स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मुझे मेरी बीवी से बचाओ! (Fight Against misuse of Dowry Law- IPC-498a)

>धारा 498a और घरेलू हिंसा और उत्पीडन के दुरुपयोग के खिलाफ़ स्वच्छ सन्देश का एक प्रयास


आपकी पत्नी द्वारा पास के पुलिस स्टेशन पर 498a दहेज़ एक्ट या घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत एक लिखित झूठी शिकायत करती है तो आप, आपके बुढे माँ- बाप और रिश्तेदार फ़ौरन ही बिना किसी विवेचना के गिरफ्तार कर लिए जायेंगे और गैर-जमानती टर्म्स में जेल में डाल दिए जायेंगे भले चाहे की गई शिकायत फर्जी और झूठी ही क्यूँ न हो! आप शायेद उस गलती की सज़ा पा जायेंगे जो आपने की ही नही और आप अपने आपको निर्दोष भी साबित नही कर पाएँगे और अगर आपने अपने आपको निर्दोष साबित कर भी लिया तब तक शायेद आप आप न रह सके बल्कि समाज में एक जेल याफ्ता मुजरिम कहलायेंगे और आप का परिवार समाज की नज़र में क्या होगा इसका अंदाजा आप लगा सकते है.

498a दहेज़ एक्ट या घरेलू हिंसा अधिनियम को केवल आपकी पत्नी या उसके सम्बन्धियों के द्वारा ही निष्प्रभावी किया जा सकता है आपकी पत्नी की शिकायत पर आपका पुरा परिवार जेल जा सकता है चाहे वो आपके बुढे माँ- बाप हों, अविवाहित बहन, भाभी (गर्भवती क्यूँ न हों) या 3 साल का छोटा बच्चा शिकायत को वापस नही लिया जा सकता और शिकायत दर्ज होने के बाद आपका जेल जाना तय है ज्यादातर केसेज़ में यह कम्पलेंट झूठी ही साबित होती है और इस को निष्प्रभावी करने के लिए स्वयं आपकी पत्नी ही आपने पूर्व बयान से मुकर कर आपको जेल से मुक्त कराती है आपका परिवार एक अनदेखे तूफ़ान से घिर जाएगा साथ ही साथ आप भारत के इस सड़े हुए भ्रष्ट तंत्र के दलदल में इस कदर फसेंगे की हो सकता आपका या आपके परिवार के किसी फ़र्द का मानसिक संतुलन ही न बिगड़ जाए यह कानून आपकी पत्नी द्वारा आपको ब्लेकमेल करने का सबसे खतरनाक हथियार है इसलिए आपको शादी करने से पूर्व और शादी के बाद ऐसी भयानक परिस्थिति का सामना न करना पड़े इसके लिए कुछ एहतियात की ज़रूरत होगी जो कि इस वेबसाइट पर मौजूद है आप उसे पढ़े और सतर्क रहे.

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Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>आधुनिक वैश्विय सभ्यता और नारी की गरीमा Modern Global Culture and Women

>आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया में नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है. लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है जो बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.


आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू…

उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे

नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.

आईये देखते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने नारी को क्या क्या दिया

व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन.
  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता… अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी… तथा फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण
  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व.
  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन.
  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के ‘इस्तेमाल’ के घिनावने और बेहूदा चित्र
  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.

(सवाल: अब आप नारी की इस स्थिति के समर्थक तो हो नहीं सकते, और अगर है तो क्या आप अपनी माँ-बहनों को ऐसा करने दे सकते हैं?)


यौन शोषण (Sexual Exploitation)

  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी ‘सेवाएँ’ अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.
  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी. सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण.
  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को ‘नृत्य-साधना’ का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई.
  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)


  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.
  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ.
  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place)
  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city)
  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण.
  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न.
  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध


  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.
  • ‘सामूहिक बलात्-दुष्कर्म’ इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है.
  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी…
  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों.
  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं.
  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ


  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.
  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).
  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)


बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा ‘फीस’ के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)

  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण ‘अपमान’.
  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना.
  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक ‘नैतिकता का मक़ाम हासिल.

समाधान


नारी के मूल अस्तित्व के बचाव में ‘स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़’ की इस पहल में आईये, हम सब साथ हो और समाधान की ओर अग्रसर हों.

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.

नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.

लेकिन इस आव्हान से पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल. क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???

आईये आज हम नारी को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की क़सम खाएं!

सलीम खान

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>तीन तलाक़, काम खल्लास ! वाह रे इस्लाम धर्म !! Women rights in Islam

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इस्लाम धर्म में विवाह के पवित्र बंधन से, जन्म-जन्मान्तर के बंधन से और औरतों से कितना छलावा किया गया है, इसकी एक बानगी है ‘केवल और केवल मर्दों के ही द्वारा तलाक़ देना और तीन तलाक़ देकर औरतों पर ज़ुल्म करना. क्या यह सही है? इस्लाम में तलाक़ के मुताल्लिक़ अधिकार केवल मर्दों को ही क्यूँ हासिल हैं औरतों को क्यूँ नहीं? अगर एक औरत अपने शौहर से तलाक़ लेना चाहे तो उसका इस्लाम में कोई प्राविधान है भी या नहीं? आखिर इस्लाम में औरतों को इतनी पाबन्दी क्यूँ है? जब आदमी चार शादी कर सकता है तो औरत क्यूँ नहीं? औरतों का इस्लामी क़ानून अथवा शरियः में कितना हुकूक़, कितना अधिकार प्राप्त है?

कुछ इसी तरह के सवालात अक़्सर हमारे गैर-मुस्लिम भाईयों के ज़हन में आता रहता है और जब वे हम मुसलमानों से इसके बारे में सुकून-बख्श या सही जवाब नहीं दे पाते हैं, उसकी वजह है कि हमें खुद ये नहीं मालूम है कि अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब में इसके मुताल्लिक़ क्या आदेश देता है.

आईये उपर्लिखित सवालों के जवाब कुरान और हदीस की रौशनी में क्या हैं.

अल्हम्दुलिल्लाह ! अल्लाह सुबहान व त-आला ने अपने बन्दों के ले लिए उनके रहन-सहन के मुताल्लिक़ अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब अल-कुरआन में कई जगह अच्छी तरह से ताक़ीद कर चुका है.

अल्लाह सुबहान व त-आला फ़रमाते हैं, सुरह अन-निसा, सुरह ४, श्लोक संख्या १ में:

ऐ लोगों अपने रब से डर रखो जिसने तुमको एक जीव से पैदा किया और उसी जाति का उसके लिए एक जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत से पुरुष और स्त्रियाँ फैला दीं. अल्लाह का डर रखो (अर्थात गुनाह से बचो) जिसका वास्ता देकर तुम एक दुसरे के सामने रखते हो अपनी मांगे रखते हो…”

अल्लाह सुबहान व-ताला फरमाता है, सुरह अर-रूम में, श्लोक संख्या २१ में:

और उसने तुम दोनों के मध्य प्रेम और दुआ का संचार किया

अल्लाह सुबहान व-ताला फरमाता है, सुरह अल-आराफ़, सुरह ७, श्लोक संख्या 189:

वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शांति और चैन प्राप्त कर सके फ़िर जब उसने उसको ढांक लिया तो उसने एक हल्का सा बोझ उठा लिया; फ़िर वह उसे लिए हुए चलती फिरती रही फ़िर जब वह बोझिल हो गयी तो दोनों ने अल्लाह -अपने रब को पुकारा “यदि तुने हमें भला चंगा बच्चा दिया तो निश्चय ही हम तेरे कृतग्य होंगे

आगे लिखा है:

वे तुम्हारा परिधान (लिबास) हैं और तुम उनका परिधान हो” अर्थात तुम दोनों (शौहर और बीवी) एक दुसरे का लिबास हो.

