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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>भारत में मुसलमानों का इतिहास Muslims in India – An Overview

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भारत में सन् सात सौ ग्यारह ईसवी (711 CE) में मुसलमानों का आगमन हुआ था. इसी साल वे स्पेन में भी दाखिल हुए थे.
मुसलामानों का भारत में दाखिल होने का कारण था, समुद्री लूटेरों द्वारा मुसलमानों के नागरिक जहाज़ (पानी के जहाज़) को बंधक बनाना, जो कि सिंध के राजा दहिर के राज्य में आता था. जब राजनैतिक और कुटनीतिक प्रयास विफ़ल हो गए तो हज्जाज बिन युसूफ ने जो कि बगदाद के थे, ने एक बेहद छोटी सेना के साथ मुहम्मद बिन क़ासिम को भेजा जो उस वक़्त मात्र सत्रह (17) वर्ष के थे. मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के राजा दहिर को हरा कर जीत हासिल की, वहां जहाँ वर्तमान पाकिस्तान का हैदराबाद है. राजा दहिर ने अपने पुत्रों और भारत के दुसरे राजाओं से मदद मांगी और मुहम्मद बिन क़ासिम से लडाई की. जिसके फ़लस्वरूप मुहम्मद बिन क़ासिम ने निरून, रावर, बहरोर, ब्रह्मनाबाद, अरोर, दीपालपुर और मुल्तान पर सात सौ तेरह (713 CE) में जीत हासिल की और सिंध और पंजाब के राज्यों से लेकर कश्मीर तक अपना राज्य स्थापित किया. मुहम्मद बिन क़ासिम की उम्र उस वक़्त मात्र उन्नीस (19) साल थी. तब से (713 CE) आगे सदियाँ गुजरते हुए 1857 तक (मुग़ल साम्राज्य के पतन तक ) भारत पर आधिपत्य था. मुहम्मद बिन क़ासिम का भारत की जनता के साथ व्यवहार बेहद न्यायिक था, यही वजह थी कि जब वह बग़दाद वापस लौट रहा था तो यहाँ की जनता ने उसका नम आँखों से विदाई दी थी. भारत की जनता निराश थी क्यूंकि उन्हें मुहम्मद बिन क़ासिम से बहुत प्यार मिला था.

मलबार में ही एक कम्युनिटी ऐसी भी थी जो वहां चक्रवर्ती सम्राट फ़र्मस के हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के हाथों इस्लाम कुबुल करने के बाद से रह रही थी. सन् 713 CE से भारत में मुस्लिम साम्राज्य का आगाज़ हो चुका था जो की सन् 1857 तक जारी रहा, यह सफ़र कुछ ऐसे रहा कि कई और मुस्लिम शासक आये जो कि अपने ही मुस्लिम भाईयों से लड़े और अपना साम्राज्य फैलाया फिर चाहे वो मध्य एशिया के तुर्क हों,अफ़गान हों, मंगोल की संताने हों या मुग़ल.

ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम शासकों ने दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया जो कि बाद में मुग़ल शासकों की भी देश की राजधानी रही और सन् 1857 तक रही जब बहादुर शाह ज़फर को अंग्रेजों ने पदच्युत कर दिया. अल्हम्दुलिल्लाह, दिल्ली आज भी हमारे वर्तमान भारत देश की राजधानी है. दो सदी पहले भारत के सम्राट अकबर के द्वारा कुछ अंग्रेजों को यहाँ रुकने की इजाज़त दी गयी थी. इसके दो दशक बाद ही अंग्रेजों ने भारत के छोटे छोटे राजाओं और नवाबों से सांठ-गाँठ कर ली और मुग़ल और मुग़ल शासकों के खिलाफ़ राजाओं और नवाबों की सेना की ताक़त बढ़ाने की नियत से उन पर खर्च करना शुरू कर दिया और मुग़ल शासक अंग्रेज़ों से दो सदी तक लड़ते रहे और आखिरी में सन् 1857 में अंग्रेज़ों ने मुग़ल साम्राज्य का अंत कर दिया.

भारत पर हज़ारों साल तक शासन करने के बावजूद भारत में मुस्लिम अल्प-संख्यक थे और आज भी अल्प-संख्यक ही है, बावजूद इसके भारत में ही दुनिया में दुसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं. मुसलमानों के भारत पर इतने लम्बे समय तक राज करने का राज़ कुछ ऐसा ही था कि उनका अख़लाक़ और अंदाज़ यहाँ की जनता से बेहत मुहब्बत भरा था और यहाँ की जनता (बहु-संख्यक) ने भी उनको स्वीकार और साथ-साथ रहे. वो लोग जो ये कहते है कि इस्लाम तलवार के बल पर फैला है के मुहं पर भारत के बहु-संख्यक लोग तमाचा समान है और वे यह गवाही दे रहे है कि अगर वाकई इस्लाम तलवार की ज़ोर पर फैला होता तो क्या वाक़ई भारत में हजारों साल तक एकछत्र राज करने पर भी इतने हिन्दू बचे होते अर्थात नहीं. भारत में अस्सी प्रतिशत (80%) हिन्दू की मौजूदगी इस बात की शहादत दे रही है कि मुस्लिम शासकों ने तलवार नहीं मुहब्बत सिखाई. मुसलमानों का यह फ़न आज भी उनको दूसरो से अलग करता है.

