहारी विद्यार्थी ज़्यादा शांतिप्रिय और सोशल थे और शाकाहारी कम, यानि शाकाहारी ज़्यादा उग्र थे और मांसाहारी कम | लेकिन यह एक रिसर्च था- यह कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं. मैं इसे बिल्कुल भी यह साबित करने के लिए नहीं बता रहा हूँ कि मांसाहारी शांतिप्रिय होते हैं | चूँकि यह एक बहस है, मुझे यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है और आपने जो भी आरोप लगाये वह या तो तर्क थे या रिसर्च, वह कोई वज्ञानिक तथ्य नहीं थे.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शाकाहारियों ने अपनी काबिलियत और बुद्धि का लोहा मनवा लिया है. मैं आपको बता दूं बहुत से ऐसे भारतीय भी है जो बहुत बुद्दिमान थे और भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है लेकिन वे सब मांसाहारी. आपका कहने का मतलब यह था कि शाकाहारी ज़्यादा बुद्धिजीवी होते है, आपने नाम भी गिनवाए जैसे जार्ज बर्नाड- जो सौ साल जिया. मैं आपको कुछ नाम और बताता हूँ जो शाकाहारी थे और बहुत बड़े बुद्धिजीवी भी- अलबर्ट आइंस्टाइन, इसाक न्यूटन. ठीक है…!

आपको मैं एक बात और बता दूं कि यह भी सत्य ही है कि मांसाहारी जानवर ज़्यादा बुद्धिमान होते हैं बनिस्बत शाकाहारी जीव के | लेकिन मैं इसे भी बहस का हिस्सा नहीं बनाऊंगा कि मांसाहार आपको बुद्धिमान बनाता है क्यूंकि यह सब बातें हम इंसानों पर लागू नहीं हो सकती हैं | खानपान का इन्सान पर फर्क पड़ता है या आपके खानपान पर असर नहीं डालता है, यह एक तर्क है ………. तर्क से सत्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

आगे मैं आपसे एक पूछता हूँ क्या आप ‘यदुनाथ सिंह नायक’ के नाम से वाकिफ हैं, नहीं मालूम मैं बताता हूँ |यदुनाथ सिंह नायक एक शाकाहारी थे और सेना में कार्यरत थे | वह कुश्तीबाज़ थे और उन्होंने विश्व चैम्पियनशिप में दो मांसाहारी कुश्तीबाजों को धुल चटा दी थी| तब तो आपको लगेगा कि शाकाहार से इन्सान ज़्यादा ताक़तवर बनाता है| मैं आपको बता दूँ कि कुश्तीबाजी के विश्व चैम्पियंज़ में शाकाहारी भी हैं और मांसाहारी भी | बात को आगे बढाते हैं- अगर आप पुरे विश्व के लिहाज़ से अगर कम्पेयर करेंगे तो आप को पता है सबसे ज़्यादा कुश्तीबाजी में कौन मशहूर है- मांसाहारी!

बोडी बिल्डिंग में कौन सबसे ज़्यादा मशहूर है——अर्नाल्ड श्वार्ज्नेगेर | तेरह बार अर्नाल्ड ने विश्व विजेता का खिताब जीता था और सात बार मि. ओलंपिया और पांच बार मि. यूनिवर्स और एक बार मि. वर्ल्ड | आपको पता है- वह क्या था ??? वह शाकाहारी था या माँसाहारी ??? माँसाहारी !!! बोक्सेर- मोहमम्द अली – माँसाहारी ! कैसियस क्ले- माँसाहारी ! माइक टायसन- माँसाहारी !

कुछ ब्लॉग मित्रों ने यह पूछा था कि चिकन और मटन के साथ चावल और रोटी क्यूँ इस्तेमाल की जाती है?

अब इसका मैं क्या जवाब दूँ| मैं आपसे पूछूँ कि आप खाना खाने पर पानी क्यूँ पीते हैं? तो आप क्या जवाब देंगे | पानी शाकाहारी है या माँसाहारी !!!?

अब मैं निम्न तथ्यों के साथ अपनी बातें ख़त्म करना चाहता हूँ: 1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.
2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?
3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 – अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.
6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.
7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.
8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.
9 – जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना ‘मांसाहार आपको आक्रामक बनता है’ का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.
10 – यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.
11 – शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.
12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.
13 –कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.
14 – और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

उम्मीद करता हूँ कि यह लेख आपकी मांसाहार के प्रति उठ रही जिज्ञासाओं को शांत कर देगा… ईश्वर हम सबको सत्य की खोज का प्यासा बनाये !

