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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>क्या गैर-मुस्लिम पर इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है?

>हर काफ़िर पर चाहे वह ईसाई या यहूदी ही क्यूँ न हो, इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है, क्यूंकि अल्लाह त-आला अपनी किताब में फरमाता है:


“(ऐ मुहम्मद ! ) आप कह दीजिये कि ऐ लोगों! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का भेजा हुआ पैगम्बर हूँ, जो असमानों और ज़मीन का बादशाह है, उसके अतिरिक्त कोई (सच्चा) पूज्य नहीं, वही मारता है वही जीलाता है. इसलिए तुम अल्लाह पर और उसके रसूल, उम्मी (अनपढ़) पैग़म्बर पर ईमान लाओ, जो स्वयं भी अल्लाह पर और उसके कलाम पर ईमान रखते हैं, और उनकी पैरवी करो ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त करो.” (सूरतुल आराफ़: १५८)

अतः तमाम लोगों पर अनिवार्य है कि वे अल्लाह के पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान लायें, किन्तु इस्लाम धर्म ने अल्लाह त-आला की दया और हिक़मत से गैर-मुस्लिमों के लिए इस बात को भी जाईज़ ठहराया कि वो अपने धर्म पर बाक़ी रहें. इस शर्त के साथ कि वह मुसलमानों के नियमों के अधीन रहें, अल्लाह त-आला का फरमान है:

“जो लोग अहले-क़िताब (यानि यहूदी और ईसाई) में से अल्लाह पर ईमान नहीं लाते और न आखिरत के दिन पर विश्वास करते है और न उन चीज़ों को हराम समझते हैं जो अल्लाह और उसके पैग़म्बर ने हराम घोषित किये हैं और न सत्य धर्म को स्वीकारते हैं, उनसे जंग करों यहाँ तक वह अपमानित हो अपने हाथ से जिज़्या दें दे.” (सूरतुल तौबा: २९)

सहीह हदीस में बुरौदा रज़िअल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम जब किसी लश्कर (फौज) या सर्रिया (फौजी दस्ता जिसमें आप शरीक न रहें हो) का अमीन नियुक्त करते तो तो आप उसे अल्लाह त-आला से डरने और अपने सह-यात्री मुसलमानों के साथ भलाई और शुभ चिंता का आदेश देते और फरमाते:

“उन्हें तीन बातों की ओर बुलाओ (विकल्प दो) वह उनमें से जिसको भी स्वीकार कर लें, तुम उनकी ओर से उसको कुबूल कर लो और उन से (जंग करने से) रुक जाओ.” (सहीह मुस्लिम हदीस नं. १७३१)

इन तीन बातों में से एक यह है कि वह जिज़्या दें. इसलिए बुद्धिजीवियों के कथनों में से उचित कथन के अनुसार यहूदियों एवं ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से भी जिज़्या स्वीकार किया जाये.

सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ.

अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है.

लेख संग्रहकर्ता: सलीम खान

Filed under: इस्लाम

8 Responses

  1. >सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ.वर्ना (ईमानवालों को) मजबूरन उनके साथ जंग, कत्लेआम और सख्ती का सहारा लेना पड़ेगा. और सुन लो (काफिरों), अगर तुमने हुकुकी मज़हबी फरमान की तौहीन की तो (तुम्हारा) कत्ल करके तुम्हारी (परिवार की) माँ बहन बेटियों को (लूट के माल की तरह) जबरन ईमानवालों को सौंप दिया जाएगा. क्योंकि मजहबे पाक में यह इसे (सबसे बड़ी) नेकियों में गिना जाता है. यही मजहबे पाक का पैगामेपाक (स्वच्छ सन्देश) है. अल्लाह इन (नापाक और ईमान से खाली) काफिरों को अक्ल बक्शे, आमीन.

  2. >सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ.वर्ना (ईमानवालों को) मजबूरन उनके साथ जंग, कत्लेआम और सख्ती का सहारा लेना पड़ेगा. और सुन लो (काफिरों), अगर तुमने हुकुकी मज़हबी फरमान की तौहीन की तो (तुम्हारा) कत्ल करके तुम्हारी (परिवार की) माँ बहन बेटियों को (लूट के माल की तरह) जबरन ईमानवालों को सौंप दिया जाएगा. क्योंकि मजहबे पाक में यह इसे (सबसे बड़ी) नेकियों में गिना जाता है. यही मजहबे पाक का पैगामेपाक (स्वच्छ सन्देश) है. अल्लाह इन (नापाक और ईमान से खाली) काफिरों को अक्ल बक्शे, आमीन.

  3. >kripaya पैगामेपाक ko पैगाम-ए-पाप padha jaaye.

  4. >kripaya पैगामेपाक ko पैगाम-ए-पाप padha jaaye.

  5. >भाई, तुहारे दो आलेख "भगवद्गीता…" और "भगवान्‌ रजनीश" को पढ़कर तो लगा कि शायद थोड़ी-बहुत अक्ल है लेकिन अंततोगत्वा तुहारे इस आलेख को पढ़कर यह पता चल गया कि तुम्हारा तथाकथित मजहब-ए-इस्लाम (जो कि निहायत ही दुनिया का सबसे पाशविक सम्प्रदाय है), तुम और तुम जैसी घटिया लोग कुछ और नहीं सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, जिन्हें अपना मल-मूत्र खाने से भी परहेज नहीं होता. तुम जैसे म्लेच्छ लोग ऐसा ही सोच सकते हैं। यह शुक्र मनाओ कि भारत देश कि बहुसंख्यक आबादी इतनी सहिष्णु है जो कि तुम जैसे निहायत ही मध्यकालीन मुस्लिम आक्रांताओं की सोच वालों को भी सड़क पर इधर-उधर मुंह मारने वाले एक आवारा कुत्ता समझ कर छोड़ देती है. लानत है ऐसी बात कहने वाले तुम्हारे अल्लाह और उसके मुहम्मद नामक अनपढ़, क्रूर, जाहिल, गंवार, एक छोटी बच्ची को साठ साल की उम्र में अपनी बीबी बनाने वाले घटिया दूत पर. छीः छीः …..

  6. >भाई, तुहारे दो आलेख "भगवद्गीता…" और "भगवान्‌ रजनीश" को पढ़कर तो लगा कि शायद थोड़ी-बहुत अक्ल है लेकिन अंततोगत्वा तुहारे इस आलेख को पढ़कर यह पता चल गया कि तुम्हारा तथाकथित मजहब-ए-इस्लाम (जो कि निहायत ही दुनिया का सबसे पाशविक सम्प्रदाय है), तुम और तुम जैसी घटिया लोग कुछ और नहीं सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, जिन्हें अपना मल-मूत्र खाने से भी परहेज नहीं होता. तुम जैसे म्लेच्छ लोग ऐसा ही सोच सकते हैं। यह शुक्र मनाओ कि भारत देश कि बहुसंख्यक आबादी इतनी सहिष्णु है जो कि तुम जैसे निहायत ही मध्यकालीन मुस्लिम आक्रांताओं की सोच वालों को भी सड़क पर इधर-उधर मुंह मारने वाले एक आवारा कुत्ता समझ कर छोड़ देती है. लानत है ऐसी बात कहने वाले तुम्हारे अल्लाह और उसके मुहम्मद नामक अनपढ़, क्रूर, जाहिल, गंवार, एक छोटी बच्ची को साठ साल की उम्र में अपनी बीबी बनाने वाले घटिया दूत पर. छीः छीः …..

  7. >मेरी पूर्वोक्त टिप्पणी पर सलीम मियां ने यहीं टिप्पणी न कर फिर से एक मेल भेजी है, जिसमें उन्होने कहा है कि "हालाँकि मैं कभी भी किसी को गालियों में जवाब नहीं देता हूँ….लेकिन पता नहीं क्यूँ तुम्हें माँ-बहन की गाली देने का माँ कर रहा है फिर भी मैं नहीं दूंगा…"। खैर, मुझे इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता । पाठकों, अब आगे भी इनके मेल से झलकता इनका "स्वच्छ संदेश" (क्या वाकई??) का नमूना देखिए।आगे जब उनके आलेख के इस अंश –>=========="उन्हें तीन बातों की ओर बुलाओ (विकल्प दो) वह उनमें से जिसको भी स्वीकार कर लें, तुम उनकी ओर से उसको कुबूल कर लो और उन से (जंग करने से) रुक जाओ." (सहीह मुस्लिम हदीस नं. १७३१)इन तीन बातों में से एक यह है कि वह जिज़्या दें. इसलिए बुद्धिजीवियों के कथनों में से उचित कथन के अनुसार यहूदियों एवं ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से भी जिज़्या स्वीकार किया जाये.सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ. अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है. ==========को पढ़कर मैंने अपनी पूर्व टिप्पणी में यह लिखा कि "लानत है ऐसी बात कहने वाले तुम्हारे अल्लाह और उसके मुहम्मद नामक अनपढ़, क्रूर, जाहिल, गंवार, एक छोटी बच्ची को साठ साल की उम्र में अपनी बीबी बनाने वाले घटिया दूत पर. छीः छीः ….." तो मियां सलीम का दिमाग ऐसा बौराया कि जनाब अपना आपा ही भूल गए और लिख दिया मुझे एक गालियों वाला मेल । मियां साहिब, काहे पगला गए हो, ब्लॉग तुम्हारा है, यहीं काहे नहीं अपना प्रत्युत्तर लिखते हो, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग तुम्हारी गंदी मानसिकता के दर्शन कर सकें??उस मेल में एक जगह लिखते है कि- "(मैं अपनी प्रकृति के विरुद्ध पहली बार ऐसी टिपण्णी कर रहा हूँ……..)" । तो हे शृगाल महाराज (यहां शृगाल अर्थात सियार का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं कि जैसे सियार जब मूड होता है हुआं-हुआं करने लगता है, वैसे ही ये मियां साहिब भी अपने मूडानुसार हुआं-हुआं करने लगते हैं), जब किसी को व्यक्तिगत रूपेण मेल किया जाता है तो उसे "टिप्पणी" नहीं कहा जाता। जो मैं यहां अपनी बात चिपिया रहा हूं ना, वह "टिप्पणी" नाम से अभिहित होती है। आई कि नहीं मेरी बात समझ में हे लादेन, तालिबान इत्यादि के मानसिक पुत्र ???

  8. >मेरी पूर्वोक्त टिप्पणी पर सलीम मियां ने यहीं टिप्पणी न कर फिर से एक मेल भेजी है, जिसमें उन्होने कहा है कि "हालाँकि मैं कभी भी किसी को गालियों में जवाब नहीं देता हूँ….लेकिन पता नहीं क्यूँ तुम्हें माँ-बहन की गाली देने का माँ कर रहा है फिर भी मैं नहीं दूंगा…"। खैर, मुझे इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता । पाठकों, अब आगे भी इनके मेल से झलकता इनका "स्वच्छ संदेश" (क्या वाकई??) का नमूना देखिए।आगे जब उनके आलेख के इस अंश –>=========="उन्हें तीन बातों की ओर बुलाओ (विकल्प दो) वह उनमें से जिसको भी स्वीकार कर लें, तुम उनकी ओर से उसको कुबूल कर लो और उन से (जंग करने से) रुक जाओ." (सहीह मुस्लिम हदीस नं. १७३१)इन तीन बातों में से एक यह है कि वह जिज़्या दें. इसलिए बुद्धिजीवियों के कथनों में से उचित कथन के अनुसार यहूदियों एवं ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से भी जिज़्या स्वीकार किया जाये.सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ. अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है. ==========को पढ़कर मैंने अपनी पूर्व टिप्पणी में यह लिखा कि "लानत है ऐसी बात कहने वाले तुम्हारे अल्लाह और उसके मुहम्मद नामक अनपढ़, क्रूर, जाहिल, गंवार, एक छोटी बच्ची को साठ साल की उम्र में अपनी बीबी बनाने वाले घटिया दूत पर. छीः छीः ….." तो मियां सलीम का दिमाग ऐसा बौराया कि जनाब अपना आपा ही भूल गए और लिख दिया मुझे एक गालियों वाला मेल । मियां साहिब, काहे पगला गए हो, ब्लॉग तुम्हारा है, यहीं काहे नहीं अपना प्रत्युत्तर लिखते हो, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग तुम्हारी गंदी मानसिकता के दर्शन कर सकें??उस मेल में एक जगह लिखते है कि- "(मैं अपनी प्रकृति के विरुद्ध पहली बार ऐसी टिपण्णी कर रहा हूँ……..)" । तो हे शृगाल महाराज (यहां शृगाल अर्थात सियार का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं कि जैसे सियार जब मूड होता है हुआं-हुआं करने लगता है, वैसे ही ये मियां साहिब भी अपने मूडानुसार हुआं-हुआं करने लगते हैं), जब किसी को व्यक्तिगत रूपेण मेल किया जाता है तो उसे "टिप्पणी" नहीं कहा जाता। जो मैं यहां अपनी बात चिपिया रहा हूं ना, वह "टिप्पणी" नाम से अभिहित होती है। आई कि नहीं मेरी बात समझ में हे लादेन, तालिबान इत्यादि के मानसिक पुत्र ???

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