भारत में मुस्लिम शासकों की पहचान यहाँ के इतिहास पढने पर मालूम हो जाती है कि वे कितने पुर-खुलूस, मुहब्बती और प्रजा-प्रेमी थे और उन्होंने न्याय, सांस्कृतिक और सामजिक समरसता, बोलने की आज़ादी, धार्मिक आज़ादी, दुसरे धर्मों के प्रति प्रेम-भावः, दुसरे धर्मों के लोगों के प्रति प्रेम-भावः, सभी धर्मों की भावनाओं के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था की स्थापना, लोक-निर्माण कार्य, शैक्षणिक कार्य की स्थापना की.

उस वक़्त जब यहाँ मुस्लिम शासकों का राज था भारत में मुसलमानों की आबादी बीस प्रतिशत (20%) थी, आज (15%) है. अगर पकिस्तान और बांग्लादेश अलग न होते तो हो सकता है कि भारत दुनिया का अकेला और पहला ऐसा देश होता जहाँ मुसलमानों की जनसँख्या सबसे ज्यादा होती. मगर अफ़सोस कि आज़ादी से पहले की छोटी सी भूल ने भारत देश के टुकड़े-टुकड़े हो गए. “लम्हों ने की खता और सदियाँ भुगत रही है…”

जब अंग्रेजों ने यह फैसला कर लिया कि भारत को आज़ादी दे देनी चाहिए और भविष्य के शासकों (पूर्व के शासकों अर्थात मुसलामानों) को उनको सौप देना चाहिए. भारत के आज़ादी के ऐन मौक़े पर भारत का विभाजन करा दिया गया. जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान बन गया.

Filed under: मुसलमान

36 Responses

  1. >सलीमं खान जी, इतिहास हिन्दू, मुसलमानों और ईसाइयों का नहीं होता। वह किसी क्षेत्र और देश की जनता का होता है। आप भी वही काम कर रहे हैं जो हिन्दूवादी करते हैं। इतिहास को क्यों बांट रहे हैं?

  2. >सलीमं खान जी, इतिहास हिन्दू, मुसलमानों और ईसाइयों का नहीं होता। वह किसी क्षेत्र और देश की जनता का होता है। आप भी वही काम कर रहे हैं जो हिन्दूवादी करते हैं। इतिहास को क्यों बांट रहे हैं?

  3. Sneha says:

    >सलीम जी,आप तो आस्तीन के साँप ही हो. और हो भी क्यों ना?इतिहास शायद आपने मदरसों में ही पढा है. इसीलिये मुस्लिम शासकों के प्रशंसक हैं.पहली बात – जगजाहिर है कि मुसलमान हिन्दुस्तान को केवल लूटने आये थे क्योंकि वो लुटेरे थे. हिन्दुस्तान की सोने-चाँदी की चमक ने उन्हें और पागल कर दिया. और अब सुनो कासिम की कारस्तानी :कासिम ने मुलतान के कई मंदिर मस्जिदों में बदल दिये गये थे. मुल्तान के सूर्य मंदिर के 6000 संरक्षकों को कासिम ने बंदी बनाया और उनकी सभी संपत्ति जब्त कर ली गई. इस मंदिर की मूर्ती को उसने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया बल्कि उसने मूर्ति के गले में गाय के माँस का टुकडा बाँध दिया. उस सोने के मंदिर को कासिम ने जमकर लूटा. कासिम ने बहुत से हिंदूओं को जबरन मुस्लिम बनवाया और उनको गुलामी और जजिया से मुक्त किया.तो कहने का मतलब है कि मुस्लमानों ने मंदिरों को खूब लूटा, तोडा क्योंकि वो लूटेरे थे, समझे सलीम मिंया.और भारत में अस्सी प्रतिशत हिंदु हैं तो बाकि बीस प्रतिशत कहाँ गए. उन्हें मुसलमान शासकों ने या तो मार दिया या तलवार के बल पर मुसलमान बना दिया.औरंगजेब ने अपने बाप और भाई को तो छोडा नहीं और बात करते हो मुसलिम शासकों की दयालूता कि.भारत की आजादी के समय मुसलमान शासकों को यदि भारत दे दिया होता तो इसका हाल पाकिस्तान से भी बुरा होता. दिया तो था पाकिस्तान निकल लेते यहाँ क्यों रुक गये?

  4. Sneha says:

    >सलीम जी,आप तो आस्तीन के साँप ही हो. और हो भी क्यों ना?इतिहास शायद आपने मदरसों में ही पढा है. इसीलिये मुस्लिम शासकों के प्रशंसक हैं.पहली बात – जगजाहिर है कि मुसलमान हिन्दुस्तान को केवल लूटने आये थे क्योंकि वो लुटेरे थे. हिन्दुस्तान की सोने-चाँदी की चमक ने उन्हें और पागल कर दिया. और अब सुनो कासिम की कारस्तानी :कासिम ने मुलतान के कई मंदिर मस्जिदों में बदल दिये गये थे. मुल्तान के सूर्य मंदिर के 6000 संरक्षकों को कासिम ने बंदी बनाया और उनकी सभी संपत्ति जब्त कर ली गई. इस मंदिर की मूर्ती को उसने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया बल्कि उसने मूर्ति के गले में गाय के माँस का टुकडा बाँध दिया. उस सोने के मंदिर को कासिम ने जमकर लूटा. कासिम ने बहुत से हिंदूओं को जबरन मुस्लिम बनवाया और उनको गुलामी और जजिया से मुक्त किया.तो कहने का मतलब है कि मुस्लमानों ने मंदिरों को खूब लूटा, तोडा क्योंकि वो लूटेरे थे, समझे सलीम मिंया.और भारत में अस्सी प्रतिशत हिंदु हैं तो बाकि बीस प्रतिशत कहाँ गए. उन्हें मुसलमान शासकों ने या तो मार दिया या तलवार के बल पर मुसलमान बना दिया.औरंगजेब ने अपने बाप और भाई को तो छोडा नहीं और बात करते हो मुसलिम शासकों की दयालूता कि.भारत की आजादी के समय मुसलमान शासकों को यदि भारत दे दिया होता तो इसका हाल पाकिस्तान से भी बुरा होता. दिया तो था पाकिस्तान निकल लेते यहाँ क्यों रुक गये?

  5. >स्नेह जी, आप और आप जैसे कथित राष्ट्रवादी लोगों के दिमाग में सिर्फ यही बात ही आती है कि मुसलमान ही हैं जो लुटेरे हैं, आतंकवादी हैं…वाह भाई वाह! आप राष्ट्रवादी और बाक़ी सब आतंकवादी…ख़ैर, मैं ये सब कहना नहीं छह रहा था…. और रहा मंदिरों को तोड़ने की बात तो यह बिलकुल ही बेबुनियाद है, मुस्लिम शासकों ने अगर मंदिर को ही तोड़ने थे तो आज एक भी मंदिर न बचता क्यूंकि अगर किसी की हुकुमत हज़ार साल से भी ज्यादा कहीं हो और बकौल आपके जैसा उनका स्वाभाव था. मुसलसल वैसा ही वाकई होता तो आज एक भी मंदिर नहीं बचता, और ना ही एक भी हिन्दू…. हाँ, मैं ये नहीं कहता कि सभी अच्छे ही थे कुछ हो सकता है कि खराब भी हों क्यूंकि काली भेंडे सभी समुदाय में मौजूद होती है…. हो सकता है इक्का दुक्का ऐसी वारदात हो तो इससे पुरे मुस्लिम जगत को ही बुरा कहना अच्छी बात नहीं…. अभी आप ही देखो टीपू सुलतान के महल के अन्दर आज भी, यु नो… आज भी महल के अन्दर मंदिर मौजूद है…. स्वभावतः मुस्लिम शांत होते हैं….. उनके दूसरो पर ज़ुल्म करने की उनका धर्म (इस्लाम) इजाज़त नहीं देता है…..लेकिन जब उन पर आक्रमण होता है तो लाज़िम है… जवाब तो देना ही पडेंगा.तो सुनिए….यह सच है कि यहां में मुगलों से पूर्व शक, हूण, कुशान के आक्रांता आये थे जिन्होंने देश के धन को भरपूर लूटा, सामूहिक कत्लेआम किये और स्त्री-पुरुषों को दास दासियां बना कर ले गये जहां उनमें से पुरुष का मूल्य 5 रुपया और स्त्री का मूल्य 10 रुपया लगा कर चौराहों पर नीलाम कर दिया गया। ये आक्रांता आये और चले गये थे। जब मुगल भारत में आये तो वे वापस नहीं गये। यह घोर निकृष्ट सोच है कि भारत का हिन्दू शक और हूणों को विदेशी और आक्रांता नहीं कहता है और न आर्यों को ही जिन्होंने 60 हजार अनार्यों का कत्लेआम किया था। शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे पर वे भारत में बस गये। इन आक्रांताओं और मुगलों में क्या अंतर है फिर मुगलों को आक्रांता कहना कितनी बेइमानी की बात है। सच बात तो यह है कि मुगलों ने तो कोई कत्लेआम भी नहीं किया। अकबर ने तो सर्वधर्म समभाव की भावना से प्रेरित होकर दीन ए इलाही चलाया था। औरंगजेब जिस प्रकार बदनाम किया जाता है वह घृणा भाव के कारण बदनाम किया जाता है वरना अनेक हिन्दू उसके दरबार में उच्च पदों पर थे। अनेक मंदिरों के लिए उसने शाही खजाने से धन दिया था। उसे 'जजिया कर' के लिए बदनाम किया जाता है पर जजिया तो उसने मुसलमानों पर भी लगाया था। औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।" (मेरे लेख "साम्प्रदायिकता का निवारण" का गद्यांश)

  6. >स्नेह जी, आप और आप जैसे कथित राष्ट्रवादी लोगों के दिमाग में सिर्फ यही बात ही आती है कि मुसलमान ही हैं जो लुटेरे हैं, आतंकवादी हैं…वाह भाई वाह! आप राष्ट्रवादी और बाक़ी सब आतंकवादी…ख़ैर, मैं ये सब कहना नहीं छह रहा था…. और रहा मंदिरों को तोड़ने की बात तो यह बिलकुल ही बेबुनियाद है, मुस्लिम शासकों ने अगर मंदिर को ही तोड़ने थे तो आज एक भी मंदिर न बचता क्यूंकि अगर किसी की हुकुमत हज़ार साल से भी ज्यादा कहीं हो और बकौल आपके जैसा उनका स्वाभाव था. मुसलसल वैसा ही वाकई होता तो आज एक भी मंदिर नहीं बचता, और ना ही एक भी हिन्दू…. हाँ, मैं ये नहीं कहता कि सभी अच्छे ही थे कुछ हो सकता है कि खराब भी हों क्यूंकि काली भेंडे सभी समुदाय में मौजूद होती है…. हो सकता है इक्का दुक्का ऐसी वारदात हो तो इससे पुरे मुस्लिम जगत को ही बुरा कहना अच्छी बात नहीं…. अभी आप ही देखो टीपू सुलतान के महल के अन्दर आज भी, यु नो… आज भी महल के अन्दर मंदिर मौजूद है…. स्वभावतः मुस्लिम शांत होते हैं….. उनके दूसरो पर ज़ुल्म करने की उनका धर्म (इस्लाम) इजाज़त नहीं देता है…..लेकिन जब उन पर आक्रमण होता है तो लाज़िम है… जवाब तो देना ही पडेंगा.तो सुनिए….यह सच है कि यहां में मुगलों से पूर्व शक, हूण, कुशान के आक्रांता आये थे जिन्होंने देश के धन को भरपूर लूटा, सामूहिक कत्लेआम किये और स्त्री-पुरुषों को दास दासियां बना कर ले गये जहां उनमें से पुरुष का मूल्य 5 रुपया और स्त्री का मूल्य 10 रुपया लगा कर चौराहों पर नीलाम कर दिया गया। ये आक्रांता आये और चले गये थे। जब मुगल भारत में आये तो वे वापस नहीं गये। यह घोर निकृष्ट सोच है कि भारत का हिन्दू शक और हूणों को विदेशी और आक्रांता नहीं कहता है और न आर्यों को ही जिन्होंने 60 हजार अनार्यों का कत्लेआम किया था। शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे पर वे भारत में बस गये। इन आक्रांताओं और मुगलों में क्या अंतर है फिर मुगलों को आक्रांता कहना कितनी बेइमानी की बात है। सच बात तो यह है कि मुगलों ने तो कोई कत्लेआम भी नहीं किया। अकबर ने तो सर्वधर्म समभाव की भावना से प्रेरित होकर दीन ए इलाही चलाया था। औरंगजेब जिस प्रकार बदनाम किया जाता है वह घृणा भाव के कारण बदनाम किया जाता है वरना अनेक हिन्दू उसके दरबार में उच्च पदों पर थे। अनेक मंदिरों के लिए उसने शाही खजाने से धन दिया था। उसे 'जजिया कर' के लिए बदनाम किया जाता है पर जजिया तो उसने मुसलमानों पर भी लगाया था। औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।" (मेरे लेख "साम्प्रदायिकता का निवारण" का गद्यांश)

  7. >खोजने पर नये तथ्य प्रकट हुए हैं कि भारत का इतिहास अंग्रेजों ने कम और हिन्दू लेखकों ने अधिक झूठे तथ्य घुसेड़ कर साम्प्रदायिक बनाया है और मुसलमानों के प्रति विषवमन किया है। विशम्भर नाथ पांडे पूर्व राज्यपाल उड़ीसा ने लिखा कि वे जब टीपू सुल्तान पर शोध कर रहे थे तो एक छात्रा के पास पुस्तक देखी, जिसमें लिखा था कि टीपू सुल्तान ने तीन हजार ब्राह्मणों को बलात इस्लाम धर्म कुबूल करने को विवश किया था और तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली थी। यह लेख एक हिन्दू लेखक पंडित हरप्रसाद शास्त्री का लिखा हुआ था। विशम्भर दयाल पांडे ने पं. हर प्रसाद से लिख कर पूछा कि यह कहां पर लिखा है तो हर प्रसाद ने कहा कि यह मैसूर के गजट में लिखा है पर गजट देखा गया, तो गजट में यह तथ्य कहीं नहीं पाया गया। इस प्रकार हिन्दू लेखकों ने मुसलमान बादशाहों के बारे में वैमनश्यतावश बहुत कुछ झूठ लिखा है। यही औरंगजेब के बारे में भी है। टीपू के बारे में तो यह प्रसिद्ध है कि उसका सेनापति ब्राह्मण था, वह 150 मंदिरों को प्रतिवर्ष अनुदान देता था, और श्रृंगेरी के जगतगुरु को बहुत मान्यता देता था। इससे साबित होता है कि इतिहास जानबूझ कर अंग्रेज लेखकों ने नहीं हिन्दू लेखकों ने ही झूठ लिखा है।

  8. >खोजने पर नये तथ्य प्रकट हुए हैं कि भारत का इतिहास अंग्रेजों ने कम और हिन्दू लेखकों ने अधिक झूठे तथ्य घुसेड़ कर साम्प्रदायिक बनाया है और मुसलमानों के प्रति विषवमन किया है। विशम्भर नाथ पांडे पूर्व राज्यपाल उड़ीसा ने लिखा कि वे जब टीपू सुल्तान पर शोध कर रहे थे तो एक छात्रा के पास पुस्तक देखी, जिसमें लिखा था कि टीपू सुल्तान ने तीन हजार ब्राह्मणों को बलात इस्लाम धर्म कुबूल करने को विवश किया था और तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली थी। यह लेख एक हिन्दू लेखक पंडित हरप्रसाद शास्त्री का लिखा हुआ था। विशम्भर दयाल पांडे ने पं. हर प्रसाद से लिख कर पूछा कि यह कहां पर लिखा है तो हर प्रसाद ने कहा कि यह मैसूर के गजट में लिखा है पर गजट देखा गया, तो गजट में यह तथ्य कहीं नहीं पाया गया। इस प्रकार हिन्दू लेखकों ने मुसलमान बादशाहों के बारे में वैमनश्यतावश बहुत कुछ झूठ लिखा है। यही औरंगजेब के बारे में भी है। टीपू के बारे में तो यह प्रसिद्ध है कि उसका सेनापति ब्राह्मण था, वह 150 मंदिरों को प्रतिवर्ष अनुदान देता था, और श्रृंगेरी के जगतगुरु को बहुत मान्यता देता था। इससे साबित होता है कि इतिहास जानबूझ कर अंग्रेज लेखकों ने नहीं हिन्दू लेखकों ने ही झूठ लिखा है।

  9. >औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।

  10. >औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था। कश्मीर के राजा हर्ष ने तो अनेक मूर्तियों को तुड़वाया था। मौर्य शासकों ने तो तमाम हिन्दू मूर्तियों को पिघला कर सिक्कों के लिए धातु इकट्ठी करायी थी।

  11. >देश का विभाजन हुआ इसके लिए मुसलमान दोषी नहीं है। यदि गहराई से खोज की जाय तो तथ्य यही सामने आते हैं कि इसकी योजना तो सावरकर जैसे हिन्दू नेताओं के घरों में बनायी गयी थी। इस प्रकार मुसलमानों को दोषी ठहराना नितांत गलत है।

  12. >देश का विभाजन हुआ इसके लिए मुसलमान दोषी नहीं है। यदि गहराई से खोज की जाय तो तथ्य यही सामने आते हैं कि इसकी योजना तो सावरकर जैसे हिन्दू नेताओं के घरों में बनायी गयी थी। इस प्रकार मुसलमानों को दोषी ठहराना नितांत गलत है।

  13. >हिन्दू समाज के उच्च तबकों (जातियों) में श्रेष्ठता का एक महारोग व्याप्त है। धर्म, जाति और लिंग सम्बंधी श्रेष्ठता की मानसिकता भी बहुत कुछ हमारी साम्प्रदायिक भावना को उभारने के लिए उत्तरदायी है। श्रेष्ठता की मानसिकता दूसरे के महत्व को स्वीकार करने की गुंजाइश समाप्त कर देता है और जब तथाकथित श्रेष्ठ तबके के अंह को कहीं ठेस पहुंचती है तो वह साम्प्रदायिकता पर उतर आता है

  14. >हिन्दू समाज के उच्च तबकों (जातियों) में श्रेष्ठता का एक महारोग व्याप्त है। धर्म, जाति और लिंग सम्बंधी श्रेष्ठता की मानसिकता भी बहुत कुछ हमारी साम्प्रदायिक भावना को उभारने के लिए उत्तरदायी है। श्रेष्ठता की मानसिकता दूसरे के महत्व को स्वीकार करने की गुंजाइश समाप्त कर देता है और जब तथाकथित श्रेष्ठ तबके के अंह को कहीं ठेस पहुंचती है तो वह साम्प्रदायिकता पर उतर आता है

  15. >बेशर्म मिंया ( शर्म होती तो एक बारी में समझ जाते,यह शब्द में इसलिए प्रयुक्त कर रहा हूँ क्योंकि आप बार बार हिन्दू धर्म पर निशाना शाद रहे है उसे उपदेश देने की कोशिश कर रहे है ! अपने धर्म में तुम लोग जो मर्जी करो, जैसे मर्जी जियो, लेकिन कम से कम आपके मुह से दुसरे के धर्म के बारे में कहना, मुझे कतई बरदास्त नहीं ! उपदेश सुनना उसी के मुह से अच्छा लगता है जो वाकई अनुसरण के लायक हो ! );अगर स्नेह जी की बात पर बिस्वास ना हो तो देश में जितने जेलखाने है उनका एक बार सर्वेक्षण कर आवो, वैसे मुसलमान अपने को इस देश में अल्पसंख्यक बताता है, किन्तु इन जेलों में आपको वे बहुसंखयक ही मिलेंगे, ये मेरा दावा है ! जब दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करके बच्चे पैदा किये जा रहे हो और उन्हें अच्छी तालीम नहीं दोगे तो वे पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ तो करेंगे ही ! और फिर दोष मदोगे देश पर कि यहाँ मुसलमानों के साथ पक्षपात होता है !

  16. >बेशर्म मिंया ( शर्म होती तो एक बारी में समझ जाते,यह शब्द में इसलिए प्रयुक्त कर रहा हूँ क्योंकि आप बार बार हिन्दू धर्म पर निशाना शाद रहे है उसे उपदेश देने की कोशिश कर रहे है ! अपने धर्म में तुम लोग जो मर्जी करो, जैसे मर्जी जियो, लेकिन कम से कम आपके मुह से दुसरे के धर्म के बारे में कहना, मुझे कतई बरदास्त नहीं ! उपदेश सुनना उसी के मुह से अच्छा लगता है जो वाकई अनुसरण के लायक हो ! );अगर स्नेह जी की बात पर बिस्वास ना हो तो देश में जितने जेलखाने है उनका एक बार सर्वेक्षण कर आवो, वैसे मुसलमान अपने को इस देश में अल्पसंख्यक बताता है, किन्तु इन जेलों में आपको वे बहुसंखयक ही मिलेंगे, ये मेरा दावा है ! जब दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करके बच्चे पैदा किये जा रहे हो और उन्हें अच्छी तालीम नहीं दोगे तो वे पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ तो करेंगे ही ! और फिर दोष मदोगे देश पर कि यहाँ मुसलमानों के साथ पक्षपात होता है !

  17. >मान गये गुरु , लगे रहो @ सलीम , देश का विभाजन हुआ – सही कह रहे हो . मुसलमानों को तो धक्का दे कर देश से निकाला था ना माँगा कोई था उन्होने , सावरकर के यहाँ योजना बनी तो क्या मुसलमानों ने सावरकर को अपना नेत्रत्व दे रखा था औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया – औरंगजेब तो चला गया अब तो इमानदार बनिये , शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे – हाँ वे भी बाहर के थे पर इस देश मे आने के बाद वो ये भूल गये कि वो बाहर से आये थे , उन को इस देश मे जो मिला – संस्कृति , भोजन , भाषा , पोशाक उन्होने अपना लिया , ओर इन को भी छोड़ दो बाहर से आया हुआ पारसी समुदाय आज भी इस देश मे है पर उन को कभी बाहर का नहीं माना जाता है ओर न ही वो इस तरह का बर्ताब करते है , बाकि आप खुद काफी समझदार है (जातियों) में श्रेष्ठता का एक महारोग व्याप्त — साथ ही इस बुराई को मानने का – विरोध करने का साहस ओर इस को दूर करने का प्रयास करने कि जीवंत प्रयास भी इसी धर्म मे है , पर क्या शिया सुन्नी अहमदिया जैसी विचाधाराओ को आप भूल गये बाकी जो आप कहै वो आपकी मर्जी

  18. >मान गये गुरु , लगे रहो @ सलीम , देश का विभाजन हुआ – सही कह रहे हो . मुसलमानों को तो धक्का दे कर देश से निकाला था ना माँगा कोई था उन्होने , सावरकर के यहाँ योजना बनी तो क्या मुसलमानों ने सावरकर को अपना नेत्रत्व दे रखा था औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया – औरंगजेब तो चला गया अब तो इमानदार बनिये , शक, हूण, कुषान तीनों ही बाहरी हत्यारे आक्रांता थे – हाँ वे भी बाहर के थे पर इस देश मे आने के बाद वो ये भूल गये कि वो बाहर से आये थे , उन को इस देश मे जो मिला – संस्कृति , भोजन , भाषा , पोशाक उन्होने अपना लिया , ओर इन को भी छोड़ दो बाहर से आया हुआ पारसी समुदाय आज भी इस देश मे है पर उन को कभी बाहर का नहीं माना जाता है ओर न ही वो इस तरह का बर्ताब करते है , बाकि आप खुद काफी समझदार है (जातियों) में श्रेष्ठता का एक महारोग व्याप्त — साथ ही इस बुराई को मानने का – विरोध करने का साहस ओर इस को दूर करने का प्रयास करने कि जीवंत प्रयास भी इसी धर्म मे है , पर क्या शिया सुन्नी अहमदिया जैसी विचाधाराओ को आप भूल गये बाकी जो आप कहै वो आपकी मर्जी

  19. Sneha says:

    >सलीम जी,क्या है कि शायद आपको शर्म आ रही है पूर्वजों के कारनामों पर इसलिये हर किसी कि बात को गलत बता देते हो.वैसे मुसलमानों के कुछ और कारनामें भी हैं जिन पर आप फक्र कर सकते हैं जरा गौर फरमाएं :-1. 1024 में महमूद गजनबी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा. यहाँ पूजा कर रहे करीब पचास हजार लोगों को उसने सरेआम कत्ल करवादिया. यहाँ से वो शिवलिंग को निकाल कर ले गया और मस्जिदो की सीढीयों में लगवा दिया. इस मंदिर पर सत्रह बार मुस्लमानों ने आक्रमण किया और लूटा.2. 1197 में इख्तियारउद्दीन नें नालन्दा विश्विधालय पर आक्रमण किया और उसे नष्ट किया.3. 1528 में बाबर ने अयोध्या में राम मन्दिर को तोडकर वहाँ बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया.4. 1688 में औरंगज़ेब ने मथुरा के करीब सभी (करीब 1000) मंदिर तुडवा दिये. 5. अपने शासन काल में मुसलमानों ने कुल मिलाकर करीब 60,000 मंदिरों को तुडवाकर उनके स्थान पर करीब 3000 मस्जिदों का निर्माण करवाया.इतिहास भरा पडा है सलीम जी, कभी आँखों से परदा हटा कर देखो और सच्चाई का सामना करो. आँखें बंद करने से कोई फायदा नहीं.आप मेरे केवल एक सवाल का जवाब दो कि मुसलमान अच्छे या बुरे जैसे भी थे – वो यहाँ हमारे देश, हमारे घर में करने क्या आये थे?और हाँ एक बात और वो यह कि मुझे इससे कोई सरोकार नहीं है कि आतंकवादी मुसलमान है या कोई और लेकिन यह सच है कि जो मुसलमान भारत आये थे वो यहाँ केवल भारत को लूटने ही आये थे और ऐसा उन्होंने किया भी.

  20. Sneha says:

    >सलीम जी,क्या है कि शायद आपको शर्म आ रही है पूर्वजों के कारनामों पर इसलिये हर किसी कि बात को गलत बता देते हो.वैसे मुसलमानों के कुछ और कारनामें भी हैं जिन पर आप फक्र कर सकते हैं जरा गौर फरमाएं :-1. 1024 में महमूद गजनबी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा. यहाँ पूजा कर रहे करीब पचास हजार लोगों को उसने सरेआम कत्ल करवादिया. यहाँ से वो शिवलिंग को निकाल कर ले गया और मस्जिदो की सीढीयों में लगवा दिया. इस मंदिर पर सत्रह बार मुस्लमानों ने आक्रमण किया और लूटा.2. 1197 में इख्तियारउद्दीन नें नालन्दा विश्विधालय पर आक्रमण किया और उसे नष्ट किया.3. 1528 में बाबर ने अयोध्या में राम मन्दिर को तोडकर वहाँ बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया.4. 1688 में औरंगज़ेब ने मथुरा के करीब सभी (करीब 1000) मंदिर तुडवा दिये. 5. अपने शासन काल में मुसलमानों ने कुल मिलाकर करीब 60,000 मंदिरों को तुडवाकर उनके स्थान पर करीब 3000 मस्जिदों का निर्माण करवाया.इतिहास भरा पडा है सलीम जी, कभी आँखों से परदा हटा कर देखो और सच्चाई का सामना करो. आँखें बंद करने से कोई फायदा नहीं.आप मेरे केवल एक सवाल का जवाब दो कि मुसलमान अच्छे या बुरे जैसे भी थे – वो यहाँ हमारे देश, हमारे घर में करने क्या आये थे?और हाँ एक बात और वो यह कि मुझे इससे कोई सरोकार नहीं है कि आतंकवादी मुसलमान है या कोई और लेकिन यह सच है कि जो मुसलमान भारत आये थे वो यहाँ केवल भारत को लूटने ही आये थे और ऐसा उन्होंने किया भी.

  21. >तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना। — औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।महानुभव ''औरंगज़ेब ने मन्दिर तोडा तो मस्जिद भी तोडी लेकिन क्यूं?'' लेख पढिये और इतिहासकार उसे कैसे तोडते मरोडते है यह जानने के लिये रेल में चुटकुले सुना कर अभी यहां पहुंचे श्री चिपलूनकर का लेख उनके ब्लाग पर देखें जो उन्‍होंने छिपा कर रखा हुआ है,फिर मुझे बतायें कसम से दुध का दूध पानी का पानी हो जायेगा, सम्मानित Ex-governor का लेख यूं शुरू होता हैःजब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी। इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है…..more 9 pages —– islaminhindi.blogspot.comhttp://islaminhindi.blogspot.com/2009/07/aurangzeb.htmlसाभारः पुस्‍तक एवं लेखक:‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार

  22. >तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना। — औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।महानुभव ''औरंगज़ेब ने मन्दिर तोडा तो मस्जिद भी तोडी लेकिन क्यूं?'' लेख पढिये और इतिहासकार उसे कैसे तोडते मरोडते है यह जानने के लिये रेल में चुटकुले सुना कर अभी यहां पहुंचे श्री चिपलूनकर का लेख उनके ब्लाग पर देखें जो उन्‍होंने छिपा कर रखा हुआ है,फिर मुझे बतायें कसम से दुध का दूध पानी का पानी हो जायेगा, सम्मानित Ex-governor का लेख यूं शुरू होता हैःजब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी। इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है…..more 9 pages —– islaminhindi.blogspot.comhttp://islaminhindi.blogspot.com/2009/07/aurangzeb.htmlसाभारः पुस्‍तक एवं लेखक:‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार

  23. >झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेखझुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख झुठा लेख

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  27. >चलिए ये झूठा है, बल्कि झूठा ही है…. तो सच क्या है???

  28. >चलिए ये झूठा है, बल्कि झूठा ही है…. तो सच क्या है???

  29. >khursheed सही कह रहे हो चोर हमेशा शोर मचाता है तुम्हारा भाई-बन्धु भी झूठा इतिहास दिखा कर अपने लूटेरा-चोर, डकौत, बलात्कारी, आक्रमणकारी,अमानवीय, मक्कार पुर्वजों का बचाव कर रहा है khursheed शायद चोर मचाये शोर बाली बात तुम्हारे दोस्त सलिम के दिमाग में बीठाओ और मना करो चोर होकर शोर ना मचाये।

  30. >khursheed सही कह रहे हो चोर हमेशा शोर मचाता है तुम्हारा भाई-बन्धु भी झूठा इतिहास दिखा कर अपने लूटेरा-चोर, डकौत, बलात्कारी, आक्रमणकारी,अमानवीय, मक्कार पुर्वजों का बचाव कर रहा है khursheed शायद चोर मचाये शोर बाली बात तुम्हारे दोस्त सलिम के दिमाग में बीठाओ और मना करो चोर होकर शोर ना मचाये।

  31. >सलीम साहब आप यह बातें किस इतिहास की किताब से दे रहे हो? आप नाम नहीं दे रहे हो महान लेखक की नई बहन भी बिना यह बताये कि उसने कहां पढा है या खुद इनिहास लिखती जा रही/रहा है, दूसरी बात इतिहास पर सबसे सच्‍ची किताब कुरआन का विजेट सबसे उपर करलें यह खास तरह का विजेट है जो इसकी तरफ प्रेम से देखेगा उसका हर काम बनेगा, इन्‍शाअल्‍लाह

  32. >सलीम साहब आप यह बातें किस इतिहास की किताब से दे रहे हो? आप नाम नहीं दे रहे हो महान लेखक की नई बहन भी बिना यह बताये कि उसने कहां पढा है या खुद इनिहास लिखती जा रही/रहा है, दूसरी बात इतिहास पर सबसे सच्‍ची किताब कुरआन का विजेट सबसे उपर करलें यह खास तरह का विजेट है जो इसकी तरफ प्रेम से देखेगा उसका हर काम बनेगा, इन्‍शाअल्‍लाह

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