सलीम खान

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>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? Non-veg is allowed, even in hindu dharma?

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अक्सर कुछ लोगों के मन में यह आता ही होगा कि जानवरों की हत्या एक क्रूर और निर्दयतापूर्ण कार्य है तो क्यूँ लोग मांस खाते हैं? जहाँ तक मेरा सवाल है मैं एक मांसाहारी हूँ. मुझसे मेरे परिवार के लोग और जानने वाले (जो शाकाहारी हैं) अक्सर कहते हैं कि आप माँस खाते हो और बेज़ुबान जानवरों पर अत्याचार करके जानवरों के अधिकारों का हनन करते हो.


शाकाहार ने अब संसार भर में एक आन्दोलन का रूप ले लिया है, बहुत से लोग तो इसको जानवरों के अधिकार से जोड़ते हैं. निसंदेह दुनिया में माँसाहारों की एक बड़ी संख्या है और अन्य लोग मांसाहार को जानवरों के अधिकार (जानवराधिकार) का हनन मानते हैं.

मेरा मानना है कि इंसानियत का यह तकाज़ा है कि इन्सान सभी जीव और प्राणी से दया का भावः रखे| साथ ही मेरा मानना यह भी है कि ईश्वर ने पृथ्वी, पेड़-पौधे और छोटे बड़े हर प्रकार के जीव-जंतुओं को हमारे लाभ के लिए पैदा किया गया है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की दी हुई अमानत और नेमत के रूप में मौजूद प्रत्येक स्रोत को किस प्रकार उचित रूप से इस्तेमाल करते है.

आइये इस पहलू पर और इसके तथ्यों पर और जानकारी हासिल की जाये…

1- माँस पौष्टिक आहार है और प्रोटीन से भरपूर है
माँस उत्तम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है. इसमें आठों अमीनों असिड पाए जाते हैं जो शरीर के भीतर नहीं बनते और जिसकी पूर्ति खाने से पूरी हो सकती है. गोश्त यानि माँस में लोहा, विटामिन बी वन और नियासिन भी पाए जाते हैं (पढ़े- कक्षा दस और बारह की पुस्तकें)



2- इन्सान के दांतों में दो प्रकार की क्षमता है
अगर आप घांस-फूस खाने वाले जानवर जैसे बकरी, भेड़ और गाय वगैरह के तो आप उन सभी में समानता पाएंगे. इन सभी जानवरों के चपटे दंत होते हैं यानि जो केवल घांस-फूस खाने के लिए उपयुक्त होते हैं. यदि आप मांसाहारी जानवरों जैसे शेर, चीता और बाघ आदि के दंत देखें तो उनमें नुकीले दंत भी पाएंगे जो कि माँस खाने में मदद करते हैं. यदि आप अपने अर्थात इन्सान के दांतों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे हमारे दांत नुकीले और चपटे दोनों प्रकार के हैं. इस प्रकार वे शाक और माँस दोनों खाने में सक्षम हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे नुकीले दांत क्यूँ देता. यह इस बात का सबूत है कि उसने हमें माँस और सब्जी दोनों खाने की इजाज़त दी है.

3- इन्सान माँस और सब्जियां दोनों पचा सकता है
शाकाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल केवल सब्जियां ही पचा सकते है और मांसाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल माँस पचाने में सक्षम है लेकिन इन्सान का पाचन तंत्र दोनों को पचा सकता है.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमको केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे हमें ऐसा पाचनतंत्र क्यूँ देता जो माँस और सब्जी दोनों पचा सकता है.

4- एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी हो सकता है
एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक अच्छा मुसलमान हो सकता है. मांसाहारी होना एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं.

5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता है
पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-

“ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है” (कुरआन 5:1)

“रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो” (कुरआन 16:5)

“और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो” (कुरआन 23:21)

6- हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की अनुमति देतें है !
बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.

A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-
वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है

(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-
माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है

(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि –
स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 88 में धर्मराज युधिष्ठर और पितामह के मध्य वार्तालाप का उल्लेख किया गया है कि कौन से भोजन पूर्वजों को शांति पहुँचाने हेतु उनके श्राद्ध के समय दान करने चाहिए? प्रसंग इस प्रकार है –

“युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबली!मुझे बताईये कि कौन सी वस्तु जिसको यदि मृत पूर्वजों को भेट की जाये तो उनको शांति मिले? कौन सा हव्य सदैव रहेगा ? और वह क्या जिसको यदि सदैव पेश किया जाये तो अनंत हो जाये?”

