स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब! (Non-veg is permmited, reply to critics)

>पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा जिसका मज़मून था “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” मैंने उस लेख में यह बताने की कोशिश की कि “मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है” लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि “मांसाहार क्यूँ जायज़ है”


विमर्श को आगे बढ़ाने से पहले मैं जैसा कि हमेशा अपना एक बात कहना चाहता हूँ तो इस लेख का सन्देश यह है-

मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

आलोचकों ने कई तर्क रखे और आरोप भी मैं उन सभी तर्कों और आरोपों का मैं बिन्दुवार जवाब देता हूँ-

उनका पहला कथन/तर्क या आरोप था कि मैंने मांसाहार को धर्म से जोड़ कर बताया है:

मैं आपसे यह बता दूँ कि धर्म से मैंने जोड़ कर नहीं बताया है यह पहले से ही वेदों, कुरान, मनुस्मृति और महाभारत वगैरह में लिखा है. और यह सत्य है. ऐसा मुझे नहीं लगता कि मैंने यह गलत किया क्यूँ कि एक हमारा हिंदुस्तान ही तो है जहाँ धर्म को इतनी अहमियत दी जाती है. यही वजह थी कि मुझे अपनी बात सार्थक तरीके से कहने के लिए उन महान और मान्य ग्रन्थों का हवाला देना पड़ा अगर मैं सिर्फ यह कहता कि यह मेरा ओपिनियन है तो मेरी बात का असर बिलकुल भी नहीं होता. अगर आपको किसी इस तरह के मुद्दों पर कुछ कहना हो तो आप भी उन सभी हवालों (सार्थक, सत्य और मान्य) का ज़िक्र करना ना भूलें, क्यूंकि हो सकता है कि आपके विचार भले ही आपको सही लग रहें हों, और वह पूर्णतया ग़लत और निरर्थक हों | क्या यह बात सही नहीं है कि मांसाहार और शाकाहार के मुद्दे को हमारे हिंदुस्तान में धर्म की नज़र से देखा जाता? बिल्कुल -सही है, इसे धर्म विशेष से जोड़ कर ही देखा जाता है| इसी वजह से मुझे अपनी बात में उन किताबों के महत्वपूर्ण उद्वरण का उल्लेख करना पड़ा| अंतत मैं आपसे और आप सबसे यह कहना चाहूँगा कि (मेरा मानना यह है कि) मांसाहार और शाकाहार को धर्म के नज़र से नहीं देखना चाहिए.

अगला आरोप था कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है?

दूसरा तर्क यह है कि मांसाहार मनुष्य के स्वाभाव में आक्रामकता पैदा करता है. चलिए ठीक है, मैं आपकी बात से हद दर्ज़े तक सहमत हूँ कि जो हम खाते है उसका हमारे स्वाभाव पर सीधा प्रभाव पड़ता है| यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब| हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.
नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful.

अब मैं बहस को आगे बढ़ाता हूँ, मुआफ कीजियेगा. अब मैं वकील की तरह बोलूँगा क्यूंकि बात तर्क की है तो आगे बढ़ना भी ज़रूरी है- आप लोग पेड़-पौधों को खाते हैं, इसीलिए आप पेड़-पौधों की तरह व्यवहार करते हैं. that is, suppression of the senses… a lower species. मैं जानता हूँ कि यह गलत है | मैं सिर्फ एक वकील की तरह व्यवहार कर रहा हूँ| मुझे शर्म महसूस हो रही है इस तरह से लिखकर. यह सत्य नहीं हैं कि अगर आप पेड़-पौधों को खायेगे तो नींम श्रेणी की प्रजाति में गिने जायेंगे या जड़वत हैं| लेकिन जैसा आपने आर्गुमेंट्स दिया उसका यह जवाब था. मुझे मुआफ करें, I really apologize…अगर आप शाकाहारियों का दिल दुखा हो. यह वैज्ञानिक रूप से सत्य नहीं है, यह केवल तर्क था.

बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत ज़्यादा है:

कुछ लोग यह तक भी देतें हैं कि महात्मा गाँधी सरीखे लोग शाकाहारी थे! मैं महात्मा गाँधी की बहुत इज्ज़त करता हूँ क्यूंकि भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया और इंसानियत के लिए भी. लेकिन क्यूंकि महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे, शांतिप्रिय थे, यहाँ यह दर्शाने के लिए लिखा गया कि शाकाहार आपको शांतिप्रिय बनाता है.

तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं.

अब आपसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल जिसका आप जवाब दीजिये! अभी तक के इतिहास में मनुष्य में कौन सा ऐसा व्यक्ति या व्यक्तित्व था जो मशहूर था- सबसे ज्यादा लोगों को मारने के लिए- क्या आप गेस कर सकते है????

….. हिटलर , अडोल्फ़ हिटलर, उसने छह मिलियन यहूदियों को मारा था | क्या वह मांसाहारी था या शाकाहारी?…………शाकाहारी.

खैर! अब आगे आप कहेंगे कि – अडोल्फ़ हिटलर शाकाहारियों के नाम पर धब्बा था और वह एक अपवाद था. वह कभी कभी माँस भी खाता था| आपको यह भी अंतरजाल पर सर्च करने पर मिलेगा कि उसे जब गैस की समस्या होती थी, तब ही वह सब्जियां खाता था. मैं आपको फ्रेंक्ली एक बात बता दूँ कि वैज्ञानिक रूप से अडोल्फ़ हिटलर का छह मिलियन यहूदियों को मारने का सम्बन्ध उसके खानपान से बिल्कुल भी नहीं है और ना ही मैं यह कह रहा हूँ कि वह शाकाहारी था या मांसाहारी था. मैं यह जानने में बिल्कुल भी इंटररेस्टेड नहीं हूँ कि वह क्या खाता था क्यूँ कि इस बात में कोई वज़न नहीं है| मेरा मानना यह है कि अडोल्फ़ हिटलर द्वारा ऐसा करने का कारन कुछ और है जो कि पूर्णतया अमानवीय है और यह वह नहीं जो उनका खानपान है. मैं एक रिसर्च के बारे में बताता हूँ- अमेरिका में कुछ शाकाहारी और मांसाहारी विद्यार्थियों पर शोध किया गया तो पाया गया कि मांसाहारी विद्यार्थी ज़्यादा शांतिप्रिय और सोशल थे और शाकाहारी कम, यानि शाकाहारी ज़्यादा उग्र थे और मांसाहारी कम | लेकिन यह एक रिसर्च था- यह कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं. मैं इसे बिल्कुल भी यह साबित करने के लिए नहीं बता रहा हूँ कि मांसाहारी शांतिप्रिय होते हैं | चूँकि यह एक बहस है, मुझे यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है और आपने जो भी आरोप लगाये वह या तो तर्क थे या रिसर्च, वह कोई वज्ञानिक तथ्य नहीं थे.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शाकाहारियों ने अपनी काबिलियत और बुद्धि का लोहा मनवा लिया है. मैं आपको बता दूं बहुत से ऐसे भारतीय भी है जो बहुत बुद्दिमान थे और भारत के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है लेकिन वे सब मांसाहारी. आपका कहने का मतलब यह था कि शाकाहारी ज़्यादा बुद्धिजीवी होते है, आपने नाम भी गिनवाए जैसे जार्ज बर्नाड- जो सौ साल जिया. मैं आपको कुछ नाम और बताता हूँ जो शाकाहारी थे और बहुत बड़े बुद्धिजीवी भी- अलबर्ट आइंस्टाइन, इसाक न्यूटन. ठीक है…!

आपको मैं एक बात और बता दूं कि यह भी सत्य ही है कि मांसाहारी जानवर ज़्यादा बुद्धिमान होते हैं बनिस्बत शाकाहारी जीव के | लेकिन मैं इसे भी बहस का हिस्सा नहीं बनाऊंगा कि मांसाहार आपको बुद्धिमान बनाता है क्यूंकि यह सब बातें हम इंसानों पर लागू नहीं हो सकती हैं | खानपान का इन्सान पर फर्क पड़ता है या आपके खानपान पर असर नहीं डालता है, यह एक तर्क है ………. तर्क से सत्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

आगे मैं आपसे एक पूछता हूँ क्या आप ‘यदुनाथ सिंह नायक’ के नाम से वाकिफ हैं, नहीं मालूम मैं बताता हूँ |यदुनाथ सिंह नायक एक शाकाहारी थे और सेना में कार्यरत थे | वह कुश्तीबाज़ थे और उन्होंने विश्व चैम्पियनशिप में दो मांसाहारी कुश्तीबाजों को धुल चटा दी थी| तब तो आपको लगेगा कि शाकाहार से इन्सान ज़्यादा ताक़तवर बनाता है| मैं आपको बता दूँ कि कुश्तीबाजी के विश्व चैम्पियंज़ में शाकाहारी भी हैं और मांसाहारी भी | बात को आगे बढाते हैं- अगर आप पुरे विश्व के लिहाज़ से अगर कम्पेयर करेंगे तो आप को पता है सबसे ज़्यादा कुश्तीबाजी में कौन मशहूर है- मांसाहारी!

