स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>गीता और कुरआन ज़ुबानी सुनाने वाले पंडित बशीरूद्दीन (Pt. Basheeruddin Elligible for BHARAT RATN)

>पंडित मौलाना डॉ. बशीरूद्दीन कादरी शाहजहांपुरी साहब को गीता और कुरआन -दोनों कंठस्थ थे। अपने मिलने-जुलने वालों को अक्सर वे उनके उद्धरण सुनाया करते थे। गीता का अरबी में उन्होंने खुद अनुवाद किया था। और उन्होंने कुरआन का भी अनुवाद संस्कृत में किया था, ताकि दोनों ही भाषाओं के जानकार इनके फलसफे को पढ़ और समझ सकें।

असल में तो पंडित बशीरूद्दीन 11 भाषाओं के विद्वान थे। कई बार दूसरे पंडित और मौलाना लोग किसी श्लोक में उपसर्ग या हलंत या किसी आयत के उच्चारण में सुधार कराने के लिए उनके पास आया करते थे। गीता और कुरआन पर व्याख्यान देने के लिए अक्सर उन्हें मंदिरों व मस्जिदों में आमंत्रित किया जाता था।

वे गांधी फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे, 1986 में वहीं से सेवा निवृत्त हुए। लेकिन उनके परिवार को सेवा निवृत्ति के फंड और ग्रच्युइटी वगैरह अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं। उनकी पत्नी तमीजन बेगम भी उन ढाई हजार दुर्लभ पुस्तकों के संरक्षण की दुहाई देती अल्लाह को प्यारी हो गईं, जो पंडितजी ने लिखी थीं या एकत्रित की थीं।

सद्भाव व समभाव को बढ़ावा देने वाले इस विद्वान ने अपना सारा जीवन गरीबी में गुजारा। यह और बात है कि धर्मनिरपेक्षता और समरसता को बढ़ावा देने की बात हमारे यहां राजनैतिक मंचों पर बहुत जोर-शोर से की जाती है, मगर ऐसी शख्सियतों को मिसाल के तौर पर जनता के सामने पेश करने का काम सरकारें कभी नहीं करतीं। लोगों के दिलों में ऐसे लोग अपनी नायाब पहचान खुद ही गढ़ते हैं। मौलाना साहब का जन्म शाहजहांपुर में अक्टूबर 1900 में हुआ था। उनके पिता मौलवी खैरूद्दीन बदायूं के लिलमा गांव की प्रारंभिक पाठशाला में अध्यापक थे। बशीरूद्दीन साहब ने उसी पाठशाला में अपनी पढ़ाई शुरू की।

अपनी तेजस्वी छवि और प्रतिभा का परिचय उन्होंने हर स्तर पर दिया। 1922 में इंटर की परीक्षा में वे बरेली इंटर कॉलेज में प्रथम रहे। इसके बाद की पढ़ाई और अपनी पीएचडी उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की। अरबी की उनकी दक्षता देख कर वहां के प्रफेसर भी दंग रह जाते थे।

लेकिन यह पढ़ाई उन्हें अपने असली उद्देश्य तक नहीं पहुंचाती थी। इसलिए उन्होंने उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी और फारसी में अलग से निपुणता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने हदीस, कुरआन, वेदों और गीता का गूढ़ अध्ययन किया और उनसे संबंधित हजारों अन्य पुस्तकें पढ़ने के बाद संस्कृत में कुरआन और अरबी में गीता का अनुवाद किया। इन दोनों ग्रंथों पर इस प्रकार का वह पहला अनुवाद था। अभी तक किसी और ने तो ऐसा किया नहीं है।

लेकिन इसके समानांतर 34 वर्ष तक लगातार वे गांधी फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में ही पढ़ाते रहे और ’86 में वहीं से रिटायर हुए। उन्हें सिर्फ कुरआन और गीता ही नहीं, उनके अरबी और संस्कृत अनुवाद भी जुबानी याद थे। कई बार कुरआन की किसी आयत की व्याख्या कर वे उससे मिलते-जुलते उपदेशों वाले गीता के श्लोकों की समीक्षा करते थे या उसका उलटा भी बताते थे। पंडित जी का निष्कर्ष यह होता था कि गीता और कुरआन के साठ प्रतिशत उपदेश एक से ही हैं

पंडितजी का मानना था कि भारतीय मदरसों में आधुनिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। इतिहास का भी पंडित बशीरूद्दीन साहब को जबर्दस्त ज्ञान था। हिंदी में उन्होंने एक इतिहास पुस्तिका तारीख-ए-हिंदी की रचना की। यह पुस्तक अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षाओं में आज भी पढ़ाई जाती है। विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब मानते हैं कि हिंदी के इतिहास पर यह पुस्तक मील का पत्थर है।

पंडित मौलाना बशीरूद्दीन का निधन 12 फरवरी 1988 में हुआ। सारी उम्र उन्होंने राजनीतिज्ञों से परहेज ही रखा। हम लोग भारत रत्न देने के लिए ऐसी गुमनाम हस्तियों के योगदान पर विचार क्यों नहीं करते?

प्रस्तुतकर्ता: स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ से सलीम खान
–साभार: फिरोज बख्त अहमद

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