भीष्म ने कहा, “बात सुनो, हे युधिष्ठिर कि वे कौन सी हवी है जो श्राद्ध रीति के मध्य भेंट करना उचित है और कौन से फल है जो प्रत्येक से जुडें हैं| और श्राद्ध के समय शीशम, बीज, चावल, बाजरा, माश, पानी, जड़ और फल भेंट किया जाये तो पूर्वजो को एक माह तक शांति मिलती है. यदि मछली भेंट की जाये तो यह उन्हें दो माह तक राहत देती है. भेंड का माँस तीन माह तक उन्हें शांति देता है| खरगोश का माँस चार माह तक, बकरी का माँस पांच माह और सूअर का माँस छह माह तक, पक्षियों का माँस सात माह तक, पृष्ठा नामक हिरन से वे आठ माह तक, रुरु नामक हिरन के माँस से वे नौ माह तक शांति में रहते हैं. “GAWAYA” के माँस से दस माह तक, भैस के माँस से ग्यारह माह तक और गौ माँस से पूरे एक वर्ष तक. प्यास यदि उन्हें घी में मिला कर दान किया जाये यह पूर्वजों के लिए गौ माँस की तरह होता है| बधरिनासा (एक बड़ा बैल) के माँस से बारह वर्ष तक और गैंडे का माँस यदि चंद्रमा के अनुसार उनको मृत्यु वर्ष पर भेंट किया जाये तो यह उन्हें सदैव सुख शांति में रखता है. क्लासका नाम की जड़ी-बूटी, कंचना पुष्प की पत्तियां और लाल बकरी का माँस भेंट किया जाये तो वह भी अनंत सुखदायी होता है. अतः यह स्वाभाविक है कि यदि तुम अपने पूर्वजों को अनंत काल तक सुख-शांति देना चाहते हो तो तुम्हें लाल बकरी का माँस भेंट करना चाहिए

7- हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित
हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.

8- पेड़ पौधों में भी जीवन
कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.

9- पौधों को भी पीड़ा होती है
वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञानं कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं लेकिन उनकी चीख इंसानों के द्वारा नहीं सुनी जा सकती. इसका कारण यह है कि मनुष्य में आवाज़ सुनने की अक्षमता जो श्रुत सीमा में नहीं आते अर्थात 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक इस सीमा के नीचे या ऊपर पड़ने वाली किसी भी वस्तु की आवाज़ मनुष्य नहीं सुन सकता है| एक कुत्ते में 40,000 हर्ट्ज़ तक सुनने की क्षमता है. इसी प्रकार खामोश कुत्ते की ध्वनि की लहर संख्या 20,000 से अधिक और 40,000 हर्ट्ज़ से कम होती है. इन ध्वनियों को केवल कुत्ते ही सुन सकते हैं, मनुष्य नहीं. एक कुत्ता अपने मालिक की सीटी पहचानता है और उसके पास पहुँच जाता है| अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.

10- दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!
एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए.

पवित्र कुरआन में कहा गया है –

ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

-सलीम खान

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>सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है?

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“इस बार थोडा अलग मगर वास्तविकता के बेहद करीब, यह लेख आप ज़रूर पढ़े, मेरा निवेदन है कि आप ज़रूर पढें और पढने से ज्यादा समझें क्यूँकि केवल पढने से ज़रूरी है उसको पढ़ कर समझना | लेकिन होता क्या है कुछ लोग अगर उनके मतलब का लेख नहीं होता है तो उसे या तो पढ़ते ही नहीं हैं और अगर पढ़ते भी हैं तो बिना जाने बूझे अनाप शनाप कमेंट्स कर देते हैं | उदहारण स्वरुप अगर किसी ने लिखा कि मांसाहार खाना जायज़ है| तो उसके फलस्वरूप उस विषय के विरोध में बहुत कुछ अनाप शनाप बातें लिख डालते है | अपनी बातें बेतुके तर्कों से भर कर सिद्ध कर देतें हैं, मगर वहीँ कुछ लोग अपनी बात सही ढंग से लिखते हैं | मैं मानता हूँ कि मुझे अभी पूर्ण जानकारी हर एक विषय में नहीं है और मैं अभी लेखन में और ब्लॉग में नया और शिशु मात्र हूँ, मगर मुझे इतना पता है कि मैं जो लिखता हूँ वो सत्य है ! अब आप ज़रूर उद्वेलित होंगे कि वाह सलीम बाबू ! आप जो भी लिखते हैं वो सत्य है और बाकी सब झूठ| तो जनाब मेरा हमेशा की तरह एक ही जवाब मैं जो भी लिखता हूँ वो इसलिए सत्य है क्यूंकि मैं केवल वेदों, पुराण, भविष्य पुराण और कुरान, हदीश और बाइबल आदि में दिए गए विषयों की व्याख्या करता हूँ |”

