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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>अल्लाह गणित नहीं जानता है: अरुण शौरी Allah doesn’t know math!

>अरुण शौरी ने अपनी एक किताब (!) में लिखा है कि अल्लाह गणित नहीं जानता है. यह सन 2001 की बात है. अरुण शौरी के मुताबिक़ “कुरआन में कुछ गणितीय त्रुटियां हैं. कुरआन के अध्याय 4 (सुरह निसा) के श्लोक (आयत) संख्या 11 व 12 के मुताबिक जब आप वसीयत करते है तो उत्तराधिकारी का हिस्सा जोड़ने पर एक से ज़्यादा मिलता है और यह संभव नहीं है अर्थात जब आप उत्तराधिकार के विभिन्न भागों/वारिसों को दी गई जोड़ का गठन करते हैं तो वह एक से अधिक है. इस प्रकार से कुरआन के लेखक को गणित का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है.”


अरुण शौरी और उनके जैसे ही हमारे समाज में रहने वाले और लोगों को जो तर्क (कुतर्क) के सहारे अध्ययन करे बिना इस्लाम के बारे में गलतफहमी पाल रखें है, को बता दूं कि अल्लाह ने अपने अंतिम ग्रन्थ अल-कुरआन में कई जगह वसीयत और उत्तराधिकार के बारे में बताया है.

जैसे:
सुरह अल-बक़रह- अध्याय 2 आयत संख्या 180
सुरह अल-बक़रह- अध्याय 2 आयत संख्या 240
सुरह अल-निसा- अध्याय 4 आयात संख्या 7 व 9
सुरह अल-निसा- अध्याय 4 आयात संख्या 19 व 33
सुरह अल-मायेदः- अध्याय 5 आयत संख्या 105 व 108

कुरआन में सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11, 12 व 176 में उत्तराधिकारियों के अंश के बारे में बिलकुल साफ़-साफ़ लिखा है.

अब अरुण शौरी के द्वारा इंगित आयतों सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11 व 12 का परीक्षण करते है.

सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11 व 12 के अनुसार–

अल्लाह तुम्हारी संतान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के हिस्से के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा; और यदि दो से अधिक बेटियाँ ही हों तो उनका हिस्सा छोड़ी हुई संपत्ति का दो तिहाई है. और यदि वह अकेली हो तो उसके लिए आधा है. और यदि मरनेवाले की संतान हो तो उसके माँ-बाप में से प्रत्येक का उसके छोडे हुए माल का छठा हिस्सा है. और यदि वह निःसंतान हो और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा तिहाई होगा. और यदि उसके भाई भी हों, तो उसकी माँ का छठा हिस्सा होगा. ये हिस्से, वसीयत जो वह कर जाये पूरी करने या ऋण चुका देने के पश्चात् हैं. तुम्हारे बाप भी है और तुम्हारे बेटे भी. तुम नहीं जानते कि उनमें से लाभ पहुँचने की दृष्टि से कौन तुमसे अधिक निकट है. या हिस्सा अल्लाह का निश्चित किया हुआ है. अल्लाह सब कुछ जानता समझता है.”
– अल-कुरआन, सुरह 4, अन-निसा आयत संख्या 11

और तुम्हारी पत्नियों जो कुछ छोड़ा हो, उसमें तुम्हारा आधा है, यदि उनके संतान न हो. लेकिन यदि उनकी संतान हों तो वे जो छोडें, उसमें तुम्हारा चौथाई होगा. इसके पश्चात् जो कि जो वसीयत वें कर जाएँ वह पूरी कर दी जाये, या जो ऋण (उनपर) हो वह चुका दिया जाये. और जो कुछ तुम छोड़ जाओ, उसमें उनका (पत्नियों का) चौथाई हिस्सा होगा, यदि तुम्हारी कोई संतान न हो. लेकिन यदि तुम्हारी संतान है, तो जो कुछ तुम छोड़ोगे, उसमें से उनका (पत्नियों का) आठवां हिस्सा होगा. इसके पश्चात् कि जो वसीयत तुमने की हो वह पूरी कर दी जाये, या जो ऋण हो चुका हो उसे चुका दिया जाये. और यदि कोई पुरुष या स्त्री के न तो कोई संतान हों और न उनके माँ-बाप ही जीवित हों और उसके एक भाई या बहन हों तो उन दोनों में से प्रत्येक का छठा हिस्सा होगा. लेकिन यदि वे इससे अधिक हों तो फिर एक तिहाई में वे सब शरीक होंगे, इसके पश्चात् कि जो वसीयत उसने की वह पूरी कर दी जाये या जो ऋण उस पर हो वह चुका दिया जाये, शर्त यह है कि वह हानिकर ना हो. यह अल्लाह के और से ताकीदी आदेश हैं और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, अत्यंत सहनशील है.”
-अल-कुरआन, अन-निसा- आयत संख्या 12

इस्लाम में उत्तराधिकार के नियम को बहुत वृहद् तरीके से वर्णित किया गया है. खुले तौर पर और प्राथमिक रूप से उत्तराधिकार के नियम को कुरआन में दिया गया है और डिटेल में अ-हदीस (मुहम्मद की परंपरा और आदेश) में विस्तृत रूप से दिया है. इस्लाम में दिए गए उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप और कोम्बिनेशन को जानने के लिए एक व्यक्ति अपनी पूरा जीवन भी व्यतीत कर दे तो भी कम है. कुरआन की दो आयातों के बिनाह पर अरुण शौरी इस्लाम के उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप को समझ जाने की और उस पर गलत टिपण्णी कर रहें है जबकि उन्होंने इन आयातों को भी ठीक से समझा नहीं! उन्हें ये भी नहीं पता कि इस्लाम में उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप का क्राइटेरिया क्या है.

(मैं आगे अरुण शौरी की टिप्पणियों का विस्तार से जवाब दूंगा, इससे पहले मैं यह पूछना चाहता आम ब्लोगर्स से कि दुनिया में कौन सा ऐसा धर्म जिसने संपत्ति वितरण और वसीयत के बारे में सभी को अधिकार दिए हैं, खास कर औरत को… इस्लाम ही दुनिया में एक वाहिद (केवल) मज़हब है जिमें औरतों को केवल अधिकार ही नहीं दिए बल्कि उनको संपत्ति में भी हिस्सा देने का प्रावधान किया है.)

ख़ैर, तो मैं बात कर रहा था कि अरुण बाबू की कुरआन के खिलाफ़ टिपण्णी की… तो यह तो कुछ ऐसे ही हुआ कि कोई इंसान गणित के समीकरण को बिना गणित के प्राथमिक नियम जाने बिना हल करना चाहता है. और ऐसा संभव नहीं है कि आप गणित के सामान्य नियम न जाने और समीकरण हल करना शुरू कर दें. मिसाल के तौर पर गणित के समीकरण हल करने में जो सामान्य नियम लागु होता है वह है – BODMAS [Bracket-Off, Division, Multiplication, Adition, Substraction] यानि गणित के समीकरण को हल करने में गणित के प्रमुख चिन्हों को किस प्रकार से एक के बाद एक हल किया जाता है. समीकरण को हल करने के लिए BODMAS को इस्तेमाल करेंगे तो सबसे पहले ब्रेकेट हटाएँगे (हल करेंगे), फिर दुसरे नंबर पर डिविज़न (भाग) को हटाएँगे (हल करेंगे), फिर तीसरे नंबर पर मल्टीप्लिकेशन (गुणा) को हटाएँगे (हल करेंगे), चौथे नंबर पर एडिशन (धन) को हटाएँगे (हल करेंगे) और फिर पांचवें नंबर पर सब्स्ट्रेक्शन (ऋण) को हटाएँगे (हल करेंगे).

अगर अरुण शौरी को गणित नहीं आती हो और वो पहले मल्टीप्लिकेशन (गुणा) को फिर सब्स्ट्रेक्शन (ऋण) को फिर ब्रेकेट ऑफ फिर भाग को फिर आखिरी में प्लस को हटा रहे है तो ज़ाहिर है उत्तर ग़लत ही आएगा.

ठीक उसी तरह से, क़ुरान के अध्याय 4 के श्लोक 11 व 12 में उत्तराधिकार और वसीयत के बारे में बच्चों के बारे में सबसे पहले आदेश है फिर माँ-बाप और पति अथवा पत्नी के बारे में फरमाता है. इसलाम के वसीयत क़ानून के मुताबिक़ पहले जो बिना देनदारी या ऋण हो उसे चुकता किया जे फिर वसीयत लागू होगी, तदोपरांत पति अथवा पत्नी और माँ-बाप (निर्भर करता है कि वे अपने पीछे संतान छोडें है या नहीं) और फिर जो भी बची संपत्ति है उसे लड़को और लड़कियों में दिए गए अंश के मुताबिक़ बाँट दी जाती है.

अब जब ऊपर लिखे तरीके से वसीयत का उत्तराधिकारियों के मध्य वितरण हो जा रहा है तो यह सवाल कैसे उत्पन्न हो सकता है कि किसी का हिस्सा एक से ज्यादा हो जायेगा. यह बात किसी को भी बहुत आसानी से समझ आ जायेगी. दरअसल अरुण शौरी और उनकी तरह के और लोग जो क़ुरान की आयतों का हवाला देते है और भ्रमित करते है दरअसल वो कुरान की आयतों को आधा या वो भाग जिसका अर्थ अलग हो को उठाते है और बीच की या उसके बाद की आयतों को नहीं उठाते जिसमें उस बात का समाधान भी होता है या उसका अर्थ पूर्ण हो जाता है और हुआ यही, अरुण शौरी ने अपने ढंग से कुतर्क के ज़रिये यह सिद्ध करने की कोशिश करी कि अल्लाह गणित नहीं जानता है.

अरे जनाब! यह अल्लाह नहीं जो गणित नहीं जानता (नउज़ुबिल्लाह), यह अरुण शौरी है जो गणित नहीं जानता है.

Filed under: ईश्वर

40 Responses

  1. >मेरा यह लेख अख़बार में छाप चूका है

  2. >मेरा यह लेख अख़बार में छाप चूका है

  3. रंजन says:

    >बहुत खुब.. अल्लाह अरुण शोरी से ज्यादा समझदार है…

  4. रंजन says:

    >बहुत खुब.. अल्लाह अरुण शोरी से ज्यादा समझदार है…

  5. varsha says:

    >सलीम जी, आप अपना मकसद नेक बताते हें, लेकिन अपने ब्लॉग में सबसे पहले जो आपने 'स्वच्छ संदेश' लगाया हुआ है उसे पढ़कर मुझ जैसे 'गैर मुस्लिम' तो यही अर्थ निकाल रहे हें की न सिर्फ़ आप बल्कि आपका खुदा भी हर गैर मुस्लिम को बेवकूफ मानता है। यह तो कुँए के मेंढक वाली बात हुई, ज़रा कुँए से बाहर निकालिए, हमारे इश्वर ने हमें वसीयत बांटना नही सिखाया पर हमें धर्म का ऐसा मार्ग दिखाया की वसीयत ही क्या हम हर तरह का न्याय स्वयं करने की काबिलियत रख सके, और इसी का नतीजा है की इतने बड़े हिंदू प्रधान देश में लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता होना सम्भव हुआ है, क्यों नही ऐसा किसी इस्लाम बहुल देश में हो सका? आप वेद पुरानों से उदाहरण देते हें, जो एक अच्छी मिसाल है, पर मैं चाहूंगी की आप सभी धर्म ग्रंथों में न सिर्फ़ रोजमर्रा के लिए बनाए हुए नियम (क्या खाना है कैसे खाना है, जायदाद कैसे बांटनी है वगैरह) बल्कि उनके दर्शन को भी आत्मसात करें। हिंदू धर्म की पवित्र पुस्तक गीता में लिखे सिर्फ़ एक वाक्य 'कर्म करो, फल की चिंता न करो' में दुनिया की हर बुराई, हर भ्रष्टाचार पर विजय पाने की ताकत है। जो जाति व्यवस्था आज हिन्दुओं के गले का काँटा है वह प्रारंभ में समाज को व्यवस्थित रखने का एक तरीका था जिसे समय के साथ बदलना भी हिन्दुओं का फ़र्ज़ था और उन्होंने किया भी। आज ब्राह्मण सेना में भरती होते हें, राजपूत शिक्षण में नाम कमाते हें.अतः यदि सभी धर्मों के एक संदेश की बात करना चाहते हें तो पहले अन्य धर्मों को 'अज्ञानी' मानना बंद करें, आँखें खोलें आपको इतना ज्ञान दिखेगा कि आत्मसात न कर पायेंगे।

  6. varsha says:

    >सलीम जी, आप अपना मकसद नेक बताते हें, लेकिन अपने ब्लॉग में सबसे पहले जो आपने 'स्वच्छ संदेश' लगाया हुआ है उसे पढ़कर मुझ जैसे 'गैर मुस्लिम' तो यही अर्थ निकाल रहे हें की न सिर्फ़ आप बल्कि आपका खुदा भी हर गैर मुस्लिम को बेवकूफ मानता है। यह तो कुँए के मेंढक वाली बात हुई, ज़रा कुँए से बाहर निकालिए, हमारे इश्वर ने हमें वसीयत बांटना नही सिखाया पर हमें धर्म का ऐसा मार्ग दिखाया की वसीयत ही क्या हम हर तरह का न्याय स्वयं करने की काबिलियत रख सके, और इसी का नतीजा है की इतने बड़े हिंदू प्रधान देश में लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता होना सम्भव हुआ है, क्यों नही ऐसा किसी इस्लाम बहुल देश में हो सका? आप वेद पुरानों से उदाहरण देते हें, जो एक अच्छी मिसाल है, पर मैं चाहूंगी की आप सभी धर्म ग्रंथों में न सिर्फ़ रोजमर्रा के लिए बनाए हुए नियम (क्या खाना है कैसे खाना है, जायदाद कैसे बांटनी है वगैरह) बल्कि उनके दर्शन को भी आत्मसात करें। हिंदू धर्म की पवित्र पुस्तक गीता में लिखे सिर्फ़ एक वाक्य 'कर्म करो, फल की चिंता न करो' में दुनिया की हर बुराई, हर भ्रष्टाचार पर विजय पाने की ताकत है। जो जाति व्यवस्था आज हिन्दुओं के गले का काँटा है वह प्रारंभ में समाज को व्यवस्थित रखने का एक तरीका था जिसे समय के साथ बदलना भी हिन्दुओं का फ़र्ज़ था और उन्होंने किया भी। आज ब्राह्मण सेना में भरती होते हें, राजपूत शिक्षण में नाम कमाते हें.अतः यदि सभी धर्मों के एक संदेश की बात करना चाहते हें तो पहले अन्य धर्मों को 'अज्ञानी' मानना बंद करें, आँखें खोलें आपको इतना ज्ञान दिखेगा कि आत्मसात न कर पायेंगे।

  7. >तुलना की जाए तो…….अरुण शौरी अल्लाह से गणित में कमतर हैं….. मान लिया!!!!

  8. >तुलना की जाए तो…….अरुण शौरी अल्लाह से गणित में कमतर हैं….. मान लिया!!!!

  9. >saleem sahb yeh kiya le aaye,,,pehle maans khana jayz bataya,,,phir,,,soowar par baat ki ab mahol ban gaya tha to kaun sa haram kaun sa halal maans batate,,,us men bada maza aata,,murg aur soowar se aage ab chipkli, mendak , billi, kutte khane wale behs men shamli ho jate kher,,, matter ho to batao na ho to batao men hoon na.

  10. >saleem sahb yeh kiya le aaye,,,pehle maans khana jayz bataya,,,phir,,,soowar par baat ki ab mahol ban gaya tha to kaun sa haram kaun sa halal maans batate,,,us men bada maza aata,,murg aur soowar se aage ab chipkli, mendak , billi, kutte khane wale behs men shamli ho jate kher,,, matter ho to batao na ho to batao men hoon na.

  11. Mohd says:

    >arun soorie ji ko to badhiya jawab he ye, masha allah

  12. Mohd says:

    >arun soorie ji ko to badhiya jawab he ye, masha allah

  13. Amit says:

    >I agreed with Varsha. हमारे इश्वर ने हमें वसीयत बांटना नही सिखाया पर हमें धर्म का ऐसा मार्ग दिखाया की वसीयत ही क्या हम हर तरह का न्याय स्वयं करने की काबिलियत रख सके, और इसी का नतीजा है की इतने बड़े हिंदू प्रधान देश में लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता होना सम्भव हुआ है, क्यों नही ऐसा किसी इस्लाम बहुल देश में हो सका?

  14. Amit says:

    >I agreed with Varsha. हमारे इश्वर ने हमें वसीयत बांटना नही सिखाया पर हमें धर्म का ऐसा मार्ग दिखाया की वसीयत ही क्या हम हर तरह का न्याय स्वयं करने की काबिलियत रख सके, और इसी का नतीजा है की इतने बड़े हिंदू प्रधान देश में लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता होना सम्भव हुआ है, क्यों नही ऐसा किसी इस्लाम बहुल देश में हो सका?

  15. Amit says:

    >ye dekhiye:सप्ताह का स्वच्छ सन्देश"और यदि मुशरिकों (बहुदेववादियों) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक की वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दो, क्यूंकि वे ऐसे लोग हैं जिन्हें ज्ञान नहीं." सुरा 9, अत-तौबा, श्लोक 6means only muslims are right and non-muslims are wrong!! what the fuck!

  16. Amit says:

    >ye dekhiye:सप्ताह का स्वच्छ सन्देश"और यदि मुशरिकों (बहुदेववादियों) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक की वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दो, क्यूंकि वे ऐसे लोग हैं जिन्हें ज्ञान नहीं." सुरा 9, अत-तौबा, श्लोक 6means only muslims are right and non-muslims are wrong!! what the fuck!

  17. smart says:

    >chalo badhiya hai ji aap ne bata diya ki aallah ko ganit aati hai.

  18. smart says:

    >chalo badhiya hai ji aap ne bata diya ki aallah ko ganit aati hai.

  19. >सलीम जी जब तक आप दुसरे धर्मं को सम्मान नहीं देंगे , दुसरे धर्म वाले भी आपको सम्मान नहीं देंगे | पता नहीं क्यों ये बात आप सबों के समझ मैं नहीं आती | आप सब तो बस दुसरे धर्म वाले को काफिर कह कर उसका वध करने मैं मशगुल हैं | कुरान की अच्छाइयों को तभी बताएँगे जब आप दुसरे धरम के भगवान् को मानेंगे | दुसरे से ये आशा क्यों करते हैं की वो अल्लाह को सर्वसक्तिमान माने ? ये तो यही बात हुई ना की तुम मेरी मानो मैं तुम्हारी नहीं मानता , क्यों?

  20. >सलीम जी जब तक आप दुसरे धर्मं को सम्मान नहीं देंगे , दुसरे धर्म वाले भी आपको सम्मान नहीं देंगे | पता नहीं क्यों ये बात आप सबों के समझ मैं नहीं आती | आप सब तो बस दुसरे धर्म वाले को काफिर कह कर उसका वध करने मैं मशगुल हैं | कुरान की अच्छाइयों को तभी बताएँगे जब आप दुसरे धरम के भगवान् को मानेंगे | दुसरे से ये आशा क्यों करते हैं की वो अल्लाह को सर्वसक्तिमान माने ? ये तो यही बात हुई ना की तुम मेरी मानो मैं तुम्हारी नहीं मानता , क्यों?

  21. >आपके ब्लॉग पे एक चीज बड़ा अजीब सा दिखता है की फला आदमी ने इस्लाम स्वीकार किया और इतने दिनों तक जिंदा रह कर इतना काम किया जैसे बाकि धरम वाले जिंदा रहते ही नहीं और कुछ काम ही नहीं करते | मतलब यदि आप मुसलमान हो तो ही आप इंसान हो नहीं तो काफिर !!!! वह बहुत सही समझ है सलीम भाई आपकी ….

  22. >आपके ब्लॉग पे एक चीज बड़ा अजीब सा दिखता है की फला आदमी ने इस्लाम स्वीकार किया और इतने दिनों तक जिंदा रह कर इतना काम किया जैसे बाकि धरम वाले जिंदा रहते ही नहीं और कुछ काम ही नहीं करते | मतलब यदि आप मुसलमान हो तो ही आप इंसान हो नहीं तो काफिर !!!! वह बहुत सही समझ है सलीम भाई आपकी ….

  23. >@Rakesh Singh शब्द ‘‘काफ़िर’’ वास्तव में अरबी शब्द ‘‘कुफ्ऱ’’ से बना है। इसका अर्थ है ‘‘छिपाना, नकारना या रद्द करना’’। इस्लामी शब्दावली में ‘‘काफ़िर’’ से आश्य ऐसे व्यक्ति से है जो इस्लाम की सत्यता को छिपाए (अर्थात लोगों को न बताए) या फिर इस्लाम की सच्चाई से इंकार करे। ऐसा कोई व्यक्ति जो इस्लाम को नकारता हो उसे उर्दू में ग़ैर मुस्लिम और अंग्रेज़ी में Non-Muslim कहते हैं।यदि कोई ग़ैर-मुस्लिम स्वयं को ग़ैर मुस्लिम या काफ़िर कहलाना पसन्द नहीं करता जो वास्तव में एक ही बात है तो उसके अपमान के आभास का कारण इस्लाम के विषय में ग़लतफ़हमी या अज्ञानता है। उसे इस्लामी शब्दावली को समझने के लिए सही साधनों तक पहुँचना चाहिए। उसके पश्चात न केवल अपमान का आभास समाप्त हो जाएगा बल्कि वह इस्लाम के दृष्टिकोण को भी सही तौर पर समझ जाएगा।

  24. >@Rakesh Singh शब्द ‘‘काफ़िर’’ वास्तव में अरबी शब्द ‘‘कुफ्ऱ’’ से बना है। इसका अर्थ है ‘‘छिपाना, नकारना या रद्द करना’’। इस्लामी शब्दावली में ‘‘काफ़िर’’ से आश्य ऐसे व्यक्ति से है जो इस्लाम की सत्यता को छिपाए (अर्थात लोगों को न बताए) या फिर इस्लाम की सच्चाई से इंकार करे। ऐसा कोई व्यक्ति जो इस्लाम को नकारता हो उसे उर्दू में ग़ैर मुस्लिम और अंग्रेज़ी में Non-Muslim कहते हैं।यदि कोई ग़ैर-मुस्लिम स्वयं को ग़ैर मुस्लिम या काफ़िर कहलाना पसन्द नहीं करता जो वास्तव में एक ही बात है तो उसके अपमान के आभास का कारण इस्लाम के विषय में ग़लतफ़हमी या अज्ञानता है। उसे इस्लामी शब्दावली को समझने के लिए सही साधनों तक पहुँचना चाहिए। उसके पश्चात न केवल अपमान का आभास समाप्त हो जाएगा बल्कि वह इस्लाम के दृष्टिकोण को भी सही तौर पर समझ जाएगा।

  25. >कुरआन के बारे में खुली दावत है छानबीन करें। लगभग सभी भाषाओं में कुरआन का अनुवाद मिल जाता है। सबको चाहिए कि इसके औचित्य को जांचने और सच्चाई मालूम करने की कोशिश करे। बुद्ध‍िजीवी किसी ऐसी चीज को नज़रन्दाज़ नहीं कर सकता, जो उसके शाश्वत राहत का सामान होने की सम्भावना रखती हो और छान-बीन के बाद शत-प्रतिशत विश्वास में निश्चित रूप से बदल सकती हो।

  26. >कुरआन के बारे में खुली दावत है छानबीन करें। लगभग सभी भाषाओं में कुरआन का अनुवाद मिल जाता है। सबको चाहिए कि इसके औचित्य को जांचने और सच्चाई मालूम करने की कोशिश करे। बुद्ध‍िजीवी किसी ऐसी चीज को नज़रन्दाज़ नहीं कर सकता, जो उसके शाश्वत राहत का सामान होने की सम्भावना रखती हो और छान-बीन के बाद शत-प्रतिशत विश्वास में निश्चित रूप से बदल सकती हो।

  27. >मेरा एक निवेदन अब भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रह है- कुरान से केवल पाँच आयते निकाल कर बताइये जो किसी विद्वानों की मण्डली में सुनाई जा सकें और सुनाने के बाद लोग उसके रचनाकार के शब्द-सामर्थ्य, गहन अनुभव या अन्तर्दृष्टि की दाद दें।

  28. >मेरा एक निवेदन अब भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रह है- कुरान से केवल पाँच आयते निकाल कर बताइये जो किसी विद्वानों की मण्डली में सुनाई जा सकें और सुनाने के बाद लोग उसके रचनाकार के शब्द-सामर्थ्य, गहन अनुभव या अन्तर्दृष्टि की दाद दें।

  29. Testing says:

    >पढा़ई नही किया होगा मार-काट और 16 साल की लड़की पटाने से फुर्सत मिलता तभी तो पढाई करता

  30. Testing says:

    >पढा़ई नही किया होगा मार-काट और 16 साल की लड़की पटाने से फुर्सत मिलता तभी तो पढाई करता

  31. Amit says:

    >जो सच्चाई है उसे कब तक छुपायेंगे महोदय. बे सिरपैर के तर्क कातिल को मासूम नहीं बना सकती. मेरे जबाब डिलीट कर देने से भी नहीं. सबको पता है कि… इसलाम कैसे पैदा हुआ… और इसलाम के वजह से कितने लोग मौत के घाट उतार दिए गए.

  32. Amit says:

    >जो सच्चाई है उसे कब तक छुपायेंगे महोदय. बे सिरपैर के तर्क कातिल को मासूम नहीं बना सकती. मेरे जबाब डिलीट कर देने से भी नहीं. सबको पता है कि… इसलाम कैसे पैदा हुआ… और इसलाम के वजह से कितने लोग मौत के घाट उतार दिए गए.

  33. >"अल्लाह गणित नहीं जानता."होता है ऐसा. सब कोई सब नहीं जान पाता. वैसे भी गणित बहुत कठिन होती है.

  34. Santosh says:

    >"अल्लाह गणित नहीं जानता."होता है ऐसा. सब कोई सब नहीं जान पाता. वैसे भी गणित बहुत कठिन होती है.

  35. Makrani says:

    >Maths un logon ke liye hai jismein deemag hota hei… un ke liye nahi jinhe samajh nahi aane per apne galat ko sahi sabit karne per adey rahein.. hota hei.. hota hei… actually, aise log hi to sach ko sabit karvate hein, i wish ke woh or zyada aisi kam-akli ka pradarshan karein taaki, dusron tak imaan ki khoosbu pahunchey…

  36. Makrani says:

    >Maths un logon ke liye hai jismein deemag hota hei… un ke liye nahi jinhe samajh nahi aane per apne galat ko sahi sabit karne per adey rahein.. hota hei.. hota hei… actually, aise log hi to sach ko sabit karvate hein, i wish ke woh or zyada aisi kam-akli ka pradarshan karein taaki, dusron tak imaan ki khoosbu pahunchey…

  37. rohit says:

    >allah maths nahi janata to kya prob hai bhai biology to janta hai wohi bahut hai jahan ko chalane ke liye. aur bhai arab ko maths hamne sikhaya yani ki hinduo ne. chalo koi baat nahi grace marks de do unhe paas kar do.nahin to salim bhai bukka faad faad ke chillayenge.

  38. rohit says:

    >allah maths nahi janata to kya prob hai bhai biology to janta hai wohi bahut hai jahan ko chalane ke liye. aur bhai arab ko maths hamne sikhaya yani ki hinduo ne. chalo koi baat nahi grace marks de do unhe paas kar do.nahin to salim bhai bukka faad faad ke chillayenge.

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