स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>क्या `नियोग´ जैसी शमर्नाक व्यवस्था ईश्वर ने दी है?

>

हिन्दू धर्म में विधवा औरत और विधुर मर्द को अपने जीवन साथी की मौत के बाद पुनर्विवाह करने से वेदों के आधार पर रोक और बिना दोबारा विवाह किये ही दोनों को `नियोग´ द्वारा सन्तान उत्पन्न करने की व्यवस्था है। एक विधवा स्त्री बच्चे पैदा करने के लिए वेदानुसार दस पुरूषों के साथ `नियोग´ कर सकती है और ऐसे ही एक विधुर मर्द भी दस स्त्रियों के साथ `नियोग´ कर सकता है। बल्कि यदि पति बच्चा पैदा करने के लायक़ न हो तो पत्नि अपने पति की इजाज़त से उसके जीते जी भी अन्य पुरूष से `नियोग´ कर सकती है। हिन्दू धर्म के झंडाबरदारों को इसमें कोई पाप नज़र नहीं आता।

क्या वाक़ई ईश्वर ऐसी व्यवस्था देगा जिसे मानने के लिए खुद वेद प्रचारक ही तैयार नहीं हैं?
ऐसा लगता है कि या तो वेदों में क्षेपक हो गया है या फिर `नियोग´ की वैदिक व्यवस्था किसी विशेष काल के लिए थी, सदा के लिए नहीं थी । ईश्वर की ओर से सदा के लिए किसी अन्य व्यवस्था का भेजा जाना अभीष्ट था।


अब सवाल है कि कौन सी व्यवस्था अपनी जाये ? इसका सीधा सा हल है पुनर्विवाह की व्यवस्था
जी हाँ, केवल पुनर्विवाह के द्वारा ही विधवा और विधुर दोनों की समस्या का सम्मानजनक हल संभव है।


ईश्वर ने क़ुरआन में यही व्यवस्था दी है।

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Filed under: नियोग

42 Responses

  1. Mohammad Azeem कहते हैं:

    >आप मुद्दा सही उठाते हो लेकिन उसे लोग ग़लत समझ लेते हैं, बहुत बढ़िया काम कर रहे हो आप.

  2. Mohammad Azeem कहते हैं:

    >आप मुद्दा सही उठाते हो लेकिन उसे लोग ग़लत समझ लेते हैं, बहुत बढ़िया काम कर रहे हो आप.

  3. Seedhi Soch कहते हैं:

    >एक बार अकबर ने महाभारत के फारसी अनुवाद के लिए आगया पारित की. काम पूर्ण हो जाने पर अकबर ने उससे पूछा कि महाभारत में कौन सी ऐसी बात है जिसे तुमने गौर किया हो? उसने कहा- "महाभारत में एक भी शख्स ऐसा नहीं हो हलाल पैदा हुआ हो!"

  4. Seedhi Soch कहते हैं:

    >एक बार अकबर ने महाभारत के फारसी अनुवाद के लिए आगया पारित की. काम पूर्ण हो जाने पर अकबर ने उससे पूछा कि महाभारत में कौन सी ऐसी बात है जिसे तुमने गौर किया हो? उसने कहा- "महाभारत में एक भी शख्स ऐसा नहीं हो हलाल पैदा हुआ हो!"

  5. Anonymous कहते हैं:

    >नियोग एक सहज प्रक्रिया है जो आपसी सहमती से क्रियान्वित होती है. इसमें किसी को कोई भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

  6. Anonymous कहते हैं:

    >नियोग एक सहज प्रक्रिया है जो आपसी सहमती से क्रियान्वित होती है. इसमें किसी को कोई भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

  7. Anonymous कहते हैं:

    >benami ki mane to jo aapasi sahmati se kaam ho usko galat nahi kaha ja sakta Jaise samlaingikta aur bhai bahan ka apas men sex sambandh

  8. Anonymous कहते हैं:

    >benami ki mane to jo aapasi sahmati se kaam ho usko galat nahi kaha ja sakta Jaise samlaingikta aur bhai bahan ka apas men sex sambandh

  9. ab inconvinienti कहते हैं:

    >सलीम खान तुम एक पागल मनोरोगी बाल बलात्कारी द्वारा चलाए कबाइली मज़हब को छोड़ कर अरब का पुराना धर्म ज्यूडिस्म अपना लो या मुश्रीक बन जाओ या मेरी तरह नास्तिक हो जाओ. क्या धरा है एक सिजोफ्रेनिक-पीडोफाइल मनोरोगी की किताब को अंतिम सत्य मानाने में और फालतू टाइम खोटी करने में?

  10. ab inconvinienti कहते हैं:

    >सलीम खान तुम एक पागल मनोरोगी बाल बलात्कारी द्वारा चलाए कबाइली मज़हब को छोड़ कर अरब का पुराना धर्म ज्यूडिस्म अपना लो या मुश्रीक बन जाओ या मेरी तरह नास्तिक हो जाओ. क्या धरा है एक सिजोफ्रेनिक-पीडोफाइल मनोरोगी की किताब को अंतिम सत्य मानाने में और फालतू टाइम खोटी करने में?

  11. राज कुमार कहते हैं:

    >हिन्दू धर्म के नियम को समझने के लिए तुम्हारी दलीलों की आवश्यकता नहीं है. यह एक परिवर्तनशील धर्म है समय के साथ साथ बदलता रहता है. कल यही धर्म वेदों को मानता था फिर पुराण और अन्य ग्रन्थ आये फिर महाभारत रामायण और गीता आये फिर आखिर में अब उन सबके बजाये राम चरित मानस हनुमान चालीसा दुर्गा चालीसा.

  12. राज कुमार कहते हैं:

    >हिन्दू धर्म के नियम को समझने के लिए तुम्हारी दलीलों की आवश्यकता नहीं है. यह एक परिवर्तनशील धर्म है समय के साथ साथ बदलता रहता है. कल यही धर्म वेदों को मानता था फिर पुराण और अन्य ग्रन्थ आये फिर महाभारत रामायण और गीता आये फिर आखिर में अब उन सबके बजाये राम चरित मानस हनुमान चालीसा दुर्गा चालीसा.

  13. >@ ab inconvinienti अब न मत करना, अपना पता बताओ मैं आ रहा हूँ तुमसे मिलने

  14. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >@ ab inconvinienti अब न मत करना, अपना पता बताओ मैं आ रहा हूँ तुमसे मिलने

  15. mehta कहते हैं:

    >tum kya brahman ho ye sab bate kuran me likhi hai jabhi tum inki achhaiya desh ko bta rhe hotaki adhik se adhik log dharm pariwartan ke liye parbhavit hojase koi bhi muslim 3 4 shadiya kar sakta haihmare hidu dharm me to kisi istri ko buri nazar se dekhna bhi pap haijo kuch pakistan me orto ke sath ho rha hai wo kisi se chupa nhi haijai hindutv jai bharat

  16. vikas mehta कहते हैं:

    >tum kya brahman ho ye sab bate kuran me likhi hai jabhi tum inki achhaiya desh ko bta rhe hotaki adhik se adhik log dharm pariwartan ke liye parbhavit hojase koi bhi muslim 3 4 shadiya kar sakta haihmare hidu dharm me to kisi istri ko buri nazar se dekhna bhi pap haijo kuch pakistan me orto ke sath ho rha hai wo kisi se chupa nhi haijai hindutv jai bharat

  17. उम्दा सोच कहते हैं:

    >तुम अपना पता बताओ सबको सलीम मिया बहुत लोग आयेंगे ,तुम को कौन कौन पता बताये और कहा कहा जाओगे तुम !हैरानी की बात है तुम तीन के अलावा कोई मुसलमान थूकता तक नहीं तुम्हारे ब्लॉग पर , हमपे मत जाओ हम तो पीकदान तलाशते रहते है थूकने क लिए !कोई मुसलमान गुस्से में तीन बार तलाक बोल दे तो उसे अपनी बीवी को अपनाने के लिए पहले किसी और से सम्भोग करवाना पड़ता है ये ज़लीत सोच खुदा की है या पैगम्बर की या कुर्रान की ?

  18. उम्दा सोच कहते हैं:

    >तुम अपना पता बताओ सबको सलीम मिया बहुत लोग आयेंगे ,तुम को कौन कौन पता बताये और कहा कहा जाओगे तुम !हैरानी की बात है तुम तीन के अलावा कोई मुसलमान थूकता तक नहीं तुम्हारे ब्लॉग पर , हमपे मत जाओ हम तो पीकदान तलाशते रहते है थूकने क लिए !कोई मुसलमान गुस्से में तीन बार तलाक बोल दे तो उसे अपनी बीवी को अपनाने के लिए पहले किसी और से सम्भोग करवाना पड़ता है ये ज़लीत सोच खुदा की है या पैगम्बर की या कुर्रान की ?

  19. ab inconvinienti कहते हैं:

    >पता फोन करके पूछ लो और फोन नंबर चिट्ठी लिखकर पूछ लेना —————– चलो वैसे हिंट दिए देता हूँ फादर एंथोनी गोजाल्वेज़ की खोली से चार ब्लाक आगे चर्च के पास वाली गली में किसी से भी पूछ लेना की एब इन्कन्विनियनटी का गरीबखाना कहाँ है

  20. ab inconvinienti कहते हैं:

    >पता फोन करके पूछ लो और फोन नंबर चिट्ठी लिखकर पूछ लेना —————– चलो वैसे हिंट दिए देता हूँ फादर एंथोनी गोजाल्वेज़ की खोली से चार ब्लाक आगे चर्च के पास वाली गली में किसी से भी पूछ लेना की एब इन्कन्विनियनटी का गरीबखाना कहाँ है

  21. ab inconvinienti कहते हैं:

    >सलीम खान मेरे घर आने से पहले विचार कर : तुम एक पागल मनोरोगी बाल बलात्कारी द्वारा चलाए कबाइली मज़हब को छोड़ कर अरब का पुराना धर्म ज्यूडिस्म अपना लो या मुश्रीक बन जाओ या मेरी तरह नास्तिक हो जाओ. क्या धरा है एक सिजोफ्रेनिक-पीडोफाइल मनोरोगी की किताब को अंतिम सत्य मानाने में और फालतू टाइम खोटी करने में. क्यों?

  22. ab inconvinienti कहते हैं:

    >सलीम खान मेरे घर आने से पहले विचार कर : तुम एक पागल मनोरोगी बाल बलात्कारी द्वारा चलाए कबाइली मज़हब को छोड़ कर अरब का पुराना धर्म ज्यूडिस्म अपना लो या मुश्रीक बन जाओ या मेरी तरह नास्तिक हो जाओ. क्या धरा है एक सिजोफ्रेनिक-पीडोफाइल मनोरोगी की किताब को अंतिम सत्य मानाने में और फालतू टाइम खोटी करने में. क्यों?

  23. Pandit Kishore Ji कहते हैं:

    >aapne prasn to sahi utthaya hain parantu tarika ghalat hai….. niyog us pratha ko kaha jaata tha jisme kisi purush va stree(shadishuda)ko kisi dusre se sambhand tab banane ki izzazat hoti thi jab undono me se koi santaan ko janm dene laayak nahi hota tha

  24. Pandit Kishore Ji कहते हैं:

    >aapne prasn to sahi utthaya hain parantu tarika ghalat hai….. niyog us pratha ko kaha jaata tha jisme kisi purush va stree(shadishuda)ko kisi dusre se sambhand tab banane ki izzazat hoti thi jab undono me se koi santaan ko janm dene laayak nahi hota tha

  25. Anonymous कहते हैं:

    >बिल्कुल भाईजान। जब अल्लाह मियाँ हलाला की इजाज़त दे सकते हैं तो ईश्वर अंकल नियोग की इजाज़त क्यूँ नहीं दे सकते भला ?

  26. Anonymous कहते हैं:

    >बिल्कुल भाईजान। जब अल्लाह मियाँ हलाला की इजाज़त दे सकते हैं तो ईश्वर अंकल नियोग की इजाज़त क्यूँ नहीं दे सकते भला ?

  27. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे एक बात पूछें ? आप और कैरानवी जी क्या दुनिया के सबसे बड़े …………बकरचोद हैं ?

  28. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे एक बात पूछें ? आप और कैरानवी जी क्या दुनिया के सबसे बड़े …………बकरचोद हैं ?

  29. Anonymous कहते हैं:

    >हरामियों की जुंडली

  30. Anonymous कहते हैं:

    >हरामियों की जुंडली

  31. सौरभ आत्रेय कहते हैं:

    >नियोग व्यवस्था को आप गलत तरीके से समझ रहे हैं. सबसे पहले तो मैं आपसे कहना चाहूँगा वैदिक या हिन्दू धर्म में अपनी पत्नी के सिवाय दूसरी स्त्री से सम्बन्ध तो दूर सोचना भी पाप है और ऐसा ही स्त्री के लिए है. अब यदि स्त्री का पति, या पुरुष की पत्नी कोई मर जाता है तो सबसे पहले तो उसको ब्रह्मचर्य के पालन की आज्ञा है किन्तु यदि वो व्यक्ति या स्त्री उस श्रेणी में नहीं आते हैं और संतान उत्पत्ति चाहते हैं तो समाज की सहमती से विवाह के समान नियोग व्यवस्था है. और इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ संतान उत्पत्ति करना ही होता है वैसे भी हमारे धर्म के अनुसार वैवाहिक जीवन में भी स्त्री-पुरुष का शारीरिक सम्बन्ध केवल संतान पैदा करने के लिए हे ही होना चाहिए और इतना न कर सकें तो कम से कम होना चाहिए किन्तु उनको प्यार से रहना चाहिए जैसे कोई प्रेमी-प्रेमिका हो. और ये आजकल दीखता भी है प्रेमी-प्रेमिका में प्यार होता है जब तक उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध न हो एक आकर्षण में बंधे होते हैं वो, किन्तु विवाह के पश्चात उनका ध्येय केवल शारीरिक सम्बन्ध रह जाता है इस कारण ही प्रेम में कमी आ जाती है और आकर्षण विकर्षण में परिवर्तित होने लगता है . वैदिक धर्म ये नहीं कहता कि विवाह में शारीरिक सम्बन्ध वर्जित है किन्तु उसका उद्देश्य केवल संतान उत्पत्ति के लिए प्रेमपूर्वक ही हो तो उनके मध्य बेहतर सम्बन्ध और शुद्ध प्रेम रहता है. ये बात आपको शायद अजीब लग रही हो क्योंकि आज कल तो केवल सेक्स को ही प्रेम माना जाता है पर साथ-२ आप ये भी देख सकते हैं कि आज-कल के वैवाहिक जीवन में कितने ही राड़-द्वेष-क्लेश उत्पन्न हो चुके हैं, कितने विवाह-विच्छेद होने लगे हैं.खैर हम नियोग कि बात करते हैं नियोग व्यवस्था विवाह की तरह ही है किन्तु उसका नाम नियोग इसलिए रखा गया है ताकि समाज में अव्यवस्था न हो. उदाहरण के तौर पर स्त्री के पति की मौत के पश्चात पति की आर्थिक संपत्ति पर पत्नी का अधिकार होता है और यदि वह पुनर्विवाह करती है तो उसके पूर्व पति की संपत्ति भी नए पति की हो जायेगी जिस कारण अव्यवस्था फैलेगी इस कारण इसको नियोग नाम दिया गया जोकि विवाह की भांति समाज के सहमती से ही संतान उत्पत्ति के लिए होता है किन्तु इसमें स्त्री के पूर्व पति की संपत्ति पर नियोगित पुरुष का अधिकार नहीं होता है. यदि नियोगित पुरुष भी मर जाये और स्त्री दूसरी संतान पैदा करना चाहे तो उसी प्रकार से समाज की सहमती से दुसरे व्यक्ति को नियोगित किया जाता है. इसमें नियम यह है कि विधवा स्त्री के साथ वो ही नियोगित होगा जिसकी पत्नी मर चुकी है और इसी तरह से किसी व्यक्ति के लिए भी. विवाहित व्यक्ति या स्त्री का नियोग उसी अवस्था में संभव है यदि उनमें से एक संतान उत्पत्ति के लायक नहीं है और वो संतान चाहते हैं तो सर्व सहमति से पति या पत्नी किसी से विवाह की भांति नियोग कर सकते हैं किन्तु उनकी संतान के माता-पिता वैवाहिक पति-पत्नी ही होंगे. छिपकर सम्बन्ध बनाने से बेहतर है आपसी सहमती से हो वरना वो व्यभिचार कि श्रेणी में आता है.वैदिक मतानुसार ये माना जाता है और ये सही लगता भी है यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से या स्त्री अपने पति से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं और उनमें से किसी एक मर जाने पर पुनर्विवाह में सात्विक प्रेम की कमी रहेगी क्योंकि उनका सम्बन्ध अपने पूर्व पति या पत्नी से हो चुका है और शुद्ध प्रेम विवाह की सबसे पहली कसौटी है, इस कारण नियोग एक आपातकालीन व्यवस्था है संतान उत्पत्ति के लिए है जो विवाह की भांति समाज की सहमती से होती है, यह व्यवस्था समाज में व्यभिचार को और सामाजिक व्यवस्था को रोकने के लिए है. ये बहुत से लोगो को पहली बार में गलत लगेगी किन्तु गहराई से अनुसंधान करके सोचो तो इसमें बुराई नज़र नहीं आती. पर यह व्यवस्था एक आदर्श समाज में ही चल सकती है नाकि आजकल के समाज में जिसमें विवाह के पश्चात भी आदमी इधर-उधर व्यभिचार के लिए भटकता रहता है और विवाह का प्रयोजन केवल शारीरिक सम्बन्ध तक ही सीमित रहता है, तो आज के हिसाब से पुनर्विवाह ही बेहतर विकल्प है क्योंकि जब पहले में ही शुद्ध प्रेम नहीं है तो दूसरे के बारे में क्या सोचें. इसी कारण महर्षि दयानंद ने भी अपने काल में अनेक विधवाओं का पुनर्विवाह करवाया जो कि समाज के द्वारा शोषित हो रही थी.

  32. सौरभ आत्रेय कहते हैं:

    >नियोग व्यवस्था को आप गलत तरीके से समझ रहे हैं. सबसे पहले तो मैं आपसे कहना चाहूँगा वैदिक या हिन्दू धर्म में अपनी पत्नी के सिवाय दूसरी स्त्री से सम्बन्ध तो दूर सोचना भी पाप है और ऐसा ही स्त्री के लिए है. अब यदि स्त्री का पति, या पुरुष की पत्नी कोई मर जाता है तो सबसे पहले तो उसको ब्रह्मचर्य के पालन की आज्ञा है किन्तु यदि वो व्यक्ति या स्त्री उस श्रेणी में नहीं आते हैं और संतान उत्पत्ति चाहते हैं तो समाज की सहमती से विवाह के समान नियोग व्यवस्था है. और इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ संतान उत्पत्ति करना ही होता है वैसे भी हमारे धर्म के अनुसार वैवाहिक जीवन में भी स्त्री-पुरुष का शारीरिक सम्बन्ध केवल संतान पैदा करने के लिए हे ही होना चाहिए और इतना न कर सकें तो कम से कम होना चाहिए किन्तु उनको प्यार से रहना चाहिए जैसे कोई प्रेमी-प्रेमिका हो. और ये आजकल दीखता भी है प्रेमी-प्रेमिका में प्यार होता है जब तक उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध न हो एक आकर्षण में बंधे होते हैं वो, किन्तु विवाह के पश्चात उनका ध्येय केवल शारीरिक सम्बन्ध रह जाता है इस कारण ही प्रेम में कमी आ जाती है और आकर्षण विकर्षण में परिवर्तित होने लगता है . वैदिक धर्म ये नहीं कहता कि विवाह में शारीरिक सम्बन्ध वर्जित है किन्तु उसका उद्देश्य केवल संतान उत्पत्ति के लिए प्रेमपूर्वक ही हो तो उनके मध्य बेहतर सम्बन्ध और शुद्ध प्रेम रहता है. ये बात आपको शायद अजीब लग रही हो क्योंकि आज कल तो केवल सेक्स को ही प्रेम माना जाता है पर साथ-२ आप ये भी देख सकते हैं कि आज-कल के वैवाहिक जीवन में कितने ही राड़-द्वेष-क्लेश उत्पन्न हो चुके हैं, कितने विवाह-विच्छेद होने लगे हैं.खैर हम नियोग कि बात करते हैं नियोग व्यवस्था विवाह की तरह ही है किन्तु उसका नाम नियोग इसलिए रखा गया है ताकि समाज में अव्यवस्था न हो. उदाहरण के तौर पर स्त्री के पति की मौत के पश्चात पति की आर्थिक संपत्ति पर पत्नी का अधिकार होता है और यदि वह पुनर्विवाह करती है तो उसके पूर्व पति की संपत्ति भी नए पति की हो जायेगी जिस कारण अव्यवस्था फैलेगी इस कारण इसको नियोग नाम दिया गया जोकि विवाह की भांति समाज के सहमती से ही संतान उत्पत्ति के लिए होता है किन्तु इसमें स्त्री के पूर्व पति की संपत्ति पर नियोगित पुरुष का अधिकार नहीं होता है. यदि नियोगित पुरुष भी मर जाये और स्त्री दूसरी संतान पैदा करना चाहे तो उसी प्रकार से समाज की सहमती से दुसरे व्यक्ति को नियोगित किया जाता है. इसमें नियम यह है कि विधवा स्त्री के साथ वो ही नियोगित होगा जिसकी पत्नी मर चुकी है और इसी तरह से किसी व्यक्ति के लिए भी. विवाहित व्यक्ति या स्त्री का नियोग उसी अवस्था में संभव है यदि उनमें से एक संतान उत्पत्ति के लायक नहीं है और वो संतान चाहते हैं तो सर्व सहमति से पति या पत्नी किसी से विवाह की भांति नियोग कर सकते हैं किन्तु उनकी संतान के माता-पिता वैवाहिक पति-पत्नी ही होंगे. छिपकर सम्बन्ध बनाने से बेहतर है आपसी सहमती से हो वरना वो व्यभिचार कि श्रेणी में आता है.वैदिक मतानुसार ये माना जाता है और ये सही लगता भी है यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से या स्त्री अपने पति से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं और उनमें से किसी एक मर जाने पर पुनर्विवाह में सात्विक प्रेम की कमी रहेगी क्योंकि उनका सम्बन्ध अपने पूर्व पति या पत्नी से हो चुका है और शुद्ध प्रेम विवाह की सबसे पहली कसौटी है, इस कारण नियोग एक आपातकालीन व्यवस्था है संतान उत्पत्ति के लिए है जो विवाह की भांति समाज की सहमती से होती है, यह व्यवस्था समाज में व्यभिचार को और सामाजिक व्यवस्था को रोकने के लिए है. ये बहुत से लोगो को पहली बार में गलत लगेगी किन्तु गहराई से अनुसंधान करके सोचो तो इसमें बुराई नज़र नहीं आती. पर यह व्यवस्था एक आदर्श समाज में ही चल सकती है नाकि आजकल के समाज में जिसमें विवाह के पश्चात भी आदमी इधर-उधर व्यभिचार के लिए भटकता रहता है और विवाह का प्रयोजन केवल शारीरिक सम्बन्ध तक ही सीमित रहता है, तो आज के हिसाब से पुनर्विवाह ही बेहतर विकल्प है क्योंकि जब पहले में ही शुद्ध प्रेम नहीं है तो दूसरे के बारे में क्या सोचें. इसी कारण महर्षि दयानंद ने भी अपने काल में अनेक विधवाओं का पुनर्विवाह करवाया जो कि समाज के द्वारा शोषित हो रही थी.

  33. >इस्लाम में हलाला जैसी कोई चीज़ नहीं है, कुर-आन का गहन अध्ययन करने पर (खास कर सुरह अल-बकरा और सुरह निशा का) पता चल जाता है कि इस्लाम का नियम नहीं बल्कि कुछ भटके हुए मुसलमानों के द्वारा यह "शोर्ट कट" अपनाया जा रहा है जो मूल रूप से कुछ और ही है, ज्यादा जानने के लिए आप मेरा इसी सम्बन्ध में लेख पढें कि "तीन तलाक़ काम खल्लास…"

  34. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >इस्लाम में हलाला जैसी कोई चीज़ नहीं है, कुर-आन का गहन अध्ययन करने पर (खास कर सुरह अल-बकरा और सुरह निशा का) पता चल जाता है कि इस्लाम का नियम नहीं बल्कि कुछ भटके हुए मुसलमानों के द्वारा यह "शोर्ट कट" अपनाया जा रहा है जो मूल रूप से कुछ और ही है, ज्यादा जानने के लिए आप मेरा इसी सम्बन्ध में लेख पढें कि "तीन तलाक़ काम खल्लास…"

  35. >सौरभ भाई आपने नियोग को जिस तरह से समझाया उसमें कुछ खामियां है, आपको मैं बता दूं संपत्ति में नारी की हिस्सेदारी दुनिया में सर्वप्रथम इस्लाम ने ही नियत की और उसे अमलीजामा पहनाया. आप अगर संपत्ति के हिस्सेदारी के बारे में विभिन्न धर्मों की किताबों का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि केवल कुर-आन ही ऐसी किताब है जिसने नारी को आर्थिक और सामाजिक रूप से और धार्मिक रूप से मजबूती प्रदान की है.

  36. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >सौरभ भाई आपने नियोग को जिस तरह से समझाया उसमें कुछ खामियां है, आपको मैं बता दूं संपत्ति में नारी की हिस्सेदारी दुनिया में सर्वप्रथम इस्लाम ने ही नियत की और उसे अमलीजामा पहनाया. आप अगर संपत्ति के हिस्सेदारी के बारे में विभिन्न धर्मों की किताबों का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि केवल कुर-आन ही ऐसी किताब है जिसने नारी को आर्थिक और सामाजिक रूप से और धार्मिक रूप से मजबूती प्रदान की है.

  37. सौरभ आत्रेय कहते हैं:

    >स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ जी आपके अनुसार नारी को संपत्ति का अधिकारी दुनिया में सर्वप्रथम इस्लाम ने नियत की है और आप मुझे विभिन्न सम्प्रदायों की पुस्तकें पढने के लिए भी बोलते हैं. किन्तु मैं आपसे ये कहना चाहूँगा कि आपको विभिन्न पुस्तकें पढने कि आवश्यकता बहुत अधिक है आप अपनी बनायीं या कुछ चंद लोगो की बनाई हुई दुनिया में जी रहें हैं क्योंकि आप अपनी बात को सिद्ध नहीं कर सकते यदि कर सकते हैं तो करके दिखाईये . खैर आप पहले हिन्दू धर्म कि मान्य प्रमाणिक पुस्तकें पढिये फिर ये आपका भ्रम मिट जायेगा. स्त्री के सम्मान और अधिकार में हमारे शास्त्रों क्या-२ लिखा हुआ है ये आपको जरा सा भी अंदाजा नहीं है. इस्लाम का इतिहास तो मात्र १४०० या १५०० वर्ष पुराना है किन्तु भारत वर्ष में स्त्रियाँ शिक्षित और स्नातक होती थी और उनका अपने पति कि संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है इस बात का प्रमाण तो भारत के इतिहास में कितने भरे पढ़े हैं. और गार्गी, अपाला, अनुसूया, मैत्री आदि विदुषी महिलाओं के शास्त्रार्थ पुरुष विद्वानों से होने का पुस्तकों में वर्णन है. यहाँ तक कि उपनिषदों में महर्षि याज्ञवल्क्य का एक विदुषी महिला से शास्त्रार्थ होता है जिसके मुझे अभी नाम याद नहीं आ रहा है. हमारे यहाँ महिलाओं को स्वयंवर अर्थात खुद वर चुन ने कि स्वतंत्रता शुरू से ही है जिसमें माता-पिता कि भी सहमती होती है, स्वयंवर का मतलब आप ऐसे मत लगाना जैसे कि कथा कहानियों में दिखाया जाता है. उसका मतलब है कि लड़की या लड़के की पसंद का वर. जितना अधिकार महिलाओं को वैदिक धर्म में आरम्भ से ही मिला है उतना कहीं और नहीं है, अभी समय कम है कभी फुर्सत में आपको शास्त्रों से उधृत तथ्यों को सप्रमाण दिखाऊँगा और इस्लाम में औरत कि क्या दशा है ये किसी से छिपा नहीं है आये दिन कोई न कोई समाचार ही बता देता है और कुरान और हदीस में क्या लिखा है ये भी मैंने पढ़ा है वो भी आप लोगो दिखा सकता हूँ. आप समझदार दीखते हैं कृपया अपने अध्यन का दायरा और बढाइये, सुनी- सुनाई या किसी मुल्ला-मौलवी कि बातों पर विश्वास मत कीजिये. मैं भी किसी भी स्वघोषित पंडितों कि बातो पर विश्वास नहीं करता, इसलिए मैंने अधिकतर सभी मजहब, रिलिजन, सम्प्रदाय, पंथ और अपने धर्म के बारे में स्वयं अध्यन किया है और पढ़ा है तभी मैं ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ.

  38. सौरभ आत्रेय कहते हैं:

    >स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ जी आपके अनुसार नारी को संपत्ति का अधिकारी दुनिया में सर्वप्रथम इस्लाम ने नियत की है और आप मुझे विभिन्न सम्प्रदायों की पुस्तकें पढने के लिए भी बोलते हैं. किन्तु मैं आपसे ये कहना चाहूँगा कि आपको विभिन्न पुस्तकें पढने कि आवश्यकता बहुत अधिक है आप अपनी बनायीं या कुछ चंद लोगो की बनाई हुई दुनिया में जी रहें हैं क्योंकि आप अपनी बात को सिद्ध नहीं कर सकते यदि कर सकते हैं तो करके दिखाईये . खैर आप पहले हिन्दू धर्म कि मान्य प्रमाणिक पुस्तकें पढिये फिर ये आपका भ्रम मिट जायेगा. स्त्री के सम्मान और अधिकार में हमारे शास्त्रों क्या-२ लिखा हुआ है ये आपको जरा सा भी अंदाजा नहीं है. इस्लाम का इतिहास तो मात्र १४०० या १५०० वर्ष पुराना है किन्तु भारत वर्ष में स्त्रियाँ शिक्षित और स्नातक होती थी और उनका अपने पति कि संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है इस बात का प्रमाण तो भारत के इतिहास में कितने भरे पढ़े हैं. और गार्गी, अपाला, अनुसूया, मैत्री आदि विदुषी महिलाओं के शास्त्रार्थ पुरुष विद्वानों से होने का पुस्तकों में वर्णन है. यहाँ तक कि उपनिषदों में महर्षि याज्ञवल्क्य का एक विदुषी महिला से शास्त्रार्थ होता है जिसके मुझे अभी नाम याद नहीं आ रहा है. हमारे यहाँ महिलाओं को स्वयंवर अर्थात खुद वर चुन ने कि स्वतंत्रता शुरू से ही है जिसमें माता-पिता कि भी सहमती होती है, स्वयंवर का मतलब आप ऐसे मत लगाना जैसे कि कथा कहानियों में दिखाया जाता है. उसका मतलब है कि लड़की या लड़के की पसंद का वर. जितना अधिकार महिलाओं को वैदिक धर्म में आरम्भ से ही मिला है उतना कहीं और नहीं है, अभी समय कम है कभी फुर्सत में आपको शास्त्रों से उधृत तथ्यों को सप्रमाण दिखाऊँगा और इस्लाम में औरत कि क्या दशा है ये किसी से छिपा नहीं है आये दिन कोई न कोई समाचार ही बता देता है और कुरान और हदीस में क्या लिखा है ये भी मैंने पढ़ा है वो भी आप लोगो दिखा सकता हूँ. आप समझदार दीखते हैं कृपया अपने अध्यन का दायरा और बढाइये, सुनी- सुनाई या किसी मुल्ला-मौलवी कि बातों पर विश्वास मत कीजिये. मैं भी किसी भी स्वघोषित पंडितों कि बातो पर विश्वास नहीं करता, इसलिए मैंने अधिकतर सभी मजहब, रिलिजन, सम्प्रदाय, पंथ और अपने धर्म के बारे में स्वयं अध्यन किया है और पढ़ा है तभी मैं ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ.

  39. Dr. shyam gupta कहते हैं:

    >सौरभ आत्रेय का कथन शत % सही है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' एवं 'साम्राज्ञी श्वसुरे भव……' जैसे आदर्शों वाले वैदिक धर्म से कुरान व इस्लाम की कोई तुलना ही नहीं है , वेदों के बारे मैं ना जानकारों को ऊल-जुलूल वर्णन से बाज़ आना चाहिए |' हिन्दुस्तान की आवाज़' के नाम पर ये विदेशी आवाज़ है

  40. Dr. shyam gupta कहते हैं:

    >सौरभ आत्रेय का कथन शत % सही है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' एवं 'साम्राज्ञी श्वसुरे भव……' जैसे आदर्शों वाले वैदिक धर्म से कुरान व इस्लाम की कोई तुलना ही नहीं है , वेदों के बारे मैं ना जानकारों को ऊल-जुलूल वर्णन से बाज़ आना चाहिए |' हिन्दुस्तान की आवाज़' के नाम पर ये विदेशी आवाज़ है

  41. Anonymous कहते हैं:

    >mutah vivaha bhi to muslmaan hi karta hai koi aur nahi karta hai ya kashi wawastha hai. jisma agreement hota hai aur male dwara female ko passe diya jaata hai. aur

  42. Anonymous कहते हैं:

    >mutah vivaha bhi to muslmaan hi karta hai koi aur nahi karta hai ya kashi wawastha hai. jisma agreement hota hai aur male dwara female ko passe diya jaata hai. aur

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