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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>जिहाद का आदेश भगवत गीता में भी ! Jihad in Bhagwat Geeta !!

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यह लेख मजहबे-इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच यकसानियत (समानताओं) पर ही आधारित किया है.

जिहाद का आदेश भगवत गीता में है या नहीं इस विषय पर जाने से पहले हमें यह समझना होगा कि जिहाद का अर्थ क्या होता है?

जिहाद शब्द का इस्तेमाल वर्तमान काल में जिस अर्थ में लिया जा रहा है, आजकल इस्लाम के बारे में फैली गलत-फहमियों में से एक है. बल्कि यों कहें कि जिहाद के बारे में गलत-फहमी केवल नॉन-मुस्लिम में ही नहीं है बल्कि मुस्लिम में भी है. जिहाद को नॉन-मुस्लिम और मुस्लिम दोनों ही यह समझते हैं कि किसी मुसलमान के द्वारा लड़ी गयी लडाई, वह चाहे किसी मक़सद के लिए हो, वह गलत मक़सद हो या सही, जिहाद कहलाता है.

जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है जो ‘जहादा’ ‘jahada’ शब्द से बना है जिसका मायने होता है ‘मेहनत करना’ ‘जद्दोजहद करना’ ‘संघर्ष करना’ अंग्रेजी में इस कहेंगे to strive or to struggle. मिसाल के तौर पर ‘अगर एक छात्र उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करता है, तो वह जिहाद कर रहा है.’ अरबी भाषा के शब्द जिहाद का एक अर्थ ‘अपनी नफ़्स से संघर्ष करना’ भी है. अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करने को भी जिहाद कहते हैं और यह अपने अंतर एक अर्थ और समेटे है जिसका अर्थ होता है कि ‘आत्म रक्षा के लिए संघर्ष’ या चढाई हो जाने या अत्याचार होने पर रण-भूमि में चढाई करने वाले या अत्याचार के विरुद्ध लड़ना.

जिहाद धर्म-युद्ध नहीं
लेकिन जिहाद को ‘पवित्र युद्ध’ holy war नाम पश्चिम जगत और इस्लाम विरोधी मिडिया ने दिया जो कि बिलकुल ही गलत परिभाषा है। जैसा कि हम देख चुके है कि जिहाद एक अरबी शब्द है उसके मायने क्या है.

इस्लाम के क्रिटिक्स खास कर अरुण शौरी जैसे लोग यह कहते है कि कुर’आन में कई श्लोक (आयत) ऐसी है जो मार-काट, लडाई-झगडे के लिए कहती है. वे कहते है कि कुर’आन में लिखा है कि ““… Fight and slay the Mushrik/Kafir wherever you find them …” (Al Qur’an 9:5)”

सुरह-तौबा की आयत संख्या पांच (5) से पहले की कुछ आयतों में शांति और समाधान की चर्चा है और शांति संधि का पालन न करने पर अल्लाह ने बहुदेववादियों को चार महीने की चेतावनी देता है और फिर उसके बाद का यह आदेश उस युद्धरत सेना के लिए है कि उन्हें अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर’आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे और यह स्वाभाविक ही है कि कोई भी आर्मी जनरल अपनी सेना का हौसला बढ़ाता है और कहता है कि “डरना नहीं, बिलकुल भी, और अपने दुश्मन के छक्के छुड़ा दो. उन्हें युद्ध में जहाँ पाओ मरो और उसका वध कर दो.

अरुण शौरी अपनी किताब “The World of Fatwas” में जब कुर’आन की सुरह तौबा के पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का ज़िक्र करता है तो वह तुंरत ही पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) से सातवीं आयत (श्लोक संख्या 7) में कूद कर जाता है. कोई भी तार्किक व्यक्ति जब कुर’आन को पढेगा तो उसे पता चल जायेगा कि पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का जवाब छठी आयत (श्लोक संख्या 6) में है.

अगर आप कुर’आन में पढेंगे तो आपको यह श्लोक मिलेगा मगर वे लोग (अरुण शौरी जैसे लोग) श्लोक को ‘आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट’ करके व्याख्यांवित करते हैं मगर आप फ़ौरन ही इस आयत के बाद पढेंगे तो मिलेगा कि “If any amongst the Mushriks (i.e. the enemies)ask thee for asylum, grant it to him so that he may hear the word of Allah and then escort him to where he can be secure”. (Al Qur’an 9:6) (कृपया चित्र में भी पढ़ लें)

अर्थात “और यदि मुश्रीकों में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक कि वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो क्यूंकि वे ऐसे लोग लोग है जिन्हें ज्ञान नहीं.”

आज दुनियाँ का कौन सा आर्मी जनरल होगा जो अपने सैनिकों से कहेगा कि अपने दुश्मन को जाने दो. लेकिन अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी किताब अल-कुर’आन में फरमाता है कि अगर तुम्हारा दुश्मन शान्ति चाहता है तो न सिर्फ शान्ति करो बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो. आज और इतहास का कौन सा ऐसा आर्मी जनरल होगा जिसने इस तरह का दयालुता से परिपूर्ण आदेश दिया होगा. अब अरुण शौरी से कोई ये पूछेगा कि उन्होंने अपनी किताब में जानबूझ कर आयत संख्या 6 का ज़िक्र क्यूँ नहीं किया?

जिहाद (अर्थात संघर्ष) का ज़िक्र भगवत गीता में
सभी मुख्य धर्म ने अपने यह आदेश दिया है कि अच्छे कार्य के लिए संघर्ष करो. यह भगवत गीता में भी लिखा है. “Therefore strive for Yoga, O Arjuna, which is the art of all work.” (Bhagavad Gita 2:50) लड़ाई-मारपीट (युद्ध) का ज़िक्र भगवत गीता में भी लिखा है:

महाभारत एक महाकाव्य है और हिन्दू धर्म में सबसे ज़्यादा पवित्र और मान्य है, जिसमें वर्णन है मुख्यतः दो रिश्तेदारों (cousins) के आपस में हुई लड़ाई का, वे रिश्तेदार थे कौरव और पांडव. भगवत गीता, महाभारत के अध्याय 25 से अध्याय 42 तक के 18 अध्याय को ही कहते हैं. इसमें 700 श्लोक हैं. जब अर्जुन युद्ध के मैदान में लड़ने से मना करते हैं और अपने ही रिश्तेदारों को युद्घ क्षेत्र में देखते है तो उनकी अंतरात्मा बोझिल हो जाती है और वे रिश्तेदारों की हत्या के विचार से विरक्त हो जाते हैं. और अपना हथियार ज़मीन पर रख देते हैं. उस क्षण में श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में ही सलाह देते हैं. वही पूरी की पूरी सलाह का रूप है ‘भगवत गीता’. भगवत गीता की कई आयतों में श्री कृष्ण, अर्जुन को अपने दुश्मन से लड़ने और उन्हें मारने के लिए आदेश और सलाह देतें हैं, चाहे दुश्मन उनके रिश्तेदार ही क्यूँ न हो?

भगवत गीता के अध्याय एक के आयत (श्लोक) संख्या 43 से 46 में लिखा है:

(43) हे कृष्ण, मैंने सुना है कि जो व्यक्ति अपने परिवार की परम्पराओं को नहीं निभाता है वह नरक का भागी होता है.

(44) दुर्भाग्य है कितना कि हम इतने बड़े पापयुक्क्त कार्य को करने जा रहे हैं, वो भी स्वयं के लाभ के लिए.

(45) मैं उनसे लड़ने और मार-काट करने से बेहतर समझता हूँ कि वे, ध्रितराष्ट्र के बेटे मुझे क़त्ल कर दें.

(46) इतना कह कर अर्जुन अपने हथियार नीचे रख देते हैं और रथ से नीचे उतर जाते हैं…

श्री कृष्ण अगले अध्याय 2 के श्लोक संख्या 2,3 में अर्जुन के बातों का जवाब देते हैं:

मेरे प्रिय अर्जुन,आपके दिमाग में इस तरह के अशुद्ध विचार किस प्रकार से जज्ब कर गए हैं. यह भलाई पाने वालों और उसके महत्त्व को जानने वालों के लिए बिलकुल भी उपयुक्त नहीं है. वे धरती के लिए नहीं बल्कि दुष्टता के लिए हैं”

हे अर्जुन,तुम्हारे मन में इस तरह के नपुंसक विचार किस प्रकार आ गए, यह आपके मन में नहीं आने चाहिए थे. अपने ह्रदय की कमज़ोरी को त्याग दो और उठो, ओ शत्रु को दंड देने वाले.”

जब अर्जुन श्री कृष्ण से कौरवों को मारने के बजाये खुद निहत्थे मर जाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं. तो श्री कृष्ण उन्हें समझाते हैं कि कैसे इस तरह के अपवित्र सिहार तुम्हारे मन में आ गए, कैसे तुम नपुंसक हो गए. उठो और अपने शत्रुवों का वध करो, उनसे लाडो और विजय पाओ.

आगे भगवत गीता में श्री कृष्ण अध्याय 2, श्लोक 31-33 में कहते हैं कि

31- क्षत्रिय को उसका कर्म ध्यान रखना चाहिए. उसके लिए इससे बेहतर हो ही नहीं सकता कि वह अपना धार्मिक उसूलों का कर्तव्य ध्यान में रखे इसलिए घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है.

32- हे पार्थ, उस क्षत्रिय को खुश होना चाहिए कि उसके लिए इस तरह का अवसर उसे मिल रहा है और स्वर्ग (जन्नत) जाने के लिए अवसर मिल रहा है.

33- लेकिन अगर तुम यह धर्म-युद्ध को नहीं लड़ते हो, अपने फ़र्ज़ से पीछे हटने पर तुम पाप के भागी बनोगे और इस प्रकार अपनी योद्धा की छवि को धूमिल करोगे.

इस तरह से भगवत गीता में सैकड़ों ऐसी आयतें है जिनका तज़्कीरा मैं यहाँ कर सकता हूँ कि जिसमें लडाई झगडे और युद्ध का ज़िक्र है. कुर’आन में दी गयी आयतों के मुकाबले कहीं ज़्यादा ज़िक्र है.

मनु-स्मृति में 8/350 में क्या लिखा है आप स्वयं पढ़ लें.

सोचिये अगर कोई बिना सन्दर्भ का हवाला दिए (without quoting the context) ये कहे कि भगवत गीता में लडाई झगडे के बारे में बहुत कहा गया है या लिखा है. उसमें अपने ही परिवार के लोगों को मारने-काटने का आदेश श्री कृष्ण दे रहे हैं. और मार काट जन्नत की प्राप्ति का ज़रिया भी बताया गया है. इस तरह का आयोजित प्रयास बहुत ही क्रूर है. लेकिन वही अगर हम सन्दर्भ का हवाला देकर (within the context) कहें कि अगर बुराई के खिलाफ़ लड़ना ज़रूरी कर्तव्य है अगर यह न्याय और सच्चाई के लिए है तो, भले ही यह आपके अपनों के खिलाफ़ क्यूँ न हो. it makes sense.

मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे इस्लाम के आलोचक, ज़्यादातर हिन्दू आलोचक कुर’आन की उन आयतों पर उंगली उठाते है, जिसमें अन्यायी दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए आदेश दिए गए हैं. यह तो केवल एक ही तरह से होता होगा कि वे स्वयं अपनी ही पुस्तकों, जैसे भगवत गीता, महाभारत और वेदों को पढ़ते ही नहीं या पढ़ते भी हैं तो ढंग से पढ़ते नहीं हैं.

जब मैं किसी हिन्दू भाई से यह पूछता हूँ कि आपके भगवत गीता में ऐसा-ऐसा लिखा है तो वह कहता है कि वह तो बुराई के खिलाफ लड़ने का आदेश है. मैं कहता हूँ वही तो कुर’आन में भी लिखा है आप बुराई के खिलाफ लड़ो. तब वह संतुष्ट हो जाता है.

आगे इस्लाम के आलोचक, खास कर हिन्दू आलोचक यह कहते है कि कुर’आन में यह लिखा है कि अगर आप इस तरह की लडाई-झगडा करते हैं,जिहाद में किसी को मारते हैं (सच्चाई के लिए लड़ते हैं) तो आपको जन्नत की प्राप्ति होती है. वे केवल कुर’आन का ही नहीं, सहीह बुखारी की एक हदीस (पर्व 4, बुक ऑफ़ जिहाद, अध्याय संख्या 2 हदीस संख्या 46) का भी हवाला देते हैं:

अल्लाह सुबहान व-ताला यह कहते हैं कि अगर कोई जिहाद करने वाला लड़ते लड़ते शहीद हो जाता है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा.”

भगवत गीता में भी ऐसी ही आयतों का ज़िक्र है कि अगर आप लड़ते लड़ते मर जाते है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा. उदाहरणार्थ आप स्वयं देख सकते है, भगवत गीता अध्याय संख्या 2 श्लोक संख्या 37

हे कुंती-पुत्र, अगर तुम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और यदि तुम जीत जाते हो तो इस धरती में तुम्हें शासन मिलेगा (अर्थात धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा), इसलिए उठो और लड़ो…

इसी तरह का आदेश ऋग्वेद में ( पुस्तक संख्या 1 हिम 132 श्लोक 2-6) भी लिखा है.
अगर कोई इस्लाम से सम्बंधित सवाल करता है, आलोचना करता है तो उसकी ग़लतफ़हमियों को दूर करने का सबसे बेहतर यही है कि तो मैं वही सब बातें उन्हीं की धार्मिक पुस्तकों में से हवाले देकर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ…
आखिर में मैं यही कहना चाहूँगा कि:
आओ उस बात की तरफ जो हम में और तुम में यकसां (समान) है” (अल-कुर’आन 3:64)

रंजीशें नफ़रत है दहशत क्यूँ यहाँ, तू दिलों में प्यार भर दे ऐ खुदा. नेक-कर और सीधे रस्ते पे चला, अम्न का सूरज नया कोई उगा.

Filed under: इस्लाम

48 Responses

  1. >वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर – क्या आपने ऐसी वाणी सुनी है ? — हर धर्म में समानता खोजना अच्छी बात है भाई साहब – कसाब तथा उसके साथी क्यूं इतने सारे निर्दोष लोगों को बन्दूक की गोलियों से मार कर किस के हुक्म की तालीम कर रहे थे ये भी बताएं क्या , मुम्बई शहर में जाकर, होटल में खाना खा रहे लोगों को , भून डालना जायज है ? किस धर्म के तहत ये सही है ? लड़ाई के मैदान में , युध्ध करो, जो आम जनता के लोग हैं उन्हें मार कर , जब् के वे लोग ट्रेन स्टेशन पर थे या, अपने काम में व्यस्त थे ,और कसाब तथा उसके समुद्र से आये साथियों से कोइ दुश्मनी भी नहीं थी , उन्हें मार डालने में कौन सी बहादुरी थी ये बताइये — हम आपके धर्म ग्रन्थ का आदर करते हैं — आप अपना धर्म निभाएं, हम हमारा धर्म निभायेंगें और हमारे असंख्य देवी देवता और मूर्तियाँ हमें बहुत ही आदरणीय तथा प्रिय हैं — हमें , हमारा धर्म अत्यंत प्रिय है — हमारे धर्म के अनुसार ही हम जीयेंगें — हर धर्म में समानता भी है और कई अलग विचार भी हैं — जैसे इस्लाम , यहूदी धर्म के लोग सूअर का मांस नहीं खाते – क्रीश्चीयन या ख्रिस्ती लोग यही खाते हैं मैं स्वयं, सनातनी हिन्दू हूँ और कोइ भी मांसाहार , मेरे लिए , वर्ज्य है — ये मेरा अपना फैसला है — सबसे मुख्य बात है — व्यक्ति की अपनी समझ सोच और बुध्धि तथा उसका अपना फैसला करने की स्वतंत्रता — व्यक्ति स्वातंत्र्य सबसे अहम् है — और इन सारी बातों से ऊपर है, अमन, चैन और शांति से , हर अलग धर्म के लोगों के साथ , सद`भाव और दोस्ती निभाकर जीना और रहना – – हर इंसान के लिए, रोटी, कपडा, मकान, तालीम, नौकरी , परिवार का भरण पोषण , देखभाल, , आराम , सभी मुख्य हैं — जैसा आपका परिवार और बच्चे हैं वैसे ही , दूसरों के भी …फिर बताइये, लोग धर्म का नाम लेकर, मासूम बच्चों का किस तरह खून कर देते हैं ? जो भी ऐसे पाप करेगा, उसे "ऊपरवाला " देख रहा है और उसे जन्नत नहीं, दोजख की आग में , झुलसना पडेगा — मेरा यही कहना है भाई साहब, आप , भाईचारे तथा दोस्ती तथा अमन का पैगाम फैलाएं …नाके, आपके धर्म या मेरे धर्म में कौन अच्छा है कौन बुरा ये साबित करें अच्छाई और बुराई , इस दुनिया में, हर तरफ है….हमें , अच्छा बन्ना है या बुराई का साथ देना है, ये भी हमारा व्यक्तिगत फैसला है जिसे , हम सबसे बड़ी ताकत देख रही है …………………….अमन रहे कायम, बच्चे हर कॉम के मुस्कुराये और खुशहाल रहें ….मेरी तो यही दुआ है …आप सहमत हों या ना हों ….आज यही कहूंगी और बार बार कहूंगी …………..आमीन !!!!!…………………………………………आपकी बड़ी बहन की नमस्ते – लावण्या

  2. >वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर – क्या आपने ऐसी वाणी सुनी है ? — हर धर्म में समानता खोजना अच्छी बात है भाई साहब – कसाब तथा उसके साथी क्यूं इतने सारे निर्दोष लोगों को बन्दूक की गोलियों से मार कर किस के हुक्म की तालीम कर रहे थे ये भी बताएं क्या , मुम्बई शहर में जाकर, होटल में खाना खा रहे लोगों को , भून डालना जायज है ? किस धर्म के तहत ये सही है ? लड़ाई के मैदान में , युध्ध करो, जो आम जनता के लोग हैं उन्हें मार कर , जब् के वे लोग ट्रेन स्टेशन पर थे या, अपने काम में व्यस्त थे ,और कसाब तथा उसके समुद्र से आये साथियों से कोइ दुश्मनी भी नहीं थी , उन्हें मार डालने में कौन सी बहादुरी थी ये बताइये — हम आपके धर्म ग्रन्थ का आदर करते हैं — आप अपना धर्म निभाएं, हम हमारा धर्म निभायेंगें और हमारे असंख्य देवी देवता और मूर्तियाँ हमें बहुत ही आदरणीय तथा प्रिय हैं — हमें , हमारा धर्म अत्यंत प्रिय है — हमारे धर्म के अनुसार ही हम जीयेंगें — हर धर्म में समानता भी है और कई अलग विचार भी हैं — जैसे इस्लाम , यहूदी धर्म के लोग सूअर का मांस नहीं खाते – क्रीश्चीयन या ख्रिस्ती लोग यही खाते हैं मैं स्वयं, सनातनी हिन्दू हूँ और कोइ भी मांसाहार , मेरे लिए , वर्ज्य है — ये मेरा अपना फैसला है — सबसे मुख्य बात है — व्यक्ति की अपनी समझ सोच और बुध्धि तथा उसका अपना फैसला करने की स्वतंत्रता — व्यक्ति स्वातंत्र्य सबसे अहम् है — और इन सारी बातों से ऊपर है, अमन, चैन और शांति से , हर अलग धर्म के लोगों के साथ , सद`भाव और दोस्ती निभाकर जीना और रहना – – हर इंसान के लिए, रोटी, कपडा, मकान, तालीम, नौकरी , परिवार का भरण पोषण , देखभाल, , आराम , सभी मुख्य हैं — जैसा आपका परिवार और बच्चे हैं वैसे ही , दूसरों के भी …फिर बताइये, लोग धर्म का नाम लेकर, मासूम बच्चों का किस तरह खून कर देते हैं ? जो भी ऐसे पाप करेगा, उसे "ऊपरवाला " देख रहा है और उसे जन्नत नहीं, दोजख की आग में , झुलसना पडेगा — मेरा यही कहना है भाई साहब, आप , भाईचारे तथा दोस्ती तथा अमन का पैगाम फैलाएं …नाके, आपके धर्म या मेरे धर्म में कौन अच्छा है कौन बुरा ये साबित करें अच्छाई और बुराई , इस दुनिया में, हर तरफ है….हमें , अच्छा बन्ना है या बुराई का साथ देना है, ये भी हमारा व्यक्तिगत फैसला है जिसे , हम सबसे बड़ी ताकत देख रही है …………………….अमन रहे कायम, बच्चे हर कॉम के मुस्कुराये और खुशहाल रहें ….मेरी तो यही दुआ है …आप सहमत हों या ना हों ….आज यही कहूंगी और बार बार कहूंगी …………..आमीन !!!!!…………………………………………आपकी बड़ी बहन की नमस्ते – लावण्या

  3. >इन शब्दों के अर्थ कुरआन और गीता में सही संदर्भों मे प्रयोग किए गए थे। लेकिन आज वही आतताइयों द्वारा गलत संदर्भों में प्रयोग किए जा रहे हैं। नए अर्थ ही प्रचलन में आ गए हैं। आज तो शैतान जिहाद का नाम ले कर हमला कर रहा है। अधर्मी लोग धर्मयुद्ध का नाम ले कर जनता को हलाल कर रहे हैं। नासमझ लोग उसे जिहाद और धर्मयुद्ध समझ रहे हैं। आज जिहाद और धर्मयुद्ध का अर्थ समझाने की जरूरत कम है, बल्कि जिहाद और धर्मयुद्ध का नाम ले कर हमला करने वाले शैतानों को नंगा कर हकीकत सामने लाने की जरूरत है।

  4. >इन शब्दों के अर्थ कुरआन और गीता में सही संदर्भों मे प्रयोग किए गए थे। लेकिन आज वही आतताइयों द्वारा गलत संदर्भों में प्रयोग किए जा रहे हैं। नए अर्थ ही प्रचलन में आ गए हैं। आज तो शैतान जिहाद का नाम ले कर हमला कर रहा है। अधर्मी लोग धर्मयुद्ध का नाम ले कर जनता को हलाल कर रहे हैं। नासमझ लोग उसे जिहाद और धर्मयुद्ध समझ रहे हैं। आज जिहाद और धर्मयुद्ध का अर्थ समझाने की जरूरत कम है, बल्कि जिहाद और धर्मयुद्ध का नाम ले कर हमला करने वाले शैतानों को नंगा कर हकीकत सामने लाने की जरूरत है।

  5. >लावान्न्यम की टिपण्णी के बाद लिखने को कुछ शेष नहीं रहा ..!!

  6. >लावान्न्यम की टिपण्णी के बाद लिखने को कुछ शेष नहीं रहा ..!!

  7. >गीता और कुरान में कोई समानता/तुलना ही नहीं है। कुरान सीधे कहती है कि जो काफिर है उसे मारो, काटो। काफिर का सीधा-साधा अर्थ है – 'जो इस्लाम को नहीं मानता' (अर्थात जो मोहम्मद को 'अल्लाह का दूत' नहीं स्वीकारता? )गीता भी मारने की सलाह देती है। कृष्ण ने स्वयं अपने मामा का बध किया था। (कृष्ण अपने युग के 'आतंकवाद विनाशक' थे । ) लेकिन यहाँ किसी सम्प्रदाय या पन्थ या रेलिजन वालों को मारने की बात नहीं है। यहाँ आततायी को मारने का आदेश है; अधर्मी को मारने का आदेश है; दुराचारी, दुष्टों को मारने का आदेश है। (अधर्मी कौन है, इसके लिये धर्म की परिभाषा/लक्षण देखिये)कृष्ण का सन्देश बिल्कुल साफ है-यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजामि अहम् ||परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुस्कृताम् |धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे-युगे ||( जब-जब धर्म की ग्लानि (क्षरण, हानि) होती है और अधर्म बढ़ता है; तब मैं अपने आप का सृजन करता हूँ (अवतार लेता हूँ)।सधुओं (सदाचारी लोगों) की रक्षा के लिये , बुरे काम करने वालों के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना के लिये मैं युग-गुग में अवतार लेता हूँ। )बस इन दो श्लोकों को समझना ही काफी है कि गीता कहाँ है और कुरान कहाँ।

  8. >गीता और कुरान में कोई समानता/तुलना ही नहीं है। कुरान सीधे कहती है कि जो काफिर है उसे मारो, काटो। काफिर का सीधा-साधा अर्थ है – 'जो इस्लाम को नहीं मानता' (अर्थात जो मोहम्मद को 'अल्लाह का दूत' नहीं स्वीकारता? )गीता भी मारने की सलाह देती है। कृष्ण ने स्वयं अपने मामा का बध किया था। (कृष्ण अपने युग के 'आतंकवाद विनाशक' थे । ) लेकिन यहाँ किसी सम्प्रदाय या पन्थ या रेलिजन वालों को मारने की बात नहीं है। यहाँ आततायी को मारने का आदेश है; अधर्मी को मारने का आदेश है; दुराचारी, दुष्टों को मारने का आदेश है। (अधर्मी कौन है, इसके लिये धर्म की परिभाषा/लक्षण देखिये)कृष्ण का सन्देश बिल्कुल साफ है-यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजामि अहम् ||परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुस्कृताम् |धर्मसंस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे-युगे ||( जब-जब धर्म की ग्लानि (क्षरण, हानि) होती है और अधर्म बढ़ता है; तब मैं अपने आप का सृजन करता हूँ (अवतार लेता हूँ)।सधुओं (सदाचारी लोगों) की रक्षा के लिये , बुरे काम करने वालों के विनाश के लिये और धर्म की स्थापना के लिये मैं युग-गुग में अवतार लेता हूँ। )बस इन दो श्लोकों को समझना ही काफी है कि गीता कहाँ है और कुरान कहाँ।

