स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>सचमुच मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं (Muslims are really insidious) !!!???

>

मैंने दो दिन पहले एक लेख पोस्ट लिखी थी जिसके मज़मून का इरादा यह था कि क्या मुसलमान धोखेबाज़ होते हैं? जैसा कि आजकल मिडिया और इस्लाम के आलोचक यह प्रोपगैंडा फैला रहें हैं. वह कुछ ऐसा ही करते जा रहें हैं कि इस्लाम ही है जो दुनिया के लिए खतरा है, यह जाने बिना यह समझे बिना हालाँकि सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि वे सब इस्लाम का विरोध इसलिए तो कतई भी नहीं करते उन्हें इस्लाम के बारे में मालूमात नहीं है बल्कि इसलिए कि पश्चिम देश (जो कि इस्लाम के दुश्मन हैं) के अन्धानुकरण के चलते विरोध करते हैं, आज देश में जैसा माहौल है और जिस तरह से अमेरिका और यूरोप आदि का अन्धानुकरण चल रहा है, ऐसा लगने लगा है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूलते ही जा रहे हैं और यह सब उन लोगों की साजिश के तहत होता जा रहा है. पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता को आत्मसात करने की जो होड़ लगी है, उससे निजात कैसे मिले? उसे कैसे ख़त्म किया जाये? उसे कैसे रोका जाये? मुझे लगता है कि भारत में मुस्लिम ही ऐसे हैं जो अब पश्चिम की भ्रष्ट सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ बोल रहें हैं और उससे अभी तक बचे हुए हैं. वरना बाक़ी भारतीय (जो गैर-मुस्लिम हैं) अमेरिका आदि देशों की चाल में आसानी से फंसते चले जा रहे हैं.


खैर, ऊपर मैंने जो सवाल उठाये हैं उन्हें आप अपने अंतर्मन से पूछिये? आप सोचें कि इनके क्या जवाब हो सकते हैं? वैसे मेरे दिमाग में एक जवाब है हम अपने हिन्दू भाईयों से यह गुजारिश करते हैं कि वे वेदों को पढें, पुराणों को पढें क्यूंकि जहाँ तक मुझे अपने अध्ययन से मालूम चला है कि केवल वेद ही ऐसी किताब है जिसे हमारे हिन्दू भाई ईश्वरीय किताब कहते हैं. और अगर यही है तो मेरा कहना है कि जो भी किताब वेद के खिलाफ़ जाती है उसका बहिस्कार करें, उसे बिलकुल भी न पढें. मैं इधर बैठ कर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि कुरान और वेद की शिक्षाएं ज़्यादातर सामान ही हैं.

मैं ये नहीं कहता कि हमारे और आपके बीच इख्तिलाफ़ (विरोधाभास) नहीं हैं. इख्तिलाफ़ तो है. लेकिन आज हम आपस में उन चीज़ों को आत्मसात करें जो हममे और आपमें यकसां (समान) हों. समानताओं पर आओ. विरोध की बातें कल डिस्कस करेंगे.

अल्लाह त-आला अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब में फरमाता है: “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं. (ताअलौ इला कलिमती सवा-इम बैनना व बैनकुम)” अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३

वैसे मैं ये पोस्ट लिखी है अपने एक ब्लॉग मित्र सुरेश चिपलूनकर से उन सवालों के जवाब में जिसमें उन्होंने कहा कि

सलीम भाई, द्विवेदी जी की बात को आगे बढ़ाईये और इस बात पर एक पोस्ट कीजिये कि क्या मुस्लिम धर्म, दूसरे धर्मों को पूर्ण आदर-सम्मान देता है? धर्म परिवर्तन अक्सर हिन्दू से ईसाई या हिन्दू से मुस्लिम होता है (अधिकांशतः लालच या डर से) तो विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या होने के बावजूद ईसाईयों और मुस्लिमों को अन्य धर्मों से धर्म-परिवर्तन करवाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? ऐसा क्यों होता है कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों को उतने अधिकार नहीं मिलते जितने भारत में अल्पसंख्यकों को मिले हुए हैं? मुस्लिम बहुल देशों में से अधिकतर में “परिपक्व लोकतन्त्र” नहीं है ऐसा क्यों है? सवाल तो बहुत हैं भाई…” और द्विवेदी जी कि टिपण्णी क्या थी “हर कोई अपने धर्म को सब से अच्छा बताता है। यह आप का मानना है कि इस्लाम सब से अच्छा धर्म है। दूसरे धर्मावलंबी इस बात को कतई मानने को तैयार न होंगे। हमें अपने धर्म को श्रेष्ठ मानने का पूरा अधिकार है। लेकिन दूसरे व्यक्ति के विश्वासों का आदर करना भी उतना ही जरूरी है.”

सुरेश भाई, सबसे पहले तो मैं यह आपको बताना चाहता हूँ कि यह इस्लाम धर्म है ना कि मुस्लिम धर्म. इस्लाम धर्म के अनुनाईयों को मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहते हैं. इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शांति’ और इसका एक और अर्थ होता है ‘आत्मसमर्पण‘ और इस्लाम धर्म को मानने वालों को मुस्लिम कहते हैं, उर्दू या हिंदी में मुसलमान कहते हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने भी लोग हैं वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ? (अर्थात नहीं)” सुरह १०, सुरह युनुस आयत (श्लोक) संख्या ९९

कहो: हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाये जो हम पर उतारी है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक और याक़ूब और उनकी संतान पर उतरी उसपर भी. और जो मूसा और ईसा और दुसरे नबियों को उनके रब के ओर से प्रदान हुईं (उस पर भी हम इमान रखते हैं) हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध में अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं.” सुरह ३, सुरह आले इमरान, आयत (श्लोक) ८४

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं. सही बात, नासमझी की बात से अलग हो कर स्पष्ट हो गयी है…” सुरह २, सुरह अल-बकरह, आयत २५६

इस्लाम अल्लाह त-आला (ईश्वर) के नज़दीक सबसे अच्छा दीन (धर्म) है, अल्लाह त-आला के नज़दीक पूरी दुनिया के मनुष्य उसी के बन्दे और पैगम्बर हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक दुसरे को पहचानों और वास्तव अल्लाह के यहाँ तुममे सबसे प्रतिष्ठित वह है जो तुममे सबसे अधिक डर रखता हो, निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है.” सुरह ४९, सुरह अल-हुजुरात, आयत (श्लोक) १३

ऐसी ही सैकणों आयतें अर्थात श्लोक कुरआन में मौजूद हैं. कुल मिला कर लब्बो-लुआब (सारांश) यह है कि इस्लाम धर्म के अनुनायी जिन्हें मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहा जाता है को अल्लाह की तरफ से हिदायत दी गयी है कि वह दीगर मज़ाहब के लोगों के साथ आदर का भाव रक्खो. हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) ने हमें यह ताकीद किया है कि सभी धर्मों के अनुनायीयों को उनके धर्म को मानने की आज़ादी है. साथ ही अल्लाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है.

ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम की आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे.

यह कहना कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहाँ अल्पसंख्यक (दुसरे धर्म के लोगों) को अधिकार नहीं मिलते, बिलकुल भी गलत है, इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन और सुन्नत) में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि दुसरे धर्म के लोगों को उनके रहन-सहन, धार्मिक आस्था और विश्वाश के प्रति गलत व्यवहार करे, बल्कि यह हिदायत ज़रूर है कि उन्हें सत्य मार्ग का रास्ता बताएं.

रही बात लोकतंत्र के सवाल का तो इसका जवाब थोडा बड़ा है फ़िलहाल इतना मैं बताना चाहूँगा कि हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के ज़माने में भी ख़लीफा लोगों का चुनाव होता था. सभी को अधिकार प्राप्त थे.

मैं अपनी पोस्ट कुरआन की इस बात (अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३) पर ख़त्म करना चाहता हूँ कि “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं.

अल्लाह (ईश्वर) हमें सत्यमार्ग पर चलने की हिदायत दे.
सलीम खान

Filed under: मुसलमान

34 Responses

  1. रंजन says:

    >कुरान मैं बहुत अच्छा लिखा होगा.. उससे इंकार नहीं पर उसे मानते कितने लोग है?? वो देश जिनका धर्म इस्लाम है.. सऊदी आदि वहाँ दुसरों को कितनी स्वतंत्रता मिलती है? क्या वो अपने पसंद के कपडे़ वहाँ पहन सकते है? कुरान या इस्लाम उन्हे सहिष्णुता क्यों नहीं सिखाती?ये देखे http://blog.chokherbali.in/2009/07/blog-post_24.html एसे कानुन उन देशों में क्यों होते है जहाँ बहुसंख्यक इस्लाम को मानने वाले है..धर्म चाहे हिन्दु हो, इस्लाम हो, इसाईत हो या कोई भी.. सभी अच्छे है.. कोई गलत नहीं सिखाता, सभी प्यार करना सिखाते है फिर क्यों हम एक दुसरे से बड़ा बनने और दुससे से बेहतर बताने की कोशिश करते है.. क्यों चाहते है कि लोग अपना धर्म छोड़ हमारा धर्म मानें.. खुदा हाफि़ज!!

  2. रंजन says:

    >कुरान मैं बहुत अच्छा लिखा होगा.. उससे इंकार नहीं पर उसे मानते कितने लोग है?? वो देश जिनका धर्म इस्लाम है.. सऊदी आदि वहाँ दुसरों को कितनी स्वतंत्रता मिलती है? क्या वो अपने पसंद के कपडे़ वहाँ पहन सकते है? कुरान या इस्लाम उन्हे सहिष्णुता क्यों नहीं सिखाती?ये देखे http://blog.chokherbali.in/2009/07/blog-post_24.html एसे कानुन उन देशों में क्यों होते है जहाँ बहुसंख्यक इस्लाम को मानने वाले है..धर्म चाहे हिन्दु हो, इस्लाम हो, इसाईत हो या कोई भी.. सभी अच्छे है.. कोई गलत नहीं सिखाता, सभी प्यार करना सिखाते है फिर क्यों हम एक दुसरे से बड़ा बनने और दुससे से बेहतर बताने की कोशिश करते है.. क्यों चाहते है कि लोग अपना धर्म छोड़ हमारा धर्म मानें.. खुदा हाफि़ज!!

  3. >सालीम जी पहले आपको नमस्कार कहना चाहुगां। आपका लेख पढा मै अभी तक यह समझ नही पाया कि आप कहना क्या चाह रहे है? जैसा की आपने शीर्षक दिया है कि क्या मुसलमान धोखेबाज होते है अपने शीर्षक के अनुसार आपने कितना लिख ? आप मुद्दे से भटक गये और साथ ही कुछ एसे बातो का भी जीक्र किया जो की शायद अनुचित है। और आप ये कैसे कह सकते है कि भारत का ख्याल सिर्फ मुस्लिम हि करते है, गैर मुस्लिम नही ?मै आपसे ये इसलिये नही कह रहा हुं कि आप एक मुसलमान है, बल्कि इसलिये कह रहा हुं कि आपने अपने द्वारा लिखे मुद्दे को इक अलग हि मोङ दे ना चाह रहे है जो की सही नही है। मै आपके इस बात से सहमत हु की हमे अपने देश कि सभ्यता को बचाना चाहिये।

  4. >सालीम जी पहले आपको नमस्कार कहना चाहुगां। आपका लेख पढा मै अभी तक यह समझ नही पाया कि आप कहना क्या चाह रहे है? जैसा की आपने शीर्षक दिया है कि क्या मुसलमान धोखेबाज होते है अपने शीर्षक के अनुसार आपने कितना लिख ? आप मुद्दे से भटक गये और साथ ही कुछ एसे बातो का भी जीक्र किया जो की शायद अनुचित है। और आप ये कैसे कह सकते है कि भारत का ख्याल सिर्फ मुस्लिम हि करते है, गैर मुस्लिम नही ?मै आपसे ये इसलिये नही कह रहा हुं कि आप एक मुसलमान है, बल्कि इसलिये कह रहा हुं कि आपने अपने द्वारा लिखे मुद्दे को इक अलग हि मोङ दे ना चाह रहे है जो की सही नही है। मै आपके इस बात से सहमत हु की हमे अपने देश कि सभ्यता को बचाना चाहिये।

  5. >@मिथिलेश जी, चूँकि यह लेख मैंने सुरेश जी की उस टिपण्णी पर लिखा है, जिसका शीर्षक सेम था. हाँ इसे भाग दो कर देता तो बेहतर था… खैर अब तो लिख ही चुका हूँ…थोडी बहुत गलतियाँ तो होती ही हैं… उम्मीद हैं आप इसी तरह हमें बतलाते रहेंगे और गलतियाँ कम होती जायेंगी… धन्यवाद…

  6. >@मिथिलेश जी, चूँकि यह लेख मैंने सुरेश जी की उस टिपण्णी पर लिखा है, जिसका शीर्षक सेम था. हाँ इसे भाग दो कर देता तो बेहतर था… खैर अब तो लिख ही चुका हूँ…थोडी बहुत गलतियाँ तो होती ही हैं… उम्मीद हैं आप इसी तरह हमें बतलाते रहेंगे और गलतियाँ कम होती जायेंगी… धन्यवाद…

  7. >@मिथिलेश जी, चूँकि यह लेख मैंने सुरेश जी की उस टिपण्णी पर लिखा है, जिसका शीर्षक सेम था. हाँ इसे भाग दो कर देता तो बेहतर था… खैर अब तो लिख ही चुका हूँ…थोडी बहुत गलतियाँ तो होती ही हैं… उम्मीद हैं आप इसी तरह हमें बतलाते रहेंगे और गलतियाँ कम होती जायेंगी… धन्यवाद…

  8. >@मिथिलेश जी, चूँकि यह लेख मैंने सुरेश जी की उस टिपण्णी पर लिखा है, जिसका शीर्षक सेम था. हाँ इसे भाग दो कर देता तो बेहतर था… खैर अब तो लिख ही चुका हूँ…थोडी बहुत गलतियाँ तो होती ही हैं… उम्मीद हैं आप इसी तरह हमें बतलाते रहेंगे और गलतियाँ कम होती जायेंगी… धन्यवाद…

  9. Shiv says:

    >आपको इस्लाम की जानकारी है. आप इस्लाम पर अच्छा लिख सकते हैं. अच्छा बोल सकते हैं. लेकिन बाकी बातों को अपने ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करने के लिए जिस तरह की भाषा और विचारों की ज़रुरत है, उसकी जानकारी आपके पास कम है. आप बहुत संवेदनशील मुद्दे पर लिख रहे हैं. ऐसे में यह ज़रूरी है कि आपके द्बारा इस्तेमाल की गई भाषा और विचारों के प्रस्तुतीकरण में कुछ सावधानी बरती जाय.बाकी तो यही कहना चाहूँगा कि आप अपने उद्देश्य में सफल हों, यही कामना है.

  10. >आपको इस्लाम की जानकारी है. आप इस्लाम पर अच्छा लिख सकते हैं. अच्छा बोल सकते हैं. लेकिन बाकी बातों को अपने ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करने के लिए जिस तरह की भाषा और विचारों की ज़रुरत है, उसकी जानकारी आपके पास कम है. आप बहुत संवेदनशील मुद्दे पर लिख रहे हैं. ऐसे में यह ज़रूरी है कि आपके द्बारा इस्तेमाल की गई भाषा और विचारों के प्रस्तुतीकरण में कुछ सावधानी बरती जाय.बाकी तो यही कहना चाहूँगा कि आप अपने उद्देश्य में सफल हों, यही कामना है.

  11. >"………..साथ ही अलाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है. ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम कीई आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे."सलीम साहब क्या उपर्युक्त गद्यांश की भाषा से ही नहीं लगता कि मुसलमानों को डराया जा रहा है कि अगर तुम अपने पडोसी को मुसलमान नहीं बना लोगे तो तुम्हे दोजख की आग में झोंक दिया जायेगा. ऐसे में कोई भी धर्मभीरू मुसलमान विधर्मियों के प्रति सहिष्णु कैसे हो सकता है???हिन्दू धर्म सत्य को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानता. चूँकि वह शाश्वत है अविनाशी है , अतः वह अपनी जगह सदैव उपस्थित है. मनुष्य को मात्र उसके अन्वेषण की आवश्यकता है. तप और योग उसके अन्वेषण के मार्ग हैं. प्रत्येक मनुष्य अपने तरीके से उस सत्य के अन्वेषण हेतु स्वतंत्र है अतः उस पर किसी प्रकार की बाध्यता नही है……….और यही सहिष्णुता का आधार है.

  12. >"………..साथ ही अलाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है. ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम कीई आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे."सलीम साहब क्या उपर्युक्त गद्यांश की भाषा से ही नहीं लगता कि मुसलमानों को डराया जा रहा है कि अगर तुम अपने पडोसी को मुसलमान नहीं बना लोगे तो तुम्हे दोजख की आग में झोंक दिया जायेगा. ऐसे में कोई भी धर्मभीरू मुसलमान विधर्मियों के प्रति सहिष्णु कैसे हो सकता है???हिन्दू धर्म सत्य को ईश्वरीय ज्ञान नहीं मानता. चूँकि वह शाश्वत है अविनाशी है , अतः वह अपनी जगह सदैव उपस्थित है. मनुष्य को मात्र उसके अन्वेषण की आवश्यकता है. तप और योग उसके अन्वेषण के मार्ग हैं. प्रत्येक मनुष्य अपने तरीके से उस सत्य के अन्वेषण हेतु स्वतंत्र है अतः उस पर किसी प्रकार की बाध्यता नही है……….और यही सहिष्णुता का आधार है.

  13. >नहीं ऐसा नहीं है, इस्लाम को मानना या ना मानना उसके ऊपर है, हम मुसलमान का काम है केवल इस्लाम की दावत देना, अगर मुसलमान अपने पडोसी या जिस किसी को यह दावत देता है तो उसका फ़र्ज़ पूरा हो गया, अब दावत पाने वाले पर निर्भर है कि वह इसे किस रूप में लेता है….और अल्लाह बेहतर जानने वाला और हिदायत वाला है, वह जिसे चाहता है हिदायत देता है…

  14. >नहीं ऐसा नहीं है, इस्लाम को मानना या ना मानना उसके ऊपर है, हम मुसलमान का काम है केवल इस्लाम की दावत देना, अगर मुसलमान अपने पडोसी या जिस किसी को यह दावत देता है तो उसका फ़र्ज़ पूरा हो गया, अब दावत पाने वाले पर निर्भर है कि वह इसे किस रूप में लेता है….और अल्लाह बेहतर जानने वाला और हिदायत वाला है, वह जिसे चाहता है हिदायत देता है…

  15. >@शिव कुमार जी, आपका धन्यवाद, सजेशन देने के लिए. इंशा अल्लाह मैं अपनी भाषा को और अधिक मज़बूत करूँगा…ताकी उन लोगों तक सार्थक बात पहुँच सके जो इसे वाकई समझना चाहते हैं….ईश्वर हम सबको अच्छी राह का राहगीर बनाये…

  16. >@शिव कुमार जी, आपका धन्यवाद, सजेशन देने के लिए. इंशा अल्लाह मैं अपनी भाषा को और अधिक मज़बूत करूँगा…ताकी उन लोगों तक सार्थक बात पहुँच सके जो इसे वाकई समझना चाहते हैं….ईश्वर हम सबको अच्छी राह का राहगीर बनाये…

  17. >@निशाचर जी, सबसे पहली बात तो यह है कि हिन्दू शब्द की सार्थकता क्या है? क्यूंकि हिन्दू शब्द की परिभाषा क्या है? वैसे मैं अपने आपको हिन्दू कहलाने में कोई परहेज़ नहीं करता क्यूंकि हिन्दू एक भौगोलिक शब्द है न कि धार्मिक !मेरा लेख पढें, जो कि अख़बार में भी छाप चूका है.."हाँ, मैं सलीम खान हिन्दू हूँ!!!

  18. >@निशाचर जी, सबसे पहली बात तो यह है कि हिन्दू शब्द की सार्थकता क्या है? क्यूंकि हिन्दू शब्द की परिभाषा क्या है? वैसे मैं अपने आपको हिन्दू कहलाने में कोई परहेज़ नहीं करता क्यूंकि हिन्दू एक भौगोलिक शब्द है न कि धार्मिक !मेरा लेख पढें, जो कि अख़बार में भी छाप चूका है.."हाँ, मैं सलीम खान हिन्दू हूँ!!!

  19. >सलीम साहब, अगर आप हिन्दू शब्द को भौगोलिक अर्थों में ही रूढ़ करना चाहते है तो हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कह सकते हैं. जी हाँ, भारतभूमि पर रहने वाले सभी हिन्दू ही हैं, परन्तु वे इसे स्वीकारते नहीं है. अलग पहचान की जिद और उनकी असहिष्णुता ही सनातनधर्मियों को भी कट्टरता की राह पकड़ने को मजबूर कर रही है.

  20. >सलीम साहब, अगर आप हिन्दू शब्द को भौगोलिक अर्थों में ही रूढ़ करना चाहते है तो हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कह सकते हैं. जी हाँ, भारतभूमि पर रहने वाले सभी हिन्दू ही हैं, परन्तु वे इसे स्वीकारते नहीं है. अलग पहचान की जिद और उनकी असहिष्णुता ही सनातनधर्मियों को भी कट्टरता की राह पकड़ने को मजबूर कर रही है.

  21. >इस्लाम की अधिक परेशानी यही रही है, कि उसे कभी समझा ही नहीं गया, हम हमेशा अनुयायिओं से ही शिक्षा ले रहे हैं, कभी इसरार अहमद कभी जाकिर नायक से। मगर हमने कभी कुरान,अहादीस,तारीखे इस्लाम उठाकर भी नहीं देखी, हमारे समस्त उदाहरण ओसामा,ज़रदारी,पाकिस्तान के मौजूदा हालात, या अधिक से अधिक आतंवाद तक सीमित हैं। इस्लाम अल्लाह के लिए समर्पित है, और अपने समर्पणता को अन्य सभी बातों से ऊपर मानता है। आज के वक्त जो पाश्चात्य संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, हिंदुत्व के नारे लगा रहे हैं, उनसे पूछना चाहिए कि उनकी ख़ुद कि कार्यप्रणाली क्या है ? एवं यह भी कि एक बार बताया जाए कि भारतीय संस्कृति क्या है। संस्कृति पत्थर नहीं है जो एक जगह पर सदैव जमा रहे, वक्त की मार उसे अपने अनुसार ढालती है, और उसे न अपनाना हमारी गलती है। यदि पाश्चात्य अथवा अन्य देशों से रास्ते बंद कर लिए जायें तो क्या जवाब है कि क्या हमारे पास इतने संसाधन हैं जो हमारे या भारतीयों के भविष्य को संतुष्ट कर सकें। या फ़िर धर्म तथा विद्रोह से ही भारत उठ पड़ेगा। ऐ आर रहमान के ओस्कर जीतने पर भारतीय संस्कृति के नारे लगाये जा रहे थे, इन लोगों से पूछना था कि क्या है भारतीय संस्कृति ? सिर्फ़ कोरा हुल्लड़, और रंगीन नारे और कुछ झंडे। धर्मों कि लडाई सदैव होती रही है और रहेगी, मगर बुद्धिमानी इसमें ही है कि हम क्या कर सकते हैं, देश के लिए। मुझे नहीं लगता कि जाकिर हुसैन,ऐ आर रहमान,अब्दुल कलाम,राही मासूम रज़ा वगैरह ने कभी किसी पाश्चात्य संस्कृति का विरोध किया, या किसी हिंदू मुस्लिम दंगे में शामिल हुए। उन्होंने अपना कार्य किया और इसी आधार पर वे दुनिया में भारत के नाम पर छाये हुए हैं। और उन्हें कभी कुरान या वेद की किसी आयत अथवा ऋचा को दोहराने कि ज़रूरत नहीं पड़ी.उनका कार्य ही उनका ईमान है उनका विश्वास है।Nishant kaushikनिशांत कौशिक

  22. >इस्लाम की अधिक परेशानी यही रही है, कि उसे कभी समझा ही नहीं गया, हम हमेशा अनुयायिओं से ही शिक्षा ले रहे हैं, कभी इसरार अहमद कभी जाकिर नायक से। मगर हमने कभी कुरान,अहादीस,तारीखे इस्लाम उठाकर भी नहीं देखी, हमारे समस्त उदाहरण ओसामा,ज़रदारी,पाकिस्तान के मौजूदा हालात, या अधिक से अधिक आतंवाद तक सीमित हैं। इस्लाम अल्लाह के लिए समर्पित है, और अपने समर्पणता को अन्य सभी बातों से ऊपर मानता है। आज के वक्त जो पाश्चात्य संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, हिंदुत्व के नारे लगा रहे हैं, उनसे पूछना चाहिए कि उनकी ख़ुद कि कार्यप्रणाली क्या है ? एवं यह भी कि एक बार बताया जाए कि भारतीय संस्कृति क्या है। संस्कृति पत्थर नहीं है जो एक जगह पर सदैव जमा रहे, वक्त की मार उसे अपने अनुसार ढालती है, और उसे न अपनाना हमारी गलती है। यदि पाश्चात्य अथवा अन्य देशों से रास्ते बंद कर लिए जायें तो क्या जवाब है कि क्या हमारे पास इतने संसाधन हैं जो हमारे या भारतीयों के भविष्य को संतुष्ट कर सकें। या फ़िर धर्म तथा विद्रोह से ही भारत उठ पड़ेगा। ऐ आर रहमान के ओस्कर जीतने पर भारतीय संस्कृति के नारे लगाये जा रहे थे, इन लोगों से पूछना था कि क्या है भारतीय संस्कृति ? सिर्फ़ कोरा हुल्लड़, और रंगीन नारे और कुछ झंडे। धर्मों कि लडाई सदैव होती रही है और रहेगी, मगर बुद्धिमानी इसमें ही है कि हम क्या कर सकते हैं, देश के लिए। मुझे नहीं लगता कि जाकिर हुसैन,ऐ आर रहमान,अब्दुल कलाम,राही मासूम रज़ा वगैरह ने कभी किसी पाश्चात्य संस्कृति का विरोध किया, या किसी हिंदू मुस्लिम दंगे में शामिल हुए। उन्होंने अपना कार्य किया और इसी आधार पर वे दुनिया में भारत के नाम पर छाये हुए हैं। और उन्हें कभी कुरान या वेद की किसी आयत अथवा ऋचा को दोहराने कि ज़रूरत नहीं पड़ी.उनका कार्य ही उनका ईमान है उनका विश्वास है।Nishant kaushikनिशांत कौशिक

  23. >इस्लाम के बारे में इसी तरह सही जानकारी दे देते रहिए। सही जानकारी लोगों को पास ला सकती है।

  24. >इस्लाम के बारे में इसी तरह सही जानकारी दे देते रहिए। सही जानकारी लोगों को पास ला सकती है।

  25. L.Goswami says:

    >ह्म्म्.. पढ़ा जा रहा है ..आप आगे लिखिए ..ईश्वर आपकी लेखनी को पूर्वाग्रहों से मुक्त रखने में आपकी सहायता करे.

  26. >ह्म्म्.. पढ़ा जा रहा है ..आप आगे लिखिए ..ईश्वर आपकी लेखनी को पूर्वाग्रहों से मुक्त रखने में आपकी सहायता करे.

  27. >भाई यह तुम किन लोगों से उलझ रहे हो आप तो quran (क़ुरआन) शब्द कैसे लिखा जाता है जानकर भी गलत तरीके से अर्थात कुरान लिख रहे हो, दूसरों से तो किया कहूँ, जब कभी फुरसत में मैं इस्लाम दुशमनों को कमेंटस देना होता है तो गूगल में 'कुरान' लिखकर ढूंडता हूँ, अच्छे लेख पढने होते हैं तो , कुरआन लिखकर ढूंडता हूँ, अब आप सोच लो आप के लेख जाहिलों में मिलेंगे जो कुरआन शब्द ठीक से नहीं लिख सकते और चले हैं कुरआन पर बहस करने,रही बात चिपलूनकर की औरंगजेब वाली उनकी रिसर्च का हाल उनके ब्लाग में जाकर देख लो,अल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.com (Rank-2)कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  28. >भाई यह तुम किन लोगों से उलझ रहे हो आप तो quran (क़ुरआन) शब्द कैसे लिखा जाता है जानकर भी गलत तरीके से अर्थात कुरान लिख रहे हो, दूसरों से तो किया कहूँ, जब कभी फुरसत में मैं इस्लाम दुशमनों को कमेंटस देना होता है तो गूगल में 'कुरान' लिखकर ढूंडता हूँ, अच्छे लेख पढने होते हैं तो , कुरआन लिखकर ढूंडता हूँ, अब आप सोच लो आप के लेख जाहिलों में मिलेंगे जो कुरआन शब्द ठीक से नहीं लिख सकते और चले हैं कुरआन पर बहस करने,रही बात चिपलूनकर की औरंगजेब वाली उनकी रिसर्च का हाल उनके ब्लाग में जाकर देख लो,अल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.com (Rank-2)कल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com (Rank-1)

  29. >qamar bhai, main darasal google indic pe type karke likhta hoon aur main puri koshish karta hoon ki कुरआन hi ho…

  30. >qamar bhai, main darasal google indic pe type karke likhta hoon aur main puri koshish karta hoon ki कुरआन hi ho…

  31. >अगर तुम मानते हो इस्लाम इस देश में बड़ी कॉम है तो मुसलमानों से कहो खुद को अल्पसंख्यक कहना बंद करे !!मुसलमान पहले तो इस्लाम के नाम पर अलग देश मांग चुके है अब सारे मांग नाजायज़ है ,जिसे सब इस्लाम के मुताबिक चाहिए वो जाए पाकिस्तान जा के बस जाए ,वहा सब सरियत के मुताबिक मिलेगा !!!या फिर एक काम करो …शरियत के मुताबिक चार शादी का हक़ चाहिए तुम्हे , और वन्दे मातरम भी तुम्हे गवारा नहीं तो सज़ा वाले मामले में क्यों शरियत की मांग नहीं करते हो क्यों नहीं कहते हो जो मुसलमान चोरी करते पकडा जाए उसके दोनों हाथ कलाई से काट दो ??? ,साउदी वाला कानून मांगो अपने लिए अगर तुम दोगले नहीं हो तो ??? नसबंदी तुम्हे मंज़ूर नहीं अल्लाह ने कहा है "तागैयल खल्द उलाह " यानी अल्लाह की बनावट से छेड़ छाड़ नहीं करनी चाहिए,तो बवासीर और हार्निया का ओपरेशन,बाईपास सर्जरी और सिजेरियन डेलेवेरी क्यों करवाते हो ?यानि फ़ायदा जहा होगा तुम्हारा वहा सिर्फ बाप को बाप बोलोगे ,जहा नुकसान होता दिखे तुंरत पडोसी का हाथ थाम कर पापा पापा बोल के झूलने लगोगे !ज़ाकिर फर्जी है! इस विडियो में देखो सूअर खाने वालो के डिजाइन के कपडे पहने है और तो और देखो पैंट भी एड्हियो तक लम्बी है मै शुरू से कह रहा हूँ के वो ईमान का मुकम्मल है ही नहीं आज अंग्रेजी कपडे पहने दिख रहा है ज़रूर गोस्त भी अंग्रेजो वाले खाता होगा,छुप कर ज़रूर हरकत भी वही करता होगा

  32. >अगर तुम मानते हो इस्लाम इस देश में बड़ी कॉम है तो मुसलमानों से कहो खुद को अल्पसंख्यक कहना बंद करे !!मुसलमान पहले तो इस्लाम के नाम पर अलग देश मांग चुके है अब सारे मांग नाजायज़ है ,जिसे सब इस्लाम के मुताबिक चाहिए वो जाए पाकिस्तान जा के बस जाए ,वहा सब सरियत के मुताबिक मिलेगा !!!या फिर एक काम करो …शरियत के मुताबिक चार शादी का हक़ चाहिए तुम्हे , और वन्दे मातरम भी तुम्हे गवारा नहीं तो सज़ा वाले मामले में क्यों शरियत की मांग नहीं करते हो क्यों नहीं कहते हो जो मुसलमान चोरी करते पकडा जाए उसके दोनों हाथ कलाई से काट दो ??? ,साउदी वाला कानून मांगो अपने लिए अगर तुम दोगले नहीं हो तो ??? नसबंदी तुम्हे मंज़ूर नहीं अल्लाह ने कहा है "तागैयल खल्द उलाह " यानी अल्लाह की बनावट से छेड़ छाड़ नहीं करनी चाहिए,तो बवासीर और हार्निया का ओपरेशन,बाईपास सर्जरी और सिजेरियन डेलेवेरी क्यों करवाते हो ?यानि फ़ायदा जहा होगा तुम्हारा वहा सिर्फ बाप को बाप बोलोगे ,जहा नुकसान होता दिखे तुंरत पडोसी का हाथ थाम कर पापा पापा बोल के झूलने लगोगे !ज़ाकिर फर्जी है! इस विडियो में देखो सूअर खाने वालो के डिजाइन के कपडे पहने है और तो और देखो पैंट भी एड्हियो तक लम्बी है मै शुरू से कह रहा हूँ के वो ईमान का मुकम्मल है ही नहीं आज अंग्रेजी कपडे पहने दिख रहा है ज़रूर गोस्त भी अंग्रेजो वाले खाता होगा,छुप कर ज़रूर हरकत भी वही करता होगा

  33. S.M.MAsum says:

    >आज इस बात की अधिक ज़रुरत है की सच्चा मुसलमान कौन है यह कुरान और मोहम्मद (स.अ.व) और उनके घराने की सीरत से पहचाना जाए और उसे दूसरी कौम के लोगों तक भी पहुँचाया जाए ,जिस से लोगों के दिलूँ में आपस में मुहब्बत और भाईचारा पैदा हो और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली इस्लाम विरोधी साजिश ,जिसका मकसद मुसलमानों के लिए लोगों के दिलों में नफरत पैदा करना है ,बेनकाब हो जाए और इंसानियत की विजय हो।

  34. >आज इस बात की अधिक ज़रुरत है की सच्चा मुसलमान कौन है यह कुरान और मोहम्मद (स.अ.व) और उनके घराने की सीरत से पहचाना जाए और उसे दूसरी कौम के लोगों तक भी पहुँचाया जाए ,जिस से लोगों के दिलूँ में आपस में मुहब्बत और भाईचारा पैदा हो और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली इस्लाम विरोधी साजिश ,जिसका मकसद मुसलमानों के लिए लोगों के दिलों में नफरत पैदा करना है ,बेनकाब हो जाए और इंसानियत की विजय हो।

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