स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>Sunday Supplimentary (स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़)

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पिछली पोस्ट से मैंने एक सीरिज़ की शुरुआत की है जिसमें मैंने “वेद और कुरआन” में दी गयी यक़्सानियत (समानताओं) का जिक्र कर रहा हूँ. सीरिज़ चलती रहेगी, फ़िलहाल यह पोस्ट ख़ास आपके लिए… यह किताब आप ज़रूर पढें…

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from: स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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Filed under: इस्लाम

>जिहाद का आदेश भगवत गीता में भी ! Jihad in Bhagwat Geeta !!

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यह लेख मजहबे-इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच यकसानियत (समानताओं) पर ही आधारित किया है.

जिहाद का आदेश भगवत गीता में है या नहीं इस विषय पर जाने से पहले हमें यह समझना होगा कि जिहाद का अर्थ क्या होता है?

जिहाद शब्द का इस्तेमाल वर्तमान काल में जिस अर्थ में लिया जा रहा है, आजकल इस्लाम के बारे में फैली गलत-फहमियों में से एक है. बल्कि यों कहें कि जिहाद के बारे में गलत-फहमी केवल नॉन-मुस्लिम में ही नहीं है बल्कि मुस्लिम में भी है. जिहाद को नॉन-मुस्लिम और मुस्लिम दोनों ही यह समझते हैं कि किसी मुसलमान के द्वारा लड़ी गयी लडाई, वह चाहे किसी मक़सद के लिए हो, वह गलत मक़सद हो या सही, जिहाद कहलाता है.

जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है जो ‘जहादा’ ‘jahada’ शब्द से बना है जिसका मायने होता है ‘मेहनत करना’ ‘जद्दोजहद करना’ ‘संघर्ष करना’ अंग्रेजी में इस कहेंगे to strive or to struggle. मिसाल के तौर पर ‘अगर एक छात्र उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करता है, तो वह जिहाद कर रहा है.’ अरबी भाषा के शब्द जिहाद का एक अर्थ ‘अपनी नफ़्स से संघर्ष करना’ भी है. अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करने को भी जिहाद कहते हैं और यह अपने अंतर एक अर्थ और समेटे है जिसका अर्थ होता है कि ‘आत्म रक्षा के लिए संघर्ष’ या चढाई हो जाने या अत्याचार होने पर रण-भूमि में चढाई करने वाले या अत्याचार के विरुद्ध लड़ना.

जिहाद धर्म-युद्ध नहीं
लेकिन जिहाद को ‘पवित्र युद्ध’ holy war नाम पश्चिम जगत और इस्लाम विरोधी मिडिया ने दिया जो कि बिलकुल ही गलत परिभाषा है। जैसा कि हम देख चुके है कि जिहाद एक अरबी शब्द है उसके मायने क्या है.

इस्लाम के क्रिटिक्स खास कर अरुण शौरी जैसे लोग यह कहते है कि कुर’आन में कई श्लोक (आयत) ऐसी है जो मार-काट, लडाई-झगडे के लिए कहती है. वे कहते है कि कुर’आन में लिखा है कि ““… Fight and slay the Mushrik/Kafir wherever you find them …” (Al Qur’an 9:5)”

सुरह-तौबा की आयत संख्या पांच (5) से पहले की कुछ आयतों में शांति और समाधान की चर्चा है और शांति संधि का पालन न करने पर अल्लाह ने बहुदेववादियों को चार महीने की चेतावनी देता है और फिर उसके बाद का यह आदेश उस युद्धरत सेना के लिए है कि उन्हें अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर’आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे और यह स्वाभाविक ही है कि कोई भी आर्मी जनरल अपनी सेना का हौसला बढ़ाता है और कहता है कि “डरना नहीं, बिलकुल भी, और अपने दुश्मन के छक्के छुड़ा दो. उन्हें युद्ध में जहाँ पाओ मरो और उसका वध कर दो.

