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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>भारत में मुसलमानों का इतिहास Muslims in India – An Overview

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भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था. इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे.
मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दहिर के राज्य में आता था. जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे. मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहाँ वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है. राजा दहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दुसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की. जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया. मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी. तब से (713 CE) आगे सदियाँ गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था. मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहाँ की जनता ने उसका नम आँखों से विदाई दी थी. भारत की जनता निराश थी क्यूंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था.

मलबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी. सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों,अफ़गान हों, मंगोल की संताने हों या मुग़ल.

ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया. अल्हम्दुलिल्लाह, दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है. दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहाँ रुकने की इजाज़त दी गयी थी. इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गाँठ कर ली और मुग़ल और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया.

भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही है, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दुसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं. मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहाँ की जनता से बेहत मुहब्बत भरा था और यहाँ की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकार और साथ-साथ रहे. वो लोग जो ये कहते है कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे है कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिन्दू बचे होते अर्थात नहीं. भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिन्दू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई. मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है.

भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहाँ के इतिहास पढने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दुसरे धर्मों के प्रति प्रेम-भावः, दुसरे धर्मों के लोगों के प्रति प्रेम-भावः, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की.

उस वक़्त जब यहाँ मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है. अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहाँ मुसलमानों की जनसँख्या सबसे ज्यादा होती. मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल ने भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए. “लम्हों ने की खता और सदियाँ भुगत रही है…”

जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए. भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया. जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया.

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>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब! (Non-veg is permmited, reply to critics)

>पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा जिसका मज़मून था “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” मैंने उस लेख में यह बताने की कोशिश की कि “मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है” लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि “मांसाहार क्यूँ जायज़ है”


विमर्श को आगे बढ़ाने से पहले मैं जैसा कि हमेशा अपना एक बात कहना चाहता हूँ तो इस लेख का सन्देश यह है-

मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

आलोचकों ने कई तर्क रखे और आरोप भी मैं उन सभी तर्कों और आरोपों का मैं बिन्दुवार जवाब देता हूँ-

उनका पहला कथन/तर्क या आरोप था कि मैंने मांसाहार को धर्म से जोड़ कर बताया है:

मैं आपसे यह बता दूँ कि धर्म से मैंने जोड़ कर नहीं बताया है यह पहले से ही वेदों, कुरान, मनुस्मृति और महाभारत वगैरह में लिखा है. और यह सत्य है. ऐसा मुझे नहीं लगता कि मैंने यह गलत किया क्यूँ कि एक हमारा हिंदुस्तान ही तो है जहाँ धर्म को इतनी अहमियत दी जाती है. यही वजह थी कि मुझे अपनी बात सार्थक तरीके से कहने के लिए उन महान और मान्य ग्रन्थों का हवाला देना पड़ा अगर मैं सिर्फ यह कहता कि यह मेरा ओपिनियन है तो मेरी बात का असर बिलकुल भी नहीं होता. अगर आपको किसी इस तरह के मुद्दों पर कुछ कहना हो तो आप भी उन सभी हवालों (सार्थक, सत्य और मान्य) का ज़िक्र करना ना भूलें, क्यूंकि हो सकता है कि आपके विचार भले ही आपको सही लग रहें हों, और वह पूर्णतया ग़लत और निरर्थक हों | क्या यह बात सही नहीं है कि मांसाहार और शाकाहार के मुद्दे को हमारे हिंदुस्तान में धर्म की नज़र से देखा जाता? बिल्कुल -सही है, इसे धर्म विशेष से जोड़ कर ही देखा जाता है| इसी वजह से मुझे अपनी बात में उन किताबों के महत्वपूर्ण उद्वरण का उल्लेख करना पड़ा| अंतत मैं आपसे और आप सबसे यह कहना चाहूँगा कि (मेरा मानना यह है कि) मांसाहार और शाकाहार को धर्म के नज़र से नहीं देखना चाहिए.

अगला आरोप था कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है?

दूसरा तर्क यह है कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है. चलिए ठीक है, मैं आपकी बात से हद दर्ज़े तक सहमत हूँ कि जो हम खाते है उसका हमारे स्वाभाव पर सीधा प्रभाव पड़ता है| यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब| हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.
नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful.

अब मैं बहस को आगे बढ़ाता हूँ, मुआफ कीजियेगा. अब मैं वकील की तरह बोलूँगा क्यूंकि बात तर्क की है तो आगे बढ़ना भी ज़रूरी है- आप लोग पेड़-पौधों को खाते हैं, इसीलिए आप पेड़-पौधों की तरह व्यवहार करते हैं. that is, suppression of the senses… a lower species. मैं जानता हूँ कि यह गलत है | मैं सिर्फ एक वकील की तरह व्यवहार कर रहा हूँ| मुझे शर्म महसूस हो रही है इस तरह से लिखकर. यह सत्य नहीं हैं कि अगर आप पेड़-पौधों को खायेगे तो नींम श्रेणी की प्रजाति में गिने जायेंगे या जड़वत हैं| लेकिन जैसा आपने आर्गुमेंट्स दिया उसका यह जवाब था. मुझे मुआफ करें, I really apologize…अगर आप शाकाहारियों का दिल दुखा हो. यह वैज्ञानिक रूप से सत्य नहीं है, यह केवल तर्क था.

बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत ज़्यादा है:

कुछ लोग यह तक भी देतें हैं कि महात्मा गाँधी सरीखे लोग शाकाहारी थे! मैं महात्मा गाँधी की बहुत इज्ज़त करता हूँ क्यूंकि भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया और इंसानियत के लिए भी. लेकिन क्यूंकि महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे, शांतिप्रिय थे, यहाँ यह दर्शाने के लिए लिखा गया कि शाकाहार आपको शांतिप्रिय बनाता है.

तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं.

अब आपसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल जिसका आप जवाब दीजिये! अभी तक के इतिहास में मनुष्य में कौन सा ऐसा व्यक्ति या व्यक्तित्व था जो मशहूर था- सबसे ज्यादा लोगों को मारने के लिए- क्या आप गेस कर सकते है????

….. हिटलर , अडोल्फ़ हिटलर, उसने छह मिलियन यहूदियों को मारा था | क्या वह मांसाहारी था या शाकाहारी?…………शाकाहारी.

खैर! अब आगे आप कहेंगे कि – अडोल्फ़ हिटलर शाकाहारियों के नाम पर धब्बा था और वह एक अपवाद था. वह कभी कभी माँस भी खाता था| आपको यह भी अंतरजाल पर सर्च करने पर मिलेगा कि उसे जब गैस की समस्या होती थी, तब ही वह सब्जियां खाता था. मैं आपको फ्रेंक्ली एक बात बता दूँ कि वैज्ञानिक रूप से अडोल्फ़ हिटलर का छह मिलियन यहूदियों को मारने का सम्बन्ध उसके खानपान से बिल्कुल भी नहीं है और ना ही मैं यह कह रहा हूँ कि वह शाकाहारी था या मांसाहारी था. मैं यह जानने में बिल्कुल भी इंटररेस्टेड नहीं हूँ कि वह क्या खाता था क्यूँ कि इस बात में कोई वज़न नहीं है| मेरा मानना यह है कि अडोल्फ़ हिटलर द्वारा ऐसा करने का कारन कुछ और है जो कि पूर्णतया अमानवीय है और यह वह नहीं जो उनका खानपान है. मैं एक रिसर्च के बारे में बताता हूँ- अमेरिका में कुछ शाकाहारी और मांसाहारी विद्यार्थियों पर शोध किया गया तो पाया गया कि मांसाहारी विद्यार्थी ज़्यादा शांतिप्रिय और सोशल थे और शाकाहारी कम, यानि शाकाहारी ज़्यादा उग्र थे और मांसाहारी कम | लेकिन यह एक रिसर्च था- यह कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं. मैं इसे बिल्कुल भी यह साबित करने के लिए नहीं बता रहा हूँ कि मांसाहारी शांतिप्रिय होते हैं | चूँकि यह एक बहस है, मुझे यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है और आपने जो भी आरोप लगाये वह या तो तर्क थे या रिसर्च, वह कोई वज्ञानिक तथ्य नहीं थे.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शाकाहारियों ने अपनी काबिलियत और बुद्धि का लोहा मनवा लिया है. मैं आपको बता दूं बहुत से ऐसे भारतीय भी है जो बहुत बुद्दिमान थे और भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है लेकिन वे सब मांसाहारी. आपका कहने का मतलब यह था कि शाकाहारी ज़्यादा बुद्धिजीवी होते है, आपने नाम भी गिनवाए जैसे जार्ज बर्नाड- जो सौ साल जिया. मैं आपको कुछ नाम और बताता हूँ जो शाकाहारी थे और बहुत बड़े बुद्धिजीवी भी- अलबर्ट आइंस्टाइन, इसाक न्यूटन. ठीक है…!

आपको मैं एक बात और बता दूं कि यह भी सत्य ही है कि मांसाहारी जानवर ज़्यादा बुद्धिमान होते हैं बनिस्बत शाकाहारी जीव के | लेकिन मैं इसे भी बहस का हिस्सा नहीं बनाऊंगा कि मांसाहार आपको बुद्धिमान बनाता है क्यूंकि यह सब बातें हम इंसानों पर लागू नहीं हो सकती हैं | खानपान का इन्सान पर फर्क पड़ता है या आपके खानपान पर असर नहीं डालता है, यह एक तर्क है ………. तर्क से सत्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

आगे मैं आपसे एक पूछता हूँ क्या आप ‘यदुनाथ सिंह नायक’ के नाम से वाकिफ हैं, नहीं मालूम मैं बताता हूँ |यदुनाथ सिंह नायक एक शाकाहारी थे और सेना में कार्यरत थे | वह कुश्तीबाज़ थे और उन्होंने विश्व चैम्पियनशिप में दो मांसाहारी कुश्तीबाजों को धुल चटा दी थी| तब तो आपको लगेगा कि शाकाहार से इन्सान ज़्यादा ताक़तवर बनाता है| मैं आपको बता दूँ कि कुश्तीबाजी के विश्व चैम्पियंज़ में शाकाहारी भी हैं और मांसाहारी भी | बात को आगे बढाते हैं- अगर आप पुरे विश्व के लिहाज़ से अगर कम्पेयर करेंगे तो आप को पता है सबसे ज़्यादा कुश्तीबाजी में कौन मशहूर है- मांसाहारी!

बोडी बिल्डिंग में कौन सबसे ज़्यादा मशहूर है——अर्नाल्ड श्वार्ज्नेगेर | तेरह बार अर्नाल्ड ने विश्व विजेता का खिताब जीता था और सात बार मि. ओलंपिया और पांच बार मि. यूनिवर्स और एक बार मि. वर्ल्ड | आपको पता है- वह क्या था ??? वह शाकाहारी था या माँसाहारी ??? माँसाहारी !!! बोक्सेर- मोहमम्द अली – माँसाहारी ! कैसियस क्ले- माँसाहारी ! माइक टायसन- माँसाहारी !

कुछ ब्लॉग मित्रों ने यह पूछा था कि चिकन और मटन के साथ चावल और रोटी क्यूँ इस्तेमाल की जाती है?

अब इसका मैं क्या जवाब दूँ| मैं आपसे पूछूँ कि आप खाना खाने पर पानी क्यूँ पीते हैं? तो आप क्या जवाब देंगे | पानी शाकाहारी है या माँसाहारी !!!?

अब मैं निम्न तथ्यों के साथ अपनी बातें ख़त्म करना चाहता हूँ: 1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.
2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?
3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 – अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.
6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.
7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.
8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.
9 – जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना ‘मांसाहार आपको आक्रामक बनता है’ का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.
10 – यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.
11 – शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.
12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.
13 –कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.
14 – और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

उम्मीद करता हूँ कि यह लेख आपकी मांसाहार के प्रति उठ रही जिज्ञासाओं को शांत कर देगा… ईश्वर हम सबको सत्य की खोज का प्यासा बनाये !

सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार

>इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली भारत के हित में: RBI निदेशक Islamic Banking System is better for India

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RBI के भूतपूर्व निदेशक का कहना है कि “बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 में बदलाव किये बिना ही भारत में इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू की जा सकती है. अल्पाधिकार प्राप्त लोगों के लिए एवम् अधिकारहीन और हाशिये के लोगों के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली वरदान साबित होगी.”
भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व निदेशक जनाब अब्दुल हसीब मुंबई में जमाते-इस्लामी हिंदी के तत्वाधान में आयोजित एक सेमीनार ‘Global Financial Crisis and Islamic Economic System’ / ‘विश्वव्यापी वित्तीय संकट और इस्लामी आर्थिक प्रणाली‘ में संबोधित कर रहे थे. भारत में इस्लामी आर्थिक प्रणाली की वक़ालत में उनका कहना था कि “रघुराम राजन कमिटी ने आर्थिक सेक्टर में सुधार हेतु जो तथ्य दिए उसमें इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली ही सबसे उपयुक्त बताई है. भारत के आर्थिक क्षेत्र में सुधार हेतु इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली को लागू करना सबसे बेहतर और कारगर काम होगा.” उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली और ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली में भी जानकारी और कहा कि दुनिया के बहुत से देश यह ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली अपना चुके हैं और वह कारगर भी है. नयी सदी में जबकि दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है और सभी आर्थिक विपत्तियों से जूझ रहे हैं, इसके लिए ज़रूरि है कि इसका हल सोचा जाये.

इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली की ख़ूबी यह है कि वह अप्रभावित है और उससे भी बड़ी विशेषता है कि वह ‘केयरिंग और शेयरिंग’, पारदर्शी एवम् इंसानी सिद्धांत और उसूलों के क़रीब है.”, इस्लामिक बैंकिंग की राष्ट्रीय कमिटी के संयोजक जनाब अब्दुर-रकीब ने टिपण्णी करी, “जबकि जापान, फ्रांस, इंग्लैंड और दीगर मुल्क़ अरबों डॉलर के व्यापार के लिए आर्थिक उदारीकरण को अपनाकर स्वागत कर रहें हैं तो हम क्यूँ नहीं कर सकते”, उन्होंने आगे तर्क दिया.

उन्होंने यह भी सफाई दी कि जिन लोगों के मन में यह है कि यह आर्थिक प्रणाली केवल मुस्लिम के लिए है तो यह गलत है क्यूंकि यह प्रणाली पुरे विश्वस्तर पर कामयाब है और भारत के लिए भी इंशा-अल्लाह होगी. इस्लामिक बैंकिंग और आर्थिक प्रणाली पूरे इंसानियत के हित में है.

अपारदर्शिता और ब्याज ने आर्थिक विपत्तियों को और अधिक बढावा दिया है, जिसके चलते अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है.”, डॉ. शरीक़ निसार (अर्थशास्त्री व इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के ज्ञाता) ने विश्लेषित किया. उन्होंने इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली के अंगों व प्रोडक्ट्स को बताते हुए कहा कि इनमें मुख्यतया मुदाराभा (speculation), कर्द-ए-हसना (Interest Free Loan), इजारा (Leasing) आदि हैं. लोगों को वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली का अध्ययन करना चाहिए ताकी वे जान सकें कि यह मौजूदा बैंकिंग प्रणाली से बेहतर है

इस सेमीनार में मौलाना रियाज़ अहमद खान (उपाध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद, महाराष्ट्र), डॉ. रहमतुल्लाह (अर्थशास्त्री), जे. ऍफ़ पाटिल (हेड ऑफ़ इकनॉमिक डिपार्टमेन्ट, कोल्हापुर यूनिवर्सिटी) भी शरीक हुए और अपने विचार प्रस्तुत किये.

-Saleem Khan

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>हिंदू भी मांसाहारी बन सकते हैं- भीष्म पितामह, महाभारत Hindu also eat meat: Bhishm Pitamah, Mahabharat

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अक्सर कुछ लोगों के मन में यह आता ही होगा कि जानवरों की हत्या एक क्रूर और निर्दयतापूर्ण कार्य है तो क्यूँ लोग मांस खाते हैं? जहाँ तक मेरा सवाल है मैं एक मांसाहारी हूँ. मुझसे मेरे परिवार के लोग और जानने वाले (जो शाकाहारी हैं) अक्सर कहते हैं कि आप माँस खाते हो और बेज़ुबान जानवरों पर अत्याचार करके जानवरों के अधिकारों का हनन करते हो.


शाकाहार ने अब संसार भर में एक आन्दोलन का रूप ले लिया है, बहुत से लोग तो इसको जानवरों के अधिकार से जोड़ते हैं. निसंदेह दुनिया में माँसाहारों की एक बड़ी संख्या है और अन्य लोग मांसाहार को जानवरों के अधिकार (जानवराधिकार) का हनन मानते हैं.

मेरा मानना है कि इंसानियत का यह तकाज़ा है कि इन्सान सभी जीव और प्राणी से दया का भावः रखे| साथ ही मेरा मानना यह भी है कि ईश्वर ने पृथ्वी, पेड़-पौधे और छोटे बड़े हर प्रकार के जीव-जंतुओं को हमारे लाभ के लिए पैदा किया गया है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की दी हुई अमानत और नेमत के रूप में मौजूद प्रत्येक स्रोत को किस प्रकार उचित रूप से इस्तेमाल करते है.

आइये इस पहलू पर और इसके तथ्यों पर और जानकारी हासिल की जाये…

1- माँस पौष्टिक आहार है और प्रोटीन से भरपूर है
माँस उत्तम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है. इसमें आठों अमीनों असिड पाए जाते हैं जो शरीर के भीतर नहीं बनते और जिसकी पूर्ति खाने से पूरी हो सकती है. गोश्त यानि माँस में लोहा, विटामिन बी वन और नियासिन भी पाए जाते हैं (पढ़े- कक्षा दस और बारह की पुस्तकें)



2- इन्सान के दांतों में दो प्रकार की क्षमता है
अगर आप घांस-फूस खाने वाले जानवर जैसे बकरी, भेड़ और गाय वगैरह के तो आप उन सभी में समानता पाएंगे. इन सभी जानवरों के चपटे दंत होते हैं यानि जो केवल घांस-फूस खाने के लिए उपयुक्त होते हैं. यदि आप मांसाहारी जानवरों जैसे शेर, चीता और बाघ आदि के दंत देखें तो उनमें नुकीले दंत भी पाएंगे जो कि माँस खाने में मदद करते हैं. यदि आप अपने अर्थात इन्सान के दांतों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे हमारे दांत नुकीले और चपटे दोनों प्रकार के हैं. इस प्रकार वे शाक और माँस दोनों खाने में सक्षम हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे नुकीले दांत क्यूँ देता. यह इस बात का सबूत है कि उसने हमें माँस और सब्जी दोनों खाने की इजाज़त दी है.

3- इन्सान माँस और सब्जियां दोनों पचा सकता है
शाकाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल केवल सब्जियां ही पचा सकते है और मांसाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल माँस पचाने में सक्षम है लेकिन इन्सान का पाचन तंत्र दोनों को पचा सकता है.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमको केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे हमें ऐसा पाचनतंत्र क्यूँ देता जो माँस और सब्जी दोनों पचा सकता है.

4- एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी हो सकता है
एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक अच्छा मुसलमान हो सकता है. मांसाहारी होना एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं.

5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता है
पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-

“ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है” (कुरआन 5:1)

“रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो” (कुरआन 16:5)

“और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो” (कुरआन 23:21)

6- hindoo dhaarmik granth maansaahaar kii anumati deten hai !
बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.

A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-
वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है

(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-
माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है

(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि –
स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 88 में धर्मराज युधिष्ठर और पितामह के मध्य वार्तालाप का उल्लेख किया गया है कि कौन से भोजन पूर्वजों को शांति पहुँचाने हेतु उनके श्राद्ध के समय दान करने चाहिए? प्रसंग इस प्रकार है –

“युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबली!मुझे बताईये कि कौन सी वस्तु जिसको यदि मृत पूर्वजों को भेट की जाये तो उनको शांति मिले? कौन सा हव्य सदैव रहेगा ? और वह क्या जिसको यदि सदैव पेश किया जाये तो अनंत हो जाये?”

भीष्म ने कहा, “बात सुनो, हे युधिष्ठिर कि वे कौन सी हवी है जो श्राद्ध रीति के मध्य भेंट करना उचित है और कौन से फल है जो प्रत्येक से जुडें हैं| और श्राद्ध के समय शीशम, बीज, चावल, बाजरा, माश, पानी, जड़ और फल भेंट किया जाये तो पूर्वजो को एक माह तक शांति मिलती है. यदि मछली भेंट की जाये तो यह उन्हें दो माह तक राहत देती है. भेंड का माँस तीन माह तक उन्हें शांति देता है| खरगोश का माँस चार माह तक, बकरी का माँस पांच माह और सूअर का माँस छह माह तक, पक्षियों का माँस सात माह तक, पृष्ठा नामक हिरन से वे आठ माह तक, रुरु नामक हिरन के माँस से वे नौ माह तक शांति में रहते हैं. “GAWAYA” के माँस से दस माह तक, भैस के माँस से ग्यारह माह तक और गौ माँस से पूरे एक वर्ष तक. प्यास यदि उन्हें घी में मिला कर दान किया जाये यह पूर्वजों के लिए गौ माँस की तरह होता है| बधरिनासा (एक बड़ा बैल) के माँस से बारह वर्ष तक और गैंडे का माँस यदि चंद्रमा के अनुसार उनको मृत्यु वर्ष पर भेंट किया जाये तो यह उन्हें सदैव सुख शांति में रखता है. क्लासका नाम की जड़ी-बूटी, कंचना पुष्प की पत्तियां और लाल बकरी का माँस भेंट किया जाये तो वह भी अनंत सुखदायी होता है. अतः यह स्वाभाविक है कि यदि तुम अपने पूर्वजों को अनंत काल तक सुख-शांति देना चाहते हो तो तुम्हें लाल बकरी का माँस भेंट करना चाहिए

7- हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित
हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.

8- पेड़ पौधों में भी जीवन
कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.

9- पौधों को भी पीड़ा होती है
वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञानं कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं लेकिन उनकी चीख इंसानों के द्वारा नहीं सुनी जा सकती. इसका कारण यह है कि मनुष्य में आवाज़ सुनने की अक्षमता जो श्रुत सीमा में नहीं आते अर्थात 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक इस सीमा के नीचे या ऊपर पड़ने वाली किसी भी वस्तु की आवाज़ मनुष्य नहीं सुन सकता है| एक कुत्ते में 40,000 हर्ट्ज़ तक सुनने की क्षमता है. इसी प्रकार खामोश कुत्ते की ध्वनि की लहर संख्या 20,000 से अधिक और 40,000 हर्ट्ज़ से कम होती है. इन ध्वनियों को केवल कुत्ते ही सुन सकते हैं, मनुष्य नहीं. एक कुत्ता अपने मालिक की सीटी पहचानता है और उसके पास पहुँच जाता है| अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.

10- दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!
एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए.

पवित्र कुरआन में कहा गया है –

ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

-सलीम खान

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>क्या मुसलमानों को आतंकवादी होना चाहिए Should every muslim be terrorist!

>आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो आतंक (भय) का कारण हो. जिसके आतंक अथवा भय से दूसरा डरे. एक चोर जब एक पुलिस वाले को देखता है तो उसे भय होता है. पुलिस वाला चोर की नज़र में आतंकवादी है. उसी तरह से हर एक मुस्लिम को असामाजिक तत्वों के लिए आतंकवादी ही होना चाहिए, मिसाल के तौर पर हर एक मुस्लिम को आतंक का पर्याय होना चाहिए, उनके लिए जो चोर हैं, डाकू हैं, बलात्कारी हैं…


जब कभी उपरोक्त क़िस्म के असामाजिक तत्व किसी मुसलमान को देखें तो उनके मन-मष्तिष्क में आतंक का संचार हो. हालाँकि यह सत्य है कि “आतंकवादी” शब्द सामान्यतया उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो जन-सामान्य में आतंक का कारण हो लेकिन एक सच्चे मुसलमान के लिए चाहिए कि वह आतंक का कारण बनें, चुनिन्दा लोगों के लिए जैसे असामाजिक तत्व ना कि निर्दोष के लिए. वास्तव में एक मुसलमान को जन-सामान्य के लिए शांति का पर्याय होना चाहिए.

एक ही व्यक्ति, एक ही कार्य के लिए दो अलगअलग लेबल (पैमाना) i.e. आतंकवादी और देशभक्त
भारत को जब फिरंगियों से आज़ादी नहीं मिली थी तब भारत देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश सरकार आतंकवादी कहती थी. उन्हीं लोगो को उसी कार्य के लिए भारतीय देश भक्त कहते थे. इस प्रकार एक ही कार्य के लिए, एक ही व्यक्ति के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) हुआ. एक उन्हें आतंकवादी कह रहा है तो दूसरा देश भक्त. जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के समर्थन में हैं वे उन्हें आतंकवादी ही मानते हैं वहीँ जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ थे वे उन्हें देश भक्त या स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं.


बहुत महत्वपूर्ण है किसी के बारे में इंसाफ करने से पहले या उसके बारे में राय कायम करने से पहले उसे स्वस्थ ह्रदय से सुना जाये, जाना जाये. दोनों तरह के तर्कों को सुना समझा जाये, हालातों को विश्लेषित किया जाये. उसके कृत्य के कारण और इरादे को भली प्रकार समझा और महसूस किया जाये, तब जाकर उसके बारे में राय कायम की जाये.

इस्लाम का अर्थ “शांति” होता है.

इस्लाम शब्द का उद्भव अरबी के “सलाम” शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है “शांति”.यह शांति का धर्म है और हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम के बुनियादी (fundamentals) ढांचें को माने और जाने और उस पर अमल करे और पूरी दुनिया में इसके महत्व को बताये. इस प्रकार हर मुस्लिम को इस्लाम के मौलिक (fundamentals) कर्तव्यों का पालन करते हुए fundamentalist होना चाहिए और terrorist* होना चाहिए.

सलीम खान

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>हाँ….मैं, सुरेश चिपलूनकर की ही तरह एक हिन्दू हूँ I am also a Hindu like Suresh Chiplunkar

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‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा

भारत वर्ष में रह कर अगर हम कहें की हिंदू शब्द की परिभाषा क्या हो सकती है? हिंदू शब्द के उद्भव का इतिहास क्या है? आख़िर क्या है हिंदू? तो यह एक अजीब सा सवाल होगा
लेकिन यह एक सवाल ही है कि जिस हिन्दू शब्द का इस्तेमाल वर्तमान में जिस अर्थ के लिए किया जा रहा है क्या वह सही है ?

मैंने पीस टीवी पर डॉ ज़ाकिर नाइक का एक स्पीच देखा, उन्होंने किस तरह से हिंदू शब्द की व्याख्या की मुझे कुछ कुछ समझ में आ गया मगर पुरी संतुष्टि के लिए मैंने अंतरजाल पर कई वेबसाइट पर इस शब्द को खोजा तो पाया हाँ डॉ ज़ाकिर नाइक वाकई सही कह रहे हैं. हिंदू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, कब हुई और किसके द्वारा हुई? इन सवालों के जवाब में ही हिंदू शब्द की परिभाषा निहित है

यह बहुत ही मजेदार बात होगी अगर आप ये जानेंगे कि हिंदू शब्द न ही द्रविडियन न ही संस्कृत भाषा का शब्द है. इस तरह से यह हिन्दी भाषा का शब्द तो बिल्कुल भी नही हुआ. मैं आप को बता दूँ यह शब्द हमारे भारतवर्ष में 17वीं शताब्दी तक इस्तेमाल में नही था. अगर हम वास्तविक रूप से हिंदू शब्द की परिभाषा करें तो कह सकते है कि भारतीय (उपमहाद्वीप) में रहने वाले सभी हिंदू है चाहे वो किसी धर्म के हों. हिंदू शब्द धर्म निरपेक्ष शब्द है यह किसी धर्म से सम्बंधित नही है बल्कि यह एक भौगोलिक शब्द है. हिंदू शब्द संस्कृत भाषा के शब्द सिन्धु का ग़लत उच्चारण का नतीजा है जो कई हज़ार साल पहले पर्सियन वालों ने इस्तेमाल किया था. उनके उच्चारण में ‘स’ अक्षर का उच्चारण ‘ह’ होता था

हाँ ! मैं सलीम खान हिंदू हूँ !!!
हिंदू शब्द अपने आप में एक भौगोलिक पहचान लिए हुए है, यह सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया था या शायेद इन्दुस नदी से घिरे स्थल पर रहने वालों के लिए इस्तेमाल किया गया था। बहुत से इतिहासविद्दों का मानना है कि ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अरब्स द्वारा प्रयोग किया गया था मगर कुछ इतिहासविद्दों का यह भी मानना है कि यह पारसी थे जिन्होंने हिमालय के उत्तर पश्चिम रस्ते से भारत में आकर वहां के बाशिंदों के लिए इस्तेमाल किया था।

धर्म और ग्रन्थ के शब्दकोष के वोल्यूम # 6,सन्दर्भ # 699 के अनुसार हिंदू शब्द का प्रादुर्भाव/प्रयोग भारतीय साहित्य या ग्रन्थों में मुसलमानों के भारत आने के बाद हुआ था

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में पेज नम्बर 74 और 75 पर लिखा है कि “the word Hindu can be earliest traced to a source a tantrik in 8th century and it was used initially to describe the people, it was never used to describe religion…” पंडित जवाहरलाल नेहरू के मुताबिक हिंदू शब्द तो बहुत बाद में प्रयोग में लाया गया। हिन्दुज्म शब्द कि उत्पत्ति हिंदू शब्द से हुई और यह शब्द सर्वप्रथम 19वीं सदी में अंग्रेज़ी साहित्कारों द्वारा यहाँ के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु प्रयोग में लाया गया।

नई शब्दकोष ब्रिटानिका के अनुसार, जिसके वोल्यूम# 20 सन्दर्भ # 581 में लिखा है कि भारत के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु (ईसाई, जो धर्म परिवर्तन करके बने को छोड़ कर) हिन्दुज्म शब्द सर्वप्रथम अंग्रेज़ी साहित्यकारों द्वारा सन् 1830 में इस्ल्तेमल किया गया था

इसी कारण भारत के कई विद्वानों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि हिन्दुज्म शब्द के इस्तेमाल को धर्म के लिए प्रयोग करने के बजाये इसे सनातन या वैदिक धर्म कहना चाहिए. स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्ति का कहना है कि “यह वेदंटिस्ट धर्म” होना चाहिए.

इस प्रकार भारतवर्ष में रहने वाले सभी बाशिंदे हिन्दू हैं, भौगोलिक रूप से! चाहे वो मैं हूँ या कोई अन्य.

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>मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं–वंदे मातरम !!!

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मैंने हिंदुस्तान के दर्द (blog) पर देखा एक जनाब अपने दर्द का इज़हार कर रहे थे, एक नहीं दो नहीं अनेक पोस्ट एक साथ करके यानि जैसे जैसे दर्द उठा उन्होंने बयां कर दिया, दर्द होना भी चाहिए लेकिन उनका एक दर्द बड़ा ही ख़तरनाक उठा जिस पर मुझे यहाँ अपनी बात रखने पर मजबूर कर दिया | बात उन महाशय की नहीं है, मेरे से इससे पहले कई लोगों ने यही सवाल पूछा था | महाशय की एक टिपण्णी की जिसमे उन्होंने लिखा कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं | गलती उनकी नहीं है दर असल उन्होंने भी चन्द लोगों की तरह गलती कर बैठी ठीक उसी तरह जैसे एक नयी नवेली ब्रांड न्यू कार को एक अनाडी ड्राईवर चलाये और एक्सीडेंट कर बैठे और लोग दोष दे कार को, ड्राईवर की करतूत पर| अरे! कार को ड्राईवर से मत तौलिये |


इन्ही महाशय की तरह मुझसे एक जनाब ने मुझसे पूछा कि सलीम एक बात बताओ “अगरइस्लाम दुनिया का सबसे अच्छा धर्म है तो आखिर बहुत से मुसलमान बेईमान, बेभरोसा क्यूँ हैं और अधिकतर मुसलमान रुढिवादी और आतंकवादी क्यूँ होते है? क्यूँ वो धोखेबाज़ और रिश्वतखोरी और घूसखोरी में लिप्त हैं?


मैं उन सबका जवाब देता हूँ बिन्दुवार- (कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं!?)


(1) मिडिया इसलाम की ग़लत तस्वीर पेश करता है-

(क) इसलाम बेशक सबसे अच्छा धर्म है लेकिन असल बात यह है कि आज मिडिया की नकेल पश्चिम वालों के हाथों में है, जो इसलाम से भयभीत है| मिडिया बराबर इसलाम के विरुद्ध बातें प्रकाशित और प्रचारित करता है| वह या तो इसलाम के विरुद्ध ग़लत सूचनाएं उपलब्ध करता/कराता है और इसलाम से सम्बंधित ग़लत सलत उद्वरण देता है या फिर किसी बात को जो मौजूद हो ग़लत दिशा देता है या उछलता है|


(ख) अगर कहीं बम फटने की कोई घटना होती है तो बगैर किसी बगैर किसी प्रमाण के मसलमान को दोषी मान लिया जाता है और उसे इसलाम से जोड़ दिया जाता है | समाचार पत्रों में बड़ी बड़ी सुर्खियों में उसे प्रकाशित किया जाता है | फिर आगे चल कर पता चलता है कि इस घटना के पीछे किसी मुसलमान के बजाये किसी गैर मुस्लिम का हाथ था तो इस खबर को पहले वाला महत्व नहीं दिया जाता और छोटी सी खबर दे दी जाती है | (जैसा कि तौक़ीर के मामले मिडिया ने किया था)


(ग) अगर कोई 50 साल का मुसलमान व्यक्ति 15 साल की मुसलमान लड़की से उसकी इजाज़त और मर्ज़ी से शादी करता है तो यह खबर अख़बार के पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित की जाती है लेकिन अगर को 50 साल का गैर-मुस्लिम व्यक्ति 6 साल की लड़की के साथ बलात्कार करता है तो इसकी खबर को अखबार के अन्दर के पन्ने में संछिप्त कालम में जगह मिलती है (यहाँ पढें मेरा लेख)| प्रतिदिन अमेरिका में 2713 बलात्कार की घटनाये होती हैं और अपने भारत में हर आधे घंटे में एक औरत बलात्कार का शिकार होती है लेकिन वे खबरों में नहीं आती है या कम प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं| अमेरिका में ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि यह चीज़ें उनकी जीवनचर्या में शामिल हो गयी है |


(2) काली भेंडें (ग़लत लोग) हर समुदाय में मौजूद हैं-


मैं जानता हूँ कि कुछ मुसलमान बेईमान हैं और भरोसे लायक नहीं है | वे धोखाधडी आदि कर लेते हैं| लेकिन असल बात यह है कि मिडिया इस बात को इस तरह पेश करता है कि सिर्फ मुसलमान ही हैं जो इस प्रकार की गतिविधियों में लिप्त हैं | हर समुदाय के अन्दर कुछ बुरे लोग होते है और हो सकते है| इन कुछ लोगों की वजह से उस धर्म को या उस पूरी कौम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जिसके वह अनुनायी है या जिससे वह सम्बद्ध हैं|


(3) कुल मिलाकर मुसलमान सबसे अच्छे हैं-


मुसलमानों में बुरे लोगों की मौजूदगी होने के बावजूद मुसलमान सबसे कुल मिलाकर सबसे अच्छे लोग हैं | मुसलमान ही वह समुदाय है जिसमें शराब पीने वालों की संख्या सबसे कम है और शराब ना पीने वालों की संख्या सबसे ज्यादा | मुसलमान कुल मिला कर दुनिया में सबसे ज्यादा धन-दौलत गरीबों और भलाई के कामों में खर्च करते हैं | भारतीय मुस्लिम हर साल लगभग बारह हज़ार करोड़ (रु. १२,०००,०००,०००/-) खर्च करते हैं| सुशीलता, शर्म व हया, सादगी और शिष्टाचार, मानवीय मूल्यों और और नैतिकता के मामले में मुसलमान दूसरो के मुक़ाबले में बहुत बढ़ कर हैं|


(4) कार को ड्राईवर से मत तौलिये-


अगर आपको किसी नवीनतम मॉडल की कार के बारे में यह अंदाजा लगाना हो कि वह कितनी अच्छी है और फिर एक ऐसा शख्स जो कार चलने की विधि से परिचित ना हो लेकिन वह कार चलाना चाहे तो आप किसको दोष देंगे कार को या ड्राईवर को | स्पष्ट है इसके लिए ड्राईवर को ही दोषी ठहराया जायेगा | इस बात का पता लगाने के लिए कि कार कितनी अच्छी है, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उस के ड्राईवर को नहीं देखता है बल्कि उस कार की खूबियों को देखता है| उसकी रफ्तार क्या है? ईंधन की खपत कैसी है? सुरक्षात्मक उपायों से सम्बंधित क्या कुछ मौजूद है? वगैरह| अगर हम इस बात को स्वीकार भी कर लें कि मुस्लमान बुरे होते हैं, तब भी हमें इस्लाम को उसके मानने वालों के आधार पर नहीं तुलना चाहिए या परखना चाहिए | अगर आप सहीं मायनों में इस्लाम की क्षमता को जानने और परखने की ख़ूबी रखते हैं तो आप उसके उचित और प्रामादिक स्रोतों (कुरान और हदीसों) को सामने रखना होगा |


(5) इस्लाम को उसके सही अनुनायी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के द्वारा जाँचिये और परखिये-

अगर आप व्यावहारिक रूप से जानना चाहते है कि कार कितनी अच्छी है तो उसको चलने पर एक माहिर ड्राईवर को नियुक्त कीजिये| इसी तरह सबसे बेहतर और इस्लाम पर अमल करने के लिहाज़ से सबसे अच्छा नमूना जिसके द्वारा आप इस्लाम की असल ख़ूबी को महसूस कर सकते हैं– पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) हैं |


बहुत से ईमानदार और निष्पक्ष गैर मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस बात का साफ़ साफ़ उल्लेख किया है पैगम्बर सल्ल० सबसे अच्छे इन्सान थे| माइकल एच हार्ट जिसने इतिहास के सौ महत्वपूर्ण प्रभावशाली लोगपुस्तक लिखी है, उसने इन महान व्यक्तियों में सबसे पहला स्थान पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को दिया है|एक इस्लाम का आलोचक ऐसा कर रहा है. गैर-मुस्लिमों द्वारा पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने के इस प्रकार के अनेक नमूने है – जैसे थॉमस कार्लाईल, ला मार्टिन आदि|


जैसा कि आजकल मिडिया और इस्लाम के आलोचक यह प्रोपगैंडा फैला रहें हैं. वह कुछ ऐसा ही करते जा रहें हैं कि इस्लाम ही है जो दुनिया के लिए खतरा है, यह जाने बिना यह समझे बिना हालाँकि सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि वे सब इस्लाम का विरोध इसलिए तो कतई भी नहीं करते उन्हें इस्लाम के बारे में मालूमात नहीं है बल्कि इसलिए कि पश्चिम देश (जो कि इस्लाम के दुश्मन हैं) के अन्धानुकरण के चलते विरोध करते हैं, आज देश में जैसा माहौल है और जिस तरह से अमेरिका और यूरोप आदि का अन्धानुकरण चल रहा है, ऐसा लगने लगा है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूलते ही जा रहे हैं और यह सब उन लोगों की साजिश के तहत होता जा रहा है. पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता को आत्मसात करने की जो होड़ लगी है, उससे निजात कैसे मिले? उसे कैसे ख़त्म किया जाये? उसे कैसे रोका जाये? मुझे लगता है कि भारत में मुस्लिम ही ऐसे हैं जो अब पश्चिम की भ्रष्ट सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ बोल रहें हैं और उससे अभी तक बचे हुए हैं. वरना बाक़ी भारतीय (जो गैर-मुस्लिम हैं) अमेरिका आदि देशों की चाल में आसानी से फंसते चले जा रहे हैं.


खैर, ऊपर मैंने जो सवाल उठाये हैं उन्हें आप अपने अंतर्मन से पूछिये? आप सोचें कि इनके क्या जवाब हो सकते हैं? वैसे मेरे दिमाग में एक जवाब है हम अपने हिन्दू भाईयों से यह गुजारिश करते हैं कि वे वेदों को पढें, पुराणों को पढें क्यूंकि जहाँ तक मुझे अपने अध्ययन से मालूम चला है कि केवल वेद ही ऐसी किताब है जिसे हमारे हिन्दू भाई ईश्वरीय किताब कहते हैं. और अगर यही है तो मेरा कहना है कि जो भी किताब वेद के खिलाफ़ जाती है उसका बहिस्कार करें, उसे बिलकुल भी न पढें. मैं इधर बैठ कर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि कुरान और वेद की शिक्षाएं ज़्यादातर सामान ही हैं.

मैं ये नहीं कहता कि हमारे और आपके बीच इख्तिलाफ़ (विरोधाभास) नहीं हैं. इख्तिलाफ़ तो है. लेकिन आज हम आपस में उन चीज़ों को आत्मसात करें जो हममे और आपमें यकसां (समान) हों. समानताओं पर आओ. विरोध की बातें कल डिस्कस करेंगे.

अल्लाह त-आला अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब में फरमाता है: “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं. (ताअलौ इला कलिमती सवा-इम बैनना व बैनकुम)” अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३

सबसे पहले तो मैं यह आपको बताना चाहता हूँ कि यह इस्लाम धर्म है ना कि मुस्लिम धर्म. इस्लाम धर्म के अनुनाईयों को मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहते हैं. इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शांति’ और इसका एक और अर्थ होता है ‘आत्मसमर्पण‘ और इस्लाम धर्म को मानने वालों को मुस्लिम कहते हैं, उर्दू या हिंदी में मुसलमान कहते हैं.


अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने भी लोग हैं वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ? (अर्थात नहीं)” सुरह १०, सुरह युनुस आयत (श्लोक) संख्या ९९

कहो: हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाये जो हम पर उतारी है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक और याक़ूब और उनकी संतान पर उतरी उसपर भी. और जो मूसा और ईसा और दुसरे नबियों को उनके रब के ओर से प्रदान हुईं (उस पर भी हम इमान रखते हैं) हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध में अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं.” सुरह ३, सुरह आले इमरान, आयत (श्लोक) ८४

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं. सही बात, नासमझी की बात से अलग हो कर स्पष्ट हो गयी है…” सुरह २, सुरह अल-बकरह, आयत २५६

इस्लाम अल्लाह त-आला (ईश्वर) के नज़दीक सबसे अच्छा दीन (धर्म) है, अल्लाह त-आला के नज़दीक पूरी दुनिया के मनुष्य उसी के बन्दे और पैगम्बर हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक दुसरे को पहचानों और वास्तव अल्लाह के यहाँ तुममे सबसे प्रतिष्ठित वह है जो तुममे सबसे अधिक डर रखता हो, निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है.” सुरह ४९, सुरह अल-हुजुरात, आयत (श्लोक) १३

ऐसी ही सैकणों आयतें अर्थात श्लोक कुरआन में मौजूद हैं. कुल मिला कर लब्बो-लुआब (सारांश) यह है कि इस्लाम धर्म के अनुनायी जिन्हें मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहा जाता है को अल्लाह की तरफ से हिदायत दी गयी है कि वह दीगर मज़ाहब के लोगों के साथ आदर का भाव रक्खो. हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) ने हमें यह ताकीद किया है कि सभी धर्मों के अनुनायीयों को उनके धर्म को मानने की आज़ादी है. साथ ही अल्लाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है.

ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम की आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे.

यह कहना कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहाँ अल्पसंख्यक (दुसरे धर्म के लोगों) को अधिकार नहीं मिलते, बिलकुल भी गलत है, इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन और सुन्नत) में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि दुसरे धर्म के लोगों को उनके रहन-सहन, धार्मिक आस्था और विश्वाश के प्रति गलत व्यवहार करे, बल्कि यह हिदायत ज़रूर है कि उन्हें सत्य मार्ग का रास्ता बताएं.

रही बात लोकतंत्र के सवाल का तो इसका जवाब थोडा बड़ा है फ़िलहाल इतना मैं बताना चाहूँगा कि हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के ज़माने में भी ख़लीफा लोगों का चुनाव होता था. सभी को अधिकार प्राप्त थे.

मैं अपनी पोस्ट कुरआन की इस बात (अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३) पर ख़त्म करना चाहता हूँ कि “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं.

अल्लाह (ईश्वर) हमें सत्यमार्ग पर चलने की हिदायत दे.
सलीम खान

Filed under: वंदे मातरम

>मोहल्ला (ब्लॉग) अभी भी मेरी टी.आर.पी. के टुकड़े खा रहा है (Mohalla, Avinash ban Saleem since last 6 months)

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जी हाँ, सही सुना आपने! मुद्दे की बात करने से पहले मैं कुछ उसूलों और अधिकारों की बात कहना चाहता हूँ. हम सब भारत देश में रहते हैं और भारत देश का संविधान यह हमें पूरी तरह से आज़ादी देता है कि हम किसी भी धर्म को मान सकते हैं, उसे स्वीकार सकते हैं और उसका प्रचार-प्रसार भी कर सकते हैं. धर्म सम्बंधित आज़ादी हमारे मौलिक अधिकारों में से एक है
अविनाश बाबू के ब्लॉग यानि मोहल्ला को मैंने इसी वर्ष जून के महीने में ज्वाइन किया था. और केवल मेरी दो ही पोस्ट के बाद ही उस कुंठित व्यक्ति ने मुझे बैन कर दिया. जानना चाहेंगे मेरी उन दो पोस्टों में ऐया कुछ भी नहीं था जो किसी समाज या धर्म के खिलाफ हो, बल्कि एक सुधारात्मक लेख लिखा था मैंने.
अब देखिये मोहल्ला के फ्रंट पृष्ठ पर किस तरह का नोटिस बोर्ड लगा रहा है इस अल्लाह के बन्दे ने.
यह नोटिस नया नहीं है, यह पिछले 6महीने से यहीं पर लगा है. अब देखिये ३ महीने यानि जून, जुलाई और अगस्त में इसके ब्लॉग की पोस्टों (लेखों) में हुआ इज़ाफा. (May-11, June-95, July-132, Aug-118 )
तो इससे ये साबित हुआ कि जैसे ही इसने यानि अविनाश ने मुझे यानि सलीम खान को मोहल्ला से बाहर किया, इसका सीधा फ़ायेदा इसको मिल गया. वैसे ये फंडा कोई नया नहीं है, पूरी मीडिया ही मुसलामानों और इस्लाम को लगातार इसी तरह बदनाम कर रही है. आपने मेरे वो दो पोस्ट ज़रूर देख लिए होंगे और अब स्वयं विश्लेषित कीजिये कि आखिर उन पोस्ट में ऐसा कुछ था जो अविनाश की नफ़रत इस क़दर भड़की कि आज तीन महीने हो गए शांत नहीं हो पाई.
हालाँकि मोहल्ला अगर कम्युनल या धार्मिक या सांप्रदायिक लेखों के खिलाफ़ वाकए है तो यह बात भी सर्वथा झूठ ही है क्यूंकि अगर आप मोहल्ला के लेखों का गहन अध्ययन करेंगे तो कई ऐसी पोस्ट आपको मिल जायेंगी जो सांप्रदायिक ही हैं और भड़काऊ भी (जबकि मेरे लेख सुधारात्मक ही होते हैं).

नीचे चटका लगा कर आप मोहल्ला के चंद साम्प्रदायिक लेखों का अध्ययन ही कर लें.(Please see the communal post of mohalla)

अविनाश के मुखौटे को उतारने के लिए यह एक ही सवाल काफ़ी है कि आपने अपने ब्लॉग का नाम रखा है मोहल्ला और ऊपर से स्वतंत्र आमंत्रण का लिंक भी दे रखा है, और अगर कोई धार्मिक या सुधारात्मक लेख लिखता है तो उस पर आप उसे बैन कर रहे हो. यानि दोगलेपन की हद !

हाँ! ये हो सकता है कि आप मेरे लेख पर स्वस्थ बहस कर लो, मगर इतना तो बूता है नहीं और न ही इतना उसके पास वक़्त है क्यूंकि वह तो व्यस्त है मोहल्ला LIVE में, मोहल्ला लाइव में व्यस्तता के कारण मोहल्ला को प्रापर वक़्त ना सकने की वजह से उसने ये शिगूफा छोडा और चैन से अपना काम करता रहा.

हालाँकि मैंने उस …ने से यह रेकुएस्ट भी करी कि भई, मेरी आई डी बहाल कर दे, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्यूँ करता उसे जो मेरे टुकड़े खाने थे; टी आर पी के…
एक जनाब ‘फसादी‘ ने तो मोहल्ला के मुखिया के इस क़दम के खिलाफ़ अपील भी कि (यहाँ चटका लगा कर देख लें) लेकिन उस ज़ालिम ने तब पर भी कोई क़दम नहीं उठाया. अगर आप गूगल पर सर्च करेंगे (सलीम मोहल्ला) तो आपको पहले पहल ही यह पोस्ट मिल जायेगी कि बन्दा कितना कुंठित है.
अगर आप गूगल में यह (क्या सलीम खान को मोहल्ले से) सर्च करेंगे तो पाएंगे कि फसादी ने क्या अपील की थी.
अगर आप गूगल में (मेरी आई डी) या (मेरी आई डी बहाल की जाये) टाईप करके सर्च करेंगे तो आपको सच्चाई का पता लग जायेगा.,…..

मैं आपको गूगल की सेवा लेने के लिए इस इस लिए कह रहा हूँ क्यूंकि उसने मेरी तमाम पोस्ट डिलीट कर रखी हैं. गूगल पे तो आपको केवल अवशेष ही मिलंगे; सुबूत बतौर.

धर्म मोहब्बत सिखाता है, नफ़रत नहीं. लेकिन अविनाश जैसे मरदूद को यह समझ नहीं आएगा.

लेख ख़त्म करने से पहले मैं अविनाश बाबू को चेतावनी देता हूँ कि उस गलीज़ ब्लॉग से वह नोटिस हटा लें और भविष्य में ऐसी नीच हरक़त बंद कर दें. अंत में: मोहल्ला के अविनाश के खिलाफ मैं सलीम खान पुनः स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ की तरफ़ से दुसरी चेतावनी देता हूँ कि वह चस्पा की गयी नोटिस शीघ्र ही हटा दें अन्यथा मुझे कानूनी कार्यवाही के बाध्य होना पड़ेगा.

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>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 4

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वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास (All Parts)
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मत्स्य पुराण में मनु की कथा”
तब भगवान् मनु से यूँ बोले ‘ठीक है, ठीक है. तुमने मुझे भलीभांति पहचान लिया है, हे भूपाल ! थोड़े ही समय में पर्वत वन और उपवन से सहित यह पृथ्वी जल में मग्न हो जायेगी. इस कारण हे पृथ्वीपते! सभी जीव समूहों की रक्षा करने के लिए समस्त देवगणों द्वारा इस नौका का निर्माण किया गया है. सुव्रत ! जितने पसीने से उत्पन्न, अण्डों से उत्पन्न, और पृथ्वी से उत्पन्न जीव हैं तथा जितने गर्भ से उत्पन्न जीव हैं, उन सभी को इस नौका में चढ़ा कर तुम सबकी रक्षा करना. इसके बाद पृथ्वीपते प्रलय की समाप्ति में तुम जगत के अचल चल प्राणियों के प्रजापति होगे.तब सातों समुन्द्र एकमेव हो जायेंगे और इन तीनों लोकों को पूर्णरूप से एक ही आकार में रूपांतरित कर देंगे. सुव्रत उस वक़्त तुम इस वेद रुपी नौका को ग्रहण करके इस पर समस्त जीवों और बीजों को लाद देना.

देखा आपने कहानी एक ही है बस फ़र्क़ है तो बस उच्चारण का! नूह और मनु !! दोनों एक ही है!!!
और लीजिये भविष्य पुराण की कथा जिसमें यह फ़र्क़ भी नहीं है.

भविष्य पुराण में नाम का भी फ़र्क़ भी नहीं

एक बार विष्णु (ईश्वर) ने स्वप्न में कहा ‘हे वत्स न्युह ! यह मेरा वचन सुन लो, आज के सातवें दिन में प्रलय होगा और और तुम नाव में शीघ्र समारोहन करके जीवन की रक्षा करना. हे भक्तेंद्र! तू सर्वश्रेष्ठ हो जायेगा. उस ख्वाब में दी गयी आज्ञा को तू स्वीकार करके उस ने मज़बूत और बड़ी और नाव बनाई जो ३०० हाँथ लम्बी थी और ५० हाँथ चौड़ी थी. यह तीस हाँथ ऊँची और बहुत आकर्षक थी समस्त जीवों से भरी हुई थी. उस नौका पर अपने कुलों के साथ प्रवेश किया और विष्णु (ईश्वर) के ध्यान में लीं हो गए. वहां ४० दिन तक घोर वर्ष हुई. यह सम्पूर्ण भारत वर्ष जालों मेंप्लावित होकर सिन्धु बन गया. चारो सागर मिल गए. चारो ओर कोई जीव नज़र नहीं आ रहा था सिवाय न्युह व ब्रह्मवादी मुनि! न्युह अपने कुलों के साथ वहां था और जल की वर्ष समाप्त हो गयी….

अगले अंक में पढ़े:
तो क्या बाइबल और कुर-आन में मनु की कथा की पुराणों से नक़ल की गयी है?

::चलते चलते::
ईश्वर के नियम नहीं बदलते– ऋग्वेद (१:२४:१०)
अर्थात जो यह कहते है कि हमारा धर्म परिवर्तनशील है वह अन्धकार में है, क्यूंकि यह स्पष्ट है कि ईश्वर के नियम कभी नहीं बदलते बल्कि हर युग हर काम में यकसां ही होते हैं.

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>वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास Similarities between Ved and Qur’an – Part 3

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वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास – Part 1
वेद और कुरआन – कितने दूर कितने पास – Part 2
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वेदों का ईशदूत कौन था?
कुछ दिन पहले मैंने इस विषय पर लेख लिखा था जिसमें यह सवाल किया था कि हिन्दू बताएं कि वेदों का ईशदूत कौन है?? अब मैं आपको बता दूं कि अगर आप वेदों, बाइबल, तौरेत और कुर-आन का विस्तृत रूप से गहन अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि वह ईशदूत कोई और नहीं बल्कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ही थे, जिसे अन्य ग्रन्थों मनु या न्युह आदि कहा जाता है. आईये जाने कुर-आन, बाइबल और मत्स्य पुराण में इनका किस तरह ज़िक्र है, आपको पढ़ते पढ़ते ही समझ आ जायेगा कि हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ही मनु हैं….

कुर-आन में नूह (अ.) की कथा:
प्रश्न यह है कि यह ह. नूह (अ.) कौन थे? कुर-आन में दर्शाई गयी निम्न पंक्तियों से यह सहज ही पता चल जाता है–

… और नूह के पास वाणी भेजी गयी कि “तुम्हारी जाति में से अब तक जो आस्तिक हो चुके हैं उन के अतिरिक्त अब कोई और आस्था रखने वाला न होगा तो इन नकारने वालों की करतूतों पर तुम उदास न हो और हमारी देख रेख में तथा हमारे निर्देशन में एक नौका बनाओं औत उम मुझसे उनकी शिफारिश न करना जिन्होंने आतंक और अत्याचार किया. वे डूब कर रहेंगे.” और नूह ने नौका बनानी शुरू कर दी और जब कभी उनकी जाति के मुखिया उनके पास से गुजरते तो उन पर हंसते. उनकी हंसी उड़ाते. नूह ने उनसे कहा कि ” अगर तूम हम पर हंसते हो तो हम भी तुम पर हंसते हैं जैसे तुम हंस रहे हो” शीघ्र ही तुन्हें पता चल जायेगा कि किस पर प्रकोप आएगा.”…. यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ पहुंचा और पृथ्वी से पानी उबलने लगा तो हमने कहा कि “इस नौका में हर प्रकार के जोड़ों में से दो दो को चढ़ा लो और जिनके लिए आदेश हो चुका है उनको छोड़ कर अपने घरवालों और आस्तिकों को भी बैठा लो”. और उनके साथ आस्था करने वाले बहुत कम थे. और नूह ने कहा कि “इसमें (नौका में) सवार हो जाओ, अल्लाह ही के नाम से इसको चलना है और इसको ठहरना है. निसंदेह मेरा प्रभु बड़ा क्षमाशील है और बहुत दयालू है” और वह नौका में उन्हें लेकर पहाड़ जैसी मौजों में चलने लगी… और आदेश हुआ कि “हे पृथ्वी अपना पानी निगल जा और हे आकाश थम जा” और पानी घट गया और कार्य पूरा हो गया नौका “जूदि” नामक पड़ी पर आ ठहरी और कहा गया कि अत्याचार करने वाले दूर हो गए…” आदेश हुआ कि “हे नूह! हमारी ओर से सुरक्षा और आर्शीवाद लेकर उतरो, अपने ऊपर भी और उन जातियों पर भी जो तुम्हारे साथ्यों से उत्पन्न होंगी. और कुछ जातियों तो ऐसी भी होंगी जिन्हें हम कुछ दिन ढील देंगे और फिर उन पर हमारी ओर से प्रकोप होगा”

बाइबल में नूह की कथा

… और परमेश्वर ने पृथ्वी पर दृष्टि की तो देखा कि वह बिगड़ी हुई है क्यूंकि प्राणियों ने पृथ्वी पर अपने अपने चाल चलन बिगाड़ लिए हैं. तब परमेश्वर ने नूह से कहा कि “सब प्राणियों के अंत करने का प्रश्न मेरे समक्ष आ गया है. क्यूंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गयी है. इसलिए मैं उनका पृथ्वी सहित नाश कर डालूँगा. इसलिए तू इन्जिर वृक्ष की लकडी का एक जहाज़ बना और उसमें कोठरियां बनाना और भीतर बाहर उनमें राल लगाना और इस ढंग से उसको बनाना कि जहाज़ की लम्बाई ३०० हाँथ, चौड़ाई ५० हाँथ, ऊँचाई ३० हाँथ की हो. जहाज़ में एक खिड़की बनाना और उनके एक हाँथ ऊपर उसकी छत बनाना आर जहाज़ की एक तरफ़ एक द्वार रखना, और जहाज़ में पहला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना. और सुनो ! मैं स्वयं पृथ्वी पर जल प्रलय कर सब प्राणियों का नाश कर डालूँगा लेकिन तेरे संग मैं वचन बांधता हूँ इसलिए तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुवों सहित जहाज़ में प्रवेश कर जाओ और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो अर्थात एक नर और एक मादा जहाज़ में ले जाकर उन्हें जीवित रखना. एक एक जाति के पशु, पक्षी, और रेंगने वाले सब में से दो दो तेरे पास आयेंगे और….
…. सात दिन के बाद प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा और पृथ्वी पर ४० दिन तक प्रलय होने लगा और जल पृथ्वी पर अत्यंत बढ़ गया और यहाँ तक कि पृथ्वी के बड़े बड़े पहाड़ जलमग्न हो गए और क्या पक्षी और क्या घरेलू पशु और क्या जंगली पशु और पृश्वी पर सब चलने वाले प्राणी और जितने जंतु और सब मनुष्य मर गए….. केवल नूह के संग जो जहाज़ में थे बच गए. और जल पृथ्वी पर १५० दिन तक प्रबल रहा. … और १५० दिन जल पृथ्वी पर लगातार घटता रहा और जहाज़ “अराफ़ात” नामक पहाड़ पर टिक गया. … तब परमेश्वर ने नूह से कहा कि “तू अपने पुत्रों, पत्नी और बहुवों समेत जहाज़ से निकल आ… तब परमेश्वर ने नूह और उनके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा कि “फूलो फलो और बढो और पृथ्वी में भर जाओ”

(उत्पत्ति- अध्याय ६, ७, ८, ९)

अब आप निश्चय ही समझ गए होंगे कि कुर-आन और बाइबल में वर्णित नूह कौन थे. जी हाँ महा जल प्लावन वाले “मनु” जिनकी कथाये वैदिक धर्म में विस्तृत रूप से मिलती हैं….

अगले अंक में पढ़े:
मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण में मनु की कथा

::चलते चलते::
डूबता हुए सूरज ने कहा- मेरे बाद इस संसार में मार्ग कौन दिखलायेगा? कोई है जो अंधेरों से लड़ने का साहस रखता हो? और फिर एक टिमटिमाता हुआ दीया आगे बढ़ कर बोला — मैं सीमा भर कोशिश करूँगा!

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लेख सन्दर्भ