क्यूँ न हम सब इसके बारे में विस्तृत रूप से समझ लें कि इस्लाम में तलाक़ और उसके बाद की पूरी प्रक्रिया क्या है?

अल-कुरआन में सुरह अत-तलाक़, सुरह ६५ में तलाक़ के बारे में लिखा है (यहाँ चटका लगायें)

तलाक़ चाहे आप एक बार कहो या तीन बार या चाहे जितनी बार कहो, तलाक़ हो जाती है.

अगर आपने तलाक़ दिया (चाहे एक बार या तीन बार) तो वह एक तलाक़ ही मानी जायेगी अर्थात पहली तलाक़ और फिर उसके ३ मासिक धर्म तक आप उसे हाथ नहीं लगा सकते हैं. चौथे महीने में आप उसे फिर से रुज़ू कर सकते हैं.

इसी तरह से आप फ़िर से पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं.

अगर आपने फ़िर तलाक़ दिया (चाहे एक बार या तीन बार) तो वह एक तलाक़ ही मानी जायेगी अर्थात दूसरी तलाक़ और फिर उसके ३ मासिक धर्म तक आप उसे हाथ नहीं लगा सकते हैं. चौथे महीने में आप उसे फिर से रुज़ू कर सकते हैं.

इसी तरह से आप फ़िर से पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं.

अगर आपने फ़िर तलाक़ दिया (चाहे एक बार या तीन बार) तो वह एक तलाक़ ही मानी जायेगी अर्थात तीसरी तलाक़…. अब आप की उससे पूरी और पूरी तीन तलाकें वाक़ेय हो गयीं. अब वो आपकी पत्नी नहीं रही. क्यूंकि यह बच्चों का खेल नहीं कि आप तलाक़ पे तलाक़ दिए जाएँ और फ़िर रुज़ू करते जाएँ. अल्लाह ने तलाक़ देने की मियाद तीन रखी है.

एक सवाल और है कि यदि किसी ने अपनी बीवी को तलाक़ दिया अर्थात पहली तलाक़ और चौथे महीने के बाद भी उसे रुज़ू नहीं किया तो उसका निकाह अवैध माना जायेगा. फ़िर अगर वे आपस में रहना चाहें तो उनको दोबारा निकाह (marriage) करना होगा और दोबारा निकाहनामा (maariage-agreement) पर दस्तखत करना होगा और दोबारा मेहर (जो भी तय हो) अदा करना पड़ेगा.

यह प्रक्रिया भी ठीक उसी तरह से होगी जैसे तलाक़ के बाद चौथे महीने में रुज़ू करने में थी. अर्थात आप निकाह करने की प्रकिया भी केवल तीन बार तक ही है. क्यूंकि यह बच्चों का खेल नहीं कि आप तलाक़ पे तलाक़ दिए जाएँ, और निकाह पे निकाह कियें जाएँ और फ़िर रुज़ू करते जाएँ. अल्लाह ने तलाक़ और निकाह देने की मियाद तीन रखी है.

अल्लाह सुबहान व-ताला को सख्त नापसंद है तलाक़, क्यूंकि चूँकि अल्लाह सुबहान व-ताला अपने बन्दों से आसानी चाहता सख्ती नहीं (यहाँ पढें) इसलिए उसने तलाक़ का तरीक़ा भी हमें बतला दिया.

अगले भाग में पढ़े… क्या औरत भी तलाक़ ले सकती है?

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>बलात्कारियों को मौत की सज़ा !

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इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत है

बहुत से लोग इसे निर्दयता कह कर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं कुछ का तो कहना है कि इस्लाम एक जंगली धर्म है मैंने उन जैसे कई व्यक्तियों से एक सवाल पूछा था – सीधा और सरल कोई आपकी माँ या बहन के साथ बलात्कार करता है और आपको न्यायधीश बना दिया जाये और बलात्कारी को सामने लाया जाये तो उस दोषी को आप कौन सी सज़ा सुनाएँगे ? मुझे प्रत्येक से एक ही जवाब सुनने को मिला- उसे मृत्यु दंड दिया जाये कुछ ने कहा कि उसे कष्ट दे दे कर मारना चाहिए मेरा अगला प्रश्न था अगर कोई व्यक्ति आपकी माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है तो आप उसे मृत्यु दंड देना चाहते हैं लेकिन यही घटना किसी और कि माँ, पत्नी या बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं मृत्युदंड देना जंगलीपन है इस स्तिथि में यह दोहरा मापदंड क्यूँ?


पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है

औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं



अमेरिका में बलात्कार की दर सबसे ज़्यादा है

अमेरिका को दुनियाँ का सबसे उन्नत देश समझा जाता है सन 1990 ई. की FBI रिपोर्ट से पता चलता है कि अमेरिका में उस साल 1,02555 बलात्कार की घटनाएँ दर्ज की गयी रिपोर्ट में यह बात भी बताई गयी है कि इस तरह की कुल घटनाओं में से केवल 16 प्रतिशत ही प्रकाश में आ पाई हैं इस प्रकार 1990 ई. की बलात्कार की घटना का सही अंदाज़ा लगाने के लिए उपरोक्त संख्या को 6.25 गुना करके जो योग सामने आता है वह है 6,40,968 इस पूरी संख्या को 365 दिनों में बनता जाये तो प्रतिदिन के लिहाज से 1756 संख्या सामने आती है

एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन 1900 घटनाएँ पेश आती हैं

Nationl Crime Victimization Survey Bureau of Justice Statistics (U.S. of Justice) के अनुसार 1996 में 3,07000 घटनाएँ दर्ज हुईं लेकिन सही घटनाओं की केवल 31 प्रतिशत ही घटनाएँ दर्ज हुईं इस प्रकार 3,07000x 3,226 = 9,90,322 बलात्कार की घटनाएँ सन 1996 में हुईं ज़रा विचार करें हर 32 सेकंड में एक बलात्कार होता है

ऐसा लगता है कि अमेरिकी बलात्कारी बड़े निडर है

FBI की 1990 की रिपोर्ट यह बताती है कि बलात्कार की घटनाओं में केवल 10 प्रतिशत बलात्कारी ही गिरफ्तार किया जा सके हैं जो कुल संख्या का 1.6 प्रतिशत है बलात्कारियों में से 50 प्रतिशत को मुकदमें से पहले ही रिहा कर दिया गया इसका मतलब यह हुआ कि केवल 0.8 प्रतिशत बलात्कारियों के विरुद्ध ही मुकदमा चलाया जा सका

