स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मांसाहार जायज़ नहीं है, यह एक राक्षशी कृत्य है. Non-veg is not-permitted, its an evil task

>इस्लाम धर्म में मांसाहार की रीति दयाभाव के प्रतिकूल है. पशुवध निर्दयता है. धर्म निर्दयता और हिंसा नहीं सिखाता है, फिर इस्लाम निर्दयी क्यूँ है, निर्दयता की शिक्षा क्यूँ देता है? अल्लाह का नाम लेकर पशुवध करने से क्या यह कृत्य वैध हो जाता है, अच्छा बन जाता है? ईद में करोडों जानवरों की हत्या क्यूँ करते है? क्या यह घोर निर्दयता नहीं???


यही कुछ सवाल और इससे मिलते जुलते सवालात मेरे पिछले लेख “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” और “मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब” में लोगों ने किये हालाँकि मेरे वे दोनों लेख अपने आप में पूर्ण थे लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस बात से से सहमत नहीं थे की मांसाहार भी जायज़ है. यह लेख ख़ास उनके लिए…

देखिये ! मैंने पहले ही कहा था कि “”मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

जीव-हत्या अपने आप में न सही है न गलत, न उचित है न अनुचित, न निंदनीय है न सराहनीय. इसका सही या गलत होना इस बात पर निर्भर है कि इसका ‘उद्देश्य’ क्या है? और…जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लाम का दृष्टिकोण भी यही है. मिसाल के तौर पर एक जीवित मेंढक की अनर्थ हत्या करके उसे फेंक दिया जाये तो यह इस्लामी दृष्टिकोण में हिंसा, निर्दयता और पाप है लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों को शल्य-प्रशिक्षण देने के लिए उनके द्वारा मेडिकल कॉलेज में जो मेंढकों को चीरा-फाड़ा जाता है, वह निरर्थक व व्यर्थ कार्य न होकर मनुष्य व मानवजाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा,न पाप बल्कि लाभदायक,वांछनीय और सराहनीय है.

और मेरा यह विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही माप-दंड, सम्पूर्ण मानव-समाज में, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है.यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तकाज़ों के अनुकूल भी.

हालाँकि जीव-हत्या या मांसाहार या पशु-बलि को विश्व के दो बड़े धर्मों सनातन धर्म और इस्लाम धर्म में मान्यता प्राप्त है. सनातन धर्म के अनुसार (कृपया मेरे पिछले लेख देखें) ‘देवताओं’ को प्रसन्न करने के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से पशु-बलि की अनुमति और आदेश मौजूद है. देखें: मनुस्मृति 3/123, 3/268, 5/23, 5/27-28 ऋग्वेद 10/27/2, 10/28/3 अथर्ववेद 9/6/4/43/8 और इस्लाम धर्म में भी अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि का विधान है. अतः सृष्टि के सृजनकर्ता- अल्लाह – अल्लाह ने पृथ्वी के सारे जीवधारी व अजीवधारी वस्तुए मनुष्य के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उपयोग या उपभोग के लिए बनाये गयी हैं. प्रत्यक्ष उपभोग में मांसाहार भी आता है और इसे इस्लाम व गैर-इस्लाम में सामान्य मान्यता मिली हुई है. कुछ व्यक्तिगत या सीमित सामुदायिक अप्वाद्द हैं, जो कि नगण्य हैं. जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लामी दृष्टिकोण को आसानी से समझा जा सकता है. हर जीवधारी (वनस्पति या पशु-पक्षी) को मनुष्य के उपभोग के लिए पैदा किया गया है. पेड़-पौधों, फलों, तरकारियों को काटना, तोड़ना (खाना और उपभोग करना) भी उसी प्रकार की जीव-हत्या है जिस प्रकार की मछलियाँ, पक्षियों एवं पशुओं को खाने के लिए उनकी हत्या करना.

अगर आप अभी भी संतुष्ट नहीं हैं तो आपकी आलोचनाओं का स्वागत है.
-सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार, शाकाहार

14 Responses

  1. Jhataka says:

    >तुम अपनी हरक़तों से बाज़ नहीं आओगे

  2. Jhataka says:

    >तुम अपनी हरक़तों से बाज़ नहीं आओगे

  3. >lagta hai tum tippniyon ke liye likhte ho kyonki tumhare tark nahin kutark hote hain . pata nhin kaun se dharm granthon ke havale dete ho. hamne to suna hai ki mansahaar chahe kisi bhi majhab me shuru huaa, uska karan akaal tha jab prithvi par akaal pada to manushy ke pas apni jaan bachane ko apne maveshi va jangali jaanvar the ,isi se mansahaar ka prachalan badha.

  4. >lagta hai tum tippniyon ke liye likhte ho kyonki tumhare tark nahin kutark hote hain . pata nhin kaun se dharm granthon ke havale dete ho. hamne to suna hai ki mansahaar chahe kisi bhi majhab me shuru huaa, uska karan akaal tha jab prithvi par akaal pada to manushy ke pas apni jaan bachane ko apne maveshi va jangali jaanvar the ,isi se mansahaar ka prachalan badha.

  5. >सलीम जी, आपके इसी विषय पर लिखे पिछले घटिया लेख पर मैंने टिप्‍पणी की थी जिस पर आपका जवाब अभी तक अपेक्षित है पर अपने नया घसीटा लिख मारा इसलिए मैं अपनी पिछली टिप्‍पणी पुन: दोहरा रहा हूं जो नीचे है। पर उसके पहले आपसे मैं सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूं कि यदि मांसाहार इतना ही जायज है तो मुसलमानों के सबसे पाक सबब अर्थात हज करने के दौरान क्‍या हाजी मांस का सेवन करते हैं? इसका जवाब बिना लाग लपेट के हां या न में देना। अब पिछले लेख पर पिछली टिप्‍पणी पुन: दोहरा देता हूं। सलीम भाई, एक बार पुन: बधाई। आपके लेख मांसाहार/शाकाहार के बारे में पढकर बडा अच्‍छा लगा। आपसे यह जानने की अपेक्षा है कि इतने बेहतरीन दांतों और आंतों से आपको गाय का मांस स्‍वादिष्‍ट लगा या सूअर का। और कभी मौका लगे तो गि‍रगिट भी खाकर देखिएगा। लोग कहते हैं कि उसका मांस भी बहुत स्‍वादिष्‍ट होता है। बात अधूरी ही रह जाएगी अगर यह न कहा जाए कि मांस भक्षण की ऐसी ही चटोरी जीभों ने अजन्‍मे मानव शिशुओं को भी खाना शुरु कर दिया है अगर कभी मौका लगे तो उनके शरीर के स्‍वाद का भी रसबखान अपने अगले लेख में करिएगा।

  6. >सलीम जी, आपके इसी विषय पर लिखे पिछले घटिया लेख पर मैंने टिप्‍पणी की थी जिस पर आपका जवाब अभी तक अपेक्षित है पर अपने नया घसीटा लिख मारा इसलिए मैं अपनी पिछली टिप्‍पणी पुन: दोहरा रहा हूं जो नीचे है। पर उसके पहले आपसे मैं सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूं कि यदि मांसाहार इतना ही जायज है तो मुसलमानों के सबसे पाक सबब अर्थात हज करने के दौरान क्‍या हाजी मांस का सेवन करते हैं? इसका जवाब बिना लाग लपेट के हां या न में देना। अब पिछले लेख पर पिछली टिप्‍पणी पुन: दोहरा देता हूं। सलीम भाई, एक बार पुन: बधाई। आपके लेख मांसाहार/शाकाहार के बारे में पढकर बडा अच्‍छा लगा। आपसे यह जानने की अपेक्षा है कि इतने बेहतरीन दांतों और आंतों से आपको गाय का मांस स्‍वादिष्‍ट लगा या सूअर का। और कभी मौका लगे तो गि‍रगिट भी खाकर देखिएगा। लोग कहते हैं कि उसका मांस भी बहुत स्‍वादिष्‍ट होता है। बात अधूरी ही रह जाएगी अगर यह न कहा जाए कि मांस भक्षण की ऐसी ही चटोरी जीभों ने अजन्‍मे मानव शिशुओं को भी खाना शुरु कर दिया है अगर कभी मौका लगे तो उनके शरीर के स्‍वाद का भी रसबखान अपने अगले लेख में करिएगा।

  7. >आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ- रचना गौड़ ‘भारती’

  8. >आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ- रचना गौड़ ‘भारती’

  9. >सलीम भाई कुतर्कों की भी एक सीमा होती है | आपने तो वो सीमा भी पार कर दी | मुझको लगता है, आपको सिर्फ बोलना आता है किसी का सुनना नहीं | अमा यार ऊपर वाले ने दो आँख, दो कान और मुह एक ही दिया, मतलब दुसरे की भी सुनो और सत्य को आँख खोल कर देखो | पर आप तो एक तरफा भोपूं बजाये जा रहे हो, दुसरे की बात या तर्क, विचार से आपका कोई मतलब ही नहीं | कितने सारे तर्क दिए आपकी कुतर्कों पे, पर आपने एक का भी जवाब नहीं दिया और अब हाज़िर हो गए फिर से एक नया पोस्ट लेकर | पहले हमारे तर्कों का जवाब दो, फिर नै पोस्ट करते | खैर आप… भैंस के आगे बिन बजाये भैंस रहे पगुराय … "

  10. >सलीम भाई कुतर्कों की भी एक सीमा होती है | आपने तो वो सीमा भी पार कर दी | मुझको लगता है, आपको सिर्फ बोलना आता है किसी का सुनना नहीं | अमा यार ऊपर वाले ने दो आँख, दो कान और मुह एक ही दिया, मतलब दुसरे की भी सुनो और सत्य को आँख खोल कर देखो | पर आप तो एक तरफा भोपूं बजाये जा रहे हो, दुसरे की बात या तर्क, विचार से आपका कोई मतलब ही नहीं | कितने सारे तर्क दिए आपकी कुतर्कों पे, पर आपने एक का भी जवाब नहीं दिया और अब हाज़िर हो गए फिर से एक नया पोस्ट लेकर | पहले हमारे तर्कों का जवाब दो, फिर नै पोस्ट करते | खैर आप… भैंस के आगे बिन बजाये भैंस रहे पगुराय … "

  11. >यार सलीम रोज तो आपलोग मांस खाते ही हो … खाओ ना , हिन्दुओं ने मना तो नहीं किया है ना ? फिर क्यों हमें सीखा रहे हो की मांस खाना अच्छा है ? एक बात और और सुनो यार , मरने की बाद उसके body को कहाँ दफनाते हो ? कब्रगाह मैं | तो एक मुर्गी के मरे सरीर को पेट मैं दाल कर इसे कब्रगाह ही बनाना छह रहे हो क्या ?देखो भाई मैं ऐसा नहीं बोलता की तुम मांस मत खाओ पर ये मत कहो की अपने जीभ के लिए जानवरों को मार – मार कर खाते जाव | सलीम भाई और एक बात बोलूंगा, आपको इस्लाम अच्छा लगता है अच्छी बात है | हमें भी इससे बैर नहीं पर आप हिन्दू ग्रंथों की बात ना किया करो तो ही अच्छा है | संस्कृत तो आती नहीं … और हिन्दू ग्रंथों को समझने के लिए गुरु की सर्नागति जरुरी है, बिना इसके हिन्दू ग्रन्थ पढने का कोई मतलब नहीं | जैसे की मैं यदि कुरान बिना मुल्ला-मौलवी के पढूं तो उलटा अर्थ निकाल लूंगा | Example : Lo! Those who disbelieve Our revelations, We shall expose them to the Fire. As often as their skins are consumed We shall exchange them for fresh skins that they may taste the torment. Lo! Allah is ever Mighty, Wise. (56) sura – 4 Site to read Kuran: http://quranexplorer.com/ अब आप कहोगे कुरान का मैं गलत अर्थ निकाल रहा हूँ , बिलकुल सही | इसी तरह आप भी तो हिन्दू ग्रंथों का गलत अर्थ ही निकाल रहे हो ना ? ऐसा क्यों करना , क्या इस्लाम ऐसा बोल रहा है की दुसरे के धर्म ग्रंथों को तोड़-मरोड़ कर पेश करो ? ऐशा कर के आप इस्लाम का भला नहीं कर रहे हो | जो भी हिन्दू सब पढ़ रहा है उसके मन मैं इस्लाम के प्रति आदर भाव नहीं आ रहा है , जो भी आदर है वो जा रहा है |

  12. >यार सलीम रोज तो आपलोग मांस खाते ही हो … खाओ ना , हिन्दुओं ने मना तो नहीं किया है ना ? फिर क्यों हमें सीखा रहे हो की मांस खाना अच्छा है ? एक बात और और सुनो यार , मरने की बाद उसके body को कहाँ दफनाते हो ? कब्रगाह मैं | तो एक मुर्गी के मरे सरीर को पेट मैं दाल कर इसे कब्रगाह ही बनाना छह रहे हो क्या ?देखो भाई मैं ऐसा नहीं बोलता की तुम मांस मत खाओ पर ये मत कहो की अपने जीभ के लिए जानवरों को मार – मार कर खाते जाव | सलीम भाई और एक बात बोलूंगा, आपको इस्लाम अच्छा लगता है अच्छी बात है | हमें भी इससे बैर नहीं पर आप हिन्दू ग्रंथों की बात ना किया करो तो ही अच्छा है | संस्कृत तो आती नहीं … और हिन्दू ग्रंथों को समझने के लिए गुरु की सर्नागति जरुरी है, बिना इसके हिन्दू ग्रन्थ पढने का कोई मतलब नहीं | जैसे की मैं यदि कुरान बिना मुल्ला-मौलवी के पढूं तो उलटा अर्थ निकाल लूंगा | Example : Lo! Those who disbelieve Our revelations, We shall expose them to the Fire. As often as their skins are consumed We shall exchange them for fresh skins that they may taste the torment. Lo! Allah is ever Mighty, Wise. (56) sura – 4 Site to read Kuran: http://quranexplorer.com/ अब आप कहोगे कुरान का मैं गलत अर्थ निकाल रहा हूँ , बिलकुल सही | इसी तरह आप भी तो हिन्दू ग्रंथों का गलत अर्थ ही निकाल रहे हो ना ? ऐसा क्यों करना , क्या इस्लाम ऐसा बोल रहा है की दुसरे के धर्म ग्रंथों को तोड़-मरोड़ कर पेश करो ? ऐशा कर के आप इस्लाम का भला नहीं कर रहे हो | जो भी हिन्दू सब पढ़ रहा है उसके मन मैं इस्लाम के प्रति आदर भाव नहीं आ रहा है , जो भी आदर है वो जा रहा है |

  13. >आप यह तिसरी पोस्ट दे रहे है,मांसाहार पर क्यो शायद इसलिये कि मांसाहारियोँ को क्रुर मानने की मान्यता है,और सिद्ध करना चाह्ते है.मान्साहारी भी शांतिप्रिय हो सकते है.जाकिर नाईक से सुना था,एक मुसलमान भी शाकाहारी रह्कर अच्छा मुसलमान हो सकता हैबस कोई एसे या वेसे नहिँ, इन जीवोँ पर थोडा रहम करो,माँसाहार का त्याग करो,त्याग का अर्थ ही कुर्बानी है तो माँसाहार की कुर्बानी दे दो,अल्लाह ने अपने भुखे बंदो पर रहम कर भले कह दिया हमने इन जीवोँ को तुम्हारे लिये बनाया है,यह उसका बड्डपन है,पर यदि शाकाहार से हमारा निर्वाह हो जाय तो बेज़ा उसकी रहमतो का क्योँ इस्तेमाल करेँ.

  14. >आप यह तिसरी पोस्ट दे रहे है,मांसाहार पर क्यो शायद इसलिये कि मांसाहारियोँ को क्रुर मानने की मान्यता है,और सिद्ध करना चाह्ते है.मान्साहारी भी शांतिप्रिय हो सकते है.जाकिर नाईक से सुना था,एक मुसलमान भी शाकाहारी रह्कर अच्छा मुसलमान हो सकता हैबस कोई एसे या वेसे नहिँ, इन जीवोँ पर थोडा रहम करो,माँसाहार का त्याग करो,त्याग का अर्थ ही कुर्बानी है तो माँसाहार की कुर्बानी दे दो,अल्लाह ने अपने भुखे बंदो पर रहम कर भले कह दिया हमने इन जीवोँ को तुम्हारे लिये बनाया है,यह उसका बड्डपन है,पर यदि शाकाहार से हमारा निर्वाह हो जाय तो बेज़ा उसकी रहमतो का क्योँ इस्तेमाल करेँ.

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