खैर ! मैं बात कर रहा था सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है?  


मैं इस विषय पर बिन्दुवार आपको सम्बंधित धर्म ग्रन्थों का हवाला देते हुए समझाने का प्रयास करूँगा कि सूअर का माँस खाना क्यूँ हराम (निषेध) है?

कुरान में सूअर का माँस का निषेध : 
हम सबको पता है कि सूअर का माँस मुख्य रूप से इस्लाम में बिल्कुल ही मना (हराम, निषेध) है | कुरान में कम से कम चार जगहों पर सूअर के माँस के प्रयोग को हराम और निषेध ठहराया गया है | हवाले के लिए देखें कुरान की आयतें 2:173, 5:3, 6:145 aur 16:115  
पवित्र कुरान की निम्न आयत इस बात को स्पष्ट करने को काफी है सूअर का माँस क्यूँ हराम किया गया है: “तुम्हारे लिए (खाना) हराम (निषेध) किया गया मुर्दार, खून, सूअर का माँस और वह जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो ” – कुरान 5:3
बाइबल में सूअर का माँस का निषेध:
ईसाईयों को यह बात उनके धार्मिक ग्रन्थ के हवाले से समझाई जा सकती है कि सूअर माँस हराम है | बाइबल में सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख लैव्य व्यवस्था (Book of Leviticus) में हुआ है-

“सूअर जो चिरे अर्थात फटे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता इसलिए वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है” “इनके माँस में से कुछ ना खाना और उनकी लोथ को छूना भी नहीं, ये तुम्हारे लिए अशुद्ध हैं|” -लैव्य व्यवस्था (11/7-8) 
इसी प्रकार बाइबल के व्यवस्था विवरण (Book of Deuteronomy) में भी सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख किया गया है- “फिर सूअर जो चिरे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता, इस कारण वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है| तुम ना तो इनका माँस खाना और ना ही इनकी लोथ को छूना |”
व्यवस्था विवरण (14/8)  

सूअर का माँस बहुत से रोगों का कारण है:

ईसाईयों के अलावा जो अन्य गैर-मुस्लिम, हिन्दू या नास्तिक लोग है वे सूअर के माँस के हराम होने के सम्बन्ध में बुद्धि, तर्क और विज्ञानं के हवालों से ही संतुष्ट हो सकते हैं| सूअर के माँस से कम से कम सत्तर विभिन्न रोग जन्म लेते हैं| किसी व्यक्ति के शरीर में विभिन्न प्रकार के कीड़े (Helminthes) हो सकते हैं, जैसे गोलाकार कीड़े, नुकीले कीड़े, फीता क्रीमी आदि | सबसे ज्यादा घातक कीड़ा Taenia Solium है जिसे आम लोग फीताकार कीड़ा (Tapworm) कहते हैं | यह कीड़ा बहुत लम्बा होता है और आंतों में रहता है| इसके अंडे खून में सम्मिलित होकर शरीर के लगभग सभी अंगों तक पहुँच जाते हैं| अगर यह कीड़ा दिमाग में चला गया तो इन्सान की स्मरणशक्ति ख़त्म हो जाती है | अगर वह दिल में प्रवेश कर जाये तो इन्सान की ह्रदय गति रुक जाने का ख़तरा हो जाता है| अगर यह कीड़ा आँखों में पहुँच जाये तो इन्सान की देखने की क्षमता समाप्त कर देता है| अगर यह जिगर में में पहुँच जाये तो बहुत भारी क्षति पहुँचाता है| इस प्रकार यह कीड़ा शरीर के अंगों को क्षति पहुँचाने की क्षमता रखता है| एक दूसरा कीड़ा Trichura Tichurasis है| 
सूअर के माँस के बारे में यह भ्रम है कि अगर उसे अच्छी तरह पका लिया जाये उसके भीतर पनप रहे उपरोक्त कीडों के अंडे नष्ट हो जाते हैं| अमेरिका में किये गए एक चिकित्सीय शोध में यह बात सामने आयी है कि चौबीस व्यक्तियों में से जो लोग Trichura Tichurasis के शिकार थे, उनमें से 22 लोगों ने सूअर के माँस को अच्छी तरह से पकाया था | इससे मालूम हुआ कि सामान्य ताप में सूअर का माँस पकाने से भी यह घातक अंडे समाप्त नहीं होते ना ही नष्ट हो पाते हैं|  

सूअर के माँस में मोटापा पैदा करने वाले वाले तत्व पाए जाते हैं:

सूअर के माँस में पुट्ठों को मज़बूत करने वाले तत्व बहुत कम पाए जाते हैं, इसके विपरीत मोटापे को पैदा करने वाले तत्व बहुत ज्यादा पाए जातें हैं | मोटापा पैदा करने वाले ये तत्व खून की नाणीयों में दाखिल हो जाते हैं और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) और हार्ट अटैक (दिल के दौरे) का कारण बनते हैं| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पचास प्रतिशत से अधिक अमेरिकी लोग हाईपरटेंशन (अत्यंत मानसिक तनाव) के शिकार हैं और इसका मुख्य कारण है कि यह लोग सूअर का माँस प्रयोग करते हैं|

कुछ लोग यह तर्क प्रस्तुत करते है कि ऑस्ट्रेलिया में सूअर का पालन पोषण अत्यंत साफ़ सुथरे ढंग से और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए अनुकूल माहौल में किया जाता है| यह बात ठीक है कि स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनुकूल और स्वच्छ वातावरण में सूअरों को एक साथ उनके बाड़े में रखा जाता है| आप चाहे उन्हें स्वच्छ रखने की कितनी भी कोशिश करें परन्तु वास्तविकता यह है कि प्राकृतिक रूप से उनके अन्दर गन्दगी पसंदी मौजूद रहती है| इसलिए वे अपने शरीर और अन्य सूअरों के शरीर से निकली गन्दगी का सेवन करने से भी नहीं चूकते| सूअर संसार का सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है: सूअर ज़मीन पर पाए जाने वाला सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है | वह जानवरों और इन्सान के बदन से निकलने वाली गन्दगी का सेवन करके जीता और पलता-बढ़ता है| इस जानवर को खुदा ने गंदगियों को साफ़ करने के उद्देश्य से पैदा किया है| गाँव और देहातों में जहाँ लोगों के लिए आधुनिक शौचालय नहीं है और लोग इस कारणवश खुले वातावरण (खेत, जंगल आदि) में शौच करते हैं, अधिकतर यह जानवर सूअर ही इन गंदगियों को साफ़ करता है|


सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है:

“इस धरती पर सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है| केवल यही एक ऐसा जानवर है जो अपने साथियों को बुलाता है कि वे आयें और उसकी मादा के साथ यौन इच्छा को पूरी करें| अमेरिका में प्रायः लोग सूअर का माँस खाते है परिणामस्वरुप ऐसा कई बार होता है कि ये लोग डांस पार्टी के बाद आपस में अपनी बीवियों की अदला बदली करते हैं अर्थात एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से कहता है कि मेरी पत्नी के साथ तुम रात गुज़ारो और मैं तुम्हारी पत्नी के साथ रात गुज़ारुन्गा (फिर वे व्याव्कारिक रूप से ऐसा करते है)| अगर आप सूअर का माँस खायेंगे तो सूअर की सी आदतें आपके अन्दर पैदा होंगी | हम भारतवासी अमेरिकियों को बहुत विकसित और साफ़ सुथरा समझते हैं | वे जो कुछ करते हैं हम भारतवासी भी उसे कुछ वर्षों बाद करने लगते हैं| Island पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार पत्नियों की अदला बदली की यह प्रथा उच्च और सामान्य वर्ग के लोगों में आम हो चुकी है|”

अब आप ही बताईये और सोचिये आखिर क्यूँ इसे निषेध किया गया है ? यह जानवर सबसे गन्दा क्यूँ है? आपकी टिप्पणियों का स्वागत है!

सलीम खान स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़, लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान