स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>आधुनिक सशक्तिकृत नारी नारीत्व के पैमाने पर मुग़लकालीन तवायफ़ों से भी निचले दर्ज़े तक पहुँच चुकी है!

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वर्तमान में हमारे भारतीय समाज में जो पश्चिमीकरण का अन्धानुकरण हो रहा है वह नक्सलवाद से भी बड़ा ख़तरा है. पश्चिम में नारी सशक्तिकरण के लुभावने नारे के पीछे उसकी क्या गत हो चुकी है वह किसी से छिपी नहीं है. हम यह अच्छी तरह जानते हैं की पश्चिम में वेश्यावृत्ति, खुले तौर पर सेक्स का समर्थन, लीव इन रिलेशनशिप वगैरह वगैरह आधुनिक सशक्तिकृत नारी का वह काला सच है जिसके पैरों तले उसकी अस्मिता की पूर्णतया ‘वाट’ लग चुकी है. यह मेरा आरोप नहीं है कि आधुनिक सशक्तिकृत नारी नारीत्व के पैमाने पर मुग़लकालीन तवायफ़ों से भी नीचले दर्जे तक पहुँच चुकी है, बल्कि नारी जाति के प्रति अफ़सोस है कि उसे क्या चुनना है अपना नारीत्व जिसके लिए ईश्वर ने उसे बनाया है या फ़िर आधुनिकता के वह पैमाने जिसमें उसका नारीत्व चीथड़े चीथड़े होता जा रहा है. इसमें पुरुष की भी कम ग़लती नहीं है. वह स्वयं इस दुर्गति के लिए उतना ही ज़िम्मेदार है जितनी कि नारी क्यूंकि दोनों को यह सोचना पड़ेगा क्या वर्तमान पश्चिमी तहज़ीब में वह दम है जो समाज में प्राकृतिक नियमों के प्रति इमानदारी का दावा कर सके और उसे बरक़रार रख सके.

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पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं

नारी सशक्तिकरण का अगर यही मतलब है कि वह कम से कमतर कपडे पहने तो यह तय मानिये कि छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाओं पर लगाम लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा. हम सब जानते हैं कि अमेरिका में बलात्कार की दर सबसे ज़्यादा है.
आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है.
लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है जो बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.
आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू…
उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे
नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.
व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन

  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता… अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी… तथा 

  • फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण  

  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व

  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन

  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के ‘इस्तेमाल’ के घिनावने और बेहूदा चित्र 

  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.

यौन शोषण (Sexual Exploitation)
  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी ‘सेवाएँ’ अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.

  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी

  • सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण

  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को ‘नृत्य-साधना’ का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई

  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)
  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.

  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ. 

  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place) 

  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city) 

  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण 

  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न. 

  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध
  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी ख़बर अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.

  • ‘सामूहिक बलात्-दुष्कर्म’ इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है. 

  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी… 

  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों. 

  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं. 

  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ
  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.

  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).

  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)
  • बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. 

  • पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा ‘फीस’ के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)
  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण ‘अपमान’

  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना. 

  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक ‘नैतिकता का मक़ाम हासिल.

  • कंडोम इस्तेमाल करो और जो जी में आये करो बस आअवश्य्क्त है आपसी सहमती की. बस ! 

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.
नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.
पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल.
क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???
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चलते-चलते
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आईये हम सब नए साल के मौक़े पर नारी के नारीत्व की रक्षा के प्रति वचनवद्ध होकर उसकी इज्ज़त और आबरू की हिफाज़त की क़सम खाएं ! आप सबको नया साल 2010 बहुत बहुत मुबारक हो!  
सलीम ख़ान

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>HINDI BLOGGING TIPS: न केवल पाठक, न टिपण्णी- पोस्ट वही जो ‘प्रारंभ से अंत तक’ पाठक को पढने पर मजबूर कर दे! और टिपण्णी करने पर भी! आईये जाने कैसे?

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जी हाँ, पोस्ट की असल ख़ूबी तो यही है कि उसे पाठक शुरू से आखिर तक पढ़ डाले और पाठक इतना सम्मोहित हो जाये कि वह जब तक पूरा का पूरा पढ़ न ले, उसे चैन न आये और क्या ही खूब हो कि पाठक आदि से अंत तक उसे पढ़ भी ले और टिपण्णी करने पर मजबूर हो जाये.

