स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था, कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था.

>


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था 
कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था

शाम से सुबह तक बस तेरी तलाश है  
तेरे बिना ज़िन्दगी मेरी जिंदा लाश है

तू नही तो ज़िन्दगी कैसी उदास है 
बुझती नही है ये भी कैसी प्यास है  

अक़्स-ऐ- आरज़ू लिए फिरते रहेंगे हम
पल-पल तेरी याद में मरते रहेंगे हम

मरासिम मुस्तकिल न सही, मिजाजे-आशिक़ी रहे
नगमा नहीं साज़ नही न सही तेरी मौसिक़ि रहे


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं
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Filed under: ज़िन्दगी की आरज़ू, सलीम खान

>तेरे सिवा कोई और इन अश्कों के क़ाबिल भी तो नहीं: Saleem Khan

>


हमें भी आरज़ू थी तेरे संग ज़िन्दगी बिताने की
पर ‘आरज़ू’, साथ तेरा हमने पाया भी तो नहीं




माना कि ज़िन्दगी में बहुत बहाने हैं, आंसू बहाने के लिए
पर तुने जैसे रुलाया है, पहले किसी ने रुलाया भी तो नहीं


ऐसा नहीं कि तेरे आने से पहले, हम कभी मुस्कुराये न थे
पर तेरे जाने के बाद वैसे किसी ने हंसाया भी तो नहीं


भटकते रहे इस दुनिया में हमसफ़र की तलाश में
पर तुझ जैसा हमसफ़र फिर दोबारा मिला भी तो नहीं


तेरी यादों की शहादत मेरे अश्क देते हैं ‘ए आरज़ू’
तेरे सिवा कोई और इन अश्कों के क़ाबिल भी तो नहीं

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>कहाँ तलाशूँ तुझे मैं तुम्हें आरज़ू -presented by Saleem Khan

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दूर तलक गूंजते हैं यहाँ सन्नाटे रात भर
दिन के शोर ओ शराबे में भी होता हूँ मैं तन्हाँ!
दिल की आवाज़ भी सुन लो, सुन लो मेरी आरज़ू
कहाँ तलाशूँ तुझे मैं, तुम हो कहाँ, मैं हूँ कहाँ?

Filed under: ज़िन्दगी की आरज़ू, मेरी ग़ज़ल

>हमें भी आरज़ू थी तेरे संग ज़िन्दगी बिताने की -presented by Saleem Khan

>

हमें भी आरज़ू थी तेरे संग ज़िन्दगी बिताने की
पर ‘आरज़ू’, साथ तेरा हमने पाया भी तो नहीं

माना कि ज़िन्दगी में बहुत बहाने हैं, आंसू बहाने के लिए
पर तुने जैसे रुलाया है, पहले किसी ने रुलाया भी तो नहीं

ऐसा नहीं कि तेरे आने से पहले, हम कभी मुस्कुराये न थे
पर तेरे जाने के बाद वैसे किसी ने हंसाया भी तो नहीं

भटकते रहे इस दुनिया में हमसफ़र की तलाश में
पर तुझ जैसा हमसफ़र फिर दोबारा मिला भी तो नहीं

तेरी यादों की शहादत* मेरे अश्क देते हैं ‘ए आरज़ू’
तेरे सिवा कोई और इन अश्कों के क़ाबिल भी तो नहीं

*गवाही

Filed under: ज़िन्दगी की आरज़ू, ज़िन्दगी की आरज़ू, मेरी ग़ज़ल

>कोई आरज़ू नहीं और ज़िन्दगी में…(No desire in life now) presented by Saleem Khan

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तन्हा मैं ज़िन्दगी बिताऊं कैसे
तेरी याद दिल से मिटा दूँ कैसे

कोई आरज़ू नहीं और ज़िन्दगी में
सिर्फ़ यही की तुझे अपना बनाऊं कैसे

तू नहीं हो सकती मेरी ये मैं जानता हूँ
पर दिल-ऐ-नादाँ को ये समझाऊं कैसे

ज़ख्म दे रहे हैं मेरे दिल के तुझे दुआ
तुझे ख़ुशी मिले और मैं न मुस्कुराऊं कैसे

ख़त्म न हो इस दिल की कहानी क़यामत तक
पर तू न हुई मेरी ये मैं सबको बताऊँ कैसे

रह गया प्यासा मैं तेरी मोहब्बत का
इस दिल की प्यास बढ़ गयी है बुझाऊं कैसे

ज़िन्दगी दी खुदा ने और दे दी तेरी आरज़ू
अब इस आरज़ू को मैं दिल से मिटाऊं कैसे

ज़िन्दगी मिली है तो मोहब्बत ही कर लूं
बिन तेरी मोहब्बत के दुनियाँ से चला जाऊँ कैसे

इंतज़ार करूँगा तेर इक़रार का उस जहाँ में भी
मर कर तू ही बता तुझे भूल जाऊं कैसे

Filed under: ज़िन्दगी की आरज़ू, ज़िन्दगी की आरज़ू, मेरी ग़ज़ल

>ज़िन्दगी की आरज़ू Desire of Life by Saleem Khan

>

~~~
एक बार आरज़ू ने ज़िन्दगी से पूछा

मैं कब पूरी होउंगी?’

ज़िन्दगी ने जवाब दिया

कभी नहीं‘!

आरज़ू ने घबरा कर फ़िर पूछा

क्यूँ?’

तो ज़िन्दगी ने जवाब दिया

अगर तू ही पूरी हो गई तो इंसान जीएगा कैसे!!!???’

ये सुन कर आरज़ू बहुत मायूस हो गई और अपने आँचल के अन्दर सुबक-सुबक कर रोने लगी.

– सलीम खान 1999-2009

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>ज़िन्दगी की आरज़ू (Desire of Life)

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~~~
एक बार आरज़ू ने ज़िन्दगी से पूछा-

मैं कब पूरी होउंगी?’

ज़िन्दगी ने जवाब दिया-

कभी नहीं‘!

आरज़ू ने घबरा कर फ़िर पूछा-

क्यूँ?’

तो ज़िन्दगी ने जवाब दिया

अगर तू ही पूरी हो गई तो इंसान जीएगा कैसे!!!???’

ये सुन कर आरज़ू बहुत मायूस हो गई और अपने आँचल के अन्दर सुबक-सुबक कर रोने लगी.

– सलीम खान 1999-2009

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान