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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>क्या भगवान रजनीश ईश्वर है? (Is Bhagwan Rajneesh God) ?

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कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है| कृपया मेरे शब्दों पर ध्यान दीजिये मैंने कहा कि “कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है !???”


मैंने पीस टी वी पर प्रश्नोत्तर काल में देखा था कि एक हिन्दू सज्जन ने कहा कि हिन्दू भगवान रजनीश को एक ईश्वर के रूप में नहीं पूजते हैं| मुझे ज्ञात हुआ कि हिन्दू भाई भगवान रजनीश को ईश्वर के रूप में नहीं देखते I

लेकिन रजनीश के मानने वाले – समर्थको ने उनकी फिलोसोफी और आइडियोलोगी को बदल दिया है, लेकिन यह भी सत्य है कि उनके मानने वाले किसी धर्म विशेष के नहीं हैं बल्कि अलग अलग धर्मों के हैं | और रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक … one and only, और वह ईश्वर हैं!

मैं इस बात को आगे बढ़ता हूँ – कुरआन के सुरः इखलास से और वेदों के अनुसार इसको जाँचता हूँ :

ईश्वर के अंतिम ग्रन्थ कुरआन के अध्याय ११२, सुरः इखलास में श्लोक संख्या १ से ४ में लिखा है कि –

1- कहो! अल्लाह यकता है| (अर्थात ईश्वर एक है)
2- अल्लाह निरपेक्ष और सर्वाधार है|
3- न वह जनिता है और न जन्य |
4- और ना उसका कोई समकक्ष |(अर्थात उस जैसा कोई नहीं)

इसी तरह वेदों में लिखा है कि – एकम ब्रह्मा अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति नास्ति नेह्न्ये ना अस्ति | (ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है. नहीं है, नहीं, ज़रा भी नहीं है.)

और

ना तस्य प्रतिमा अस्ति | (ईश्वर की कोई प्रतिमा, कोई बुत, कोई फोटो, कोई तस्वीर, कोई छवि, कोई मूर्ति नहीं हो सकती)

(अ) सुरः इखलास में लिखा है- ‘क़ुल हु अल्लाह हु अहद’ –‘यानि, वह अल्लाह (ईश्वर) है, एक और केवल (यकता)| क्या रजनीश वन एंड वनली है? क्या रजनीश एक है और केवल एक? हम देखते हैं कि हमारे देश में फर्जी व्यक्ति अपने आपको भगवान-पुरुष इस तरह से बताते हैं कि जनता को ऐसा लगने लगता है कि वह ईश्वर है या ईश्वर का रूप है| ऐसे बहुत मिलेंगे अपने इस महान देश भारत में | रजनीश वास्तव में एक और केवल मात्र एक नहीं है| मनुष्य होने के बावजूद और केवल मनुष्य होने के नाते कोई यह घोषित कर दे कि वह ईश्वर है, गलत है | बिलकुल ही गलत है| फिरभी रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक… one and only. एक ही समय में कोई दो कैसे हो सकता है. हम मानते हैं कि ईश्वर अर्थात अल्लाह अमर है. क्या रजनीश अमर हैं? हम जानते हैं ईश्वर खाना नहीं खता. क्या रजनीश खाना नहीं खाता था. ऐसे ही बहुत से ईश्वर के गुण हैं जो केवल उसी के लिए ही हैं. हाँ अगर उन गुणों उन विशेषताओं पर कोई खरा उतरता है मैं उसे ईश्वर मानने के लिए तैयार हूँ.

(आ) आगे सुरः इखलास में लिखा है अल्लाह हुस् समद’– ‘अल्लाह निरपेक्ष है और सर्वाधार है’

क्या रजनीश निरपेक्ष और सर्वाधार है ??? ईश्वर अमर व अजर है | क्या रजनीश अमर या अजर थे? मैंने तो उनकी जीवनी में पढ़ा है कि उनको डायबिटीज़, अस्थमा और क्रोनिक बैकएच जैसी कई बीमारियाँ थी | वे जब अमेरिका की जेल में थे तब उन्होंने वहां की सरकार पर उनको को मारने की नियत से स्लो पोइसोनिंग का इल्जाम लगाया था | कल्पना कीजिये! परमशक्तिसंपन्न ईश्वर को ज़हर दिया जा रहा है! और तो और हम सब जानते हैं कि रजनीश की म्रत्यु हुई थी जैसे हम और आप मरते हैं और वह तो जलाये भी गए थे|

इस तरह से रजनीश अमर नहीं थे ना ही सर्वाधार, सर्वव्यापी |

(इ) तीसरा वाक्य है ‘लम य लिद व लम यु लद’ – यानि ‘He begets not, nor is begotten’. वह (ईश्वर) न जनिता है न जन्य‘|

अब हमें और आपको अर्थात सबको पता है रजनीश पैदा हुए थे| उनका जन्म भारत के जबलपुर शहर में हुआ था जैसे कि मेरा जन्म भारत के पीलीभीत जिले में हुआ था और आपका भी कहीं ना कहीं हुआ है अर्थात सभी मनुष्य की तरह वह भी पैदा हुए थे| उनकी माता थीं और उनके पिता भी| रजनीश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे| मई 1981 में वे अमेरिका गए और अमेरिका के ओरेगोन शहर में बस गए जिसका नाम रखा उन्होंने ‘रजनीशपुरम’ | अमेरिका में उनके द्वारा किये गए किसी अपराध के लिए वह जेल गए और सन 1985 में अमेरिका से डिपोर्ट कर दिए गए| इस तरह से रजनीश भारत वापस आ गए और पुणे में ‘Rajneesh Neosanyas Commune’ की शुरुवात की जिसका नाम बाद में बदल कर ‘ओशो कम्यून’ |

अगर कभी वक़्त मिले तो पुणे जाईयेगा- ‘ओशो कम्यून’ में, वह आपको पत्थर पर लिखा हुआ मिलेगा कि “OSHO – never born, never died, only visited the planet earth between 11th Dec. 1931 to 19th Jan 1990”. ‘ओशो- ना कभी पैदा हुआ, ना कभी मरा, केवल 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच पृथ्वी पर आया था’|

उस पत्थर पर एक बात लिखना शायेद भूल गए कि रजनीश अर्थात भगवन रजनीश को दुनिया के विभिन्न 21 देशों ने वीज़ा देने से मना कर दिया गया| सोचिये और कल्पना कीजिये – सर्वशक्तिमान ईश्वर धरती पर आता है और उसे वीज़ा की आवश्यकता पड़ती है!

(ई) चौथा वाक्य (आयत) है व लम य कुल्लहु कुफुवन अहद “none besides the One True God, Allah (swt), ‘there is none like Him’. यानि :और ना कोई उसका समकक्ष” (अर्थात उस जैसा कोई नहीं)

अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | वेदों में लिखा है – “ना तस्य प्रतिमा अस्ति” उसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती | इधर हम जानते है कि रजनीश एक इन्सान थे, उनका एक सिर था, दो हाँथ, दो पैर और बड़ी सी दाढ़ी भी | कल्पना कीजिये कि कोई कहे, “ईश्वर हज़ार गुना शक्तिशाली है अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर के मुकाबले”| अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर जैसा कि आप जानते है दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक है| वह मिस्टर यूनिवर्स के खिताब से नवाज़ा गया था| अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती चाहे उसे सौ गुना हज़ार गुना ज्यादा कहके क्यूँ ना कहा जाये य चेह कोई कितना भी बलशाली क्यूँ ना हो, उसकी तुलना करके आप ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकते, ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | भले चाहे वह खली, दारा सिंह य किंग कोंग क्यूँ ना हो|

“The moment you can compare the claimant to godhood to anything, he or she is not God.” ‘Wa lam ya kul lahu kufwan ahad’ ‘there is none like Him.’ वेदों में लिखा है – ना तस्य प्रतिमा अस्ति | “एकः ब्रह्म अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति, नास्ति किंचन मात्र नास्ति”

यहाँ पढ़े रजनीश के बारे में और ज़्यादा !


-सलीम खान
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Filed under: ईश्वर

34 Responses

  1. नीरज गोस्वामी कहते हैं:

    >रजनीश को भगवान् कहना शायद उनके अनुयायियों द्वारा उनके प्रति प्रेम प्रदर्शन का एक तरीका हो…लेकिन एक बात सत्य है की रजनीश जैसा सुलझा हुआ वक्ता हमें बहुत कम सुनने को मिलता है…लगभग सभी धर्म और महापुरुषों पर दिए उनके प्रवचन उन्हें विशिष्ठ श्रेणी में रखते हैं…बिना पढ़े या गहराई में गए कोई किसी पर इतने अधिकार पूर्वक नहीं बोल सकता…उनके प्रवचनों और शब्द प्रवाह की प्रशंशा उस समय के दिग्गज साहित्यकारों ने भी की थी…नीरज

  2. नीरज गोस्वामी कहते हैं:

    >रजनीश को भगवान् कहना शायद उनके अनुयायियों द्वारा उनके प्रति प्रेम प्रदर्शन का एक तरीका हो…लेकिन एक बात सत्य है की रजनीश जैसा सुलझा हुआ वक्ता हमें बहुत कम सुनने को मिलता है…लगभग सभी धर्म और महापुरुषों पर दिए उनके प्रवचन उन्हें विशिष्ठ श्रेणी में रखते हैं…बिना पढ़े या गहराई में गए कोई किसी पर इतने अधिकार पूर्वक नहीं बोल सकता…उनके प्रवचनों और शब्द प्रवाह की प्रशंशा उस समय के दिग्गज साहित्यकारों ने भी की थी…नीरज

  3. रंजन कहते हैं:

    >ईश्वर की कोई ठेकेदारी तो नहीं.. वैसे रजनीश को ’भगवान’ कहा जाता है…"भगवान रजनीश" आप ही उन्हे ईश्वर कह रहे है और आप ही नकार रहे है.. हम तो मानते है.. की रजनीश भगवान थे.. राम पैदा हुए और मरे, कृष्ण पैदा हुए और मरे तो क्या वो भगवान नहीं है? अल्ला हाफि़ज!!

  4. रंजन कहते हैं:

    >ईश्वर की कोई ठेकेदारी तो नहीं.. वैसे रजनीश को ’भगवान’ कहा जाता है…"भगवान रजनीश" आप ही उन्हे ईश्वर कह रहे है और आप ही नकार रहे है.. हम तो मानते है.. की रजनीश भगवान थे.. राम पैदा हुए और मरे, कृष्ण पैदा हुए और मरे तो क्या वो भगवान नहीं है? अल्ला हाफि़ज!!

  5. Mohammed Umar Kairanvi कहते हैं:

    >आप तो स्वयं ऐसे लेख लिख कर महान बनते जा रहे हो, बधाई'क़ुरआन' शब्द को सही लिखने पर भी,अल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.com (Rank-2)बौद्ध् मैत्रे, कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  6. Mohammed Umar Kairanvi कहते हैं:

    >आप तो स्वयं ऐसे लेख लिख कर महान बनते जा रहे हो, बधाई'क़ुरआन' शब्द को सही लिखने पर भी,अल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.com (Rank-2)बौद्ध् मैत्रे, कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  7. >भारत में रजनीश की तरह ही न जाने कितने लोगों ने अपने आपको भगवान् तो कहलवाया ही साथ ही लोगों ने उन्हें ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दे रखा है. जबकि हम भारतीयों को खास कर हिन्दू भाईयों को इस मसले पर अपनी किताब 'वेद' और पुराण आदि को देखना चाहिए और उसके द्वारा जो निर्देश और ज्ञान प्राप्त हो, खुद ही तय करें…

  8. सलीम ख़ान कहते हैं:

    >भारत में रजनीश की तरह ही न जाने कितने लोगों ने अपने आपको भगवान् तो कहलवाया ही साथ ही लोगों ने उन्हें ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दे रखा है. जबकि हम भारतीयों को खास कर हिन्दू भाईयों को इस मसले पर अपनी किताब 'वेद' और पुराण आदि को देखना चाहिए और उसके द्वारा जो निर्देश और ज्ञान प्राप्त हो, खुद ही तय करें…

  9. Udan Tashtari कहते हैं:

    >ओशो एक ज्ञानी मार्गदर्शक, दर्शनशास्त्री, चिन्तक, विचारक और एक जबरदस्त वक्ता थे, और उनके अनुयायी उन्हें प्रेमवश, आदरवश अपना भगवान मानते थे जैसे कि माँ, बाप और गुरु को माना जाता है.उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं भगवान हूँ या मुझे भगवान मानो.

  10. Udan Tashtari कहते हैं:

    >ओशो एक ज्ञानी मार्गदर्शक, दर्शनशास्त्री, चिन्तक, विचारक और एक जबरदस्त वक्ता थे, और उनके अनुयायी उन्हें प्रेमवश, आदरवश अपना भगवान मानते थे जैसे कि माँ, बाप और गुरु को माना जाता है.उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं भगवान हूँ या मुझे भगवान मानो.

  11. safat alam कहते हैं:

    >रजनीश तो क्या आज ही दैनिक जाग्रण में यह ख़बर छपी है कि (नाग देवता की पूजा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़)जी हां! हमारे हां नाग देवता बन चुका है और खूब धूम धाम से उककी पूजा होती है। इसका आप क्या कहेंगे। बस हमारा कर्तव्य यही होना चाहिए कि हम अपने उन भाईयों को जो ईश्वर को न पहचान रहे हैं प्रेम से उन्हें हम उनकी अपनी अमानत उनके हवाले कर दें।

  12. safat alam taimi कहते हैं:

    >रजनीश तो क्या आज ही दैनिक जाग्रण में यह ख़बर छपी है कि (नाग देवता की पूजा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़)जी हां! हमारे हां नाग देवता बन चुका है और खूब धूम धाम से उककी पूजा होती है। इसका आप क्या कहेंगे। बस हमारा कर्तव्य यही होना चाहिए कि हम अपने उन भाईयों को जो ईश्वर को न पहचान रहे हैं प्रेम से उन्हें हम उनकी अपनी अमानत उनके हवाले कर दें।

  13. >आप हर बात में हिन्दुओं (या भारतीयों को) वेद और पुराण देखने की समझाइश देते हैं. अच्छी बात है. बहुत से हिन्दू इन्हें ईश्वरीय ग्रन्थ मानते हैं लेकिन नहीं मानने वालों की तादाद भी खासी बड़ी है. हिन्दू मानस में वेदों और पुरानों से ज्यादा गहरी छाप गीता और रामचरितमानस की है.और यह हिन्दू या सनातन या वैदिक धर्म की ही विशेषता है जिसमें यदि कहीं मनुष्य को ईश्वर के सामने नगण्य माना गया है तो अनेक प्रसंगों में ईश्वर के समतुल्य भी.

  14. >आप हर बात में हिन्दुओं (या भारतीयों को) वेद और पुराण देखने की समझाइश देते हैं. अच्छी बात है. बहुत से हिन्दू इन्हें ईश्वरीय ग्रन्थ मानते हैं लेकिन नहीं मानने वालों की तादाद भी खासी बड़ी है. हिन्दू मानस में वेदों और पुरानों से ज्यादा गहरी छाप गीता और रामचरितमानस की है.और यह हिन्दू या सनातन या वैदिक धर्म की ही विशेषता है जिसमें यदि कहीं मनुष्य को ईश्वर के सामने नगण्य माना गया है तो अनेक प्रसंगों में ईश्वर के समतुल्य भी.

  15. RAVI KANT कहते हैं:

    >bhaai, na to aapko Rajneesh ke baare me kuchh pata hai aur na hi Ishwar ke baare me.

  16. RAVI KANT कहते हैं:

    >bhaai, na to aapko Rajneesh ke baare me kuchh pata hai aur na hi Ishwar ke baare me.

  17. P.N. Subramanian कहते हैं:

    >अहम् ब्रह्मास्मि ..

  18. P.N. Subramanian कहते हैं:

    >अहम् ब्रह्मास्मि ..

  19. बालसुब्रमण्यम कहते हैं:

    >भगवान सर्वव्यापी हैं। चाहे रजनीश या चाहे पत्थर, सबमें भगवान हैं, आपमें भी हैं। तो यदि आप भी अपने को भगवान बताएं, तो इसमें गलत कुछ नहीं है।

  20. बालसुब्रमण्यम कहते हैं:

    >भगवान सर्वव्यापी हैं। चाहे रजनीश या चाहे पत्थर, सबमें भगवान हैं, आपमें भी हैं। तो यदि आप भी अपने को भगवान बताएं, तो इसमें गलत कुछ नहीं है।

  21. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >भगवान्‌ शब्द "भग (धातु) +वतुप्‌ (प्रत्यय)" से मिलकर बना है. यहां "भग" का अर्थ "प्रकाश" और "वतुप्‌" प्रत्यय "वाला" के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भगवान्‌ शब्द का अर्थ हुआ "प्रकाश वाला" अर्थात्‌ जो प्रकाशमान हो. और किसी व्यक्ति को हम प्रकाशमान तब कहते हैं, जब उसमें वैशिष्ट्य दिखे. इस नाते यदि कोई रजनीश को भगवान्‌ कहता है तो वह गलत नहीं है. सर्वप्रथम आपको चाहिए कि आप संस्कृत और हिन्दी व्याकरण का सम्यक्‌ अवगाहन करें, जिससे आपकी भ्रमात्मक स्थिति सुधरे. दूसरी बात ये कि हिन्दी और संस्कृत भाषा में कई शब्द ऐसे हैं जिनके कई अनेक अर्थ भी होते हैं एवं जिनका अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ होता है. उदाहरणार्थ- "सैन्धवम्‌ आनय" के दो अर्थ हैं, एक नमक और दूसरा घोड़ा. अब यह श्रोता पर निर्भर करता है कि युद्धक्षेत्र में जाने वाले को घोड़ा देता है या नमक. वैसे ही यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस शब्द को किस अर्थ में लेते हैं?भई सलीम साहब और उनके समर्थक टिप्पणीकार बन्धुओं ! कुछ भी लिखने या लिखे हुए पर सियार की सहमति की हुआं-हुआं करने से पहले उसके बारे में ठीक से जान लें तो बेहतर होगा। नहीं तो "जबरिया पोस्टों में वर्धन" करना हो तो जो मन चाहे करते रहिए.जाते-जाते एक और बात, कोई भाषा हो या धर्म/सम्प्रदाय, उसपर कुछ लिखने या टिप्पणी करने से पूर्व सही जानकारी रखनी चाहिए. हर भाषा या धर्म की प्रकृति अलग होती है, उसे उसी धर्म के अन्तर्गत देखा जाएगा तो सही तस्वीर उभरेगी. ये सनातन/हिन्दू धर्म की प्रकृति है कि यहां "हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है" कहा और माना भी जाता है. ईश्वर के बनाए इस सृष्टि के हर अवयव में स्वयं ईश्वर ही विराजमान है, ऐसा माना जाता है. यह कुछ इस प्रकार भी समझ सकते है कि जैसे आप अपने पिताजी/अब्बाहुजुर के वीर्यांश अथवा खून हैं, किन्तु क्या कहीं आप इन स्थूल आंखों से देख सकते है कि आपके अब्बा आपके भीतर विराजमान हैं?? नही, ना!! आशा है आप मेरी बात समझ रहे होंगे……. धन्यवाद.

  22. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >भगवान्‌ शब्द "भग (धातु) +वतुप्‌ (प्रत्यय)" से मिलकर बना है. यहां "भग" का अर्थ "प्रकाश" और "वतुप्‌" प्रत्यय "वाला" के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भगवान्‌ शब्द का अर्थ हुआ "प्रकाश वाला" अर्थात्‌ जो प्रकाशमान हो. और किसी व्यक्ति को हम प्रकाशमान तब कहते हैं, जब उसमें वैशिष्ट्य दिखे. इस नाते यदि कोई रजनीश को भगवान्‌ कहता है तो वह गलत नहीं है. सर्वप्रथम आपको चाहिए कि आप संस्कृत और हिन्दी व्याकरण का सम्यक्‌ अवगाहन करें, जिससे आपकी भ्रमात्मक स्थिति सुधरे. दूसरी बात ये कि हिन्दी और संस्कृत भाषा में कई शब्द ऐसे हैं जिनके कई अनेक अर्थ भी होते हैं एवं जिनका अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग अर्थ होता है. उदाहरणार्थ- "सैन्धवम्‌ आनय" के दो अर्थ हैं, एक नमक और दूसरा घोड़ा. अब यह श्रोता पर निर्भर करता है कि युद्धक्षेत्र में जाने वाले को घोड़ा देता है या नमक. वैसे ही यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस शब्द को किस अर्थ में लेते हैं?भई सलीम साहब और उनके समर्थक टिप्पणीकार बन्धुओं ! कुछ भी लिखने या लिखे हुए पर सियार की सहमति की हुआं-हुआं करने से पहले उसके बारे में ठीक से जान लें तो बेहतर होगा। नहीं तो "जबरिया पोस्टों में वर्धन" करना हो तो जो मन चाहे करते रहिए.जाते-जाते एक और बात, कोई भाषा हो या धर्म/सम्प्रदाय, उसपर कुछ लिखने या टिप्पणी करने से पूर्व सही जानकारी रखनी चाहिए. हर भाषा या धर्म की प्रकृति अलग होती है, उसे उसी धर्म के अन्तर्गत देखा जाएगा तो सही तस्वीर उभरेगी. ये सनातन/हिन्दू धर्म की प्रकृति है कि यहां "हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है" कहा और माना भी जाता है. ईश्वर के बनाए इस सृष्टि के हर अवयव में स्वयं ईश्वर ही विराजमान है, ऐसा माना जाता है. यह कुछ इस प्रकार भी समझ सकते है कि जैसे आप अपने पिताजी/अब्बाहुजुर के वीर्यांश अथवा खून हैं, किन्तु क्या कहीं आप इन स्थूल आंखों से देख सकते है कि आपके अब्बा आपके भीतर विराजमान हैं?? नही, ना!! आशा है आप मेरी बात समझ रहे होंगे……. धन्यवाद.

  23. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >मेरी पूर्व टिप्पणी पर मान्यवर सलीम जी ने अपना तर्क यहां न देकर व्यक्तिगत रूप से मेरे जीमेल आईडी पर कल भेजी, जिसे सभी पाठकों हेतु उसी रूप में अविकल प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि आप भी देख लें कि इनके तर्क का स्तर क्या है? और उसकी अंतिम परिणति उन्होने अपनी अंतिम पंक्ति में किस रूप और भाव में कही है-==========================अब्बा हुजुर का विर्यांश बनाया किसने, ईश्वर ने…देखिये आपका मानना है कि सभी कुछ ईश्वर है… जबकि सत्य यह है कि सभी कुछ ईश्वर का है….ईश्वर का बनाया हुआ…..आप मैं सूर्य चंद्रमा धरती पानी आग और सभी कुछ ….. अगर सभी कुछ ईश्वर होता तो हम आप कितना झूठ बोलते है मार काट करते हैं गलियां बकते हैं…क्या हमारे अन्दर बैठा ईश्वर ऐसा करने दे रहा है…………नहींउसने हमन बनाया और वाहू हमसे हिसाब भी लेगा… एक एक बात का………….. उसने वेदों में समझाया……लोग न समझे…..उसने बाइबल में समझाया लोग न समझे …………. अब उसने अपने मुकम्मल किताब हम इंसानों को अता की है…… अब तो समझ जाओ………… =================जनाब सलीम जी,दूसरे की कही गयी बातों में निरर्थक बातें नहीं जोड़नी चाहिए। मेरा मानना क्या है, वो अपनी पूर्व टिप्पणी में लिखा हुआ है। अगर अभी भी मेरी बात समझ में नहीं आ रही है तो मानस की ये चौपाई शायद आपकी कुछ सहायता कर सके कि "ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशि॥" दूसरी बात जो आपने कही कि "अगर सभी कुछ ईश्वर होता तो हम आप कितना झूठ बोलते है मार काट करते हैं गलियां बकते हैं…क्या हमारे अन्दर बैठा ईश्वर ऐसा करने दे रहा है…………नहीं" तो जनाब ये बात आपके ईश्वर (जिसे आपके सम्प्रदायानुयायी अल्लाह नाम अभिहित करते हैं) भी लागू होती है। और जब आपकी ही भाषा में "अब उसने अपने मुकम्मल किताब हम इंसानों को अता की है…… अब तो समझ जाओ………… " यह बात कही है, तो ओसामा बिन लादेन, जवाहिरी, बैतूल्ला महसूद, तालिबान और आतंकवादी कृत्य करने वाले वे लोग जो फख्र करते हैं, मुसलमान होने पर, क्यों नहीं समझते????

  24. दिवाकर मणि कहते हैं:

    >मेरी पूर्व टिप्पणी पर मान्यवर सलीम जी ने अपना तर्क यहां न देकर व्यक्तिगत रूप से मेरे जीमेल आईडी पर कल भेजी, जिसे सभी पाठकों हेतु उसी रूप में अविकल प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि आप भी देख लें कि इनके तर्क का स्तर क्या है? और उसकी अंतिम परिणति उन्होने अपनी अंतिम पंक्ति में किस रूप और भाव में कही है-==========================अब्बा हुजुर का विर्यांश बनाया किसने, ईश्वर ने…देखिये आपका मानना है कि सभी कुछ ईश्वर है… जबकि सत्य यह है कि सभी कुछ ईश्वर का है….ईश्वर का बनाया हुआ…..आप मैं सूर्य चंद्रमा धरती पानी आग और सभी कुछ ….. अगर सभी कुछ ईश्वर होता तो हम आप कितना झूठ बोलते है मार काट करते हैं गलियां बकते हैं…क्या हमारे अन्दर बैठा ईश्वर ऐसा करने दे रहा है…………नहींउसने हमन बनाया और वाहू हमसे हिसाब भी लेगा… एक एक बात का………….. उसने वेदों में समझाया……लोग न समझे…..उसने बाइबल में समझाया लोग न समझे …………. अब उसने अपने मुकम्मल किताब हम इंसानों को अता की है…… अब तो समझ जाओ………… =================जनाब सलीम जी,दूसरे की कही गयी बातों में निरर्थक बातें नहीं जोड़नी चाहिए। मेरा मानना क्या है, वो अपनी पूर्व टिप्पणी में लिखा हुआ है। अगर अभी भी मेरी बात समझ में नहीं आ रही है तो मानस की ये चौपाई शायद आपकी कुछ सहायता कर सके कि "ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशि॥" दूसरी बात जो आपने कही कि "अगर सभी कुछ ईश्वर होता तो हम आप कितना झूठ बोलते है मार काट करते हैं गलियां बकते हैं…क्या हमारे अन्दर बैठा ईश्वर ऐसा करने दे रहा है…………नहीं" तो जनाब ये बात आपके ईश्वर (जिसे आपके सम्प्रदायानुयायी अल्लाह नाम अभिहित करते हैं) भी लागू होती है। और जब आपकी ही भाषा में "अब उसने अपने मुकम्मल किताब हम इंसानों को अता की है…… अब तो समझ जाओ………… " यह बात कही है, तो ओसामा बिन लादेन, जवाहिरी, बैतूल्ला महसूद, तालिबान और आतंकवादी कृत्य करने वाले वे लोग जो फख्र करते हैं, मुसलमान होने पर, क्यों नहीं समझते????

  25. Pratik Pandey कहते हैं:

    >भाई, मैंने तो किसी रजनीश-समर्थक को कहते नहीं सुना आजतक कि सिर्फ़ वे ही ईश्वर हैं। हाँ, इतना ज़रूर है कि वे भी ईश्वर हैं, क्योंकि हिन्दू धर्म में सभी को साक्षात ईश्वर माना जाता है। वेदवाक्य है – सर्वखल्विदं ब्रह्म नेहनानास्ति किंचन… मतलब कि सभी ब्रह्म यानी ईश्वर हैं। वैसे ही जितने वाक्य आपने उद्धृत किए हैं यहाँ पर, जैसे कि "एकम् ब्रह्म अस्ति द्वितीयो नास्ति" उसका मतलब यह है कि दुनिया में सिर्फ़ एकमात्र ईश्वर ही है, उसके अलावा कोई और नहीं है। यानी सब ईश्वर हैं।आपका भाईचारे और सहिष्णुता को फैलाने का प्रयास सराहनीय है। लेकिन इसलिए हिन्दू शास्त्रों का ग़लत अर्थ करना कितना जायज़ है? अगर क़ुरआन और वेद में फ़र्क़ है, तो उन्हें ज़बरदस्ती खींचतान करके एक मतलब देने की कोशिश करने का क्या फ़ायदा है?

  26. Pratik Pandey कहते हैं:

    >भाई, मैंने तो किसी रजनीश-समर्थक को कहते नहीं सुना आजतक कि सिर्फ़ वे ही ईश्वर हैं। हाँ, इतना ज़रूर है कि वे भी ईश्वर हैं, क्योंकि हिन्दू धर्म में सभी को साक्षात ईश्वर माना जाता है। वेदवाक्य है – सर्वखल्विदं ब्रह्म नेहनानास्ति किंचन… मतलब कि सभी ब्रह्म यानी ईश्वर हैं। वैसे ही जितने वाक्य आपने उद्धृत किए हैं यहाँ पर, जैसे कि "एकम् ब्रह्म अस्ति द्वितीयो नास्ति" उसका मतलब यह है कि दुनिया में सिर्फ़ एकमात्र ईश्वर ही है, उसके अलावा कोई और नहीं है। यानी सब ईश्वर हैं।आपका भाईचारे और सहिष्णुता को फैलाने का प्रयास सराहनीय है। लेकिन इसलिए हिन्दू शास्त्रों का ग़लत अर्थ करना कितना जायज़ है? अगर क़ुरआन और वेद में फ़र्क़ है, तो उन्हें ज़बरदस्ती खींचतान करके एक मतलब देने की कोशिश करने का क्या फ़ायदा है?

  27. उम्दा सोच कहते हैं:

    >Pratik Pandey भाई बिलकुल ठीक कहा आप ने … अगर क़ुरआन और वेद में फ़र्क़ है, तो उन्हें ज़बरदस्ती खींचतान करके एक मतलब देने की कोशिश करने का क्या फ़ायदा है?देखिये न उड़न तश्तरी जैसे वरिष्ठ तक ने इन्हें समझाने की कोशिश की है …अफ़सोस मोटी अकल पर सब बेअसर !!!

  28. उम्दा सोच कहते हैं:

    >Pratik Pandey भाई बिलकुल ठीक कहा आप ने … अगर क़ुरआन और वेद में फ़र्क़ है, तो उन्हें ज़बरदस्ती खींचतान करके एक मतलब देने की कोशिश करने का क्या फ़ायदा है?देखिये न उड़न तश्तरी जैसे वरिष्ठ तक ने इन्हें समझाने की कोशिश की है …अफ़सोस मोटी अकल पर सब बेअसर !!!

  29. ashutoshdeexit कहते हैं:

    >यदि आप पहले ही मान बैठे हैं की आपके माता पिता और उनके भी माता पिता द्वारा स्वीकार्य धर्म या मत ही सर्वश्रेष्ठ है और शांति के लिए बाकी सभी मतों को उसके 'ज्ञान' से एकमत होना ज़रूरी है तो यह पूर्वाग्रह है और कुछ नहीं. वेद या गीता या रामायण कोई ईश्वरीय किताबें नहीं हैं क्योंकि किताबें ईश्वरीय नहीं हो सकती. ये सब पुस्तकें तो सिर्फ हमारे पूर्वज मनीषियों के विचार और दर्शन का दर्शित रूप हैं. हालाँकि हम यह कह सकते हैं की मनुष्य के विचार इश्वर प्रदत्त हैं इसलिए उसके द्वारा रचित किताब भी ईश्वरीय है. किताबों को ज्ञान विज्ञान, दर्शन, तर्क और अध्ययन-अध्यापन के लिए छोड़ दें और उन्हें मानव जीवन का 'ताना-शाह' न बनने दें. रजनीश इश्वर हैं या नहीं यह इश्वर पर ही छोड़ दें, क्योंकि एक दूसरे के मत पर निर्णायक मत रखना ही मतभेद का कारण होता है. अगर उनके अनुयायी उन्हें इश्वर मानते हैं तो दूसरों को तकलीफ किस बात की? और सबको 'सही' मार्ग दिखने ठेका ही 'इस्लाम' के प्रति संशय पैदा करता है. फिर जिसका मत सभी विषयों पर शाश्त्रार्थ की आज्ञा नहीं दे सकता उसे तर्क से परहेज़ ही उचित है. इस्लामिक बैंकिंग, वेद-पुराण, कल्कि अवतार, काबा में कौन (?), मांसाहार की इजाज़त (क्यों और किस-से) , काबा-मीन-टाइम, नमाज़ से तंदुरुस्ती आदि आदि विषय पर आपके लेख मुझे एक ऐसी गाय के प्रयास से ज्यादा कुछ नहीं लगते जो अपने खूंटे से बंधी हुई है पर दुनिया के सामने रंभा-रंभा कर अपना यात्रा वृत्तान्त सुना रही है.

  30. ashutoshdeexit कहते हैं:

    >यदि आप पहले ही मान बैठे हैं की आपके माता पिता और उनके भी माता पिता द्वारा स्वीकार्य धर्म या मत ही सर्वश्रेष्ठ है और शांति के लिए बाकी सभी मतों को उसके 'ज्ञान' से एकमत होना ज़रूरी है तो यह पूर्वाग्रह है और कुछ नहीं. वेद या गीता या रामायण कोई ईश्वरीय किताबें नहीं हैं क्योंकि किताबें ईश्वरीय नहीं हो सकती. ये सब पुस्तकें तो सिर्फ हमारे पूर्वज मनीषियों के विचार और दर्शन का दर्शित रूप हैं. हालाँकि हम यह कह सकते हैं की मनुष्य के विचार इश्वर प्रदत्त हैं इसलिए उसके द्वारा रचित किताब भी ईश्वरीय है. किताबों को ज्ञान विज्ञान, दर्शन, तर्क और अध्ययन-अध्यापन के लिए छोड़ दें और उन्हें मानव जीवन का 'ताना-शाह' न बनने दें. रजनीश इश्वर हैं या नहीं यह इश्वर पर ही छोड़ दें, क्योंकि एक दूसरे के मत पर निर्णायक मत रखना ही मतभेद का कारण होता है. अगर उनके अनुयायी उन्हें इश्वर मानते हैं तो दूसरों को तकलीफ किस बात की? और सबको 'सही' मार्ग दिखने ठेका ही 'इस्लाम' के प्रति संशय पैदा करता है. फिर जिसका मत सभी विषयों पर शाश्त्रार्थ की आज्ञा नहीं दे सकता उसे तर्क से परहेज़ ही उचित है. इस्लामिक बैंकिंग, वेद-पुराण, कल्कि अवतार, काबा में कौन (?), मांसाहार की इजाज़त (क्यों और किस-से) , काबा-मीन-टाइम, नमाज़ से तंदुरुस्ती आदि आदि विषय पर आपके लेख मुझे एक ऐसी गाय के प्रयास से ज्यादा कुछ नहीं लगते जो अपने खूंटे से बंधी हुई है पर दुनिया के सामने रंभा-रंभा कर अपना यात्रा वृत्तान्त सुना रही है.

  31. ashutoshdeexit कहते हैं:

    >मेरी पोस्ट का उत्तर सलीम जी ने मेरी जीमेल पर भेजा है जो मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ…"अब सवाल है कि कौन सा रास्ता ठीक है… अगर जवाब दो शब्दों "हाँ" या "ना" में देना हो तो कोई भी रास्ते का ज्ञाता आपको वाया उन्नाव ही सजेस्ट करेगा…. तो अब या तो सभी रास्ते सही है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर सभी रास्ते गलत है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर इन सबमें कोई एक ही रास्ता सबसे सही और सत्य है (इसकी संभावना ज्यादा प्रबल है) अब कानपुर जाने वाले यात्री को यह तय करना है कि कौन सा रास्ता वह चुने !!! गलत रास्ता या सही रास्ता… इसका जवाब यह भी नहीं हो सकता कि भाई मेरी आस्था फलां रास्ते में और उसी में मुझे संतुष्टि मिलती है तो बात तो ठीक है लेकिन सबसे सत्य और सही रास्ता फिर भी केवल और केवल एक ही है…"———————————–उपरोक्त कथन पर मेरा मत इस प्रकार है…..यह हठधर्मिता है की सही रास्ता केवल एक है…इश्वर तक पहुँचाने के रास्ते 'राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण' ने नहीं बनाये जो केवल एक ही शोर्टेस्ट रास्ता बनाने की अनुमति रही हो. अपने रास्ते को ही सही बताना और बाकी सबको 'कमतर सत्य या कम सही' बताना तो 'धर्मांध' होना है. इस्लाम ही सबसे सटीक मार्ग है, यह प्रमाणपत्र किसने दिया? किसी ने कहा और हम मान लें? गौतम बुद्ध कहते हैं की 'अपने गुरु की बात भी तब तक मत मानो जब तक उसे तर्क की कसौटी पर न कस लो'. इस वैज्ञानिक युग में 'सिर्फ और सिर्फ' उस धर्मं की जगह होगी जो 'तर्क की कसौटी' पर कसे जाने के लिए तैयार होगा…..

  32. ashutoshdeexit कहते हैं:

    >मेरी पोस्ट का उत्तर सलीम जी ने मेरी जीमेल पर भेजा है जो मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ…"अब सवाल है कि कौन सा रास्ता ठीक है… अगर जवाब दो शब्दों "हाँ" या "ना" में देना हो तो कोई भी रास्ते का ज्ञाता आपको वाया उन्नाव ही सजेस्ट करेगा…. तो अब या तो सभी रास्ते सही है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर सभी रास्ते गलत है (ऐसा भी नहीं हो सकता) या फिर इन सबमें कोई एक ही रास्ता सबसे सही और सत्य है (इसकी संभावना ज्यादा प्रबल है) अब कानपुर जाने वाले यात्री को यह तय करना है कि कौन सा रास्ता वह चुने !!! गलत रास्ता या सही रास्ता… इसका जवाब यह भी नहीं हो सकता कि भाई मेरी आस्था फलां रास्ते में और उसी में मुझे संतुष्टि मिलती है तो बात तो ठीक है लेकिन सबसे सत्य और सही रास्ता फिर भी केवल और केवल एक ही है…"———————————–उपरोक्त कथन पर मेरा मत इस प्रकार है…..यह हठधर्मिता है की सही रास्ता केवल एक है…इश्वर तक पहुँचाने के रास्ते 'राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण' ने नहीं बनाये जो केवल एक ही शोर्टेस्ट रास्ता बनाने की अनुमति रही हो. अपने रास्ते को ही सही बताना और बाकी सबको 'कमतर सत्य या कम सही' बताना तो 'धर्मांध' होना है. इस्लाम ही सबसे सटीक मार्ग है, यह प्रमाणपत्र किसने दिया? किसी ने कहा और हम मान लें? गौतम बुद्ध कहते हैं की 'अपने गुरु की बात भी तब तक मत मानो जब तक उसे तर्क की कसौटी पर न कस लो'. इस वैज्ञानिक युग में 'सिर्फ और सिर्फ' उस धर्मं की जगह होगी जो 'तर्क की कसौटी' पर कसे जाने के लिए तैयार होगा…..

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