ब्लोगिंग वर्तमान में अंतर्जाल पर सबसे जयादा पसंद किया जाने वाला एक संवाद-स्थल है, यही नहीं इसके माध्यम से वे लोग जयादा लाभान्वित हो रहे हैं जो लेखक, रचनाकार आदि बनने के सपने तो देखते हैं और लिखते भी हैं लेकिन उनको प्रकाशित करवाने में उन्हें लाले आ जाते हैं. ब्लोगिंग ने प्रकाशन के पारंपरिक माध्यम के एकाधिकार  में सेंध सी लगा दी है.
ज़्यादातर होता यूँ है कि ब्लोगर बंधू चिट्ठे पर जाते है और पोस्ट ओपन भी करते हैं लेकिन उस पोस्ट को पढ़ते नहीं है और सिर्फ शीर्षक पढ़ कर ही अपनी टिपण्णी कर देते हैं या अगर यूँ कहें कि पाठक अक्सर केवल अपनी टिपण्णी करने ही चिट्ठे पर आते है तो अतिश्योक्ति न होगी. वहीँ दूसरी ओर कुछ ब्लोगर की जमात ऐसी भी है कि वे पढ़ते तो है मगर उस पर टिपण्णी करने से कतराते हैं. भले ही वह पोस्ट उन्हें पसंद आ रही हो या नहीं.

अब सवाल ऐसा है कि कोई ऐसा क्या किया जाये कि जो पाठक को पूरा का पूरा पढ़े और वह यहाँ तक सम्मोहित हो जाये कि टिपण्णी करे बिना उसे चैन न आये. तो जनाब आपको बस नीचे लिखे टिप्स पर कुछ ध्यान देना है;

शीर्षक ऐसा कि पाठक को खींच लायें

अर्थात शीर्षक ऐसा हो कि प्रथम दृष्टया में ही पाठक को उसे पोस्ट तक खींच लाये. आप जो कुछ भी लिखना चाहते है उसका शीर्षक इतना सशक्त हो कि पाठक की नज़र उस पर पड़ते ही उस क्लिक करने पर मजबूर कर दे. ज़रूरी नहीं कि पोस्ट लिखने से पहले ही शीर्षक का नामकरण किया जाये. अगर आपको लेख लिखने से पहले शीर्षक समझ नहीं आ रहा तो कोई चिंता की बात नहीं है, आप पूरा लेख लिखने के बाद भी शीर्षक बना सकते हैं बल्कि पूरा लेख लिखने के बाद तो शीर्षक और भी सशक्त बनाया जा सकता है.