दुसरे शब्दों में अगर एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार की घटनाओं में लिप्त हो तो केवल एक बार ही उसे सज़ा दी जाने की संभावना हैं बहुत से लोग इसे अच्छा जुआ समझेंगे रिपोर्ट से यह भी अंदाज़ा होता है की सज़ा दिए जाने वालों में से केवल 50 प्रतिशत लोगों को एक साल से कम की सज़ा दी गयी है हालाँकि अमेरिकी कानून के मुताबिक सात साल की सज़ा होनी चाहिए उन लोगों के सम्बन्ध में जो पहली बार सज़ा के दोषी पाए जातें हैं, जज़ नरम पद जाते हैं

ज़रा विचार करें एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार करता है लेकिन उसके विरुद्ध मुकदमा चलने का अवसर केवल एक बार ही आता है और फिर पचास प्रतिशत लोगों को जज़ की नरमी का फायेदा मिल जाता है और एक साल से भी कम मुद्दत की सज़ा किसी ऐसे बलात्कारी को मिल पाती है जिस पर यह अपराध सिद्ध हो चूका हो

बलात्कार की सज़ा मौत: लाल कृष्ण आडवानी

हालाँकि मैं श्री लाल कृष्ण आडवानी जी की अन्य नीतियों और विचार से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ लेकिन मैं सहमत हूँ लाल कृष्ण आडवानी के इस विचार से कि बलात्कारियों को सज़ा-ए-मौत देनी चाहिए उन्होंने यह मांग उठाई थी कि बलात्कारी को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए सम्बंधित खबर पढें…


इस्लामी कानून निश्चित रूप से बलात्कार की दर घटाएगा
स्वाभाविक रूप से ज्यों ही इस्लामिक कानून लागू किया जायेगा तो इसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा अगर इस्लामिक कानून संसार के किसी भी हिस्से में लागू किया जाये चाहे अमेरिका हो या यूरोप, ऑस्ट्रेलिया हो या भारत, समाज में शांति आएगी

सलीम खान
संरक्षक
स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़
लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>समलैंगिकता को वर्जित क्यूँ समझा जाता है? (Why Homosexuality/Lesbianism is prohibited)

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

(मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ)

हर प्रकार की हम्द व सना (प्रशंसा व गुणगान) अल्लाह के लिए योग्य है, हम उसी की प्रशंसा करते हैं उसी से मदद मांगते हैं और उसी से क्षमा याचना करते हैं तथा हम अपने नफस की बुराई और अपने बुरे कामों से अल्लाह की पनाह में आते हैं, जिसे अल्लाह तआला हिदायत दे दे उसे कोई पथ्भ्स्थ करनेवाला नहीं, और जिसे गुमराह करदे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं. हम्द व सना के बाद:

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए ही योग्य है.

१. मुसलमान के लिए एक पल के लिए भी यह संदेह करना उचित नहीं कि अल्लाह त-आला के क़ानून तत्वदर्शी व बुद्धिपूर्ण हैं, और इस बात को जान लेना उचित है कि अल्लाह तआला ने जिस चीज़ का आदेश दिया है और जिस चीज़ से मना किया है उसके अन्दर सम्पूर्ण और व्यापक हिकमत (तत्वदर्शिता) है और वही सीधा पथ और एक मात्र रास्ता है कि मनुष्य सुरक्षा और संतुष्टि के साथ जीवन यापन करे और उसकी इज्ज़त और
आबरू (सतीत्व), बुद्धि और स्वास्थ्य की सुरक्षा हो और वह उस प्रकृति के अनुरूप हो जिस पर अल्लाह तआला ने पैदा किया है.

कुछ विधर्मी और स्वधर्मभ्रष्ट लोगों ने इस्लाम और उसके प्रावधानों और नियमों पर हमला करने का प्रयास किया है अतः उन्होंने तलाक़ और बहु विवाह की निंदा की है और शराब की अनुमति दी है, और जो आदमी उनके समाज की स्तिथि को देखेगा तो उसे उस दयनीय स्तिथि और दुर्दशा का पता चल जायेगा जहाँ वे समाज पहुँच चुके है. जब उन्होंने तलाक़ को अविकार किया तो उनका स्थान हत्या ने ले लिया. जब उन्होंने ने बहु-विवाह को अस्वीकार किया तो उसके बदले में रखैल (मिस्ट्रेस) रखने की प्रथा चल पड़ी, और जब उन्होंने शराब को वैध ठहरा लिया तो सभी रंग रूप की बुराइयां और अनैतिक कार्यों का फैलाव हुआ.

वे दोनों यानि पुरुष समलैंगिकता और स्त्री समलैंगिकता अल्लाह त-आला के उस प्राकृतिक स्वभाव के विरुद्ध है जिस पर अल्लाह त-आला ने मनुष्यों को – बल्कि पशुवों को भी पैदा किया है कि पुरुष स्त्री का और स्त्री पुरुष की इछ्हुक होती है और जिसने इसका विरोध किया उसने फ़ितरत (प्राकृतिक स्वभाव) का विरोध किया.

पुरुष और स्त्री समलैंगिकता के फैलाव ने ढेर सारी ने बीमारियों को जन्म दिया है जिनके अस्तित्व का पूरब और पश्चिम के लोग इन्कार नहीं कर सकते, यदि इस विषमता के परिणामों में से केवल ‘एड्स’ की बीमारी ही होती जो मनुष्य के अन्दर प्रतिरक्षा प्रणाली को धरम-भरम (नष्ट) कर देती है, तो बहुत काफी है.
इसी प्रकार यह परिवारों के विघटन और उनके टुकड़े-टुकड़े हो जाने और काम-काज और पढाई-लिखाई को त्याग कर इस प्रकार के अप्राकृतिक कृत्यों में व्यस्त हो जाने का कारण बनता है.

चूँकि इसका निषेध उसके पालनहार की ओर से आया है अतः मुसलमान को इस बात की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि चिकित्सा विज्ञान अल्लाह त-आला के के वर्जित किये हुए अपराध से होने वाली क्षति और नुक्सान को सिद्ध करे, बल्कि उसे इस बात का डरीं विश्वास होना चाहिए कि अल्लाह त-आला उसी चीज़ हो वैध करता है जिसमें लोगों का हित और कल्याण हो और यह आधुनिक खोज अल्लाह त-आला की महान हिकमत और तत्वदर्शिता के प्रति उसके संतोष को बढ़ाते हैं.

२. स्त्री की समलैंगिकता (Lesbianism) का अर्थ यह है कि एक महिला दुसरे महिला के साथ ऐसा ही सम्बन्ध स्थापित करे जिस तरह एक पुरुष महिला के साथ करता है.

पुरुष समलैंगिकता (Homosexuality) का अर्थ यह है कि पुरुष के गुदा में लिंग प्रवेश कर सम्बन्ध बनाना, जो कि अल्लाह के ईश-दूत लूत अलैहिस्सलाम के समुदाय के शापित लोगों की करवाई है.

अल्लाह त-आला कुरआन में फरमाता है कि:
(وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُمْ بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِنَ الْعَالَمِينَ. إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِنْ دُونِ النِّسَاءِ بَلْ أَنْتُمْ قَوْمٌ مُسْرِفُونَ )الأعراف)

अर्थात
“और हमने लूत (अ.) को भेजा जबकि उन्होंने अपनी काम से कहा कि क्या तुम ऐसा बुरा काम करते हो जिसे तुमसे पहले सारी दुनिया में किसी ने नहीं किया? तुम महिलाओं को छोड़ कर पुरुषों के साथ सम्भोग करते हो. बल्कि तुम तो हद से गुज़र गए हो.” (सूरतुल आराफ 80-81)

और फ़रमाया:

(إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّا آلَ لُوطٍ نَجَّيْنَاهُمْ بِسَحَرٍ (القمر:34 )
अर्थात
“बेशक हमने उन पर पत्थर की बारिश करने वाली हवा भेजी, सिवाय लूत (अ) के परिवार वालों के, उन्हें सुबह के वक़्त हमने मुक्ति प्रदान कर दी.” (सूरतुल क़मर 34)

इसी तरह अल्लाह त-आला अपनी किताब कुरआन में कई जगह फरमाता है. अल्लाह त-आला फरमाता है सूरतुल अनकबूत:२८, सूरतुल अम्बिया ७४, सूरतुल नम्ल ५४-५८ और सुरतुन्निसा १६ में.

यही नहीं वेदों में भी समलैंगिकता का निषेध है…

आपके विचार का स्वागत है.

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>स्त्री एक से अधिक पति क्यूँ नहीं रख सकती? More then one husband, why not?

>एक और सवाल जो हमारे नॉन-मुस्लिम भाईयों के ज़ेहन में हमेशा से आता रहता है और वो अक्सर ये पूछते हैं कि इस्लाम में मर्दों को तो एक से ज़्यादा विवाह करने का, एक से ज़्यादा बीवियां रखने की अनुमति तो है, मगर औरतो को क्यूँ नहीं यह छुट मिली कि वह भी एक से ज़्यादा विवाह कर सके, एक से ज़्यादा मर्दों को रख सके? इस्लाम में औरतों को बहुविवाह की अनुमति क्यूँ नहीं है?


वे तो इसे कभी-कभी महिला-सशक्तिकरण से जोड़ने से भी नहीं चूकते और हवाला देते हैं पश्चिमी समाज का और कहते हैं कि देखों वहां औरतों को कितनी छूट मिली है. अरे जनाब ! औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं | पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया | इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं. इसके विपरीत इस्लाम ने औरतों को इज्ज़त दी, यहाँ तक की उसे जायदाद में भी हिस्सेदार बनाया. आप बता सकते हैं किस धर्म किस किताब में औरतों को जायदाद में हिस्सा देना लिखा है? इस्लाम ने औरतों को वही दर्जा दिया है जिसकी वे वास्तव में मुस्तहक़ हैं.

सबसे पहले मैं आपको पूरे यकीन के साथ बताना चाहता हूँ कि इस्लाम न्याय और समानता से परिपूर्ण समाज की हिमायत करता है और इस्लामी समाज इसी (न्याय और समानता) पर आधारित है| ईश्वर/अल्लाह ने स्त्री और पुरुष दोनों को समानरूप से बनाया है लेकिन अलग अलग क्षमताएं और जिम्मेदारियां रक्खी हैं| स्त्री और पुरुष मानसिक और शारीरिक रूप से भिन्न हैं, और उनकी समाज और घर में रोल और जिम्मेदारियाँ अलग अलग हैं| स्त्री और पुरुष दोनों ही इस्लाम में समान हैं लेकिन एक जैसे नहीं.

मैं कुछ बातें और बताना चाहता हूँ जिससे कि यह स्पष्ट हो जाये कि औरतों को एक ज़्यादा पति रखना क्यूँ जाएज़ नहीं है और वर्जित क्यूँ है ?

1- अगर एक मर्द के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माँ-बाप का पता आसानी से लग सकता है लेकिन वहीँ अगर एक औरत के पास एक से ज़्यादा पति हों तो केवल माँ का पता चलेगा, बाप का नहीं. इस्लाम माँ-बाप की पहचान को बहुत ज़्यादा महत्त्व देता है | मनोचिकित्सक कहते है कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात और पागलपन के शिकार हो जाते है जो जो अपने माँ-बाप विशेष कर अपने बाप का नाम नहीं जानते| अक्सर उनका बचपन ख़ुशी से खली होता है| इसी कारण तवायफों (वेश्याओं) के बच्चो का बचपन अक्सर स्वस्थ नहीं होता|

यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे का किसी स्कूल में अड्मिशन कराया जाय और उसकी माँ से उस बच्चे के बाप का नाम पूछा जाय तो माँ को दो या उससे अधिक नाम बताने पड़ेंगे.

2- मर्दों में कुदरती तौर पर औरतों के मुकाबले बहु-विवाह की क्षमता ज़्यादा होती है.

3- समाज विज्ञान के अनुसार एक से ज़्यादा बीवी रखने वाले पुरुष एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है जबकि उसी जगह पर अनेक शौहर रखने वाली औरत के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं है, विशेषकर मासिकधर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है.

4- एक से ज़्यादा पति वाली औरत के एक ही समय में कई यौन साझी होंगे जिसकी वजह से उनमे यौन सम्बन्धी रोगों में ग्रस्त होने की आशंका अधिक होंगी और यह रोग उसके पतियों को भी लग सकता है चाहे उसके सभी पति उस स्त्री के अन्य किसी स्त्री के साथ यौन समंध से मुक्त हों. यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती है.

हालाँकि आजकल की साइंस ने डीएनए इजाद कर लिया है जिसके ज़रिये से बहुत कुछ पता चल सकता है. लेकिन यह इजाद अभी आया है पहले नहीं था और दूसरी बात, क्या यह इतना ही आसान सी प्रक्रिया है जिसके ज़रिये आम इंसान इस टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कर सके???

औरतों को बहु-विवाह की मुमानियत का यह इस्लामी कानून निश्चित रूप से समाज में शान्ति लाएगा.
स्वाभाविक रूप से ज्यों ही इस्लामिक कानून लागू किया जायेगा तो इसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा | अगर इस्लामिक कानून संसार के किसी भी हिस्से में लागू किया जाये चाहे अमेरिका हो या यूरोप, ऑस्ट्रेलिया हो या भारत, समाज में शांति आएगी.

यही वजह है कि अल्लाह तबारक़-व-तआला ने अपनी अंतिम किताब में यह साफ़-तौर पर आदेश दिया है कि औरत बहु-विवाह नहीं कर सकती.

इस मुद्दे के मुताल्लिक़ आपके अन्य सवालों का भी स्वागत है.

– सलीम खान

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>मुसलमान बताएं कि एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति क्यों है? (Why more then one wives in Islam)

>कहते हैं कि मुसलमान चार शादियाँ करते हैं? सच ही है! लेकिन चार शादी और तलाक़ के मसले पर नॉन-मुस्लिम्स मुसलामानों से सवाल पूछते रहते है और मुसलमान इसका कोई जवाब नहीं दे पते. वजह क्यूंकि उन्हें खुद ही इसके बारे में ठीक से पता नहीं.


मैं आपको बता दूं दुनिया में वाहिद (single) ऐसी किताब है कुरआन जिसमें लिखा है और इसके मानने वालों (मुसलमानों) को यह निर्देश भी दिया गया है कि केवल एक से शादी करो. “marry only one”

इसके अलावा कोई ऐसी धार्मिक किताब नहीं जो उनके मानने वालों को यह निर्देश देती नहीं है. हमें मालूम है कि हिन्दू धर्म में भी ऐसी कोई किताब नहीं जो इसके मुताल्लिक़ कोई फैसला करती हो. बाइबल में ऐसे मुद्दे पर नहीं लिखा है कि आपको इसके मुताल्लिक़ क्या करने चाहिए.