  9. >कृपया स्पष्त कीजिये-१) किन-किन जीवों को 'अल्लाह' ने 'आदरणीय' ठहराया है? क्या मानव आदरणीय है या नहीं?२) कुरान ने काफिरों के कत्ल करने को पवित्र माना है लेकिन जो 'शरण' में आ जाय (जजिया देने को राजी हो?) उसे छोड़ दो। – यह विधान तो आदमी क्या, पशु भी निभाते हैं!! लेकिन यह क्या बात हुई कि कोई व्यक्ति कितना भी सज्जन हो किन्तु आपके मत/पन्थ/सम्प्रदय/ह्विम को न माने उसे कत्ल कर दो!! आपका अल्ला ताला तो बड़ा तंग दिल है!!!३) इस्लाम में 'शान्ति' की क्या परिभाषा है? क्या दुनिया में तलवार के बल पर सबको मुहम्मद का पिछलग्गू बनाने को ही शान्ति कहा जाता है?४)'जेहाद' का मूल अर्थ (डिक्शनरी अर्थ) भले ही 'संघर्ष' या कुछ और हो, इसको कुरान आगे किस रूप में परिभाषित करता है वह ज्यादा महत्व रखता है। और कुरान 'जेहाद' को उसी अर्थ में पारिभाषित करता है जिस अर्थ में संसार के बुद्धिजीवी (जैसे अरुण शौरी, डेनियल पाइप्स आदि) उसे समझते हैं।५) ये कैसा अल्लाह है कि अपनी बात को स्पष्ट रूप से नहीं कह पाता है? एक आयत में कुछ और कहता है दूसरी में उससे उल्टा बात कहता है? अल्लाह तो भारी कान्फ्यूज्ड व्यक्ति लगता है।

  10. >कृपया स्पष्त कीजिये-१) किन-किन जीवों को 'अल्लाह' ने 'आदरणीय' ठहराया है? क्या मानव आदरणीय है या नहीं?२) कुरान ने काफिरों के कत्ल करने को पवित्र माना है लेकिन जो 'शरण' में आ जाय (जजिया देने को राजी हो?) उसे छोड़ दो। – यह विधान तो आदमी क्या, पशु भी निभाते हैं!! लेकिन यह क्या बात हुई कि कोई व्यक्ति कितना भी सज्जन हो किन्तु आपके मत/पन्थ/सम्प्रदय/ह्विम को न माने उसे कत्ल कर दो!! आपका अल्ला ताला तो बड़ा तंग दिल है!!!३) इस्लाम में 'शान्ति' की क्या परिभाषा है? क्या दुनिया में तलवार के बल पर सबको मुहम्मद का पिछलग्गू बनाने को ही शान्ति कहा जाता है?४)'जेहाद' का मूल अर्थ (डिक्शनरी अर्थ) भले ही 'संघर्ष' या कुछ और हो, इसको कुरान आगे किस रूप में परिभाषित करता है वह ज्यादा महत्व रखता है। और कुरान 'जेहाद' को उसी अर्थ में पारिभाषित करता है जिस अर्थ में संसार के बुद्धिजीवी (जैसे अरुण शौरी, डेनियल पाइप्स आदि) उसे समझते हैं।५) ये कैसा अल्लाह है कि अपनी बात को स्पष्ट रूप से नहीं कह पाता है? एक आयत में कुछ और कहता है दूसरी में उससे उल्टा बात कहता है? अल्लाह तो भारी कान्फ्यूज्ड व्यक्ति लगता है।

  11. Sneha says:

    >१. गीता में किसी जिहाद की बात नहीं की गयी. तथ्यों को तोड-मरोड को मत पेश करो सलीम जी. गीता में भगवान कृष्ण ने दुष्टों को मारने का आदेश दिया था वो किसी धर्म को मनवाने की लडाई नहीं थी. लेकिन इसलाम में जिहाद अपने धर्म को मनवाने के लिये है, इसलाम को मनवाने के लिये है.२. सलीम जी वैसे आपको समझाने और धरती से चाँद पर पैदल जाने में, चाँद पर पैदल जाना आसान है. आप एक बात बताओ, इसलाम में जिहाद का आदेश है तो किसी को भी मार दोगे क्या? दूसरे धर्मों का सहारा लेकर अपने धर्म को श्रेष्ट बताना एक मुस्लिम ही ये काम कर सकता है.३. आप जो गीता के श्लोंकों का संदर्भ देते हो वो कृपया सही दिया किजीये. ऐसा लगता है कि आपको सस्कृत और हिन्दी आती नहीं है (हिन्दी गिनतियाँ शायद आप पढ ही नहीं पाते). इसलिये गलत श्लोंकों का हवाल देते रहते हो.४. गीता/महाभारत में दो राजाओं की सेना लड रही थीं. तुम्हारी जिहाद में तुम्हारी लडाई नॉन-मुस्लिम लोगों से है. उनके अंत और उनके खात्मे से है या फिर उनको अपना धर्म कुबुल करवालो.५. ये मुस्लिम आतँकवादी भारत में किस प्रायोजन से हमले करते हैं इस बात का जवाब दे सकते हो क्या? आपके हिसाब से क्या वो गलत नहीं हैं? जवाब देना जरूर हमेशा की तरह चुप्पी मत साध लेना. और हाँ अपने जवाब में यह मत लिखना कि मुसलमान आतँकवादी नहीं होते.@सलीम …. अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर'आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे…यानि खुदा खुद कह रहा है इंसान का कत्ल करने को. वैरी गुड…. बहुत ही बढिया बात है. मतलब या तो इसलाम अपना लो या मरने के लिये तैयार रहो.वैसे सलीम जी, आप अपनी बातों को ज्यादा खुल कर ना बताओ तो ही अच्छा है. कहीं आपके अपने ही इसलाम से खफा ना हो जायें. ये चीजे जितनी छुपी रहें उतना ही अच्छा है.

  12. Sneha says:

    >१. गीता में किसी जिहाद की बात नहीं की गयी. तथ्यों को तोड-मरोड को मत पेश करो सलीम जी. गीता में भगवान कृष्ण ने दुष्टों को मारने का आदेश दिया था वो किसी धर्म को मनवाने की लडाई नहीं थी. लेकिन इसलाम में जिहाद अपने धर्म को मनवाने के लिये है, इसलाम को मनवाने के लिये है.२. सलीम जी वैसे आपको समझाने और धरती से चाँद पर पैदल जाने में, चाँद पर पैदल जाना आसान है. आप एक बात बताओ, इसलाम में जिहाद का आदेश है तो किसी को भी मार दोगे क्या? दूसरे धर्मों का सहारा लेकर अपने धर्म को श्रेष्ट बताना एक मुस्लिम ही ये काम कर सकता है.३. आप जो गीता के श्लोंकों का संदर्भ देते हो वो कृपया सही दिया किजीये. ऐसा लगता है कि आपको सस्कृत और हिन्दी आती नहीं है (हिन्दी गिनतियाँ शायद आप पढ ही नहीं पाते). इसलिये गलत श्लोंकों का हवाल देते रहते हो.४. गीता/महाभारत में दो राजाओं की सेना लड रही थीं. तुम्हारी जिहाद में तुम्हारी लडाई नॉन-मुस्लिम लोगों से है. उनके अंत और उनके खात्मे से है या फिर उनको अपना धर्म कुबुल करवालो.५. ये मुस्लिम आतँकवादी भारत में किस प्रायोजन से हमले करते हैं इस बात का जवाब दे सकते हो क्या? आपके हिसाब से क्या वो गलत नहीं हैं? जवाब देना जरूर हमेशा की तरह चुप्पी मत साध लेना. और हाँ अपने जवाब में यह मत लिखना कि मुसलमान आतँकवादी नहीं होते.@सलीम …. अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर'आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे…यानि खुदा खुद कह रहा है इंसान का कत्ल करने को. वैरी गुड…. बहुत ही बढिया बात है. मतलब या तो इसलाम अपना लो या मरने के लिये तैयार रहो.वैसे सलीम जी, आप अपनी बातों को ज्यादा खुल कर ना बताओ तो ही अच्छा है. कहीं आपके अपने ही इसलाम से खफा ना हो जायें. ये चीजे जितनी छुपी रहें उतना ही अच्छा है.

