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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>हिन्दू धर्म के दो नकारात्मक स्वभाव: जाति प्रथा व महिलाओं का अवमुल्यन -भाग 2

>नारी का अवमुल्यन
(लेख संकलनकर्ता: सलीम खान)
हमारे भारत देश में यह मुद्दा आज का नहीं है, यह एक राष्ट्रिय बहस का विषय भी बन चुका है. भारत देश में लगभग 80% हिन्दू हैं और 15% मुस्लिम और 5% दीगर धर्मों के या विधर्मी रहते हैं. देश में महिलाओं या लड़कियों से दुर्व्यवहार के केसेज़ ज्यादातर हिन्दुओं द्वारा ही किये जाते हैं. सबसे भयानक तथ्य तो स्त्री शिशु हत्या / स्त्री भ्रूण हत्या की है जिसने सदियों पहले से अपना व्यापक पाँव पसार रखा है और जो आज तक जारी है.

आर. जे. रुम्मेल के अनुसार –
भारत में छोटी अथवा लड़कियों की हत्या का मामला इसलिए भयंकर होता है क्यूंकि हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था बेहद कठोर है. जब पहली बार उन्नीसवीं सदी में जनसांख्यिकीय आंकडे इकट्ठे किये गए थे, तब यह पता चला कि कुछ गाँव में तो एक भी लड़की (baby) नहीं पाई गईं, एक भी नहीं. दीगर 30 गाँव में हुए जनसांख्यिकीय आंकडे में चौकाने वाला तथ्य सामने आये कि 343 लड़कों पर मात्र 54 लड़कियां ही थी. 1834 में मुंबई (तब बॉम्बे) में कुल 603 लड़कियां ही जीवित थी.”

जुलाई 2007 में एक लेख छापा था जिसके आधार पर कुछ चौकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे, जो तथ्य सामने आए थे वह थे:
स्त्री भ्रूण हत्या: यह सामान्य रूप से प्रचलित है कि अल्ट्रासाउंड मशीन का दुरुपयोग गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग की जांच के लिए होता था और अगर भ्रूण का लिंग स्त्री हुआ तो उसे गर्भ में ही मार डाला जाता था.
शिशु हत्या: और जो यह पता कर पाने में असमर्थ थे वह परंपरागत तरीका अपनाते हुए जन्म लिए स्त्री शिशु (लड़की) की हत्या जन्मोपरांत तुंरत कर देते थे और यह भ्रान्ति फैला देते कि बच्चा (लड़की) मरी हुई पैदा हुई है. यह सब जघन्य कृत्य हमारे समाज में (ज्यादातर हिन्दू धर्म में) सदियों से चला आ रहा है और अभी भी हो रहा है, वजह केवल यह थी कि जन्मने वाले का लिंग स्त्री था.

लड़कियों का समाज में व्यापक रूप से अनादर और उपेक्षा की जाती है. समाज में सामूहिक रूप से स्त्री के प्रति घृणा रखना और हिंसा करना, यहाँ तक कि उसकी हत्या भी कर देना कोई ज़्यादा बड़ी बात नहीं. वजह केवल यह कि हिन्दू धर्म में यह विश्वाश है कि स्त्री बुराई का प्रतीक है.

The Gendercide वेबसाइट के अनुसार:
कम्युनिटी सर्विस गिल्ड ऑफ़ मद्रास, तमिलनाडु के एक सर्वेक्षण में यहाँ पाया गया कि प्रदेश में हिन्दू परिवार (मुस्लिम और ईसाई परिवार के मुकाबले) में स्त्री शिशुहत्या अतिविस्तृत रूप में है. 1250 हिन्दू परिवार को इस सर्वेक्षण में शामिल किया गया, जिनमे 740 परिवार के पास केवल एक ही लड़की थी और 249 परिवार ने सीधे तौर पर यह स्वीकार किया कि उन्होंने अनचाहे स्त्री शिशु को रास्ते से हटा दिया. 213 परिवार के पास एक से ज़्यादा पुरुष थे जबकि इन परिवार में से आधे से ज़्यादा के पास सिर्फ एक ही लड़की थी.”

इससे भी ज़्यादा असाधारण रूप से, UNICEF के अनुसार, “मुंबई में सन 1984 में गर्भपात करने वालों में 8,000 में से 7,999 का जो गर्भपात हुआ था वह स्त्री भ्रूण का था. सेक्स तो जैसे लगता है एक फायदे का बिज़नेस सा हो गया है.”

भारत में अल्ट्रासाउंड टेक्निक्स का इस्तेमाल भ्रूण के लिंग की जांच के लिए करना एक कानूनन अपराध है. कानून तो बन गया मगर लोगों के लिए अब भी लिंग की जांच अल्ट्रासाउंड मशीन से बहुत आसान है, वजह समाज में नस नस में फैला भ्रष्टाचार और भौतिकवाद !

पिछले 20 साल में लगभग 10 मिलियन लड़कियों को मार डाला गया है. यहाँ की सरकारी आंकडें खुद यह स्वीकार करते है कि कानून सख्त बनाने के बावजूद यह कृत्य नहीं रुक नहीं रहा है.

भारतीय पक्ष में छापा मनोहर अगनानी जी के एक लेख का यहाँ उद्वरण देना चाहता हूँ. उन्होंने लिखा था कि “अख़बार में विदेश की एक न्यूज़ छपी थी कि दिमागी तौर पर मृत एक गर्भवती महिला को जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया है और डाक्टरों को विश्वास है कि उसका बच्चा गर्भाशय के बाहर जीवित रह सकता है। इससे उसके परिवार वालों में एक नई उम्मीद जगी है। परिवार के एक सदस्य के मुताबिक वह बच्चा एक लड़की है और महिला की इस हालत से पहले दंपत्ति ने उसका नाम सिसिलिया रखने का सोचा था। वहीं दूसरे अखबार की एक खबर बताती है कि अलीगढ़ में एक पति ने अपनी पत्नी को मार डाला, क्योंकि उसके गर्भ में पलने वाला बच्चा एक लड़की थी। ये घटनाएं सामाजिक मूल्यों की विविधता के बारे में बताती हैं।

हमारे भारतीय समाज में लड़कियों से भेदभाव रखने की मानो एक परंपरा रही है, कम से कम मध्यकाल से तो ऐसा है ही। तब लड़कियों को जन्म के समय ही मार दिया जाता था और ज्यादातर पुरूष युद्ध में मारे जाते थे। इस तरह बहुत हद तक जनसंख्या लिंगानुपात सामान्य बना रहता था। नवजात लड़कियों से छुटकारा पाने के लिए जहर देना या भूसे के ढेर पर दम घुटने के लिए छोड़ देना आदि कुछ पारंपरिक तरीके थे। इन तरीकों का स्थान अब सोनोग्राफी आदि उच्च चिकित्सा तकनीकों ने ले लिया है, जिनसे पता चलता है कि कोख में पलने वाले बच्चे का लिंग क्या है। नतीजतन किसी नवजात की हत्या नहीं करनी पड़ती, भ्रूण हत्या से ही काम चला लिया जाता है। इससे जनसंख्या लिंगानुपात में बड़ा अंतर आ गया है, जिसके परिणाम निश्चित तौर पर सुखद नहीं हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार इस खेदजनक स्थिति से अनजान है स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए संसद ने अपने स्तर पर प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक ‘पी.एन.डी.टी.’ रेग्युलेशन एण्ड प्रिवेशन आफ मिसयूज एक्ट, 1994 लागू किया है, जिसे पी.एन.डी.टी. अधिनियम कहा जाता है। यह अधिनियम, 1 जनवरी 1996 से ही लागू है। इसके अनुसार जन्म से पूर्व की जा सकने वाली जांच तकनीकों का दुरूपयोग नहीं किया जा सकता। इसी तरह मई 2001 में सेंटर फार इनक्वायरी इन्टु हेल्थ एण्ड एलायड थीम्स (सीइएचएटी) द्वारा जनहित में दायर की गई याचिका की सुनवाई करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किन्हीं कारणों से कन्या भ्रूणहत्या अभी तक रूकी नहीं है जबकि यह एक सचाई है कि बेटी की मधुर आवाज और स्पर्श से मां-बाप पर एक सुखद प्रभाव पड़ता है।

ऐसा लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय दुख के समय निकली एक आह मात्र है। परंपरा, प्रशासन और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कुछ लोगों ने मिलकर पी.एन.डी.टी. अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय की नेक सलाह को ताक पर रख दिया हैं। ये एकजुट होकर कानून को इतनी उदासीनता से तोड़ते हैं, मानो कानून का कोई अस्तित्व ही न हो।

सन 2001 की जनगणना में जनसंख्या का लिंगानुपात 933 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष था। 1991 से 2001 में बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट आई है। जो अनुपात 1991 में 945 लड़कियां प्रति 1000 लड़का था जो घटकर 2001 में 927 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों तक रह गया। कुछ राज्यों में जनसंख्या के लिंगानुपात और राष्ट्रीय जनसंख्या लिंगानुपात में आश्चर्यजनक रूप से अंतर है। जैसे, पंजाब-798, हरियाणा 819 दिल्ली 688, गुजरात 883, हिमाचल 896, उत्तरांचल 908, राजस्थान 909, महाराष्ट्र 913 और मध्य प्रदेश में 919 महिलाएं प्रति 1000 पुरूष।
लिंगानुपात में आ रही यह गिरावट कितनी चिंताजनक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां 1991 में 800 से कम के लिंगानुपात वाला एक भी जिला नहीं था, वहीं 2001 में ऐसे जिलों की संख्या 14 है। इसी तरह पहले ऐसा एकमात्र जिला था जहां लिंगानुपात 800 से 850 के बीच में था लेकिन ऐसे जिले 31 हो गए हैं। देश के 116 जिलों में यह अनुपात 900 से कम है। इस तरह के चलन को सोनोग्राफी जैसी सुविधाओं ने एक अतिरिक्त गति दे दी है। सोनोग्राफी जैसी सुविधाएं लोगों को आसानी से मिल भी जाती हैं। यहां तक कि यह मध्यप्रदेश के सुदूर जिले मुरैना में भी उपलब्ध है। मई, 2005 में इस जिले के सभी गांवो में घर-घर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि यहां का लिंगानुपात चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है।

इस बुरी स्थिति के जिम्मेदार समाज के नैतिक परिप्रेक्ष्य तो हैं ही, साथ में चिकित्सा व्यवस्था की भागीदारी भी कम नहीं है। जाहिर तौर पर ऐसे में समाज में बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है। यह एक सीधी और स्पष्ट सच्चाई है कि सोनोग्राफी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जो चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ा हुआ हो। इसलिए सारी जिम्मेदारी मुख्यत: इन लोगों पर ही आती है। यह भी सच है कि बिना प्रशासन के सहयोग के ऐसे काम जारी नहीं रखे जा सकते। यह एक विचित्र तथ्य है कि चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोग हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी व्यक्ति को चुनाव करने का अधिकार है और विशेषज्ञों का कर्तव्य है कि वह इसमें उसकी मदद करें। इसी का नतीजा है कि इस क्षेत्र से जुड़े कुछ लोग सोनोग्राफी के पक्ष में अपना तर्क देते हैं कन्या भ्रूणहत्या को किसी व्यक्ति की निजी इच्छा के तौर पर पेश करते हैं। यह आश्चर्यजनक है कि वह उसी डाली को काटने का प्रयास कर रहे हैं जिस पर वे बैठे हुए हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने चिकित्सा की नैतिकताओं और कानूनी ढांचे जिस पर उनका व्यवसाय टिका हुआ है, के ही विरूद्ध बहस शुरू कर दी है।”

लड़कियों से घरेलू हिंसा और सेक्सुअल उत्पीड़न भारत में बहुत बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, इसकी शिकार जो होतीं हैं वह तो कुछ ख़ास विरोध नहीं कर पातीं हैं बल्कि इसके खिलाफ बने कानून का फायेदा गैर पारंपरिक परिवार के तत्व ज़्यादा उठाते हैं. सन 2006 का सरकारी सर्वे यहाँ बताता है कि लगभग 45% लड़कियों ने विवाह की निम्न आयु सीमा 18 वर्ष के पूर्व ही शादी कर ली है. सन 2004 का सर्वे यह बताता है कि भारत में व्यस्क स्त्री की शिक्षा का प्रतिशत केवल 47.8% है जबकि व्यस्क पुरुष की शिक्षा का प्रतिशत 73.4% है.

2001 की जनगणना के अनुसार स्त्री-पुरुष का अनुपात भी कम चौकाने वाला नहीं हैं, प्रति 1000 पुरुष पर केवल 933 स्त्री ही है और यह अनुपात दुनिया में सबसे निम्नतम में से एक है.
वहीँ स्त्री शिक्षा का स्तर भी बेहद निम्न है ज्यादातर तो प्राथमिक शिक्षा तक ग्रहण कर नहीं सकी हैं.

SALEEM KHAN

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8 Responses

  1. >हिन्दू धर्म में यह विश्वाश है कि स्त्री बुराई का प्रतीक है.बिल्कुल गलत: हिंदू धर्म में कहा जाता है जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं. हिंदू धर्म में वंदे मातरम जैसे विचार हैं यानि कि मां कि वंदना की जाती है. और कन्या भ्रूण हत्या जैसी चीजें वर्तमान समय की बुराइयां हैं. इनका हिंदू धर्म से कोई लेना देना नही है. कन्या भ्रूण हत्या जैसी चीजों को रोकने के लिये वाकई में हिंदू धर्म की शिक्षाओं के प्रसार की जरूरत है जो कि गुलामी के समय से कम होती गईं. क्योंकि जो नारी की इज्जत करेगा वो कभी उसके साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार नही करेगा.

  2. >हिन्दू धर्म में यह विश्वाश है कि स्त्री बुराई का प्रतीक है.बिल्कुल गलत: हिंदू धर्म में कहा जाता है जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं. हिंदू धर्म में वंदे मातरम जैसे विचार हैं यानि कि मां कि वंदना की जाती है. और कन्या भ्रूण हत्या जैसी चीजें वर्तमान समय की बुराइयां हैं. इनका हिंदू धर्म से कोई लेना देना नही है. कन्या भ्रूण हत्या जैसी चीजों को रोकने के लिये वाकई में हिंदू धर्म की शिक्षाओं के प्रसार की जरूरत है जो कि गुलामी के समय से कम होती गईं. क्योंकि जो नारी की इज्जत करेगा वो कभी उसके साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार नही करेगा.

  3. haal-ahwaal says:

    >BURA JO DEKHAN MAIN CHALABURA NA MILYA KOYJO DIL KHOJU AAPNEMUJH SA BURA NA KOY……

  4. haal-ahwaal says:

    >BURA JO DEKHAN MAIN CHALABURA NA MILYA KOYJO DIL KHOJU AAPNEMUJH SA BURA NA KOY……

  5. >सलीम जी, बधाई। आपका जागरुकता बढाने वाला लेख पढा। लगता है समय के साथ साथ हिंदू धर्म के मानने वालों में भी कुछ कमियां आई हैं लेकिन संतोष इस बात का है कि कुछ अन्‍य धर्मों की जहालत के आगे यह ऊँट के मुंह में जीरे के समान है। पर अफसोस यह है कि एक विशिष्‍ट धर्म के पढे लिखे लोग अपने अंधेरे कमरे में रोशनी करने की जगह सूरज के आगे दिया लिए घूम रहे हैं और गलतफहमी में हैं कि हमने बहुत बडा काम कर दिया। पर आप अपने काम में लगे रहिए क्‍योंकि आपकी समझ में तो यह बात आने से रही।

  6. >सलीम जी, बधाई। आपका जागरुकता बढाने वाला लेख पढा। लगता है समय के साथ साथ हिंदू धर्म के मानने वालों में भी कुछ कमियां आई हैं लेकिन संतोष इस बात का है कि कुछ अन्‍य धर्मों की जहालत के आगे यह ऊँट के मुंह में जीरे के समान है। पर अफसोस यह है कि एक विशिष्‍ट धर्म के पढे लिखे लोग अपने अंधेरे कमरे में रोशनी करने की जगह सूरज के आगे दिया लिए घूम रहे हैं और गलतफहमी में हैं कि हमने बहुत बडा काम कर दिया। पर आप अपने काम में लगे रहिए क्‍योंकि आपकी समझ में तो यह बात आने से रही।

  7. Sneha says:

    >सलीम जी,2001 में हिन्दु लिंग अनुपात जहाँ 1000 लडकों पर 922 लडकियाँ थीं वहीं मुसलमानों में यह 1000 लडकों पर 907 लडकियाँ थीं.हिन्दुस्तान में 1991 से 2001 के बीच में जनंख्या वृद्धि में मुसलमानों का सबसे ज्यादा योगदान 29.5% रहा है. जबकि मुसलमानों में शिक्षा सबसे कम यानि 60% है. वहीं जैनीयों में शिक्षा सबसे ज्यादा 95% और हिन्दूओं में 75.5% रही.देश में सबसे कम काम करने वालों या यूं कहो की निठल्ले और खाली बैठने वालों में सबसे बडा योगदान मुसलमानों का रहा. यानि देश के करीब 31.3% मुसलमान खाली या बेरोजगार हैं. और सुनो मुसलमानों का देश के लिये योगदान – सिविल सर्विसिस में सबसे कम मुसलमान हैं करीब दो साल पहले के आंकडों के हिसाब से सबसे कम मुसलमान IFS में केवल 1.6% हैं यानि 619 अफसरों में से केवल 10 और सबसे ज्यादा IPS में 3% हैं.देश की आबादी का करीब बाईस प्रतिशत का हिस्सा होते हुए भी केवल 3.6% प्रतिशत मुसलमान स्नातक यानि Graduate हैं जो कि सिविल परिक्षा मे लिये कम से कम योग्याता है. सलीम जी आपके लिये अगला सवाल – मुसलमान अपने बच्चों को पोलीयो की दवाई नहीं पिलाते. इसके ईस्लामिक, कुरआनिक, वैज्ञानिक, पारावरिक, सामाजिक, सलीमालिक और मुसलमानिक विचारों व कारणों का विस्तार से वर्णन करें.

  8. Sneha says:

    >सलीम जी,2001 में हिन्दु लिंग अनुपात जहाँ 1000 लडकों पर 922 लडकियाँ थीं वहीं मुसलमानों में यह 1000 लडकों पर 907 लडकियाँ थीं.हिन्दुस्तान में 1991 से 2001 के बीच में जनंख्या वृद्धि में मुसलमानों का सबसे ज्यादा योगदान 29.5% रहा है. जबकि मुसलमानों में शिक्षा सबसे कम यानि 60% है. वहीं जैनीयों में शिक्षा सबसे ज्यादा 95% और हिन्दूओं में 75.5% रही.देश में सबसे कम काम करने वालों या यूं कहो की निठल्ले और खाली बैठने वालों में सबसे बडा योगदान मुसलमानों का रहा. यानि देश के करीब 31.3% मुसलमान खाली या बेरोजगार हैं. और सुनो मुसलमानों का देश के लिये योगदान – सिविल सर्विसिस में सबसे कम मुसलमान हैं करीब दो साल पहले के आंकडों के हिसाब से सबसे कम मुसलमान IFS में केवल 1.6% हैं यानि 619 अफसरों में से केवल 10 और सबसे ज्यादा IPS में 3% हैं.देश की आबादी का करीब बाईस प्रतिशत का हिस्सा होते हुए भी केवल 3.6% प्रतिशत मुसलमान स्नातक यानि Graduate हैं जो कि सिविल परिक्षा मे लिये कम से कम योग्याता है. सलीम जी आपके लिये अगला सवाल – मुसलमान अपने बच्चों को पोलीयो की दवाई नहीं पिलाते. इसके ईस्लामिक, कुरआनिक, वैज्ञानिक, पारावरिक, सामाजिक, सलीमालिक और मुसलमानिक विचारों व कारणों का विस्तार से वर्णन करें.

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