हम जानते हैं कि दशरथ के कई बीवियां थीं. इसी तरह और भी बहुत से हिन्दू लोग थे इतिहास पढने पर पता चलता है कि उनकी एक से ज़्यादा बीवियां थीं. आपको पता है श्रीकृष्ण की कितनी बीवियां थीं…. दो…चार…दस….सौ….हज़ार…!!! श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार एक सौ आठ बीवियां थी…. १६,१०८

अगर उनके इतनी बीवियां हो सकती हैं तो हमारी चार क्यूँ नहीं…!!!???

हिन्दू धर्म में एक से ज़्यादा बीवियां रखने पर यह पाबन्दी नहीं है आप कितनी बीवियां रख सकते हैं. ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है कि आप सिर्फ एक से ही शादी करोगे.. एक से ज़्यादा और कितनी भी (कोई गिनती नहीं) बीवी रखने पर कोई पाबन्दी नहीं. ये तो भारत देश के कानून ने HUF एक्ट में इसकी मुमानियत करी है सन १९५१ में… हिन्दू धर्म कि किसी भी किताब में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है. खैर, मैं अब अपने मुद्दे पर आता हूँ कि क्यूँ मुसलमान (या कोई भी) एक से ज़्यादा बीवी रख सकता है?


आईये इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा करते हैं-

बहु-विवाह की परिभाषा-इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति के एक से अधिक पत्नी या पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं-

१. एक पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना। २. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना । (मैं इस विषय पर भी शीघ्र ही लिखूंगा)

इस्लाम में इस बात की इजाजत है कि एक पुरूष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाजत नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।

. पवित्र कुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है ‘केवल एक औरत से विवाह करो।

संसार में कुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो।’ दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे ‘वेद, ‘रामायण, ‘गीता, हो या ‘तलमुद व ‘बाइबल। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है।

बाद में हिन्दुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी। हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ के एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी के भी अनेक पत्नियाँ थीं। प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी। यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाजत है। तलमूद कानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। इनमें बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (९६० ई.-१०३० ई.) ने इसके खिलाफ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज १९५० ई. तक प्रचलित रहा और अन्तत: इसराईल के चीफ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।

२. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं सन १९७५ र्ई. में प्रकाशित ‘इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या ६६, ६७ में बताया गया है कि १९५१ ई. और १९६१ ई. के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह ५.०६ प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल ४.३१ प्रतिशत था।

भारतीय कानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गैर-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गैर कानूनी है। इसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियां होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियां रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन १९५४ ई. में हुआ जब हिन्दू विवाह कानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको गैर-कानूनी करार दिया गया। यह भारतीय कानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ। अब आइए इस पर चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरूष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?

३. पवित्र कुरआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र कुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो’ कुरआन में है- ”अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो”(·कुरआन, ४:३)

कुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नही थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ करने में समर्थ हो। कुरआन के इसी अध्याय अर्थात सूरा निसा आयत १२९ में कहा गया है : ”तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे।” (कुरआन, ४:१२९)

कुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरूष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है.

आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा नहीं करने की दृष्टि से पाँच भागों में बांटा है-

(A) फ़र्ज़ अर्थात अनिवार्य (B) मुस्तहब अर्थात पसन्दीदा (C) मुबाह अर्थात जिसकी अनुमति हो (D) मकरूह अर्थात घृणित, नापसन्दीदा (E) ‘हराम अर्थात निषेध

बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो.

४. औरतों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरूष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज्य़ादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है इसीलिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है.

५. भारत में पुरूषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और भ्रूण हत्या भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबदी पुरूषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक होगी.

६. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक हैअमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अठत्तर लाख ज्य़ादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरूषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरूषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरूषमैथुन) है ओर पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरूषों से चालीस लाख ज्य़ादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल खुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कितनी अधिक है।

७. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएंगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएंगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी। यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत: उस·के सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरूष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह गलत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे.

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इ़ज्ज़त बाकी रखना चाहता है।

सलीम खान

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>समलैंगिकता ईश्वर के क़ानून के खिलाफ़ है

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बीते गुरुवार (यौमुल खमीस) को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश एपी शाह और न्यायधीश एस मुरलीधर की पीठ ने यह फ़ैसला सुना दिया कि समलैंगिकता अब अपराध नहीं और आपसी सहमती से इस प्रकार के बनाये गए सम्बन्ध में कोई बात गैर-क़ानूनी नहीं. (कु)तर्क यह था न्यायधीशों का कि “भेदभाव समानता के खिलाफ़ है और यह फ़ैसला समानता को मान्यता देता है जो हर व्यक्ति को एक गरिमा प्रदान करेगा”. कोर्ट के इस फ़ैसले पर जिस प्रकार से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आईं वह लाज़मी थी.


वैसे एक बात मुझे पहली बार अच्छी लगी कि भारत की दो बड़ी कौमें हिन्दू व मुसलमानों ने एक जुट हो कर इस फैसले का विरोध किया (मेरा मानना है कि अगर इसी तरह अमेरिका और पश्चिम का अन्धानुकरण को साथ मिलकर नकारा जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि भारत जल्द ही विश्वशक्ति बन जायेगा).

भाजपा के एक बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी का बयान काबिले तारीफ रहा, उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से बड़ी संसद है अर्थात संसद न्यायपालिका से उपर है. सिर्फ एक या दो न्यायधीश (शायेद वह समलैंगिक ही हों) सब कुछ तय नहीं कर सकते हैं.

बाबा रामदेव ने कहा कि इस प्रकार तो कुल ही नष्ट हो जायेंगे. अगर सरकार नहीं चेती तो आन्दोलन किया जायेगा”

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह फ़ैसला भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ तो है ही इस्लाम के नज़र में भी हराम है. कुरान में जिक्र है कि एक ज़माने में हज़रत लूत की कौम थी, और वे लोग आपस में एक ही लिंग के प्रति आकर्षित थे. अल्लाह के आदेश पर हज़रत लूत ने अपनी कौम को समझाया और उन्हें यह शिक्षा देने की कोशिश की कि यह अप्राकृतिक है और अल्लाह के नज़दीक खतरनाक गुनाह जिसका अजाब भयानक होगा. लेकिन उनकी कौम ने नहीं माना और अल्लाह ने उन पर पत्थरों की बारिश करके पूरी की पूरी कौम को ख़त्म कर दिया. (जिस तरह से देह व्यापार या अप्राकृतिक यौन संबंधों को वैध ठहराने वाले यह सबक ले सकते है कि एड्स जैसी लाइलाज खतरनाक बीमारी के रूप में ईश्वर इन्सान के सामने अपनी निशानियाँ भेज देता है)

किसी ने कहा है कि किसी देश को बरबाद करना हो तो वहां के युवा वर्ग को बरबाद कर दो देश खुद ब खुद बरबाद हो जाएगा।

अमेरिका का अन्धानुकरण इस प्रकार कि अपने देश के कानून में ही बदलाव किया जा रहा है…कोर्ट ने १४९ साल पुराने क़ानून के उन प्रावधानों को बुनियादी अधिकारों के खिलाफ बताया है जिनके तहत समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में आता था. न्यायधीशों ने भारत के संविधान की धरा ३७७ को ही गलत करार दिया. हालाँकि पीठ ने यह भी साफ कर दिया है कि समलैंगिकता को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७, असहमति अवयस्कता और अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध के मामले जारी रहेंगे. आईपीसी की धाराएँ इसे अपराध मानती हैं और कोर्ट नहीं मानता यह दोगलापन क्यूँ?


आखिर बुनियादी अधिकार क्या क्या है? यही कि समय समय इसे बदला जाता रहे. आज भी बुनियादी अधिकार रोटी कपडा और मकान ही है. आज भी देश की ७०% जनता गरीब है उसे सलैंगिकता से कोई लेना देना नहीं. उन्हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए और चाहिए पहनने को कपडा…

समलैंगिकता अगर अप्राकृतिक नहीं होती तो पूरी दुनिया में किसी ना किसी जानवर में यह आदत ज़रूर होती.

वैसे अभी यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया है इसलिए केवल दिल्ली की सीमा के अन्दर ही यह क़ानून लागु होगा…जब तक की देश के अलग हिस्सों में भी ऐसा फैसला नहीं आ जाता.(अगर प्रतिशत की बात करें तो आंकडों ? के मुताबिक (पता नहीं कहाँ से आंकडें आ गए) २५ लाख से ज़्यादा लोग समलैगिक हैं इस प्रकार मात्र 0.२५% ही लोग इस श्रेणी में आते हैं, अगर कोर्ट इतने कम (लगभग नगण्य) लोगों की मुलभुत ज़रूरतों का ख्याल आ रहा है तो देश ७०% गरीब जनता के लिए वह क्या फैसला दे रही है. करोडों अशिक्षित जनता के बारे में क्या फैसला कर रही है . १५% से ज़्यादा मुसलमानों की सुरक्षा और मुलभुत सुविधाओं के बारे में क्या फैसला कर रही है. यहाँ कुछ नहीं होने वाला सिवाय अंग्रेजों की गुलामी और अमेरिका के कल्चर को चाट चाट कर अपने अन्दर समाहित करने के.)

यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि जिस देश के युवा को ग़रीबी, अशिक्षा बेरोजगारी से जूझना चाहिए. वह समलैंगिकता की बात कर रहे हैं. कोर्ट का यह फैसला निहायत ही अप्राकृतिक है और किसी भी तरह से प्राकृतिक नहीं है. मैं फिर कह रहा हूँ कि अगर प्राकृतिक होता तो जानवर में भी ऐसी प्रवृत्ति दिखाई देती. यह समाज में गन्दगी फ़ैलाने वाला फ़ैसला है. किसी भी धर्म गर्न्थों में ऐसे संबंधों का ज़िक्र नहीं है. ऐसे चीज़ों को मान्यता देना मेरे हिसाब से एक प्रतिशत भी सही नहीं होगा. इसे बदलाव की बयार बताने वाले लोगों की सामाजिक निंदा होनी चाहिए. इसे खुलेआम स्वीकार करने का मतलब है कि मुसीबत को बढावा देना. अन-नैचुरल सेक्स संबंधों से एच.आई.वी. एड्स के साथ साथ कई सामाजिक संक्रमण पैदा होगा जो किसी भी हाल में उचित नहीं है. मेरे हिसाब से इन चीज़ों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए.

लॉर्ड मैकाले ने १८६० में आईपीसी की धारा ३७७ का मसौदा तैयार किया था. इसमें अप्राकृतिक यौन संबंधों पर दस साल तक की सज़ा का प्रावधान किया गया था. मेडिकल साइंस तो अभी तक इस मामले में निरपेक्ष है मगर यह तय है कि यह अप्राकृतिक ही है.

यह फैसला अल्लाह के क़ानून और देश के क़ानून के खिलाफ है…मैं चैलेन्ज के साथ कह सकता हूँ कि अगर देश भर में वोटिंग करा ली जाये तो उन लोगों को पता चल जायेगा जो लोग इसे सही मान रहें है… ऐसी कृत्य के लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं और उनके लिए क़ानून की नहीं मनोचिकित्सक को दिखाने की ज़रुरत है.इस क़ानून को वापस ले लेना चाहिए. कोर्ट का फ़ैसला अप्रत्याशित है. यह अमेरिका की गहरी साजिश है. एशियन कल्चर के विरुद्ध है. ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाने-पर तो इंसानी नस्ल ही ख़त्म हो जायगी. लोग मुसीबत में गिरफ्तार हो जायेंगे. इस फैसले पर विचार करने की ज़रुरत है. ईश्वर ने इन्सान को जिस मकसद के लिए पैदा किया है उसके खिलाफ़ यह खुली बगावत है अर्थात ईश्वर के क़ानून के खिलाफ बगावत. यह चन्द बाकी लोग जो कोर्ट में ईश्वर के क़ानून को चुनौती दे रहे है एक न एक दिन बड़ी मुसीबत में गिरफ़्तार होंगे. ईश्वर (अल्लाह) ने मर्द और औरत को एक दुसरे का लिबास बताया है, और एक दुसरे के सुकून का ज़रिया. लेकिन अगर यह हुआ है तो यह तय है कि समाज में अराजकता बढेगी और तलाक़, संबंधों के टूटने का चलन बढेगा. (अभी तक तो पत्नी अपने पति से इसलिए झगडा करती थी कि उसके पति का किसी गैर-औरत से सम्बन्ध है लेकिन अब तो उसे अपने पति को अपने दोस्तों से भी दूर रखना पड़ेगा और निगाह रखनी पड़ेगी कि वह किस मर्द से मिल रहा है, औरतों से वे बाद में निबटेंगी. यह एक नयी मुसीबत आएगी.)

और हाँ, एक तर्क है जवाब दीजिये आप… अगर आपके पास हो तो. जिस तरह समाज का एक तबका यह मानता है कि बाकी उसकी बात माने और अमल करें तो समलैंगिक लोगों की भी यही मंशा ज़रूर होगी कि सभी समलैंगिकता का समर्थन करें, उसे जाने और माने भी. चलो ठीक है लेकिन वे और आप जवाब दें फिर बच्चे कैसे पैदा होंगे, इंसानी नस्ल आगे कैसे बढ़ेगी??? है कोई जवाब…???
यह फैसला भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धज्जियाँ उड़ा रहा है.

समर्थन में कुतर्क समलैंगिक सम्बन्ध प्रकृति के के खिलाफ है लेकिन केवल इसी आधार पर समलैंगिकों को मौलिक अधिकार से तो वंचित नहीं रखा जा सकता है. समाज को अपना नजरिया बदलना होगा.
जवाब चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या एक असामाजिक कृत्य है लेकिन केवल इसी आधार पर चोर लोगों को मौलिक अधिकारों से तो वंचित नहीं रखा जा सकता है. समाज को अपना नजरिया बदलना होगा और चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या को वैधानिक रूप से मान्यतामिलनी चाहिए. क्या यह सही है???


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>छोटे वस्त्र: दुर्व्यवहार करने का न्योता !

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आजकल फिल्मों में तो लड़कियां (Actresses) उधम करे ही हुए हैं मगर हमारे लोकल समाज में भी अब छोटे कपडे आम होते जा रहे हैं, मुझे तो ऐसा लगता है कि हर गर्मी में लड़कियां पश्चिमी सभ्यता के नज़दीक और करीब आती जा रही हैं और उनके वस्त्रों में अमेरिका और यूरोप की झलक हर गर्मी में बढती ही जा रही है यानि कम के कमतर और कमेस्ट ! यही नहीं प्राइवेट स्कूल कॉलेज की लड़कियां भी हद से काफी आगे जाती जा रहीं हैं, हालाँकि सरकारी कॉलेज में हाल ही में ड्रेस कोड लागु किया जा चुका है जिसमें जींस टी-शर्ट पहनने पर पाबन्दी लगा दी गयी है, यूपी प्रिंसिपल असोसिएशन की बैठक में यह निर्णय लिया गया है. बैठक में यह भी सुझव दिया गया कि अगर लड़कियां इस तरह की भड़काऊ वस्त्र ना पहने तो छेड़छाड़ में कमी आएगी. अब कॉलेज में तो यह लागू हो जा रहा है लेकिन हमारे आस पास में यह बीमारी कैसे ठीक होगी. हमें नहीं लगता कि यह बीमारी किसी तरह जल्दी ठीक हो पाए लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि अगर हम अपनी ओरिजनल सभ्यता और चलन को अपनाने लगे तो कुछ फायेदा हो सकता है | उन चलन में से एक चलन है- पर्दा !!!

परदे से मुराद इस्लामिक लिबास है जो किसी भी स्त्री की गरीमा को बढ़ाता ही है, घटाता नहीं है…

वैसे मैं आपको एक उदहारण से यह बताने की कोशिश करूँगा कि पर्दा करने वाली लड़की और छोटे वस्त्र वाली लड़की में से कौन दुर्व्यवहार को न्योता देगी !!!

“मान लीजिये समान रूप से सुन्दर दो जुड़वां बहनें सड़क पर चल रही हैं| एक केवल कलाई और चेहरे को छोड़ कर परदे में पूरी तरह ढकी हों दूसरी पश्चिमी वस्त्र मिनी स्कर्ट (छोटा लहंगा) और छोटा सा टॉप पहने हो | एक लफंगा किसी लड़की को छेड़ने के लिए किनारे खडा हो ऐसी स्थिति में वह किस लड़की से छेड़ छाड़ करेगा ? उस लड़की से जो परदे में है या उससे जो मिनी स्कर्ट में है? स्वाभाविक है वह दूसरी लड़की से दुर्व्यवहार करेगा! ऐसे वस्त्र विपरीत लिंग को अप्रत्यक्ष रूप से छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार का निमंत्रण देते हैं|’

कुरआन बिलकुल सही कहता है कि पर्दा औरतों के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न को रोकता है| परदे का औरतों को क्यूँ उपदेश दिया जाता है इसके कारण का पवित्र कुरआन की सुरा अल अहज़ाब में उल्लेख किया गया है –

“ऐ नबी! अपनी पत्नियों, पुत्रियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे (जब बाहर जाएँ) तो उपरी वस्त्र से स्वयं को ढांक लें | यह अत्यंत आसान है कि वे इसी प्रकार जानी जाएँ और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रहें और अल्लाह तो बड़ा क्षमाकारी और बड़ा ही दयालु है |” (कुरआन 33:59)

पवित्र कुरआन कहता है कि औरतों को परदे का इसलिए उपदेश दिया गया है कि वे पाकदामनी के रूप में देखि जाएँ और पर्दा उनसे दुर्व्यवहार से भी रोकता है|

आगे कुरआन की सुरा निसा में कहा गया है –
“और अल्लाह पर इमान रखने वाली औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामनी की सुरक्षा करें और वे अपने बनाव श्रृंगार और आभूषणों को ना दिखाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं जो सामान्य रूप से नज़र आता है| और उन्हें चाहिए कि वे अपने सीनों पर ओढ़नियाँ ओढ़ लें और अपने पतियों, बापों और बेटों…… के अतिरिक्त किसी के सामने अपने बनाव-श्रृंगार प्रकट न करें |” (कुरआन, 24:31)


आम तौर पर लोग समझते हैं कि इस्लाम में पर्दा केवल स्त्रियों के लिए ही कहा गया है | हालाँकि पवित्र कुरआन में अल्लाह ने औरतों से पहले मर्दों के परदे का वर्णन किया गया है

“ईमानवालों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामनी की सुरक्षा करें| यह उनको अधिक पवित्र बनाएगा और अल्लाह खूब परिचित है हर उस कार्य से जो वे करते हैं|” -(कुरआन 24:30)


“उस क्षण जब एक व्यक्ति की नज़र किसी स्त्री पर पड़े तो उसे चाहिए कि वह अपनी नज़र नीची कर ले |”



लेखक: सलीम खान

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>पब संस्कृति, कट्टरता संस्कृति और हमारी संस्कृति

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पुनः प्रकाशित

पिछले दिनों 26 जनवरी के ठीक एक दिन पहले मंगलूर (कर्नाटक) में श्रीरामसेना के कार्यकर्ताओं ने कानून व्यवस्था की चिंता किए बिना जिस तरह से लड़कियों और औरतों को दौड़ा-दौड़ा के पीटा उससे सभ्यता और शालीनता के मानने वालों को बहुत ठेस पहुँची और दुःख पहुँचा। लड़कियों पर असभ्य हमले की इस घटना पर प्रदेश के मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया आने में 2 दिन लग गए। इसके अलावा पुलिस ने भी अपनी कार्यवाही में बहुत देरी की। कर्नाटक ने चर्चों पर अभी हमलों के ज़्यादा दिन नहीं बीते तब इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार बजरंगदल के प्रति जिस तरह से नरमी बरती गयी थी वह किसी से छिपा नही है। अतीत को देखते हुए इस बार भी श्रीराम सेना पर अंकुश लगाने के लिए राज्य सरकार की तरफ़ से कोई ठोस क़दम उठाये जायेंगे, कह पाना मुश्किल है। श्रीरामसेना पर पाबन्दी लगाने पर भी राज्य सरकार टालमटोल सा रवैया अपनाए हुए है। सरकार का बयान भी उस वक्त आया जब श्रीरामसेना के प्रमुख प्रमोद मुथलिक जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, उन्होंने राज्य सरकार की रूलिंग पार्टी को याद दिलाया कि राज्य में जो सरकार बनी है वो बनी ही है हिंदुत्व एजेंडे पर। मुथलिक ने राज्य सरकार को यह सलाह भी दे दी थी कि राजनितिक फायदे के लिए हिंदूवादी संगठनों को बेज़ा परेशान ना किया जाए। (‘हाँ मैं हिंदू हूँ’ -मेरा लेख पढ़े यहाँ क्लिक करके)

श्रीरामसेना के प्रमुख प्रमोद मुथलिक का कहना है कि हमें भारतीय संस्कृति को बचाना है और रक्षा करनी है और लड़कियो और औरतों को ग़लत हरकतों और अनैतिक गतिविधियों से बचाना है, इसलिए उनकी सेना ने पब पर हमला किया और वहां पर मौजूद लड़कियों और महिलाओं को दौड़ा दौड़ा कर खूब पीटा। भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर स्वयम्भू संगठनों के इस कृत्य को जायज़ नही ठहराया नहीं जा सकता लेकिन अफ़सोस इस तरह की घटनाओं पर कोई नही बोल रहा है और गुपचुप रूप से राजनैतिक समर्थन भी मिला हुआ है रूलिंग पार्टी ने कहा की पब पर हमला करने वालों से और श्रीरामसेना से उनका कोई रिश्ता या लेनादेना नही है लेकिन अगर वाकई ये सही है तो बजरंगदल, श्रीरामसेना जैसे इन संगठनों के हिंसात्मक कारनामों पर रूलिंग पार्टी को अपना रुख पुरी तरह से साफ़ करना चाहिए।

