स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मेरी आँखों का ख़्याल रखना: सलीम खान Just take care of my eyes Please!!!

>

एक अंधी लड़की थी जो अपने आप से इसलिये घृणा करती थी क्योंकि वो अंधी थी। यही नही वो बाकि सभी से भी ऐसी ही घृणा करती थी सिवाय एक शख्स के और वो था उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड। क्योंकि वो हर पल लड़की की मदद के लिये हाजिर रहता था। वो हमेशा कहती थी कि अगर वो दुनिया देख पाती तो अपने ब्वॉयफ्रेंड से शादी कर लेती

उसकी तमन्ना पूरी हुई, एक दिन किसी ने उसे आँखें दान कर दी, अब वो सब देख सकती थी और साथ ही साथ अपने ब्वॉयफ्रेंड को भी। उसके ब्वॉयफ्रेंड ने उससे पूछा कि अब तो तुम दुनिया देख सकती हो!
क्या अब मुझ से शादी करोगी?>
लड़की को बहुत ही बड़ा झटका लगा, ये देख कर कि उसका ब्वॉयफ्रेंड भी अंधा है वो देख नही सकता!! उस लड़की ने शादी से इन्कार कर दिया

उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड आंखों में आँसू लिये चुपचाप वहाँ से चला गया.
और बाद में उसने लड़की को एक खत लिखा जिसमें लिखा था –
प्लीज मेरी आँखों का ख्याल रखना” (Just take care of my eyes Please!!!)
= = =
इस तरह से बदलता है इंसान जब उसका वक्त बदलता है। कुछ ही होते हैं जो ये याद रखते हैं कि वो पहले क्या थे और वो कौन लोग थे जो मुश्किल घड़ी में हमेशा उसकी मदद के लिये तैयार रहते थे।
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29 Responses

  1. >कहानी अच्छी है लेकिन बहुत बुरा संदेश दे रही है। कहती है कभी प्रेम में बलिदान नहीं देना चाहिए और औरतें अहसान फरामोश होती हैं।लड़के ने बलिदान दिया प्रेम के कारण लेकिन प्रेम तो हमेशा ही एक तरफा होता है और बदले में कुछ नहीं चाहता। प्रतिफल की आशा में किए गए काम को बलिदान नहीं कह सकते। कुल मिला कर प्रेम के कारण बलिदान करने की भावना के विरुद्ध जा रही है यह कहानी।

  2. >कहानी अच्छी है लेकिन बहुत बुरा संदेश दे रही है। कहती है कभी प्रेम में बलिदान नहीं देना चाहिए और औरतें अहसान फरामोश होती हैं।लड़के ने बलिदान दिया प्रेम के कारण लेकिन प्रेम तो हमेशा ही एक तरफा होता है और बदले में कुछ नहीं चाहता। प्रतिफल की आशा में किए गए काम को बलिदान नहीं कह सकते। कुल मिला कर प्रेम के कारण बलिदान करने की भावना के विरुद्ध जा रही है यह कहानी।

  3. अवधिया चाचा कहते हैं:

    >बेटा हम समझ गए, इस लिए तुम फिक्र ना करो, तुम अन्‍धे होके आचार्य बन जाओ या जबलपुर ब्रिगेड में चले जाओ,तुम्‍हारी आँखें जो इधर ही रह गई इनसे काम होता रहेगा, वेसे अब हमारी दो ही इच्‍छा रह गई एक तुम्‍हें वादों पर कायम रहते देखना दूसरा अवध देखना, तुम छ महीने के लिए जा रहे हो कहा था वादे पर नहीं टिके, स्‍वच्‍छ संदेश दोगे न दे सके (भाई लोग कहते हैं सबसे गन्‍दे संदेश देते रहे हो), दूसरी इच्‍छा भी तुम पर निर्भर है अगर तुम अपना ब्‍यान दो तो पता चले कि अवध की तहजीब सलामत है या नहीं,

  4. अवधिया चाचा कहते हैं:

    >बेटा हम समझ गए, इस लिए तुम फिक्र ना करो, तुम अन्‍धे होके आचार्य बन जाओ या जबलपुर ब्रिगेड में चले जाओ,तुम्‍हारी आँखें जो इधर ही रह गई इनसे काम होता रहेगा, वेसे अब हमारी दो ही इच्‍छा रह गई एक तुम्‍हें वादों पर कायम रहते देखना दूसरा अवध देखना, तुम छ महीने के लिए जा रहे हो कहा था वादे पर नहीं टिके, स्‍वच्‍छ संदेश दोगे न दे सके (भाई लोग कहते हैं सबसे गन्‍दे संदेश देते रहे हो), दूसरी इच्‍छा भी तुम पर निर्भर है अगर तुम अपना ब्‍यान दो तो पता चले कि अवध की तहजीब सलामत है या नहीं,

  5. Tarkeshwar Giri कहते हैं:

    >बहुत ही अच्छा लगा , मगर सबसे अच्छा तो ये लगा की आप ने अपने आपको बदल लिया.

  6. Tarkeshwar Giri कहते हैं:

    >बहुत ही अच्छा लगा , मगर सबसे अच्छा तो ये लगा की आप ने अपने आपको बदल लिया.

  7. dhiru singh {धीरू सिंह} कहते हैं:

    >इश्क में इतना अन्धा होना भी तो ठीक नही . समय से आन्खे खुल जाये तो अच्छा . अब तो आप एक राष्ट्रीय राजनेतिक दल का हिस्सा है . अब एक नया सलीम का इन्तज़ार है

  8. dhiru singh {धीरू सिंह} कहते हैं:

    >इश्क में इतना अन्धा होना भी तो ठीक नही . समय से आन्खे खुल जाये तो अच्छा . अब तो आप एक राष्ट्रीय राजनेतिक दल का हिस्सा है . अब एक नया सलीम का इन्तज़ार है

  9. ab inconvenienti कहते हैं:

    >अवधिया चचा उर्फ़ उमर यारा तू तो बड़ा अच्छा लिखे सै, एस्सा कर के कुछ मजाक और कॉमेडी वाली कहाणीयां लिक्ख. कसम उड़ानझल्ले सी तेरा ब्लॉग हिट हो जावेगा. फिलम लाइन में स्क्रिप्ट और डाइलोग राइटिंग करन ले लिए ट्राई मार खूब नाम कमावेगा…. शराफत अली अम्बालवी की बात खली णा जावे सै.

  10. ab inconvenienti कहते हैं:

    >अवधिया चचा उर्फ़ उमर यारा तू तो बड़ा अच्छा लिखे सै, एस्सा कर के कुछ मजाक और कॉमेडी वाली कहाणीयां लिक्ख. कसम उड़ानझल्ले सी तेरा ब्लॉग हिट हो जावेगा. फिलम लाइन में स्क्रिप्ट और डाइलोग राइटिंग करन ले लिए ट्राई मार खूब नाम कमावेगा…. शराफत अली अम्बालवी की बात खली णा जावे सै.

  11. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    >सलीम भाई बहुत दिनों बाद तुम्हारे ब्लॉग पर फिर से टिपण्णी कर रहा हूँ क्योंकि अपने विचारों में, लेखन में तुमने परिवर्तन लाने का भरोषा जाकिर भाई के माध्यम से दिलाया है ! कुछ बाते कहना चाहूंगा, एक तो यह कि आपमें लेखन की एक अच्छी गुंजाइश है, अगर सृजनात्मक लेखनी पर ध्यान दोगे तो आगे चलकर बहुत अच्छे किस्म के लेखक बन्ने की आपमें पूरी गुंजाइश है ! दुसरे जो महत्वपूर्ण बात मैं बोलना चाहता हूँ वह यह कि एक तो मैं स्पष्ट भाषी हूँ, कुछ कायरो की तरह यहाँ पर गोलमाल भाषा का इस्तेमाल नहीं करता, जो बोलता हूँ बेखौ बोलता हूँ, इसलिए मेरी आपको सलाह है, इस "वर्सेस कैरान्वी चचा" नाम के शख्स से बचकर रहो, यह खुद तो एक विकृत बुद्धि का गिरी हुई सोच वाला इन्सान है, साथ ही वह तुम जैसे लोगो को उकसा कर पथ भरष्ट कर रहा है ! तुम मानो या न मानो अभी जो भी फजीयत ब्लॉग जगत में तुम्हारी हुई उसमे बहुत कुछ योगदान इस विकृत बूढी वाले शख्स का था !सजेशन देना फर्ज समझता था बाकी आपकी मर्जी !हाँ, इस अवधिया चचा को इतना जुरूर मेरा मेसेज पहुंचा दीजिएगा कि अगर कभी मौक़ा मिला तो आपको अवध अवश्य घुमाऊँगा यह दिखाने के लिए कि वह पर लोग कितनी तहजीव से बात करते है !

  12. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    >सलीम भाई बहुत दिनों बाद तुम्हारे ब्लॉग पर फिर से टिपण्णी कर रहा हूँ क्योंकि अपने विचारों में, लेखन में तुमने परिवर्तन लाने का भरोषा जाकिर भाई के माध्यम से दिलाया है ! कुछ बाते कहना चाहूंगा, एक तो यह कि आपमें लेखन की एक अच्छी गुंजाइश है, अगर सृजनात्मक लेखनी पर ध्यान दोगे तो आगे चलकर बहुत अच्छे किस्म के लेखक बन्ने की आपमें पूरी गुंजाइश है ! दुसरे जो महत्वपूर्ण बात मैं बोलना चाहता हूँ वह यह कि एक तो मैं स्पष्ट भाषी हूँ, कुछ कायरो की तरह यहाँ पर गोलमाल भाषा का इस्तेमाल नहीं करता, जो बोलता हूँ बेखौ बोलता हूँ, इसलिए मेरी आपको सलाह है, इस "वर्सेस कैरान्वी चचा" नाम के शख्स से बचकर रहो, यह खुद तो एक विकृत बुद्धि का गिरी हुई सोच वाला इन्सान है, साथ ही वह तुम जैसे लोगो को उकसा कर पथ भरष्ट कर रहा है ! तुम मानो या न मानो अभी जो भी फजीयत ब्लॉग जगत में तुम्हारी हुई उसमे बहुत कुछ योगदान इस विकृत बूढी वाले शख्स का था !सजेशन देना फर्ज समझता था बाकी आपकी मर्जी !हाँ, इस अवधिया चचा को इतना जुरूर मेरा मेसेज पहुंचा दीजिएगा कि अगर कभी मौक़ा मिला तो आपको अवध अवश्य घुमाऊँगा यह दिखाने के लिए कि वह पर लोग कितनी तहजीव से बात करते है !

  13. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    >एक बात और, आपके ब्लॉग पर आपके द्वारा कौन्ग्रेस ज्वाइन करने का ठप्पा दीख रहा है, इसके लिए बधाई ! मैं तो सुरु से ही आपके धांसू लेखो को पढ़कर यह सोच बैठा था कि आपमें कौंग्रेस जैसी पार्टी को ज्वाइन करने की पूरी-पूरी काबिलियत है !!!

  14. पी.सी.गोदियाल कहते हैं:

    >एक बात और, आपके ब्लॉग पर आपके द्वारा कौन्ग्रेस ज्वाइन करने का ठप्पा दीख रहा है, इसके लिए बधाई ! मैं तो सुरु से ही आपके धांसू लेखो को पढ़कर यह सोच बैठा था कि आपमें कौंग्रेस जैसी पार्टी को ज्वाइन करने की पूरी-पूरी काबिलियत है !!!

  15. >बहुत ही मारक लघुकथा है। सलीम भाई, इसके लिए बधाई।द्विवेदी जी, मेरी समझ से आप लघुकथा के सही मतलब तक नहीं पहुंच पाए हैं। मेरी समझ से यह कहानी अपने गूढार्थ के कारण यहाँ प्रस्तुत की गयी है। सलीम भाई, सही कहा न?——–अदभुत है हमारा शरीर।इतनी आसान पहेली को तो आप बूझ ही लेंगे?

  16. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    >इसमें कोई शक नहींं की गाँधीजी की कॉग्रेस ही आपके योग्य पार्टी है. आपको व कांग्रेस को तमाम भविष्य की तमाम शुभकामनाएं. प्रेमी एक आँख दान कर सकता था. दोनो देखते. खैर अपनी अपनी अक्कल है.

  17. संजय बेंगाणी कहते हैं:

    >इसमें कोई शक नहींं की गाँधीजी की कॉग्रेस ही आपके योग्य पार्टी है. आपको व कांग्रेस को तमाम भविष्य की तमाम शुभकामनाएं. प्रेमी एक आँख दान कर सकता था. दोनो देखते. खैर अपनी अपनी अक्कल है.

  18. महफूज़ अली कहते हैं:

    >संजय बेंगानी जी ने ठीक कहा है….प्रेमी एक आँख दान कर सकता था. ….. बेवकूफ था…..

  19. महफूज़ अली कहते हैं:

    >संजय बेंगानी जी ने ठीक कहा है….प्रेमी एक आँख दान कर सकता था. ….. बेवकूफ था…..

  20. रचना कहते हैं:

    >दान क्यों करते हैं ?? क्या इस लिये की उस दान के बदले कुछ मिले ?? जो दान किसी चीज़ की कामना हेतु किया जाए वो बेकार हैं । अगर प्रेमी ने नेत्र दान इस लिये किया था की प्रेमिका उसको देख कर उस से विवाह करेगी तो बड़ा ही खुदगर्ज प्रेमी था । दान का महत्व तब ही तक होता हैं जब तक हम उसको बिना अपने लिये कुछ भी मांगे करे । हिंदू धर्म मे कन्यादान होता हैं जो एक कुरीति हैं क्युकी ये इसलिये होता हैं की माता पिता को स्वर्ग मिले पर क्या हर उस लड़की के माँ पिता को स्वर्ग मिला जिन होने कन्यादान किया ? किसी ने देखा नहीं ? सो जब सब अंधे ही हैं और देख नहीं सकते तो क्यूँ दान किसी कामना से करते हैं ।अपने कर्म करे फल की चिंता न करे स्वर्ग , नरक , लोक परलोक सब यही हैं जो जैसा करेगा वैसा भरेगा , क्या पता प्रेमिका ने जिस से शादी की वो बाद मे नेत्र हीन होजाए ? क्या करेगी तब ये प्रेमिका ।वो कहते हैं ना , आँख के अंधे नाम नयन सुख पर आँख वाले अन्धो का क्या

  21. रचना कहते हैं:

    >दान क्यों करते हैं ?? क्या इस लिये की उस दान के बदले कुछ मिले ?? जो दान किसी चीज़ की कामना हेतु किया जाए वो बेकार हैं । अगर प्रेमी ने नेत्र दान इस लिये किया था की प्रेमिका उसको देख कर उस से विवाह करेगी तो बड़ा ही खुदगर्ज प्रेमी था । दान का महत्व तब ही तक होता हैं जब तक हम उसको बिना अपने लिये कुछ भी मांगे करे । हिंदू धर्म मे कन्यादान होता हैं जो एक कुरीति हैं क्युकी ये इसलिये होता हैं की माता पिता को स्वर्ग मिले पर क्या हर उस लड़की के माँ पिता को स्वर्ग मिला जिन होने कन्यादान किया ? किसी ने देखा नहीं ? सो जब सब अंधे ही हैं और देख नहीं सकते तो क्यूँ दान किसी कामना से करते हैं ।अपने कर्म करे फल की चिंता न करे स्वर्ग , नरक , लोक परलोक सब यही हैं जो जैसा करेगा वैसा भरेगा , क्या पता प्रेमिका ने जिस से शादी की वो बाद मे नेत्र हीन होजाए ? क्या करेगी तब ये प्रेमिका ।वो कहते हैं ना , आँख के अंधे नाम नयन सुख पर आँख वाले अन्धो का क्या

  22. ab inconvenienti कहते हैं:

    >अगर गूढ़ अर्थ की बात करते हैं तो जान लें की अगर अच्छा, रोचक और उपयोगी लिखोगे तो सैकड़ों फालोवर और मिलेंगे और हजारों कमेन्ट. वर्ना बुराई करके और विवाद पैदा करके तो भड़ास और मोहल्ला भी कमेन्ट और समर्थक जुगाड़ लेते हैं. पर कितने लोग इन्हें पसंद करते हैं और इनके दिल से समर्थक हैं?

  23. ab inconvenienti कहते हैं:

    >अगर गूढ़ अर्थ की बात करते हैं तो जान लें की अगर अच्छा, रोचक और उपयोगी लिखोगे तो सैकड़ों फालोवर और मिलेंगे और हजारों कमेन्ट. वर्ना बुराई करके और विवाद पैदा करके तो भड़ास और मोहल्ला भी कमेन्ट और समर्थक जुगाड़ लेते हैं. पर कितने लोग इन्हें पसंद करते हैं और इनके दिल से समर्थक हैं?

  24. सलीम खान कहते हैं:

    >संजय बेंगाणी जी और रचना जी, आभार आपकी क़ीमती टिप्पणी का!!! यहाँ दान देने या उसके बदले कुछ पाने की लालसा का न तो चित्रण है और न ही इस हेतु किसी भी प्रकार का कोई सन्देश. सवाल यह था कि जब वह अंधी थी तब वे दोनों एक दुसरे से प्रेम करते थे यही वजह थी कि उस लड़की ने उस लड़के को भरोसा दिलाया था कि अगर वह देख सकती तो उससे शादी कर लेती (यानि वह स्वयं को उस लड़के के काबिल नहीं समझती होगी)… और प्यार करने की हक़ीक़ी मंज़िल तो बवक्त शादी ही होती है. और इस सफ़र में जो आखरी मंज़िल तक साथ दे और हर परस्थितियों में अपने साथी का साथ… (तब जबकि उसका साथी भी उसका साथ दे रहा था, यहाँ अगर मजबूरी हो या कोई परिस्थितिजन्य कोई कारण तो उसकी बात अलग है)अतिश्योक्ति न होगी कि अगर मैं कहूँ कि मैं अपने जीवन में ऐसे ही कुछ हालत से गुज़र चुका हूँ!!

  25. सलीम खान कहते हैं:

    >संजय बेंगाणी जी और रचना जी, आभार आपकी क़ीमती टिप्पणी का!!! यहाँ दान देने या उसके बदले कुछ पाने की लालसा का न तो चित्रण है और न ही इस हेतु किसी भी प्रकार का कोई सन्देश. सवाल यह था कि जब वह अंधी थी तब वे दोनों एक दुसरे से प्रेम करते थे यही वजह थी कि उस लड़की ने उस लड़के को भरोसा दिलाया था कि अगर वह देख सकती तो उससे शादी कर लेती (यानि वह स्वयं को उस लड़के के काबिल नहीं समझती होगी)… और प्यार करने की हक़ीक़ी मंज़िल तो बवक्त शादी ही होती है. और इस सफ़र में जो आखरी मंज़िल तक साथ दे और हर परस्थितियों में अपने साथी का साथ… (तब जबकि उसका साथी भी उसका साथ दे रहा था, यहाँ अगर मजबूरी हो या कोई परिस्थितिजन्य कोई कारण तो उसकी बात अलग है)अतिश्योक्ति न होगी कि अगर मैं कहूँ कि मैं अपने जीवन में ऐसे ही कुछ हालत से गुज़र चुका हूँ!!

  26. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >जाकिर भाई से पूर्णतया सहमत !!!

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