अरुण शौरी अपनी किताब “The World of Fatwas” में जब कुर’आन की सुरह तौबा के पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का ज़िक्र करता है तो वह तुंरत ही पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) से सातवीं आयत (श्लोक संख्या 7) में कूद कर जाता है. कोई भी तार्किक व्यक्ति जब कुर’आन को पढेगा तो उसे पता चल जायेगा कि पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का जवाब छठी आयत (श्लोक संख्या 6) में है.

अगर आप कुर’आन में पढेंगे तो आपको यह श्लोक मिलेगा मगर वे लोग (अरुण शौरी जैसे लोग) श्लोक को ‘आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट’ करके व्याख्यांवित करते हैं मगर आप फ़ौरन ही इस आयत के बाद पढेंगे तो मिलेगा कि “If any amongst the Mushriks (i.e. the enemies)ask thee for asylum, grant it to him so that he may hear the word of Allah and then escort him to where he can be secure”. (Al Qur’an 9:6) (कृपया चित्र में भी पढ़ लें)

अर्थात “और यदि मुश्रीकों में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक कि वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो क्यूंकि वे ऐसे लोग लोग है जिन्हें ज्ञान नहीं.”

आज दुनियाँ का कौन सा आर्मी जनरल होगा जो अपने सैनिकों से कहेगा कि अपने दुश्मन को जाने दो. लेकिन अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी किताब अल-कुर’आन में फरमाता है कि अगर तुम्हारा दुश्मन शान्ति चाहता है तो न सिर्फ शान्ति करो बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो. आज और इतहास का कौन सा ऐसा आर्मी जनरल होगा जिसने इस तरह का दयालुता से परिपूर्ण आदेश दिया होगा. अब अरुण शौरी से कोई ये पूछेगा कि उन्होंने अपनी किताब में जानबूझ कर आयत संख्या 6 का ज़िक्र क्यूँ नहीं किया?

जिहाद (अर्थात संघर्ष) का ज़िक्र भगवत गीता में
सभी मुख्य धर्म ने अपने यह आदेश दिया है कि अच्छे कार्य के लिए संघर्ष करो. यह भगवत गीता में भी लिखा है. “Therefore strive for Yoga, O Arjuna, which is the art of all work.” (Bhagavad Gita 2:50) लड़ाई-मारपीट (युद्ध) का ज़िक्र भगवत गीता में भी लिखा है:

महाभारत एक महाकाव्य है और हिन्दू धर्म में सबसे ज़्यादा पवित्र और मान्य है, जिसमें वर्णन है मुख्यतः दो रिश्तेदारों (cousins) के आपस में हुई लड़ाई का, वे रिश्तेदार थे कौरव और पांडव. भगवत गीता, महाभारत के अध्याय 25 से अध्याय 42 तक के 18 अध्याय को ही कहते हैं. इसमें 700 श्लोक हैं. जब अर्जुन युद्ध के मैदान में लड़ने से मना करते हैं और अपने ही रिश्तेदारों को युद्घ क्षेत्र में देखते है तो उनकी अंतरात्मा बोझिल हो जाती है और वे रिश्तेदारों की हत्या के विचार से विरक्त हो जाते हैं. और अपना हथियार ज़मीन पर रख देते हैं. उस क्षण में श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में ही सलाह देते हैं. वही पूरी की पूरी सलाह का रूप है ‘भगवत गीता’. भगवत गीता की कई आयतों में श्री कृष्ण, अर्जुन को अपने दुश्मन से लड़ने और उन्हें मारने के लिए आदेश और सलाह देतें हैं, चाहे दुश्मन उनके रिश्तेदार ही क्यूँ न हो?

भगवत गीता के अध्याय एक के आयत (श्लोक) संख्या 43 से 46 में लिखा है:

(43) हे कृष्ण, मैंने सुना है कि जो व्यक्ति अपने परिवार की परम्पराओं को नहीं निभाता है वह नरक का भागी होता है.

(44) दुर्भाग्य है कितना कि हम इतने बड़े पापयुक्क्त कार्य को करने जा रहे हैं, वो भी स्वयं के लाभ के लिए.