लेखांश सशक्त व सन्दर्भ के आसपास ही हो

लेखांश हमेशा सन्दर्भ के आसपास हो और शीर्षक से मेल खाता हुआ क्यूंकि अगर ऐसा न हुआ तो पाठक आयेंगे ज़रूर लेकिन वे पढ़े बिना ही चले जायेंगे क्यूंकि शीर्षक से सम्बंधित लेखांश उन्हें नहीं मिल पाता है. तो यह ध्यान भी देना बहुत ज़रूरी है कि लेखांश सशक्त व सन्दर्भ और शीर्षक के आसपास ही हो.
अपनी भाषा-शैली में सरलता रखे
हम ब्लोगर अंतरजाल पर ही लिख सकते हैं और अंतरजाल पर हर क़िस्म के पाठक आते है; कुछ भाषा के ज्ञानी भी होते हैं तो कुछ जो भाषा की गहनता से लगभग अनजान रहते हैं. हमें अपनी भाषा और शैली को इस तरह से बना कर रखना होगा जिससे हम ज़्यादा से ज़्यादा पाठक तक अपनी पहुँच बना सकें. आपको बड़े-बड़े व्याकरण के शब्दों से परहेज़ करते हुए सरल शब्दों को प्रयोग करना चाहिए जिससे कि हर क़िस्म के पाठक आसानी से पढ़ सकें और समझ सकें. भाषा शैली में सरलता इसलिए भी ज़्यादा महत्व रखती है क्यूंकि हमें अत्यधिक पाठक तक अपनी पकड़ बनानी होती है.
वाक्य और पैराग्राफ़ छोटे हों
अंतरजाल सर्फ़ करते वक़्त पाठक ज़्यादा समय तक एक ही विषयवस्तु पर नहीं टिकते इसलिए चाहिए कि लिखते समय आपके लेख में वाक्य और पैराग्राफ़ छोटे और मुद्दे पर ही केन्द्रित हों. पाठकों का ध्यान आकर्षण करने के लिए इसके अलावा आप बुलेटेड पॉइंट का प्रयोग कर सकते हैं.
अपना लेख संवादी बनायें
चूँकि हम ब्लॉग में जो कुछ लिखते हैं उसके जवाब में हमें टिप्पणियों की भी दरकार होती है बल्कि अधिकांशतः लेखक तो मात्र टिप्पणियों के लिए ही लिखते हैं. इसलिए हमें अपने लेख को संवाद-योग्य बनाना चाहिए ताकि पाठक पढ़ते ही संवाद स्थापित करने को उत्सुक हो जाए.
लेखन में अपने व्यक्तित्व को समाहित करें
कोशिश करें कि लेख में व्यक्तिगत अनुभव की झलक दिखाई पढ़े. आपके वे अनुभव जो लेख से सम्बंधित हो अवश्य अंकित करें. इसके लिए आप प्रयोगात्मक चुटकुले प्रयोग करें जिससे पाठक पढ़ते वक़्त खुश हो जाएँ. पाठक को लगे कि लेखक ने वास्तविकता के साथ लिखा है.
हालाँकि उपरोक्त सभी टिप्स ज़रूरी नहीं कि एक ही लेख में समाहित कर लिए जाएँ, यह निर्भर करता है कि आप क्या लिखा रहें है!
आज के लिए बस इतना ही!! फ़िर हाज़िर होऊंगा कुछ नया लेकर!!!
आपका
सलीम ख़ान
मोबाइल::: 9838659380
वार्तालाप का समय सुबह १०:०० बजे से पहले और शाम ६:०० बजे के बाद

दिनांक 21/12/2009, दिन सोमवार समय 11: 00 को साईंस ब्लोगर्स एसोसियेशन पर मेरा पहला लेख पढ़ना न भूलें! धन्यवाद !!

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>सभी ब्लोगर्स को नया साल मुबारक हो!!!! Happy New Year!!!

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सभी ब्लोगर्स को नया साल मुबारक हो!!!! Happy New Year!!! كل عام وانتم بخير ١٤٣١
सभी ब्लोगर बन्धुवों को नया साल मुबारक हो! इस नए साल पर सभी ब्लोगर्स को ढेरों शुभकामनायें और बधाइयां !!! كل عام وانتم بخير ١٤٣١ 
इस नए हिजरी १४३१ में हम सभी ब्लोगर बन्धु यह अहद ले कि अपने इस देश में सद्भाव के साथ अमन चैन से सभी लोग अपनी ज़िन्दगी बिताएं और सत्य पथ के मार्गी बने.
आप सबका
सलीम ख़ान
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मेरा नया लेख साईंस ब्लोगर्स एसोसियेशन पर दिनांक २१/१२/२००९ को ज़रूर पढ़ें. मेरा दावा है कि इस लेख को पढ़ कर आपके रोयें काँप उठेंगे!!!

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>आजकल "मुहँनोचवा" क्यूँ नहीं दिखते लोगों को! where is Muhnochwa nowadays! -सलीम ख़ान

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हाँ भाई! क्या हुआ आजकल मुहँनोचवा क्यूँ नहीं दिखते हैं? आज कल रातों में लोगों को नोचते खसोटते क्यूँ नहीं दिखते? कहाँ गए वे मुहँनोचवा? ये तो कोई बात नहीं हुई उस ज़माने में तो रोज़ न रोज़ इन मुहँनोचवा का ज़िक्र आये दिन अख़बारों में और टीवी पर पढ़ने-देखने को मिल जाता था.
आप लोग भी भूल गए उस मुहँनोचवा को! बड़ी गलत बात है. अब देखिये न उनके (मुहँनोचवा के) दिल पर क्या बीतती होगी! क्या आपने उन्हें तलाशने की ज़रा सी भी कोशिश नहीं की? क्या आपको नहीं लगता है कि कम से कम एक बार तो उनका ज़िक्र अपने होंटो से उन मुहँनोचवा का कर लेते !!! और  इसका एक भाई पूर्वी दिल्ली में भी खूब चर्चित रहा था कम से कम उसका तो ख़्याल कर लेते !!!
मुहँनोचवा मीडिया क्रिएशन हैं, और कुछ नहीं !!!
जी हाँ, मुहँनोचवा की असलियत सिर्फ़ और सिर्फ़ इतनी है कि वह मीडिया क्रिएशन ही है बस और कुछ भी नहीं!!! दर-असल मीडिया में वो ताक़त है जो दिन को रात और रात को दिन बना देता है और इस हद तक कि लोग वह मानने भी लगते हैं. मीडिया में वो ताक़त है जो रातों-रात हीरो को विलेन और विलेन को हीरो बना देती है. कहना अतिश्योक्ति न होगी कि मीडिया ही है जो समाज में चाहे तो रातों-रात जनता में जागरूकता का इन्कलाब ला सकती है और चाहे तो रातों-रात जनता में नफ़रत का सैलाब ला सकती है!
आप सबसे यही गुज़ारिश है कि मीडिया के द्वारा निर्मित अफ़वाहों पर ध्यान न देकर सच्चाई की  तस्दीक कर लें, अगर ऐसा हो गया तो फ़िर न ही कोई मुहँनोचवा आएगा, ना ही समाज में कोई नकारात्मक अफ़वाह ही अपने पैर पसार पायेगी!!!
-सलीम ख़ान 

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>…लेकिन पहले ये बताओ मुझे धक्का किसने दिया! Who push me!?

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एक बार शहर के एक अमीर व्यक्ति ने एक इनामवाली प्रतियोगिता रखी और इनाम था एक करोड़ रुपये! काम बस इतना करना था कि एक छोटे से तालाब को तैर कर पार करना था. शहर के कई बड़े बड़े तैराकों ने कहा- ये अमीर व्यक्ति सठिया गया है, तैरने की प्रतियोगिता रखी और वो भी एक छोटे से तालाब में. वे वहां आये लेकिन उस छोटे से तालाब को देख कर किसी को भी उसमें जाकर तैरने की हिम्मत न हुई क्यूंकि उस तालाब में मगरमच्छ थे जो शायेद भूखे भी थे…
प्रतियोगिता का निर्धारित समय व्यतीत होता जा रहा था और जब मात्र २ मिनट  बचे थे तभी छपाक सी आवाज़ आई और एक व्यक्ति उस तालाब को बहुत तेज़ी से पार कर गया
अब तो उसकी जय-जयकार होने लगी और लोगों ने उसे कन्धों पर उठा लिया और इनाम-स्थली पर ले गए और वह अमीर आदमी ने उसको बधाई देते हुए उसकी प्रसंशा की और वह एक करोड़ रुपये का नगद इनाम देने लगा.
लेकिन उस विजेता ने उस एक करोड़ रूपये की नगद इनाम की रक़म को एक तरफ हटाते हुए बहुत ज़ोर से पूछा –
“वो सब तो ठीक है लेकिन ये बताओ मुझे धक्का किसने दिया था???”
(एम वे कंपनी की मीटिंग में किसी ने मुझे ये कहानी सुनाई थी.)    

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>शादी करने और मोबाइल ख़रीदने में कभी भी जल्दबाजी न करें, क्यूंकि… If you’ll wait, Chance is to get letest model for both सलीम खान

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जी हाँ, शीर्षक सही है और यथार्थ के बेहद क़रीब. बहुत ही आसान सा तर्क है.
अब देखिये न, अगर आपका मन मोबाइल ख़रीदने का है और आपने मोबाइल आज खरीद लिया और कल तक का इंतज़ार नहीं करते हैं तो आप मोबाइल के आने वाले लेटेस्ट मॉडल से महरूम हो सकते हैं और आपका मोबाइल आउट डेटेड को कहा जायेगा. आप मोबाइल ख़रीदने में जल्दबाज़ी न करें तो ही बेहतर होगा!!!
ठीक उसी तरह अगर आप शादी करने जा रहें हो तो सावधान हो जाएँ क्यूंकि अगर आप आज शादी कर रहें है तो आने वाले कुछ साल में आप द्वारा चयनित जीवन साथी आउट-डेटेड हो जायेगा या आपको लगने लगेगा और बेहतर यही है कि अगर आप शादी करने के लिए जितना इंतज़ार कर लें उतना ही लेटेस्ट मॉडल आपको मिल सकता है.
इसलिए शादी करने और मोबाइल ख़रीदने में कभी भी जल्दबाजी न करें…
वैधानिक चेतावनी::: यह तर्क पुरुषों पर सौ फ़ीसदी सटीक बैठता है.

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>अगर कल सलीम ख़ान की मृत्यु हो जाती, तो !!! Saleem Khan injured yesterday!!!

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एकबारगी तो मुझे लगा कि आज मेरी मौत हो जायेगी और आँखों के सामने कुछ सेकंड तक अँधेरा भी छ गया था. जो हुआ वह इतनी रफ़्तार में हुआ कि सँभालने का मौक़ा ही नहीं मिला. कल हो सकता था कि मेरी मृत्यु हो जाती लेकिन शायेद नियति को यह मंज़ूर नहीं था
हुआ यूँ कि कल मैं ऑफिस के काम से कहीं जा रहा था. और एक जगह पर बाईक रोक दी थी. जहाँ बाईक रोकी थी उसी के दाहिनी तरफ एक कार खड़ी थी और वह भी रुकी हुई थी. मैं वहां मात्र दो या तीन सेकंड ही रुका था. और आगे बढ़ने के लिए पहला गियर लगाया ही था कि अचानक कार ड्राईवर ने बिना अपने बाएं तरफ देखे गाड़ी पीछे की तरफ़ हलकी सी बढ़ा दी थी. वह कार मुझसे सिर्फ हलकी सी स्पर्श ही कर पाए थी, लेकिन मेरा खड़े खड़े ही बैलेंस बिगड़ गया और मैं अपने दाहिने तरह गिर गया. यहाँ तक ठीक था बस घुटनों के बल गिरने की वजह से घुटनों में ही चोट आई थी लेकिन जिस वक़्त मैं नीचे गिरा उसी वक़्त एक टैक्सी बहुत तेज़ी से आ रही थी और उस टैक्सी का बम्पर मेरी बाईक से लड़ता हुआ मेरी खोपड़ी (हेलमेटशुदा) में बहुत ज़ोर से लगा और मैं दूर छिटक कर गिर पड़ा…
यह पूरा हादसा महज़ चंद सेकंडों में हुआ. तभी दो लोग आये और उन्होंने मुझे उठाया और सहारा देकर बाईक पकड़ा दी. मेरे घुटने में बहुत दर्द हो रहा था. और मेरी हथेली भी थोड़ी सी छिल गयी थी…
अब मैं संभल चुका था टैक्सी वाला जा चुका था और कार वाला भी जा चुका था. मेरी जो हालत थी वह तो थी ही लेकिन मुझे अपनी बाईक की हालत देखी नहीं गयी… बाईक के आगे वोयिज़र एक तरफ़ से पूरी तरह से टूट चुका था और और क्लच हैंडिल टूट गया था (गनीमत थी कि क्लच वायर नहीं टुटा था) आगे का मडगार्ड टूट गया था… कुल मिला कर गाडी की पूरी तरह से वाट लग गयी थी…
ख़ैर! हिम्मत करके मैंने अपनी टूटीफूटी बाईक स्टार्ट की और अपने ऑफिस आ गया. फ़िर मैंने पड़ोस के डॉ एजाज़ क्लिनिक से ट्रीटमेंट कराया और अपनी गाडी दुरुस्त करके को क़ैसरबाग़ के मशहूर मामू मकेनिक के यहाँ अपनी गाडी बनवाई. पुरे 900 रूपये का चुना लग गया….
अब आप सोच रहे होंगे कि यह आपबीती सूना कर कहना क्या चाहता है….
तो भैया मैं आपको बता दूं अगर मैंने हेलमेट नहीं लगाया होता तो मेरा सिर पके खरबूजे की तरह फट गया होता जब टैक्सी का बम्पर मेरी खोपड़ी से टकराया था…

ब्लोगर बन्धुवों अगर आप बाईक चलाते वक़्त हेलमेट यूज़ नहीं करते तो करना शुरू कर दीजिये क्यूंकि हेलमेट पर खर्च की गए क़ीमत सिर्फ एक टक्कर में ही वसूल हो जाती है…

अगर हेलमेट न होता तो पता नहीं मैं किस अस्पताल में पड़ा होता !!!