बोडी बिल्डिंग में कौन सबसे ज़्यादा मशहूर है——अर्नाल्ड श्वार्ज्नेगेर | तेरह बार अर्नाल्ड ने विश्व विजेता का खिताब जीता था और सात बार मि. ओलंपिया और पांच बार मि. यूनिवर्स और एक बार मि. वर्ल्ड | आपको पता है- वह क्या था ??? वह शाकाहारी था या माँसाहारी ??? माँसाहारी !!! बोक्सेर- मोहमम्द अली – माँसाहारी ! कैसियस क्ले- माँसाहारी ! माइक टायसन- माँसाहारी !

कुछ ब्लॉग मित्रों ने यह पूछा था कि चिकन और मटन के साथ चावल और रोटी क्यूँ इस्तेमाल की जाती है?

अब इसका मैं क्या जवाब दूँ| मैं आपसे पूछूँ कि आप खाना खाने पर पानी क्यूँ पीते हैं? तो आप क्या जवाब देंगे | पानी शाकाहारी है या माँसाहारी !!!?

अब मैं निम्न तथ्यों के साथ अपनी बातें ख़त्म करना चाहता हूँ: 1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.
2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?
3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 – अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.
6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.
7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.
8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.
9 – जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना ‘मांसाहार आपको आक्रामक बनता है’ का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.
10 – यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.
11 – शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.
12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.
13 –कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.
14 – और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

उम्मीद करता हूँ कि यह लेख आपकी मांसाहार के प्रति उठ रही जिज्ञासाओं को शांत कर देगा… ईश्वर हम सबको सत्य की खोज का प्यासा बनाये !

सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार, शाकाहार

56 Responses

  1. >फ़रवरी २००९ में निशांत जी से हुए डिबेट के अंश भी इस पोस्ट में सम्मिलित हैं!

  2. >फ़रवरी २००९ में निशांत जी से हुए डिबेट के अंश भी इस पोस्ट में सम्मिलित हैं!

  3. Neha says:

    >aapka pichhala post to maine nahi padha tha..lekin ye post jaroor prabhavshali hai….mujhe nahi pata tha ki yahaan shakahaar aur manshahaar ko lekar itni bahas bhi ho chuki hai…khair dekha jaaye to hamare poorvajon ne to pahle maans kha kar hi gujara kiya tha(aadimanav ki baat karen to)….ab hamara apna vichar hai ki ham mansahari banna chahte hain ya shakahari…kai baar logon ko kuch bimariyon ke liye shakahari banne ki bhi salah di jaati hai…lekin hamen davaiyon ke roop me bhi to cod liver oil ka istemaal karna hota hai….dekha jaaye to koi bhi shuddh shakahaari to hai hi nahi…sabhi chhote jivon ko kha hi chuke hain…ek aam khadya dahi me…aise aur bhi kai udaharan hain…vaise main to shakahari hoon…shuddh nahi kah sakti…

  4. Neha says:

    >aapka pichhala post to maine nahi padha tha..lekin ye post jaroor prabhavshali hai….mujhe nahi pata tha ki yahaan shakahaar aur manshahaar ko lekar itni bahas bhi ho chuki hai…khair dekha jaaye to hamare poorvajon ne to pahle maans kha kar hi gujara kiya tha(aadimanav ki baat karen to)….ab hamara apna vichar hai ki ham mansahari banna chahte hain ya shakahari…kai baar logon ko kuch bimariyon ke liye shakahari banne ki bhi salah di jaati hai…lekin hamen davaiyon ke roop me bhi to cod liver oil ka istemaal karna hota hai….dekha jaaye to koi bhi shuddh shakahaari to hai hi nahi…sabhi chhote jivon ko kha hi chuke hain…ek aam khadya dahi me…aise aur bhi kai udaharan hain…vaise main to shakahari hoon…shuddh nahi kah sakti…

  5. >@सलीम जी,"उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि."सूअर को मैं तो आज तक शान्तीप्रिय जीव ही समझता था। लेकिन आज आपने हमारे ज्ञान में जो वृ्द्धि की है, उसके लिए आपको धन्यवाद्!!12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.आपके इस कुतर्क पर हँसने को मन कर रहा है। भाई! इन्सान कुता,गधा,घोडा,इत्यादि ऎसे सैंकडों जीव हैं,जिनका भक्षण नहीं करता। इसका मतलब तो ये हुआ कि हमारे चारों तरफ कुत्ते ही कुत्ते घूम रहे हैं,गधे ही गधे घूम रहे हैं,घोडे ही घोडे दिखाई दे रहे हैं। कमाल है!!!भाई! हमारा ब्लाग लेखन का ये उद्देश्य होना चाहिए कि इसके माध्यम से कुछ अपनी कहे और कुछ दूसरों की सुने। ताकि हमें अपने आपको परखने/जाँचने का मौका मिल सके। ये नहीं कि सिर्फ अपनी ही अपनी हाँकते रहें।माना कि ये ब्लाग आपका है,आप अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी लिखने के अधिकारी है। किन्तु ये नहीं कि अपने विचारों को धर्म तथा कुतर्कों की चाशनी में डुबोकर दूसरों के मुँह में ठूंसा जाए। आपकी पिछली पोस्ट में मासाँहार के विपक्ष में बहुत से लोगों नें अपने विचार प्रस्तुत किए थे…किन्तु आपने उनमें से किसी के भी प्रश्नों का सही तरीके से उत्तर देने का कोई प्रयास नहीं किया। बल्कि अपने ही विचारो को प्रमुखता देते हुए कुतर्कों पर आधारित आज फिर से एक नईं पोस्ट लिखने बैठ गये।वैसे तो मुझे कुछ भी लेना देना नहीं हैं,आप चाहे जो मन में आए लिखें। किन्तु मेरा आपसे एक आग्रह है कि कृ्प्या धर्मान्धता का परित्याग करके अपने मन मस्तिष्क को खोलकर विचार करें तो शायद आपके ज्ञान में भी वृ्द्धि हो सके और हो सकता है कि हमें भी आपसे कुछ नया जानने/सीखने को मिल सके।धन्यवाद्!!!

  6. >@सलीम जी,"उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि."सूअर को मैं तो आज तक शान्तीप्रिय जीव ही समझता था। लेकिन आज आपने हमारे ज्ञान में जो वृ्द्धि की है, उसके लिए आपको धन्यवाद्!!12 – अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.आपके इस कुतर्क पर हँसने को मन कर रहा है। भाई! इन्सान कुता,गधा,घोडा,इत्यादि ऎसे सैंकडों जीव हैं,जिनका भक्षण नहीं करता। इसका मतलब तो ये हुआ कि हमारे चारों तरफ कुत्ते ही कुत्ते घूम रहे हैं,गधे ही गधे घूम रहे हैं,घोडे ही घोडे दिखाई दे रहे हैं। कमाल है!!!भाई! हमारा ब्लाग लेखन का ये उद्देश्य होना चाहिए कि इसके माध्यम से कुछ अपनी कहे और कुछ दूसरों की सुने। ताकि हमें अपने आपको परखने/जाँचने का मौका मिल सके। ये नहीं कि सिर्फ अपनी ही अपनी हाँकते रहें।माना कि ये ब्लाग आपका है,आप अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी लिखने के अधिकारी है। किन्तु ये नहीं कि अपने विचारों को धर्म तथा कुतर्कों की चाशनी में डुबोकर दूसरों के मुँह में ठूंसा जाए। आपकी पिछली पोस्ट में मासाँहार के विपक्ष में बहुत से लोगों नें अपने विचार प्रस्तुत किए थे…किन्तु आपने उनमें से किसी के भी प्रश्नों का सही तरीके से उत्तर देने का कोई प्रयास नहीं किया। बल्कि अपने ही विचारो को प्रमुखता देते हुए कुतर्कों पर आधारित आज फिर से एक नईं पोस्ट लिखने बैठ गये।वैसे तो मुझे कुछ भी लेना देना नहीं हैं,आप चाहे जो मन में आए लिखें। किन्तु मेरा आपसे एक आग्रह है कि कृ्प्या धर्मान्धता का परित्याग करके अपने मन मस्तिष्क को खोलकर विचार करें तो शायद आपके ज्ञान में भी वृ्द्धि हो सके और हो सकता है कि हमें भी आपसे कुछ नया जानने/सीखने को मिल सके।धन्यवाद्!!!

  7. >यदि भैंस का मांस खा सकते हैं तो आदमी का क्यों नहीं? यह तो बहुत आसान है – चार चार बीबियाँ रखो (उसमें से कोई आठ-नौ वर्ष की भी हो सकती है) उनसे सैकड़ों बच्चे जन्माओ और कम से कम हर साल एक के गोस्त का मजा लो।

  8. >यदि भैंस का मांस खा सकते हैं तो आदमी का क्यों नहीं? यह तो बहुत आसान है – चार चार बीबियाँ रखो (उसमें से कोई आठ-नौ वर्ष की भी हो सकती है) उनसे सैकड़ों बच्चे जन्माओ और कम से कम हर साल एक के गोस्त का मजा लो।

  9. >सलीम खान के ब्लॉग पर कुतर्कों की पुनरावृति देख कर यही लगता है कि इस्लाम को ठीक से मानने वाला कोई भी पढ़ा – लिखा व्यक्ति जीवत्व के तकाजों से पूर्णतया विमुख हो ही जाता है ||अच्छा ही है सलीम जी आपने इस्लाम के बारे में मन – मस्तिष्क के गड़बड़झाले को काफी दूर कर दिया ||जितना हम सोच भी नहीं सकते उतनी क्रूरता की हद तक जाने के लिए आप तैयार बैठे हैं |ऐसे इस्लाम की दावतों से तो खुदा ही बचाए ||@ सलीम खान जी यह मत समझियेगा कि आपके इन दोबारा दिए गए कुतर्कों का ज़वाब हमारे पास नहीं है या फिर हम व्यर्थ की बहस में पड़ने से उकता चुके हैं ,आपके द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे कुतर्कों एवं धर्म से जोड़ कर देखने वाले षड्यंत्रों का हम शीघ्र ही प्रतिउत्तर देंगे ताकि एक अतार्किक दर्शन ( इस्लाम ) को कुतर्कों के रूप में पश करने वालों की चुनौतियों से जन – मानस को बचाया जा सके ||इस नेक काम में तो ईश्वर भी जीवत्व की रक्षा हेतु हमारा साथ देगा ||सत्यमेव जयते ||

  10. >सलीम खान के ब्लॉग पर कुतर्कों की पुनरावृति देख कर यही लगता है कि इस्लाम को ठीक से मानने वाला कोई भी पढ़ा – लिखा व्यक्ति जीवत्व के तकाजों से पूर्णतया विमुख हो ही जाता है ||अच्छा ही है सलीम जी आपने इस्लाम के बारे में मन – मस्तिष्क के गड़बड़झाले को काफी दूर कर दिया ||जितना हम सोच भी नहीं सकते उतनी क्रूरता की हद तक जाने के लिए आप तैयार बैठे हैं |ऐसे इस्लाम की दावतों से तो खुदा ही बचाए ||@ सलीम खान जी यह मत समझियेगा कि आपके इन दोबारा दिए गए कुतर्कों का ज़वाब हमारे पास नहीं है या फिर हम व्यर्थ की बहस में पड़ने से उकता चुके हैं ,आपके द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे कुतर्कों एवं धर्म से जोड़ कर देखने वाले षड्यंत्रों का हम शीघ्र ही प्रतिउत्तर देंगे ताकि एक अतार्किक दर्शन ( इस्लाम ) को कुतर्कों के रूप में पश करने वालों की चुनौतियों से जन – मानस को बचाया जा सके ||इस नेक काम में तो ईश्वर भी जीवत्व की रक्षा हेतु हमारा साथ देगा ||सत्यमेव जयते ||

  11. >عجیب شخص ہو یار تم! کل اتنے اچچھے سے تمہیں سمجھایا تو تھا!میں یہ اردو میں گوگل کی مدد سے لکھ رہا ہوں لیکن مجھے اردو، فارسی، اور عربی پڑھنے-لکھنے آتے ہے.بار-بار مجھے وید اور پران پڑھنے کی ہدایت مت دو.

  12. >عجیب شخص ہو یار تم! کل اتنے اچچھے سے تمہیں سمجھایا تو تھا!میں یہ اردو میں گوگل کی مدد سے لکھ رہا ہوں لیکن مجھے اردو، فارسی، اور عربی پڑھنے-لکھنے آتے ہے.بار-بار مجھے وید اور پران پڑھنے کی ہدایت مت دو.

  13. >@ निशांत जी हैं …….. ये भाई ई का हैं इस्लाम अपना लिए हैं का ……….लगता हैं सलीम खान जी का एक मनोरथ तो सिद्ध हो ही गया ………. :)का लिखें हैं ये तो बताये भला ……….गूगल बाबा भी इसे देखकर भाग खड़े हुए ……… कहें "अल्लाह की जबान" ना बाबा ना………मुझ नाचीज़ में इतनी कूव्वत नहीं की अनुवाद करुँ ………..निशांत जी जल्दी जवाब दें वेट कर रहां हूँ वैसे सलीम जी आपको बधाई …… इतने प्रयासों के बाद कम से कम एक बन्दा तो मिला ……… जो अल्लाह की जबान बोल रहा हो जो शायद आपकी भी समझ के बाहर है |

  14. >@ निशांत जी हैं …….. ये भाई ई का हैं इस्लाम अपना लिए हैं का ……….लगता हैं सलीम खान जी का एक मनोरथ तो सिद्ध हो ही गया ………. :)का लिखें हैं ये तो बताये भला ……….गूगल बाबा भी इसे देखकर भाग खड़े हुए ……… कहें "अल्लाह की जबान" ना बाबा ना………मुझ नाचीज़ में इतनी कूव्वत नहीं की अनुवाद करुँ ………..निशांत जी जल्दी जवाब दें वेट कर रहां हूँ वैसे सलीम जी आपको बधाई …… इतने प्रयासों के बाद कम से कम एक बन्दा तो मिला ……… जो अल्लाह की जबान बोल रहा हो जो शायद आपकी भी समझ के बाहर है |

  15. >भैया गरुड़ध्वज,मुझे अरबी, फारसी, उर्दू अच्छे से पढ़नी आती है. सलीम को शायद न आती हो. मुझे सीखे हुए १५ साल होनेवाले हैं.मैंने सलीम भाई से कहा – "अजीब शख्स हो यार तुम! कल इतने अच्छे से तुम्हें समझाया तो था!…. बार-बार हमें वेद और पुराण पढने की हिदायत मत दो."हम यहाँ बार-बार आते हैं और अपना टाइम वेस्ट करते हैं. सलीम मियां तो हर बात को कुरान और इस्लाम के नजरिये से ही देखना पसंद कर रहे हैं.

  16. >भैया गरुड़ध्वज,मुझे अरबी, फारसी, उर्दू अच्छे से पढ़नी आती है. सलीम को शायद न आती हो. मुझे सीखे हुए १५ साल होनेवाले हैं.मैंने सलीम भाई से कहा – "अजीब शख्स हो यार तुम! कल इतने अच्छे से तुम्हें समझाया तो था!…. बार-बार हमें वेद और पुराण पढने की हिदायत मत दो."हम यहाँ बार-बार आते हैं और अपना टाइम वेस्ट करते हैं. सलीम मियां तो हर बात को कुरान और इस्लाम के नजरिये से ही देखना पसंद कर रहे हैं.

  17. >@ निशांत जी चलिए शुक्र है आप रोजेदारों की जमात में शामिल न हुए ……….. नहीं तो नाहक ही हमारा दिल बैठा जा रहा था ……………वैसे हमें और सभी को समझ में आ गया आपने क्या लिखा है ……… परन्तु शायद सलीम खान को न आया हो ………….(वैसे अभी उम्मीद कायम है )" उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है" लगे रहिये ……… :)बाकि सब राम राम ……

  18. >@ निशांत जी चलिए शुक्र है आप रोजेदारों की जमात में शामिल न हुए ……….. नहीं तो नाहक ही हमारा दिल बैठा जा रहा था ……………वैसे हमें और सभी को समझ में आ गया आपने क्या लिखा है ……… परन्तु शायद सलीम खान को न आया हो ………….(वैसे अभी उम्मीद कायम है )" उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है" लगे रहिये ……… :)बाकि सब राम राम ……

  19. >वाकई अब तो यहाँ आकर ऐसा लगता है कि हम हमारा समय फ़ालतू लेखों में बर्बाद कर रहे हैं।

  20. >वाकई अब तो यहाँ आकर ऐसा लगता है कि हम हमारा समय फ़ालतू लेखों में बर्बाद कर रहे हैं।

  21. >मैंने हमेशा माना है कि आप तर्क से तो लड़ सकते हैं कुतर्क से नहीं। आज एक बार फिर इसकी पुष्टि हो गई। वैसे मुझे ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता कि आप क्या खायें-किसी का खान-पान उसका निजी मामला है और देश-काल-माहौल-मौसम ही इसको तय करते हैं। बाक़ी- बॉक्सर मोहम्मद अली और कैसियस क्ले एक ही इंसान के दो नाम हैं। शायद फ़ेहरिस्त बढ़ाने के चक्कर में चूक हो गई।

  22. >मैंने हमेशा माना है कि आप तर्क से तो लड़ सकते हैं कुतर्क से नहीं। आज एक बार फिर इसकी पुष्टि हो गई। वैसे मुझे ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता कि आप क्या खायें-किसी का खान-पान उसका निजी मामला है और देश-काल-माहौल-मौसम ही इसको तय करते हैं। बाक़ी- बॉक्सर मोहम्मद अली और कैसियस क्ले एक ही इंसान के दो नाम हैं। शायद फ़ेहरिस्त बढ़ाने के चक्कर में चूक हो गई।

  23. >@ सलीम खान वैसे एक बात तो भूल ही गए आप ओसामा – बिन – लादेन भी मांसाहारी ही हैं |लेकिन उनका दर्जा कुछ विशेष है आखिर आप के जात-भाई जो ठहरे , क्यों है ना ?जॉर्ज डबल्यू बुश जिनसे आपकी बिरादरी को खासी तकलीफ है उनका नाम आप मांसाहारियों की फेहरिस्त में जोड़ना भूल गए क्या कोई गुप फतवा है जो नाम भी लेने से रोक रहा है ?यदि है तो कोई बात नहीं , आप से मुझे अब सहानुभूति है :):)

  24. >@ सलीम खान वैसे एक बात तो भूल ही गए आप ओसामा – बिन – लादेन भी मांसाहारी ही हैं |लेकिन उनका दर्जा कुछ विशेष है आखिर आप के जात-भाई जो ठहरे , क्यों है ना ?जॉर्ज डबल्यू बुश जिनसे आपकी बिरादरी को खासी तकलीफ है उनका नाम आप मांसाहारियों की फेहरिस्त में जोड़ना भूल गए क्या कोई गुप फतवा है जो नाम भी लेने से रोक रहा है ?यदि है तो कोई बात नहीं , आप से मुझे अब सहानुभूति है :):)

  25. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या १ . "मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं" तार्किक प्रतिउत्तर :- आपने जैसा की लिखा है कि मांसाहार या शाकाहार किसी धर्म विशेष की जागीर नहीं है , फिर भी अभी तक पिछले दोनों लेखों में आपने निम्न धार्मिक हवालों का उल्लेख किया है जो कि आपके सन्देश कि नीयत को ही झुठला रहे हैं |प्रथम लेख के हवाले ………:—-"5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता हैपवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-"ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है" (कुरआन 5:1)"रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो" (कुरआन 16:5)"और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो" (कुरआन 23:21)6- हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की अनुमति देतें है !बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-"वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है"(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-"माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है"(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि -"स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं"द्वितीय लेख के हवाले ………..——मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है" लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि "मांसाहार क्यूँ जायज़ है ' नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful. …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………इस प्रकार उपरोक्त उदाहरणों को ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि सलीम खान का प्रयास शाकाहार या मांसाहार की तार्किकता से हटकर गलत बात को भी मज़हब का मुलम्मा चढाकर सही साबित करने का कुत्सित प्रयास है |||| सत्यमेव जयते ||

  26. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या १ . "मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं" तार्किक प्रतिउत्तर :- आपने जैसा की लिखा है कि मांसाहार या शाकाहार किसी धर्म विशेष की जागीर नहीं है , फिर भी अभी तक पिछले दोनों लेखों में आपने निम्न धार्मिक हवालों का उल्लेख किया है जो कि आपके सन्देश कि नीयत को ही झुठला रहे हैं |प्रथम लेख के हवाले ………:—-"5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता हैपवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-"ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है" (कुरआन 5:1)"रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो" (कुरआन 16:5)"और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो" (कुरआन 23:21)6- हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की अनुमति देतें है !बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-"वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है"(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-"माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है"(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि -"स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं"द्वितीय लेख के हवाले ………..——मांसाहार का ज़िक्र केवल कुरआन में ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की किताबों में भी है और बाइबल और दूसरी दीगर मज़हबों की किताबों में भी है" लेकिन लेख में पाठकगणों के द्वारा कुछ सवाल भी पूछे गए जिसका जवाब मैंने टिपण्णी के मध्यम से देने की पूरी कोशिश की और बकिया मैं इस पोस्ट के माध्यम से यह सिद्ध करूँगा कि "मांसाहार क्यूँ जायज़ है ' नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. We are peace loving people, therefore we want to have animals which are peaceful. …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………इस प्रकार उपरोक्त उदाहरणों को ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि सलीम खान का प्रयास शाकाहार या मांसाहार की तार्किकता से हटकर गलत बात को भी मज़हब का मुलम्मा चढाकर सही साबित करने का कुत्सित प्रयास है |||| सत्यमेव जयते ||

  27. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या २ . ." शाकाहारी पशुओं का मांस खाने से आक्रामकता नहीं आती " जैसा कि इन्होंने अपने लेख में लिखा है ' " यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब | हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. "तार्किक प्रतिउत्तर :- मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर ( जी हाँ सूअर एक आक्रामक नहीं बल्कि शांतिप्रिय पशु ही होता है ) आदि खाने वाले प्रत्येक पशु की मनोस्थिति बेहद ही आक्रामक होती है जैसे कि शेर , चीते , कुत्ते , भालू , भेड़िया इत्यादि |जाहिर है इन जीवों को भोजन के रूप में खाकर मनुष्य की मनोस्थिति भी खतरनाक और आक्रामक हो जाती है | || सत्यमेव जयते ||

  28. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या २ . ." शाकाहारी पशुओं का मांस खाने से आक्रामकता नहीं आती " जैसा कि इन्होंने अपने लेख में लिखा है ' " यही वजह है कि हम लोग उन जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हों – जैसे मुर्गी, बकरी, भेंड आदि. और इन जानवरों का व्यवहार कैसा होता है? यह शांतप्रिय होते हैं जनाब | हम इसी वजह से उन जानवरों को नहीं खाते जो आक्रामक होते है जैसे- शेर, चिता, कुत्ता और सुवर आदि.नबी हज़रत मोहमम्द सल्ल० ने साफ़ तौर पर कहा है, इस तरह के जानवर तुम पर हराम (prohibited) हैं| हम शांतिप्रिय हैं, इसीलिए हम उन्ही जानवरों को खाते है जो शांतिप्रिय हैं. "तार्किक प्रतिउत्तर :- मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर ( जी हाँ सूअर एक आक्रामक नहीं बल्कि शांतिप्रिय पशु ही होता है ) आदि खाने वाले प्रत्येक पशु की मनोस्थिति बेहद ही आक्रामक होती है जैसे कि शेर , चीते , कुत्ते , भालू , भेड़िया इत्यादि |जाहिर है इन जीवों को भोजन के रूप में खाकर मनुष्य की मनोस्थिति भी खतरनाक और आक्रामक हो जाती है | || सत्यमेव जयते ||

  29. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या 3 . .बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत कम है ? ऐसा सलीम खान ने अपने उदाहरणों से सिद्ध करने की कोशिश की है जैसे कि ये उदाहरण ….. " तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं. "तार्किक प्रतिउत्तर : — १. सबसे पहली बात नोबल पुरस्कार के ऊपर सलीम खान जी क्या आप और आप के मार्गदर्शक जाकिर नाइक जानते हैं कि नोबल पुरस्कार के पैमाने क्या हैं ?चलिए इस विषय पर मैं कुछ प्रकाश डालता हूँ ! " नोबल पुरस्कारों की स्थापना अल्फ्रेड नोबल ने की थी जो की डायनामाइट का भी अविष्कारक थे , अल्फ्रेड नोबल ने डायनामाइट के अविष्कार के बाद पूरी दुनिया के युद्धरत देशों को इसे बेचकर बेपनाह दौलत अर्जित की | इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर नरसंहार के लिए किया गया |जीवन के उत्तरार्ध में जब अल्फ्रेड नोबल बीमार रहने लगा , तभी एक दिन उनके भाई का इंतकाल हो गया |अगले दिन के अखबारों में गलती से भाई की जगह अल्फ्रेड नोबल के मरने की खबर छाप दी गयी |सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का शीर्षक निम्न था ……………….. सदी का सबसे क्रूर हत्यारा मर गया , ईश्वर उसे नर्क में भी जगह न देगा इस शीर्षक को पढने के पश्चात् नोबल ने सोचा कि क्या दुनिया मुझे इसी तरह से याद रखेगी , फिर उसने नोबल फाउंडेशन की स्थापना की और ताज्जुब तो इस बात का है कि वो दुनिया में शांति का पुरस्कार बाँट रहे हैं :)"ज़नाब सलीम खान कथित रूप से शांति के ऐसे पुरस्कार तो आपके मांसाहारी कुनबे को ही मुबारक हों |जारी ………………………………………………………………..|| सत्यमेव जयते ||

  30. >सलीम खान के दो कौड़ी के कुतर्कों का मैं सिलसिलेवार तरीके से जवाब लिख रहा हूँ ताकि इनकी गंदगी से आम जनमानस दिग्भ्रमित न हो |कुतर्क संख्या 3 . .बुद्धिजीवियों में शाकाहारियों का प्रतिशत कम है ? ऐसा सलीम खान ने अपने उदाहरणों से सिद्ध करने की कोशिश की है जैसे कि ये उदाहरण ….. " तो सुनिए आज आप दुनिया के सबसे बड़े नोबेल पुरस्कार (शांति हेतु) का विश्लेषण करें तो पाएंगे उनमें से ज्यादातर, बल्कि सभी मांसाहारी थे. मसलन-मनेक्चंग बेगन- मांसाहारी, यासीर अराफात-मांसाहारी, अनवर सादात-मांसाहारी, मदर टेरेसा- मांसाहारी, आपने पढ़ा मदर टेरेसा मांसाहारी थीं. "तार्किक प्रतिउत्तर : — १. सबसे पहली बात नोबल पुरस्कार के ऊपर सलीम खान जी क्या आप और आप के मार्गदर्शक जाकिर नाइक जानते हैं कि नोबल पुरस्कार के पैमाने क्या हैं ?चलिए इस विषय पर मैं कुछ प्रकाश डालता हूँ ! " नोबल पुरस्कारों की स्थापना अल्फ्रेड नोबल ने की थी जो की डायनामाइट का भी अविष्कारक थे , अल्फ्रेड नोबल ने डायनामाइट के अविष्कार के बाद पूरी दुनिया के युद्धरत देशों को इसे बेचकर बेपनाह दौलत अर्जित की | इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर नरसंहार के लिए किया गया |जीवन के उत्तरार्ध में जब अल्फ्रेड नोबल बीमार रहने लगा , तभी एक दिन उनके भाई का इंतकाल हो गया |अगले दिन के अखबारों में गलती से भाई की जगह अल्फ्रेड नोबल के मरने की खबर छाप दी गयी |सभी प्रमुख समाचार-पत्रों का शीर्षक निम्न था ……………….. सदी का सबसे क्रूर हत्यारा मर गया , ईश्वर उसे नर्क में भी जगह न देगा इस शीर्षक को पढने के पश्चात् नोबल ने सोचा कि क्या दुनिया मुझे इसी तरह से याद रखेगी , फिर उसने नोबल फाउंडेशन की स्थापना की और ताज्जुब तो इस बात का है कि वो दुनिया में शांति का पुरस्कार बाँट रहे हैं :)"ज़नाब सलीम खान कथित रूप से शांति के ऐसे पुरस्कार तो आपके मांसाहारी कुनबे को ही मुबारक हों |जारी ………………………………………………………………..|| सत्यमेव जयते ||

  31. >गतांक से आगे …………………२. अब बात महात्मा गांधी जी कीकई लोग कहते हैं की महात्मा गाँधी जी को नोबल पुरस्कार नहीं मिला !! मेरा कहना है कि अहिंसा के उस परमदूत के सामने नोबल जैसों की औकात ही क्या है |संयुक्त राष्ट्र संघ ने शांतिदूत गाँधी जी के प्रयासों को सम्मानित करते हुए प्रतिवर्ष २ अक्टूबर गाँधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया है |सलीम खान बताएं कि पूरे मांसाहारी कुनबे में किस व्यक्ति को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ है ?जारी …………………………………………………………………………………

  32. >गतांक से आगे …………………२. अब बात महात्मा गांधी जी कीकई लोग कहते हैं की महात्मा गाँधी जी को नोबल पुरस्कार नहीं मिला !! मेरा कहना है कि अहिंसा के उस परमदूत के सामने नोबल जैसों की औकात ही क्या है |संयुक्त राष्ट्र संघ ने शांतिदूत गाँधी जी के प्रयासों को सम्मानित करते हुए प्रतिवर्ष २ अक्टूबर गाँधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया है |सलीम खान बताएं कि पूरे मांसाहारी कुनबे में किस व्यक्ति को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ है ?जारी …………………………………………………………………………………

  33. >गतांक से आगे ………………… ३.अब बात अडोल्फ़ हिटलर की सलीम खान ने अपने लेख में हिटलर को शाकाहारी बताते हुए ( जो की एक विवाद का विषय है ) यहूदियों की हत्या को और उसके द्वारा किये गए विनाश को शाकाहारी अपवाद से जोड़ दिया है |अब कोई उन्हें बताये कि अगर बात इंसानियत के दुश्मनों की ही की जाए तो मांसाहारियों का कुनबा इतना बड़ा है कि हिटलर भी बौना पड़ जायेगा , जरा नीचे लिखे कुछ नामों पर गौर फरमाएं ||१. जोसफ स्तालिन ( २.५ करोड़ हत्याएं ) – मांसाहारी २. माओत्से तुंग ( ३ से ४ करोड़ हत्याओं का दोषी ) – मांसाहारी ३ . पोलपोट ( २० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ४. सिकंदर ( १० लाख हत्याए ) – मांसाहारी ५. इदी अमिन ( १५ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ६. सद्दाम हुसैन ( १० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ७. अयातुल्ला खोमैनी ( ६ से ८ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ८. विलियम ट्रूमन ( ५ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ९.जनरल तोजो ( २० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी १० . ओसामा- बिन – लादेन ( ७०००० से अधिक अभी जारी ..) – मांसाहारी जारी …………………………………………………………..

  34. >गतांक से आगे ………………… ३.अब बात अडोल्फ़ हिटलर की सलीम खान ने अपने लेख में हिटलर को शाकाहारी बताते हुए ( जो की एक विवाद का विषय है ) यहूदियों की हत्या को और उसके द्वारा किये गए विनाश को शाकाहारी अपवाद से जोड़ दिया है |अब कोई उन्हें बताये कि अगर बात इंसानियत के दुश्मनों की ही की जाए तो मांसाहारियों का कुनबा इतना बड़ा है कि हिटलर भी बौना पड़ जायेगा , जरा नीचे लिखे कुछ नामों पर गौर फरमाएं ||१. जोसफ स्तालिन ( २.५ करोड़ हत्याएं ) – मांसाहारी २. माओत्से तुंग ( ३ से ४ करोड़ हत्याओं का दोषी ) – मांसाहारी ३ . पोलपोट ( २० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ४. सिकंदर ( १० लाख हत्याए ) – मांसाहारी ५. इदी अमिन ( १५ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ६. सद्दाम हुसैन ( १० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ७. अयातुल्ला खोमैनी ( ६ से ८ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ८. विलियम ट्रूमन ( ५ लाख हत्याएं ) – मांसाहारी ९.जनरल तोजो ( २० लाख हत्याएं ) – मांसाहारी १० . ओसामा- बिन – लादेन ( ७०००० से अधिक अभी जारी ..) – मांसाहारी जारी …………………………………………………………..

  35. >कुतर्क संख्या ४. "सलीम खान ने अपने ब्लॉग पर कुछ नामचीन हस्तियों के साथ ही प्रमुख कुश्तीबाजों को भी मांसाहारी बताया है "तार्किक प्रतिउत्तर :- क्या कुश्तीबाजी मनुष्य का नैसर्गिक गुण है ? , शायद नहीं ये तो एक पाशविक क्रिया है जो कि पशुओं द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र और मादाओं पर अधिपत्य ज़माने के लिए की जाती है ; आदि मानव के लिए ये आवश्यक रहा होगा लेकिन विकास के क्रम में ये बातें सभी मनुष्य के लिए गौण हो जाती हैं | विकास के क्रम में मनुष्य के लिए विज्ञान , गणित , कला , संस्कृति , दर्शन आदि महत्वपूर्ण रहते हैं |उदाहरण के लिए २५० वर्ष पहले के किसी कुश्तीबाज का नाम शायद की आप को पता हो लेकिन २५०० वर्ष पहले आये भगवान् बुद्ध को हम सभी जानते हैं , इसी क्रम में अन्य महान लोगों के भी नाम लिए जा सकते हैं जिन्होंने मानवता के लिए विशष्ट योगदान दिया और वो शाकाहारी ही थे ………………..जैसे १. प्लूटो २. सुकरात .३. आर्यभट ४. गौतम बुद्ध ५. लेओनार्दो – डा – विन्ची ५. आइन्स्टीन ६. न्यूटन७. राल्फ एमर्सन ८. बर्नाड शा ९. कोपेर्निक्स १०. स्वामी विवेकानंद ११ . माइकल जैक्सन और भी अनेक नाम हैं पहला लिंकदूसरा लिंक जारी …………………………………………

  36. >कुतर्क संख्या ४. "सलीम खान ने अपने ब्लॉग पर कुछ नामचीन हस्तियों के साथ ही प्रमुख कुश्तीबाजों को भी मांसाहारी बताया है "तार्किक प्रतिउत्तर :- क्या कुश्तीबाजी मनुष्य का नैसर्गिक गुण है ? , शायद नहीं ये तो एक पाशविक क्रिया है जो कि पशुओं द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र और मादाओं पर अधिपत्य ज़माने के लिए की जाती है ; आदि मानव के लिए ये आवश्यक रहा होगा लेकिन विकास के क्रम में ये बातें सभी मनुष्य के लिए गौण हो जाती हैं | विकास के क्रम में मनुष्य के लिए विज्ञान , गणित , कला , संस्कृति , दर्शन आदि महत्वपूर्ण रहते हैं |उदाहरण के लिए २५० वर्ष पहले के किसी कुश्तीबाज का नाम शायद की आप को पता हो लेकिन २५०० वर्ष पहले आये भगवान् बुद्ध को हम सभी जानते हैं , इसी क्रम में अन्य महान लोगों के भी नाम लिए जा सकते हैं जिन्होंने मानवता के लिए विशष्ट योगदान दिया और वो शाकाहारी ही थे ………………..जैसे १. प्लूटो २. सुकरात .३. आर्यभट ४. गौतम बुद्ध ५. लेओनार्दो – डा – विन्ची ५. आइन्स्टीन ६. न्यूटन७. राल्फ एमर्सन ८. बर्नाड शा ९. कोपेर्निक्स १०. स्वामी विवेकानंद ११ . माइकल जैक्सन और भी अनेक नाम हैं पहला लिंकदूसरा लिंक जारी …………………………………………

  37. >बिन्दुवार दिए गए कुतर्कों का जवाब (१) – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.जवाब – धर्म की समझ जब तुम जैसे अहमकों को है ही नहीं ( जो हर बात को कुरान , हदीस ,और सुन्नत की निगाहों से तौलते हैं ) तो फिर कैसे समझ सकते हो हमारे लिए धर्म का मतलब " यतस्य धार्यती सः धर्मेण " है |आज की मानवता के लिए मांसाहार कत्तई धर्मयुक्त नहीं है ||(२) क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?जवाब – वैसे तो चाँद पर जाने से लेकर करोडों बेमतलब की जनसँख्या का पेट पालना ये भी फिजूलखर्ची ही है , और एस्किमो जाती रूप से मनुष्य की संज्ञा में नहीं आते |(३) अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता |(४) अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है. |(५) अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है |जवाब — सुशांत सिंहल जी ने अपने आलेख में इसका बड़ा ही तार्किक उत्तर दिया है | एक तर्क यह दिया गया है कि पेड़-पौधों को भी कष्ट होता है। ऐसे में पशुओं को कष्ट पहुंचाने की बात स्वयमेव निरस्त हो जाती है। इस बारे में विनम्र निवेदन है कि हम पेड़ से फल तोड़ते हैं तो पेड़ की हत्या नहीं कर देते। फल तोड़ने के बाद भी पेड़ स्वस्थ है, प्राणवान है, और फल देता रहेगा। आप गाय, भैंस, बकरी का दूध दुहते हैं तो ये पशु न तो मर जाते हैं और न ही दूध दुहने से बीमार हो जाते हैं। दूध को तो प्रकृति ने बनाया ही भोजन के रूप में है। पर अगर हम किसी पशु के जीवन का अन्त कर देते हैं तो अनेकों धर्मों में इसको बुरा माना गया है। आप इससे सहमत हों या न हों, आपकी मर्ज़ी। जारी ……………………………………………………………………………………………………………………….

  38. >बिन्दुवार दिए गए कुतर्कों का जवाब (१) – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.जवाब – धर्म की समझ जब तुम जैसे अहमकों को है ही नहीं ( जो हर बात को कुरान , हदीस ,और सुन्नत की निगाहों से तौलते हैं ) तो फिर कैसे समझ सकते हो हमारे लिए धर्म का मतलब " यतस्य धार्यती सः धर्मेण " है |आज की मानवता के लिए मांसाहार कत्तई धर्मयुक्त नहीं है ||(२) क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?जवाब – वैसे तो चाँद पर जाने से लेकर करोडों बेमतलब की जनसँख्या का पेट पालना ये भी फिजूलखर्ची ही है , और एस्किमो जाती रूप से मनुष्य की संज्ञा में नहीं आते |(३) अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता |(४) अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है. |(५) अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है |जवाब — सुशांत सिंहल जी ने अपने आलेख में इसका बड़ा ही तार्किक उत्तर दिया है | एक तर्क यह दिया गया है कि पेड़-पौधों को भी कष्ट होता है। ऐसे में पशुओं को कष्ट पहुंचाने की बात स्वयमेव निरस्त हो जाती है। इस बारे में विनम्र निवेदन है कि हम पेड़ से फल तोड़ते हैं तो पेड़ की हत्या नहीं कर देते। फल तोड़ने के बाद भी पेड़ स्वस्थ है, प्राणवान है, और फल देता रहेगा। आप गाय, भैंस, बकरी का दूध दुहते हैं तो ये पशु न तो मर जाते हैं और न ही दूध दुहने से बीमार हो जाते हैं। दूध को तो प्रकृति ने बनाया ही भोजन के रूप में है। पर अगर हम किसी पशु के जीवन का अन्त कर देते हैं तो अनेकों धर्मों में इसको बुरा माना गया है। आप इससे सहमत हों या न हों, आपकी मर्ज़ी। जारी ……………………………………………………………………………………………………………………….

  39. >६) इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है |जवाब – इंसान के दाँतों की बनावट किसी भी मांसाहारी जीव के दाँतों से पूरी तरह से भिन्न हैं | बल्कि सभी शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य भी अपने दाँतों को दायें – बाये चलाता है न कि ऊपर – नीचे जैसा कि मांसाहारी करते हैं |(७) और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ |जवाब – सुशांत सिंघल जी ने इसका जवाब दिया है ; "पाचन संस्थान की बात चल निकली है तो इतना बता दूं कि सभी शाकाहारी जीवों में छोटी आंत, मांसाहारी जीवों की तुलना में कहीं अधिक लंबी होती है। हम मानव भी इसका अपवाद नहीं हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं, हमारी छोटी आंत लगभग २७ फीट लंबी है और यही स्थिति बाकी सब शाकाहारी जीवों की भी है। शेर की, कुत्ते की, बिल्ली की छोटी आंत बहुत छोटी है क्योंकि ये मूलतः मांसाहारी जानवर हैं। "जारी ……………………..

  40. >६) इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है |जवाब – इंसान के दाँतों की बनावट किसी भी मांसाहारी जीव के दाँतों से पूरी तरह से भिन्न हैं | बल्कि सभी शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य भी अपने दाँतों को दायें – बाये चलाता है न कि ऊपर – नीचे जैसा कि मांसाहारी करते हैं |(७) और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ |जवाब – सुशांत सिंघल जी ने इसका जवाब दिया है ; "पाचन संस्थान की बात चल निकली है तो इतना बता दूं कि सभी शाकाहारी जीवों में छोटी आंत, मांसाहारी जीवों की तुलना में कहीं अधिक लंबी होती है। हम मानव भी इसका अपवाद नहीं हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं, हमारी छोटी आंत लगभग २७ फीट लंबी है और यही स्थिति बाकी सब शाकाहारी जीवों की भी है। शेर की, कुत्ते की, बिल्ली की छोटी आंत बहुत छोटी है क्योंकि ये मूलतः मांसाहारी जानवर हैं। "जारी ……………………..

  41. >(८ ) आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.जवाब – आदिमानव का मांसाहार करना उनकी प्रकृति के हिसाब से सही होगा किन्तु हमारे लिए कत्तई उचित नहीं है |( यह कोई सुन्नत नहीं है कि अपना दिमाग न लगाइए ) (९) जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं हैजवाब – मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर , गाय आदि खाने वाले प्रत्येक पशु की मनोस्थिति बेहद ही आक्रामक होती है जैसे कि शेर , चीते , कुत्ते , भालू , भेड़िया इत्यादि |जाहिर है इन जीवों (मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर) को भोजन के रूप में खाकर मनुष्य की मनोस्थिति भी खतरनाक और आक्रामक हो जाती है |(१०) शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक. जवाब – एक किलोग्राम गोमांस के उत्पादन में करीब 16 किलोग्राम अन्न की आवश्यकता पड़ती है।एक किलोग्राम मांस की समग्र उत्पादन प्रक्रिया में करीब 70 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है। एक बार न्यूजवीक पत्रिका में छपा था कि साढ़े चार सौ किलोग्राम के एक बैल की परवरिश में इतना पानी लग जाता है कि उसमें एक पानी का जहाज चलाया जा सके। एक हैम्बर्गर तैयार करने में वातावरण में 75 किलोग्राम कार्बन डाई आक्साइड घुल जाती है। अगर आप पूरे दिन अपनी कार दौड़ाते हैं तो मात्र तीन किलोग्राम गैस ही निकलेगी।अब बताइए क्या सस्ता पड़ता है ? | (११) अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.जवाब – पंडित डी. के . शर्मा ' वत्स ' जी के शब्दों में आपके इस कुतर्क पर हँसने को मन कर रहा है। भाई! इन्सान कुता,गधा,घोडा,इत्यादि ऎसे सैंकडों जीव हैं,जिनका भक्षण नहीं करता। इसका मतलब तो ये हुआ कि हमारे चारों तरफ कुत्ते ही कुत्ते घूम रहे हैं,गधे ही गधे घूम रहे हैं,घोडे ही घोडे दिखाई दे रहे हैं। कमाल है!!!जारी ……………………………………………………

  42. >(८ ) आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.जवाब – आदिमानव का मांसाहार करना उनकी प्रकृति के हिसाब से सही होगा किन्तु हमारे लिए कत्तई उचित नहीं है |( यह कोई सुन्नत नहीं है कि अपना दिमाग न लगाइए ) (९) जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं हैजवाब – मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर , गाय आदि खाने वाले प्रत्येक पशु की मनोस्थिति बेहद ही आक्रामक होती है जैसे कि शेर , चीते , कुत्ते , भालू , भेड़िया इत्यादि |जाहिर है इन जीवों (मुर्गा , बकरी , भेड़, सूअर) को भोजन के रूप में खाकर मनुष्य की मनोस्थिति भी खतरनाक और आक्रामक हो जाती है |(१०) शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक. जवाब – एक किलोग्राम गोमांस के उत्पादन में करीब 16 किलोग्राम अन्न की आवश्यकता पड़ती है।एक किलोग्राम मांस की समग्र उत्पादन प्रक्रिया में करीब 70 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है। एक बार न्यूजवीक पत्रिका में छपा था कि साढ़े चार सौ किलोग्राम के एक बैल की परवरिश में इतना पानी लग जाता है कि उसमें एक पानी का जहाज चलाया जा सके। एक हैम्बर्गर तैयार करने में वातावरण में 75 किलोग्राम कार्बन डाई आक्साइड घुल जाती है। अगर आप पूरे दिन अपनी कार दौड़ाते हैं तो मात्र तीन किलोग्राम गैस ही निकलेगी।अब बताइए क्या सस्ता पड़ता है ? | (११) अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.जवाब – पंडित डी. के . शर्मा ' वत्स ' जी के शब्दों में आपके इस कुतर्क पर हँसने को मन कर रहा है। भाई! इन्सान कुता,गधा,घोडा,इत्यादि ऎसे सैंकडों जीव हैं,जिनका भक्षण नहीं करता। इसका मतलब तो ये हुआ कि हमारे चारों तरफ कुत्ते ही कुत्ते घूम रहे हैं,गधे ही गधे घूम रहे हैं,घोडे ही घोडे दिखाई दे रहे हैं। कमाल है!!!जारी ……………………………………………………

  43. >१२ ) कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए |जवाब – चिकित्सा विज्ञानं की समझ न हो तो इस प्रकार के घटिया तर्क तो मत दीजिये |जरा इस पर भी गौर फरमाएं :- "नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने बताया कि मांसाहारियों की तुलना में शाकाहारी लोगों को कैंसर का खतरा कम होता है। दुनिया भर के पांच फीसदी शाकाहारी लोगों के लिए यह शर्तिया एक अच्छी खबर थी। लेकिन क्या सचमुच शाकाहार में ही सारे फायदे निहित हैं? । कई बीमारियों में शाकाहारी होना फायदेमंद है। कहां किसको है फायदा और किसे नुकसान, आइये डालते हैं एक नजर.. [आर्थराइटिस]खतरा : मांसाहारी कोजोड़ों में आयरन के इकट्ठा होने से आर्थराइटिस होता है। चूंकि मीट में आयरन की मात्रा ज्यादा होती है। लिहाजा मांस का सेवन करने वालों में आर्थराइटिस का खतरा ज्यादा होता है। [गालब्लैडर की पथरी]खतरा : मांसाहारी कोगालब्लैडर की पथरी तब हो जाती है जब ब्लैडर से निकलने वाला बाइल, जो आमतौर पर तरल होता है, सख्त हो जाता है। यह आहार में बहुत ज्यादा सैचुरेटेड वसा लेने के कारण होता है। इस तरह का वसा मीट में ज्यादा पाया जाता है। लिहाजा, मांसाहारियों को गालब्लैडर की पथरी का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। [अल्जाइमर्स]खतरा : मांसाहारी कोमाना जाता है कि अल्जाइमर्स का मुख्य कारण मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में बीटा-अमाइलायड प्रोटीन का जमना है। फल और सब्जियों में मौजूद पालीफिनाल इस प्रोटीन को जमने से रोकते हैं। इसलिए मांसाहारियों की तुलना में अल्जाइमर्स का खतरा शाकाहारियों को कम होता है। अभी तो ऐसी एक ही रिपोर्ट आपके सामने रख रहा हूँ , अपने आजतक कितनी पढ़ी हैं ????

  44. >१२ ) कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए |जवाब – चिकित्सा विज्ञानं की समझ न हो तो इस प्रकार के घटिया तर्क तो मत दीजिये |जरा इस पर भी गौर फरमाएं :- "नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने बताया कि मांसाहारियों की तुलना में शाकाहारी लोगों को कैंसर का खतरा कम होता है। दुनिया भर के पांच फीसदी शाकाहारी लोगों के लिए यह शर्तिया एक अच्छी खबर थी। लेकिन क्या सचमुच शाकाहार में ही सारे फायदे निहित हैं? । कई बीमारियों में शाकाहारी होना फायदेमंद है। कहां किसको है फायदा और किसे नुकसान, आइये डालते हैं एक नजर.. [आर्थराइटिस]खतरा : मांसाहारी कोजोड़ों में आयरन के इकट्ठा होने से आर्थराइटिस होता है। चूंकि मीट में आयरन की मात्रा ज्यादा होती है। लिहाजा मांस का सेवन करने वालों में आर्थराइटिस का खतरा ज्यादा होता है। [गालब्लैडर की पथरी]खतरा : मांसाहारी कोगालब्लैडर की पथरी तब हो जाती है जब ब्लैडर से निकलने वाला बाइल, जो आमतौर पर तरल होता है, सख्त हो जाता है। यह आहार में बहुत ज्यादा सैचुरेटेड वसा लेने के कारण होता है। इस तरह का वसा मीट में ज्यादा पाया जाता है। लिहाजा, मांसाहारियों को गालब्लैडर की पथरी का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। [अल्जाइमर्स]खतरा : मांसाहारी कोमाना जाता है कि अल्जाइमर्स का मुख्य कारण मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में बीटा-अमाइलायड प्रोटीन का जमना है। फल और सब्जियों में मौजूद पालीफिनाल इस प्रोटीन को जमने से रोकते हैं। इसलिए मांसाहारियों की तुलना में अल्जाइमर्स का खतरा शाकाहारियों को कम होता है। अभी तो ऐसी एक ही रिपोर्ट आपके सामने रख रहा हूँ , अपने आजतक कितनी पढ़ी हैं ????

  45. >(१३) और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.जवाब – दुनिया में कोई भी कभी किसी अनाचार को पूरी तरह से नहीं रोक सकता फिर अभी भोजन से जुड़ा व्यवहारिक पक्ष पूरी दुनिया के सामने लाया जाना बाकी ही है |आशा है आप सभी लोग इन बातों की सत्यता पूर्वक परख करेंगें ||सत्यमेव जयते ||

  46. >(१३) और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.जवाब – दुनिया में कोई भी कभी किसी अनाचार को पूरी तरह से नहीं रोक सकता फिर अभी भोजन से जुड़ा व्यवहारिक पक्ष पूरी दुनिया के सामने लाया जाना बाकी ही है |आशा है आप सभी लोग इन बातों की सत्यता पूर्वक परख करेंगें ||सत्यमेव जयते ||

  47. >ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं"लिखने से पहले सोच विचार कर लेने में कोई पाप नहीं है. अगर जानवरों मांस खाने से से उनके अधिकारों का कोई हनन नहीं होता तो लोग कल को इंसानों को मारकर उनका मांस खाने लगें तो इंसानों के अधिकारों का भी कोई हनन नहीं होगा! सलाम तुम्हारे लॉजिक को (!!!!!!?????)और बाकी जानवरों की आबादी बढे न बढे इंसानी आबादी तो बेकाबू हुई ही जा रही है, उसे कौन खाकर कंट्रोल करेगा? पुरातत्व विज्ञान बताता है की आज से पहले पृथ्वी पर केवल एक बार किसी प्रजाति की आबादी बेकाबू हुई थी(डाइनासोर) , और उसे किसी ने खाकर ख़त्म नहीं किया. बल्कि कुदरत ने उनका इन्तेजाम कर दिया. जब कुदरत हर चीज़ कंट्रोल करने में सक्षम है तो हम जानवरों की आबादी घटाने का ठेका अपने सर क्यों ले रहे हैं?आज इंसानी आबादी घटाने की ज़रूरत सबसे ज्यादा है, क्या हमें इन्सान का लज़ीज़ गोश्त भी खाना शुरू कर देना चाहिए? बोलें तो भिजवाऊं आपके दस्तरख्वान पर….

  48. >ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं"लिखने से पहले सोच विचार कर लेने में कोई पाप नहीं है. अगर जानवरों मांस खाने से से उनके अधिकारों का कोई हनन नहीं होता तो लोग कल को इंसानों को मारकर उनका मांस खाने लगें तो इंसानों के अधिकारों का भी कोई हनन नहीं होगा! सलाम तुम्हारे लॉजिक को (!!!!!!?????)और बाकी जानवरों की आबादी बढे न बढे इंसानी आबादी तो बेकाबू हुई ही जा रही है, उसे कौन खाकर कंट्रोल करेगा? पुरातत्व विज्ञान बताता है की आज से पहले पृथ्वी पर केवल एक बार किसी प्रजाति की आबादी बेकाबू हुई थी(डाइनासोर) , और उसे किसी ने खाकर ख़त्म नहीं किया. बल्कि कुदरत ने उनका इन्तेजाम कर दिया. जब कुदरत हर चीज़ कंट्रोल करने में सक्षम है तो हम जानवरों की आबादी घटाने का ठेका अपने सर क्यों ले रहे हैं?आज इंसानी आबादी घटाने की ज़रूरत सबसे ज्यादा है, क्या हमें इन्सान का लज़ीज़ गोश्त भी खाना शुरू कर देना चाहिए? बोलें तो भिजवाऊं आपके दस्तरख्वान पर….

  49. वजूद says:

    >सलीम भाई, गरुदद्वज जी, विवेक जी, निशांत जी,आप सभी की टिप्पणियों को मैंने पढा. सच्चाई यह है कि प्लीज़ इसे धर्म से जोड़कर मनों में खटास ना भरें. हम सभी के पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ भी की हैं और कई अच्चैयाँ भी. चाहे हम मुसलमान हों या हिन्दू या ईसाई. सब कुछ परिस्तिथिवश हुआ. इसलिए अपने महान पूर्वजों पर चीखने के बजाय सौहार्दता से काम लें. मैं ये बता दूं कि हममें से असल कोई नहीं, लेकिन साबित इसलिए नहीं करूंगा कि न तो यह हमारा विषय है, और न ही इसे तवज्जो देना चाहता हूँ. लेकिन अपने ब्लॉग पर एक दिन इसे लिखूंगा ज़रूर. बहरहाल हम सभी का मकसद एक होना चाहिए. मेरा ख़याल है कि सलीम भाई आप भी विवादिद विषयों से बच सकते थे यदि दुबारा इस विषय पर ना लिखते. मैं सिर्फ यह सलाह आप सभी को देना चाहता हूँ कि यदि संभव हो तो हम सभी हर महीने ५०-५० गरीबों को अपने-अपने सामर्थ्य शाकाहार या मांसाहार के अनुसार भोजन ज़रूर कराएँ. कोशिश करें कि अपने घर का बच्चा हुआ भोजन भी किसी भूखे को ही दें, ताकि कोई गरीब भूखा उठ तो जाए, लेकिन सोये नहीं.अब आप इस बात पर सरकार की नीतियों की तरफ ना चले जाएँ. क्योंकि यदि सारी नीतियाँ सरकार पर ही निर्भर करती तो आप और हमारी दरकार किसी को न होती. प्लीज़ इस पर बहस छोडें.

  50. वजूद says:

    >सलीम भाई, गरुदद्वज जी, विवेक जी, निशांत जी,आप सभी की टिप्पणियों को मैंने पढा. सच्चाई यह है कि प्लीज़ इसे धर्म से जोड़कर मनों में खटास ना भरें. हम सभी के पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ भी की हैं और कई अच्चैयाँ भी. चाहे हम मुसलमान हों या हिन्दू या ईसाई. सब कुछ परिस्तिथिवश हुआ. इसलिए अपने महान पूर्वजों पर चीखने के बजाय सौहार्दता से काम लें. मैं ये बता दूं कि हममें से असल कोई नहीं, लेकिन साबित इसलिए नहीं करूंगा कि न तो यह हमारा विषय है, और न ही इसे तवज्जो देना चाहता हूँ. लेकिन अपने ब्लॉग पर एक दिन इसे लिखूंगा ज़रूर. बहरहाल हम सभी का मकसद एक होना चाहिए. मेरा ख़याल है कि सलीम भाई आप भी विवादिद विषयों से बच सकते थे यदि दुबारा इस विषय पर ना लिखते. मैं सिर्फ यह सलाह आप सभी को देना चाहता हूँ कि यदि संभव हो तो हम सभी हर महीने ५०-५० गरीबों को अपने-अपने सामर्थ्य शाकाहार या मांसाहार के अनुसार भोजन ज़रूर कराएँ. कोशिश करें कि अपने घर का बच्चा हुआ भोजन भी किसी भूखे को ही दें, ताकि कोई गरीब भूखा उठ तो जाए, लेकिन सोये नहीं.अब आप इस बात पर सरकार की नीतियों की तरफ ना चले जाएँ. क्योंकि यदि सारी नीतियाँ सरकार पर ही निर्भर करती तो आप और हमारी दरकार किसी को न होती. प्लीज़ इस पर बहस छोडें.

  51. >खुदा का काम अब आदमी करेगा. धन्य हो

  52. >खुदा का काम अब आदमी करेगा. धन्य हो

  53. >यार सलीम रोज तो आपलोग मांस खाते ही हो … खाओ ना , हिन्दुओं ने मना तो नहीं किया है ना ? फिर क्यों हमें सीखा रहे हो की मांस खाना अच्छा है ? एक बात और और सुनो यार , मरने की बाद उसके body को कहाँ दफनाते हो ? कब्रगाह मैं | तो एक मुर्गी के मरे सरीर को पेट मैं दाल कर इसे कब्रगाह ही बनाना छह रहे हो क्या ? देखो भाई मैं ऐसा नहीं बोलता की तुम मांस मत खाओ पर ये मत कहो की अपने जीभ के लिए जानवरों को मार – मार कर खाते जाव | सलीम भाई और एक बात बोलूंगा, आपको इस्लाम अच्छा लगता है अच्छी बात है | हमें भी इससे बैर नहीं पर आप हिन्दू ग्रंथों की बात ना किया करो तो ही अच्छा है | संस्कृत तो आती नहीं … और हिन्दू ग्रंथों को समझने के लिए गुरु की सर्नागति जरुरी है, बिना इसके हिन्दू ग्रन्थ पढने का कोई मतलब नहीं | जैसे की मैं यदि कुरान बिना मुल्ला-मौलवी के पढूं तो उलटा अर्थ निकाल लूंगा | Example : Lo! Those who disbelieve Our revelations, We shall expose them to the Fire. As often as their skins are consumed We shall exchange them for fresh skins that they may taste the torment. Lo! Allah is ever Mighty, Wise. (56) sura – 4 Site to read Kuran: http://quranexplorer.com/ अब आप कहोगे कुरान का मैं गलत अर्थ निकाल रहा हूँ , बिलकुल सही | इसी तरह आप भी तो हिन्दू ग्रंथों का गलत अर्थ ही निकाल रहे हो ना ? ऐसा क्यों करना , क्या इस्लाम ऐसा बोल रहा है की दुसरे के धर्म ग्रंथों को तोड़-मरोड़ कर पेश करो ? ऐशा कर के आप इस्लाम का भला नहीं कर रहे हो | जो भी हिन्दू सब पढ़ रहा है उसके मन मैं इस्लाम के प्रति आदर भाव नहीं आ रहा है , जो भी आदर है वो जा रहा है | आशा है आप मामले की गंभीरता को समझोगे और आगे से हिन्दू ग्रंथों का हवाला नहीं दोगे |

  54. >यार सलीम रोज तो आपलोग मांस खाते ही हो … खाओ ना , हिन्दुओं ने मना तो नहीं किया है ना ? फिर क्यों हमें सीखा रहे हो की मांस खाना अच्छा है ? एक बात और और सुनो यार , मरने की बाद उसके body को कहाँ दफनाते हो ? कब्रगाह मैं | तो एक मुर्गी के मरे सरीर को पेट मैं दाल कर इसे कब्रगाह ही बनाना छह रहे हो क्या ? देखो भाई मैं ऐसा नहीं बोलता की तुम मांस मत खाओ पर ये मत कहो की अपने जीभ के लिए जानवरों को मार – मार कर खाते जाव | सलीम भाई और एक बात बोलूंगा, आपको इस्लाम अच्छा लगता है अच्छी बात है | हमें भी इससे बैर नहीं पर आप हिन्दू ग्रंथों की बात ना किया करो तो ही अच्छा है | संस्कृत तो आती नहीं … और हिन्दू ग्रंथों को समझने के लिए गुरु की सर्नागति जरुरी है, बिना इसके हिन्दू ग्रन्थ पढने का कोई मतलब नहीं | जैसे की मैं यदि कुरान बिना मुल्ला-मौलवी के पढूं तो उलटा अर्थ निकाल लूंगा | Example : Lo! Those who disbelieve Our revelations, We shall expose them to the Fire. As often as their skins are consumed We shall exchange them for fresh skins that they may taste the torment. Lo! Allah is ever Mighty, Wise. (56) sura – 4 Site to read Kuran: http://quranexplorer.com/ अब आप कहोगे कुरान का मैं गलत अर्थ निकाल रहा हूँ , बिलकुल सही | इसी तरह आप भी तो हिन्दू ग्रंथों का गलत अर्थ ही निकाल रहे हो ना ? ऐसा क्यों करना , क्या इस्लाम ऐसा बोल रहा है की दुसरे के धर्म ग्रंथों को तोड़-मरोड़ कर पेश करो ? ऐशा कर के आप इस्लाम का भला नहीं कर रहे हो | जो भी हिन्दू सब पढ़ रहा है उसके मन मैं इस्लाम के प्रति आदर भाव नहीं आ रहा है , जो भी आदर है वो जा रहा है | आशा है आप मामले की गंभीरता को समझोगे और आगे से हिन्दू ग्रंथों का हवाला नहीं दोगे |

  55. >सलीम भाई इतने लोगों ने आपके कुतर्कों की ऐसी तैसी कर दी | आप भी कुछ बोलो |

  56. >सलीम भाई इतने लोगों ने आपके कुतर्कों की ऐसी तैसी कर दी | आप भी कुछ बोलो |

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