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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>हिन्दू धर्म में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत (Concept of God in Hinduism)

>इस कड़ी के दो भाग हैं; एक हिन्दू धर्म में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत, दूसरा; मजहबे-इस्लाम में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत.


हिन्दू धर्म में ईश्वर की सामान्य परिकल्पना (COMMON CONCEPT OF GOD IN HINDUISM)

अगर किसी सामान्य हिन्दू जन से यह पूछेंगे कि वो कितने भगवान् में विश्वाश रखता है तो कुछ कहेंगे तीन, कुछ कहेंगे हज़ारों और कुछ कहेंगे तैतीस करोड़ (330 million). लेकिन वहीँ अगर यही सवाल किसी पढ़े-लिखे (हिन्दू धर्म के ज्ञाता, धार्मिक रूप से) हिन्दू जन से पूछेंगे तो उसका जवाब होगा; ईश्वर केवल एक ही है, और वह एक ईश्वर में ही विश्वास रखता है.

आईये जाने कि हिन्दू धर्म की प्रमुख धार्मिक पुस्तकें कौन कौन सी हैं और उनमें ईश्वर की परिकल्पना किस प्रकार से करी गयी है. हिन्दू धर्म की वह प्रमुख धार्मिक पुस्तकें हैं जिनमें ईश्वर की परिकल्पना ओ जाना जा सकता है; वेद, उपनिषद, पुराण, भगवद गीता हैं.

उपनिषद (UPANISHAD)

छन्दोग्य-उपनिषद्, अध्याय 6, भाग 2, श्लोक 1:

एकम् एवाद्वितियम” अर्थात ‘वह केवल एक ही है

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 9:

नाकस्या कस्किज जनिता न काधिपः” अर्थात “उसका न कोई माँ-बाप है न ही खुदा“.

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 19:

न तस्य प्रतिमा अस्ति” अर्थात “उसकी कोई छवि (कोई पिक्चर,कोई फोटो, कोई मूर्ति) नहीं हो सकती“.

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 20:

न सम्द्रसे तिस्थति रूपम् अस्य, न कक्सुसा पश्यति कस कनैनम” अर्थात “उसे कोई देख नहीं सकता, उसको किसी की भी आँखों से देखा नहीं जा सकता“.

भगवद गीता (BHAGWAD GEETA)

भगवद गीता हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा पवित्र और मान्य धार्मिक ग्रन्थ है.

“….जो सांसारिक इच्छाओं के गुलाम हैं उन्होंने अपने लिए ईश्वर के अतिरिक्त झूठे उपास्य बना लिए है…” (भगवद गीता 7:20)

वो जो मुझे जानते हैं कि मैं ही हूँ, जो अजन्मा हूँ, मैं ही हूँ जिसकी कोई शुरुआत नहीं, और सारे जहाँ का मालिक हूँ.” (भगवद गीता 10:3)

यजुर्वेद (YAJURVEDA)

वेद हिन्दू धर्म की सबसे प्राचीन किताबें हैं. ये मुख्यतया चार हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद.

यजुर्वेद, अध्याय 32, श्लोक 3:

न तस्य प्रतिमा अस्ति” अर्थात “उसकी कोई छवि (कोई पिक्चर,कोई फोटो, कोई मूर्ति) नहीं हो सकती.”

इसी श्लोक में आगे लिखा है; वही है जिसे किसी ने पैदा नहीं किया, और वही पूजा के लायक़ है.

यजुर्वेद, अध्याय 40, श्लोक 8:

“वह शरीर-विहीन है और शुद्ध है”

यजुर्वेद, अध्याय 40, श्लोक 9:

अन्धात्मा प्रविशन्ति ये अस्संभुती मुपस्ते” अर्थात “वे अन्धकार में हैं और गुनाहगार हैं, जो प्राकृतिक वस्तुओं को पूजते हैं

*प्राकृतिक वस्तुएं-सूरज, चाँद, ज़मीन, पेड़, जानवर आदि.

आगे लिखा है;

वे और भी ज्यादा गुनाहगार हैं और अन्धकार में हैं जिन्होंने सांसारिक वस्तुओं को पूजा

*सांसारिक वस्तुएं- जिन्हें मनुष्य खुद बनता हैं. जैसे टेबल, मेज़, तराशा हुआ पत्थर आदि.

अथर्ववेद, किताब २०, अध्याय 58 श्लोक 3:

देव महा ओसी” अर्थात “ईश्वर सबसे बड़ा, महान है

ऋग्वेद (यह सबसे पुराना वेद है) RIGVEDA

ऋग्वेद किताब 1, अध्याय 164 श्लोक 46:

एकम् सत् विप्र बहुधा वदन्ति” अर्थात विप्र लोग (Sages, learned Priests) मुझे कई नाम से बुलाते हैं.”

ऋग्वेद किताब 8 अध्याय 1 श्लोक 1:

मा चिदंयाद्वी शंसता” अर्थात “किसी की भी पूजा मत करो सिवाह उसके, वही सत्य है और उसकी पूजा एकांत में करो.

ऋग्वेद, किताब 5 अध्याय 81 श्लोक 1:

वही महान है जिसे सृष्टिकर्ता का गौरव प्राप्त है.”

ऋग्वेद, किताब VI, अध्याय 45, श्लोक 16:

“या एका इत्तामुश्तुही” अर्थात “उसी की पूजा करो, क्यूंकि उस जैसा कोई नहीं और वह अकेला है.”

वेदान्त का ब्रह्म सूत्र भी पढ़ लीजिये:

एकम् ब्रह्म, द्वितीय नास्ते, नेह-नये नास्ते, नास्ते किंचन

भगवान एक ही है, दूसरा नहीं हैं. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है.

“There is only one God, not the second, not at all, not at all, not in the least bit”

इस तरह से हम देखते हैं कि उपरलिखित श्लोक आदि ईश्वर के एक होने के बारे में कह रहें हैं.मैं सैकडों और श्लोक यहाँ लिख सकता हूँ जिसमें ईश्वर के एक होने की बात कहीं गयी हैं….

इस तरह से जब हम हिन्दू धर्म की किताबों का गहन अध्ययन करते हैं तो पातें हैं कि सभी किताबोब में ईश्वर एक एक होने की पुष्टि होती है.”

प्रस्तुति: सलीम खान

Filed under: ईश्वर

8 Responses

  1. haal-ahwaal says:

    >aapka ye kehna bilkul sahi hai ki ISHWAR EK HAI. sabhi jante hain, mante hain….lekin Allah-Allah ki rat me aap ye kyo bhul jaate ho ki uparwale aur insaan ke beech me kuch aisi bhi taakte (mano ya na mano) hoti hain, jo hume sambal pradan karti hain, raasta dikhati hain, madad karti hain kisi na kisi roop me….main apko ek ghatna bataata hu :main train me safar kar raha tha. ek station par do ladke chadhe. bahut young the. 15-16 saal ki umra hogi. paas me khade aapas me batiya rahe the. unki baatchit se maloom pada ki muslim hain. main unki baatchit sun raha tha. unme se ek ne dusre se kaha – yaar, aaj maine khana nahi khaya. dusre ne poochha : kyo?to pehle ne bataya : yaar, maa ne kaha, kuchh kha le, lekin maa ne roza rakha tha. maa ne kuchh nahi khaya tha. aise me mujhe bhi khane ki ichchha nahi hiyee. yaar, ghar me koyee bhookha rahe to apan kaise kha sakte hain?…………ye unki chhoti si baatchit thi, jo mere kano me padi. agle station par wo bhi utar gaye, main bhi………….yaha main jo baat puri vinamrta se kehna chahta hu, wo ye ki…uss ladke ki maa ne bhale hi roza allah ke liye rakha ho, lekin uss ladke ne apni maa ke liye roza rakha….isse aap kya kahenge???kya allah ke alawa aur koyee poojneeya nahi hai?nahi ho sakta?? iss lihaj se hindu dharm hi behtar hai. usme ishwar ke alawa maa-baap, gurujan aur sadhu-santo, shreshtha jano ko bhi utna hi poojneeya mana jata hai.meri tippani kisi dharm ke khilaf nahi hai. mera kehna bas itna hai ki sanatan hindu dharm ki ishwar sambandhi maanyataye koyee galat nahi hain.

  2. haal-ahwaal says:

    >aapka ye kehna bilkul sahi hai ki ISHWAR EK HAI. sabhi jante hain, mante hain….lekin Allah-Allah ki rat me aap ye kyo bhul jaate ho ki uparwale aur insaan ke beech me kuch aisi bhi taakte (mano ya na mano) hoti hain, jo hume sambal pradan karti hain, raasta dikhati hain, madad karti hain kisi na kisi roop me….main apko ek ghatna bataata hu :main train me safar kar raha tha. ek station par do ladke chadhe. bahut young the. 15-16 saal ki umra hogi. paas me khade aapas me batiya rahe the. unki baatchit se maloom pada ki muslim hain. main unki baatchit sun raha tha. unme se ek ne dusre se kaha – yaar, aaj maine khana nahi khaya. dusre ne poochha : kyo?to pehle ne bataya : yaar, maa ne kaha, kuchh kha le, lekin maa ne roza rakha tha. maa ne kuchh nahi khaya tha. aise me mujhe bhi khane ki ichchha nahi hiyee. yaar, ghar me koyee bhookha rahe to apan kaise kha sakte hain?…………ye unki chhoti si baatchit thi, jo mere kano me padi. agle station par wo bhi utar gaye, main bhi………….yaha main jo baat puri vinamrta se kehna chahta hu, wo ye ki…uss ladke ki maa ne bhale hi roza allah ke liye rakha ho, lekin uss ladke ne apni maa ke liye roza rakha….isse aap kya kahenge???kya allah ke alawa aur koyee poojneeya nahi hai?nahi ho sakta?? iss lihaj se hindu dharm hi behtar hai. usme ishwar ke alawa maa-baap, gurujan aur sadhu-santo, shreshtha jano ko bhi utna hi poojneeya mana jata hai.meri tippani kisi dharm ke khilaf nahi hai. mera kehna bas itna hai ki sanatan hindu dharm ki ishwar sambandhi maanyataye koyee galat nahi hain.

  3. >काश आपकी बात …कसाब तथा उस जैसे आतंकवादीयों तक भी पहुँच जाए ईश्वर एक है — पर उस एक ईश्वर का नाम सिर्फ " अल्लाह " नहीं — कृष्ण, जेहोवाह , बुध्ध , महावीर , यीशु के परम पिता — ऐसा सभी कुछ होना भी निहायत जरुरी है फिर, सिर्फ अपना राग अलाप कर, एक हे ईश्वर तब दुसरे धर्म पर चलनेवालों का खून करना अब बंद करो — – लावण्या

  4. >काश आपकी बात …कसाब तथा उस जैसे आतंकवादीयों तक भी पहुँच जाए ईश्वर एक है — पर उस एक ईश्वर का नाम सिर्फ " अल्लाह " नहीं — कृष्ण, जेहोवाह , बुध्ध , महावीर , यीशु के परम पिता — ऐसा सभी कुछ होना भी निहायत जरुरी है फिर, सिर्फ अपना राग अलाप कर, एक हे ईश्वर तब दुसरे धर्म पर चलनेवालों का खून करना अब बंद करो — – लावण्या

  5. >असहमत -हिन्दू धर्म कभी भी यह निश्चयात्मक तौर पर नहीं कहता की ईश्वर का कोई निश्चित स्वरुप और अस्तित्व भी है -वह किसी भी धारणा को अंतिम नहीं मानता -नेति नेति कहता है -यह भी नहीं यह भी नहीं ! वे अज्ञेय है ! जाना नहीं जा सकता ! रामचरित मानस में तुलसी कहते हैं -इदिमित्थम कहि सकई न कोई ! वह हो भी सकता है नहीं भी -उसकी खोज जारी है ! उसकी खोज का मतलब है आत्मान्वेषण ही -तत त्वं असि !

  6. >असहमत -हिन्दू धर्म कभी भी यह निश्चयात्मक तौर पर नहीं कहता की ईश्वर का कोई निश्चित स्वरुप और अस्तित्व भी है -वह किसी भी धारणा को अंतिम नहीं मानता -नेति नेति कहता है -यह भी नहीं यह भी नहीं ! वे अज्ञेय है ! जाना नहीं जा सकता ! रामचरित मानस में तुलसी कहते हैं -इदिमित्थम कहि सकई न कोई ! वह हो भी सकता है नहीं भी -उसकी खोज जारी है ! उसकी खोज का मतलब है आत्मान्वेषण ही -तत त्वं असि !

  7. bumbhole says:

    >सलीम भाई , जरा सोचिये आपके मरने के बाद आपको पता चलता है …. की इश्वर जैसी कोई चीजे कभी थी ही नहीं, और धर्म नाम की चीज का कोई अस्तित्व था | मरने जीने का चक्र चलता रहता है अनंत काल तक और विभिन्न ग्रहों पे और इसको इश्वर/ अल्लाह नाम का कोई तत्त्व/ ज्ञान संचालित नहीं करता | और आपको पता चलता है की जो भी प्रचार किसी भी धर्म का आपने किया वो बेकार था जिन भी चीजों की लिए आप लादे वो उसी दुनिया का विचार था और वो वही तक सिमित था …………. तो जो ये इसलाम / हिन्दू के विचार आप कॉपी करते है और जबरजस्ती लिखते है उन का कोई महत्व नहीं होगा, क्यों सही है न ? ………………. ना आपकी kuran न मेरी geeta मुझे इश्वर/ अल्लाह दिखा/ महसूस करा सकती है ना ही ऐसा कुछ है | सिर्फ एक concept के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे है | जाईये जिंदगी का आनंद उठाईये वही इश्वर है …….. और किसी को दुःख न पहुचना ही धर्म है ……………………

  8. bumbhole says:

    >सलीम भाई , जरा सोचिये आपके मरने के बाद आपको पता चलता है …. की इश्वर जैसी कोई चीजे कभी थी ही नहीं, और धर्म नाम की चीज का कोई अस्तित्व था | मरने जीने का चक्र चलता रहता है अनंत काल तक और विभिन्न ग्रहों पे और इसको इश्वर/ अल्लाह नाम का कोई तत्त्व/ ज्ञान संचालित नहीं करता | और आपको पता चलता है की जो भी प्रचार किसी भी धर्म का आपने किया वो बेकार था जिन भी चीजों की लिए आप लादे वो उसी दुनिया का विचार था और वो वही तक सिमित था …………. तो जो ये इसलाम / हिन्दू के विचार आप कॉपी करते है और जबरजस्ती लिखते है उन का कोई महत्व नहीं होगा, क्यों सही है न ? ………………. ना आपकी kuran न मेरी geeta मुझे इश्वर/ अल्लाह दिखा/ महसूस करा सकती है ना ही ऐसा कुछ है | सिर्फ एक concept के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे है | जाईये जिंदगी का आनंद उठाईये वही इश्वर है …….. और किसी को दुःख न पहुचना ही धर्म है ……………………

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