(45) मैं उनसे लड़ने और मार-काट करने से बेहतर समझता हूँ कि वे, ध्रितराष्ट्र के बेटे मुझे क़त्ल कर दें.

(46) इतना कह कर अर्जुन अपने हथियार नीचे रख देते हैं और रथ से नीचे उतर जाते हैं…

श्री कृष्ण अगले अध्याय 2 के श्लोक संख्या 2,3 में अर्जुन के बातों का जवाब देते हैं:

मेरे प्रिय अर्जुन,आपके दिमाग में इस तरह के अशुद्ध विचार किस प्रकार से जज्ब कर गए हैं. यह भलाई पाने वालों और उसके महत्त्व को जानने वालों के लिए बिलकुल भी उपयुक्त नहीं है. वे धरती के लिए नहीं बल्कि दुष्टता के लिए हैं”

हे अर्जुन,तुम्हारे मन में इस तरह के नपुंसक विचार किस प्रकार आ गए, यह आपके मन में नहीं आने चाहिए थे. अपने ह्रदय की कमज़ोरी को त्याग दो और उठो, ओ शत्रु को दंड देने वाले.”

जब अर्जुन श्री कृष्ण से कौरवों को मारने के बजाये खुद निहत्थे मर जाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं. तो श्री कृष्ण उन्हें समझाते हैं कि कैसे इस तरह के अपवित्र सिहार तुम्हारे मन में आ गए, कैसे तुम नपुंसक हो गए. उठो और अपने शत्रुवों का वध करो, उनसे लाडो और विजय पाओ.

आगे भगवत गीता में श्री कृष्ण अध्याय 2, श्लोक 31-33 में कहते हैं कि

31- क्षत्रिय को उसका कर्म ध्यान रखना चाहिए. उसके लिए इससे बेहतर हो ही नहीं सकता कि वह अपना धार्मिक उसूलों का कर्तव्य ध्यान में रखे इसलिए घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है.

32- हे पार्थ, उस क्षत्रिय को खुश होना चाहिए कि उसके लिए इस तरह का अवसर उसे मिल रहा है और स्वर्ग (जन्नत) जाने के लिए अवसर मिल रहा है.

33- लेकिन अगर तुम यह धर्म-युद्ध को नहीं लड़ते हो, अपने फ़र्ज़ से पीछे हटने पर तुम पाप के भागी बनोगे और इस प्रकार अपनी योद्धा की छवि को धूमिल करोगे.

इस तरह से भगवत गीता में सैकड़ों ऐसी आयतें है जिनका तज़्कीरा मैं यहाँ कर सकता हूँ कि जिसमें लडाई झगडे और युद्ध का ज़िक्र है. कुर’आन में दी गयी आयतों के मुकाबले कहीं ज़्यादा ज़िक्र है.

मनु-स्मृति में 8/350 में क्या लिखा है आप स्वयं पढ़ लें.

सोचिये अगर कोई बिना सन्दर्भ का हवाला दिए (without quoting the context) ये कहे कि भगवत गीता में लडाई झगडे के बारे में बहुत कहा गया है या लिखा है. उसमें अपने ही परिवार के लोगों को मारने-काटने का आदेश श्री कृष्ण दे रहे हैं. और मार काट जन्नत की प्राप्ति का ज़रिया भी बताया गया है. इस तरह का आयोजित प्रयास बहुत ही क्रूर है. लेकिन वही अगर हम सन्दर्भ का हवाला देकर (within the context) कहें कि अगर बुराई के खिलाफ़ लड़ना ज़रूरी कर्तव्य है अगर यह न्याय और सच्चाई के लिए है तो, भले ही यह आपके अपनों के खिलाफ़ क्यूँ न हो. it makes sense.

मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे इस्लाम के आलोचक, ज़्यादातर हिन्दू आलोचक कुर’आन की उन आयतों पर उंगली उठाते है, जिसमें अन्यायी दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए आदेश दिए गए हैं. यह तो केवल एक ही तरह से होता होगा कि वे स्वयं अपनी ही पुस्तकों, जैसे भगवत गीता, महाभारत और वेदों को पढ़ते ही नहीं या पढ़ते भी हैं तो ढंग से पढ़ते नहीं हैं.

जब मैं किसी हिन्दू भाई से यह पूछता हूँ कि आपके भगवत गीता में ऐसा-ऐसा लिखा है तो वह कहता है कि वह तो बुराई के खिलाफ लड़ने का आदेश है. मैं कहता हूँ वही तो कुर’आन में भी लिखा है आप बुराई के खिलाफ लड़ो. तब वह संतुष्ट हो जाता है.

आगे इस्लाम के आलोचक, खास कर हिन्दू आलोचक यह कहते है कि कुर’आन में यह लिखा है कि अगर आप इस तरह की लडाई-झगडा करते हैं,जिहाद में किसी को मारते हैं (सच्चाई के लिए लड़ते हैं) तो आपको जन्नत की प्राप्ति होती है. वे केवल कुर’आन का ही नहीं, सहीह बुखारी की एक हदीस (पर्व 4, बुक ऑफ़ जिहाद, अध्याय संख्या 2 हदीस संख्या 46) का भी हवाला देते हैं:

अल्लाह सुबहान व-ताला यह कहते हैं कि अगर कोई जिहाद करने वाला लड़ते लड़ते शहीद हो जाता है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा.”

भगवत गीता में भी ऐसी ही आयतों का ज़िक्र है कि अगर आप लड़ते लड़ते मर जाते है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा. उदाहरणार्थ आप स्वयं देख सकते है, भगवत गीता अध्याय संख्या 2 श्लोक संख्या 37

हे कुंती-पुत्र, अगर तुम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और यदि तुम जीत जाते हो तो इस धरती में तुम्हें शासन मिलेगा (अर्थात धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा), इसलिए उठो और लड़ो…

इसी तरह का आदेश ऋग्वेद में ( पुस्तक संख्या 1 हिम 132 श्लोक 2-6) भी लिखा है.
अगर कोई इस्लाम से सम्बंधित सवाल करता है, आलोचना करता है तो उसकी ग़लतफ़हमियों को दूर करने का सबसे बेहतर यही है कि तो मैं वही सब बातें उन्हीं की धार्मिक पुस्तकों में से हवाले देकर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ…
आखिर में मैं यही कहना चाहूँगा कि:

आओ उस बात की तरफ जो हम में और तुम में यकसां (समान) है” (अल-कुर’आन 3:64)

रंजीशें नफ़रत है दहशत क्यूँ यहाँ, तू दिलों में प्यार भर दे ऐ खुदा. नेक-कर और सीधे रस्ते पे चला, अम्न का सूरज नया कोई उगा.

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>इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली भारत के हित में: RBI निदेशक Islamic Banking System is better for India

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RBI के भूतपूर्व निदेशक का कहना है कि “बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में बदलाव किये बिना ही भारत में इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू की जा सकती है. अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के लिए एवम् अधिकारहीन और हाशिये के लोगों के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली वरदान साबित होगी.”
भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व निदेशक जनाब अब्दुल हसीब मुंबई में जमाते-इस्लामी हिंदी के तत्वाधान में आयोजित एक सेमीनार ‘Global Financial Crisis and Islamic Economic System’ / ‘विश्वव्यापी वित्तीय संकट और इस्लामी आर्थिक प्रणाली‘ में संबोधित कर रहे थे. भारत में इस्लामी आर्थिक प्रणाली की वक़ालत में उनका कहना था कि “रघुराम राजन कमिटी ने आर्थिक सेक्टर में सुधार हेतु जो तथ्य दिए उसमें इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली ही सबसे उपयुक्त बताई है. भारत के आर्थिक क्षेत्र में सुधार हेतु इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली को लागू करना सबसे बेहतर और कारगर काम होगा.” उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली और ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली में भी जानकारी और कहा कि दुनिया के बहुत से देश यह ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वह कारगर भी है. नयी सदी में जबकि दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है और सभी आर्थिक विपत्तियों से जूझ रहे हैं, इसके लिए ज़रूरि है कि इसका हल सोचा जाये.

इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली की ख़ूबी यह है कि वह अप्रभावित है और उससे भी बड़ी विशेषता है कि वह ‘केयरिंग और शेयरिंग’, पारदर्शी एवम् इंसानी सिद्धांत और उसूलों के क़रीब है.”, इस्लामिक बैंकिंग की राष्ट्रीय कमिटी के संयोजक जनाब अब्दुर-रकीब ने टिपण्णी करी, “जबकि जापान, फ्रांस, इंग्लैंड और दीगर मुल्क़ अरबों डॉलर के व्यापार के लिए आर्थिक उदारीकरण को अपनाकर स्वागत कर रहें हैं तो हम क्यूँ नहीं कर सकते”, उन्होंने आगे तर्क दिया.

उन्होंने यह भी सफाई दी कि जिन लोगों के मन में यह है कि यह आर्थिक प्रणाली केवल मुस्लिम के लिए है तो यह गलत है क्यूंकि यह प्रणाली पुरे विश्वस्तर पर कामयाब है और भारत के लिए भी इंशा-अल्लाह होगी. इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली पूरे इंसानियत के हित में है.

अपारदर्शिता और ब्याज ने आर्थिक विपत्तियों को और अधिक बढावा दिया है, जिसके चलते अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है.”, डॉ. शरीक़ निसार (अर्थशास्त्री व इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के ज्ञाता) ने विश्लेषित किया. उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के अंगों व प्रोडक्ट्स को बताते हुए कहा कि इनमें मुख्यतया मुदाराभा (speculation), कर्द-ए-हसना (Interest Free Loan), इजारा (Leasing) आदि हैं. लोगों को वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करना चाहिए ताकी वे जान सकें कि यह मौजूदा बैंकिंग प्रणाली से बेहतर है

इस सेमीनार में मौलाना रियाज़ अहमद खान (उपाध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र), डॉ. रहमतुल्लाह (अर्थशास्त्री), जे. ऍफ़ पाटिल (हेड ऑफ़ इकनॉमिक डिपार्टमेन्ट, कोल्हापुर यूनिवर्सिटी) भी शरीक हुए और अपने विचार प्रस्तुत किये.

-Saleem Khan

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>क्या गैर-मुस्लिम पर इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है?

>हर काफ़िर पर चाहे वह ईसाई या यहूदी ही क्यूँ न हो, इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है, क्यूंकि अल्लाह त-आला अपनी किताब में फरमाता है:


“(ऐ मुहम्मद ! ) आप कह दीजिये कि ऐ लोगों! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का भेजा हुआ पैगम्बर हूँ, जो असमानों और ज़मीन का बादशाह है, उसके अतिरिक्त कोई (सच्चा) पूज्य नहीं, वही मारता है वही जीलाता है. इसलिए तुम अल्लाह पर और उसके रसूल, उम्मी (अनपढ़) पैग़म्बर पर ईमान लाओ, जो स्वयं भी अल्लाह पर और उसके कलाम पर ईमान रखते हैं, और उनकी पैरवी करो ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त करो.” (सूरतुल आराफ़: १५८)

अतः तमाम लोगों पर अनिवार्य है कि वे अल्लाह के पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान लायें, किन्तु इस्लाम धर्म ने अल्लाह त-आला की दया और हिक़मत से गैर-मुस्लिमों के लिए इस बात को भी जाईज़ ठहराया कि वो अपने धर्म पर बाक़ी रहें. इस शर्त के साथ कि वह मुसलमानों के नियमों के अधीन रहें, अल्लाह त-आला का फरमान है:

