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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मुसलमानों में प्रचलित बुराईयाँ (Bad habits in Muslims)

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[पिछले महीने (माहे-रजब) में आपने लेख पढ़ा “रजब का महीना बिदआत के घेरे में” अब इसी सीरीज़ में पढें “शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ”]

शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ:

हम जब इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन व सुन्नत और हदीसों) का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि शाबान के महीने में विशिष्ट रूप से पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने केवल इतना प्रमाणित किया है कि आप इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा नफ़्लि रोजा रखते थे और इसके लिए कोई दिन सुनिश्चित नहीं करते थे. किन्तु आजकल बहुत सारे मुसलमान पंद्रहवी शाबान की रात और उसके दिन को बहुत महत्व और विशेषता और प्राथमिकता देते हुए ऐसे अधार्मिक कार्य करते हैं जिनका हमारे पैगम्बर (स.अ व.) की लाई हुई शरीयत से कोई सम्बन्ध नहीं है. बल्कि वो बिदआत की श्रेणी में आते हैं जिनसे इस्लाम ने सख्ती से रोका है. मैं उन बिदआतों में से कुछ का ज़िक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ जिससे कि हमारे समाज में अगर ऐसा कर रहा है तो वह संभल जाये और गुनाहगार होने से बच जाये.

१. पंद्रहवीं शाबान को रोज़ा रखना

२. पंद्रहवीं शाबान की रात को ‘सौ रक़आते’ की नमाज़ (हज़ारी नमाज़) पढना. हर रक़अतों में दस बार ‘सूरतुल इख़लास’ पढना और हर दो रक़अतों के बाद सलाम फेरना. आपको मैं बता दूं कि इस बुराई का जन्म हुआ था ४४८ हिजरी में बैतूल मुक़द्दीस में ‘इब्ने अबील हम्रा’ के द्वारा. इसके पूर्व इसका कोई अस्तित्व नहीं था. (फिर यह कसी वैध हो सकता है)

३. पंद्रहवीं शाबान की रात को औरतें का बन-ठन कर, सज संवर कर क़ब्रिस्तान जाना, वहां क़ब्रों पर चिरागाँ करना, अगरबत्ती जलना, फूल चढ़ाना, मुर्दों के सामने अपनी मुरादें रखना और अपना दुखड़ा सुनाना… आदि

४. घरों, सड़कों, क़ब्रों, मस्जिदों रौशनी करना जो कि मजुसियों की इजाद की हुई चीज़ है, जो आग को पूजते हैं और आग को अपना परमेश्वर मानते हैं.

५. मुसीबत और बला टालने, लम्बी उम्र और लोगों के बेनियाज़ी के लिए छह रक़अत नमाज़ पढ़ना.

६. पंद्रहवीं शाबान को हलवा बनाना (शुबरात का हलवा) इसके पीछे जो आस्था पाया जाता है वह अनाधार है और मात्र अफ़साना.

७. स रात रूहों के आगमन का अक़ीदा रखना और यह गुमान करना कि इस रात मरे हुए लोगों की रूहें घरों में आती हैं और रात भर बसेरा करती हैं. अगर घर में हलवा पातीं हैं तो ख़ुश हो कर लौट जाती हैं वरना मायूस हो कर लौटती हैं. इसलिए उनकी मनपसंद की चीज़ें पकवान बनाये जातें हैं.

८. यह भी भ्रान्ति फैली है कि शुबरात के पहले जो रूहें मरती हैं वे इस दिन आकर क़ब्रों से मिल जातीं हैं… यह अकीदा मात्र परिहास का संचार है और कुछ नहीं.

यह और इनके अतिरिक्त न जाने और कितने ही खुदसाख्ता काम किया जाता है जिसका पैगम्बर (स.अ.व.) ने कहा और न अल्लाह (स.व.त.) ने आदेश दिया और न ही खुलफा-ए-राशिदीन, अन्य सहाबा ताबेईन और सलफ़ ने किये हैं.

ऐ, मुसलमानों तुम अल्लाह का कहा मानों और रसूल (स.अ.व.) की इताअत करो.


-सलीम खान

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Filed under: मुसलमान

14 Responses

  1. Mohammed Umar Kairanvi कहते हैं:

    >आजकल जिस प्रकार की पोस्ट आप लिख रहे हो, यह उनसे अलग है, मुझे लगता है आपको दो ब्लाग पढ बना लेने चाहियें, संदेश का अलग धर्म सधार का अलग,,पिछले दिनों आपने जो पाठक पाये हैं वह यह देखकर भाग जायेंगे, मुझको देखो कुछ सदाबहार सा अपने ब्लाग पर लगाकर मजे से घूम रहा हूँ और रैंक 2 हो गया, islaminhindi.blogpot.com

  2. Mohammed Umar Kairanvi कहते हैं:

    >आजकल जिस प्रकार की पोस्ट आप लिख रहे हो, यह उनसे अलग है, मुझे लगता है आपको दो ब्लाग पढ बना लेने चाहियें, संदेश का अलग धर्म सधार का अलग,,पिछले दिनों आपने जो पाठक पाये हैं वह यह देखकर भाग जायेंगे, मुझको देखो कुछ सदाबहार सा अपने ब्लाग पर लगाकर मजे से घूम रहा हूँ और रैंक 2 हो गया, islaminhindi.blogpot.com

  3. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >आपका मशविरा सही है…

  4. safat alam taimi कहते हैं:

    >जी हाँ ! मैं भी Mohammed Umar Kairanvi भाई की राय से सहमत हूं।

  5. safat alam कहते हैं:

    >जी हाँ ! मैं भी Mohammed Umar Kairanvi भाई की राय से सहमत हूं।

  6. safat alam taimi कहते हैं:

    >आपने जो लिखा वह सौ प्रतिशत सही हैं पर यदि समाज सुधार के लिए अलग ब्लौग खोल लिया जाता तो अच्छा था।

  7. safat alam कहते हैं:

    >आपने जो लिखा वह सौ प्रतिशत सही हैं पर यदि समाज सुधार के लिए अलग ब्लौग खोल लिया जाता तो अच्छा था।

  8. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >bhai maine khola hai aap sab amantrit hain. islamicgroupofindia.blogspot.com

  9. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >ab aap sab ismen shamil ho jayen aur islam ke sudhar se sambandhit lekh post karen safat bhai aapke liye khususan…

  10. >ab aap sab ismen shamil ho jayen aur islam ke sudhar se sambandhit lekh post karen safat bhai aapke liye khususan…

  11. खुर्शीद अहमद कहते हैं:

    >बहुत सही बात कही आपने सलीम साहब. आज इसलाम में नाम पर बहुत सी चीजे इसमें जोड़ दी गयी हैं जिनका इसलाम से कोई ताल्लुक नहीं है. इसलाम तो आज से चौदह सौ साल पहले ही पूर्ण हो चुका है. कुरआन में भी है कि अल्लाह कहता है कि इसलाम एक पूर्ण धर्म है और अल्लाह ने हमारे लिये इस्लाम को चुना है. और जब अल्लाह ने इसलाम को पूर्ण कर दिया है तो अब इसमें न तो ज़र्रा (परमाणु) बराबर न तो बढोत्तरी हो सकती है और न ही कमी. फिर इसलाम के नाम पर नयी चीजे जोड़ना कहाँ से सही है .शाबान की रात को कब्रों को इबादत गाह बना लेना कहाँ से सही है. जबकि मुहम्मद सल. ने साफतौर पर फ़रमाया कि ऐ लोगों! तुम लोग मेरी कब्र को इबादतगाह मत बना लेना जैसा कि यहुदिओं और नस्रानियों (ईसाईयों) ने बनाया.

  12. khursheed कहते हैं:

    >बहुत सही बात कही आपने सलीम साहब. आज इसलाम में नाम पर बहुत सी चीजे इसमें जोड़ दी गयी हैं जिनका इसलाम से कोई ताल्लुक नहीं है. इसलाम तो आज से चौदह सौ साल पहले ही पूर्ण हो चुका है. कुरआन में भी है कि अल्लाह कहता है कि इसलाम एक पूर्ण धर्म है और अल्लाह ने हमारे लिये इस्लाम को चुना है. और जब अल्लाह ने इसलाम को पूर्ण कर दिया है तो अब इसमें न तो ज़र्रा (परमाणु) बराबर न तो बढोत्तरी हो सकती है और न ही कमी. फिर इसलाम के नाम पर नयी चीजे जोड़ना कहाँ से सही है .शाबान की रात को कब्रों को इबादत गाह बना लेना कहाँ से सही है. जबकि मुहम्मद सल. ने साफतौर पर फ़रमाया कि ऐ लोगों! तुम लोग मेरी कब्र को इबादतगाह मत बना लेना जैसा कि यहुदिओं और नस्रानियों (ईसाईयों) ने बनाया.

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