वास्तव में ऐसे लोगों को हिंदू कहना हिंदू धर्म संस्कृति का अपमान है श्रीरामसेना की गुंडा और दहशत फैलाने वाली फौज ने जो कुछ किया उसकी कड़ी आलोचना देश भर में हुई जो अख़बारों के ज़रिये हमने अपने सबने पढ़ी/देखी। (‘हाँ मैं हिंदू हूँ’ -मेरा लेख पढ़े यहाँ क्लिक करके)

हमारे यहाँ ये जो कट्टरता का ज़हर हर धर्म में फैलता जा रहा है, वह वास्तव में हमारे लिए किसी आत्मघाती मौत से कम नहीं है। वो जो ये सोचते है किवह ही सही हैं और बाकी सब ग़लत वो वास्तव में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं। उन्हें हमारे भारत, हमारे विश्व और हमारी इंसानियत बिरादरी की असलियत बिल्कुल भी ज्ञान नही है। वो इन्सान और इन्सान में भेद कर रहे हैं, वो अगर किसी अन्य वजह से भेद करते तो समझ में आता भी कि चलो उन्हें शयेद ज्ञान नहीं है असलियत का, मगर जनाब ये तो धर्म को लेकर आपस में बाँट रहें है जबकि दुनिया में जितने भी धर्म हैं या धर्म के ग्रन्थ हैं वो सब एक ही बात कहते है। ना यकीन हो तो अपनी अपनी किताबों और धर्मग्रन्थों के साथ साथ अन्य धर्म के ग्रन्थों का भी उदार मन से मुताला (अध्ययन) करें। सब पता चल जाएगा लेकिन नहीं आप ऐसा करना ही पसंद नहीं करेंगे, हो सकता है कि ये लेख पढ़ते पढ़ते बंद भी कर दे। मगर सच्चाई वाकई तो यही है, ज़रा अपने आप में झांकिए और पूछिये कि क्या हम सब एक नहीं हैं? (इस सम्बन्ध में मेरा लेख पढ़ें- स्वच्छ संदेश ब्लॉग पर)

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिकता व पश्चिमी संस्कृति की अंधी दौड़ में आज की महिलाएं और लड़कियां तमाम मर्यादाएं लाँघ कर शर्म व लिहाज को भूल रही हैं कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसलिए यहाँ सभी को अपने तरीके से रहने, खाने-पीने, बोलने घुमने फिरने का समान अधिकार है। लेकिन भाई आज़ादी का यह मतलब नहीं कि आधुनिकता की अंधी गली में प्रवेश कर लिया जाए, ना ही श्रीराम सेना जैसे संगठनों को यह अधिकार है कि वह इस तरह से विरोध करें जो गैर कानूनी हो। आज की युवतियों, औरतों को यह समझाने की ज़रूरत है कि वह मर्यादा में रह भी आज़ादी और मनोरंजन का लुत्फ़ उठा सकती हैं, सलीकों से उनके ज़मीर को जगाया जा सकता है साथ ही उन्हें ये सोचने के लिए विवश किया जा सकता है कि वह अपनी शिक्षा के आधार पर यह तय करें कि भारतीय संस्कृति और पश्चिम की संस्कृति में क्या फर्क है। 

सच तो यह है की लड़कियों की पहली पाठशाला व घर में पहली टीचर माँ है बच्चों विशेष रूप से लड़कियों की परवरिश बचपन में ही करते समय अगर उन्हें मर्यादा में रहने, अपनी सभ्यता संस्कृति और परम्पराओं की शिक्षा देने के साथ ही उन्हें निभाने के लिए प्रेरित किया जाए, अच्छे बुरे की पहचान की आदत डाली जाए तो लड़कियों के क़दम हरगिज़ नहीं बहकेंगे, जिस तरह से आज जो देखने को मिल रहा है उसके लिए कहीं न कहीं ज़िम्मेदार परिवार के लोग, पैरेंट्स भी हैं, जो लड़कियों को ज़रूरत से ज़्यादा छूट दिए हुए हैं।

इस घटना के बाद पब कल्चर को लेकर जो बहस छिडी है उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि पब कल्चर कि जड़ों पर प्रहार करने कि ज़रूरत है जो लोग इनके खिलाफ हैं उनका विरोध पब में शराब पीती लड़कियों से नहीं होना चाहिए बल्कि शराब का विरोध करना/होना चाहिए। जो लोग नई अर्थव्यवस्था/पूजीवादी अर्थव्यवस्था के सक्रीय भागीदार हैं वह इसके दुष्परिणामों को समाज के लिए हानिकारक नहीं मानते। अरे! पूजीवाद तो रिश्तों, भावनाओं तक को कैश करा लेने से भी पीछे नही हटता उनकी निगाह में लड़कियों लड़के का सार्वजनिक रूप से बाँहों में बाहें डाल के शराब पीना या डांस करना कोई बुरी बात नहीं है औद्योगिकरण के अलग चरणों का पब संस्कृति या शराब खानों से सीधा सम्बन्ध शुरू से ही रहा है। देश कि अर्थ व्यवस्था वर्तमान समय में औद्योगिकरण के विशेष दौर से गुज़र रही है जहाँ उत्पादन और श्रम के नए तरीकों ने दिन-रात का अन्तर कम कर दिया है। ऐसा नहीं है कि शराब कोंई नई चीज़ है यह पहले भी पी जाती थी और अब भी पी जाती है, लेकिन अब बड़े पैमाने पर पी जाती है और आज कल ये स्टेटस सिम्बल बन चुका है, जिसके नतीजे में समाज में जो गिरावट आई है वो सबके सामने है।

“शराब अपने अपने आप में बहुत भयानक् चीज़ है, वेदों और कुरान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि शराब पीना हराम, वर्जित (prohibited) है। ना यकीन हो तो पढ़ कर देखलें।”

ऐ ईमानदारों, शराब, जुआं और बुत और पांसे तो बस नापाक (बुरे) शैतानी काम हैं, तो तुम लोग इनसे बचे रहो ताकि तुम फलाह (कामयाबी) पाओ. (अल-कुरान 5:90)

मनु स्मृति में पुरज़ोर तरीके से यह मना किया है कि मनुष्य को शराब नहीं पीना चाहिए बल्कि इस की सुगंध तक तो नही लेना चाहिए. (देखें मनु स्मृति 11.146-149)

ऋग्वेद में तो कई जगह पर शराब पीने को निषेध किया गया है, कहाँ गया है कि यह राक्षस, पिशाच और नरक जानेवालों का कार्य है जो ईश्वर के नजदीक बहुत बड़ा पाप है, जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है. 

तो भई! अब जाग ही जाइये तो अच्छा है, वरना विनाश तो निश्चित है.




आपका: सलीम खान संरक्षक स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान