स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

Icon

सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>समलैंगिकता ईश्वर के क़ानून के खिलाफ़ है

>


बीते गुरुवार (यौमुल खमीस) को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश एपी शाह और न्यायधीश एस मुरलीधर की पीठ ने यह फ़ैसला सुना दिया कि समलैंगिकता अब अपराध नहीं और आपसी सहमती से इस प्रकार के बनाये गए सम्बन्ध में कोई बात गैर-क़ानूनी नहीं. (कु)तर्क यह था न्यायधीशों का कि “भेदभाव समानता के खिलाफ़ है और यह फ़ैसला समानता को मान्यता देता है जो हर व्यक्ति को एक गरिमा प्रदान करेगा”. कोर्ट के इस फ़ैसले पर जिस प्रकार से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आईं वह लाज़मी थी.

वैसे एक बात मुझे पहली बार अच्छी लगी कि भारत की दो बड़ी कौमें हिन्दू व मुसलमानों ने एक जुट हो कर इस फैसले का विरोध किया (मेरा मानना है कि अगर इसी तरह अमेरिका और पश्चिम का अन्धानुकरण को साथ मिलकर नकारा जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि भारत जल्द ही विश्वशक्ति बन जायेगा).

भाजपा के एक बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी का बयान काबिले तारीफ रहा, उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से बड़ी संसद है अर्थात संसद न्यायपालिका से उपर है. सिर्फ एक या दो न्यायधीश (शायेद वह समलैंगिक ही हों) सब कुछ तय नहीं कर सकते हैं.

बाबा रामदेव ने कहा कि इस प्रकार तो कुल ही नष्ट हो जायेंगे. अगर सरकार नहीं चेती तो आन्दोलन किया जायेगा”

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह फ़ैसला भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ तो है ही इस्लाम के नज़र में भी हराम है. कुरान में जिक्र है कि एक ज़माने में हज़रत लूत की कौम थी, और वे लोग आपस में एक ही लिंग के प्रति आकर्षित थे. अल्लाह के आदेश पर हज़रत लूत ने अपनी कौम को समझाया और उन्हें यह शिक्षा देने की कोशिश की कि यह अप्राकृतिक है और अल्लाह के नज़दीक खतरनाक गुनाह जिसका अजाब भयानक होगा. लेकिन उनकी कौम ने नहीं माना और अल्लाह ने उन पर पत्थरों की बारिश करके पूरी की पूरी कौम को ख़त्म कर दिया. (जिस तरह से देह व्यापार या अप्राकृतिक यौन संबंधों को वैध ठहराने वाले यह सबक ले सकते है कि एड्स जैसी लाइलाज खतरनाक बीमारी के रूप में ईश्वर इन्सान के सामने अपनी निशानियाँ भेज देता है)
किसी ने कहा है कि किसी देश को बरबाद करना हो तो वहां के युवा वर्ग को बरबाद कर दो देश खुद ब खुद बरबाद हो जाएगा।

अमेरिका का अन्धानुकरण इस प्रकार कि अपने देश के कानून में ही बदलाव किया जा रहा है…कोर्ट ने १४९ साल पुराने क़ानून के उन प्रावधानों को बुनियादी अधिकारों के खिलाफ बताया है जिनके तहत समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में आता था. न्यायधीशों ने भारत के संविधान की धरा ३७७ को ही गलत करार दिया. हालाँकि पीठ ने यह भी साफ कर दिया है कि समलैंगिकता को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७, असहमति अवयस्कता और अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध के मामले जारी रहेंगे. आईपीसी की धाराएँ इसे अपराध मानती हैं और कोर्ट नहीं मानता यह दोगलापन क्यूँ?


आखिर बुनियादी अधिकार क्या क्या है? यही कि समय समय इसे बदला जाता रहे. आज भी बुनियादी अधिकार रोटी कपडा और मकान ही है. आज भी देश की ७०% जनता गरीब है उसे सलैंगिकता से कोई लेना देना नहीं. उन्हें रोटी चाहिए, मकान चाहिए और चाहिए पहनने को कपडा…

समलैंगिकता अगर अप्राकृतिक नहीं होती तो पूरी दुनिया में किसी ना किसी जानवर में यह आदत ज़रूर होती.

वैसे अभी यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया है इसलिए केवल दिल्ली की सीमा के अन्दर ही यह क़ानून लागु होगा…जब तक की देश के अलग हिस्सों में भी ऐसा फैसला नहीं आ जाता.(अगर प्रतिशत की बात करें तो आंकडों ? के मुताबिक (पता नहीं कहाँ से आंकडें आ गए) २५ लाख से ज़्यादा लोग समलैगिक हैं इस प्रकार मात्र 0.२५% ही लोग इस श्रेणी में आते हैं, अगर कोर्ट इतने कम (लगभग नगण्य) लोगों की मुलभुत ज़रूरतों का ख्याल आ रहा है तो देश ७०% गरीब जनता के लिए वह क्या फैसला दे रही है. करोडों अशिक्षित जनता के बारे में क्या फैसला कर रही है . १५% से ज़्यादा मुसलमानों की सुरक्षा और मुलभुत सुविधाओं के बारे में क्या फैसला कर रही है. यहाँ कुछ नहीं होने वाला सिवाय अंग्रेजों की गुलामी और अमेरिका के कल्चर को चाट चाट कर अपने अन्दर समाहित करने के.)

यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि जिस देश के युवा को ग़रीबी, अशिक्षा बेरोजगारी से जूझना चाहिए. वह समलैंगिकता की बात कर रहे हैं. कोर्ट का यह फैसला निहायत ही अप्राकृतिक है और किसी भी तरह से प्राकृतिक नहीं है. मैं फिर कह रहा हूँ कि अगर प्राकृतिक होता तो जानवर में भी ऐसी प्रवृत्ति दिखाई देती. यह समाज में गन्दगी फ़ैलाने वाला फ़ैसला है. किसी भी धर्म गर्न्थों में ऐसे संबंधों का ज़िक्र नहीं है. ऐसे चीज़ों को मान्यता देना मेरे हिसाब से एक प्रतिशत भी सही नहीं होगा. इसे बदलाव की बयार बताने वाले लोगों की सामाजिक निंदा होनी चाहिए. इसे खुलेआम स्वीकार करने का मतलब है कि मुसीबत को बढावा देना. अन-नैचुरल सेक्स संबंधों से एच.आई.वी. एड्स के साथ साथ कई सामाजिक संक्रमण पैदा होगा जो किसी भी हाल में उचित नहीं है. मेरे हिसाब से इन चीज़ों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए.

लॉर्ड मैकाले ने १८६० में आईपीसी की धारा ३७७ का मसौदा तैयार किया था. इसमें अप्राकृतिक यौन संबंधों पर दस साल तक की सज़ा का प्रावधान किया गया था. मेडिकल साइंस तो अभी तक इस मामले में निरपेक्ष है मगर यह तय है कि यह अप्राकृतिक ही है.

यह फैसला अल्लाह के क़ानून और देश के क़ानून के खिलाफ है…मैं चैलेन्ज के साथ कह सकता हूँ कि अगर देश भर में वोटिंग करा ली जाये तो उन लोगों को पता चल जायेगा जो लोग इसे सही मान रहें है… ऐसी कृत्य के लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं और उनके लिए क़ानून की नहीं मनोचिकित्सक को दिखाने की ज़रुरत है.इस क़ानून को वापस ले लेना चाहिए. कोर्ट का फ़ैसला अप्रत्याशित है. यह अमेरिका की गहरी साजिश है. एशियन कल्चर के विरुद्ध है. ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाने-पर तो इंसानी नस्ल ही ख़त्म हो जायगी. लोग मुसीबत में गिरफ्तार हो जायेंगे. इस फैसले पर विचार करने की ज़रुरत है. ईश्वर ने इन्सान को जिस मकसद के लिए पैदा किया है उसके खिलाफ़ यह खुली बगावत है अर्थात ईश्वर के क़ानून के खिलाफ बगावत. यह चन्द बाकी लोग जो कोर्ट में ईश्वर के क़ानून को चुनौती दे रहे है एक न एक दिन बड़ी मुसीबत में गिरफ़्तार होंगे. ईश्वर (अल्लाह) ने मर्द और औरत को एक दुसरे का लिबास बताया है, और एक दुसरे के सुकून का ज़रिया. लेकिन अगर यह हुआ है तो यह तय है कि समाज में अराजकता बढेगी और तलाक़, संबंधों के टूटने का चलन बढेगा. (अभी तक तो पत्नी अपने पति से इसलिए झगडा करती थी कि उसके पति का किसी गैर-औरत से सम्बन्ध है लेकिन अब तो उसे अपने पति को अपने दोस्तों से भी दूर रखना पड़ेगा और निगाह रखनी पड़ेगी कि वह किस मर्द से मिल रहा है, औरतों से वे बाद में निबटेंगी. यह एक नयी मुसीबत आएगी.)

और हाँ, एक तर्क है जवाब दीजिये आप… अगर आपके पास हो तो. जिस तरह समाज का एक तबका यह मानता है कि बाकी उसकी बात माने और अमल करें तो समलैंगिक लोगों की भी यही मंशा ज़रूर होगी कि सभी समलैंगिकता का समर्थन करें, उसे जाने और माने भी. चलो ठीक है लेकिन वे और आप जवाब दें फिर बच्चे कैसे पैदा होंगे, इंसानी नस्ल आगे कैसे बढ़ेगी??? है कोई जवाब…???
यह फैसला भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धज्जियाँ उड़ा रहा है.

समर्थन में कुतर्क समलैंगिक सम्बन्ध प्रकृति के के खिलाफ है लेकिन केवल इसी आधार पर समलैंगिकों को मौलिक अधिकार से तो वंचित नहीं रखा जा सकता है. समाज को अपना नजरिया बदलना होगा.
जवाब चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या एक असामाजिक कृत्य है लेकिन केवल इसी आधार पर चोर लोगों को मौलिक अधिकारों से तो वंचित नहीं रखा जा सकता है. समाज को अपना नजरिया बदलना होगा और चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या को वैधानिक रूप से मान्यतामिलनी चाहिए. क्या यह सही है???


Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, ईश्वर, नारी, समलैंगिकता

18 Responses

  1. >समलैंगिकता पर आपके विचार , जहाँ तक आपके अपने निजी विचार हैं उम्दा हैं. मैं भी अपने निजी स्तर पर समलैंगिकता का पक्षधर नहीं हूँ …परन्तु इस एक मुद्दे की कसौटी पर पूरी किसी भी समाज या संस्कृति को कसने की सोच से मैं सहमत नहीं हूँ ! आपकी इस बात से की ""समलैंगिक लोगों की भी यही मंशा ज़रूर होगी कि सभी समलैंगिकता का समर्थन करें.." कहीं सोच की अपरिपक्वता का भास् होता है ! समलैंगिक लोग किसी सिरफिरे धरम के ठेकेदार की तरह नहीं हैं की जिनका मकसद किसी भी दूसरे धर्म के अनुयायिओं को मारना काटना या धर्म परिवर्तन करना होता हैं….इश्वर ( अल्लाह ) की ज़ात से ज्यादा जिन्हें अपनी ताक़त का लोहा मनवाने में दिलचस्पी होती है …कुछ हरे झंडे तो कुछ भगवे झंडे लिए पूरी सभ्यता का शुद्धिकरण करने का ठेका लिए रहते हैं …!! कोई शिव या राम का नाम लेता है तो कोई जेहाद के नाम पर दुनिया को कब्रिस्तान बनाने की फिराक में रहता है ! अगर हमारी सभ्यता को , हमारी संस्कृति को ख़तरा है तो इन जनूनी सिरफिरे इंसानियत के दुश्मनों से है….समलैंगिक लोग भले ही मानसिक तौर पर हमारी आपकी समझ के हिसाब से विकृत हों मगर ख़तरा किसी के लिए नहीं है ! यह उनकी अपनी निजी सोच और आचरण है जिससे ना तो किसी को व्यक्तिगत तौर पर और ना ही किसी तरह से सामाजिक तौर पर कोई असर पड़ने वाला है ! समलैंगिकता कोई बिमारी नहीं और ना ही कोई अनुवांशिक कमी है….यह एक आचरण है जिसे धुम्रपान की तरह …नशाखोरी की तरह कुछ लोग अपना लेते हैं . अब धुम्रपान और शराबखोरी को भी कोई धर्म सही नहीं मानता …लेकिन क्या हर धर्म के लोग इसकी लत का शिकार नहीं होते ? सिगरेट की डिब्बी पर भयावह तस्वीर छाप देने से या शराब की बोतल पर चेतावनी चिपका देने से क्या हुआ है ? अगर इतनी ही परवाह है तो इन सब चीज़ों का उत्पादन ही बंद क्यों नहीं कर देते ? जनाब ….कहने सुनने मैं सब कुछ बहुत भला बहुत अच्छा लगता है मगर व्यावहारिकता कुछ और होती है ! बाकी मेरी यह टिप्पणी समलैंगिकता के नहीं इंसानी आचरण की स्वतंत्रता के पक्ष में है ! आपके किसी भी आचरण से जब समाज में किसी दुसरे को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता हो तो आप अपने उस आचरण के स्वयं ही उत्तरदायी हैं और उसे अपनाने के लिए स्वतंत्र भी ! न्यायपालिका ने ३७७ को ख़त्म नहीं किया है …सिर्फ स्वैच्छिक और पारस्परिक सहमती से किये गए आचरण को आपराधिक दायरे से मुक्त किया है ! वैसे इस सन्दर्भ में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है लिखा जा सकता है ….मगर शायद फिर कभी ! और हाँ…चलते चलते एक और तथ्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा ….अपने अध्ययन और ज्ञान की सीमा को कुछ विस्तार और दें ! जीवशास्त्रियों के अनुसार अब यह बात मान्य नहीं रही की समलैंगिकता केवल इंसानी दायरे की ही विकृति है….बंदरों , कुत्तों , सांडों, और यहाँ तक की छोटे छोटे कीट पतंगों में भी …खासतौर पर गुबरैलों में भी इस आचरण को पाया गया है …! यानी इस पर हम सभी को अपनी सोच के दायरे को विस्तृत करना होगा और वह भी बिना किसी पूर्वाग्रह के ! अंतिम सत्य अभी भी दूर है !मेरी इन बातों से आप सहमत हों या ना हों, इन्हें अन्यथा ना लें !

  2. >समलैंगिकता पर आपके विचार , जहाँ तक आपके अपने निजी विचार हैं उम्दा हैं. मैं भी अपने निजी स्तर पर समलैंगिकता का पक्षधर नहीं हूँ …परन्तु इस एक मुद्दे की कसौटी पर पूरी किसी भी समाज या संस्कृति को कसने की सोच से मैं सहमत नहीं हूँ ! आपकी इस बात से की ""समलैंगिक लोगों की भी यही मंशा ज़रूर होगी कि सभी समलैंगिकता का समर्थन करें.." कहीं सोच की अपरिपक्वता का भास् होता है ! समलैंगिक लोग किसी सिरफिरे धरम के ठेकेदार की तरह नहीं हैं की जिनका मकसद किसी भी दूसरे धर्म के अनुयायिओं को मारना काटना या धर्म परिवर्तन करना होता हैं….इश्वर ( अल्लाह ) की ज़ात से ज्यादा जिन्हें अपनी ताक़त का लोहा मनवाने में दिलचस्पी होती है …कुछ हरे झंडे तो कुछ भगवे झंडे लिए पूरी सभ्यता का शुद्धिकरण करने का ठेका लिए रहते हैं …!! कोई शिव या राम का नाम लेता है तो कोई जेहाद के नाम पर दुनिया को कब्रिस्तान बनाने की फिराक में रहता है ! अगर हमारी सभ्यता को , हमारी संस्कृति को ख़तरा है तो इन जनूनी सिरफिरे इंसानियत के दुश्मनों से है….समलैंगिक लोग भले ही मानसिक तौर पर हमारी आपकी समझ के हिसाब से विकृत हों मगर ख़तरा किसी के लिए नहीं है ! यह उनकी अपनी निजी सोच और आचरण है जिससे ना तो किसी को व्यक्तिगत तौर पर और ना ही किसी तरह से सामाजिक तौर पर कोई असर पड़ने वाला है ! समलैंगिकता कोई बिमारी नहीं और ना ही कोई अनुवांशिक कमी है….यह एक आचरण है जिसे धुम्रपान की तरह …नशाखोरी की तरह कुछ लोग अपना लेते हैं . अब धुम्रपान और शराबखोरी को भी कोई धर्म सही नहीं मानता …लेकिन क्या हर धर्म के लोग इसकी लत का शिकार नहीं होते ? सिगरेट की डिब्बी पर भयावह तस्वीर छाप देने से या शराब की बोतल पर चेतावनी चिपका देने से क्या हुआ है ? अगर इतनी ही परवाह है तो इन सब चीज़ों का उत्पादन ही बंद क्यों नहीं कर देते ? जनाब ….कहने सुनने मैं सब कुछ बहुत भला बहुत अच्छा लगता है मगर व्यावहारिकता कुछ और होती है ! बाकी मेरी यह टिप्पणी समलैंगिकता के नहीं इंसानी आचरण की स्वतंत्रता के पक्ष में है ! आपके किसी भी आचरण से जब समाज में किसी दुसरे को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता हो तो आप अपने उस आचरण के स्वयं ही उत्तरदायी हैं और उसे अपनाने के लिए स्वतंत्र भी ! न्यायपालिका ने ३७७ को ख़त्म नहीं किया है …सिर्फ स्वैच्छिक और पारस्परिक सहमती से किये गए आचरण को आपराधिक दायरे से मुक्त किया है ! वैसे इस सन्दर्भ में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है लिखा जा सकता है ….मगर शायद फिर कभी ! और हाँ…चलते चलते एक और तथ्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा ….अपने अध्ययन और ज्ञान की सीमा को कुछ विस्तार और दें ! जीवशास्त्रियों के अनुसार अब यह बात मान्य नहीं रही की समलैंगिकता केवल इंसानी दायरे की ही विकृति है….बंदरों , कुत्तों , सांडों, और यहाँ तक की छोटे छोटे कीट पतंगों में भी …खासतौर पर गुबरैलों में भी इस आचरण को पाया गया है …! यानी इस पर हम सभी को अपनी सोच के दायरे को विस्तृत करना होगा और वह भी बिना किसी पूर्वाग्रह के ! अंतिम सत्य अभी भी दूर है !मेरी इन बातों से आप सहमत हों या ना हों, इन्हें अन्यथा ना लें !

  3. >vikshubd pathak jee, aapne tark diya hai ki kit patangon men bhi samlaingik hote hain. kahan likha hai zara batayen… auragar aisa hota bhi ho to mujhe aas paas ke janwaron men nazar kyun nahin aata…

  4. >vikshubd pathak jee, aapne tark diya hai ki kit patangon men bhi samlaingik hote hain. kahan likha hai zara batayen… auragar aisa hota bhi ho to mujhe aas paas ke janwaron men nazar kyun nahin aata…

  5. >जनाब सलीम भाई ! हो सकता है की मेरा ज्ञान और अध्ययन लघु हो परन्तु मेरी बात का आधार सुदृढ़ है ! लिखने पड़ने की बात तो फिर दूर की है….डिस्कवरी चैनल तथा इसी तरह के अन्य कई चैनलों पर समय समय पर इस विषय को उठाया जाता रहा है , जिनमे ना केवल शोधकर्ताओं द्वारा की गयी शोधों की रिपोर्ट्स प्रस्तुत की जाती रही है , बल्कि अति आधुनिक कैमरों की मदद से प्राणियों के आचरण को भी प्रतक्ष्य दिखाया जाता रहा है ! लेकिन मैं आपसे फिर एक बार कहना चाहोंगा की मैं निजी तौर पर समलैंगिकता के पक्ष में हरगिज़ नहीं हूँ ! परन्तु साथ ही मैं निजी स्वतंत्रता का घोर समर्थक हूँ ! मैं समलैंगिकता के लिगालाईज़शन ( legalisation ) की नहीं उसके डिक्रिमिनालाईज़ीशन( decriminalisation ) की सोच का समर्थक हूँ ! बस बात इतनी सी है !

  6. >जनाब सलीम भाई ! हो सकता है की मेरा ज्ञान और अध्ययन लघु हो परन्तु मेरी बात का आधार सुदृढ़ है ! लिखने पड़ने की बात तो फिर दूर की है….डिस्कवरी चैनल तथा इसी तरह के अन्य कई चैनलों पर समय समय पर इस विषय को उठाया जाता रहा है , जिनमे ना केवल शोधकर्ताओं द्वारा की गयी शोधों की रिपोर्ट्स प्रस्तुत की जाती रही है , बल्कि अति आधुनिक कैमरों की मदद से प्राणियों के आचरण को भी प्रतक्ष्य दिखाया जाता रहा है ! लेकिन मैं आपसे फिर एक बार कहना चाहोंगा की मैं निजी तौर पर समलैंगिकता के पक्ष में हरगिज़ नहीं हूँ ! परन्तु साथ ही मैं निजी स्वतंत्रता का घोर समर्थक हूँ ! मैं समलैंगिकता के लिगालाईज़शन ( legalisation ) की नहीं उसके डिक्रिमिनालाईज़ीशन( decriminalisation ) की सोच का समर्थक हूँ ! बस बात इतनी सी है !

  7. >जब धरती पर समलैंगिता ने इन्तिहा कर दी थी तब ईशवर ने धरती को पलट दिया था इसका प्रमाणों सहित लेख पढ लें, नूह की कशती वाली घटना सभी धर्मों से संबंधित जानकारी भी दी गई हैं, http://www.kairana.net/news-nooh.htmअल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.comकल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com

  8. >जब धरती पर समलैंगिता ने इन्तिहा कर दी थी तब ईशवर ने धरती को पलट दिया था इसका प्रमाणों सहित लेख पढ लें, नूह की कशती वाली घटना सभी धर्मों से संबंधित जानकारी भी दी गई हैं, http://www.kairana.net/news-nooh.htmअल्लाह के चैलेंजislaminhindi.blogspot.comकल्कि व अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल.antimawtar.blogspot.com

  9. >चलिए आपकी बात से यह तो ज़ाहिर हो ही गया की समलैंगिकता कोई नया निराला शगूफा नहीं है ना ही यह पश्चिमी सभ्यता की देन है , जैसा की इसकी मुखालफत करने वाले अक्सर कहते फिरते हैं…! बाकी निजी तौर पर मेरा इस आचरण से कुछ लेना देना नहीं है ! मेरे लिए यह ठीक उसी तरह है जैसे मैं चाय पसंद करता हूँ तो कोई कोफी की चाह रखता है ! या कोई धुम्रपान करता है और मैं उससे कोसों दूर हूँ… ! अपनी अपनी तबियत का तकाजा है दोस्त !

  10. >चलिए आपकी बात से यह तो ज़ाहिर हो ही गया की समलैंगिकता कोई नया निराला शगूफा नहीं है ना ही यह पश्चिमी सभ्यता की देन है , जैसा की इसकी मुखालफत करने वाले अक्सर कहते फिरते हैं…! बाकी निजी तौर पर मेरा इस आचरण से कुछ लेना देना नहीं है ! मेरे लिए यह ठीक उसी तरह है जैसे मैं चाय पसंद करता हूँ तो कोई कोफी की चाह रखता है ! या कोई धुम्रपान करता है और मैं उससे कोसों दूर हूँ… ! अपनी अपनी तबियत का तकाजा है दोस्त !

  11. >समलैंगिकता एक ऐसा कृत्य है जो ईश्वर के नज़दीक सख्त गुनाह है, ठीक उसी तरह से जैसे चोरी बलात्कार आदि… जिस तरह से चोरी बलात्कार आदि की सज़ा मुक़र्रर है ठीक उसी तरह से ईश्वर के क़ानून के खिलाफ़ जाने पर सज़ा मुक़र्रर है… वेदों का मुताला करने पर, कुरान का मुताला करने पर यह बात पूरी तरह से समझ में आ जायेगी…

  12. >समलैंगिकता एक ऐसा कृत्य है जो ईश्वर के नज़दीक सख्त गुनाह है, ठीक उसी तरह से जैसे चोरी बलात्कार आदि… जिस तरह से चोरी बलात्कार आदि की सज़ा मुक़र्रर है ठीक उसी तरह से ईश्वर के क़ानून के खिलाफ़ जाने पर सज़ा मुक़र्रर है… वेदों का मुताला करने पर, कुरान का मुताला करने पर यह बात पूरी तरह से समझ में आ जायेगी…

  13. >किसी की पसंद के हिसाब से इंसानियत के नियम नहीं चलते…. इसके लिए केवल और केवल ईश्वरीय क़ानून पर सख्त अमल ज़रुरत है… आखिरकार ईश्वर ने ही हमें बनाया है… उसी ने हमें एक तुच्छ वीर्य से मांस का लोथडा बनाते हुए नौ महीने अँधेरी गुफ़ा के ज़रिये बेहद तंग स्थान से पैदा किया…………और बेशक हमें उसी की तरफ लौट के जाना है… वही हमारा और तुम्हारा और सारे जहां का मालिक है, वह यकता है और सारी तारीफें उसी के लिए हैं….

  14. >किसी की पसंद के हिसाब से इंसानियत के नियम नहीं चलते…. इसके लिए केवल और केवल ईश्वरीय क़ानून पर सख्त अमल ज़रुरत है… आखिरकार ईश्वर ने ही हमें बनाया है… उसी ने हमें एक तुच्छ वीर्य से मांस का लोथडा बनाते हुए नौ महीने अँधेरी गुफ़ा के ज़रिये बेहद तंग स्थान से पैदा किया…………और बेशक हमें उसी की तरफ लौट के जाना है… वही हमारा और तुम्हारा और सारे जहां का मालिक है, वह यकता है और सारी तारीफें उसी के लिए हैं….

  15. 2truthseeker says:

    >दर असल बात नये या पुराने शगूफे, अथवा अपनी पसंद और प्रवृत्ति की नहीं है, और न ही यह कहना ही उचित है कि मनुश्य स्वतंत्र है, बल्कि उसके ऊपर उसके सृष्टा की बाध्यता अवश्य ही है, यह और बात है कि जिस पर्यावरण और माहौल में आदमी रहता है, उसी के अनुसार ढल जाता है और वही उसकी प्रकृति का रूप धारण कर लेती है। यह संसार और इसके सभी प्राणी परम परमेश्वर अल्लाह तआला के पैदा किये हुये हैं, और मनुष्य के कल्याण और उसके हित के लिए उसने जो नियम निर्धारित किये हैं, वही असल और प्राकृतिक हैं। और अल्लाह ने समलैंगिकता को घोर पाप शुमार किया है। अगर किसी व्यक्ति अथवा अन्य जीव-प्राणी के अंदर यह प्रवृत्ति पायी जाती है तो उसे स्वभाविक नहीं कहा जा सकता, बल्कि वह अस्वभाविक है, विकृत है, अल्लाह के प्रकोप को ललकारना है और जिसके गलत परिणामों से आज मानवता जूझ रही है! जो किसी पर रहस्य नहीं है। इसीलिए इस्लाम धर्म ने इस का सख्त विरोध किया है और इस्लामी-शास्त्र में इसकी कड़ी सज़ा है। इस्लाम हर पक्ष से मानव की रक्षा, सुरक्षा, कल्याण और हित के लिए आया है और वह उस अस्तित्व का बनाया हुआ शास्त्र है जो मानव के दिल के अंदर पैदा होने वाली कल्पनाओं से भी अवगत है, तो क्या उसके बनाये हुए नियम को चुनौती दी जा सकती है!!?इस्लाम ने समलैंगिकता को क्यों वर्जित किया है? इसके बारे में पढ़िये इस लिंक पर :http://www.islamhouse.com/p/223544

  16. 2truthseeker says:

    >दर असल बात नये या पुराने शगूफे, अथवा अपनी पसंद और प्रवृत्ति की नहीं है, और न ही यह कहना ही उचित है कि मनुश्य स्वतंत्र है, बल्कि उसके ऊपर उसके सृष्टा की बाध्यता अवश्य ही है, यह और बात है कि जिस पर्यावरण और माहौल में आदमी रहता है, उसी के अनुसार ढल जाता है और वही उसकी प्रकृति का रूप धारण कर लेती है। यह संसार और इसके सभी प्राणी परम परमेश्वर अल्लाह तआला के पैदा किये हुये हैं, और मनुष्य के कल्याण और उसके हित के लिए उसने जो नियम निर्धारित किये हैं, वही असल और प्राकृतिक हैं। और अल्लाह ने समलैंगिकता को घोर पाप शुमार किया है। अगर किसी व्यक्ति अथवा अन्य जीव-प्राणी के अंदर यह प्रवृत्ति पायी जाती है तो उसे स्वभाविक नहीं कहा जा सकता, बल्कि वह अस्वभाविक है, विकृत है, अल्लाह के प्रकोप को ललकारना है और जिसके गलत परिणामों से आज मानवता जूझ रही है! जो किसी पर रहस्य नहीं है। इसीलिए इस्लाम धर्म ने इस का सख्त विरोध किया है और इस्लामी-शास्त्र में इसकी कड़ी सज़ा है। इस्लाम हर पक्ष से मानव की रक्षा, सुरक्षा, कल्याण और हित के लिए आया है और वह उस अस्तित्व का बनाया हुआ शास्त्र है जो मानव के दिल के अंदर पैदा होने वाली कल्पनाओं से भी अवगत है, तो क्या उसके बनाये हुए नियम को चुनौती दी जा सकती है!!?इस्लाम ने समलैंगिकता को क्यों वर्जित किया है? इसके बारे में पढ़िये इस लिंक पर :http://www.islamhouse.com/p/223544

  17. vishu says:

    >मुस्लिम स्कॉलर और कासिम, जो प्रोफेट मुहम्मद हो गया, के बारे में, विशेषकर शांति, समलैंगिकता एवं सैक्स पर पूरे विवरण वीडियो लिंक देखिए http://www.youtube.com/user/allahaleg जल्द ही इनमें से कुछ का हिंदी अनुवाद कर सभी बंधुओं को दिया जाएगा। एक बानगी जरूर पेश करना चाहता हूँ जनाब जाकिर नायक की जिन्होंने अपने वीडियो में हूर शब्द का अनुवाद "कॉमन सुंदरता" कर स्त्रियों को 72 पुरूष स्वर्ग में मिलने की बात कर तालियां ली हैं वे यदि आगे की आयत छुपी रहना पसंद करते हैं। अगली आयत में हूर के बारे में लिखा है कि वे जो कौमार्य युक्त कन्याएं जो जिन्नात ने भी नहीं भोगी न मासिक धर्म का रक्त निकलता है मिलेंगी। 300 सुंदर बालक भी जन्नत में दिए जाने का वादा है वे क्या …। खैर झूठ ही जिस मज़हब का आधार है उस गिरोह का नेता व आज्ञाकारी गुलाम झूठ से कब मुक्त होंगे? क्या होना चाहेंगे? नहीं गिरोह के लिए जो जरूरी है वह इसी नेता व किताब में है। इस साइट की भाषा व तेवर वही हैं इसलिए संभावना न्यून है।

  18. vishu says:

    >मुस्लिम स्कॉलर और कासिम, जो प्रोफेट मुहम्मद हो गया, के बारे में, विशेषकर शांति, समलैंगिकता एवं सैक्स पर पूरे विवरण वीडियो लिंक देखिए http://www.youtube.com/user/allahaleg जल्द ही इनमें से कुछ का हिंदी अनुवाद कर सभी बंधुओं को दिया जाएगा। एक बानगी जरूर पेश करना चाहता हूँ जनाब जाकिर नायक की जिन्होंने अपने वीडियो में हूर शब्द का अनुवाद "कॉमन सुंदरता" कर स्त्रियों को 72 पुरूष स्वर्ग में मिलने की बात कर तालियां ली हैं वे यदि आगे की आयत छुपी रहना पसंद करते हैं। अगली आयत में हूर के बारे में लिखा है कि वे जो कौमार्य युक्त कन्याएं जो जिन्नात ने भी नहीं भोगी न मासिक धर्म का रक्त निकलता है मिलेंगी। 300 सुंदर बालक भी जन्नत में दिए जाने का वादा है वे क्या …। खैर झूठ ही जिस मज़हब का आधार है उस गिरोह का नेता व आज्ञाकारी गुलाम झूठ से कब मुक्त होंगे? क्या होना चाहेंगे? नहीं गिरोह के लिए जो जरूरी है वह इसी नेता व किताब में है। इस साइट की भाषा व तेवर वही हैं इसलिए संभावना न्यून है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: