स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>अंतिम अवतार के दावेदार (List of antim -awtar)

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आज तक अंतिम या कलियुग का अवतार होने का दावा अनेक व्यक्तियों ने किया है। ऐसे अवतार के दावेदारों में से कुछ का उल्लेख निम्नलिखित है।
1. प्रथम उल्लेख में एक निष्कलंकी दल नाम में एक संस्था है। इसके संस्थापक बालमुकुन्दजी कहे जाते हैं। वह भारत के निवासी हैं, उनके अनुयायी उनके अवतार होने की प्रतिक्षा में हैं।

2. ठाकुर दयानन्द का ‘‘अरूणा चल मिशन’’ यह मिशन आसाम राज्य के सिलचर नामक स्थान में 1909 में स्थापित किया गया था। उन्होंने स्वयं तो अवतार होने का दावा नहीं किया किन्तु अनुयायी गणों ने माना, वह मिशन आज भी चल रहा है।

3. मात आनन्दमयी – इनको हजारों लोग आदि शक्ति जगदम्बा का अवतार मानते हैं।

4. मध्य प्रदेश वर्धा के सत्य समाज के संचालक स्वामी सत्य भक्त जी अवतार बन गये थे।

5. ब्रह्मकुमारियों के दादा गुरू-दादा लेखराज जिनका पूर्व नाम खूब चंद्रकृपलानी था। 1937 में आम मण्डली नाम की संस्था की स्थापना की। उन्होंने स्वयं ही ब्रह्मा विष्णु आदि होने का दावा किय था।

6. कृष्णानन्द जी दादा धुनी वाले ने अपने आपको शंकर जी का अवतार कहा था।

7. स्वामी प्रणवानन्द जी भी अवतार बन बैठे थे।

8. हंसावतार – इनके समन्ध में इनके प्रचारकों का कहना है कि जो त्रोता में राम, द्वापर में कृष्ण, वही भगवान अब हंसावतर है। (कल्कि पुराण भूमिका से)

अन्य और दावा करने वाले



9. आनन्द मार्ग करने वाले



10. अखिल ब्रह्माण्ड पति



11. सत् संघ आश्रम श्री अनुकूल चंद्र ठाकुर
 
थोड़ा आगे देखें तो-



12. सीता राम ओंकार नाथ,



13. श्री राम कृष्ण परमहंस देव ठाकुर।



14. श्री लोक नाथ ब्रह्मचारी।



15. बालक ब्रह्मचारी, आदि को लेकर अवतार मानते थे।
 
16. ऐतिहासिक रूप से समाज में प्रेम-भक्ति का जो विचार लाया था उनका नाम श्री कृष्ण चैतन्य था, आज तक वैष्णव सम्प्रदाय उनके ही कलियुग का अवतार मानता है। इनका पूर्व नाम निमाइमिश्र, पिता जगन्नाथ मिश्र, माता शची देवी, जन्म स्थान बंगाल के नदीया जिले में।
 
वर्तमान समय में नकली अवतारों की संख्या बहुत है।
 
नकली अवतार का दावा करने वाले केवल कलि युग में ही नहीं द्वापर युग में भी अवतार का दावा करनेवाले भी थे(देखें भागवत पु. – 10/66/अ.)
 
अंतिम अवतार का दावा पेश करने में एक व्यक्ति बड़ी जोर शोर के साथ खड़ा हुआ वह मुसलमान घराने में पैदा हुआ उनका परिचय: वह पंजाब के गुरूदास पुर, जिला कादियां का मिर्जा गोलाम अहमद है। आश्चर्य की बात तो यह है कि बहुत से हिन्दू-मुसलमान उसको अवतार मानने लगे हैं।
 
ऊपर कहे गये तमाम दावेदार झूठे अवतार हैं, यह कहने के लिए विचार का प्रयोजन नहीं है।



इसी विषय पर अगला भाग पढ़े- (जिसमे विभिन्न धर्मों के धर्म ग्रन्थों में अंतिम अवतार के के बारे में क्या बताया गया है, का विश्लेषण)

Source: अंतिम अवतार Blog,  अंतिम अवतार परिचय- महाराज विकाशानन्‍द

Filed under: अंतिम अवतार

>मोहल्ला (ब्लॉग) मेरी टी.आर.पी. के टुकड़े खा रहा है: सलीम खान (Mohalla, Avinash ban Saleem since last 3 months for growing TRP)

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जी हाँ, सही सुना आपने! मुद्दे की बात करने से पहले मैं कुछ उसूलों और अधिकारों की बात कहना चाहता हूँ. हम सब भारत देश में रहते हैं और भारत देश का संविधान यह हमें पूरी तरह से आज़ादी देता है कि हम किसी भी धर्म को मान सकते हैं, उसे स्वीकार सकते हैं और उसका प्रचार-प्रसार भी कर सकते हैं. धर्म सम्बंधित आज़ादी हमारे मौलिक अधिकारों में से एक है.
अविनाश बाबू के ब्लॉग यानि मोहल्ला को मैंने इसी वर्ष जून के महीने में ज्वाइन किया था. और केवल मेरी दो ही पोस्ट के बाद ही उस कुंठित व्यक्ति ने मुझे बैन कर दिया. जानना चाहेंगे मेरी उन दो पोस्टों में ऐया कुछ भी नहीं था जो किसी समाज या धर्म के खिलाफ हो, बल्कि एक सुधारात्मक लेख लिखा था मैंने.
अब देखिये मोहल्ला के फ्रंट पृष्ठ पर किस तरह का नोटिस बोर्ड लगा रहा है इस अल्लाह के बन्दे ने.

यह नोटिस नया नहीं है, यह पिछले तीन महीने से यहीं पर लगा है. अब देखिये पिछले तीन महीने यानि जून, जुलाई और अगस्त में इसके ब्लॉग की पोस्टों (लेखों) में हुआ इज़ाफा. (May-11, June-95, July-132, Aug-118 )
तो इससे ये साबित हुआ कि जैसे ही इसने यानि अविनाश ने मुझे यानि सलीम खान को मोहल्ला से बाहर किया, इसका सीधा फ़ायेदा इसको मिल गया. वैसे ये फंडा कोई नया नहीं है, पूरी मीडिया ही मुसलामानों और इस्लाम को लगातार इसी तरह बदनाम कर रही है. आपने मेरे वो दो पोस्ट ज़रूर देख लिए होंगे और अब स्वयं विश्लेषित कीजिये कि आखिर उन पोस्ट में ऐसा कुछ था जो अविनाश की नफ़रत इस क़दर भड़की कि आज तीन महीने हो गए शांत नहीं हो पाई.

 
हालाँकि मोहल्ला अगर कम्युनल या धार्मिक या सांप्रदायिक लेखों के खिलाफ़ वाकए है तो यह बात भी सर्वथा झूठ ही है क्यूंकि अगर आप मोहल्ला के लेखों का गहन अध्ययन करेंगे तो कई ऐसी पोस्ट आपको मिल जायेंगी जो सांप्रदायिक ही हैं और भड़काऊ भी (जबकि मेरे लेख सुधारात्मक ही होते हैं).

नीचे चटका लगा कर आप मोहल्ला के चंद साम्प्रदायिक लेखों का अध्ययन ही कर लें.(Please see the communal post of mohalla)

अविनाश के मुखौटे को उतारने के लिए यह एक ही सवाल काफ़ी है कि आपने अपने ब्लॉग का नाम रखा है मोहल्ला और ऊपर से स्वतंत्र आमंत्रण का लिंक भी दे रखा है, और अगर कोई धार्मिक या सुधारात्मक लेख लिखता है तो उस पर आप उसे बैन कर रहे हो. यानि दोगलेपन की हद !

हाँ! ये हो सकता है कि आप मेरे लेख पर स्वस्थ बहस कर लो, मगर इतना तो बूता है नहीं और न ही इतना उसके पास वक़्त है क्यूंकि वह तो व्यस्त है मोहल्ला LIVE में, मोहल्ला लाइव में व्यस्तता के कारण मोहल्ला को प्रापर वक़्त ना सकने की वजह से उसने ये शिगूफा छोडा और चैन से अपना काम करता रहा.

हालाँकि मैंने उस …ने से यह रेकुएस्ट भी करी कि भई, मेरी आई डी बहाल कर दे, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्यूँ करता उसे जो मेरे टुकड़े खाने थे; टी आर पी के…

एक जनाब ‘फसादी‘ ने तो मोहल्ला के मुखिया के इस क़दम के खिलाफ़ अपील भी कि (यहाँ चटका लगा कर देख लें) लेकिन उस ज़ालिम ने तब पर भी कोई क़दम नहीं उठाया. अगर आप गूगल पर सर्च करेंगे (सलीम मोहल्ला) तो आपको पहले पहल ही यह पोस्ट मिल जायेगी कि बन्दा कितना कुंठित है.

अगर आप गूगल में यह (क्या सलीम खान को मोहल्ले से) सर्च करेंगे तो पाएंगे कि फसादी ने क्या अपील की थी.

अगर आप गूगल में (मेरी आई डी) या (मेरी आई डी बहाल की जाये) टाईप करके सर्च करेंगे तो आपको सच्चाई का पता लग जायेगा.,…..



मैं आपको गूगल की सेवा लेने के लिए इस इस लिए कह रहा हूँ क्यूंकि उसने मेरी तमाम पोस्ट डिलीट कर रखी हैं. गूगल पे तो आपको केवल अवशेष ही मिलंगे; सुबूत बतौर.

धर्म मोहब्बत सिखाता है, नफ़रत नहीं. लेकिन अविनाश जैसे मरदूद को यह समझ नहीं आएगा.

लेख ख़त्म करने से पहले मैं अविनाश बाबू को चेतावनी देता हूँ कि उस गलीज़ ब्लॉग से वह नोटिस हटा लें और भविष्य में ऐसी नीच हरक़त बंद कर दें.

Filed under: मोहल्ला

>क्या वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराए जाने वाला जिहाद सही था!!!??? Types of Jihad

>मैं पीस टीवी देख रहा था. प्रोग्राम था… इज़हारे हक और इज़हारे हक की इस नशिस्त (एपिसोड) में जो शीर्षक था…वह था… “जिहाद और दहशतगर्दी – इस्लाम के पसमंज़र में“, जिसे लखनऊ में ही आयोजित किया गया था. उस प्रोग्राम में जब सवालात और जवाबात का सेशन शुरू हुआ तो औरतों में से एक मुसलमान ख्वातीन ने डॉ जाकिर साहब से पूछा:

डॉ साहब, मुझे ये बताईये कि ग्यारह सितम्बर दो हज़ार एक (9/11) को जो ट्विन टावर गिराया गया वो जिहाद था या नहीं और अगर था तो क्या यह सही जिहाद था? क्यूंकि मेरा बेटा भी एक आईआईटीएन है और वह वहां मौजूद था और जब हमने यह सुना तो मेरी तो रूह ही काँप गयी थी. मुझे यह बताईये डॉ साहब कि जिन्होंने ने यह सब किया सही किया या नहीं?

मैंने टीवी पर नज़रें गड़ा दीं क्यूंकि यह एक अहम् सवाल था और मेरे लिए इस सवाल का जवाब जानना बहुत ज़रूरी था. उस ख्वातीन की तरह मुझे भी यह जानना ज़रूरी था क्यूंकि मुझसे भी कई लोगों ने इसी तरह का सवाल किया था यहाँ तक कि कई ब्लॉगरों ने मेरी पोस्ट पर यह सवाल दागे या इससे मिलते जुलते. मैं डॉ जाकिर नाइक साहब ने जो जवाब दिया और विश्लेषण इस पोस्ट के ज़रिये आप तक पहुंचाना चाहता हूँ.

इस सवाल के जवाब से पहले हमें यह जानना बहुत ज़रूरी है कि जिहाद कहते किसे हैं और जिहाद किस-किस क़िस्म का होता है? हालाँकि मैंने जिहाद का शाब्दिक अर्थ और परिभाषा अपने पिछले पोस्ट में व्यक्त कर दी थी. मैं उसे यहाँ पर दोहराना चाहूँगा कि जिहाद क्या है?

जिहाद शब्द का इस्तेमाल वर्तमान काल में जिस अर्थ में लिया जा रहा है, आजकल इस्लाम के बारे में फैली गलत-फहमियों में से एक है. बल्कि यों कहें कि जिहाद के बारे में गलत-फहमी केवल नॉन-मुस्लिम में ही नहीं है बल्कि मुस्लिम में भी है. जिहाद को नॉन-मुस्लिम और मुस्लिम दोनों ही यह समझते हैं कि किसी मुसलमान के द्वारा लड़ी गयी लडाई, वह चाहे किसी मक़सद के लिए हो, वह गलत मक़सद हो या सही, जिहाद कहलाता है.
जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है जो ‘जहादा’ ‘jahada’ शब्द से बना है जिसका मायने होता है ‘मेहनत करना’ ‘जद्दोजहद करना’ ‘संघर्ष करना’ अंग्रेजी में इस कहेंगे to strive or to struggle. मिसाल के तौर पर ‘अगर एक छात्र उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करता है, तो वह जिहाद कर रहा है.’ अरबी भाषा के शब्द जिहाद का एक अर्थ ‘अपनी नफ़्स से संघर्ष करना’ भी है. अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करने को भी जिहाद कहते हैं और यह अपने अंतर एक अर्थ और समेटे है जिसका अर्थ होता है कि ‘आत्म रक्षा के लिए संघर्ष’ या चढाई हो जाने या अत्याचार होने पर रण-भूमि में चढाई करने वाले या अत्याचार के विरुद्ध लड़ना.
जिहाद धर्म-युद्ध नहीं
लेकिन जिहाद को ‘पवित्र युद्ध’ holy war नाम पश्चिम जगत और इस्लाम विरोधी मिडिया ने दिया जो कि बिलकुल ही गलत परिभाषा है। जैसा कि हम देख चुके है कि जिहाद एक अरबी शब्द है उसके मायने क्या है.

इस्लामिक नज़रिए में जब हम कुर’आन और हदीस का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि ‘जिहाद’ मुख्यतया दो प्रकार का हो सकता है;
एक “फ़ी-सबिलिल्लाह” अर्थात अल्लाह की राह में (अच्छाई की राह में) और दूसरा “फ़ी-सबीशैतान” अर्थात शैतान की राह में (बुराई की राह में).

अगर हम देखते हैं कि जो ट्विन टावर गिराया गया वह कौन सा जिहाद था तो साफ़ पता चलता है कि यह फ़ी-सबीशैतान था.

जिहाद का अर्थ जद्दो जहद होता है तो वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर गिराना भी ऐसा नहीं है कि हंसी खेल था यह तो बहुत ही जद्दो-जहद का काम रहा होगा यानि यह बहुत बड़े जिहाद का काम था लेकिन “फ़ी-सबिशैतान” बुराई की राह में था.

पश्चिमी मीडिया कहती है कि प्रमुख संदिग्ध ओसामा बिन लादेन है. वही पश्चिम के लोग जो शहीदे-आज़म भगत सिंह को भी आतंकवादी कहते थे. ओसामा बिन लादेन ने अगर ऐसा किया है तो यह ग़लत है, लेकिन आज तक यह सिद्ध नहीं हो पाया केवल प्राइम सस्पेक्ट ओसामा बिन लादेन, प्राइम सस्पेक्ट ओसामा बिन लादेन…

मान लें, बहस के तौर पर कि ओसामा बिन लादेन ने ऐसा किया भी है… तो एक इंसान की करी गयी ग़लती की वजह से बुश की अमेरिकी सेना ने लाखों लोगों को मौत की नींद सुला दिया. अफगानिस्तान जैसे गरीब देश पर उसने लाखों बेगुनाहों पर बम गिराए. इस तरह से तो बुश तो दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी है.

हमें मालूम है कि सद्दाम हुसैन एक मुसलमान था, मुसलमान होने के बावजूद उसने कुछ लोगों को ग़लत तरीक़े से मार डाला था. लेकिन उस पर तरह तरह के इल्जाम लगा कर कि उसके पास जैविक हथियार हैं; ये है; वो है. और इराक़ पर बुश ने बम बरसाए.

खुद बुश ने सी एन एन पर कहा था कि “मैंने वहां सेना भेजी”. आप खुद सोचिये जिस कृत्य को यूएन ने इजाज़त नहीं दी, उसके खिलाफ़ जाकर बुश और अमेरिकी सेना ने क्या सही किया? अगर आतंक का यही नजरिया है तो मेरे हिसाब से बुश दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी है.

यही नहीं अमेरिका की तीन बड़ी मैगजीनों ने यह साबित किया था कि ट्विन टावर पर जो हमला किया गया वह बाहरी हमला नहीं बल्कि अमेरिका का अपना इनसाइड जॉब था.

Filed under: जिहाद, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर

>गोधरा की सच्ची कहानी, एक पत्रकार की ज़ुबानी (Truth about the Godhra Train Incident)

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पाठकों और ब्लोगर बन्धुवों ! मैं आज एक ऐसे पत्र को आप तक पहुँचाने जा रहा हूँ जो कि एक पत्रकार ने लिखा था. उसने अपने पत्र में गोधरा में हुए काण्ड का सच बयान किया है. मैं उस पत्र में लिखित अंश और विश्लेषण को आप तक पहुँचाना चाहता हूँ.

साबरमती एक्सप्रेस में जो दु:खदायक काण्ड हुआ वह क्या था? और उस दिन क्या क्या घटित हुआ? कितनी सच्चाई हमारी मिडिया ने दिखाई, कितना सच छान कर झूठ का लबेदा ओढे हम तक पहुंचा? आईये एक पत्रकार की ज़ुबानी सुनते हैं….. (Mr. Anil Soni and Neelam Soni (reporter of Gujarat Samachar) Soni’s mobile number: 0-9825038152.Resident number 02672 (code) 43153)

साबरमती एक्सप्रेस का दुखदाई कांड सुबह ७:३० पर गोधरा स्टेशन के एक किलोमीटर दूर हुआ, की सच्चाई मैं आप तक पहुँचाना चाहता हूँ. साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर S-6 और दो दूसरी बोगियों में विश्व हिन्दू परिषद् (VHP) के कार-सेवक यात्रा कर रहे थे. दुखदाई कांड की असल वजह ये कार-सेवक ही थे, जो उन बोगियों में सफ़र कर रहे थे. जो कहानी आप तक पहुंचाई गयी है वह सच्चाई से कोसों दूर हैं, असल कहानी जो कि सच है वह अलग ही है.

यह वास्तविकता शुरू होती है गोधरा से ७०-७५ किलोमीटर दूर दाहोद नामक स्टेशन से. समय था ५:३०-६:०० ऍएम्, ट्रेन दाहोद स्टेशन पहुंचती है. ये कार-सेवक उस स्टेशन पर चाय-नाश्ता करने के उद्देश्य से टी-स्टाल पर जाते हैं. किसी बात पर कार-सेवकों और टी-स्टाल के बीच विवाद हो गया और उन कार-सेवकों ने दूकान में तोड़-फोड़ कर दी. फिर वे अपने बोगी में वापस चले गए… इस वाकिये की एक एन-सी.आर. दूकान मालिक ने स्थानीय पुलिस में भी की थी.

अब ट्रेन गोधरा स्टेशन पर पहुंचती है और समय हो रहा होता है ७:००-७:१५ AM. वहां सभी के सभी कार-सेवक ट्रेन से उतर कर स्टेशन पर एक छोटे से चाय की स्टाल पर जा कर स्नैक्स आदि लेते हैं; उस स्टाल को एक बुढा मुसलमान व्यक्ति चला रहा होता है. उस दूकान में एक छोटा लड़का भी हेल्पर बतौर काम कर रहा था. कार-सेवकों ने जानबूझ कर मुसलमान दूकानदार से बहसबाजी शुरू कर दी और बहस करते करते ही उसे पीट डाला. उन कार-सेवकों ने उस बूढे मुसलमान की दाढ़ी भी पकड़ कर खींची और उसे मारा. वे कार-सेवक जोर जोर से एक नारा भी दे रहे थे

मंदिर का निर्माण करो, बाबर की औलाद को बाहर करो
बाबर की औलाद से उनका मुराद मुसलमान ही थे.

शोर-शराबा सुन कर उस बूढे की सोलह साल की एक लड़की वहां पर आ गयी और अपने बाप को बचाने की नाकाम कोशिश करने लगी. वह उन ज़ालिम कार-सेवकों से दया की भीख मांग रही थी और कह रही थी कि उसके बाप को छोड़ दीजिये, जिसको वे कार-सेवक अभी भी मार रहे.

उन ज़ालिमों ने उस बूढे को तो छोड़ दिया लेकिन उस लड़की को पकड़ लिया और अपने बोगी (S-6) में ले गए और अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया. उस लड़की को अपने साथ ज़बरदस्ती क्यूँ ले गए थे; यह बताने की आवश्यकता नहीं है.

उधर बुढा उनसे अपनी बेटी को छोड़ देने की गुहार लगा रहा था. लेकिन उसकी एक न चली. अब ट्रेन धीमे धीमे आगे बढ़ना शुरू हो गयी लेकिन ट्रेन के रफ़्तार पकड़ने से पहले ही वह बुढा मुसलमान दूकानदार ट्रेन की आखिरी बोगी (गार्ड के पहले वाली) में चढ़ जाता है और ट्रेन की चेन को पुल कर देता है. अब ट्रेन पूरी तरह से रुक जाती है और यह सब करते करते गोधरा स्टेशन लगभग एक १ किलोमीटर पीछे हो चुका होता है.

तभी २ नव-युवक वहां आ जाते हैं माज़रा समझ कर खिड़की के बाहर से उन कार-सेवकों से उस लड़की को छोड़ देने के लिए कहते हैं. शोर-शराबा काफी बढ़ चुका होता है बोगी के आस-पास लोग इक्कट्ठे हो जाते हैं; उस भीड़ में कुछ लड़के और औरतें भी होती हैं जो बाहर से ही उन कार-सेवकों से उस लड़की को छोड़ने का दबाव बनाने लगते हैं. भीड़ काफी गुस्से में होती जा रही थी और लड़की को वापस कर देने की मांग अब गुस्से में तब्दील होती जा रही थी.

लेकिन बजाये लड़की को वापस देने के, वे ज़ालिम (VHP) के कार-सेवक लोगों ने बोगी की खिड़कियाँ ही बंद कर दीं. यह क्रिया भीड़ के गुस्से में आग में घी का सा काम किया और उस भीड में से कुछ लोगों ने बोगी पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया.

बोगी संख्या एस छह (S-6) के दोनों तरफ की बोगियों में भी कार सेवक थे. उन कार-सेवकों के पास भी बैनर थे जिसमें लम्बे लम्बे डंडे लगे थे. वे कार-सेवक अपने बैनर्स और डंडों के साथ लड़की को बचाने आई भीड़ पर ही पिल पड़े और बैनर के डंडों से भीड़ पर हमला बोल दिया. अब भीड़ का गुस्सा पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुका था. भीड़ में से ही कुछ लोगों ने पास के ही एक गैराज से (garages Signal Fadia) से डीज़ल और पेट्रोल आदि ले आये और बोगी को जलाने लगे.

जैसा कि कथित रिपोर्ट में यह कहा गया कि पेट्रोल आदि को प्री-प्लांड पेट्रोल पम्प से लाया गया; बिलकुल ही बे-बुनियाद है. यह प्रतिक्रिया अचानक भीड़ ने की न कि पहले से प्लान करके. भीड़ लड़की को छुडाने की कोशिश कर रही थी लेकिन कार-सेवक उग्र से उग्रतर होते जा रहे थे. वे (स्वभावत: वैसा ही करने लगे जैसा कि वे अयोध्या में कर चुके थे) जानते थे कि यह हिन्दुस्तान है यहाँ केवल जय श्री राम कह कर जो आतंक फैलाया जा सकता है वह गोली बंदूक से भी ज़्यादा भयानक
होता है.

यह घटना सुनकर वहां के स्थानीय वीएचपी (VHP) कार्यकर्ताओं ने उस गैराज में (Signal Fadia) में आग लगा दी और पास के ही एक इलाके ‘शेहरा भगाड़’ (गोधरा का ही एक स्थान) में स्थित एक मस्जिद को भी जला डाला.

देर से पहुंची पुलिस को सच कहानी का पता तो नहीं चल सका लेकिन भीड़ द्वारा जलाई गयी सरकारी बोगी को साक्षात् देख पुलिस का गुस्सा स्थानीय लोगों पर उतारा और पुलिस ने स्थानीय लोगों को गिरफ़्तार कर लिया.
पुलिस अपना पल्ला झाड़ने के तहत गोधरा के मेयर श्री अहमद हुसैन कलोता को इस घटना का ज़िम्मेदार ठहरा दिया. श्री अहमद हुसैन भारतीय कांग्रेस के मेंबर भी है उर एक वकील भी.

यह पूरी जानकारी वहीँ के स्थानीय लोगों और विश्वसनीय लोगों से बातचीत पर आधारित भी है. मैं इस स्रोत के मुख्य पात्र श्री अनिल सोनी जी (मोब. 0-9825038152. घर का नंबर 02672 ‘कोड’ 43153, ऑफिस नंबर : 43152,) का शुक्गुज़ार हूँ जिन्होंने इस पूरी घटना का सच्चा वृतांत
पहुँचाया.

(वी एच पी (विश्व हिन्दू परिषद्) ने फिर ऐसा चक्र रचा कि देश को १०० साल से भी ज़्यादा पीछे धकेल दिया. मैं यह कहने से कोई गुरेज़ नहीं करता हूँ कि भारत में वी एच पी (विश्व हिन्दू परिषद्) या संघ या बजरंज दल या भाजपा आदि धुर-कट्टरपंथी ताक़तों ने एक बार नहीं कई बार देश को साम्प्रदायिकता की आग में धकेला है और उसकी रोटी सेंकी है. ऐस नहीं है कि जिसकी रोटी इन्होने सेंकी उन्हें कोई फायेदा पहुंचा हो, वे केवल देश की उन भोली भाली जनता का ब्रेन वश कर देते हैं जो अंध-विश्वास और आस्था के लिए कुछ भी कर देती है. क्या इन शैतानों के इस कृत्य को कोई रोक सकता है और इनके इस कृत्य की सज़ा तो केवल उन मासूम लोगों को ही भुगतनी पड़ती है जिनका
उससे कोई लेना देना भी नहीं है.)

क्या ऐसा ही होता रहेगा कभी अयोध्या, कभी गोधरा कभी गुजरात……..आखिर कब तक !!!??

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>मुझे मेरी बीवी से बचाओ! (Fight Against misuse of Dowry Law- IPC-498a)

>धारा 498a और घरेलू हिंसा और उत्पीडन के दुरुपयोग के खिलाफ़ स्वच्छ सन्देश का एक प्रयास


आपकी पत्नी द्वारा पास के पुलिस स्टेशन पर 498a दहेज़ एक्ट या घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत एक लिखित झूठी शिकायत करती है तो आप, आपके बुढे माँ- बाप और रिश्तेदार फ़ौरन ही बिना किसी विवेचना के गिरफ्तार कर लिए जायेंगे और गैर-जमानती टर्म्स में जेल में डाल दिए जायेंगे भले चाहे की गई शिकायत फर्जी और झूठी ही क्यूँ न हो! आप शायेद उस गलती की सज़ा पा जायेंगे जो आपने की ही नही और आप अपने आपको निर्दोष भी साबित नही कर पाएँगे और अगर आपने अपने आपको निर्दोष साबित कर भी लिया तब तक शायेद आप आप न रह सके बल्कि समाज में एक जेल याफ्ता मुजरिम कहलायेंगे और आप का परिवार समाज की नज़र में क्या होगा इसका अंदाजा आप लगा सकते है.

498a दहेज़ एक्ट या घरेलू हिंसा अधिनियम को केवल आपकी पत्नी या उसके सम्बन्धियों के द्वारा ही निष्प्रभावी किया जा सकता है आपकी पत्नी की शिकायत पर आपका पुरा परिवार जेल जा सकता है चाहे वो आपके बुढे माँ- बाप हों, अविवाहित बहन, भाभी (गर्भवती क्यूँ न हों) या 3 साल का छोटा बच्चा शिकायत को वापस नही लिया जा सकता और शिकायत दर्ज होने के बाद आपका जेल जाना तय है ज्यादातर केसेज़ में यह कम्पलेंट झूठी ही साबित होती है और इस को निष्प्रभावी करने के लिए स्वयं आपकी पत्नी ही आपने पूर्व बयान से मुकर कर आपको जेल से मुक्त कराती है आपका परिवार एक अनदेखे तूफ़ान से घिर जाएगा साथ ही साथ आप भारत के इस सड़े हुए भ्रष्ट तंत्र के दलदल में इस कदर फसेंगे की हो सकता आपका या आपके परिवार के किसी फ़र्द का मानसिक संतुलन ही न बिगड़ जाए यह कानून आपकी पत्नी द्वारा आपको ब्लेकमेल करने का सबसे खतरनाक हथियार है इसलिए आपको शादी करने से पूर्व और शादी के बाद ऐसी भयानक परिस्थिति का सामना न करना पड़े इसके लिए कुछ एहतियात की ज़रूरत होगी जो कि इस वेबसाइट पर मौजूद है आप उसे पढ़े और सतर्क रहे.

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>स्वाइन-फ्लू: Its an American mistake which the world is now facing…

>मुझे कुछ दिन पहले एक ईमेल प्राप्त हुआ जिसे मेरे मित्र खुर्शीद ने भेजा था और जिसे उनको उनके मित्र जनाब फैसल मालिक (Mobile:-+91-9873937056) जो कि पेशे से इंजिनियर हैं, ने भेजा था. मैंने सोचा क्यूँ न देश-हित में इसे एक सन्देश बना दिया जाये. मैं खुर्शीद जी और फैसल जी का शुक्र गुजार हूँ…

देखिये, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सुवर दुनिया का सबसे गन्दा, घिनौना, और बेशर्म जानवर है. इसे ईश्वर ने केवल गन्दगी साफ़ करने के लिए ही बनाया ही और उसका स्थान जो होना चाहिए वही रहता तो शायेद आज दुनिया भर में स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी न फ़ैल पति और सैकडों लोगों की जाने बच सकती थी.

ख़ैर , आप स्वयं देखिये और विश्लेषित कीजिये…..
















Filed under: सुअर, सुवर

>हिन्दू धर्म में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत (Concept of God in Hinduism)

>इस कड़ी के दो भाग हैं; एक हिन्दू धर्म में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत, दूसरा; मजहबे-इस्लाम में ईश्वर की परिकल्पना और स्रोत.


हिन्दू धर्म में ईश्वर की सामान्य परिकल्पना (COMMON CONCEPT OF GOD IN HINDUISM)

अगर किसी सामान्य हिन्दू जन से यह पूछेंगे कि वो कितने भगवान् में विश्वाश रखता है तो कुछ कहेंगे तीन, कुछ कहेंगे हज़ारों और कुछ कहेंगे तैतीस करोड़ (330 million). लेकिन वहीँ अगर यही सवाल किसी पढ़े-लिखे (हिन्दू धर्म के ज्ञाता, धार्मिक रूप से) हिन्दू जन से पूछेंगे तो उसका जवाब होगा; ईश्वर केवल एक ही है, और वह एक ईश्वर में ही विश्वास रखता है.

आईये जाने कि हिन्दू धर्म की प्रमुख धार्मिक पुस्तकें कौन कौन सी हैं और उनमें ईश्वर की परिकल्पना किस प्रकार से करी गयी है. हिन्दू धर्म की वह प्रमुख धार्मिक पुस्तकें हैं जिनमें ईश्वर की परिकल्पना ओ जाना जा सकता है; वेद, उपनिषद, पुराण, भगवद गीता हैं.

उपनिषद (UPANISHAD)

छन्दोग्य-उपनिषद्, अध्याय 6, भाग 2, श्लोक 1:

एकम् एवाद्वितियम” अर्थात ‘वह केवल एक ही है

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 9:

नाकस्या कस्किज जनिता न काधिपः” अर्थात “उसका न कोई माँ-बाप है न ही खुदा“.

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 19:

न तस्य प्रतिमा अस्ति” अर्थात “उसकी कोई छवि (कोई पिक्चर,कोई फोटो, कोई मूर्ति) नहीं हो सकती“.

श्वेताश्वतारा उपनिषद्, अध्याय 4, श्लोक 20:

न सम्द्रसे तिस्थति रूपम् अस्य, न कक्सुसा पश्यति कस कनैनम” अर्थात “उसे कोई देख नहीं सकता, उसको किसी की भी आँखों से देखा नहीं जा सकता“.

भगवद गीता (BHAGWAD GEETA)

भगवद गीता हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा पवित्र और मान्य धार्मिक ग्रन्थ है.

“….जो सांसारिक इच्छाओं के गुलाम हैं उन्होंने अपने लिए ईश्वर के अतिरिक्त झूठे उपास्य बना लिए है…” (भगवद गीता 7:20)

वो जो मुझे जानते हैं कि मैं ही हूँ, जो अजन्मा हूँ, मैं ही हूँ जिसकी कोई शुरुआत नहीं, और सारे जहाँ का मालिक हूँ.” (भगवद गीता 10:3)

यजुर्वेद (YAJURVEDA)

वेद हिन्दू धर्म की सबसे प्राचीन किताबें हैं. ये मुख्यतया चार हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद.

यजुर्वेद, अध्याय 32, श्लोक 3:

न तस्य प्रतिमा अस्ति” अर्थात “उसकी कोई छवि (कोई पिक्चर,कोई फोटो, कोई मूर्ति) नहीं हो सकती.”

इसी श्लोक में आगे लिखा है; वही है जिसे किसी ने पैदा नहीं किया, और वही पूजा के लायक़ है.

यजुर्वेद, अध्याय 40, श्लोक 8:

“वह शरीर-विहीन है और शुद्ध है”

यजुर्वेद, अध्याय 40, श्लोक 9:

अन्धात्मा प्रविशन्ति ये अस्संभुती मुपस्ते” अर्थात “वे अन्धकार में हैं और गुनाहगार हैं, जो प्राकृतिक वस्तुओं को पूजते हैं

*प्राकृतिक वस्तुएं-सूरज, चाँद, ज़मीन, पेड़, जानवर आदि.

आगे लिखा है;

वे और भी ज्यादा गुनाहगार हैं और अन्धकार में हैं जिन्होंने सांसारिक वस्तुओं को पूजा

*सांसारिक वस्तुएं- जिन्हें मनुष्य खुद बनता हैं. जैसे टेबल, मेज़, तराशा हुआ पत्थर आदि.

अथर्ववेद, किताब २०, अध्याय 58 श्लोक 3:

देव महा ओसी” अर्थात “ईश्वर सबसे बड़ा, महान है

ऋग्वेद (यह सबसे पुराना वेद है) RIGVEDA

ऋग्वेद किताब 1, अध्याय 164 श्लोक 46:

एकम् सत् विप्र बहुधा वदन्ति” अर्थात विप्र लोग (Sages, learned Priests) मुझे कई नाम से बुलाते हैं.”

ऋग्वेद किताब 8 अध्याय 1 श्लोक 1:

मा चिदंयाद्वी शंसता” अर्थात “किसी की भी पूजा मत करो सिवाह उसके, वही सत्य है और उसकी पूजा एकांत में करो.

ऋग्वेद, किताब 5 अध्याय 81 श्लोक 1:

वही महान है जिसे सृष्टिकर्ता का गौरव प्राप्त है.”

ऋग्वेद, किताब VI, अध्याय 45, श्लोक 16:

“या एका इत्तामुश्तुही” अर्थात “उसी की पूजा करो, क्यूंकि उस जैसा कोई नहीं और वह अकेला है.”

वेदान्त का ब्रह्म सूत्र भी पढ़ लीजिये:

एकम् ब्रह्म, द्वितीय नास्ते, नेह-नये नास्ते, नास्ते किंचन

भगवान एक ही है, दूसरा नहीं हैं. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है.

“There is only one God, not the second, not at all, not at all, not in the least bit”

इस तरह से हम देखते हैं कि उपरलिखित श्लोक आदि ईश्वर के एक होने के बारे में कह रहें हैं.मैं सैकडों और श्लोक यहाँ लिख सकता हूँ जिसमें ईश्वर के एक होने की बात कहीं गयी हैं….

इस तरह से जब हम हिन्दू धर्म की किताबों का गहन अध्ययन करते हैं तो पातें हैं कि सभी किताबोब में ईश्वर एक एक होने की पुष्टि होती है.”

प्रस्तुति: सलीम खान

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>जिहाद का आदेश भगवत गीता में भी ! Jihad in Bhagwat Geeta !!

>

यह लेख मजहबे-इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच यकसानियत (समानताओं) पर ही आधारित किया है.

जिहाद का आदेश भगवत गीता में है या नहीं इस विषय पर जाने से पहले हमें यह समझना होगा कि जिहाद का अर्थ क्या होता है?

जिहाद शब्द का इस्तेमाल वर्तमान काल में जिस अर्थ में लिया जा रहा है, आजकल इस्लाम के बारे में फैली गलत-फहमियों में से एक है. बल्कि यों कहें कि जिहाद के बारे में गलत-फहमी केवल नॉन-मुस्लिम में ही नहीं है बल्कि मुस्लिम में भी है. जिहाद को नॉन-मुस्लिम और मुस्लिम दोनों ही यह समझते हैं कि किसी मुसलमान के द्वारा लड़ी गयी लडाई, वह चाहे किसी मक़सद के लिए हो, वह गलत मक़सद हो या सही, जिहाद कहलाता है.

जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है जो ‘जहादा’ ‘jahada’ शब्द से बना है जिसका मायने होता है ‘मेहनत करना’ ‘जद्दोजहद करना’ ‘संघर्ष करना’ अंग्रेजी में इस कहेंगे to strive or to struggle. मिसाल के तौर पर ‘अगर एक छात्र उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करता है, तो वह जिहाद कर रहा है.’ अरबी भाषा के शब्द जिहाद का एक अर्थ ‘अपनी नफ़्स से संघर्ष करना’ भी है. अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करने को भी जिहाद कहते हैं और यह अपने अंतर एक अर्थ और समेटे है जिसका अर्थ होता है कि ‘आत्म रक्षा के लिए संघर्ष’ या चढाई हो जाने या अत्याचार होने पर रण-भूमि में चढाई करने वाले या अत्याचार के विरुद्ध लड़ना.

जिहाद धर्म-युद्ध नहीं
लेकिन जिहाद को ‘पवित्र युद्ध’ holy war नाम पश्चिम जगत और इस्लाम विरोधी मिडिया ने दिया जो कि बिलकुल ही गलत परिभाषा है। जैसा कि हम देख चुके है कि जिहाद एक अरबी शब्द है उसके मायने क्या है.

इस्लाम के क्रिटिक्स खास कर अरुण शौरी जैसे लोग यह कहते है कि कुर’आन में कई श्लोक (आयत) ऐसी है जो मार-काट, लडाई-झगडे के लिए कहती है. वे कहते है कि कुर’आन में लिखा है कि ““… Fight and slay the Mushrik/Kafir wherever you find them …” (Al Qur’an 9:5)”

सुरह-तौबा की आयत संख्या पांच (5) से पहले की कुछ आयतों में शांति और समाधान की चर्चा है और शांति संधि का पालन न करने पर अल्लाह ने बहुदेववादियों को चार महीने की चेतावनी देता है और फिर उसके बाद का यह आदेश उस युद्धरत सेना के लिए है कि उन्हें अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर’आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे और यह स्वाभाविक ही है कि कोई भी आर्मी जनरल अपनी सेना का हौसला बढ़ाता है और कहता है कि “डरना नहीं, बिलकुल भी, और अपने दुश्मन के छक्के छुड़ा दो. उन्हें युद्ध में जहाँ पाओ मरो और उसका वध कर दो.

अरुण शौरी अपनी किताब “The World of Fatwas” में जब कुर’आन की सुरह तौबा के पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का ज़िक्र करता है तो वह तुंरत ही पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) से सातवीं आयत (श्लोक संख्या 7) में कूद कर जाता है. कोई भी तार्किक व्यक्ति जब कुर’आन को पढेगा तो उसे पता चल जायेगा कि पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का जवाब छठी आयत (श्लोक संख्या 6) में है.

अगर आप कुर’आन में पढेंगे तो आपको यह श्लोक मिलेगा मगर वे लोग (अरुण शौरी जैसे लोग) श्लोक को ‘आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट’ करके व्याख्यांवित करते हैं मगर आप फ़ौरन ही इस आयत के बाद पढेंगे तो मिलेगा कि “If any amongst the Mushriks (i.e. the enemies)ask thee for asylum, grant it to him so that he may hear the word of Allah and then escort him to where he can be secure”. (Al Qur’an 9:6) (कृपया चित्र में भी पढ़ लें)

अर्थात “और यदि मुश्रीकों में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक कि वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो क्यूंकि वे ऐसे लोग लोग है जिन्हें ज्ञान नहीं.”

आज दुनियाँ का कौन सा आर्मी जनरल होगा जो अपने सैनिकों से कहेगा कि अपने दुश्मन को जाने दो. लेकिन अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी किताब अल-कुर’आन में फरमाता है कि अगर तुम्हारा दुश्मन शान्ति चाहता है तो न सिर्फ शान्ति करो बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो. आज और इतहास का कौन सा ऐसा आर्मी जनरल होगा जिसने इस तरह का दयालुता से परिपूर्ण आदेश दिया होगा. अब अरुण शौरी से कोई ये पूछेगा कि उन्होंने अपनी किताब में जानबूझ कर आयत संख्या 6 का ज़िक्र क्यूँ नहीं किया?

जिहाद (अर्थात संघर्ष) का ज़िक्र भगवत गीता में
सभी मुख्य धर्म ने अपने यह आदेश दिया है कि अच्छे कार्य के लिए संघर्ष करो. यह भगवत गीता में भी लिखा है. “Therefore strive for Yoga, O Arjuna, which is the art of all work.” (Bhagavad Gita 2:50) लड़ाई-मारपीट (युद्ध) का ज़िक्र भगवत गीता में भी लिखा है:

महाभारत एक महाकाव्य है और हिन्दू धर्म में सबसे ज़्यादा पवित्र और मान्य है, जिसमें वर्णन है मुख्यतः दो रिश्तेदारों (cousins) के आपस में हुई लड़ाई का, वे रिश्तेदार थे कौरव और पांडव. भगवत गीता, महाभारत के अध्याय 25 से अध्याय 42 तक के 18 अध्याय को ही कहते हैं. इसमें 700 श्लोक हैं. जब अर्जुन युद्ध के मैदान में लड़ने से मना करते हैं और अपने ही रिश्तेदारों को युद्घ क्षेत्र में देखते है तो उनकी अंतरात्मा बोझिल हो जाती है और वे रिश्तेदारों की हत्या के विचार से विरक्त हो जाते हैं. और अपना हथियार ज़मीन पर रख देते हैं. उस क्षण में श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में ही सलाह देते हैं. वही पूरी की पूरी सलाह का रूप है ‘भगवत गीता’. भगवत गीता की कई आयतों में श्री कृष्ण, अर्जुन को अपने दुश्मन से लड़ने और उन्हें मारने के लिए आदेश और सलाह देतें हैं, चाहे दुश्मन उनके रिश्तेदार ही क्यूँ न हो?

भगवत गीता के अध्याय एक के आयत (श्लोक) संख्या 43 से 46 में लिखा है:

(43) हे कृष्ण, मैंने सुना है कि जो व्यक्ति अपने परिवार की परम्पराओं को नहीं निभाता है वह नरक का भागी होता है.

(44) दुर्भाग्य है कितना कि हम इतने बड़े पापयुक्क्त कार्य को करने जा रहे हैं, वो भी स्वयं के लाभ के लिए.

(45) मैं उनसे लड़ने और मार-काट करने से बेहतर समझता हूँ कि वे, ध्रितराष्ट्र के बेटे मुझे क़त्ल कर दें.

(46) इतना कह कर अर्जुन अपने हथियार नीचे रख देते हैं और रथ से नीचे उतर जाते हैं…

श्री कृष्ण अगले अध्याय 2 के श्लोक संख्या 2,3 में अर्जुन के बातों का जवाब देते हैं:

मेरे प्रिय अर्जुन,आपके दिमाग में इस तरह के अशुद्ध विचार किस प्रकार से जज्ब कर गए हैं. यह भलाई पाने वालों और उसके महत्त्व को जानने वालों के लिए बिलकुल भी उपयुक्त नहीं है. वे धरती के लिए नहीं बल्कि दुष्टता के लिए हैं”

हे अर्जुन,तुम्हारे मन में इस तरह के नपुंसक विचार किस प्रकार आ गए, यह आपके मन में नहीं आने चाहिए थे. अपने ह्रदय की कमज़ोरी को त्याग दो और उठो, ओ शत्रु को दंड देने वाले.”

जब अर्जुन श्री कृष्ण से कौरवों को मारने के बजाये खुद निहत्थे मर जाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं. तो श्री कृष्ण उन्हें समझाते हैं कि कैसे इस तरह के अपवित्र सिहार तुम्हारे मन में आ गए, कैसे तुम नपुंसक हो गए. उठो और अपने शत्रुवों का वध करो, उनसे लाडो और विजय पाओ.

आगे भगवत गीता में श्री कृष्ण अध्याय 2, श्लोक 31-33 में कहते हैं कि

31- क्षत्रिय को उसका कर्म ध्यान रखना चाहिए. उसके लिए इससे बेहतर हो ही नहीं सकता कि वह अपना धार्मिक उसूलों का कर्तव्य ध्यान में रखे इसलिए घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है.

32- हे पार्थ, उस क्षत्रिय को खुश होना चाहिए कि उसके लिए इस तरह का अवसर उसे मिल रहा है और स्वर्ग (जन्नत) जाने के लिए अवसर मिल रहा है.

33- लेकिन अगर तुम यह धर्म-युद्ध को नहीं लड़ते हो, अपने फ़र्ज़ से पीछे हटने पर तुम पाप के भागी बनोगे और इस प्रकार अपनी योद्धा की छवि को धूमिल करोगे.

इस तरह से भगवत गीता में सैकड़ों ऐसी आयतें है जिनका तज़्कीरा मैं यहाँ कर सकता हूँ कि जिसमें लडाई झगडे और युद्ध का ज़िक्र है. कुर’आन में दी गयी आयतों के मुकाबले कहीं ज़्यादा ज़िक्र है.

मनु-स्मृति में 8/350 में क्या लिखा है आप स्वयं पढ़ लें.

सोचिये अगर कोई बिना सन्दर्भ का हवाला दिए (without quoting the context) ये कहे कि भगवत गीता में लडाई झगडे के बारे में बहुत कहा गया है या लिखा है. उसमें अपने ही परिवार के लोगों को मारने-काटने का आदेश श्री कृष्ण दे रहे हैं. और मार काट जन्नत की प्राप्ति का ज़रिया भी बताया गया है. इस तरह का आयोजित प्रयास बहुत ही क्रूर है. लेकिन वही अगर हम सन्दर्भ का हवाला देकर (within the context) कहें कि अगर बुराई के खिलाफ़ लड़ना ज़रूरी कर्तव्य है अगर यह न्याय और सच्चाई के लिए है तो, भले ही यह आपके अपनों के खिलाफ़ क्यूँ न हो. it makes sense.

मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे इस्लाम के आलोचक, ज़्यादातर हिन्दू आलोचक कुर’आन की उन आयतों पर उंगली उठाते है, जिसमें अन्यायी दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए आदेश दिए गए हैं. यह तो केवल एक ही तरह से होता होगा कि वे स्वयं अपनी ही पुस्तकों, जैसे भगवत गीता, महाभारत और वेदों को पढ़ते ही नहीं या पढ़ते भी हैं तो ढंग से पढ़ते नहीं हैं.

जब मैं किसी हिन्दू भाई से यह पूछता हूँ कि आपके भगवत गीता में ऐसा-ऐसा लिखा है तो वह कहता है कि वह तो बुराई के खिलाफ लड़ने का आदेश है. मैं कहता हूँ वही तो कुर’आन में भी लिखा है आप बुराई के खिलाफ लड़ो. तब वह संतुष्ट हो जाता है.

आगे इस्लाम के आलोचक, खास कर हिन्दू आलोचक यह कहते है कि कुर’आन में यह लिखा है कि अगर आप इस तरह की लडाई-झगडा करते हैं,जिहाद में किसी को मारते हैं (सच्चाई के लिए लड़ते हैं) तो आपको जन्नत की प्राप्ति होती है. वे केवल कुर’आन का ही नहीं, सहीह बुखारी की एक हदीस (पर्व 4, बुक ऑफ़ जिहाद, अध्याय संख्या 2 हदीस संख्या 46) का भी हवाला देते हैं:

अल्लाह सुबहान व-ताला यह कहते हैं कि अगर कोई जिहाद करने वाला लड़ते लड़ते शहीद हो जाता है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा.”

भगवत गीता में भी ऐसी ही आयतों का ज़िक्र है कि अगर आप लड़ते लड़ते मर जाते है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा. उदाहरणार्थ आप स्वयं देख सकते है, भगवत गीता अध्याय संख्या 2 श्लोक संख्या 37

हे कुंती-पुत्र, अगर तुम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और यदि तुम जीत जाते हो तो इस धरती में तुम्हें शासन मिलेगा (अर्थात धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा), इसलिए उठो और लड़ो…

इसी तरह का आदेश ऋग्वेद में ( पुस्तक संख्या 1 हिम 132 श्लोक 2-6) भी लिखा है.
अगर कोई इस्लाम से सम्बंधित सवाल करता है, आलोचना करता है तो उसकी ग़लतफ़हमियों को दूर करने का सबसे बेहतर यही है कि तो मैं वही सब बातें उन्हीं की धार्मिक पुस्तकों में से हवाले देकर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ…
आखिर में मैं यही कहना चाहूँगा कि:

आओ उस बात की तरफ जो हम में और तुम में यकसां (समान) है” (अल-कुर’आन 3:64)

रंजीशें नफ़रत है दहशत क्यूँ यहाँ, तू दिलों में प्यार भर दे ऐ खुदा. नेक-कर और सीधे रस्ते पे चला, अम्न का सूरज नया कोई उगा.

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>मांसाहार जायज़ नहीं है, यह एक राक्षशी कृत्य है. Non-veg is not-permitted, its an evil task

>इस्लाम धर्म में मांसाहार की रीति दयाभाव के प्रतिकूल है. पशुवध निर्दयता है. धर्म निर्दयता और हिंसा नहीं सिखाता है, फिर इस्लाम निर्दयी क्यूँ है, निर्दयता की शिक्षा क्यूँ देता है? अल्लाह का नाम लेकर पशुवध करने से क्या यह कृत्य वैध हो जाता है, अच्छा बन जाता है? ईद में करोडों जानवरों की हत्या क्यूँ करते है? क्या यह घोर निर्दयता नहीं???


यही कुछ सवाल और इससे मिलते जुलते सवालात मेरे पिछले लेख “मांसाहार क्यूँ जायज़ है?” और “मांसाहार क्यूँ जायज़ है? आलोचकों को मेरा जवाब” में लोगों ने किये हालाँकि मेरे वे दोनों लेख अपने आप में पूर्ण थे लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस बात से से सहमत नहीं थे की मांसाहार भी जायज़ है. यह लेख ख़ास उनके लिए…

देखिये ! मैंने पहले ही कहा था कि “”मांसाहार और शाकाहार किसी बहस का मुद्दा नहीं है, ना ही यह किसी धर्म विशेष की जागीर है और ना ही यह मानने और मनवाने का विषय है| कुल मिला कर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह सब्जियां भी खा सकता है और माँस भी, तो जिसको जो अच्छा लगे खाए | इससे न तो पर्यावरण प्रेमियों को ऐतराज़ होना चाहिए, ना ही इससे जानवरों का अधिकार हनन होगा | अगर आपको मासं पसंद है तो माँस खाईए और अगर आपको सब्जियां पसंद हों तो सब्जियां | आप दोनों को खाने के लिए अनुकूल हैं

जीव-हत्या अपने आप में न सही है न गलत, न उचित है न अनुचित, न निंदनीय है न सराहनीय. इसका सही या गलत होना इस बात पर निर्भर है कि इसका ‘उद्देश्य’ क्या है? और…जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लाम का दृष्टिकोण भी यही है. मिसाल के तौर पर एक जीवित मेंढक की अनर्थ हत्या करके उसे फेंक दिया जाये तो यह इस्लामी दृष्टिकोण में हिंसा, निर्दयता और पाप है लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों को शल्य-प्रशिक्षण देने के लिए उनके द्वारा मेडिकल कॉलेज में जो मेंढकों को चीरा-फाड़ा जाता है, वह निरर्थक व व्यर्थ कार्य न होकर मनुष्य व मानवजाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा,न पाप बल्कि लाभदायक,वांछनीय और सराहनीय है.


और मेरा यह विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही माप-दंड, सम्पूर्ण मानव-समाज में, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है.यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तकाज़ों के अनुकूल भी.

हालाँकि जीव-हत्या या मांसाहार या पशु-बलि को विश्व के दो बड़े धर्मों सनातन धर्म और इस्लाम धर्म में मान्यता प्राप्त है. सनातन धर्म के अनुसार (कृपया मेरे पिछले लेख देखें) ‘देवताओं’ को प्रसन्न करने के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से पशु-बलि की अनुमति और आदेश मौजूद है. देखें: मनुस्मृति 3/123, 3/268, 5/23, 5/27-28 ऋग्वेद 10/27/2, 10/28/3 अथर्ववेद 9/6/4/43/8 और इस्लाम धर्म में भी अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए पशु-बलि का विधान है. अतः सृष्टि के सृजनकर्ता- अल्लाह – अल्लाह ने पृथ्वी के सारे जीवधारी व अजीवधारी वस्तुए मनुष्य के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उपयोग या उपभोग के लिए बनाये गयी हैं. प्रत्यक्ष उपभोग में मांसाहार भी आता है और इसे इस्लाम व गैर-इस्लाम में सामान्य मान्यता मिली हुई है. कुछ व्यक्तिगत या सीमित सामुदायिक अप्वाद्द हैं, जो कि नगण्य हैं. जीव-हत्या के सम्बन्ध में इस्लामी दृष्टिकोण को आसानी से समझा जा सकता है. हर जीवधारी (वनस्पति या पशु-पक्षी) को मनुष्य के उपभोग के लिए पैदा किया गया है. पेड़-पौधों, फलों, तरकारियों को काटना, तोड़ना (खाना और उपभोग करना) भी उसी प्रकार की जीव-हत्या है जिस प्रकार की मछलियाँ, पक्षियों एवं पशुओं को खाने के लिए उनकी हत्या करना.

अगर आप अभी भी संतुष्ट नहीं हैं तो आपकी आलोचनाओं का स्वागत है.

-सलीम खान

Filed under: माँसाहार, माँसाहार या शाकाहार, शाकाहार

>आधुनिक वैश्विय सभ्यता और नारी की गरीमा Modern Global Culture and Women

>आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया में नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है. लेकिन यह सिक्के का केवल एक पहलू है जो बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.


आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू…

उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे

नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.

आईये देखते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने नारी को क्या क्या दिया

व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन.
  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता… अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी… तथा फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण
  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व.
  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन.
  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के ‘इस्तेमाल’ के घिनावने और बेहूदा चित्र
  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.

(सवाल: अब आप नारी की इस स्थिति के समर्थक तो हो नहीं सकते, और अगर है तो क्या आप अपनी माँ-बहनों को ऐसा करने दे सकते हैं?)


यौन शोषण (Sexual Exploitation)

  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी ‘सेवाएँ’ अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.
  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी. सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण.
  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को ‘नृत्य-साधना’ का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई.
  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)


  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.
  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ.
  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place)
  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city)
  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण.
  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न.
  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध


  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.
  • ‘सामूहिक बलात्-दुष्कर्म’ इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है.
  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी…
  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों.
  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं.
  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ


  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.
  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).
  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)


बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा ‘फीस’ के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)

  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण ‘अपमान’.
  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना.
  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक ‘नैतिकता का मक़ाम हासिल.

समाधान


नारी के मूल अस्तित्व के बचाव में ‘स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़’ की इस पहल में आईये, हम सब साथ हो और समाधान की ओर अग्रसर हों.

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.

नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.

लेकिन इस आव्हान से पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल. क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???

आईये आज हम नारी को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की क़सम खाएं!

सलीम खान

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लेख सन्दर्भ