  13. >मैं आजकल DD-Urdu के कुछ episode तैयार कराने में व्‍यस्त हूँ, आप कम बोलना संयम से बोलना, मेरी नजर है इन कमेंटस पर है, यह नालायक तो ग्रथ का नाम तक ठीक नहीं लिख सकता यह कहाँ टिकेगा,यह कुरआन शब्द को उर्दू का शब्‍द जानता है, इसके गुरू तो समझ गये कि नाम तो हमें ठीक लिखना पडेगा जैसे हम इसको लाख बुरा कहें मगर हमें इसका नाम तो ठीक लिखना पडेगा, अगर हम अनुवाद सिंह कहकर इसे चंपी करें तो कैसा रहेगा, तो आजसे इसने अगर शब्द कुरआन ठीक ना लिखा तो मैं इसे अनुवाद सिंह पुकारा करूंगा, वैसे जचता है यह ना इ तो भोपू मात्र है ऊ महान लेखक का, श्री अनुवाद सिंह जी, अपना वह श्‍लोक चैलेंज यहाँ ले आओ, मैं उसे सर्वधर्म चैलेंज का रूप देना चाहता हूँ, आखिर उस बहाने में तुम्‍हें बताउंगा कि मनु वही है जहां इस्लाम और हिन्‍दू एक होता है, तुम जीतोगे तब भी मैं जीतूंगा वह हमारे पूर्वज ही तो है, मैं हारूंगा तो दुनिया के सारे धर्म को हरवाके हारूंगा, अगर कैरानवी पर थोडा सा भी यकीन हो तो जान लो में केवल एक आयत में गागर में सागर प्रस्‍तुत करूंगा, फिर हर गुण पर एक आयत लाउंगा, लेकिन पहले सारे धर्म वालों में चीखूंगा कि आओ पहले तुम जवाब दो, ले आ ऐ महान कुप्रचारी इसमें हर तरफ सत्‍य की जीत होगी

  14. >मैं आजकल DD-Urdu के कुछ episode तैयार कराने में व्‍यस्त हूँ, आप कम बोलना संयम से बोलना, मेरी नजर है इन कमेंटस पर है, यह नालायक तो ग्रथ का नाम तक ठीक नहीं लिख सकता यह कहाँ टिकेगा,यह कुरआन शब्द को उर्दू का शब्‍द जानता है, इसके गुरू तो समझ गये कि नाम तो हमें ठीक लिखना पडेगा जैसे हम इसको लाख बुरा कहें मगर हमें इसका नाम तो ठीक लिखना पडेगा, अगर हम अनुवाद सिंह कहकर इसे चंपी करें तो कैसा रहेगा, तो आजसे इसने अगर शब्द कुरआन ठीक ना लिखा तो मैं इसे अनुवाद सिंह पुकारा करूंगा, वैसे जचता है यह ना इ तो भोपू मात्र है ऊ महान लेखक का, श्री अनुवाद सिंह जी, अपना वह श्‍लोक चैलेंज यहाँ ले आओ, मैं उसे सर्वधर्म चैलेंज का रूप देना चाहता हूँ, आखिर उस बहाने में तुम्‍हें बताउंगा कि मनु वही है जहां इस्लाम और हिन्‍दू एक होता है, तुम जीतोगे तब भी मैं जीतूंगा वह हमारे पूर्वज ही तो है, मैं हारूंगा तो दुनिया के सारे धर्म को हरवाके हारूंगा, अगर कैरानवी पर थोडा सा भी यकीन हो तो जान लो में केवल एक आयत में गागर में सागर प्रस्‍तुत करूंगा, फिर हर गुण पर एक आयत लाउंगा, लेकिन पहले सारे धर्म वालों में चीखूंगा कि आओ पहले तुम जवाब दो, ले आ ऐ महान कुप्रचारी इसमें हर तरफ सत्‍य की जीत होगी

  15. >उपरोक्त अधिकांश टिप्पणीकारों ने लगभग वह सबकुछ कह दिया है, जो मेरे मन में भी उमड़-घुमड़ रहा था. अस्तु, बेहतर है सलीम जी कि आप इनके प्रश्नों का तर्कपूर्ण उत्तर एक टिप्पणी के रूप में दें. मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता, चूंकि संस्कृत का ही छात्र हूं तो एक उक्ति कहना चाहूंगा कि "यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेदि नेतरः" अर्थात्‌ जो तर्क (कुतर्क नहीं) के द्वारा अनुसंधित हो, वही धर्म जानो, उसके अलावे कोई धर्म नहीं है. यही बात आपके धर्म और उसकी पुस्तक कुरआन या अन्य ग्रंथों पर भी लागू होती है. हालांकि, दिखता यही है कि किसी ने भी इस्लाम के किसी भी कोने पर उंगली रखी तो अधिकांश मुल्ला-मौलवी फतवा जारी करना आरंभ कर देते है. क्या, आपका अल्लाह और उसकी सत्ता इतनी कमजोर है, जो आलोचनाओं से डर और हिल जाए???

  16. >उपरोक्त अधिकांश टिप्पणीकारों ने लगभग वह सबकुछ कह दिया है, जो मेरे मन में भी उमड़-घुमड़ रहा था. अस्तु, बेहतर है सलीम जी कि आप इनके प्रश्नों का तर्कपूर्ण उत्तर एक टिप्पणी के रूप में दें. मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता, चूंकि संस्कृत का ही छात्र हूं तो एक उक्ति कहना चाहूंगा कि "यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेदि नेतरः" अर्थात्‌ जो तर्क (कुतर्क नहीं) के द्वारा अनुसंधित हो, वही धर्म जानो, उसके अलावे कोई धर्म नहीं है. यही बात आपके धर्म और उसकी पुस्तक कुरआन या अन्य ग्रंथों पर भी लागू होती है. हालांकि, दिखता यही है कि किसी ने भी इस्लाम के किसी भी कोने पर उंगली रखी तो अधिकांश मुल्ला-मौलवी फतवा जारी करना आरंभ कर देते है. क्या, आपका अल्लाह और उसकी सत्ता इतनी कमजोर है, जो आलोचनाओं से डर और हिल जाए???

  17. flare says:

    >मैं पिछले १ साल से ब्लोग्वानी के ब्लोग्स पढ़ रहा हूँ ? पर पता नहीं क्यों जब से सलीम और करानावी के ब्लोग्स और कमेंट्स देखा है ………… क्या बताऊँ , ये और इनके कुछ चापत्ते जाना भी जाते है इसलाम के भसड मचा के राखी है ? जैसे लगता है की अब इसलाम के अलावा कुछ और बात करोगे तो खा जाएँगे ………… हर बात पे विरोध करते है | जहा भी इनके कमेंट्स है वहा इतनी गन्दगी और नफ़रत की बातें होती है की पूछिए मत | अरे भैया ब्लॉग्गिंग करने दो सबको क्यों यहाँ भी प्रचार में पड़े हुए हो | एक तो सलीम का ब्लॉग देख के ही लगता है की इनको भी सौदी से इसका पैसा मिलता है ……….

  18. flare says:

    >मैं पिछले १ साल से ब्लोग्वानी के ब्लोग्स पढ़ रहा हूँ ? पर पता नहीं क्यों जब से सलीम और करानावी के ब्लोग्स और कमेंट्स देखा है ………… क्या बताऊँ , ये और इनके कुछ चापत्ते जाना भी जाते है इसलाम के भसड मचा के राखी है ? जैसे लगता है की अब इसलाम के अलावा कुछ और बात करोगे तो खा जाएँगे ………… हर बात पे विरोध करते है | जहा भी इनके कमेंट्स है वहा इतनी गन्दगी और नफ़रत की बातें होती है की पूछिए मत | अरे भैया ब्लॉग्गिंग करने दो सबको क्यों यहाँ भी प्रचार में पड़े हुए हो | एक तो सलीम का ब्लॉग देख के ही लगता है की इनको भी सौदी से इसका पैसा मिलता है ……….

  19. >आप सभी लोगों के सभी सवालों का जवाब है : "आप लोग वक़्त निकाल कर कम से कम पांच मिनट ही रोज़ या हफ्ते में किसी एक दिन……कुर'आन, वेदों, पुराणों, बाइबल आदि का मुताला (अध्ययन) कर लिया करें….."मैं इधर बैठ कर चैलेन्ज करता हूँ कि आप लोगों की सारी गलत-फहमियां धीरे धीरे ख़त्म हो जायेंगी….और अगर आप ऐसा नहीं कर प् रहे हैं तो, मैं तो हूँ ही ना!!!

  20. >आप सभी लोगों के सभी सवालों का जवाब है : "आप लोग वक़्त निकाल कर कम से कम पांच मिनट ही रोज़ या हफ्ते में किसी एक दिन……कुर'आन, वेदों, पुराणों, बाइबल आदि का मुताला (अध्ययन) कर लिया करें….."मैं इधर बैठ कर चैलेन्ज करता हूँ कि आप लोगों की सारी गलत-फहमियां धीरे धीरे ख़त्म हो जायेंगी….और अगर आप ऐसा नहीं कर प् रहे हैं तो, मैं तो हूँ ही ना!!!

  21. >@flare झूठे आदमी तुम बलागवाणी पढते तो पता होता कि यह कैरानवी को सदस्‍यता देने की हिम्‍मत ब्लागवाणी में नहीं है, अभी एक लेख पर कमेंटस दिया था वह यहां भी झेल लो,Mohammed Umar Kairanvi said…मिडिया को हिन्‍दू विरोधी बताने वाले से पूछो, यह ब्लागवाणी भी तो मिडिया में आती है कोई ब्लागवाणी से पूछे उपर के कमेंटस में बताये ब्लागों को जिनमें Rank-2 भी है को कियूं सदस्‍यता नहीं देती, हर इस्‍्लाम का दुशमन इस हिन्‍दूवाणी पर रजिस्‍ट्रड है एक सुरक्षित दीवार इससे बरदाश्‍त नहीं होती, फिर कियूं अपना नाम यह ब्लागवाणी रखे हुये है कियूं नहीं हिन्‍दू वाणी,संघ वाणी, सनातन धर्म वाणी, चिपलूनकर वाणी आदि जैसा नाम रख लेती यह इनकी वाणी

  22. >@flare झूठे आदमी तुम बलागवाणी पढते तो पता होता कि यह कैरानवी को सदस्‍यता देने की हिम्‍मत ब्लागवाणी में नहीं है, अभी एक लेख पर कमेंटस दिया था वह यहां भी झेल लो,Mohammed Umar Kairanvi said…मिडिया को हिन्‍दू विरोधी बताने वाले से पूछो, यह ब्लागवाणी भी तो मिडिया में आती है कोई ब्लागवाणी से पूछे उपर के कमेंटस में बताये ब्लागों को जिनमें Rank-2 भी है को कियूं सदस्‍यता नहीं देती, हर इस्‍्लाम का दुशमन इस हिन्‍दूवाणी पर रजिस्‍ट्रड है एक सुरक्षित दीवार इससे बरदाश्‍त नहीं होती, फिर कियूं अपना नाम यह ब्लागवाणी रखे हुये है कियूं नहीं हिन्‍दू वाणी,संघ वाणी, सनातन धर्म वाणी, चिपलूनकर वाणी आदि जैसा नाम रख लेती यह इनकी वाणी

  23. >जनाब मोहम्मद उमर कैरानवी साहब (क्षमा कीजिएगा यदि आपके नाम की वर्तनी गलत लिख दिया हो तो, ऐसा उर्दू या अन्य वामतः लिखित भाषाओं के बारे में न्यूनातिन्यून जानकारी के कारण हो सकता है) !! आप तो दूरदर्शन के उर्दू विभाग हेतु धारावाहिक/कों के निर्माण-कार्य से जुड़े हुए हैं, और इस तरह की महती जिम्मेदारी किसी विशिष्ट को ही दी जा सकती है. लेकिन मुझे ऐसा क्यूं लगता है कि आप इस लेख पर अपनी टिप्पणी न देकर, व्यर्थ के कवायद में अपनी प्रतिभा और श्रम को जाया कर रहे हैं !! और नहीं तो भाई सलीम को ही बधाई देते, जो कम-से-कम एक अपनी प्रातिभ-क्षमतानुसार कुछ सार्थक तो कर रहे हैं. हालांकि यह अलग बात है कि इनकी लेखनी से कौन सहमत या असहमत है? अगर एक वाक्य में सलीम के लिए कुछ कहूं तो सिर्फ यही कि -"इनकी बात से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, किन्तु सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता".

  24. >जनाब मोहम्मद उमर कैरानवी साहब (क्षमा कीजिएगा यदि आपके नाम की वर्तनी गलत लिख दिया हो तो, ऐसा उर्दू या अन्य वामतः लिखित भाषाओं के बारे में न्यूनातिन्यून जानकारी के कारण हो सकता है) !! आप तो दूरदर्शन के उर्दू विभाग हेतु धारावाहिक/कों के निर्माण-कार्य से जुड़े हुए हैं, और इस तरह की महती जिम्मेदारी किसी विशिष्ट को ही दी जा सकती है. लेकिन मुझे ऐसा क्यूं लगता है कि आप इस लेख पर अपनी टिप्पणी न देकर, व्यर्थ के कवायद में अपनी प्रतिभा और श्रम को जाया कर रहे हैं !! और नहीं तो भाई सलीम को ही बधाई देते, जो कम-से-कम एक अपनी प्रातिभ-क्षमतानुसार कुछ सार्थक तो कर रहे हैं. हालांकि यह अलग बात है कि इनकी लेखनी से कौन सहमत या असहमत है? अगर एक वाक्य में सलीम के लिए कुछ कहूं तो सिर्फ यही कि -"इनकी बात से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, किन्तु सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता".

  25. >नमस्कार "स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़" !!किसी को कुछ पढ़ने की सलाह देने की अपेक्षा तार्किक ढंग से अपनी बात रखते तो ज्यादा उपयुक्त होता। और जब आपने ही अपनी टिप्पणी की अंतिम पंक्ति में ये कहा कि "और अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो, मैं तो हूँ ही ना!!" तो फिर देर काहे की?? उस "मैं हूं ना" को कहने की अपेक्षा चरितार्थ कर दें. धन्यवाद..

  26. >नमस्कार "स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़" !!किसी को कुछ पढ़ने की सलाह देने की अपेक्षा तार्किक ढंग से अपनी बात रखते तो ज्यादा उपयुक्त होता। और जब आपने ही अपनी टिप्पणी की अंतिम पंक्ति में ये कहा कि "और अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो, मैं तो हूँ ही ना!!" तो फिर देर काहे की?? उस "मैं हूं ना" को कहने की अपेक्षा चरितार्थ कर दें. धन्यवाद..

  27. >@flare मै इस्‍लाम के अलावा भी बात करता हूँ, धार्मिक ब्लाग पर नहीं जाता लेकिन कुप्रचारियों को छोडता भी नहीं, ब्लागजगत की शान आशीष खण्‍डेलवाल जी tips-hindi.blogspot.com, गर्व करते हैं मुझपर, यह स्‍टोरी श्री अनुवाद सिंह के ज्ञान में है, जानना हो तो janokti ब्‍लाग पर पहुंचो वहां मिलेगा उमर चालीसाजनता की बेहद माँग पर यहाँ भी वही सुपर हिट कमेंटः''ऐ janokti के निवासियों (ब्‍लागरों), मेरी गुरू दक्षिणा स्‍वीकार कर ली गई, गुरू आशीष खण्‍डेलवाल जी को मुझ पर गर्व है, उन्होंने मेरे से दक्षिणा मांगी थी जो उपर के comments में फिरसे पढलो कि मैंने उनसे कहा था कि मैं उन्‍हें दक्षिणा में आलोचना दूंगा, मैंने दी उन्‍होंने स्‍वीकार की देखो एक आलोचना के जवाब में वह मुझ पर गर्व करते हैं, और ईमेल में लिखते हैं''आप मेरे ब्लॉग के सम्माननीय पाठक हैं, अच्छे आलोचक हैं और आप जैसा पाठक पाने पर मुझे गर्व है।''

  28. >@flare मै इस्‍लाम के अलावा भी बात करता हूँ, धार्मिक ब्लाग पर नहीं जाता लेकिन कुप्रचारियों को छोडता भी नहीं, ब्लागजगत की शान आशीष खण्‍डेलवाल जी tips-hindi.blogspot.com, गर्व करते हैं मुझपर, यह स्‍टोरी श्री अनुवाद सिंह के ज्ञान में है, जानना हो तो janokti ब्‍लाग पर पहुंचो वहां मिलेगा उमर चालीसाजनता की बेहद माँग पर यहाँ भी वही सुपर हिट कमेंटः''ऐ janokti के निवासियों (ब्‍लागरों), मेरी गुरू दक्षिणा स्‍वीकार कर ली गई, गुरू आशीष खण्‍डेलवाल जी को मुझ पर गर्व है, उन्होंने मेरे से दक्षिणा मांगी थी जो उपर के comments में फिरसे पढलो कि मैंने उनसे कहा था कि मैं उन्‍हें दक्षिणा में आलोचना दूंगा, मैंने दी उन्‍होंने स्‍वीकार की देखो एक आलोचना के जवाब में वह मुझ पर गर्व करते हैं, और ईमेल में लिखते हैं''आप मेरे ब्लॉग के सम्माननीय पाठक हैं, अच्छे आलोचक हैं और आप जैसा पाठक पाने पर मुझे गर्व है।''

  29. >@दिवाकर मणि जी मेरे नाम पर खाक डालिये यह अनुनाद सिंह जी कुरआन को xकुरानx लिखते हैं बताने पर कहते हैं उन्‍होंने उर्दू को बुरा भला कहा जबकि यह अरबी का शब्‍द है, यह बात उनके लिये थी, उन तक पहुच जायेगी प्रतीक्षा किजिये, साथ में उनको यह भी सुनादूं कि उर्दू हिन्‍दी की कहीं बहस कर सकते हों तो छेडो किसी ब्लाग पर बहस ये दोनों भाषायें बहनों जैसी हैं परन्‍तु अगर मैं एक बहन के पीछे पड गया तो वह लाल किले सामने वाली सीढीयों पर पनाह माँगेगी परदा पर्दा परदः पडा है पडा रहने दो,मेरा वह काम नहीं जो आप बता रहे हो, ध्‍यान से पढो केवल Scripts में सहायता कर रहा हूँ, T.V. को देखना इससे जुडना हमारे लिये फख्र की बात नहीं होती,

  30. >@दिवाकर मणि जी मेरे नाम पर खाक डालिये यह अनुनाद सिंह जी कुरआन को xकुरानx लिखते हैं बताने पर कहते हैं उन्‍होंने उर्दू को बुरा भला कहा जबकि यह अरबी का शब्‍द है, यह बात उनके लिये थी, उन तक पहुच जायेगी प्रतीक्षा किजिये, साथ में उनको यह भी सुनादूं कि उर्दू हिन्‍दी की कहीं बहस कर सकते हों तो छेडो किसी ब्लाग पर बहस ये दोनों भाषायें बहनों जैसी हैं परन्‍तु अगर मैं एक बहन के पीछे पड गया तो वह लाल किले सामने वाली सीढीयों पर पनाह माँगेगी परदा पर्दा परदः पडा है पडा रहने दो,मेरा वह काम नहीं जो आप बता रहे हो, ध्‍यान से पढो केवल Scripts में सहायता कर रहा हूँ, T.V. को देखना इससे जुडना हमारे लिये फख्र की बात नहीं होती,

  31. >"Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…मैं आजकल DD-Urdu के कुछ episode तैयार कराने में व्‍यस्त हूँ"जनाब कैरानवी, दूसरों को ध्यान से पढ़ने की सलाह देने की अपेक्षा कुछ आप भी ध्यान से लिखने-बोलने की जहमत उठाते तो अच्छा रहता। बताइए कि आपकी पूर्व टिप्पणी में कहां लिखा है कि आप " केवल Scripts में सहायता" करने में व्यस्त हैं?? यदि हिन्दी की समझ है तो आप ही बताईये कि मेरे टिप्पणी में लिखित दूसरी पंक्ति से क्या अर्थ निकलता है??आपकी टिप्पणी से जान कि बहस-मुबाहिसे (हालांकि आपकी टिप्पणियों से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता) और पीछे पड़ने में ज्यादा ही रुचि है, तो आपको बता दूं कि अंतरताने पर इन विषयों को अधिकृत कर ऐसी बहुत सी साइट है, जहां अपनी भड़ास को निकाल सकते है. उनमे से एक साइट का पता तो मैं ही आपको दे देता हूं (आपकी जानकारी के लिए बताता चलूं कि वहां तार्किक युद्ध हिन्दू-मुस्लिम के बीच ना होकर दोनों ही सेमेटिक धर्मों यानि कि इस्लाम और इसाइयत के बीच है). उस का वेब पता है- "http://www.faithfreedom.org/" आशा है, आपकी बहस-मुबाहिसे और पीछे पड़ने की इच्छा में मैंने कुछ सहायता की होगी. धन्यवाद…..

  32. >"Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…मैं आजकल DD-Urdu के कुछ episode तैयार कराने में व्‍यस्त हूँ"जनाब कैरानवी, दूसरों को ध्यान से पढ़ने की सलाह देने की अपेक्षा कुछ आप भी ध्यान से लिखने-बोलने की जहमत उठाते तो अच्छा रहता। बताइए कि आपकी पूर्व टिप्पणी में कहां लिखा है कि आप " केवल Scripts में सहायता" करने में व्यस्त हैं?? यदि हिन्दी की समझ है तो आप ही बताईये कि मेरे टिप्पणी में लिखित दूसरी पंक्ति से क्या अर्थ निकलता है??आपकी टिप्पणी से जान कि बहस-मुबाहिसे (हालांकि आपकी टिप्पणियों से ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता) और पीछे पड़ने में ज्यादा ही रुचि है, तो आपको बता दूं कि अंतरताने पर इन विषयों को अधिकृत कर ऐसी बहुत सी साइट है, जहां अपनी भड़ास को निकाल सकते है. उनमे से एक साइट का पता तो मैं ही आपको दे देता हूं (आपकी जानकारी के लिए बताता चलूं कि वहां तार्किक युद्ध हिन्दू-मुस्लिम के बीच ना होकर दोनों ही सेमेटिक धर्मों यानि कि इस्लाम और इसाइयत के बीच है). उस का वेब पता है- "http://www.faithfreedom.org/" आशा है, आपकी बहस-मुबाहिसे और पीछे पड़ने की इच्छा में मैंने कुछ सहायता की होगी. धन्यवाद…..

  33. >हमारे प्रश्नों के उत्तर कहाँ हैं?इसके पहले पूछे गये प्रश्नों के उत्तर कहाँ हैं?कुरान की पाँच अच्छी (सुभाषित) आयतें लिखने का आग्रह कबसे कर रहा हूँ। जरा जल्दी कीजिये।कुरान का अल्लाह सह-अस्तित्व के विरुद्ध क्यों है?

  34. >हमारे प्रश्नों के उत्तर कहाँ हैं?इसके पहले पूछे गये प्रश्नों के उत्तर कहाँ हैं?कुरान की पाँच अच्छी (सुभाषित) आयतें लिखने का आग्रह कबसे कर रहा हूँ। जरा जल्दी कीजिये।कुरान का अल्लाह सह-अस्तित्व के विरुद्ध क्यों है?

  35. >अनुवाद सिंह जी, मैंने आपको लिखा है कि वह श्‍लोक यहाँ डालो, सलीम साहब का दरबार उसके लिये उपयुक्‍त है, वह मंच इसके लिये ठीक नहीं था, केवल कापी करके यहाँ पेस्ट करदो, फिर सारे धर्मों को चैलेंज करूंगा कि पहले वह जवाब दें फिर मैं दूंगा,मैं जवाब पेन ड्राइव में लिये फिरता हूँ बस संयम से काम ले रहा हूँ इस बहाने सर्वधर्म को आजमा लूंगा,इसाई,यहूदी,जैन,बौद्ध्,कादियानी,बहाई सबको आजमा लेंगे वह चुप रहेंगे, फिर सोचो जीत तम्‍हारी या मेरी होगी, दुनिया देखेगी, मानेगी मनु को जो आगे चलकर तम्‍हारा भी है हमारा भी हीरो है,और वह भी बताउंगा कि जो तुम जानना नहीं चाहते कि कैसे मनु पर जाकर इस्‍लाम और हिन्‍दू धर्म एक हो जाता है

  36. >अनुवाद सिंह जी, मैंने आपको लिखा है कि वह श्‍लोक यहाँ डालो, सलीम साहब का दरबार उसके लिये उपयुक्‍त है, वह मंच इसके लिये ठीक नहीं था, केवल कापी करके यहाँ पेस्ट करदो, फिर सारे धर्मों को चैलेंज करूंगा कि पहले वह जवाब दें फिर मैं दूंगा,मैं जवाब पेन ड्राइव में लिये फिरता हूँ बस संयम से काम ले रहा हूँ इस बहाने सर्वधर्म को आजमा लूंगा,इसाई,यहूदी,जैन,बौद्ध्,कादियानी,बहाई सबको आजमा लेंगे वह चुप रहेंगे, फिर सोचो जीत तम्‍हारी या मेरी होगी, दुनिया देखेगी, मानेगी मनु को जो आगे चलकर तम्‍हारा भी है हमारा भी हीरो है,और वह भी बताउंगा कि जो तुम जानना नहीं चाहते कि कैसे मनु पर जाकर इस्‍लाम और हिन्‍दू धर्म एक हो जाता है

  37. >अनुनाद भाई, काहे भेजाफ़ोड़ी कर रहे हो…। मतलब की एक बात सुनने की बजाय, इधर जमाने भर के खेत-खलिहान की बातें सुनने को मिलेंगी… काम की बात एक भी नहीं…। अपना समय खराब कर रहे हो अनुनाद…। आप कहेंगे कुछ और, वे सुनेंगे कुछ और, अन्त में बतायेंगे कुछ तीसरा ही…। भई मैं तो नादान हूं, कोई मुझे समझाये कि आखिर कैरानवी किस भाषा में? किससे? और क्या? कहना चाहते हैं, मैं तो आज तक इनकी एक बात भी समझ नहीं पाया… (नादान जो ठहरा…) लेकिन किसी और को समझ में आई हो तो मुझे बतायें, ताकि मेरी मोटी बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश फ़ैले…🙂

  38. >अनुनाद भाई, काहे भेजाफ़ोड़ी कर रहे हो…। मतलब की एक बात सुनने की बजाय, इधर जमाने भर के खेत-खलिहान की बातें सुनने को मिलेंगी… काम की बात एक भी नहीं…। अपना समय खराब कर रहे हो अनुनाद…। आप कहेंगे कुछ और, वे सुनेंगे कुछ और, अन्त में बतायेंगे कुछ तीसरा ही…। भई मैं तो नादान हूं, कोई मुझे समझाये कि आखिर कैरानवी किस भाषा में? किससे? और क्या? कहना चाहते हैं, मैं तो आज तक इनकी एक बात भी समझ नहीं पाया… (नादान जो ठहरा…) लेकिन किसी और को समझ में आई हो तो मुझे बतायें, ताकि मेरी मोटी बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश फ़ैले…🙂

  39. Sneha says:

    >सलीम जी,इनके बारे में आपका कुरान क्या कहता है. (ग्रामैटिकल मिस्टेक पर मत जाना मुद्दे की एहीमीयत समझो)अभी हाल में अफगानिस्तान में एक नया फतवा जारी किया गया है जिसके अनुसार अगर कोई औरत अपने पति को हमबिस्तर होने से मना करती है तो उसे भोजन नही दिया जायेंगा। इस बात में हमें गौर करना चाहिये कि अगर कोई औरत अपने पति कों हमबिस्तर होने से क्यों मना करेगी और अगर कर भी रही है तो कुछ ना कुछ मजबूरी होगा इस्लाम के विद्वानों को औरतों का इस मजबूरी से कोई लेना देना नही है जिसके चलते एक नया फतवा लगा दिया जिसके तहत औरत अगर हमबिस्तर होने से मना कि तो भोजन नही मिलेगा।असम के हाउली टाउन में कुछ महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया गया क्योंकि उन्होंने एक मस्जिद के भीतर जाकर नमाज अदा की थी। असम के इस मुस्लिम बाहुल्य इलाके की शांति उस समय भंग हो गई , जब 29 जून शुक्रवार को यहां की एक मस्जिद में औरतों के एक समूह ने अलग से बनी एक जगह पर बैठकर जुमे की नमाज अदा की। राज्य भर से आई इन महिलाओं ने मॉडरेट्स के नेतृत्व में मस्जिद में प्रवेश किया। जिले के दीनी तालीम बोर्ड ऑफ द कम्युनिटी ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि इस तरीके की हरकत गैरइस्लामी है। बोर्ड ने मस्जिद में महिलाओं द्वारा नमाज करने को रोकने के लिए फतवा भी जारी किया।समाज अधुनिक हो रहा है मुस्लिम समाज भी अपने लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिये प्रोत्साहित कर रहें है जिसके कारण लड़कियों को घर से बाहर निकल रही है और शिक्षा के बाद अपना भविष्य के संवारने के लिये अपना मनचाहा कैरियर चुन रही है और किसी भी दुसरे धर्म के लड़कियों कि तरह वह इस देश और समाज को आगें बढाने में मदद कर रही है ये बातें धर्म के ठिकेदारों को नागावार गुजरा जिसके कारण और नौकरीपेशा महिलाओं द्वारा अपने कुंआरे पुरुष को-वर्करों को कम से कम 5 बार अपनी छाती का दूध पिलाने का फतवा जारी किया। तर्क यह दिया गया कि इससे उनमें मां-बेटों की रिलेशनशिप बनेगी और अकेलेपन के दौरान वे किसी भी इस्लामिक मान्यता को तोड़ने से बचेंगे।http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2118751.cmsक्या कहते हो सलीम जी?और श्रीमद् भागवत गीता को भगवत गीता लिखना बंद किजीये वरना कैरानवी साहब आपको नहीं बख्शेंगे. क्यों कैरानवी साहब "यह नालायक तो ग्रथ का नाम तक ठीक नहीं लिख सकता" इनकी गलती नहीं सुधारेंगे? आपकी तो नजर है इन कमेंटस पर?

  40. Sneha says:

    >सलीम जी,इनके बारे में आपका कुरान क्या कहता है. (ग्रामैटिकल मिस्टेक पर मत जाना मुद्दे की एहीमीयत समझो)अभी हाल में अफगानिस्तान में एक नया फतवा जारी किया गया है जिसके अनुसार अगर कोई औरत अपने पति को हमबिस्तर होने से मना करती है तो उसे भोजन नही दिया जायेंगा। इस बात में हमें गौर करना चाहिये कि अगर कोई औरत अपने पति कों हमबिस्तर होने से क्यों मना करेगी और अगर कर भी रही है तो कुछ ना कुछ मजबूरी होगा इस्लाम के विद्वानों को औरतों का इस मजबूरी से कोई लेना देना नही है जिसके चलते एक नया फतवा लगा दिया जिसके तहत औरत अगर हमबिस्तर होने से मना कि तो भोजन नही मिलेगा।असम के हाउली टाउन में कुछ महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया गया क्योंकि उन्होंने एक मस्जिद के भीतर जाकर नमाज अदा की थी। असम के इस मुस्लिम बाहुल्य इलाके की शांति उस समय भंग हो गई , जब 29 जून शुक्रवार को यहां की एक मस्जिद में औरतों के एक समूह ने अलग से बनी एक जगह पर बैठकर जुमे की नमाज अदा की। राज्य भर से आई इन महिलाओं ने मॉडरेट्स के नेतृत्व में मस्जिद में प्रवेश किया। जिले के दीनी तालीम बोर्ड ऑफ द कम्युनिटी ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि इस तरीके की हरकत गैरइस्लामी है। बोर्ड ने मस्जिद में महिलाओं द्वारा नमाज करने को रोकने के लिए फतवा भी जारी किया।समाज अधुनिक हो रहा है मुस्लिम समाज भी अपने लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिये प्रोत्साहित कर रहें है जिसके कारण लड़कियों को घर से बाहर निकल रही है और शिक्षा के बाद अपना भविष्य के संवारने के लिये अपना मनचाहा कैरियर चुन रही है और किसी भी दुसरे धर्म के लड़कियों कि तरह वह इस देश और समाज को आगें बढाने में मदद कर रही है ये बातें धर्म के ठिकेदारों को नागावार गुजरा जिसके कारण और नौकरीपेशा महिलाओं द्वारा अपने कुंआरे पुरुष को-वर्करों को कम से कम 5 बार अपनी छाती का दूध पिलाने का फतवा जारी किया। तर्क यह दिया गया कि इससे उनमें मां-बेटों की रिलेशनशिप बनेगी और अकेलेपन के दौरान वे किसी भी इस्लामिक मान्यता को तोड़ने से बचेंगे।http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2118751.cmsक्या कहते हो सलीम जी?और श्रीमद् भागवत गीता को भगवत गीता लिखना बंद किजीये वरना कैरानवी साहब आपको नहीं बख्शेंगे. क्यों कैरानवी साहब "यह नालायक तो ग्रथ का नाम तक ठीक नहीं लिख सकता" इनकी गलती नहीं सुधारेंगे? आपकी तो नजर है इन कमेंटस पर?

  41. कुश says:

    >हाय-तौबा की आयत संख्या सात में लिखा है कि मुश्रीकों के बारे में उतना ही उल्टा सीधा लिखो जब तक उनकी खोपडी नहीं सटके वरना अगर उनकी सटक गयी तो अच्छे अच्छो की सटका देते है..

  42. कुश says:

    >हाय-तौबा की आयत संख्या सात में लिखा है कि मुश्रीकों के बारे में उतना ही उल्टा सीधा लिखो जब तक उनकी खोपडी नहीं सटके वरना अगर उनकी सटक गयी तो अच्छे अच्छो की सटका देते है..

  43. varsha says:

    >सलीम जी जिस तरह से आपने दो धर्म ग्रंथों की तुलना की है, तर्कसंगत नहीं लगती है। श्रीमद भगवद गीता में जिस धर्म युद्ध की बात की गई है वह एक हिंदू क्षत्रिय के अपने क्षत्रिय धर्म निभाने को लेकर है जिसका अर्थ यह है की युद्ध में पीठ फेर लेना या विचलित होना एक क्षत्रिय का धर्म नहीं है, फ़िर भले ही उसके शत्रु स्वयं उसके सगे सम्बन्धी क्यों न हों। यहाँ धर्म शब्द का अर्थ क्षत्रिय धर्म है न की हिंदू धर्म का बाकी सभी धर्मों के विरुद्ध 'धर्म युद्ध'। अनुनाद जी इस बात को अपनी टिप्पणियों में भली भाँती समझा चुके हें फ़िर भी..

  44. varsha says:

    >सलीम जी जिस तरह से आपने दो धर्म ग्रंथों की तुलना की है, तर्कसंगत नहीं लगती है। श्रीमद भगवद गीता में जिस धर्म युद्ध की बात की गई है वह एक हिंदू क्षत्रिय के अपने क्षत्रिय धर्म निभाने को लेकर है जिसका अर्थ यह है की युद्ध में पीठ फेर लेना या विचलित होना एक क्षत्रिय का धर्म नहीं है, फ़िर भले ही उसके शत्रु स्वयं उसके सगे सम्बन्धी क्यों न हों। यहाँ धर्म शब्द का अर्थ क्षत्रिय धर्म है न की हिंदू धर्म का बाकी सभी धर्मों के विरुद्ध 'धर्म युद्ध'। अनुनाद जी इस बात को अपनी टिप्पणियों में भली भाँती समझा चुके हें फ़िर भी..

  45. Anonymous says:

    >hame to ye baa de kuran pahle likhi gayi ya maha bhart bas ye jawab dede to pata laga

  46. Anonymous says:

    >hame to ye baa de kuran pahle likhi gayi ya maha bhart bas ye jawab dede to pata laga

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