स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>जिन्हें नाज़ है ‘हिन्द’ पर वो कहाँ हैं….Sahir Ludhiyanwi

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ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये पुरपेंच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

वो उजले दरीचों में पायल की छन छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन धन
ये बेरूह कमरों मे खांसी कि ठन ठन
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रे, ये गुस्ताख फ़िक़रे

ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनओमन्द बेटे भी, अब्बा मियाँ भी
ये बीवी है और बहन है, माँ है
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

मदद चाहती है ये हवा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलेखा की बेटी,
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….


ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये
कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें
नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें
नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ
हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….
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लेख सन्दर्भ

सलीम खान