स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>क्या `नियोग´ जैसी शमर्नाक व्यवस्था ईश्वर ने दी है?

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हिन्दू धर्म में विधवा औरत और विधुर मर्द को अपने जीवन साथी की मौत के बाद पुनर्विवाह करने से वेदों के आधार पर रोक और बिना दोबारा विवाह किये ही दोनों को `नियोग´ द्वारा सन्तान उत्पन्न करने की व्यवस्था है। एक विधवा स्त्री बच्चे पैदा करने के लिए वेदानुसार दस पुरूषों के साथ `नियोग´ कर सकती है और ऐसे ही एक विधुर मर्द भी दस स्त्रियों के साथ `नियोग´ कर सकता है। बल्कि यदि पति बच्चा पैदा करने के लायक़ न हो तो पत्नि अपने पति की इजाज़त से उसके जीते जी भी अन्य पुरूष से `नियोग´ कर सकती है। हिन्दू धर्म के झंडाबरदारों को इसमें कोई पाप नज़र नहीं आता।

क्या वाक़ई ईश्वर ऐसी व्यवस्था देगा जिसे मानने के लिए खुद वेद प्रचारक ही तैयार नहीं हैं?
ऐसा लगता है कि या तो वेदों में क्षेपक हो गया है या फिर `नियोग´ की वैदिक व्यवस्था किसी विशेष काल के लिए थी, सदा के लिए नहीं थी । ईश्वर की ओर से सदा के लिए किसी अन्य व्यवस्था का भेजा जाना अभीष्ट था।


अब सवाल है कि कौन सी व्यवस्था अपनी जाये ? इसका सीधा सा हल है पुनर्विवाह की व्यवस्था
जी हाँ, केवल पुनर्विवाह के द्वारा ही विधवा और विधुर दोनों की समस्या का सम्मानजनक हल संभव है।


ईश्वर ने क़ुरआन में यही व्यवस्था दी है।

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>आतंकवाद पर केवल मुसलमानों का ही एकाधिकार है Muslim monopoly in terrorism

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>हिन्दू धर्म के अनैतिक नियम और भारतीय संविधान की कसौटी Hindu religious law and Indian constitution

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पिछली कुछ पोस्ट्स में मैंने वह झलक पेश की जो हिन्दुत्व का स्रोत है। अब मैं आर एस एस के प्रचारक बलराज मधोक और उनकी विचारधारा के वाहक से कुछ सवाल पूछना चाहते कि इंसानियत और सामाजिक आधार पर जो तथ्य व इतिहास हम हिन्दू धर्म में पहले से सीखते आ रहे हैं क्या हमारे वर्तमान समय में व्यावहारिक हैं? और क्या वह भारतीय संविधान की कसौटी पर खरे उतारते हैं? आखिर क्या वजह थी क्या मजबूरी थी कि भारतीय संविधान में “हिन्दू ला” को परिभाषित किया गया?? मैं उन बातों पर भी प्रकाश डालना चाहता हूँ जिस की आख्या भी हिन्दू लेखकों के कलम से प्रस्तुत की गई है, इस के हवाले से हम ‘‘बलराज मधोक’’ जी से कहना चाहेंगे कि अगर यह ही हिन्दुत्व है तो हमारा तो इसे दूर से ही सलाम है, स्वयं आप भी इस पर खुले आम अमल नहीं कर सकते यह केवल पुराने समय की बात थी, जो समय के साथ इतिहास का हिस्सा बन चुकी, अब जो चलने वाली व्यवस्था है वह केवल और केवल इस्लामी व्यवस्था है
स्वंय आप उसी व्यवस्था में जी रहे हैं।
उदाहरण के बतोर भारतीय कानून की नजर मे ब्राह्मण और शूद्र एक समान हैं.
आज विधवा को सति नहीं किया जा सकता, या तो उस की दूसरी शादी कर दी जाए वरन राज्य उसे विधवा पेंशन दे
नियोग से बच्चा पैदा नहीं किया जा सकता (यह राज्य की दृष्टि मे चाहे अपराध न हो अपितु समाज की दृष्टि में अवश्‍य अपराध है)
ऐसे ही शिक्षा केवल ब्राह्मण के लिए नहीं है बल्कि सब के लिए है ।अब कोई शम्बूक (शूद्र) शिक्षा प्राप्ति और जप-तप करने के कारण मारा नहीं जा सकता.
भ्रुण हत्या पर प्रतिबन्ध
जन्म से पहले लिंग पता करने पर प्रतिबन्ध
दहेज लेने देने पर प्रतिबन्ध
यह सब इस्लामी कानून हैं ।
खास बात यह भी है कि इन में से अधिक तर हिन्दू धर्म के विपरीत हैं, इन चीजों के विपरीत हिन्दू धर्म में स्पष्‍ट आदेश है, जैसा कि वर्ण व्यवस्था, सती या नियोग आदि, और हिदू धर्म के पर्वतक उसका नमूना पेश करते हैं, दहेज को ही लीजिए, चाहे उसका स्पष्‍ट आदेश न हो परन्तु मर्यादा पुरूषोत्तम राम के विवाह में देखये, राजा जनक ने उन्हें किस कदर भारी संख्या मे दहेज दिया था ।यह एक नमूना था उन आदेशों/आदर्शों का जिनका सम्बन्ध कानून से है, इस के अतिरिक्त कुछ बातें वह है जिन का सम्बन्ध नैतिकता से है, इस्लाम क्यों कि मुकम्मल निजाम-ए-हयात (जीवन जीने कि सम्पूर्ण पद्धति) है अतः इस्लाम ने नैतिकता के आधार पर भी बहुत से नियम पेश किये हैं।
उदाहरण के तौर पर एक मशहूर हदीस है कि