“जो लोग अहले-क़िताब (यानि यहूदी और ईसाई) में से अल्लाह पर ईमान नहीं लाते और न आखिरत के दिन पर विश्वास करते है और न उन चीज़ों को हराम समझते हैं जो अल्लाह और उसके पैग़म्बर ने हराम घोषित किये हैं और न सत्य धर्म को स्वीकारते हैं, उनसे जंग करों यहाँ तक वह अपमानित हो अपने हाथ से जिज़्या दें दे.” (सूरतुल तौबा: २९)

सहीह हदीस में बुरौदा रज़िअल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम जब किसी लश्कर (फौज) या सर्रिया (फौजी दस्ता जिसमें आप शरीक न रहें हो) का अमीन नियुक्त करते तो तो आप उसे अल्लाह त-आला से डरने और अपने सह-यात्री मुसलमानों के साथ भलाई और शुभ चिंता का आदेश देते और फरमाते:

“उन्हें तीन बातों की ओर बुलाओ (विकल्प दो) वह उनमें से जिसको भी स्वीकार कर लें, तुम उनकी ओर से उसको कुबूल कर लो और उन से (जंग करने से) रुक जाओ.” (सहीह मुस्लिम हदीस नं. १७३१)

इन तीन बातों में से एक यह है कि वह जिज़्या दें. इसलिए बुद्धिजीवियों के कथनों में से उचित कथन के अनुसार यहूदियों एवं ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से भी जिज़्या स्वीकार किया जाये.

सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ.

अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है.

लेख संग्रहकर्ता: सलीम खान

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>नमाज़ का तरीक़ा

>नमाज़ का तरीक़ा http://d.scribd.com/ScribdViewer.swf?document_id=16776722&access_key=key-96k20yhtplcua30wzw0&page=1&version=1&viewMode=

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>महाकवि टैगोर ने क्या कहा?

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महाकवि टैगोर के साथ एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे मौलाना सय्यद सुलैमान नदवी, इस्लाम के इतिहासकार, इन दोनों दोनों महान विद्वानों को एक साथ देख कर किसी व्यक्ति ने कुछ यूं प्रश्न कर दिया कि

आज इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों नहीं फैल रहा है जितनी तेज़ी से मुहम्मद सल्ल० और पहले युग में फैला – सय्यद साहिब ने टैगोर से इस प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की।

तब टैगोर ने बताया कि “तब सत्य धर्म की अच्छाइयों और भलाइयों को जानने के लिए लोगों को पुस्तकालयों का रुख़ नहीं करना पड़ता था, वह हर मुसलमान के जीवन ही में विधमान था।”

क्या भारत के मुसलमान गुरु देव की बात पर ध्यान देंने ?

जी हाँ। आज सब से बड़ी बाधा हमारे देशवासियों के लिए कुछ मुसलमानों के घृणित कर्तव्य हैं । आज वह अपने ही धर्म इस्लाम का इस कारण विरोध कर रहे हैं कि वह मुसलमानों को उसके अनुसार चलते हुए नहीं देखते।

“एक मुस्लमान को चाहिए कि वो कुरान का मुताला (अध्ययन) रोज़ करे. उसे इससे भी ज्यादा ज़रूरी है कुरान के मायने जानना इसलिए वो रोज़ मायने भी पढ़े|”

प्रस्तुति: सलीम खान

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>विश्वव्यापी और नित्य आदर्श सिर्फ़ पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल० की जीवनी है.

