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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>"कहां है धर्म कहां है न्याय’’- देवासुर संग्राम Written by Rakesh Nath

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धर्म ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर देवासुर संग्राम का उल्लेख आता है। देवता स्वर्ग में विलासी जीवन बिताते थे और असुरों को छलबल से पराभूत करने के शड्यंत्र रचते रहते थे। असुरों को दुष्चरित्र सिद्ध करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। जगह-जगह उनकी निंदा की गई, केवल निंदा करने वाले उदाहरणों पर ध्यान नहीं दें तो पता चलेगा कि देवताओं और असुरों के चित्रण में कोई मौलिक अंतर नहीं था देवता भी वह सब कुकर्म करते थे जिन का आरोप असुरों पर लगाया जाता हैअसुर देवताओं से अधिक परिश्रमी और जुझारू थे, इसलिए उन्हें सफलता भी मिलती थी देवताओं को कोई अधिक श्रम वाला काम करना होता तो धर्म ग्रन्थों से मिलने वाले विवरणों के अनुसार उन के लिए उन्हें असुरों का ही सहयोग लेना पड़ता था

समुद्रमंथन की घटना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। ‘‘भागवत’’ के आठवें स्कंध में आईं इस कथा के अनुसार इंद्र के प्रस्ताव पर असुरों ने देवताओं के साथ मिलकर समुद्रमंथन शुरू किया था । समुद्र में जब अमृत निकला तो विष्‍णु ने स्त्री का रूप धारण करके असुरों को मोहित किया और आपस में लड़ा दिया स्त्री रूप धारी विष्‍णु ने चालाकी से असुरों को अमृत के भाग से वंचित कर दिया और सारा अमृत देवताओं को ही बांट दिया

यह कथा सच है या गलत, यह सोचना बेकार है, लेकिन कहानी यह तो बताती है कि भगवान और देवता किस तरह छल करते थे और अधिक परिश्रम करने वालों का हिस्सा भी हड़प जाते थेराजा बलि का लाभ उठाकर उस का पूरा राज्य हड़प लेने और देवताओं को दे देने की कथा भी भागवत में आती है । बलि स्वभाव से उदार और दानशील था । भागवत के अनुसार उसने तीनों लोकों में अपना राज्य स्थापित कर लिया था। विष्‍णु ने पहले तो उस से दान मांगा और वचन लिया कि जो भी मांगा जाएगा वह बलि दे देगा। वचन लेने के बाद विष्‍णु ने बलि का पूरा राज्य ही ले लिया और देवताओं को दे दिया । बलि असुरों का राजा था और भागवत में आए प्रसंग के अनुसार ही वह उदार था । उस की उदारता का अनुचित लाभ उठाना नैतिक है या अनैतिक? ‘‘भागवत’’ के एक और कथा प्रसंग में देवताओं द्वारा संकट के समय साथ देने वाले विश्‍वरूप की हत्या का उल्लेख आता है । छठे स्कंध में आई इस कथा के अनुसार इंद्र ने देवता त्वष्‍टा के पुत्र विश्‍वरूप से वैष्‍णवी विद्या सीखी और असुरों को जीत कर अपना राज्य वापस ले लिया। विश्‍वरूप की माता असुरकुल की थी। एक यज्ञ में वह अपनी माता के वंश की भी आहुति देता है तो इन्द्र ने उस का सिर काट लिया इंद्र वहां विश्‍वरूप द्वारा किय गये उपकार को भूल गया और असुरों के नाम से इतना चिढ़ गया कि उपकार करने वाले की ही हत्या कर दी । उपकार करने वालों के साथ इस व्यवहार क्या नैतिक कहा जाएगा?

और स्वार्थीपने की हद देखिए कि देवता अपने एक शत्रु को मारने के लिए दघीचि के पास उन की हड्डियां मांगने पहँच गए। वृत्र नामक असुर का संहार करने के लिए जो आयुध चाहिए था वह हड्डियों से बन सकता था हड्डियां भी ऐसे व्यक्ति कि जो तपस्वी हो, देवताओं में ऐसा कोई तपस्वी था नहीं, सभी विलासी थे।इसलिए वे दधीचि ऋषि के पास गए और उन से अपनी हड्डियां देने के लिए कहने लगे। जीवन रक्षा के लिए खून चढाने की जरूरत हो तो अति आत्मीय व्यक्ति से भी रक्तदान करने के लिए कहने में संकोच होता है। रक्तदान में यद्यपि मरने का डर नहीं रहता, लेकिन देवता जीवित व्यक्ति के पास उस की हड्डियां मांगने पहँच गये और मांग लाए, स्वार्थपरता की यह अति देवताओं के चरित्र में ही दिखाई देती है, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं।इस तरह के कथा प्रसंग अविश्‍वसणीय और अस्वाभाविक हैं, लेकिन ये इस बात के द्योतक तो हैं कि धर्म ग्रन्थों में किस प्रकार की नैतिकता सिखाई गई है छलकपट करने, दूसरों की उदारता का अनुचित लाभ उठाने और स्वार्थ में अन्धे हो जाने वाले चरित्रों को आदर्श बना कर प्रस्तुत किया गया है तो इस से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कथित धार्मिक युग के लोग कितने नैतिक रहे होंगे —-
देवताओं के साथ साथ भगवान के अवतार भी अनैतिक आचरण करते थे। कई स्थलों पर तो उन का आचरण अनैतिकता की हद से भी आगे अपराधपूर्ण लगता है। इस तरह के कृत्य यदि कोई आज करे तो कानून में उसे दंड देने की व्यवस्था है
स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!”
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चलते चलते
मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि इस सन्देश को आप एक प्रश्न के रूप में देखें और विचार करें और शुद्ध मन से अध्ययन करें ताकि सत्य मार्ग के अभिलाषी बन सकें. ज़रूरी नहीं कि जो बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है और आस्था के नाम पर केवल दिल को ही खुश करना नादानी होगी. धर्म वह है जो इंसानियत के पहलूवों पर खरा उतरे और इंसान के मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे सके.

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4 Responses

  1. >वाह खान साहब प्रस्‍तुती का अंदाज तो कोई आपसे सीखे, बात को निराले रूप में पेश करते हो, बधाई

  2. >वाह खान साहब प्रस्‍तुती का अंदाज तो कोई आपसे सीखे, बात को निराले रूप में पेश करते हो, बधाई

  3. >बलिहारी जाऊ मुर्खता पे दोस्त !आज तक लगता है तुम ये ही नहीं समझ पाए हो की असुर कौन है और देवता कौन तो अमृत वितरण कैसे समझोगे ? लिखते हो …. चलते चलतेमेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि इस सन्देश को आप एक प्रश्न के रूप में देखें और विचार करें और शुद्ध मन से अध्ययन करें ताकि सत्य मार्ग के अभिलाषी बन सकें. '''''''''''''''''''''''ज़रूरी नहीं कि जो बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है और आस्था के नाम पर केवल दिल को ही खुश करना नादानी होगी. ''''''''धर्म वह है जो इंसानियत के पहलूवों पर खरा उतरे और इंसान के मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे सके'''''''''बोलते ये हो …….और कुरान कहता है — क़यामत के दिन मुर्दे ज़िंदा होंगे और अपनी कब्रों से बाहर आयेंगे और खुदा सच्चे मुसलमान की वकालत कर उसे जन्नत मुक्कम्मल करवाएगा !!!तुम्हारे मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे रहा है ये 'ज़रूरी नहीं कि ये बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है !छोडो यार किस पागलपन का प्रचार करते घूम रहे हो …..जीवन प्रकाश से लाभान्वित हो….. जाओ ज्ञानवर्धक कोई साहित्य पढ़ कर आओ.. और सुनो …. सच्चे दिल से खुराफाती दिमाग से नहीं !

  4. >बलिहारी जाऊ मुर्खता पे दोस्त !आज तक लगता है तुम ये ही नहीं समझ पाए हो की असुर कौन है और देवता कौन तो अमृत वितरण कैसे समझोगे ? लिखते हो …. चलते चलतेमेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि इस सन्देश को आप एक प्रश्न के रूप में देखें और विचार करें और शुद्ध मन से अध्ययन करें ताकि सत्य मार्ग के अभिलाषी बन सकें. '''''''''''''''''''''''ज़रूरी नहीं कि जो बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है और आस्था के नाम पर केवल दिल को ही खुश करना नादानी होगी. ''''''''धर्म वह है जो इंसानियत के पहलूवों पर खरा उतरे और इंसान के मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे सके'''''''''बोलते ये हो …….और कुरान कहता है — क़यामत के दिन मुर्दे ज़िंदा होंगे और अपनी कब्रों से बाहर आयेंगे और खुदा सच्चे मुसलमान की वकालत कर उसे जन्नत मुक्कम्मल करवाएगा !!!तुम्हारे मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे रहा है ये 'ज़रूरी नहीं कि ये बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है !छोडो यार किस पागलपन का प्रचार करते घूम रहे हो …..जीवन प्रकाश से लाभान्वित हो….. जाओ ज्ञानवर्धक कोई साहित्य पढ़ कर आओ.. और सुनो …. सच्चे दिल से खुराफाती दिमाग से नहीं !

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