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>वह पहला भिखारी तो मैं ही था: सलीम ख़ान (A Short Story by Saleem Khan)

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एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ भोजन करने बैठा उसके सामने पूरी भूनी हुई मुर्गी थी, उसी समय एक भिकारी द्वार पर आकर कुछ माँगने लगा, उसने दरवाज़ा खोला और भिकारी को डाँट कर भगा दिया।
अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि कुछ ही दिनों में वह व्यक्ति भी निर्धन हो गया, सारी सम्पत्ती जाती रही यहाँ तक कि उसने अपनी पत्नी को तलाक़ भी दे दिया, उस महिला ने किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया। एक दिन जब अपने दूसरे पति के साथ जलपान हेतु बैठी तो उसी समय एक भिकारी दरवाज़े पर आ गया। दोनों के सामने पूरी भूनी हुई मर्ग़ी थी, भिकारी की आवाज़ सुनते ही पति ने पत्नी से कहा : द्वार खोलो और यह मुर्गी उस भिखारी को दे दो !
पत्नी भिकारी को भुनी मुर्गी देने के लिए जब द्वार पर आई तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गई कि भिकारी कोई दूसरा नहीं बल्कि उसी का पहला पति है ( जिसने भिकारी को डाँट कर भगाया था) मुर्गी उसे दे दिया और रोती हुई अपने पति के पास लौटी.
 जब पति ने रोने का कारण पूछा तो बोली : वह भिकारी मेरा पहला पति था, फिर उसने सारी घटना सुनाई कि किस प्रकार उसके पति ने एक भिकारी को डाँट कर भगा दिया उसके तुरन्त बाद उसकी सारी संपत्ति जाती रही यहाँ तक कि उसने हमें तलाक़ दे दिया, और मैंने आप से विवाह कर लिया.
पति ने कहा:

वह पहला भिखारी तो मैं ही था

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>मेरी आँखों का ख़्याल रखना: सलीम खान Just take care of my eyes Please!!!

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एक अंधी लड़की थी जो अपने आप से इसलिये घृणा करती थी क्योंकि वो अंधी थी। यही नही वो बाकि सभी से भी ऐसी ही घृणा करती थी सिवाय एक शख्स के और वो था उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड। क्योंकि वो हर पल लड़की की मदद के लिये हाजिर रहता था। वो हमेशा कहती थी कि अगर वो दुनिया देख पाती तो अपने ब्वॉयफ्रेंड से शादी कर लेती

उसकी तमन्ना पूरी हुई, एक दिन किसी ने उसे आँखें दान कर दी, अब वो सब देख सकती थी और साथ ही साथ अपने ब्वॉयफ्रेंड को भी। उसके ब्वॉयफ्रेंड ने उससे पूछा कि अब तो तुम दुनिया देख सकती हो!
क्या अब मुझ से शादी करोगी?>
लड़की को बहुत ही बड़ा झटका लगा, ये देख कर कि उसका ब्वॉयफ्रेंड भी अंधा है वो देख नही सकता!! उस लड़की ने शादी से इन्कार कर दिया

उस लड़की का ब्वॉयफ्रेंड आंखों में आँसू लिये चुपचाप वहाँ से चला गया.
और बाद में उसने लड़की को एक खत लिखा जिसमें लिखा था –
प्लीज मेरी आँखों का ख्याल रखना” (Just take care of my eyes Please!!!)
= = =
इस तरह से बदलता है इंसान जब उसका वक्त बदलता है। कुछ ही होते हैं जो ये याद रखते हैं कि वो पहले क्या थे और वो कौन लोग थे जो मुश्किल घड़ी में हमेशा उसकी मदद के लिये तैयार रहते थे।

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>जब सरदार मर कर आएगा तो मैं इसे नरक में ही डालूँगा::: यमराज प्रवृत्ति न अपनाएं हिंदी ब्लोगर्स, पूर्वाग्रह से बचें…लखनऊ ब्लॉगर सम्मलेन

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एक बार किसी बात से यमराज जी सरदार जी से किसी बात पर चिढ गए थे. चित्रगुप्त ने उनसे पूछा कि आखिर वजह क्या है कि आप सरदार जी से इतने चिढ़े हुए हैं? उन्होंने कहा- क्यूंकि सरदार पॉकेट में रोकेट रखता है और वो भी दोनों तरफ़! और तुम देखना चित्रगुप्त जब सरदार मर कर आएगा तो मैं इसे नरक में ही डालूँगा.
फिर वह वक़्त भी आया कि जब सरदार जी के जीवन की लीला समाप्त हुई और वह यमराज के समक्ष उपस्थित हुए और अपने फैसले का इंतज़ार करने लगे. उसी वक़्त २ अन्य लोगों (एक पंडित जी और एक मुल्ला जी) का भी देहावसान हुआ था और वह भी अपने फ़ैसले के इंतज़ार में खड़े थे. लेकिन यमराज जी तो बस सरदार जी को ही नाहरे जा रहे थे और सोच रहे थे कि कैसे उसे नरक का भोगी बनाऊं.
“आप लोगों से सवाल तलब किये जायेंगे और जो जवाब सही दे देगा वह जन्नत में जायेगा और जिसने ग़लत जवाब दिया तो उसे दोज़ख मिलेगी.” यमराज गरजे.
उसके बाद वाईवा शुरू हुआ.
पंडित जी आप २ का पहाड़ा सुनाईये?” यमराज जी का सवाल पंडित जी के लिए.
पंडित जी ने एक ही सांस में २ का पहाड़ा सुना दिया. फलस्वरूप उन्हें जन्नत का सर्टिफिकेट मिल गया.
मुल्ला जी आप ३ का पहाड़ा सुनाईये? यमराज जी का सवाल मुल्ला जी के लिए.
मुल्ला जी ने भी एक ही सांस में ३ का पहाड़ा सरपट सुना दिया. फलस्वरूप उन्हें भी जन्नत का सर्टिफिकेट मिल गया.
हाँ! तो सरदार जी आप १९ (उन्नीस) का पहाड़ा सुनाईये?” यमराज जी का सवाल सरदार जी के लिए था…
बेचारे सरदार जी को उन्नीस का पहाड़ा आता ही नहीं था और वह सवाल जवाब के सेशन में फेल हो चुके थे. फलस्वरूप उन्हें नरक का सर्टिफिकेट मिला.
सरदारजी को लगा कि उनसे कुछ ज्यादा ही कठिन सवाल पूछ लिया गया है. उन्होंने कहा – “हे महाराज! मुझे लगता है कि मेरे साथ ज्यातदी की गयी है. मुझसे सवाल अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक कठिन सवाल पूछा गया है.”
ठीक है, हम दोबारा से पूछते हैं.
पंडित जी आप बताईये कि आपके एक हाँथ में कितनी उंगलिया हैं?”
“जी, पांच” पंडित जी ने चिहुँकते हुए जवाब दिया.
मुल्ला जी आप बताईये कि आपके एक पैर में कितनी उंगलिया हैं?”
जी, पांच” मुल्ला जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
हाँ! तो सरदार जी आप बताईये कि आपके सिर में कितने बाल हैं?”
यहाँ पर फ़िर सरदार जी जवाब नहीं दे पाए और उन्हें एक बार फ़िर दोज़ख का सर्टिफिकेट मिल गया.
लेकिन अबकी बार भी सरदार जी ने विरोध किया तो यमराज जी ने तीसरा और आखिरी मौक़ा देते हुए सवाल दगा.
पंडित जी, कैट की स्पेलिंग बताईये?”
सी ए टी
मुल्ला जी, डॉग की स्पेलिंग बताएं?”
“डी ओ जी”
हाँ! तो सरदार जी, आप चिकोस्लोवाकिया की स्पेलिंग बताएं?”
“!!!!!!!!”
इस तरह से प्री-ज्यूडिस मामले में पंडित जी और मुल्ला जी को जन्नत और सरदार जी को अंततः दोज़ख ही मिली.
चलते चलते::
मेरा सभी ब्लॉगर से अनुरोध है कि किसी पूर्वाग्रह के चलते आप किसी भी ब्लॉगर का विरोध न करे बल्कि उसकी बातों को चिंतन और मनन के उपरान्त और सत्य की कसौटी पर उतार कर उसके बारे में फैसला लें.

Filed under: स्वच्छ सन्देश

लेख सन्दर्भ

सलीम खान