>विश्वव्यापी और नित्य आदर्श सिर्फ़ पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल० की जीवनी है.http://documents.scribd.com/ScribdViewer.swf?document_id=11511431&access_key=key-2enro0cfq3bihvb04y2k&page=1&version=1&viewMode=

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>अल्लाह का इस्लाम मानो, मुल्ला का नही

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पिछले दिनों मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान ने मुसलमानों को उपदेश देते हुए कहा था कि ‘अल्लाह का इस्लाम मानो, मुल्ला का नही‘ यानि उनके कहने का मकसद यह है कुरान पाक और रसूले अकरम हज़रत मोहम्मद स.अ.व. की हदीस (कही गई बातों) को ही सिर्फ़ माना जाए जिसमे सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह ताआला के आदेश, निर्देश और उपदेश पर आधारित है। उनकी इस बात से ऐसा भी लगता है कि वह भी अल्लाह का इस्लाम मानने वाले मुस्लमान हैं और मुल्लाओं की इस्लाम के सम्बन्ध में प्रचारित की जाने वाली बातों व कार्यों को गैर इस्लामिक समझते है। वैसे उनके इन ख़यालात, नज़रियात और एहसासात के मुख्या कारणों में मुल्लाओं के सम्बन्ध में जानकारी की कमी, निजी स्वार्थों को पुरा करने की हवस या मुसलमानों में सुधार लाने की कोशिश की ख्वाहिश भी मुमकिन है। वैसे जिस माहौल और व्यवसाय में वो हैं वहां इस्लाम तो अलग बात इंसानियत के तरीके पर भी चलते होंगे ये भी एक सवाल है.

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>हाथ से हाथ मिला कर कहें-हम सब एक हैं |

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दोस्तों, मैं सलीम खान ब्लॉग की इस असीमित दुनिया में बिल्कुल ही नया हूँ और मैंने अपना यह ब्लॉग इसी वर्ष यानि २००९ में बनाया है। ब्लॉग बनाने का मेरा मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ इतना है कि हम सभी मनुष्य एक उपास्य को ही अपना ईश्वर माने जिसे हम अल्लाह कहते हैं और कुरान को आखिरी ईश्वरीय ग्रन्थ साथ ही साथ मुहम्मद सल्ल० को ईश्वर यानि अल्लाह का अन्तिम दूत, नबी, पैगम्बर। लो भाई, ये तो वही बात हुई मैंने कहा और आपने मान लिया। आप कहेंगे कि सबूत लाओ, आप कहेंगे कि हम कैसे माने कि एक उपास्य को ही अपना ईश्वर माने जिसे हम अल्लाह कहते हैं और कुरान को आखिरी ईश्वरीय ग्रन्थ साथ ही साथ मुहम्मद सल्ल० को ईश्वर यानि अल्लाह का अन्तिम नबी। आप कहेंगे कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ में ऐसी कोई बात लिखी हो तब माने। तो जनाब अब आप जाग जाइये और अपने धार्मिक ग्रन्थों का मुताला करें, अगर आप हिंदू हैं तो वेदों और पुराणों को पढ़े अगर आप ईसाई हैं तो इंजील का मुताला करें । इंजील इतनी बार संशोधित हो चुकी है कि शायेद ही आपको इसका ओरिजनल एक पन्ना भी हाथ लगे लेकिन फिर भी आपको सबूत तो काफी मिलेंगे कि हम सब, इस दुनिया के सभी मनुष्य एक ही परमात्मा यानि ईश्वर यानि अल्लाह के उपासक होने चाहिए न कि दर्जनों खुदाओं के। एक बात और कहना चाहूँगा मैं इस स्वच्छ संदेश पर आप सभी एकेश्वरवादी, मानवतावादी, एक दुसरे से मुहब्बत करने वालों का हार्दिक दिल से स्वागत कर करना चाहता हूँ, आप सभी का इस स्वच्छ संदेश नामक ब्लॉग पर स्वागत है। आप के विचार, आपकी प्रिक्रियाओं और आलोचनों का स्वागत है। अगर आपके पास कोई ऐसे तथ्य, प्रमाण या विचार हो जो इस ब्लॉग के मकसद के करीब हो तो महती स्वागत है।

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>मानवता का धर्म इस्लाम है

>लेखक : मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
मुझे पता चला कि जिस धर्म को संसार इस्लाम के नाम से जानता है वास्तव में वही धार्मिक मतभेद के प्रश्न का वास्तविक समाधान है। इस्लाम दुनिया में कोई नया धर्म स्थापित नहीं करना चाहता बल्कि उसका आंदोनक स्वंय उसके बयान के अनुसार मात्र यह है कि संसार में प्रत्येक धर्म के मानने वाले अपनी वास्तविक और शुद्ध सत्य पर आ जाएं और बाहर से मिलाई हुई झूटी बातों को छोड़ दें- यदि वह ऐसा करें तो जो आस्था उनके पास होगी उसी का नाम क़ुरआन की बोली में इस्लाम है।
क़ुरआन कहता है कि खुदा की सच्चाई एक है, आरम्भ से एक है, और सारे इनसानों और समुदायों के लिए समान रूप में आती रही है, दुनिया का कोई देश और कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ अल्लाह के सच्चे बन्दे न पैदा हुए हों और उन्होंने सच्चाई की शिक्षा न दी हो, परन्तु सदैव ऐसा हुआ कि लोग कुछ दिनों तक उस पर क़ाएम रहे फिर अपनी कल्पना और अंधविश्वास से भिन्न भिन्न आधुनिक और झूटी बातें निकाल कर इस तरह फैला दीं कि वह ईश्वर की सच्चाई इनसानी मिलावट के अनदर संदिग्ध हो गई।
अब आवश्यकता थी कि सब को जागरुक करने के लिए एक विश्य-व्यापी आवाज़ लगाई जाए, यह इस्लाम है। वह इसाई से कहता है कि सच्चा इसाई बने, यहूदी से कहता है कि सच्चा यहूदी बने, पारसी से कहता है कि सच्चा पारसी बने, उसी प्रकार हिन्दुओं से कहता है कि अपनी वास्तविक सत्यता को पुनः स्थापित कर लें, यह सब यदि ऐसा कर लें तो वह वही एक ही सत्यता होगी जो हमेशा से है और हमेशा सब को दी गई है, कोई समुदाय नहीं कह सकता कि वह केवल उसी की सम्पत्ती है।
उसी का नाम इस्लाम है और वही प्राकृतिक धर्म है अर्थात ईश्वर का बनाया हुआ नेचर, उसी पर सारा जगत चल रहा है, सूर्य का भी वही धर्म है, ज़मीन भी उसी को माने हुए हर समय घूम रही है और कौन कह सकता है कि ऐसी ही कितनी ज़मीनें और दुनियाएं हैं और एक ईश्वर के ठहराए हुए एक ही नियम पर अमल कर रही हैं।
अतः क़ुरआन लोगों को उनके धर्म से छोड़ाना नहीं चाहता बल्कि उनके वास्तविक धर्म पर उनको पुनः स्थापित कर देना चाहता है। दुनिया में विभिन्न धर्म हैं, हर धर्म का अनुयाई समझता है कि सत्य केवल उसी के भाग में आई है और बाक़ी सब असत्य पर हैं मानो समुदाय और नस्ल के जैसे सच्चाई की भी मीरास है अब अगर फैसला हो तो क्यों कर हो? मतभेद दूर हो तो किस प्रकार हो? उसकी केवल तीन ही सूरतें हो सकती हैं एक यह कि सब सत्य पर हैं, यह हो नहीं सकता क्योंकि सत्य एक से अधिक नहीं और सत्य में मतभेद नहीं हो सकता, दूसरी यह कि सब असत्य पर हैं इस से भी फैसला नहीं होता क्योंकि फिर सत्य कहाँ है? और सब का दावा क्यों है ? अब केवल एक तीसरी सूरत रह गई अर्थात सब सत्य पर हैं और सब असत्य पर अर्थात असल एक है और सब के पास है और मिलावट बातिल है, वही मतभेद का कारण है और सब उसमें ग्रस्त हो गए हैं यदि मिलावट छोड़ दें और असलियत को परख कर शुद्ध कर लें तो वह एक ही होगी और सब की झोली में निकलेगी। क़ुरआन यही कहता है और उसकी बोली में उसी मिली जुली और विश्वव्यापी सत्यता का नाम “इस्लाम” है।

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान