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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>यदि वेद (VED) देववाणी है तो इसे लाने वाला ईशदूत कौन था?

>कहा जाता है कि कृष्णा मेनन आने लन्दन प्रवास के दिनों में एक दिन अपनी मित्र मंडली में बैठे हुऐ थे कि अचानक एक दोस्त ने उन्हों संबोधित करते हुए कहाः


‘‘यह सामने बैठा हुआ तुम्हारा मित्र ‘यहूदी‘ है। इस का कहना है कि इस के पास ईश्वर का एक ग्रन्थ है जिस का नाम ‘तौरेत‘ है और यह ईश्वरीय ज्ञान का ग्रंथ ह. मूसा अलै. के माध्यम से दिया गया था।‘‘

‘‘मैं यह बात जानता हूं!‘‘ कृष्णा मेनन ने जवाब दिया।

अब उसी मित्र ने एक दूसरे ईसाई मित्र की ओर संकेत करते हुए कहा– ‘‘यह व्यक्ति ‘ईसाई‘ है और इस का कहना है कि इस के पास भी ईश्वर की एक किताब है जिसका नाम ‘इन्जील‘ है और यह दिव्य ज्ञान की भेंट ईश्वर ने महात्मा ईसा मसीह के द्वारा प्रदान की थी।‘‘

‘‘मैं यह भी जानता हूं!‘‘ कृष्णा मेनन ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा- मानो इन विश्व्यापी तथ्यों को दोहराने पर उन्हें आश्चर्य हो रहा हो लेकिन बोलने वाला पूरी गम्भीरत से बोल रहा था।

उसने तीसरा विषय छेडते हुए, और एक मुसलमान दोस्त की ओर इशारा करते हुए कहाः

‘‘यह हमारा मुसलमान दोस्त है और इस का कहना है कि इस के पास भी ईश्वर का एक ग्रन्थ है- ‘कुरआन‘, और ईश्वर ने यह ज्ञान जिस सत्पुरूष के माध्यम से दिया, उस का नाम ह. मुहम्मद सल्ल. है।‘‘

‘‘अरे भाई, मैं यह भी जानता हूं ‘‘कृष्णा मेनन ने आश्चर्यचकित होकर जवाब दिया।

‘‘निस्सन्देह! वही मित्र बोला- ‘‘ हम और तुम यह बातें खूब जानते हैं, लेकिन मित्र! हम में से कोइ यह नहीं जानता कि ‘वेद‘ जिस का तुम ठीक उसी तरह ईश्वर का सबसे पहला, सबसे प्राचीन, सबसे श्रेष्ठ ज्ञान और वाणी मानते हो, उसे आदि-ग्रन्थ कहते हो उसको ईश्वर से ग्रहण करने तथा जनसाधारण तक पहुंचाने वाला सर्वप्रथम मानव-माध्यम आखिर कौन था?

कहा जाता है कि पूरी सभा की ओर से इस बार प्रश्नवाचक मुस्कुराहट और आश्चर्य के सामने पहली बार कृष्णा मेनन सिर से पांव तक प्रश्न चिह्न बन गन गए। एक ऐसे चिंतन के सन्नाटे में गुम हो गए जसे पहली बार उन्हें यह एक ठोस सवाल महसूस हुआ हो। मानो पहली बार उन्हें अपने वैदिक विद्वानों के वर्तमान शास्त्रीय दृष्टिकोण में एक वास्तविक अन्तराल की अनुभूति हुई हो।

तोरैत, इन्जील और कुरआन के ईश्वर से मानव तक पहुचने के माध्यम तो मालूम हैं, लेकिन यदि वेद देववाणी है तो इसे लाने वाला ईशदूत कौन था? यह घटना चाहे सच्ची हो या मात्र एक कहानी, इसमें शक नहीं है कि यह स्वाभाविक प्रश्न वैदिक धर्म के प्रत्येक अनुयायी के सीने में हजारों वर्षों से अन्दर ही अन्दर निरन्तर खटक रहा होगा

प्रस्तुति: सलीम खान
(पुस्तक ‘अब भी न जागे तो’ से साभार, स्रोत-कर्ता: मोहम्मद उमर कैरानवी)
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70 Responses

  1. sajid khan कहते हैं:

    >MASHALLAH hamri taraf se aap ko dher sari duaBHAGWAAN ham sab ko tamam buraiyo se bachayeAAMEEN

  2. Anonymous कहते हैं:

    >वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि माना जाता है कि इसके मन्त्रों को परमेश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे । वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

  3. mahadev कहते हैं:

    >तेरको पता है की तेरा बाप कौन है व् उसका बाप का खानदान के बारे में पहले पता कर फिर पूछना की वेद को कौन लाया अरे मुर्ख वेद को इश्वर ने मानव कल्याण के लिए प्रकट किया है ऋषि मुनियों के द्वारा

  4. sajid khan कहते हैं:

    >MASHALLAH hamri taraf se aap ko dher sari duaBHAGWAAN ham sab ko tamam buraiyo se bachayeAAMEEN

  5. Anonymous कहते हैं:

    >वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि माना जाता है कि इसके मन्त्रों को परमेश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे । वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

  6. mahadev कहते हैं:

    >तेरको पता है की तेरा बाप कौन है व् उसका बाप का खानदान के बारे में पहले पता कर फिर पूछना की वेद को कौन लाया अरे मुर्ख वेद को इश्वर ने मानव कल्याण के लिए प्रकट किया है ऋषि मुनियों के द्वारा

  7. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे हिन्दू धर्म में इस से कोई फरक नहीं पढता.. आप लगता है पंडित बन ने के इरादे में है

  8. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे हिन्दू धर्म में इस से कोई फरक नहीं पढता.. आप लगता है पंडित बन ने के इरादे में है

  9. ab inconvenienti कहते हैं:

    >वो सब छोड़ो….. तुम पहले अपने परदादा के परदादा के अब्बाजान नाम बताओ.. कहाँ रहते थे क्या करते थे.. उनके कितनी औलादें थीं वगैरह

  10. ab inconvenienti कहते हैं:

    >वो सब छोड़ो….. तुम पहले अपने परदादा के परदादा के अब्बाजान नाम बताओ.. कहाँ रहते थे क्या करते थे.. उनके कितनी औलादें थीं वगैरह

  11. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे बात सब विश्वाश की है,, जैसे आप विश्वाश करते है की ह. मुहम्मद सल्ल. ईश्वरीय दूत थे और उन्होंने कुरआन उन्ही की प्रेरणा से लिखी थी.. ये विश्वाश वाली बात है.. अगर रोड पर पंचर बनाते किसी मुस्लिम भाई से आप कुरान के बारे में पूछेंगे तो उसे नहीं पता होगा जितना आपको पता है.. अतः किसी भी धर्म पर प्रशन मत कीजिये, ये आस्था और विश्वास की बात है.. इस से आपकी नियत में खोट नज़र आता है

  12. Anonymous कहते हैं:

    >वैसे बात सब विश्वाश की है,, जैसे आप विश्वाश करते है की ह. मुहम्मद सल्ल. ईश्वरीय दूत थे और उन्होंने कुरआन उन्ही की प्रेरणा से लिखी थी.. ये विश्वाश वाली बात है.. अगर रोड पर पंचर बनाते किसी मुस्लिम भाई से आप कुरान के बारे में पूछेंगे तो उसे नहीं पता होगा जितना आपको पता है.. अतः किसी भी धर्म पर प्रशन मत कीजिये, ये आस्था और विश्वास की बात है.. इस से आपकी नियत में खोट नज़र आता है

  13. खुर्शीद अहमद कहते हैं:

    >क्या बात है ? साबित करता है आप का रुझान कि आप आने वाले वक़्त के बादशाह हैं. आप का शोध उच्च से उच्चतर होता जा रहा है. सलीम भाई आपमें बहुत ऊर्जा है. वैसे जहाँ तक इस पोस्ट की बात है तो कुर-आन कहता है कि "आसी कोई भी क़ौम नहीं गुज़री जिसमें अल्लाह ने कोई किताब नाजिल नहीं की" कुछ का जिक्र तो कुर-आन में है. लेकिन कुर-आन के उक्त वाकत को हम अगर समझें तो हमें पता चल जायेगा कि (हो सकता है) वेद भी ईश्वरीय ग्रन्थ ही है. हम अगर विस्तृत रूप से गहन अध्ययन करें तो पता चल जायेगा कि वेद में ही ज़िक्र है कि ईश्वर अपने सन्देश ऋषि मुनियों के ज़रिये मानव तक पहुंचाता था. जिसे वे एकत्र कर लेते होंगे. चूँकि अति पुराना होने की वजह से इस बात की कोई जानकारी नहीं हो पायी होगी.

  14. खुर्शीद अहमद कहते हैं:

    >क्या बात है ? साबित करता है आप का रुझान कि आप आने वाले वक़्त के बादशाह हैं. आप का शोध उच्च से उच्चतर होता जा रहा है. सलीम भाई आपमें बहुत ऊर्जा है. वैसे जहाँ तक इस पोस्ट की बात है तो कुर-आन कहता है कि "आसी कोई भी क़ौम नहीं गुज़री जिसमें अल्लाह ने कोई किताब नाजिल नहीं की" कुछ का जिक्र तो कुर-आन में है. लेकिन कुर-आन के उक्त वाकत को हम अगर समझें तो हमें पता चल जायेगा कि (हो सकता है) वेद भी ईश्वरीय ग्रन्थ ही है. हम अगर विस्तृत रूप से गहन अध्ययन करें तो पता चल जायेगा कि वेद में ही ज़िक्र है कि ईश्वर अपने सन्देश ऋषि मुनियों के ज़रिये मानव तक पहुंचाता था. जिसे वे एकत्र कर लेते होंगे. चूँकि अति पुराना होने की वजह से इस बात की कोई जानकारी नहीं हो पायी होगी.

  15. saras कहते हैं:

    >- yahi sabit karta hai ki VED kitne prachin hain.- tum apni pushto ko gin ne baithoge to 1700 saal pehle jaakar tumhari ginti ruk jayegi…- lekin hinduvo ki ginti kaha thaharegi?- hame bhi nahi pata…thik hai?- sanatan dharm islam se jyada prachin hai.- tum ise jhooth sabit nahi kar sakte.- kuchh bhi kar lo…- jab tumhare sall. miya dharti par aaye, usse pehle se hamare purkhe is dharti par maujood the…- aur katl-e-aam ke alawa deegar gyan prapt kar rahe the aur prem ka sandesh faila rahe the…- vaise mere vichar me kitab hi sare jhagdo ki jad hai.- mazhab nahi sikhata aapas me bair karna- lekin kitab sikhati hai.- KAM SE KAM…- kuran to sikhati hi hai…- iska maksad hai puri duniya ko islamic state banana- aur wohi aaj chal rahi jang ka sabab hai.- maine tumhe sahi salah di thi…- KU-ran ko SU-ran kar lo…- sadbuddhi aa jayegi…- puri kaum sudhar jayegi…- lekin tum sunte hi nahi.- KUwarji, kuchh to bolo….

  16. saras कहते हैं:

    >- yahi sabit karta hai ki VED kitne prachin hain.- tum apni pushto ko gin ne baithoge to 1700 saal pehle jaakar tumhari ginti ruk jayegi…- lekin hinduvo ki ginti kaha thaharegi?- hame bhi nahi pata…thik hai?- sanatan dharm islam se jyada prachin hai.- tum ise jhooth sabit nahi kar sakte.- kuchh bhi kar lo…- jab tumhare sall. miya dharti par aaye, usse pehle se hamare purkhe is dharti par maujood the…- aur katl-e-aam ke alawa deegar gyan prapt kar rahe the aur prem ka sandesh faila rahe the…- vaise mere vichar me kitab hi sare jhagdo ki jad hai.- mazhab nahi sikhata aapas me bair karna- lekin kitab sikhati hai.- KAM SE KAM…- kuran to sikhati hi hai…- iska maksad hai puri duniya ko islamic state banana- aur wohi aaj chal rahi jang ka sabab hai.- maine tumhe sahi salah di thi…- KU-ran ko SU-ran kar lo…- sadbuddhi aa jayegi…- puri kaum sudhar jayegi…- lekin tum sunte hi nahi.- KUwarji, kuchh to bolo….

  17. >इसी विषय पर इसकी अगली नशिस्त में आगे भी पढिये "अब भी न जागे तो"

  18. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >इसी विषय पर इसकी अगली नशिस्त में आगे भी पढिये "अब भी न जागे तो"

  19. बवाल कहते हैं:

    >अरे सलीम मियाँ आपको पूरी कहानी नहीं मालूम लगता है। जब कृष्णा मेनन चुप रह गए तो उनके सचिव मुहम्मद बवाल से रहा नहीं गया। उसने तुरंत बतला दिया के ब्रह्माजी ने वेदों की झिरॉक्स कापियाँ, इस्लाम के सबसे बड़े ठेकेदार सलीम मियाँ नामक एक मुसलमान को छोड़कर सभी मानवों को बँटवा दी थी । आप लोग इतनी सी बात भी नहीं जानते क्या ? नामालूम क्यूँ ?हा हा कोई बात नहीं भाईजान हम एक कॉपी आपको भी दिलवा देंगे, राईट टु इन्फ़र्मेशन के तहत। आप हमारे मज़हब को शोहरत कम कम और थू-थू ज़्यादा दिलवा रहे हैं मियाँ। यदि दिल में मोहम्मद (सल्ल.)साहब के लिए ज़रा भी इज़्ज़त बाक़ी रखते हैं आप, तो बाज़ आ जाइए भाई। ऊपर वाले को क्या आपकी पैरवी की ज़रूरत है ? अरे उनकी शान में गुस्ताखी़ न खु़द कीजिएगा ना दूसरॊं से करवाइएगा। खै़र आप समझदार हैं, यदि हमें अपना समझते होंगे तो गौ़र फ़रमाएंगे हमारी बात पर। वरना आज के दौर में………खै़र जाने दीजिए, हमारी बात का बुरा मत मानिएगा। फ़ीअमानल्लाह ।

  20. बवाल कहते हैं:

    >अरे सलीम मियाँ आपको पूरी कहानी नहीं मालूम लगता है। जब कृष्णा मेनन चुप रह गए तो उनके सचिव मुहम्मद बवाल से रहा नहीं गया। उसने तुरंत बतला दिया के ब्रह्माजी ने वेदों की झिरॉक्स कापियाँ, इस्लाम के सबसे बड़े ठेकेदार सलीम मियाँ नामक एक मुसलमान को छोड़कर सभी मानवों को बँटवा दी थी । आप लोग इतनी सी बात भी नहीं जानते क्या ? नामालूम क्यूँ ?हा हा कोई बात नहीं भाईजान हम एक कॉपी आपको भी दिलवा देंगे, राईट टु इन्फ़र्मेशन के तहत। आप हमारे मज़हब को शोहरत कम कम और थू-थू ज़्यादा दिलवा रहे हैं मियाँ। यदि दिल में मोहम्मद (सल्ल.)साहब के लिए ज़रा भी इज़्ज़त बाक़ी रखते हैं आप, तो बाज़ आ जाइए भाई। ऊपर वाले को क्या आपकी पैरवी की ज़रूरत है ? अरे उनकी शान में गुस्ताखी़ न खु़द कीजिएगा ना दूसरॊं से करवाइएगा। खै़र आप समझदार हैं, यदि हमें अपना समझते होंगे तो गौ़र फ़रमाएंगे हमारी बात पर। वरना आज के दौर में………खै़र जाने दीजिए, हमारी बात का बुरा मत मानिएगा। फ़ीअमानल्लाह ।

  21. >सलीम हम लाए थे किसी की हिम्मत हो तो झूठा करके बताए हम को

  22. >सलीम हम लाए थे किसी की हिम्मत हो तो झूठा करके बताए हम को

  23. Anonymous कहते हैं:

    >लगता है सलीम खान के रूप मैं इस्लाम को नया पैगंबर मिल गया है … बधाई ही भाई जान …

  24. Anonymous कहते हैं:

    >लगता है सलीम खान के रूप मैं इस्लाम को नया पैगंबर मिल गया है … बधाई ही भाई जान …

  25. mahashakti कहते हैं:

    >श्री बवाल जी आपका कहना ठीक है, न गुस्‍ताखी करो न करने दो, अब ये मियां खुद तो कर ही रहे है सबसे बुरी बात तो यह है कि अल्‍लाह के प्रति करने के लिये उकसा रहे है, यही है इनकी अल्‍लाह के प्रति समर्पण ?

  26. महाशक्ति कहते हैं:

    >श्री बवाल जी आपका कहना ठीक है, न गुस्‍ताखी करो न करने दो, अब ये मियां खुद तो कर ही रहे है सबसे बुरी बात तो यह है कि अल्‍लाह के प्रति करने के लिये उकसा रहे है, यही है इनकी अल्‍लाह के प्रति समर्पण ?

  27. mythbuster कहते हैं:

    >मैं तो कहता हूँ कि वेद ही नहीं कोई भी ग्रन्थ ईश्वरीय नही् है। यह ईश्वरीय होने या न होने का जो हल्ला है कोई पु्ख्ता सबूत है किसी के भी पास किसी ग्रंथ के ईश्वरीय होने का ? आज की बात तो जाने दीजिये, सभी ईश्वरीय ग्रंथों के रचनाकार के जीवन में भी तथ्यविश्वासी और सत्यसाधकों ने ग्रंथों के ईश्वरीय होने को नकारा है।कारण सीधा सा है ईश्वर की अवधारणा स्वयं मानव दिमाग की उपज है, In the beginning there was man, once he had a lot of spare time…to kill the boredom he created GOD…and has not lived peacefully thereafter. अब जो चीज है ही नहीं केवल mental realm में अस्तित्व है उसका वह कैसे कोई ग्रंथ की रचना कर सकती है?अगर आप में से कोई मुझे जवाब देना चाहता है तो कृपया आस्था, विश्वास आदि तर्कों का प्रयोग न करें और न ही किसी धर्न ग्रंथ का हवाला दें!

  28. mythbuster कहते हैं:

    >मैं तो कहता हूँ कि वेद ही नहीं कोई भी ग्रन्थ ईश्वरीय नही् है। यह ईश्वरीय होने या न होने का जो हल्ला है कोई पु्ख्ता सबूत है किसी के भी पास किसी ग्रंथ के ईश्वरीय होने का ? आज की बात तो जाने दीजिये, सभी ईश्वरीय ग्रंथों के रचनाकार के जीवन में भी तथ्यविश्वासी और सत्यसाधकों ने ग्रंथों के ईश्वरीय होने को नकारा है।कारण सीधा सा है ईश्वर की अवधारणा स्वयं मानव दिमाग की उपज है, In the beginning there was man, once he had a lot of spare time…to kill the boredom he created GOD…and has not lived peacefully thereafter. अब जो चीज है ही नहीं केवल mental realm में अस्तित्व है उसका वह कैसे कोई ग्रंथ की रचना कर सकती है?अगर आप में से कोई मुझे जवाब देना चाहता है तो कृपया आस्था, विश्वास आदि तर्कों का प्रयोग न करें और न ही किसी धर्न ग्रंथ का हवाला दें!

  29. >the below comment is for Indianwomanhasarrived because they are deleting my answer बहन रचना, आपने मेरा दूसरा कमेन्ट जिसमें आपके सवाल का हल था आपने डिलीट कर दिया. ख़ैर कोई बात नहीं. ईश्वर आपको सदबुद्धि दे. मैं आपसे फिर गुजारिश करता हूँ कि आप आगे बढ़ने से पहले आप निम्न किताबों का अध्ययन करें तो इंशा अल्लाह आपको पता चल जायेगा कि इस्लाम नारी के बारे में क्या कहता है और इस्लाम में नारी का क्या स्थान है…वह किताबें निम्न हैं…http://islamicwebdunia.com/hame%20khuda%20kese%20mila.pdfऔरhttp://www.islamhouse.com/p/223546आपने लिखा था कि "और एक बाद ध्यान रखना सलीम भाई , आप के धर्म मे भी अगर एक औरत किसी को भाई कह दे तो उसको गाली नहीं देते हैं और ना ही उस से बदजुबानी कर ते हैं सो अगर एक भी अपशब्द आप का या आप की किसी भी मुस्लिम भाई का इस पोस्ट पर आया तो मै यहीं मानूगी की आप सच्चे मुसलमान नहीं होआप की बहिनरचनाआप के जवाब के इंतज़ार मे"तो मैंने आपको बहन कहा और एक बहन से यह भाई यही चाहता है कि अगर आपको वाकई सत्य ज्ञान की शदीद (अति) प्यास है तो बातों को सार्थक रूप से ही किया जाये. आपके पास भी वक़्त है और मेरे पास भी. यह महज़ एक पोस्ट की बात नहीं. आप इत्मीनान से इन दो किताबोब का मुताला (अध्ययन) करें और फिर इंशा अल्लाह आपको परम शक्ति संम्पन्न हिदायत देना चाहेगा तो अवश्य आप मुत्तास्सिर (प्रभावित) होंगी. हमारा काम तो बस अल्लाह का सन्देश मानव मात्र तक पहुँचाना है और हिदायत तो बस अल्लाह ही देता है. (मैंने आपका प्रोफाइल देखा है आप उम्र के लिहाज़ से मुझसे बहुत बड़ी हैं, अल्लाह से दुआ है आपको सदबुद्धि दे) आपका छोटा भाईसलीम खान

  30. Anonymous कहते हैं:

    >इसे ही कहते है अधजल गगरी छलकत जाये !क्या आप जानते है वेदो को श्रुति भी कहते है ?क्या आपको श्रुति का अर्थ ज्ञात है ?क्या आप जानते है वेदो का ज्ञान ऋषियो को ब्रह्म ने तपस्या मे प्रदान किया था ?क्या आप जानते है ब्रह्म का अर्थ क्या है ?क्या आपको लगता है ब्रह्म का अर्थ ईश्वर है ?क्या आप 'अह्म ब्रह्मस्मी'का अर्थ जानते है ?क्या आप जानते है वेद एक ही थे ?क्या आप जानते है कि वेद सँहिता , सूक्त और मँत्रो मे विभाजित है ?क्या आप जानते है कि हर मँत्र के साथ एक ऋषि का नाम जुडा हुआ है ?क्या आप जानते है द्वापर युग के अन्त मे वेदो को चार भागो मे बाँटा गया ? किस आधार पर ?क्या आप जानते है वेदो को श्रुति से लिखित रूप मे परिवर्तित करने का कार्य किसने किया ?क्या आप जानते है वेदो की रचना कब हुयी ?आपसे किसने कह दिया कि जे कृष्णमूर्ति वेदो के ज्ञाता है या सनातन (वैदिक) धर्म के ज्ञाता है ? जे कृष्णमूर्ती और थियासाफीकल सोसायटी के रिश्ते के बारे मे क्या जानते है ?थियासाफीकल सोसायटी बौध्द धर्म के सिद्धाँतो से ज्यादा समीप है या सनातन (वैदिक) धर्म के ?वेद के रचियता कौन है अथवा इसे इसे किसने लाया ? इस प्रश्न का उत्तर ना जानने से क्या सिद्ध होता है ? उत्तर ना देने वाले का सीमीत ज्ञान अथवा वेद देववाणी नही है ?किसी भी विषय पर कोई भी प्रश्न पूछने से पहले अपने ज्ञान को परिपूर्ण करेँ !

  31. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >the below comment is for Indianwomanhasarrived because they are deleting my answer बहन रचना, आपने मेरा दूसरा कमेन्ट जिसमें आपके सवाल का हल था आपने डिलीट कर दिया. ख़ैर कोई बात नहीं. ईश्वर आपको सदबुद्धि दे. मैं आपसे फिर गुजारिश करता हूँ कि आप आगे बढ़ने से पहले आप निम्न किताबों का अध्ययन करें तो इंशा अल्लाह आपको पता चल जायेगा कि इस्लाम नारी के बारे में क्या कहता है और इस्लाम में नारी का क्या स्थान है…वह किताबें निम्न हैं…http://islamicwebdunia.com/hame%20khuda%20kese%20mila.pdfऔरhttp://www.islamhouse.com/p/223546आपने लिखा था कि "और एक बाद ध्यान रखना सलीम भाई , आप के धर्म मे भी अगर एक औरत किसी को भाई कह दे तो उसको गाली नहीं देते हैं और ना ही उस से बदजुबानी कर ते हैं सो अगर एक भी अपशब्द आप का या आप की किसी भी मुस्लिम भाई का इस पोस्ट पर आया तो मै यहीं मानूगी की आप सच्चे मुसलमान नहीं होआप की बहिनरचनाआप के जवाब के इंतज़ार मे"तो मैंने आपको बहन कहा और एक बहन से यह भाई यही चाहता है कि अगर आपको वाकई सत्य ज्ञान की शदीद (अति) प्यास है तो बातों को सार्थक रूप से ही किया जाये. आपके पास भी वक़्त है और मेरे पास भी. यह महज़ एक पोस्ट की बात नहीं. आप इत्मीनान से इन दो किताबोब का मुताला (अध्ययन) करें और फिर इंशा अल्लाह आपको परम शक्ति संम्पन्न हिदायत देना चाहेगा तो अवश्य आप मुत्तास्सिर (प्रभावित) होंगी. हमारा काम तो बस अल्लाह का सन्देश मानव मात्र तक पहुँचाना है और हिदायत तो बस अल्लाह ही देता है. (मैंने आपका प्रोफाइल देखा है आप उम्र के लिहाज़ से मुझसे बहुत बड़ी हैं, अल्लाह से दुआ है आपको सदबुद्धि दे) आपका छोटा भाईसलीम खान

  32. Anonymous कहते हैं:

    >इसे ही कहते है अधजल गगरी छलकत जाये !क्या आप जानते है वेदो को श्रुति भी कहते है ?क्या आपको श्रुति का अर्थ ज्ञात है ?क्या आप जानते है वेदो का ज्ञान ऋषियो को ब्रह्म ने तपस्या मे प्रदान किया था ?क्या आप जानते है ब्रह्म का अर्थ क्या है ?क्या आपको लगता है ब्रह्म का अर्थ ईश्वर है ?क्या आप 'अह्म ब्रह्मस्मी'का अर्थ जानते है ?क्या आप जानते है वेद एक ही थे ?क्या आप जानते है कि वेद सँहिता , सूक्त और मँत्रो मे विभाजित है ?क्या आप जानते है कि हर मँत्र के साथ एक ऋषि का नाम जुडा हुआ है ?क्या आप जानते है द्वापर युग के अन्त मे वेदो को चार भागो मे बाँटा गया ? किस आधार पर ?क्या आप जानते है वेदो को श्रुति से लिखित रूप मे परिवर्तित करने का कार्य किसने किया ?क्या आप जानते है वेदो की रचना कब हुयी ?आपसे किसने कह दिया कि जे कृष्णमूर्ति वेदो के ज्ञाता है या सनातन (वैदिक) धर्म के ज्ञाता है ? जे कृष्णमूर्ती और थियासाफीकल सोसायटी के रिश्ते के बारे मे क्या जानते है ?थियासाफीकल सोसायटी बौध्द धर्म के सिद्धाँतो से ज्यादा समीप है या सनातन (वैदिक) धर्म के ?वेद के रचियता कौन है अथवा इसे इसे किसने लाया ? इस प्रश्न का उत्तर ना जानने से क्या सिद्ध होता है ? उत्तर ना देने वाले का सीमीत ज्ञान अथवा वेद देववाणी नही है ?किसी भी विषय पर कोई भी प्रश्न पूछने से पहले अपने ज्ञान को परिपूर्ण करेँ !

  33. rohit कहते हैं:

    >यह लोग क्या जाने की सनातन धर्म क्यों महान है यह तो अभी सनातन धर्म के आयेज बच्चे ही है इनकी उम्र मात्र १७०० साल है और फिर मैं यह पूछता हूँ की अगर जो खुदा खुदा इतना यह सलीम चिल्ला रहा है मेरी इतनी सी बात का जवाब दे दे की अगर इनका अल्लाह इतना ही ताकतवर है तो कटे हुए माफी चाहूँगा ख़तने किए हुए मुसलमान ही पैदा क्यों नही करता क्यों एक हिंदू बच्चे को पैदा करता है जिसे यह कठमुल्ले ख़तना कर के मुसलमान बना देते है

  34. rohit कहते हैं:

    >यह लोग क्या जाने की सनातन धर्म क्यों महान है यह तो अभी सनातन धर्म के आयेज बच्चे ही है इनकी उम्र मात्र १७०० साल है और फिर मैं यह पूछता हूँ की अगर जो खुदा खुदा इतना यह सलीम चिल्ला रहा है मेरी इतनी सी बात का जवाब दे दे की अगर इनका अल्लाह इतना ही ताकतवर है तो कटे हुए माफी चाहूँगा ख़तने किए हुए मुसलमान ही पैदा क्यों नही करता क्यों एक हिंदू बच्चे को पैदा करता है जिसे यह कठमुल्ले ख़तना कर के मुसलमान बना देते है

  35. Anonymous कहते हैं:

    >उपर की टिप्पणी मे एक गलती है, कृष्ण मेनन और जे कृष्णमूर्ती का घालमेल हो गया है|इस भाग को नजर अँदाज करेआपसे किसने कह दिया कि जे कृष्णमूर्ति वेदो के ज्ञाता है या सनातन (वैदिक) धर्म के ज्ञाता है ? जे कृष्णमूर्ती और थियासाफीकल सोसायटी के रिश्ते के बारे मे क्या जानते है ?थियासाफीकल सोसायटी बौध्द धर्म के सिद्धाँतो से ज्यादा समीप है या सनातन (वैदिक) धर्म के ?

  36. sneha कहते हैं:

    >सलीम जी,यदि आपको किसी बात के बारे में पता ना हो तो इसका यह मतलब नही है कि वो बात है ही नहीं अथवा वह बात गलत है.वेदों की रचना महर्षि व्यास जी ने की है. वे त्रिकालज्ञ थे तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जायेंगे। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिन, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया। वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवे वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है।। पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढ़ाया। व्यास जी के शिष्योंने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएँ और उप शाखाएँ बना दीं।पौराणिक-महाकाव्य युग की महान विभूति, महाभारत, अट्ठारह पुराण, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग ३००० ई. पूर्व में हुआ था। वेदांत दर्शन, अद्वैतवाद के संस्थापक वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। पत्नी आरुणी से उत्पन्न इनके पुत्र थे महान बाल योगी शुकदेव।शंका का समाधान हुआ अथवा नही सलीम जी.

  37. Anonymous कहते हैं:

    >उपर की टिप्पणी मे एक गलती है, कृष्ण मेनन और जे कृष्णमूर्ती का घालमेल हो गया है|इस भाग को नजर अँदाज करेआपसे किसने कह दिया कि जे कृष्णमूर्ति वेदो के ज्ञाता है या सनातन (वैदिक) धर्म के ज्ञाता है ? जे कृष्णमूर्ती और थियासाफीकल सोसायटी के रिश्ते के बारे मे क्या जानते है ?थियासाफीकल सोसायटी बौध्द धर्म के सिद्धाँतो से ज्यादा समीप है या सनातन (वैदिक) धर्म के ?

  38. sneha कहते हैं:

    >सलीम जी,यदि आपको किसी बात के बारे में पता ना हो तो इसका यह मतलब नही है कि वो बात है ही नहीं अथवा वह बात गलत है.वेदों की रचना महर्षि व्यास जी ने की है. वे त्रिकालज्ञ थे तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जायेंगे। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिन, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया। वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवे वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है।। पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढ़ाया। व्यास जी के शिष्योंने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएँ और उप शाखाएँ बना दीं।पौराणिक-महाकाव्य युग की महान विभूति, महाभारत, अट्ठारह पुराण, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग ३००० ई. पूर्व में हुआ था। वेदांत दर्शन, अद्वैतवाद के संस्थापक वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। पत्नी आरुणी से उत्पन्न इनके पुत्र थे महान बाल योगी शुकदेव।शंका का समाधान हुआ अथवा नही सलीम जी.

  39. rohit कहते हैं:

    >सलीम भाई आप मे खुद की कोई समझ नही है जो आइ आर एफ का प्रेसीडेंट जाकिर नायक बोलता है उसे ही सही मान लेते हो क्योंकि तुम कुए के मेडक हो कुआ ही तुम्हारी दुनिया है और जाकिर नायक एक दूसरे कुए से आया हुआ मेडक जो जो तुम्हे उल जलूल बातें बताता है और तुम उन्हे सही मान लेते हो क्योंकि खुद की तो कोई समझ नही है सिर्फ़ कॉपी पेस्ट करना जानते हो आइ आर एफ डॉट नेट से या अनुवाद करना जानते हो बहुत ही दुख होता है तुम्हारी जहालत पर वेदो उपनिषद् के बारे मे तुम ना जानते हो ना जान सकते हो क्योंकि उनकी विषय वास्तु तुम्हारे छोटे से दिमाग़ मे नही आने वाली रही बात ईसा की तो भाई अगर तुम थोड़े ही पड़े लिखे हो तो इतना बता दो की बिनसहवास के बच्चे कैसे पैदा हो सकते है ज़रा वैज्ञानिक तरीके से सोचो यदि नही हो सकते तो ईसा कैसे हुए यदि हो सकते है तो तुम कर के दिखा दो. तो फिर यह ईसाई क्या जाने जो खुद इतने कुपमांडूक है . वेद मे आयुर्वेद है जो अनॅटमी फिज़ियालजी पेतॉलजी मेडिसिन का एक संपूर्ण ग्रंथ है वेद वैज्ञानिक ज्ञान पर सही उतरते है इनमे कोई उल्जालूल बाते नही है जो है वो हमारे महान ऋषियों के ज्ञान द्वारा अर्जित बाते हैं सलीम भाई अगर थोड़ा बहुत वेदो उपनिषद् के बारे मे जानना चाहते हो तो ज़्यादा नही हिस्टरी की थोड़ी कितबे पड़ लो. ओहो मैं माफी चाहता हूँ की आपको थोड़ा दिमाग़ लगाना होगा इन्हे पड़ने मे जो की आप के पास तो है ही नही

  40. rohit कहते हैं:

    >सलीम भाई आप मे खुद की कोई समझ नही है जो आइ आर एफ का प्रेसीडेंट जाकिर नायक बोलता है उसे ही सही मान लेते हो क्योंकि तुम कुए के मेडक हो कुआ ही तुम्हारी दुनिया है और जाकिर नायक एक दूसरे कुए से आया हुआ मेडक जो जो तुम्हे उल जलूल बातें बताता है और तुम उन्हे सही मान लेते हो क्योंकि खुद की तो कोई समझ नही है सिर्फ़ कॉपी पेस्ट करना जानते हो आइ आर एफ डॉट नेट से या अनुवाद करना जानते हो बहुत ही दुख होता है तुम्हारी जहालत पर वेदो उपनिषद् के बारे मे तुम ना जानते हो ना जान सकते हो क्योंकि उनकी विषय वास्तु तुम्हारे छोटे से दिमाग़ मे नही आने वाली रही बात ईसा की तो भाई अगर तुम थोड़े ही पड़े लिखे हो तो इतना बता दो की बिनसहवास के बच्चे कैसे पैदा हो सकते है ज़रा वैज्ञानिक तरीके से सोचो यदि नही हो सकते तो ईसा कैसे हुए यदि हो सकते है तो तुम कर के दिखा दो. तो फिर यह ईसाई क्या जाने जो खुद इतने कुपमांडूक है . वेद मे आयुर्वेद है जो अनॅटमी फिज़ियालजी पेतॉलजी मेडिसिन का एक संपूर्ण ग्रंथ है वेद वैज्ञानिक ज्ञान पर सही उतरते है इनमे कोई उल्जालूल बाते नही है जो है वो हमारे महान ऋषियों के ज्ञान द्वारा अर्जित बाते हैं सलीम भाई अगर थोड़ा बहुत वेदो उपनिषद् के बारे मे जानना चाहते हो तो ज़्यादा नही हिस्टरी की थोड़ी कितबे पड़ लो. ओहो मैं माफी चाहता हूँ की आपको थोड़ा दिमाग़ लगाना होगा इन्हे पड़ने मे जो की आप के पास तो है ही नही

  41. खुर्शीद अहमद कहते हैं:

    >हिन्दू धर्म के दो स्रोत हैं. श्रुति और स्मृति. ये मुझे भी पता है और सलीम को भी. आप लगता है इस ब्लॉग को ध्यान से नहीं पढ़ते.

  42. खुर्शीद अहमद कहते हैं:

    >हिन्दू धर्म के दो स्रोत हैं. श्रुति और स्मृति. ये मुझे भी पता है और सलीम को भी. आप लगता है इस ब्लॉग को ध्यान से नहीं पढ़ते.

  43. rangeela rasul कहते हैं:

    >saleem khan aajkal rangeela rasul padh rahe hai kal se voh bhi chapegi tab ye usame uthe savalo ka bhi jvaab denge . ki rasul kitana rangeela tha aur uski rangeele harakate hi saleem jaise haramiyo ko is jaha me laee kinhe bad me muslaman kaha gaya ……….

  44. rangeela rasul कहते हैं:

    >saleem khan aajkal rangeela rasul padh rahe hai kal se voh bhi chapegi tab ye usame uthe savalo ka bhi jvaab denge . ki rasul kitana rangeela tha aur uski rangeele harakate hi saleem jaise haramiyo ko is jaha me laee kinhe bad me muslaman kaha gaya ……….

  45. Anonymous कहते हैं:

    >सलीम खान के इस ब्लाग की पोस्टों का असर:हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति बुरा भाव जगाता हैसलीम खान के इस ब्लाग की पोस्टों की कमेंट्स का असर:मुसलमानों के मन में हिंदुओं के प्रति बुरा भाव जगाता है.(क्योंकि हिंदू भाई गुस्से में कमेंट्स करते हैं)अब इस नफ़रत से फ़ायदा किसे होता है?पाकिस्तान और आतंकवादियों को. क्योंकि वही भारत को तोड़ना चाहते हैं.// इससे किसी भी प्रकार का कोई फ़ायदा इस्लाम को नही होता है बल्कि उसका मजाक बनता जा रहा है.// अब चूंकि इससे फ़ायदा पाकिस्तान और आतंकवादियों को हो रहा है तो क्यों ना देशहित में इस ब्लाग को "हेट स्पीच" के लिये रिपोर्ट किया जाए. आजकल तो भारत में भी पुलिस की साइबर सेल है.

  46. Anonymous कहते हैं:

    >सलीम खान के इस ब्लाग की पोस्टों का असर:हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति बुरा भाव जगाता हैसलीम खान के इस ब्लाग की पोस्टों की कमेंट्स का असर:मुसलमानों के मन में हिंदुओं के प्रति बुरा भाव जगाता है.(क्योंकि हिंदू भाई गुस्से में कमेंट्स करते हैं)अब इस नफ़रत से फ़ायदा किसे होता है?पाकिस्तान और आतंकवादियों को. क्योंकि वही भारत को तोड़ना चाहते हैं.// इससे किसी भी प्रकार का कोई फ़ायदा इस्लाम को नही होता है बल्कि उसका मजाक बनता जा रहा है.// अब चूंकि इससे फ़ायदा पाकिस्तान और आतंकवादियों को हो रहा है तो क्यों ना देशहित में इस ब्लाग को "हेट स्पीच" के लिये रिपोर्ट किया जाए. आजकल तो भारत में भी पुलिस की साइबर सेल है.

  47. rohit कहते हैं:

    >Question Is it not true that Prophet Muhammad (pbuh) has copied the Qur’an from the Bible?AnswerMany critics allege that Prophet Muhummad (pbuh) himself was not the author of the Qur’an but he learnt it and/or plagiarised (copied or adapted) it from other human sources or from previous scriptures or revelations.

  48. rohit कहते हैं:

    >Question Is it not true that Prophet Muhammad (pbuh) has copied the Qur’an from the Bible?AnswerMany critics allege that Prophet Muhummad (pbuh) himself was not the author of the Qur’an but he learnt it and/or plagiarised (copied or adapted) it from other human sources or from previous scriptures or revelations.

  49. rohit कहते हैं:

    >this question answer has been published in irf.net

  50. rohit कहते हैं:

    >this question answer has been published in irf.net

  51. rohit कहते हैं:

    >mr salim kindly read irf.net before wrighting any thing this question answer has been given by ur favouret dr jakir naik in irf.net. the most surprising thing for me that a link has been provided by urself on ur blog but u had not gone through it at all.

  52. rohit कहते हैं:

    >mr salim kindly read irf.net before wrighting any thing this question answer has been given by ur favouret dr jakir naik in irf.net. the most surprising thing for me that a link has been provided by urself on ur blog but u had not gone through it at all.

  53. rohit कहते हैं:

    >Some Pagans accused the Prophet of learning the Qur’an from a Roman Blacksmith, who was a Christian staying at the outskirts of Makkah. The Prophet very often used to go and watch him do his work. A revelation of the Qur’an was sufficient to dismiss this charge – the Qur’an says in Surah An-Nahl chapter 16 verse 103: "We know indeed that they say, ‘It is a man that teaches him,’ The tongue of him they wickedly point to is notably foreign, while this is Arabic, pure and clear." [Al-Qur’an 16:103]

  54. rohit कहते हैं:

    >Some Pagans accused the Prophet of learning the Qur’an from a Roman Blacksmith, who was a Christian staying at the outskirts of Makkah. The Prophet very often used to go and watch him do his work. A revelation of the Qur’an was sufficient to dismiss this charge – the Qur’an says in Surah An-Nahl chapter 16 verse 103: "We know indeed that they say, ‘It is a man that teaches him,’ The tongue of him they wickedly point to is notably foreign, while this is Arabic, pure and clear." [Al-Qur’an 16:103]

  55. rohit कहते हैं:

    >there is not any concrete statement in qur'a regarding its origin.

  56. rohit कहते हैं:

    >there is not any concrete statement in qur'a regarding its origin.

  57. Satyajeetprakash कहते हैं:

    >श्रुयताम, श्रुयतामआशु मार्ग: नव: कोअपि प्रस्तुयताम

  58. Satyajeetprakash कहते हैं:

    >श्रुयताम, श्रुयतामआशु मार्ग: नव: कोअपि प्रस्तुयताम

  59. rohit कहते हैं:

    >what happend dear salim no answer from ur side. shayad aaina dekh liya aapne

  60. rohit कहते हैं:

    >what happend dear salim no answer from ur side. shayad aaina dekh liya aapne

  61. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >सलीम जी, आपको मैंने अपनी पूर्व की टिप्पणियों में भी कहा है कि कृपया आलोचना-समालोचना जो भी करें किंतु सर्वप्रथम उस विषय का सम्यक्‌ अध्ययन अवश्य कर लें। जैसे तुम्हे या कैरानवी को "कुर-आन" को "कुरान" लिखने वाले लोगों पर गुस्सा आता है, वैसे ही जब तुम संस्कृत उक्तियों का गलत प्रयोग करते हो तो हमें (खासकर मुझे-कारण कि मैं संस्कृत का ही छात्र हूं, यदि विश्वास ना हो तो मेरा प्रोफाइल देख लो) बहुत गुस्सा आता है। अस्तु, ये तुम्हारे जैसे अज्ञानी या अधकचरा ज्ञान वाले इस तरह की शंका उठाते हैं कि "यदि वेद (VED) देववाणी है तो इसे लाने वाला ईशदूत कौन था?"यदि थोड़ी भी समझ रखना चाहो तो "वेद" शब्द की व्युत्पत्ति ही तुम्हारी शंका का समाधान कर देगी। दूसरी बात तुम्हारा धर्म "सेमेटिक" कोटि में आता है, जहां एक इंसान मुहम्मद पैगंबर माना जाता है, एक किताब कुर-आन, सभी ज्ञानों पर भारी है। इस तरह की अवधारणाएं मूलतः अन्य व्यक्तियों की चिन्तन-शक्ति पर कुठाराघात करती है, और यह साबित कराना चाहती है कि मुहम्मद के अलावा किसी अन्य मां की कोख से पैदा हुआ व्यक्ति ना तो कुछ सोच सकता है, ना ही नई दिशा दिखा सकता है। शायद तुम्हे पता नहीं कि मुहम्मद के पूर्व बुद्ध, महावीर इत्यादि कितने ही महात्माओं ने विश्व को ऊर्जस्वित किया है और मुहम्मद के बाद भी कितने मनीषियों ने पथ को आलोकित किया है।पुनश्च विषयांतर न होते हुए मैं यही कहूंगा कि वेदों के पौरुषेयत्व अथवा अपौरुषेयत्व के बारे में थोड़ा सा मीमांसा-दर्शन का अध्ययन कर लो। हालांकि, यह भी पता है कि तुम जैसे हुआं-हुआं करने वाले इस पर कान नहीं देंगे। तुम्हे तो जाकिर इत्यादि से मिलने वाली वमन का ही रसपान करते रहना है।

  62. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >सलीम जी, आपको मैंने अपनी पूर्व की टिप्पणियों में भी कहा है कि कृपया आलोचना-समालोचना जो भी करें किंतु सर्वप्रथम उस विषय का सम्यक्‌ अध्ययन अवश्य कर लें। जैसे तुम्हे या कैरानवी को "कुर-आन" को "कुरान" लिखने वाले लोगों पर गुस्सा आता है, वैसे ही जब तुम संस्कृत उक्तियों का गलत प्रयोग करते हो तो हमें (खासकर मुझे-कारण कि मैं संस्कृत का ही छात्र हूं, यदि विश्वास ना हो तो मेरा प्रोफाइल देख लो) बहुत गुस्सा आता है। अस्तु, ये तुम्हारे जैसे अज्ञानी या अधकचरा ज्ञान वाले इस तरह की शंका उठाते हैं कि "यदि वेद (VED) देववाणी है तो इसे लाने वाला ईशदूत कौन था?"यदि थोड़ी भी समझ रखना चाहो तो "वेद" शब्द की व्युत्पत्ति ही तुम्हारी शंका का समाधान कर देगी। दूसरी बात तुम्हारा धर्म "सेमेटिक" कोटि में आता है, जहां एक इंसान मुहम्मद पैगंबर माना जाता है, एक किताब कुर-आन, सभी ज्ञानों पर भारी है। इस तरह की अवधारणाएं मूलतः अन्य व्यक्तियों की चिन्तन-शक्ति पर कुठाराघात करती है, और यह साबित कराना चाहती है कि मुहम्मद के अलावा किसी अन्य मां की कोख से पैदा हुआ व्यक्ति ना तो कुछ सोच सकता है, ना ही नई दिशा दिखा सकता है। शायद तुम्हे पता नहीं कि मुहम्मद के पूर्व बुद्ध, महावीर इत्यादि कितने ही महात्माओं ने विश्व को ऊर्जस्वित किया है और मुहम्मद के बाद भी कितने मनीषियों ने पथ को आलोकित किया है।पुनश्च विषयांतर न होते हुए मैं यही कहूंगा कि वेदों के पौरुषेयत्व अथवा अपौरुषेयत्व के बारे में थोड़ा सा मीमांसा-दर्शन का अध्ययन कर लो। हालांकि, यह भी पता है कि तुम जैसे हुआं-हुआं करने वाले इस पर कान नहीं देंगे। तुम्हे तो जाकिर इत्यादि से मिलने वाली वमन का ही रसपान करते रहना है।

  63. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >==========पुनश्च: तुम्हारे लिए मीमांसा का यह विचार "वेद से पुरुष का संबंध" यहां दे रहा हूं इसे पढ़ लो, और फिर भी ना समझ में आए तो मुझसे सम्पर्क करो, तुम्हे इस विषयक और भी सामग्री उपलब्ध करा दूंगा…."पदार्थ-प्रतिपादन में संकेत द्वारा शब्द से पदार्थों का , वाक्यार्थ-प्रतिपादन में ग्रंथ का , और रचना द्वारा (पद का) पुरुष का त्रिधा संबंध होता है। शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचक-संबंध नित्य मानकर वेद में पुरुष-प्रवेश का खंडन किया गया है। अर्थात् , वेद पुरुष के द्वारा प्रणीत हैं -ऐसा कहने का कारण यह है कि हमनें वाक्यों को बिना व्यक्ति के कभी नहीं सुना , पढा या जाना है । जबकि मीमांसकों के मत में शब्द(पद या वाक्य) तथा उसके द्वारा प्रतिपाद्य घटपटादि-अर्थ का सम्बन्ध नित्य है । अतः 'ये पद इस अर्थ को बताता है'- इस बात का हमें पता न होने पर भी पद अपने प्रतिपाद्य को बताता ही है । अर्थात् शक्तिग्रह न होने पर भी पद में प्रतिपादनसामर्थ्य है ही । और वाक्यार्थ संबंध के द्वारा पुरुष संबंध को पृथक् करने के लिए वाक्याधिकरण की प्रवृत्ति है। इस अधिकरण में यथा पद की पदार्थ में शक्ति होती है, वैसे ही वाक्य की वाक्यार्थ में शक्ति होती है, ऐसे जो प्रतिपादन करते हैं उसकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि पद से उपस्थित पदार्थ ही आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति से अन्वित होकर अंशत्रय विशिष्ट भावनारूप वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता है। वैयाकरण मत से वाक्यार्थ वाक्यशक्ति से भासित होता है। इस मत के अनुसार शब्दबोध में पदार्थों का परस्पर संबंध संसर्ग मर्यादा से भासता है। यह नैयायिकों का मत है, जिससे वाक्य की वाक्यार्थ में पृथक् शक्ति की प्रतीति होती है, किंतु कुमारिल भट्ट ने अभिहितान्वय का समर्थन किया है। प्रभाकर ने अन्विताभिधान का समर्थन किया है। इस तरह वाक्यार्थ में पुरुष संडंध द्वितीय प्रकार से निरस्त हुआ। तृतीय प्रकार ग्रंथ रचना द्वारा होता है।संदर्भ वाक्य का पुरुष के साथ दो प्रकार से संबंध होता है, एक कर्तृ-कर्म-भाव-संबंध द्वारा और द्वितीय प्रयुक्त-प्रवचन-भाव-संबंध द्वारा होता है। प्रवचन सर्वसाधारण और रचना असाधारण होती है। असाधारण विशेषण होता है। अतएव वेद पौरुषेय है।कुछ विद्वानों के अनुसार वेदों में पुरुष, देश, नदी, वृक्ष आदि के निर्देश होने के कारण वेदों को पुरुषप्रणीत अथवा पौरुषेय कहते हैं, किंतु मीमांसा दर्शन के अनुसार प्रवचन भी असाधारण माना गया है। उदाहरणार्थ "कठसंहिता" अथवा "कठ ब्राह्मण" के विषय में किंवदंती है कि अनेक शाखा अध्यायियों के मध्य "कष्ट" महर्षि ने पूर्ण रूप से अध्ययन किया था। द्वितीय हेतु है कि वेद में पुरुष, नदी आदि का नाम आता है, इससे भी वेद पौरुषेय सिद्ध होता है, किंतु यह कल्पना चतुर-बुद्धि-विहित नहीं; क्योंकि प्राय: सर्वप्रथम सांसारिक वस्तुओं के नाम वेद से ही आए हैं, उसी दृष्टि से लोक -नाम की परंपरा चली है। अर्थात वेद इतिहास को अनित्य नहीं मानता, किंतु इतिहास के नित्यत्व का प्रतिपादन करता है, इसका विस्तृत विवेचन मीमांसा के "शाबरभाष्य" में दृष्टव्य है। नित्य विषय और वाक्य अथवा वचन को यथानुपूर्वी ब्रह्मर्षिगण समाधि में दर्शन करते हैं, अतएव वेद में पूर्वपुरुष कर्तृत्वकल्पना का लेश भी समावेश नहीं है।" लौकिक रचनाएँ पुरुष विशेष कर्तृत्व होने के कारण पौरुषेय हैं, यथा महाभारत, रामायण आदि।कुमारिल भट्ट के अनुसार अध्ययन परंपरा अनादि है। अतएव वेद भी अपौरुषेय हैं। ऐसे ही अधिकरण सिद्धांत न्याय से ही वेद ग्रंथ रचना के द्वारा पुरुष संबंध नहीं हो सकता, अतएव विधि वाक्य ही धर्म में प्रमाण है।"

  64. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >==========पुनश्च: तुम्हारे लिए मीमांसा का यह विचार "वेद से पुरुष का संबंध" यहां दे रहा हूं इसे पढ़ लो, और फिर भी ना समझ में आए तो मुझसे सम्पर्क करो, तुम्हे इस विषयक और भी सामग्री उपलब्ध करा दूंगा…."पदार्थ-प्रतिपादन में संकेत द्वारा शब्द से पदार्थों का , वाक्यार्थ-प्रतिपादन में ग्रंथ का , और रचना द्वारा (पद का) पुरुष का त्रिधा संबंध होता है। शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचक-संबंध नित्य मानकर वेद में पुरुष-प्रवेश का खंडन किया गया है। अर्थात् , वेद पुरुष के द्वारा प्रणीत हैं -ऐसा कहने का कारण यह है कि हमनें वाक्यों को बिना व्यक्ति के कभी नहीं सुना , पढा या जाना है । जबकि मीमांसकों के मत में शब्द(पद या वाक्य) तथा उसके द्वारा प्रतिपाद्य घटपटादि-अर्थ का सम्बन्ध नित्य है । अतः 'ये पद इस अर्थ को बताता है'- इस बात का हमें पता न होने पर भी पद अपने प्रतिपाद्य को बताता ही है । अर्थात् शक्तिग्रह न होने पर भी पद में प्रतिपादनसामर्थ्य है ही । और वाक्यार्थ संबंध के द्वारा पुरुष संबंध को पृथक् करने के लिए वाक्याधिकरण की प्रवृत्ति है। इस अधिकरण में यथा पद की पदार्थ में शक्ति होती है, वैसे ही वाक्य की वाक्यार्थ में शक्ति होती है, ऐसे जो प्रतिपादन करते हैं उसकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि पद से उपस्थित पदार्थ ही आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति से अन्वित होकर अंशत्रय विशिष्ट भावनारूप वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता है। वैयाकरण मत से वाक्यार्थ वाक्यशक्ति से भासित होता है। इस मत के अनुसार शब्दबोध में पदार्थों का परस्पर संबंध संसर्ग मर्यादा से भासता है। यह नैयायिकों का मत है, जिससे वाक्य की वाक्यार्थ में पृथक् शक्ति की प्रतीति होती है, किंतु कुमारिल भट्ट ने अभिहितान्वय का समर्थन किया है। प्रभाकर ने अन्विताभिधान का समर्थन किया है। इस तरह वाक्यार्थ में पुरुष संडंध द्वितीय प्रकार से निरस्त हुआ। तृतीय प्रकार ग्रंथ रचना द्वारा होता है।संदर्भ वाक्य का पुरुष के साथ दो प्रकार से संबंध होता है, एक कर्तृ-कर्म-भाव-संबंध द्वारा और द्वितीय प्रयुक्त-प्रवचन-भाव-संबंध द्वारा होता है। प्रवचन सर्वसाधारण और रचना असाधारण होती है। असाधारण विशेषण होता है। अतएव वेद पौरुषेय है।कुछ विद्वानों के अनुसार वेदों में पुरुष, देश, नदी, वृक्ष आदि के निर्देश होने के कारण वेदों को पुरुषप्रणीत अथवा पौरुषेय कहते हैं, किंतु मीमांसा दर्शन के अनुसार प्रवचन भी असाधारण माना गया है। उदाहरणार्थ "कठसंहिता" अथवा "कठ ब्राह्मण" के विषय में किंवदंती है कि अनेक शाखा अध्यायियों के मध्य "कष्ट" महर्षि ने पूर्ण रूप से अध्ययन किया था। द्वितीय हेतु है कि वेद में पुरुष, नदी आदि का नाम आता है, इससे भी वेद पौरुषेय सिद्ध होता है, किंतु यह कल्पना चतुर-बुद्धि-विहित नहीं; क्योंकि प्राय: सर्वप्रथम सांसारिक वस्तुओं के नाम वेद से ही आए हैं, उसी दृष्टि से लोक -नाम की परंपरा चली है। अर्थात वेद इतिहास को अनित्य नहीं मानता, किंतु इतिहास के नित्यत्व का प्रतिपादन करता है, इसका विस्तृत विवेचन मीमांसा के "शाबरभाष्य" में दृष्टव्य है। नित्य विषय और वाक्य अथवा वचन को यथानुपूर्वी ब्रह्मर्षिगण समाधि में दर्शन करते हैं, अतएव वेद में पूर्वपुरुष कर्तृत्वकल्पना का लेश भी समावेश नहीं है।" लौकिक रचनाएँ पुरुष विशेष कर्तृत्व होने के कारण पौरुषेय हैं, यथा महाभारत, रामायण आदि।कुमारिल भट्ट के अनुसार अध्ययन परंपरा अनादि है। अतएव वेद भी अपौरुषेय हैं। ऐसे ही अधिकरण सिद्धांत न्याय से ही वेद ग्रंथ रचना के द्वारा पुरुष संबंध नहीं हो सकता, अतएव विधि वाक्य ही धर्म में प्रमाण है।"

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