अगर तुम कहीं जुल्म (अन्याय) होता देखो और तुम उसे रोकने की शक्ति रखते हो तो शक्ति का प्रदर्शन करके उसे रोक दो । और अगर अपने अन्दर उसे रोकने की शक्ति नहीं पाते बल्कि ज़ुबान से अन्याय को अन्याय कह सकते हो। तो जुबान से जुल्म को जुल्म कहो इस समय तुम्हारा चुप रहना पाप है। और अगर इतनी भी शक्ति नहीं है तो दिल से बुराई को बुराई समझो, और उससे अलग हो जाओ, यह ईमान का आखिरी दर्जा है अर्थात किसी भी स्थिति में अन्याय का समर्थन जायज़ नहीं है।

इसकी तुलना महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्‍ण के किरदार से किजिए, जिस युद्ध में वह अर्जुन के सार्थी बनकर उन्हें अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने के उपदेश दे रहे थे उसी युद्ध में उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति दूसरे पक्ष को दे रखी थी । एक दूसरा उदाहरण देखिये, राजा दशरथ ने अपनी एक पत्नी को दिये गये दो वचनों के कारण अपने पुत्र श्री राम को घर से निकाल दिया था, ऐसी स्थिति में इस्लामी कानून यह है कि वह वचन जिस में किसी की हकतलफी होती है वह सिरे से खारीज है उस पर अमल नहीं किया जाएगा यहां तक कि अगर कोई भूल-चूक में भी किसी ऐसे कार्य के करने की कसम खा बैठे तो इस्लामी नियम के अनुसार वह कार्य नहीं किया जाएगा साथ ही कसम के झूठा होने के कारण कसम का कफ्फारा (एक प्रकार का दंड ) देना अनिवार्य होगा
ख्याल रहे कि भारतीय कानून भी कुछ ऐसा ही है, यही कारण है कि अगर कोई अपने बेटे को इसलिए घर से निकाल दे कि उस ने किसी को यह वचन दिया था तो उसका वचन जाए भाड़ में, भारतीय न्यायालय और सरकार उसे ऐसा करने की अनुमति नही दे सकती
अतः श्री बलराज मधोक जी और उनके वैचारिक समर्थकों से निवेदन है कि इस्लामी व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा समय चक्र के आहनी पंजे ने बलपूर्वक आप से मनवा दिया है अब आप ज़िद छोडें, और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए निष्‍पक्ष होकर इस्लामी व्यवस्था के बाकी बचे हिस्से का अघ्ययन करेंअब जो कुछ बचा है वह कुछ अधिक नहीं, अपितु बहुत मामूली सा है और वह क्या है, उसे पवित्र कुरआन कि भाषा में मुलाहिज़ा …फरमाइये

‘हे ईशवरीय ग्रन्थ रखने वालों आओ एक ऐसी बात की ओर जिसे हमारे और तुम्हारे बीच समान मान्यता हासिल है वह यह कि हम एक ईश्‍वर के अतिरिक्त किसी अन्य को न पूजें और ना ही उसके साथ किसी को सा़झी ठहराएं और न परस्पर हममें से कोई एक दूसरे को एक ईश्‍वर से हटकर पालनहार बनाये ’’। (सूरत आल-ए-इमरान 64)

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>"धर्मग्रंथों में पात्रों की कामुकता की पराकाष्‍ठा" Sexuality in Hindu Scriptures

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धर्मग्रंथों में जिन पात्रों को आदर्श बताया गया है उन में कामुकता की पराकाष्‍ठा देखी जा सकती है। जहां भी सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसे प्राप्त करने और भोगने के तानेबाने बुने जाने लगे

ब्रह्मा के संबंध मे शिवपुराण में उल्लेख आता है कि पार्वती के विवाह में ब्रह्मा पुरोहित बने थे। उन्होंने पार्वती का पांव देखा और इस कदर कामातुर हो उठे कि कर्मकांड करातेकराते ही स्खलित हो गए। भागवत में उल्लेख आता है कि शिव की रक्षा के लिए विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण किया तो शिव उसी रूप पर मुग्ध हो गए और उस के पीछे दीवाने होकर भागे। भविष्‍यपुराण में आई एक कथा के अनुसार अत्रि ऋशि की पत्नी अनुपम सुंदरी थी। ब्रह्मा , विष्‍णु, महेश तीनों उस के पास गए। ब्रह्मा ने निर्लज्ज हो कर अनुसूया से रतिसुख मांगा और तीनों देवता अश्‍लील हरकतें करने लगेगौतम के वेश में इंद्र द्वारा अहल्या से व्यभिचार की कथा रामायण और ब्रहा वैवर्त पुराण में आती है। अनैतिकता की पराकाष्‍ठा देखिए कि इस का दंड बेचारी निर्दोष अहल्या को भोगना पड़ा था।भागवत (9।14) और देवी भागवत में चंद्रमा द्वारा गुरू की पत्नी को अपने पास रखने की कथा आती है गुरू ने अपनी पत्नी बार-बार वापस मांगी तो भी चन्द्रमा ने उसे वापस नहीं लौटाया। लंबे अरसे तक साथ रहने के कारण चंद्रमा से तारा को एक पुत्र भी हुआ जो चन्द्रमा को ही दे दिया गया

देवताओं के गुरू बृहस्पति ने स्वयं अपने भाई की गर्भवती पत्नी से बलात्कार किया देवताओं ने ममता ( बृहस्पति की भावज ) को उस समय काफी बुराभला कहा जब उसने बृहस्पति की मनमानी का प्रतिरोध करना चाहा।इन प्रसंगों के सही गलत होने का विवेचन करने की आवशयकता नहीं है। इन का उल्लेख इसी दृष्टि से किया जा रहा है धर्म ग्रन्थों में उल्लेखित पात्रों को किनं मानदडों पर आदर्श सिद्ध किया गया है । उन का समय दूसरों की पत्नी छीनने व व्यभिचार करने में बीतता था तो वे लोगों को नैतिकता का पाठ कब सिखाते थे और कैसे सिखाते थेइंद्र का तो सारा समय ही स्त्रियों के साथ राग रंग में बीतता था वह जब असुरों से हार जाते तो ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश की सहायता से षड्यंत्र रच कर अपना राज्य वापस प्राप्त करते और फिर उन्ही रागरंगों में रम जाते। अप्सराओं के नाच देखना, शराब पीना, और दूसरा कोई व्यक्ति अच्छे काम करता तो उस में विध्न पैदा करना यही इंद्र की जीवनचर्या थी । इस की पुष्ठि करने वाले ढेरों प्रसंग धर्मषास्त्रों में भरे पडे़ हैं

महाभारत के तो हर अघ्याय में झूठ, बेईमानी और धूर्तता की ढेरों कहानियां हैं। धर्मराज युधिष्ठिर, जिन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन में कभी पाप नही किया, जुआ खेल कर राजपाट हार गए और पत्नी को भी दाव पर लगा बैठे, युधिष्ठिर के इस कृत्य की द्रौपदी और धृतराष्‍ट के ही एक पुत्र विकर्ण ने भर्त्‍सना की थी। ‘‘महाभारत’’ की लड़ाई के लिए कोई एक घटना मूल कारण है तो वह युधिष्ठिर का जुआ खेलना और द्रौपदी को दांव पर लगाना हैइतने बड़े युद्व का कारण धार्मिक भले ही हो, पर नैतिक कहां रह जाता है?

दूसरे धर्मावतार भीष्‍म ने एक राजकुमारी अंबा का अपहरण किया तथा न खुद उससे विवाह किया और न ही दूसरी जगह होने दिया । अंबा को इस संताप के कारण आत्महत्या करनी पड़ीकुंती के चारों पुत्र कर्ण, युघिष्ठिर , भीम और अर्जुन परपुरूषों से उत्पन्न हुए थे कर्ण तो विवाह से पहले ही जन्म ले चुका थास्वयंवर में द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाली थी। किन्तु पांचों भाइयों ने उसके साथ संयुक्त विवाह का निश्‍चय किया। पांचाल नरेश ने इसका विरोध किया तो युधिष्ठिर ने ही जिद की और अपनी बात मनवाई

संपूर्ण धर्म वाड्।मय इस तरह की विसंगतियों से भरा हुआ है इसे कथित धार्मिक युग का प्रतिबिंब भी कह सकते हैं और धर्म का आदर्श भी कह सकते हैं । जिनमें नैतिक गुणों का कोई महत्व नहीं है ।इन प्रसंगों से यही सिद्व होता है कि अनैतिकता को तब धर्मगुरूओं की स्वीकृति मिली हुई थी। दानदक्षिणा, पूजापाठ, कर्मकांड, यज्ञ, हवन आदि धार्मिक क्रियाकृत्य करते हुए कैसा भी आचरण किया जाता तो वह सभ्य था । जरूरी इतना भर था कि ब्राह्मणों के स्वार्थ पुरे किये जाते रहें।

नैतिक कौन?
असुर देवताओं और धार्मिक लोगों की तुलना में अधिक नैतिक थे
। वे देवताओं से युद्ध जरूर लड़ते थे, लेकिन युद्ध में उन्होंने बेईमानी प्रायः नहीं की । देवताओं की स्त्रियों को भी उन्होंने परेशान नहीं किया अपमान का बदला लेने के लिए रावण सीता का हरण कर के ले तो गया था, पर उस ने सीता को लंका में बड़े ही आदर से रखा थाराम ने शूर्पनखा के प्रणय निवेदन को ठुकराया, वहाँ तक तो ठीक है, लेकिन उसे लक्ष्मण के पास प्रणय प्रस्ताव ले कर जाने और बाद में नाककान काट लेने का भद्दा मजाक और दुव्र्यवहार करने का क्या औचित्य था? रावण यदि इसी स्तर पर प्रतिशोध लेना चाहता तो सीता की शील रक्षा असंभव थी । इस स्थिति में कौन ज्यादा नैतिक था – राम या रावण ?
स्रोत : मोहमद उमर कैरानवी

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>"कहां है धर्म कहां है न्याय’’- देवासुर संग्राम Written by Rakesh Nath

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धर्म ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर देवासुर संग्राम का उल्लेख आता है। देवता स्वर्ग में विलासी जीवन बिताते थे और असुरों को छलबल से पराभूत करने के शड्यंत्र रचते रहते थे। असुरों को दुष्चरित्र सिद्ध करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। जगह-जगह उनकी निंदा की गई, केवल निंदा करने वाले उदाहरणों पर ध्यान नहीं दें तो पता चलेगा कि देवताओं और असुरों के चित्रण में कोई मौलिक अंतर नहीं था देवता भी वह सब कुकर्म करते थे जिन का आरोप असुरों पर लगाया जाता हैअसुर देवताओं से अधिक परिश्रमी और जुझारू थे, इसलिए उन्हें सफलता भी मिलती थी देवताओं को कोई अधिक श्रम वाला काम करना होता तो धर्म ग्रन्थों से मिलने वाले विवरणों के अनुसार उन के लिए उन्हें असुरों का ही सहयोग लेना पड़ता था

समुद्रमंथन की घटना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। ‘‘भागवत’’ के आठवें स्कंध में आईं इस कथा के अनुसार इंद्र के प्रस्ताव पर असुरों ने देवताओं के साथ मिलकर समुद्रमंथन शुरू किया था । समुद्र में जब अमृत निकला तो विष्‍णु ने स्त्री का रूप धारण करके असुरों को मोहित किया और आपस में लड़ा दिया स्त्री रूप धारी विष्‍णु ने चालाकी से असुरों को अमृत के भाग से वंचित कर दिया और सारा अमृत देवताओं को ही बांट दिया

यह कथा सच है या गलत, यह सोचना बेकार है, लेकिन कहानी यह तो बताती है कि भगवान और देवता किस तरह छल करते थे और अधिक परिश्रम करने वालों का हिस्सा भी हड़प जाते थेराजा बलि का लाभ उठाकर उस का पूरा राज्य हड़प लेने और देवताओं को दे देने की कथा भी भागवत में आती है । बलि स्वभाव से उदार और दानशील था । भागवत के अनुसार उसने तीनों लोकों में अपना राज्य स्थापित कर लिया था। विष्‍णु ने पहले तो उस से दान मांगा और वचन लिया कि जो भी मांगा जाएगा वह बलि दे देगा। वचन लेने के बाद विष्‍णु ने बलि का पूरा राज्य ही ले लिया और देवताओं को दे दिया । बलि असुरों का राजा था और भागवत में आए प्रसंग के अनुसार ही वह उदार था । उस की उदारता का अनुचित लाभ उठाना नैतिक है या अनैतिक? ‘‘भागवत’’ के एक और कथा प्रसंग में देवताओं द्वारा संकट के समय साथ देने वाले विश्‍वरूप की हत्या का उल्लेख आता है । छठे स्कंध में आई इस कथा के अनुसार इंद्र ने देवता त्वष्‍टा के पुत्र विश्‍वरूप से वैष्‍णवी विद्या सीखी और असुरों को जीत कर अपना राज्य वापस ले लिया। विश्‍वरूप की माता असुरकुल की थी। एक यज्ञ में वह अपनी माता के वंश की भी आहुति देता है तो इन्द्र ने उस का सिर काट लिया इंद्र वहां विश्‍वरूप द्वारा किय गये उपकार को भूल गया और असुरों के नाम से इतना चिढ़ गया कि उपकार करने वाले की ही हत्या कर दी । उपकार करने वालों के साथ इस व्यवहार क्या नैतिक कहा जाएगा?

और स्वार्थीपने की हद देखिए कि देवता अपने एक शत्रु को मारने के लिए दघीचि के पास उन की हड्डियां मांगने पहँच गए। वृत्र नामक असुर का संहार करने के लिए जो आयुध चाहिए था वह हड्डियों से बन सकता था हड्डियां भी ऐसे व्यक्ति कि जो तपस्वी हो, देवताओं में ऐसा कोई तपस्वी था नहीं, सभी विलासी थे।इसलिए वे दधीचि ऋषि के पास गए और उन से अपनी हड्डियां देने के लिए कहने लगे। जीवन रक्षा के लिए खून चढाने की जरूरत हो तो अति आत्मीय व्यक्ति से भी रक्तदान करने के लिए कहने में संकोच होता है। रक्तदान में यद्यपि मरने का डर नहीं रहता, लेकिन देवता जीवित व्यक्ति के पास उस की हड्डियां मांगने पहँच गये और मांग लाए, स्वार्थपरता की यह अति देवताओं के चरित्र में ही दिखाई देती है, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं।इस तरह के कथा प्रसंग अविश्‍वसणीय और अस्वाभाविक हैं, लेकिन ये इस बात के द्योतक तो हैं कि धर्म ग्रन्थों में किस प्रकार की नैतिकता सिखाई गई है छलकपट करने, दूसरों की उदारता का अनुचित लाभ उठाने और स्वार्थ में अन्धे हो जाने वाले चरित्रों को आदर्श बना कर प्रस्तुत किया गया है तो इस से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कथित धार्मिक युग के लोग कितने नैतिक रहे होंगे —-
देवताओं के साथ साथ भगवान के अवतार भी अनैतिक आचरण करते थे। कई स्थलों पर तो उन का आचरण अनैतिकता की हद से भी आगे अपराधपूर्ण लगता है। इस तरह के कृत्य यदि कोई आज करे तो कानून में उसे दंड देने की व्यवस्था है
स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!”
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चलते चलते
मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि इस सन्देश को आप एक प्रश्न के रूप में देखें और विचार करें और शुद्ध मन से अध्ययन करें ताकि सत्य मार्ग के अभिलाषी बन सकें. ज़रूरी नहीं कि जो बात आपके दिल को अच्छी लग रही हो वही सही है और आस्था के नाम पर केवल दिल को ही खुश करना नादानी होगी. धर्म वह है जो इंसानियत के पहलूवों पर खरा उतरे और इंसान के मष्तिष्क में उपजे सारे सवालों का जवाब दे सके.

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>गौमाता के आदर व सम्मान का क्या यह मतलब है!

>उनका मानना है कि माता तीन हैं एक जननी माता, एक धरती माता और एक गौ माता. वह हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल0 की एक हदीस का हवाला देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार माँ के पैरों तले जन्नत है। ऐसे ही धरती माता भी स्‍वर्ग के समान है। अतः हमें उसकी वन्दना करने में कोई संकोच नही होना चाहिए, इसी प्रकार हमें गौ माता का भी आदर और सम्मान करना चाहिये। क्योंकि हमें उस से दूध और मूत्र मिलता है। दूध हम पीते हैं तो उसके मूत्र से औषधियाँ बनायी जाती हैं।

एक बार मैंने उनसे पूछा कि आज आप जिस धरती माता की वन्दना करने को कह रहे हैं। आपकी आस्था के अनुसार कल मरनोपरान्त आप का पुनः जन्म अगर पाकिस्तान के तालिबान (अफ़गानिस्तान) में हो गया तो आप हमारी इसी धरती के विरूद्व आतंकवादी घटनाओं में तो सम्मिलित न होंगे?

अपने उत्तर मे उन्होंने मुझसे पलट कर प्रश्‍न किया कि अगर आप अमेरिका में पैदा हो गये तो?

अब मेरा जवाब था कि मेरे धर्म के अनुसार, मैं अगर अपने देश में ही मरता हूं तो कल कयामत में यहीं से दोबारा उठाया जाऊंगा

मेरा दूसरा प्रश्‍न यह था कि गौमाता के आदर व सम्मान का क्या यह मतलब है कि उसके मूत्र का सेवन किया जाये?उन्होंने कहा कि मैडिकली साइन्टीफिक शेध में यह बात सिद्ध हो गयी है कि उसका मूत्र कई बीमारियों में लाभकारी है। मैं ने कहा कि अगर मूत्र में ही लाभ तलाश करना है तो जननी माता जिस ने नौ महीने आप को अपनी कोख में रखकर पाला है इस बात की ज्यादा पात्र है कि उस के मूत्र के लाभ तलाश किये जायें

मगर अफसोस कि इन अन्याइयों ने कभी अपनी जन्मदाई माता के मूत्र पर साइन्टीफिक शोद्ध की आवशयकता न समझी, दूसरी ओर उन्हे गाय के मूत्र का साइन्टीफिक लाभ तो दिखाई दिया परन्तु मैडिकल साइन्स का यह निश्‍कर्ष नज़र न आया कि मूत्र में किसी भी जानदार के बदन की तमाम गन्दगियाँ सम्मिलित होती हैं। हर उचित मस्तिष्‍क का व्यक्ति पेशाब करने के बाद अपने हाथों को धोना चाहता है और कभी किसी ने अपने पेशाब को टेस्ट न कराया कि शायद उसमे भी कुछ लाभकारी तत्व विराजमान हों।

मैं कल एक अखबार पढ़ रहा था जिसमें पूरी सृष्टि के सभी ईश्वर और देवता और भगवान् का वास गाय में दर्शाया गया था और गाय के गुदा में पूरी सृष्टि अथवा सारे तीर्थ होते हैं और मूत्र में गंगा जल…!!!

यही आपकी संस्कृति है और इस के बदले आप हमारे सर से इस्लाम का भूत उतारना चाहते हैं। तो यकीन जानये कि इस में आपको कामयाबी नहीं मिलेगी, क्योंकि कहाँ एक जानवर के मूत्र का सेवन और कहाँ मुहम्मद सल्ल. की हदीस के यह शब्द, कि पेशाब की छीटों से बचो!!!

Some Sources: Mohammad Umar Kairanvi

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>जिन्हें नाज़ है ‘हिन्द’ पर वो कहाँ हैं….Sahir Ludhiyanwi

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ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये पुरपेंच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

वो उजले दरीचों में पायल की छन छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन धन
ये बेरूह कमरों मे खांसी कि ठन ठन
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रे, ये गुस्ताख फ़िक़रे

ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनओमन्द बेटे भी, अब्बा मियाँ भी
ये बीवी है और बहन है, माँ है
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

मदद चाहती है ये हवा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलेखा की बेटी,
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….


ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये
कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें
नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें
नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ
हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं….

Filed under: जिन्हें नाज़ है हिन्द पर

>आरएसएस RSS के भूतपूर्व प्रचारक ‘बलराज मधोक’ की पुस्तक झूठी व मनगढ़ंत

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भारतीय हिन्दुत्ववादी संगठन आर.एस.एस. के भूतपूर्व प्रचारक ‘‘बलराज मधोक’’ की पुस्तक ‘‘विश्‍वव्‍यापी मुस्लिम समस्याएं’’ पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, पूरी किताब झूठ, बोहतान और मन घडन्त आरोपों पर आधारित है। मिसाल के तौर पर मधोक जी ने अपनी पुस्तक के पेज नं 15 पर कुछ इस्लामी इस्तलाहात मुजाहिद, शहीद व ‘गाजी’ की परिभाषा करते हुए अपनी ओर से ‘गाजी’ की मन घड़न्त ‘‘परिभाषा’’ इन शब्दों में की है –
‘‘जिस ने अपने हाथ से कम से कम एक काफिर को खत्म किया है, ऐसे मुसलमान को गाजी कहा जाता है।’’ – पृष्‍ठ न. १५
ख्याल रहे कि यह निराधार परिभाषा मधोक जी की है। इस्लाम या मुसलमान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं ।
मधोक जी ने अपनी पुस्तक में अनेक स्थानों पर लिखा है कि जहाँ भी इस्लामी राज्य स्थापित हुआ वहाँ की गैर मुस्लिम जनता के सामने दो में से एक विकल्प चुनना अनिवार्य था, इस्लाम या मौत – पृष्‍ठ न. 16,२२
अफसोस कि मधोक जी ने यह लिखते हुए इतना न सोचा कि भारत में कई शताब्दियों तक इस्लामी राज्य कायम रहा । परन्तु मधोक जी फिर भी बच गये, बल्कि दो में से एक विकल्प देने वाले अल्प संख्यक रह गये और मधोक जी ….
बलराज मधोक जी को इतिहास का कितना ज्ञान है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी पुस्तक के पृष्‍ठ नं 34 पर लिखते हैं कि सोमनाथ के मन्दिर पर मुसलमान आकर्मणकारियों द्वारा बनाई गई मस्जिद को हटा कर सरदार पटेल ने पुनः मन्दिर बनवाया
सब जानते है कि सोमनाथ के मन्दिर पर कभी मस्जिद नहीं रही, परन्तु नफरत के पुजारी नफरत का करोबार करने के लिए इतिहास को बदलने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं।
मधोक जी कितने बड़े ज्ञानी हैं, और वह अपने समय के हालात से कितनी वाकफियत रखते हैं इस का अन्दाज़ा इस बात से कीजिए कि सन 2003 में वह अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि इस समय संसार में छोटे बडे़ चालीस इस्लामी देश हैं – पृष्‍ठ ३९
ज़ाहिर है कि या तो उन्हें गिनती नहीं आती या उनका भौगोलिक ज्ञान कमज़ोर है, अगर वह संसार का मानचित्र उठा कर इस्लामी देशों की गिनती करते तो यह संख्या उनकी बताई संख्या से दस /पन्द्रह अंक ऊपर जाती ।जिस व्यक्ति के ज्ञान की यह स्थिति हो उसकी कृति को महत्व देना उस पर विचार व्यक्त करना अपना समय नष्‍ट करने के सिवा कुछ नहीं, परन्तु मधोक जी ने मुसलमानों के भारतीयकरण करने के सम्बन्ध में लिखा है –
‘उसके लिए एक रास्ता तो यह है कि इस्लाम का भूत उतार कर उन्हें पुनः अपने मूल हिन्दू परिवार में लौटने के लिए प्रेरित किया जाये।’’- पृष्‍ठ ४९
इस प्रकार के आग्रह मधोक जैसे विचार रखने वाले कुछ अन्य लोगों की ओर से भी समय समय पर आते रहते हैं, आर.एस.एस. के ही एक अन्य प्रचारक हरिद्वार के डा. अनुप गौड ने अपने द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘‘क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जायेगा’’ प्रकाशित 2006 में मुसलमानों का आहवान करते हुए लिखा है कि
‘‘ इस पुस्तक के माध्यम से मैं आहवान करता हूँ कि वह अपने स्वधर्म में लौट आयें ’’ पृश्ठ-78 ।
उक्त विद्वानगण के इस प्रकार के विचार, सोचने वाला दिमाग रखने वाले मनुष्‍य को मजबूर करते हैं कि मुस्लमानों को जिस धर्म में लौटाने के लिये उक्त विद्वानगण इतने बेताब दिखाई पड़ते हैं, उसको समझा जाए और इस्लाम का भूत उतार कर मधोक जी जिस धर्म का भूत चढ़ाना चाहते हैं इस्लाम से उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। तो आइये इस परीपेक्ष में इस्लाम और हिन्दू धर्म का एक सरसरी तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

धर्मों का आधार पूजनीय ईश्‍वर होता है, इसी कारण जिन समाजों में ईश्‍वर की कल्पना नहीं, उन्हें नास्तिक कहा जाता है। इसलिए बेहतर होगा कि बात ‘पूजनीय ईश्‍वर’ से ही शुरू की जाय, यहाँ यह पुष्टि करना भी अनिवार्य है कि हमने ज्ञान का आधार धर्म ग्रन्थों को बनाया है, क्योंकि व्यक्ति विशेष, क्या कह रहा है इसका कोई महत्व नहीं, महत्व धर्म ग्रन्थों का होता है क्योंकि व्यक्ति विशेष की करनी, कथनी में अन्तर हो सकता है या वह बात कह कर बदल भी सकता है जबकि ग्रन्थ बदला नहीं करते ।”

इस्लाम में पूजनीय केवल एक ईश्‍वर की ज़ात है, जो कि सर्वशक्तिमान है, सब का पालनहार और सब का स्वामी है, जिसका न कोई साझी है, नही कोई उस जैसा है, इस सम्बन्ध में जब हम हिन्दू धर्मग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो कहीं एक ईश्‍वर की बात मिलती है, कही तीन की, तो कहीं तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की और कहीं यह भी कि दुनिया की हर वस्तु ईश्‍वर है।

साभार: मोहम्मद उमर कैरानवी

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>आरएसएस RSS के भूतपूर्व प्रचारक ‘बलराज मधोक’ की पुस्तक झूठी व मनगढ़ंत

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भारतीय हिन्दुत्ववादी संगठन आर.एस.एस. के भूतपूर्व प्रचारक ‘‘बलराज मधोक’’ की पुस्तक ‘‘विश्‍वव्‍यापी मुस्लिम समस्याएं’’ पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, पूरी किताब झूठ, बोहतान और मन घडन्त आरोपों पर आधारित है। मिसाल के तौर पर मधोक जी ने अपनी पुस्तक के पेज नं 15 पर कुछ इस्लामी इस्तलाहात मुजाहिद, शहीद व ‘गाजी’ की परिभाषा करते हुए अपनी ओर से ‘गाजी’ की मन घड़न्त ‘‘परिभाषा’’ इन शब्दों में की है –
‘‘जिस ने अपने हाथ से कम से कम एक काफिर को खत्म किया है, ऐसे मुसलमान को गाजी कहा जाता है।’’ – पृष्‍ठ न. १५
ख्याल रहे कि यह निराधार परिभाषा मधोक जी की है। इस्लाम या मुसलमान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं ।
मधोक जी ने अपनी पुस्तक में अनेक स्थानों पर लिखा है कि जहाँ भी इस्लामी राज्य स्थापित हुआ वहाँ की गैर मुस्लिम जनता के सामने दो में से एक विकल्प चुनना अनिवार्य था, इस्लाम या मौत – पृष्‍ठ न. 16,२२
अफसोस कि मधोक जी ने यह लिखते हुए इतना न सोचा कि भारत में कई शताब्दियों तक इस्लामी राज्य कायम रहा । परन्तु मधोक जी फिर भी बच गये, बल्कि दो में से एक विकल्प देने वाले अल्प संख्यक रह गये और मधोक जी ….
बलराज मधोक जी को इतिहास का कितना ज्ञान है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी पुस्तक के पृष्‍ठ नं 34 पर लिखते हैं कि सोमनाथ के मन्दिर पर मुसलमान आकर्मणकारियों द्वारा बनाई गई मस्जिद को हटा कर सरदार पटेल ने पुनः मन्दिर बनवाया
सब जानते है कि सोमनाथ के मन्दिर पर कभी मस्जिद नहीं रही, परन्तु नफरत के पुजारी नफरत का करोबार करने के लिए इतिहास को बदलने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं।
मधोक जी कितने बड़े ज्ञानी हैं, और वह अपने समय के हालात से कितनी वाकफियत रखते हैं इस का अन्दाज़ा इस बात से कीजिए कि सन 2003 में वह अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि इस समय संसार में छोटे बडे़ चालीस इस्लामी देश हैं – पृष्‍ठ ३९
ज़ाहिर है कि या तो उन्हें गिनती नहीं आती या उनका भौगोलिक ज्ञान कमज़ोर है, अगर वह संसार का मानचित्र उठा कर इस्लामी देशों की गिनती करते तो यह संख्या उनकी बताई संख्या से दस /पन्द्रह अंक ऊपर जाती ।जिस व्यक्ति के ज्ञान की यह स्थिति हो उसकी कृति को महत्व देना उस पर विचार व्यक्त करना अपना समय नष्‍ट करने के सिवा कुछ नहीं, परन्तु मधोक जी ने मुसलमानों के भारतीयकरण करने के सम्बन्ध में लिखा है –
‘उसके लिए एक रास्ता तो यह है कि इस्लाम का भूत उतार कर उन्हें पुनः अपने मूल हिन्दू परिवार में लौटने के लिए प्रेरित किया जाये।’’- पृष्‍ठ ४९
इस प्रकार के आग्रह मधोक जैसे विचार रखने वाले कुछ अन्य लोगों की ओर से भी समय समय पर आते रहते हैं, आर.एस.एस. के ही एक अन्य प्रचारक हरिद्वार के डा. अनुप गौड ने अपने द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘‘क्या हिन्दुत्व का सूर्य डूब जायेगा’’ प्रकाशित 2006 में मुसलमानों का आहवान करते हुए लिखा है कि
‘‘ इस पुस्तक के माध्यम से मैं आहवान करता हूँ कि वह अपने स्वधर्म में लौट आयें ’’ पृश्ठ-78 ।
उक्त विद्वानगण के इस प्रकार के विचार, सोचने वाला दिमाग रखने वाले मनुष्‍य को मजबूर करते हैं कि मुस्लमानों को जिस धर्म में लौटाने के लिये उक्त विद्वानगण इतने बेताब दिखाई पड़ते हैं, उसको समझा जाए और इस्लाम का भूत उतार कर मधोक जी जिस धर्म का भूत चढ़ाना चाहते हैं इस्लाम से उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। तो आइये इस परीपेक्ष में इस्लाम और हिन्दू धर्म का एक सरसरी तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

धर्मों का आधार पूजनीय ईश्‍वर होता है, इसी कारण जिन समाजों में ईश्‍वर की कल्पना नहीं, उन्हें नास्तिक कहा जाता है। इसलिए बेहतर होगा कि बात ‘पूजनीय ईश्‍वर’ से ही शुरू की जाय, यहाँ यह पुष्टि करना भी अनिवार्य है कि हमने ज्ञान का आधार धर्म ग्रन्थों को बनाया है, क्योंकि व्यक्ति विशेष, क्या कह रहा है इसका कोई महत्व नहीं, महत्व धर्म ग्रन्थों का होता है क्योंकि व्यक्ति विशेष की करनी, कथनी में अन्तर हो सकता है या वह बात कह कर बदल भी सकता है जबकि ग्रन्थ बदला नहीं करते ।”

इस्लाम में पूजनीय केवल एक ईश्‍वर की ज़ात है, जो कि सर्वशक्तिमान है, सब का पालनहार और सब का स्वामी है, जिसका न कोई साझी है, नही कोई उस जैसा है, इस सम्बन्ध में जब हम हिन्दू धर्मग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो कहीं एक ईश्‍वर की बात मिलती है, कही तीन की, तो कहीं तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की और कहीं यह भी कि दुनिया की हर वस्तु ईश्‍वर है।

साभार: मोहम्मद उमर कैरानवी

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>कहाँ तलाशूँ तुझे मैं तुम्हें आरज़ू -presented by Saleem Khan

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दूर तलक गूंजते हैं यहाँ सन्नाटे रात भर
दिन के शोर ओ शराबे में भी होता हूँ मैं तन्हाँ!
दिल की आवाज़ भी सुन लो, सुन लो मेरी आरज़ू
कहाँ तलाशूँ तुझे मैं, तुम हो कहाँ, मैं हूँ कहाँ?

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लेख सन्दर्भ