स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>आधुनिक सशक्तिकृत नारी नारीत्व के पैमाने पर मुग़लकालीन तवायफ़ों से भी निचले दर्ज़े तक पहुँच चुकी है!

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वर्तमान में हमारे भारतीय समाज में जो पश्चिमीकरण का अन्धानुकरण हो रहा है वह नक्सलवाद से भी बड़ा ख़तरा है. पश्चिम में नारी सशक्तिकरण के लुभावने नारे के पीछे उसकी क्या गत हो चुकी है वह किसी से छिपी नहीं है. हम यह अच्छी तरह जानते हैं की पश्चिम में वेश्यावृत्ति, खुले तौर पर सेक्स का समर्थन, लीव इन रिलेशनशिप वगैरह वगैरह आधुनिक सशक्तिकृत नारी का वह काला सच है जिसके पैरों तले उसकी अस्मिता की पूर्णतया ‘वाट’ लग चुकी है. यह मेरा आरोप नहीं है कि आधुनिक सशक्तिकृत नारी नारीत्व के पैमाने पर मुग़लकालीन तवायफ़ों से भी नीचले दर्जे तक पहुँच चुकी है, बल्कि नारी जाति के प्रति अफ़सोस है कि उसे क्या चुनना है अपना नारीत्व जिसके लिए ईश्वर ने उसे बनाया है या फ़िर आधुनिकता के वह पैमाने जिसमें उसका नारीत्व चीथड़े चीथड़े होता जा रहा है. इसमें पुरुष की भी कम ग़लती नहीं है. वह स्वयं इस दुर्गति के लिए उतना ही ज़िम्मेदार है जितनी कि नारी क्यूंकि दोनों को यह सोचना पड़ेगा क्या वर्तमान पश्चिमी तहज़ीब में वह दम है जो समाज में प्राकृतिक नियमों के प्रति इमानदारी का दावा कर सके और उसे बरक़रार रख सके.

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पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं

नारी सशक्तिकरण का अगर यही मतलब है कि वह कम से कमतर कपडे पहने तो यह तय मानिये कि छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाओं पर लगाम लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा. हम सब जानते हैं कि अमेरिका में बलात्कार की दर सबसे ज़्यादा है.
आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है.
लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है जो बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.
आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू…
उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे
नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.
व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन

  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता… अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी… तथा 

  • फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण  

  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व

  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन

  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के ‘इस्तेमाल’ के घिनावने और बेहूदा चित्र 

  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.

यौन शोषण (Sexual Exploitation)
  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी ‘सेवाएँ’ अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.

  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी

  • सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण

  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को ‘नृत्य-साधना’ का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई

  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)
  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.

  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ. 

  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place) 

  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city) 

  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण 

  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न. 

  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध
  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी ख़बर अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.

  • ‘सामूहिक बलात्-दुष्कर्म’ इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है. 

  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी… 

  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों. 

  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं. 

  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ
  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.

  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).

  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)
  • बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. 

  • पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा ‘फीस’ के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)
  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण ‘अपमान’

  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना. 

  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक ‘नैतिकता का मक़ाम हासिल.

  • कंडोम इस्तेमाल करो और जो जी में आये करो बस आअवश्य्क्त है आपसी सहमती की. बस ! 

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.
नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.
पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल.
क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???
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चलते-चलते
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आईये हम सब नए साल के मौक़े पर नारी के नारीत्व की रक्षा के प्रति वचनवद्ध होकर उसकी इज्ज़त और आबरू की हिफाज़त की क़सम खाएं ! आप सबको नया साल 2010 बहुत बहुत मुबारक हो!  
सलीम ख़ान

Filed under: स्वच्छ सन्देश

19 Responses

  1. कुश says:

    >डेढ़ साल की बच्ची से बलात्कार को क्या कहेंगे आप? उसमे भी गलती उस बच्ची की ही रही होंगी?

  2. कुश says:

    >डेढ़ साल की बच्ची से बलात्कार को क्या कहेंगे आप? उसमे भी गलती उस बच्ची की ही रही होंगी?

  3. >हाय रे नारी सब तरफ हा हा कार कर दिया !भाई नंग बड़े परमेश्वर से तो परमेश्वर को दूर से प्रणाम ! कोई अपना शोषण करवा के ही ख़ुशी पाना चाहता है तो क्या करे ???

  4. >हाय रे नारी सब तरफ हा हा कार कर दिया !भाई नंग बड़े परमेश्वर से तो परमेश्वर को दूर से प्रणाम ! कोई अपना शोषण करवा के ही ख़ुशी पाना चाहता है तो क्या करे ???

  5. >यह नारी की पोस्ट पर डेढ़ साल की बच्ची क्या कर रही? बी एस पाबला

  6. >यह नारी की पोस्ट पर डेढ़ साल की बच्ची क्या कर रही? बी एस पाबला

  7. >बहुत बढ़िया लिखे हो भाई , शायद आँखे खुल जायें कुछ लोग की ।

  8. >बहुत बढ़िया लिखे हो भाई , शायद आँखे खुल जायें कुछ लोग की ।

  9. >विचारणीय पोस्ट लिखी है। धन्यवाद।

  10. >विचारणीय पोस्ट लिखी है। धन्यवाद।

  11. >आपको व आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

  12. >आपको व आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

  13. >saarthak aalekh………samayochit aalekh abhinandneey aalekh…….badhaai ho bhai !

  14. >saarthak aalekh………samayochit aalekh abhinandneey aalekh…….badhaai ho bhai !

  15. >बहुत बढ़िया… नया साल आपको बहुत-बहुत मुबारक हो…

  16. >बहुत बढ़िया… नया साल आपको बहुत-बहुत मुबारक हो…

  17. >सलीम खान जी , अधिकांश मुस्लिम मुगलिया सल्तनत के वैभव से आगे कुछ सोच ही नहीं पते हैं और आप भी इसका अपवाद नहीं हैं , आप लोगों की सोच मुग़ल कल से बदली ही नहीं है और जो चीज बदलती नहीं वो सड जाती है| जहाँ तक महिलाओं के साथ होने वाले वाले अपराधों का मामला है तो यह तो शायद आपके जैसे विकृत मानसिकता वाले मुस्लिमों के कारण होता है और हाँ मैं यह अवश्य स्वीकार करता हूँ की लम्बे समय के इस्लामिक शासन के फलस्वरूप कुछ हिन्दुओं की भावनाओं में भी विकृति आ गई है परन्तु इस्लाम के आगमन से पहले भारत में में महिलाओं की सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी थी परन्तुइस्लाम के साथ ही पर्दा प्रथा का आगमन हुआ और स्थिति ख़राब हो गई , अब सुधर रही है तो इस्लामिक धर्मावलम्बियों से देखा नहीं जाता

  18. >सलीम खान जी , अधिकांश मुस्लिम मुगलिया सल्तनत के वैभव से आगे कुछ सोच ही नहीं पते हैं और आप भी इसका अपवाद नहीं हैं , आप लोगों की सोच मुग़ल कल से बदली ही नहीं है और जो चीज बदलती नहीं वो सड जाती है| जहाँ तक महिलाओं के साथ होने वाले वाले अपराधों का मामला है तो यह तो शायद आपके जैसे विकृत मानसिकता वाले मुस्लिमों के कारण होता है और हाँ मैं यह अवश्य स्वीकार करता हूँ की लम्बे समय के इस्लामिक शासन के फलस्वरूप कुछ हिन्दुओं की भावनाओं में भी विकृति आ गई है परन्तु इस्लाम के आगमन से पहले भारत में में महिलाओं की सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी थी परन्तुइस्लाम के साथ ही पर्दा प्रथा का आगमन हुआ और स्थिति ख़राब हो गई , अब सुधर रही है तो इस्लामिक धर्मावलम्बियों से देखा नहीं जाता

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