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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली भारत के हित में: RBI निदेशक Islamic Banking System is better for India

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RBI के भूतपूर्व निदेशक का कहना है कि “बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में बदलाव किये बिना ही भारत में इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू की जा सकती है. अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के लिए एवम् अधिकारहीन और हाशिये के लोगों के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली वरदान साबित होगी.”
भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व निदेशक जनाब अब्दुल हसीब मुंबई में जमाते-इस्लामी हिंदी के तत्वाधान में आयोजित एक सेमीनार ‘Global Financial Crisis and Islamic Economic System’ / ‘विश्वव्यापी वित्तीय संकट और इस्लामी आर्थिक प्रणाली‘ में संबोधित कर रहे थे. भारत में इस्लामी आर्थिक प्रणाली की वक़ालत में उनका कहना था कि “रघुराम राजन कमिटी ने आर्थिक सेक्टर में सुधार हेतु जो तथ्य दिए उसमें इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली ही सबसे उपयुक्त बताई है. भारत के आर्थिक क्षेत्र में सुधार हेतु इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली को लागू करना सबसे बेहतर और कारगर काम होगा.” उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली और ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली में भी जानकारी और कहा कि दुनिया के बहुत से देश यह ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वह कारगर भी है. नयी सदी में जबकि दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है और सभी आर्थिक विपत्तियों से जूझ रहे हैं, इसके लिए ज़रूरि है कि इसका हल सोचा जाये.

इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली की ख़ूबी यह है कि वह अप्रभावित है और उससे भी बड़ी विशेषता है कि वह ‘केयरिंग और शेयरिंग’, पारदर्शी एवम् इंसानी सिद्धांत और उसूलों के क़रीब है.”, इस्लामिक बैंकिंग की राष्ट्रीय कमिटी के संयोजक जनाब अब्दुर-रकीब ने टिपण्णी करी, “जबकि जापान, फ्रांस, इंग्लैंड और दीगर मुल्क़ अरबों डॉलर के व्यापार के लिए आर्थिक उदारीकरण को अपनाकर स्वागत कर रहें हैं तो हम क्यूँ नहीं कर सकते”, उन्होंने आगे तर्क दिया.

उन्होंने यह भी सफाई दी कि जिन लोगों के मन में यह है कि यह आर्थिक प्रणाली केवल मुस्लिम के लिए है तो यह गलत है क्यूंकि यह प्रणाली पुरे विश्वस्तर पर कामयाब है और भारत के लिए भी इंशा-अल्लाह होगी. इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली पूरे इंसानियत के हित में है.

अपारदर्शिता और ब्याज ने आर्थिक विपत्तियों को और अधिक बढावा दिया है, जिसके चलते अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है.”, डॉ. शरीक़ निसार (अर्थशास्त्री व इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के ज्ञाता) ने विश्लेषित किया. उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के अंगों व प्रोडक्ट्स को बताते हुए कहा कि इनमें मुख्यतया मुदाराभा (speculation), कर्द-ए-हसना (Interest Free Loan), इजारा (Leasing) आदि हैं. लोगों को वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करना चाहिए ताकी वे जान सकें कि यह मौजूदा बैंकिंग प्रणाली से बेहतर है

इस सेमीनार में मौलाना रियाज़ अहमद खान (उपाध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र), डॉ. रहमतुल्लाह (अर्थशास्त्री), जे. ऍफ़ पाटिल (हेड ऑफ़ इकनॉमिक डिपार्टमेन्ट, कोल्हापुर यूनिवर्सिटी) भी शरीक हुए और अपने विचार प्रस्तुत किये.

-Saleem Khan
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Filed under: इस्लाम, इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली

>मंदी से बचाव: भारत में भी इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू हो ! (Islamic banking system should be implemented in India)

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अमेरिका और यूरोप में मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली चालू करने पर गंभीरता से विचार चल रहा है| गौरतलब है कि इस्लामिक बैंक बिना ब्याज़ के अपना व्यवसाय करते हैं | अभी तक यह बैंकिंग सिर्फ इस्लामिक मुल्कों में ही चलन में है | मंदी के इस दौर में जब अमेरिका और यूरोप के बड़े बड़े बैंक दिवालिया हुए चले जा रहे हैं, तब बाज़ार को मंदी से बचाने के लिए तथा निर्यातकों को राहत देने के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपनाने पर ज़ोर दिया गया जा रहा है | इस प्रणाली के तहत बैंक निर्यातकों से उनका माल खरीदतें हैं और अपने रिस्क पर उसको निर्यात करते हैं, जिससे निर्यातकों को ख़तरा कम हो जाता है | यह बैंक लघु उद्योगों को जब व्यापार करने के लिए पैसा देतें हैं तो उनसे ब्याज़ के बजाये सर्विस चार्ज के रूप में एक छोटी सी रक़म लेते हैं, यही नहीं लघु उद्योग जब डूबने लगते हैं तो उनको दिवालिया होने से बचाने का प्राविधान भी इस प्रणाली में है|


भारत के कालीन निर्यातकों ने भी मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली अपनाने की मांग की है|

Filed under: इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली

>मंदी से बचाव: भारत में भी इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू हो ! (एक विकल्प)

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अमेरिका और यूरोप में मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली चालू करने पर गंभीरता से विचार चल रहा है| गौरतलब है कि इस्लामिक बैंक बिना ब्याज़ के अपना व्यवसाय करते हैं | अभी तक यह बैंकिंग सिर्फ इस्लामिक मुल्कों में ही चलन में है | मंदी के इस दौर में जब अमेरिका और यूरोप के बड़े बड़े बैंक दिवालिया हुए चले जा रहे हैं, तब बाज़ार को मंदी से बचाने के लिए तथा निर्यातकों को राहत देने के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपनाने पर ज़ोर दिया गया जा रहा है | इस प्रणाली के तहत बैंक निर्यातकों से उनका माल खरीदतें हैं और अपने रिस्क पर उसको निर्यात करते हैं, जिससे निर्यातकों को ख़तरा कम हो जाता है | यह बैंक लघु उद्योगों को जब व्यापार करने के लिए पैसा देतें हैं तो उनसे ब्याज़ के बजाये सर्विस चार्ज के रूप में एक छोटी सी रक़म लेते हैं, यही नहीं लघु उद्योग जब डूबने लगते हैं तो उनको दिवालिया होने से बचाने का प्राविधान भी इस प्रणाली में है|  

भारत के कालीन निर्यातकों ने भी मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली अपनाने की मांग की है|

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लेख सन्दर्भ