स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मांसाहार क्यूँ जायज़ है? Non-veg is allowed, even in hindu dharma?

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अक्सर कुछ लोगों के मन में यह आता ही होगा कि जानवरों की हत्या एक क्रूर और निर्दयतापूर्ण कार्य है तो क्यूँ लोग मांस खाते हैं? जहाँ तक मेरा सवाल है मैं एक मांसाहारी हूँ. मुझसे मेरे परिवार के लोग और जानने वाले (जो शाकाहारी हैं) अक्सर कहते हैं कि आप माँस खाते हो और बेज़ुबान जानवरों पर अत्याचार करके जानवरों के अधिकारों का हनन करते हो.


शाकाहार ने अब संसार भर में एक आन्दोलन का रूप ले लिया है, बहुत से लोग तो इसको जानवरों के अधिकार से जोड़ते हैं. निसंदेह दुनिया में माँसाहारों की एक बड़ी संख्या है और अन्य लोग मांसाहार को जानवरों के अधिकार (जानवराधिकार) का हनन मानते हैं.

मेरा मानना है कि इंसानियत का यह तकाज़ा है कि इन्सान सभी जीव और प्राणी से दया का भावः रखे| साथ ही मेरा मानना यह भी है कि ईश्वर ने पृथ्वी, पेड़-पौधे और छोटे बड़े हर प्रकार के जीव-जंतुओं को हमारे लाभ के लिए पैदा किया गया है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की दी हुई अमानत और नेमत के रूप में मौजूद प्रत्येक स्रोत को किस प्रकार उचित रूप से इस्तेमाल करते है.

आइये इस पहलू पर और इसके तथ्यों पर और जानकारी हासिल की जाये…

1- माँस पौष्टिक आहार है और प्रोटीन से भरपूर है
माँस उत्तम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है. इसमें आठों अमीनों असिड पाए जाते हैं जो शरीर के भीतर नहीं बनते और जिसकी पूर्ति खाने से पूरी हो सकती है. गोश्त यानि माँस में लोहा, विटामिन बी वन और नियासिन भी पाए जाते हैं (पढ़े- कक्षा दस और बारह की पुस्तकें)



2- इन्सान के दांतों में दो प्रकार की क्षमता है
अगर आप घांस-फूस खाने वाले जानवर जैसे बकरी, भेड़ और गाय वगैरह के तो आप उन सभी में समानता पाएंगे. इन सभी जानवरों के चपटे दंत होते हैं यानि जो केवल घांस-फूस खाने के लिए उपयुक्त होते हैं. यदि आप मांसाहारी जानवरों जैसे शेर, चीता और बाघ आदि के दंत देखें तो उनमें नुकीले दंत भी पाएंगे जो कि माँस खाने में मदद करते हैं. यदि आप अपने अर्थात इन्सान के दांतों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे हमारे दांत नुकीले और चपटे दोनों प्रकार के हैं. इस प्रकार वे शाक और माँस दोनों खाने में सक्षम हैं.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य को केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे नुकीले दांत क्यूँ देता. यह इस बात का सबूत है कि उसने हमें माँस और सब्जी दोनों खाने की इजाज़त दी है.

3- इन्सान माँस और सब्जियां दोनों पचा सकता है
शाकाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल केवल सब्जियां ही पचा सकते है और मांसाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल माँस पचाने में सक्षम है लेकिन इन्सान का पाचन तंत्र दोनों को पचा सकता है.

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमको केवल सब्जियां ही खिलाना चाहता तो उसे हमें ऐसा पाचनतंत्र क्यूँ देता जो माँस और सब्जी दोनों पचा सकता है.

4- एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी हो सकता है
एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक अच्छा मुसलमान हो सकता है. मांसाहारी होना एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं.

5- पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता है
पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की इजाज़त देता है. कुरआन की आयतें इस बात की सबूत है-

“ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है” (कुरआन 5:1)

“रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो” (कुरआन 16:5)

“और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो” (कुरआन 23:21)

6- हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की अनुमति देतें है !
बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं. उनका विचार है कि माँस सेवन धर्म विरुद्ध है. लेकिन सच ये है कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ मांसाहार की इजाज़त देतें है. ग्रन्थों में उनका ज़िक्र है जो माँस खाते थे.

A) हिन्दू क़ानून पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि-
वे जो उनका माँस खाते है जो खाने योग्य हैं, अगरचे वो कोई अपराध नहीं करते. अगरचे वे ऐसा रोज़ करते हो क्यूंकि स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के लिए पैदा किया है

(B) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5 सूत्र 31 में आता है-
माँस खाना बलिदान के लिए उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का नियम कहा जाता है

(C) आगे अध्याय 5 सूत्र 39 और 40 में कहा गया है कि –
स्वयं ईश्वर ने बलि के जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अतः बलि के उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 88 में धर्मराज युधिष्ठर और पितामह के मध्य वार्तालाप का उल्लेख किया गया है कि कौन से भोजन पूर्वजों को शांति पहुँचाने हेतु उनके श्राद्ध के समय दान करने चाहिए? प्रसंग इस प्रकार है –

“युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबली!मुझे बताईये कि कौन सी वस्तु जिसको यदि मृत पूर्वजों को भेट की जाये तो उनको शांति मिले? कौन सा हव्य सदैव रहेगा ? और वह क्या जिसको यदि सदैव पेश किया जाये तो अनंत हो जाये?”

भीष्म ने कहा, “बात सुनो, हे युधिष्ठिर कि वे कौन सी हवी है जो श्राद्ध रीति के मध्य भेंट करना उचित है और कौन से फल है जो प्रत्येक से जुडें हैं| और श्राद्ध के समय शीशम, बीज, चावल, बाजरा, माश, पानी, जड़ और फल भेंट किया जाये तो पूर्वजो को एक माह तक शांति मिलती है. यदि मछली भेंट की जाये तो यह उन्हें दो माह तक राहत देती है. भेंड का माँस तीन माह तक उन्हें शांति देता है| खरगोश का माँस चार माह तक, बकरी का माँस पांच माह और सूअर का माँस छह माह तक, पक्षियों का माँस सात माह तक, पृष्ठा नामक हिरन से वे आठ माह तक, रुरु नामक हिरन के माँस से वे नौ माह तक शांति में रहते हैं. “GAWAYA” के माँस से दस माह तक, भैस के माँस से ग्यारह माह तक और गौ माँस से पूरे एक वर्ष तक. प्यास यदि उन्हें घी में मिला कर दान किया जाये यह पूर्वजों के लिए गौ माँस की तरह होता है| बधरिनासा (एक बड़ा बैल) के माँस से बारह वर्ष तक और गैंडे का माँस यदि चंद्रमा के अनुसार उनको मृत्यु वर्ष पर भेंट किया जाये तो यह उन्हें सदैव सुख शांति में रखता है. क्लासका नाम की जड़ी-बूटी, कंचना पुष्प की पत्तियां और लाल बकरी का माँस भेंट किया जाये तो वह भी अनंत सुखदायी होता है. अतः यह स्वाभाविक है कि यदि तुम अपने पूर्वजों को अनंत काल तक सुख-शांति देना चाहते हो तो तुम्हें लाल बकरी का माँस भेंट करना चाहिए

7- हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित
हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.

8- पेड़ पौधों में भी जीवन
कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.

9- पौधों को भी पीड़ा होती है
वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञानं कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं लेकिन उनकी चीख इंसानों के द्वारा नहीं सुनी जा सकती. इसका कारण यह है कि मनुष्य में आवाज़ सुनने की अक्षमता जो श्रुत सीमा में नहीं आते अर्थात 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक इस सीमा के नीचे या ऊपर पड़ने वाली किसी भी वस्तु की आवाज़ मनुष्य नहीं सुन सकता है| एक कुत्ते में 40,000 हर्ट्ज़ तक सुनने की क्षमता है. इसी प्रकार खामोश कुत्ते की ध्वनि की लहर संख्या 20,000 से अधिक और 40,000 हर्ट्ज़ से कम होती है. इन ध्वनियों को केवल कुत्ते ही सुन सकते हैं, मनुष्य नहीं. एक कुत्ता अपने मालिक की सीटी पहचानता है और उसके पास पहुँच जाता है| अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.

10- दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!
एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए.

पवित्र कुरआन में कहा गया है –

ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

-सलीम खान

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>पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पोते आचार्य संजय द्विवेदी ने अपनाया इस्लाम बन गए अहमद पंडित

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आचार्य संजय द्विवेदी ने अपनाया इस्लाम बन गए अहमद पंडित

काशी विद्यापीठ से आचार्य की डिग्री ले चुके संजय द्विवेदी ने इस्लाम कुबूल किया.

कांग्रेस पार्टी के आला नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पोते आचार्य संजय द्विवेदी को आखिर इस्लाम में ऐसा क्या खास लगा?
आचार्य संजय पंद्रह साल की उम्र में ही बिरला ग्रुप के मंदिरों के मुख्य पुजारी बन गए थे और वे आल इंडिया ब्राह्मण असोसिअशन के अध्यक्ष भी थे .

-सलीम खान

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>स्त्री एक से अधिक पति क्यूँ नहीं रख सकती? More then one husband, why not?

>एक और सवाल जो हमारे नॉन-मुस्लिम भाईयों के ज़ेहन में हमेशा से आता रहता है और वो अक्सर ये पूछते हैं कि इस्लाम में मर्दों को तो एक से ज़्यादा विवाह करने का, एक से ज़्यादा बीवियां रखने की अनुमति तो है, मगर औरतो को क्यूँ नहीं यह छुट मिली कि वह भी एक से ज़्यादा विवाह कर सके, एक से ज़्यादा मर्दों को रख सके? इस्लाम में औरतों को बहुविवाह की अनुमति क्यूँ नहीं है?


वे तो इसे कभी-कभी महिला-सशक्तिकरण से जोड़ने से भी नहीं चूकते और हवाला देते हैं पश्चिमी समाज का और कहते हैं कि देखों वहां औरतों को कितनी छूट मिली है. अरे जनाब ! औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं | पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया | इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं. इसके विपरीत इस्लाम ने औरतों को इज्ज़त दी, यहाँ तक की उसे जायदाद में भी हिस्सेदार बनाया. आप बता सकते हैं किस धर्म किस किताब में औरतों को जायदाद में हिस्सा देना लिखा है? इस्लाम ने औरतों को वही दर्जा दिया है जिसकी वे वास्तव में मुस्तहक़ हैं.

सबसे पहले मैं आपको पूरे यकीन के साथ बताना चाहता हूँ कि इस्लाम न्याय और समानता से परिपूर्ण समाज की हिमायत करता है और इस्लामी समाज इसी (न्याय और समानता) पर आधारित है| ईश्वर/अल्लाह ने स्त्री और पुरुष दोनों को समानरूप से बनाया है लेकिन अलग अलग क्षमताएं और जिम्मेदारियां रक्खी हैं| स्त्री और पुरुष मानसिक और शारीरिक रूप से भिन्न हैं, और उनकी समाज और घर में रोल और जिम्मेदारियाँ अलग अलग हैं| स्त्री और पुरुष दोनों ही इस्लाम में समान हैं लेकिन एक जैसे नहीं.

मैं कुछ बातें और बताना चाहता हूँ जिससे कि यह स्पष्ट हो जाये कि औरतों को एक ज़्यादा पति रखना क्यूँ जाएज़ नहीं है और वर्जित क्यूँ है ?

1- अगर एक मर्द के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माँ-बाप का पता आसानी से लग सकता है लेकिन वहीँ अगर एक औरत के पास एक से ज़्यादा पति हों तो केवल माँ का पता चलेगा, बाप का नहीं. इस्लाम माँ-बाप की पहचान को बहुत ज़्यादा महत्त्व देता है | मनोचिकित्सक कहते है कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात और पागलपन के शिकार हो जाते है जो जो अपने माँ-बाप विशेष कर अपने बाप का नाम नहीं जानते| अक्सर उनका बचपन ख़ुशी से खली होता है| इसी कारण तवायफों (वेश्याओं) के बच्चो का बचपन अक्सर स्वस्थ नहीं होता|

यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे का किसी स्कूल में अड्मिशन कराया जाय और उसकी माँ से उस बच्चे के बाप का नाम पूछा जाय तो माँ को दो या उससे अधिक नाम बताने पड़ेंगे.

2- मर्दों में कुदरती तौर पर औरतों के मुकाबले बहु-विवाह की क्षमता ज़्यादा होती है.

3- समाज विज्ञान के अनुसार एक से ज़्यादा बीवी रखने वाले पुरुष एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है जबकि उसी जगह पर अनेक शौहर रखने वाली औरत के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं है, विशेषकर मासिकधर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है.

4- एक से ज़्यादा पति वाली औरत के एक ही समय में कई यौन साझी होंगे जिसकी वजह से उनमे यौन सम्बन्धी रोगों में ग्रस्त होने की आशंका अधिक होंगी और यह रोग उसके पतियों को भी लग सकता है चाहे उसके सभी पति उस स्त्री के अन्य किसी स्त्री के साथ यौन समंध से मुक्त हों. यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती है.

हालाँकि आजकल की साइंस ने डीएनए इजाद कर लिया है जिसके ज़रिये से बहुत कुछ पता चल सकता है. लेकिन यह इजाद अभी आया है पहले नहीं था और दूसरी बात, क्या यह इतना ही आसान सी प्रक्रिया है जिसके ज़रिये आम इंसान इस टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कर सके???

औरतों को बहु-विवाह की मुमानियत का यह इस्लामी कानून निश्चित रूप से समाज में शान्ति लाएगा.
स्वाभाविक रूप से ज्यों ही इस्लामिक कानून लागू किया जायेगा तो इसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा | अगर इस्लामिक कानून संसार के किसी भी हिस्से में लागू किया जाये चाहे अमेरिका हो या यूरोप, ऑस्ट्रेलिया हो या भारत, समाज में शांति आएगी.

यही वजह है कि अल्लाह तबारक़-व-तआला ने अपनी अंतिम किताब में यह साफ़-तौर पर आदेश दिया है कि औरत बहु-विवाह नहीं कर सकती.

इस मुद्दे के मुताल्लिक़ आपके अन्य सवालों का भी स्वागत है.

– सलीम खान

Filed under: इस्लाम और नारी के अधिकार, नारी

>मुसलमान बताएं कि एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति क्यों है? (Why more then one wives in Islam)

>कहते हैं कि मुसलमान चार शादियाँ करते हैं? सच ही है! लेकिन चार शादी और तलाक़ के मसले पर नॉन-मुस्लिम्स मुसलामानों से सवाल पूछते रहते है और मुसलमान इसका कोई जवाब नहीं दे पते. वजह क्यूंकि उन्हें खुद ही इसके बारे में ठीक से पता नहीं.


मैं आपको बता दूं दुनिया में वाहिद (single) ऐसी किताब है कुरआन जिसमें लिखा है और इसके मानने वालों (मुसलमानों) को यह निर्देश भी दिया गया है कि केवल एक से शादी करो. “marry only one”

इसके अलावा कोई ऐसी धार्मिक किताब नहीं जो उनके मानने वालों को यह निर्देश देती नहीं है. हमें मालूम है कि हिन्दू धर्म में भी ऐसी कोई किताब नहीं जो इसके मुताल्लिक़ कोई फैसला करती हो. बाइबल में ऐसे मुद्दे पर नहीं लिखा है कि आपको इसके मुताल्लिक़ क्या करने चाहिए.

हम जानते हैं कि दशरथ के कई बीवियां थीं. इसी तरह और भी बहुत से हिन्दू लोग थे इतिहास पढने पर पता चलता है कि उनकी एक से ज़्यादा बीवियां थीं. आपको पता है श्रीकृष्ण की कितनी बीवियां थीं…. दो…चार…दस….सौ….हज़ार…!!! श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार एक सौ आठ बीवियां थी…. १६,१०८

अगर उनके इतनी बीवियां हो सकती हैं तो हमारी चार क्यूँ नहीं…!!!???

हिन्दू धर्म में एक से ज़्यादा बीवियां रखने पर यह पाबन्दी नहीं है आप कितनी बीवियां रख सकते हैं. ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है कि आप सिर्फ एक से ही शादी करोगे.. एक से ज़्यादा और कितनी भी (कोई गिनती नहीं) बीवी रखने पर कोई पाबन्दी नहीं. ये तो भारत देश के कानून ने HUF एक्ट में इसकी मुमानियत करी है सन १९५१ में… हिन्दू धर्म कि किसी भी किताब में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है. खैर, मैं अब अपने मुद्दे पर आता हूँ कि क्यूँ मुसलमान (या कोई भी) एक से ज़्यादा बीवी रख सकता है?


आईये इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा करते हैं-

बहु-विवाह की परिभाषा-इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति के एक से अधिक पत्नी या पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं-

१. एक पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना। २. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना । (मैं इस विषय पर भी शीघ्र ही लिखूंगा)

इस्लाम में इस बात की इजाजत है कि एक पुरूष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाजत नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।

. पवित्र कुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है ‘केवल एक औरत से विवाह करो।

संसार में कुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो।’ दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे ‘वेद, ‘रामायण, ‘गीता, हो या ‘तलमुद व ‘बाइबल। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है।

बाद में हिन्दुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी। हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ के एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी के भी अनेक पत्नियाँ थीं। प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी। यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाजत है। तलमूद कानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। इनमें बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (९६० ई.-१०३० ई.) ने इसके खिलाफ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज १९५० ई. तक प्रचलित रहा और अन्तत: इसराईल के चीफ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।

२. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं सन १९७५ र्ई. में प्रकाशित ‘इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या ६६, ६७ में बताया गया है कि १९५१ ई. और १९६१ ई. के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह ५.०६ प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल ४.३१ प्रतिशत था।

भारतीय कानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गैर-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गैर कानूनी है। इसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियां होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियां रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन १९५४ ई. में हुआ जब हिन्दू विवाह कानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको गैर-कानूनी करार दिया गया। यह भारतीय कानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ। अब आइए इस पर चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरूष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?

३. पवित्र कुरआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र कुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो’ कुरआन में है- ”अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो”(·कुरआन, ४:३)

कुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नही थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ करने में समर्थ हो। कुरआन के इसी अध्याय अर्थात सूरा निसा आयत १२९ में कहा गया है : ”तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे।” (कुरआन, ४:१२९)

कुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरूष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है.

आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा नहीं करने की दृष्टि से पाँच भागों में बांटा है-

(A) फ़र्ज़ अर्थात अनिवार्य (B) मुस्तहब अर्थात पसन्दीदा (C) मुबाह अर्थात जिसकी अनुमति हो (D) मकरूह अर्थात घृणित, नापसन्दीदा (E) ‘हराम अर्थात निषेध

बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो.

४. औरतों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरूष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज्य़ादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है इसीलिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है.

५. भारत में पुरूषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और भ्रूण हत्या भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबदी पुरूषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक होगी.

६. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक हैअमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अठत्तर लाख ज्य़ादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरूषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरूषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरूषमैथुन) है ओर पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरूषों से चालीस लाख ज्य़ादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल खुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कितनी अधिक है।

७. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएंगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएंगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी। यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत: उस·के सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरूष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह गलत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे.

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इ़ज्ज़त बाकी रखना चाहता है।

सलीम खान

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>भगवान शिव काबा में विराजमान हैं? Bhagwan Shiv esteblished in Kaa’ba?

>एक बार हिन्दू दोस्त ने मुझसे पूछा कि तुम्हें पता है, काबा भी हमारा ही है! मैंने कहा ‘मैं कुछ समझा नहीं! आप कहना क्या चाहते हैं?’ उस दोस्त ने कहा कि देखो मक्का में जो काबा है उसमें एक पत्थर लगा है और वह पत्थर ही भगवान शिव हैं और वह वहां विराजमान हैं! इसलिए तुम सब भी उन्ही की पूजा करते हो. देखो इस तस्वीर को (उसने एक तस्वीर दिखाई, जिसमें मुसलमान लोग उस पत्थर को चूम रहे थे). क्या तुम अब भी नहीं मानते कि यह पत्थर केवल मात्र पत्थर ही नहीं बल्कि भाग्वान शिव का साक्षात रूप है और तुम लोग भी इसे पूजते हो !


हालाँकि मुझे मालूम था कि वह जो कह रहा है, वह यूँ ही कह रहा है. बस बहस के तहत उसने यह कुतर्क बोला था. मैंने उस दोस्त से कहा, “दोस्त! अगर यही बात है तो तुम मुसलमान क्यूँ नहीं बन जाते और तुम भी जाओ उस पत्थर को चूमने

मैंने यूँ ही किये गए सवाल का जवाब भी ऐसे ही दे दिया.

मुझे याद है बचपन में मेरे गाँव में मेरे हिन्दू दोस्त कहते थे कि उसके चाचा या बाबा यह कहते हैं कि तुम जिस काबा की पूजा करते हो उस्मने हमारे शिव भगवान् क़ैद है. कुछ दोस्त यह कहते कि वहां शिव जी ही हैं क्यूंकि वहां शिवलिंग लगा है!! उस वक़्त मैं कुछ भी जवाब न दे पाता क्यूँकि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था.

जब बड़ा हुआ तो यही सवाल कुछ परिस्कृत रूप से पूजा जाने लगा कि जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काबा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ क्यूँ पढ़ते हैं?

खैर, मैं हिन्दू भाईयों में अज्ञानतावश, या जानबूझकर कुतर्क के ज़रिये हमेशा से पूछे गए इस सवाल का जवाब देता हूँ कि काबा में भगवान शिव हैं, या मुस्लिम काबा के पत्थर अथवा काबा की पूजा करते हैं.

सबसे पहला जवाब है:

जब आप मानते हो कि वहां (मक्का के काबा में, मुसलमानों के इबादतगाह में) शिव हैं तो आप मुसलमान क्यूँ नहीं हो जाते? (The stone you are seeing in the Kaa’ba is called Hajr-e-Aswad)

दूसरा जवाब:

काबा मतलब किबला होता है जिसका मतलब है- वह दिशा जिधर मुखातिब होकर मुसलमान नमाज़ पढने के लिए खडे होते है, वह काबा की पूजा नही करते.


मुसलमान किसी के आगे नही झुकते, न ही पूजा करते हैं सिवाय अल्लाह के.

सुरह बकरा में अल्लाह सुबहान व तआला फरमाते हैं –
ऐ रसूल, किबला बदलने के वास्ते बेशक तुम्हारा बार बार आसमान की तरफ़ मुहं करना हम देख रहे हैं तो हम ज़रूर तुमको ऐसे किबले की तरफ़ फेर देंगे कि तुम निहाल हो जाओ अच्छा तो नमाज़ ही में तुम मस्जिदे मोहतरम काबे की तरफ़ मुहं कर लो और ऐ मुसलमानों तुम जहाँ कहीं भी हो उसी की तरफ़ अपना मुहं कर लिया करो और जिन लोगों को किताब तौरेत वगैरह दी गई है वह बखूबी जानते है कि ये तब्दील किबले बहुत बजा व दुरुस्त हैं और उसके परवरदिगार की तरफ़ से है और जो कुछ वो लोग करते हैं उससे खुदा बेखबर नहीं.” (अल-कुरान 2: 144)

इस्लाम एकता के साथ रहने का निर्देश देता है:

चुकि इस्लाम एक सच्चे ईश्वर यानि अल्लाह को मानता है और मुस्लमान जो कि एक ईश्वर यानि अल्लाह को मानते है इसलिए उनकी इबादत में भी एकता होना चाहिए और अगर ऐसा निर्देश कुरान में नही आता तो सम्भव था वो ऐसा नही करते और अगर किसी को नमाज़ पढने के लिए कहा जाता तो कोई उत्तर की तरफ़, कोई दक्षिण की तरफ़ अपना चेहरा करके नमाज़ अदा करना चाहता इसलिए उन्हें एक ही दिशा यानि काबा कि दिशा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ अदा करने का हुक्म कुरान में आया. तो इस तरह से अगर कोई मुसलमान काबा के पूरब की तरफ़ रहता है तो वह पश्चिम यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है इसी तरह मुसलमान काबा के पश्चिम की तरफ़ रहता है तो वह पूरब यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है.

काबा दुनिया के नक्शे में बिल्कुल बीचो-बीच (मध्य- Center) स्थित है:

दुनिया में मुसलमान ही प्रथम थे जिन्होंने विश्व का नक्शा बनाया. उन्होंने दक्षिण (south facing) को upwards और उत्तर (north facing) को downwards करके नक्शा बनाया तो देखा कि काबा center में था. बाद में पश्चिमी भूगोलविद्दों ने दुनिया का नक्शा उत्तर (north facing) को upwards और दक्षिण (south facing) को downwards करके नक्शा बनाया. फ़िर भी अल्हम्दुलिल्लाह नए नक्शे में काबा दुनिया के center में है.

काबा का तवाफ़ (चक्कर लगाना) करना इस बात का सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है:

जब मुसलमान मक्का में जाते है तो वो काबा (दुनिया के मध्य) के चारो और चक्कर लगते हैं (तवाफ़ करते हैं) यही क्रिया इस बात की सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है.

काबा पर खड़े हो कर अजान दी जाती थी:

हज़रत मुहम्मद सल्ल. के ज़माने में लोग काबे पर खड़े हो कर लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने वास्ते अजान देते थे. उनसे जो ये इल्जाम लगाते हैं कि मुस्लिम काबा कि पूजा करते है, से एक सवाल है कि कौन मूर्तिपूजक होगा जो अपनी आराध्य मूर्ति के ऊपर खडे हो उसकी पूजा करेगा. जवाब दीजिये?

वैसे इसका तीसरा और सबसे बेहतर जवाब भी है: हदीस में एक जगह लिखा है कि “हज़रत उमर (र.अ.) यह फ़रमाते हैं कि मैं इसे चूमता हूँ, क्यूंकि इसे हमारे प्यारे नबी (स.अ.व.) ने चूमा था, वरना यह सिर्फ एक पत्थर ही है इसके सिवा कुछ नहीं, यह मेरा ना लाभ कर सकता है, ना ही नुकसान.

-सलीम खान

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>मुसलमानों में प्रचलित बुराईयाँ (Bad habits in Muslims)

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[पिछले महीने (माहे-रजब) में आपने लेख पढ़ा “रजब का महीना बिदआत के घेरे में” अब इसी सीरीज़ में पढें “शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ”]

शाबान के महीने में प्रचलित मुसलमानों में बुराईयाँ:

हम जब इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन व सुन्नत और हदीसों) का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि शाबान के महीने में विशिष्ट रूप से पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने केवल इतना प्रमाणित किया है कि आप इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा नफ़्लि रोजा रखते थे और इसके लिए कोई दिन सुनिश्चित नहीं करते थे. किन्तु आजकल बहुत सारे मुसलमान पंद्रहवी शाबान की रात और उसके दिन को बहुत महत्व और विशेषता और प्राथमिकता देते हुए ऐसे अधार्मिक कार्य करते हैं जिनका हमारे पैगम्बर (स.अ व.) की लाई हुई शरीयत से कोई सम्बन्ध नहीं है. बल्कि वो बिदआत की श्रेणी में आते हैं जिनसे इस्लाम ने सख्ती से रोका है. मैं उन बिदआतों में से कुछ का ज़िक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ जिससे कि हमारे समाज में अगर ऐसा कर रहा है तो वह संभल जाये और गुनाहगार होने से बच जाये.

१. पंद्रहवीं शाबान को रोज़ा रखना

२. पंद्रहवीं शाबान की रात को ‘सौ रक़आते’ की नमाज़ (हज़ारी नमाज़) पढना. हर रक़अतों में दस बार ‘सूरतुल इख़लास’ पढना और हर दो रक़अतों के बाद सलाम फेरना. आपको मैं बता दूं कि इस बुराई का जन्म हुआ था ४४८ हिजरी में बैतूल मुक़द्दीस में ‘इब्ने अबील हम्रा’ के द्वारा. इसके पूर्व इसका कोई अस्तित्व नहीं था. (फिर यह कसी वैध हो सकता है)

३. पंद्रहवीं शाबान की रात को औरतें का बन-ठन कर, सज संवर कर क़ब्रिस्तान जाना, वहां क़ब्रों पर चिरागाँ करना, अगरबत्ती जलना, फूल चढ़ाना, मुर्दों के सामने अपनी मुरादें रखना और अपना दुखड़ा सुनाना… आदि

४. घरों, सड़कों, क़ब्रों, मस्जिदों रौशनी करना जो कि मजुसियों की इजाद की हुई चीज़ है, जो आग को पूजते हैं और आग को अपना परमेश्वर मानते हैं.

५. मुसीबत और बला टालने, लम्बी उम्र और लोगों के बेनियाज़ी के लिए छह रक़अत नमाज़ पढ़ना.

६. पंद्रहवीं शाबान को हलवा बनाना (शुबरात का हलवा) इसके पीछे जो आस्था पाया जाता है वह अनाधार है और मात्र अफ़साना.

७. स रात रूहों के आगमन का अक़ीदा रखना और यह गुमान करना कि इस रात मरे हुए लोगों की रूहें घरों में आती हैं और रात भर बसेरा करती हैं. अगर घर में हलवा पातीं हैं तो ख़ुश हो कर लौट जाती हैं वरना मायूस हो कर लौटती हैं. इसलिए उनकी मनपसंद की चीज़ें पकवान बनाये जातें हैं.

८. यह भी भ्रान्ति फैली है कि शुबरात के पहले जो रूहें मरती हैं वे इस दिन आकर क़ब्रों से मिल जातीं हैं… यह अकीदा मात्र परिहास का संचार है और कुछ नहीं.

यह और इनके अतिरिक्त न जाने और कितने ही खुदसाख्ता काम किया जाता है जिसका पैगम्बर (स.अ.व.) ने कहा और न अल्लाह (स.व.त.) ने आदेश दिया और न ही खुलफा-ए-राशिदीन, अन्य सहाबा ताबेईन और सलफ़ ने किये हैं.

ऐ, मुसलमानों तुम अल्लाह का कहा मानों और रसूल (स.अ.व.) की इताअत करो.


-सलीम खान

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>मंदी से बचाव: भारत में भी इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू हो ! (Islamic banking system should be implemented in India)

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अमेरिका और यूरोप में मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली चालू करने पर गंभीरता से विचार चल रहा है| गौरतलब है कि इस्लामिक बैंक बिना ब्याज़ के अपना व्यवसाय करते हैं | अभी तक यह बैंकिंग सिर्फ इस्लामिक मुल्कों में ही चलन में है | मंदी के इस दौर में जब अमेरिका और यूरोप के बड़े बड़े बैंक दिवालिया हुए चले जा रहे हैं, तब बाज़ार को मंदी से बचाने के लिए तथा निर्यातकों को राहत देने के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपनाने पर ज़ोर दिया गया जा रहा है | इस प्रणाली के तहत बैंक निर्यातकों से उनका माल खरीदतें हैं और अपने रिस्क पर उसको निर्यात करते हैं, जिससे निर्यातकों को ख़तरा कम हो जाता है | यह बैंक लघु उद्योगों को जब व्यापार करने के लिए पैसा देतें हैं तो उनसे ब्याज़ के बजाये सर्विस चार्ज के रूप में एक छोटी सी रक़म लेते हैं, यही नहीं लघु उद्योग जब डूबने लगते हैं तो उनको दिवालिया होने से बचाने का प्राविधान भी इस प्रणाली में है|


भारत के कालीन निर्यातकों ने भी मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली अपनाने की मांग की है|

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>क्या भगवान रजनीश ईश्वर है? (Is Bhagwan Rajneesh God) ?

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कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है| कृपया मेरे शब्दों पर ध्यान दीजिये मैंने कहा कि “कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है !???”


मैंने पीस टी वी पर प्रश्नोत्तर काल में देखा था कि एक हिन्दू सज्जन ने कहा कि हिन्दू भगवान रजनीश को एक ईश्वर के रूप में नहीं पूजते हैं| मुझे ज्ञात हुआ कि हिन्दू भाई भगवान रजनीश को ईश्वर के रूप में नहीं देखते I

लेकिन रजनीश के मानने वाले – समर्थको ने उनकी फिलोसोफी और आइडियोलोगी को बदल दिया है, लेकिन यह भी सत्य है कि उनके मानने वाले किसी धर्म विशेष के नहीं हैं बल्कि अलग अलग धर्मों के हैं | और रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक … one and only, और वह ईश्वर हैं!

मैं इस बात को आगे बढ़ता हूँ – कुरआन के सुरः इखलास से और वेदों के अनुसार इसको जाँचता हूँ :

ईश्वर के अंतिम ग्रन्थ कुरआन के अध्याय ११२, सुरः इखलास में श्लोक संख्या १ से ४ में लिखा है कि –

1- कहो! अल्लाह यकता है| (अर्थात ईश्वर एक है)
2- अल्लाह निरपेक्ष और सर्वाधार है|
3- न वह जनिता है और न जन्य |
4- और ना उसका कोई समकक्ष |(अर्थात उस जैसा कोई नहीं)

इसी तरह वेदों में लिखा है कि – एकम ब्रह्मा अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति नास्ति नेह्न्ये ना अस्ति | (ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है. नहीं है, नहीं, ज़रा भी नहीं है.)

और

ना तस्य प्रतिमा अस्ति | (ईश्वर की कोई प्रतिमा, कोई बुत, कोई फोटो, कोई तस्वीर, कोई छवि, कोई मूर्ति नहीं हो सकती)

(अ) सुरः इखलास में लिखा है- ‘क़ुल हु अल्लाह हु अहद’ –‘यानि, वह अल्लाह (ईश्वर) है, एक और केवल (यकता)| क्या रजनीश वन एंड वनली है? क्या रजनीश एक है और केवल एक? हम देखते हैं कि हमारे देश में फर्जी व्यक्ति अपने आपको भगवान-पुरुष इस तरह से बताते हैं कि जनता को ऐसा लगने लगता है कि वह ईश्वर है या ईश्वर का रूप है| ऐसे बहुत मिलेंगे अपने इस महान देश भारत में | रजनीश वास्तव में एक और केवल मात्र एक नहीं है| मनुष्य होने के बावजूद और केवल मनुष्य होने के नाते कोई यह घोषित कर दे कि वह ईश्वर है, गलत है | बिलकुल ही गलत है| फिरभी रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक… one and only. एक ही समय में कोई दो कैसे हो सकता है. हम मानते हैं कि ईश्वर अर्थात अल्लाह अमर है. क्या रजनीश अमर हैं? हम जानते हैं ईश्वर खाना नहीं खता. क्या रजनीश खाना नहीं खाता था. ऐसे ही बहुत से ईश्वर के गुण हैं जो केवल उसी के लिए ही हैं. हाँ अगर उन गुणों उन विशेषताओं पर कोई खरा उतरता है मैं उसे ईश्वर मानने के लिए तैयार हूँ.

(आ) आगे सुरः इखलास में लिखा है अल्लाह हुस् समद’– ‘अल्लाह निरपेक्ष है और सर्वाधार है’

क्या रजनीश निरपेक्ष और सर्वाधार है ??? ईश्वर अमर व अजर है | क्या रजनीश अमर या अजर थे? मैंने तो उनकी जीवनी में पढ़ा है कि उनको डायबिटीज़, अस्थमा और क्रोनिक बैकएच जैसी कई बीमारियाँ थी | वे जब अमेरिका की जेल में थे तब उन्होंने वहां की सरकार पर उनको को मारने की नियत से स्लो पोइसोनिंग का इल्जाम लगाया था | कल्पना कीजिये! परमशक्तिसंपन्न ईश्वर को ज़हर दिया जा रहा है! और तो और हम सब जानते हैं कि रजनीश की म्रत्यु हुई थी जैसे हम और आप मरते हैं और वह तो जलाये भी गए थे|

इस तरह से रजनीश अमर नहीं थे ना ही सर्वाधार, सर्वव्यापी |

(इ) तीसरा वाक्य है ‘लम य लिद व लम यु लद’ – यानि ‘He begets not, nor is begotten’. वह (ईश्वर) न जनिता है न जन्य‘|

अब हमें और आपको अर्थात सबको पता है रजनीश पैदा हुए थे| उनका जन्म भारत के जबलपुर शहर में हुआ था जैसे कि मेरा जन्म भारत के पीलीभीत जिले में हुआ था और आपका भी कहीं ना कहीं हुआ है अर्थात सभी मनुष्य की तरह वह भी पैदा हुए थे| उनकी माता थीं और उनके पिता भी| रजनीश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे| मई 1981 में वे अमेरिका गए और अमेरिका के ओरेगोन शहर में बस गए जिसका नाम रखा उन्होंने ‘रजनीशपुरम’ | अमेरिका में उनके द्वारा किये गए किसी अपराध के लिए वह जेल गए और सन 1985 में अमेरिका से डिपोर्ट कर दिए गए| इस तरह से रजनीश भारत वापस आ गए और पुणे में ‘Rajneesh Neosanyas Commune’ की शुरुवात की जिसका नाम बाद में बदल कर ‘ओशो कम्यून’ |

अगर कभी वक़्त मिले तो पुणे जाईयेगा- ‘ओशो कम्यून’ में, वह आपको पत्थर पर लिखा हुआ मिलेगा कि “OSHO – never born, never died, only visited the planet earth between 11th Dec. 1931 to 19th Jan 1990”. ‘ओशो- ना कभी पैदा हुआ, ना कभी मरा, केवल 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच पृथ्वी पर आया था’|

उस पत्थर पर एक बात लिखना शायेद भूल गए कि रजनीश अर्थात भगवन रजनीश को दुनिया के विभिन्न 21 देशों ने वीज़ा देने से मना कर दिया गया| सोचिये और कल्पना कीजिये – सर्वशक्तिमान ईश्वर धरती पर आता है और उसे वीज़ा की आवश्यकता पड़ती है!

(ई) चौथा वाक्य (आयत) है व लम य कुल्लहु कुफुवन अहद “none besides the One True God, Allah (swt), ‘there is none like Him’. यानि :और ना कोई उसका समकक्ष” (अर्थात उस जैसा कोई नहीं)

अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | वेदों में लिखा है – “ना तस्य प्रतिमा अस्ति” उसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती | इधर हम जानते है कि रजनीश एक इन्सान थे, उनका एक सिर था, दो हाँथ, दो पैर और बड़ी सी दाढ़ी भी | कल्पना कीजिये कि कोई कहे, “ईश्वर हज़ार गुना शक्तिशाली है अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर के मुकाबले”| अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर जैसा कि आप जानते है दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक है| वह मिस्टर यूनिवर्स के खिताब से नवाज़ा गया था| अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती चाहे उसे सौ गुना हज़ार गुना ज्यादा कहके क्यूँ ना कहा जाये य चेह कोई कितना भी बलशाली क्यूँ ना हो, उसकी तुलना करके आप ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकते, ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | भले चाहे वह खली, दारा सिंह य किंग कोंग क्यूँ ना हो|

“The moment you can compare the claimant to godhood to anything, he or she is not God.” ‘Wa lam ya kul lahu kufwan ahad’ ‘there is none like Him.’ वेदों में लिखा है – ना तस्य प्रतिमा अस्ति | “एकः ब्रह्म अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति, नास्ति किंचन मात्र नास्ति”

यहाँ पढ़े रजनीश के बारे में और ज़्यादा !


-सलीम खान

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>अब घर-घर कुरआन पहुंचेगा (Qura’n will avail everywhere in India)!

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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की ओर से कुरआन के प्रचार-प्रसार के लिए प्रदेश में ‘कुरआन सबके लिए’ अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत कुरआन का हिंदी व अंग्रेजी में प्रकाशन कर इसे घर-घर में पहुंचाया जा रहा है। पहले चरण में कुरआन की पांच हजार प्रतियां छपवाई गई हैं।


संस्था के प्रदेश अध्यक्ष जनाब सलीम ने रविवार को बताया कि हिंदुस्तान में विभिन्न धर्र्मो के लोग रहते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के धर्र्मो के बारे में नहीं जानते, जिससे भ्रांतियां पैदा हो जाती हैं।


देश में शांति, सद्भावना व भाईचारा रखने के लिए एक-दूसरे के धर्र्मो के बारे में जानना आवश्यक है।


संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौलाना मोहम्मद जफर ने बताया कि हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) ने पवित्र कुरआन के द्वारा सामाजिक बुराइयों को दूर कर हर व्यक्ति को न्याय दिलाते हुए विश्व-बंधुत्व की भावना का संचार किया था। ऐसे में हर व्यक्ति को इसका अध्ययन करना चाहिए। कल रविवार 26 जुलाई को जयपुर में इस अभियान के तहत बड़ा आयोजन कियागया था । कोटा, राजस्थान के शहर अध्यक्ष गुलशेर अहमद ने बताया कि मंगलवार को सुबह 9 बजे किशोरपुरा स्थित मस्जिद और रात सवा नौ बजे स्टेशन बड़ी मस्जिद में कार्यक्रम होगा। इसी क्रम में रविवार सुबह साढ़े 10 बजे प्रेस क्लब में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें प्रदेश अध्यक्ष सलीम, शहर काजी अनवार अहमद, दुर्गाशंकर गहलोत, डॉ. आरसी साहनी, दिल्ली प्रदेश के प्रचार सचिव जैनुल आबिदीन मंसूरी आदि ने संबोधित किया। समारोह में कुरआन की शिक्षा का जन-जन में प्रचार कर उससे सीख लेने की बात कही।


अगर आप भी इसमें शिरकत करना चाहते हों तो आपका स्वागत है,


कुरआन को समझने के इसका हिंदी अनुवाद पढने के आप इच्छुक हो तो आपका स्वागत है. इन्टरनेट पर यह quraninhindi.com पर उपलब्ध है.


साथ ही अंतिम अवतार के बारे में जाने http://antimawtar.blogspot.com/ पर


लखनऊ में एक किताब छपती है ‘विश्व एकता सन्देश’ यह कई दशकों से भारत की जनता को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही है.


-सलीम खान

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>सचमुच मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं (Muslims are really insidious) !!!???

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मैंने दो दिन पहले एक लेख पोस्ट लिखी थी जिसके मज़मून का इरादा यह था कि क्या मुसलमान धोखेबाज़ होते हैं? जैसा कि आजकल मिडिया और इस्लाम के आलोचक यह प्रोपगैंडा फैला रहें हैं. वह कुछ ऐसा ही करते जा रहें हैं कि इस्लाम ही है जो दुनिया के लिए खतरा है, यह जाने बिना यह समझे बिना हालाँकि सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि वे सब इस्लाम का विरोध इसलिए तो कतई भी नहीं करते उन्हें इस्लाम के बारे में मालूमात नहीं है बल्कि इसलिए कि पश्चिम देश (जो कि इस्लाम के दुश्मन हैं) के अन्धानुकरण के चलते विरोध करते हैं, आज देश में जैसा माहौल है और जिस तरह से अमेरिका और यूरोप आदि का अन्धानुकरण चल रहा है, ऐसा लगने लगा है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति को भूलते ही जा रहे हैं और यह सब उन लोगों की साजिश के तहत होता जा रहा है. पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता को आत्मसात करने की जो होड़ लगी है, उससे निजात कैसे मिले? उसे कैसे ख़त्म किया जाये? उसे कैसे रोका जाये? मुझे लगता है कि भारत में मुस्लिम ही ऐसे हैं जो अब पश्चिम की भ्रष्ट सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ बोल रहें हैं और उससे अभी तक बचे हुए हैं. वरना बाक़ी भारतीय (जो गैर-मुस्लिम हैं) अमेरिका आदि देशों की चाल में आसानी से फंसते चले जा रहे हैं.


खैर, ऊपर मैंने जो सवाल उठाये हैं उन्हें आप अपने अंतर्मन से पूछिये? आप सोचें कि इनके क्या जवाब हो सकते हैं? वैसे मेरे दिमाग में एक जवाब है हम अपने हिन्दू भाईयों से यह गुजारिश करते हैं कि वे वेदों को पढें, पुराणों को पढें क्यूंकि जहाँ तक मुझे अपने अध्ययन से मालूम चला है कि केवल वेद ही ऐसी किताब है जिसे हमारे हिन्दू भाई ईश्वरीय किताब कहते हैं. और अगर यही है तो मेरा कहना है कि जो भी किताब वेद के खिलाफ़ जाती है उसका बहिस्कार करें, उसे बिलकुल भी न पढें. मैं इधर बैठ कर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि कुरान और वेद की शिक्षाएं ज़्यादातर सामान ही हैं.

मैं ये नहीं कहता कि हमारे और आपके बीच इख्तिलाफ़ (विरोधाभास) नहीं हैं. इख्तिलाफ़ तो है. लेकिन आज हम आपस में उन चीज़ों को आत्मसात करें जो हममे और आपमें यकसां (समान) हों. समानताओं पर आओ. विरोध की बातें कल डिस्कस करेंगे.

अल्लाह त-आला अपनी आखिरी और मुक़म्मल किताब में फरमाता है: “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं. (ताअलौ इला कलिमती सवा-इम बैनना व बैनकुम)” अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३

वैसे मैं ये पोस्ट लिखी है अपने एक ब्लॉग मित्र सुरेश चिपलूनकर से उन सवालों के जवाब में जिसमें उन्होंने कहा कि

सलीम भाई, द्विवेदी जी की बात को आगे बढ़ाईये और इस बात पर एक पोस्ट कीजिये कि क्या मुस्लिम धर्म, दूसरे धर्मों को पूर्ण आदर-सम्मान देता है? धर्म परिवर्तन अक्सर हिन्दू से ईसाई या हिन्दू से मुस्लिम होता है (अधिकांशतः लालच या डर से) तो विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या होने के बावजूद ईसाईयों और मुस्लिमों को अन्य धर्मों से धर्म-परिवर्तन करवाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? ऐसा क्यों होता है कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक होते हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों को उतने अधिकार नहीं मिलते जितने भारत में अल्पसंख्यकों को मिले हुए हैं? मुस्लिम बहुल देशों में से अधिकतर में “परिपक्व लोकतन्त्र” नहीं है ऐसा क्यों है? सवाल तो बहुत हैं भाई…” और द्विवेदी जी कि टिपण्णी क्या थी “हर कोई अपने धर्म को सब से अच्छा बताता है। यह आप का मानना है कि इस्लाम सब से अच्छा धर्म है। दूसरे धर्मावलंबी इस बात को कतई मानने को तैयार न होंगे। हमें अपने धर्म को श्रेष्ठ मानने का पूरा अधिकार है। लेकिन दूसरे व्यक्ति के विश्वासों का आदर करना भी उतना ही जरूरी है.”

सुरेश भाई, सबसे पहले तो मैं यह आपको बताना चाहता हूँ कि यह इस्लाम धर्म है ना कि मुस्लिम धर्म. इस्लाम धर्म के अनुनाईयों को मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहते हैं. इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शांति’ और इसका एक और अर्थ होता है ‘आत्मसमर्पण‘ और इस्लाम धर्म को मानने वालों को मुस्लिम कहते हैं, उर्दू या हिंदी में मुसलमान कहते हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने भी लोग हैं वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ? (अर्थात नहीं)” सुरह १०, सुरह युनुस आयत (श्लोक) संख्या ९९

कहो: हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाये जो हम पर उतारी है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक और याक़ूब और उनकी संतान पर उतरी उसपर भी. और जो मूसा और ईसा और दुसरे नबियों को उनके रब के ओर से प्रदान हुईं (उस पर भी हम इमान रखते हैं) हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध में अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं.” सुरह ३, सुरह आले इमरान, आयत (श्लोक) ८४

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं. सही बात, नासमझी की बात से अलग हो कर स्पष्ट हो गयी है…” सुरह २, सुरह अल-बकरह, आयत २५६

इस्लाम अल्लाह त-आला (ईश्वर) के नज़दीक सबसे अच्छा दीन (धर्म) है, अल्लाह त-आला के नज़दीक पूरी दुनिया के मनुष्य उसी के बन्दे और पैगम्बर हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद हैं.

अल्लाह त-आला फरमाते हैं:

ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक दुसरे को पहचानों और वास्तव अल्लाह के यहाँ तुममे सबसे प्रतिष्ठित वह है जो तुममे सबसे अधिक डर रखता हो, निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है.” सुरह ४९, सुरह अल-हुजुरात, आयत (श्लोक) १३

ऐसी ही सैकणों आयतें अर्थात श्लोक कुरआन में मौजूद हैं. कुल मिला कर लब्बो-लुआब (सारांश) यह है कि इस्लाम धर्म के अनुनायी जिन्हें मुस्लिम (आज्ञाकारी) कहा जाता है को अल्लाह की तरफ से हिदायत दी गयी है कि वह दीगर मज़ाहब के लोगों के साथ आदर का भाव रक्खो. हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) ने हमें यह ताकीद किया है कि सभी धर्मों के अनुनायीयों को उनके धर्म को मानने की आज़ादी है. साथ ही अल्लाह त-आला अपनी किताब में यह भी फ़रमाता है कि मैंने तुमको जो सत्य मार्ग बताया है उसे फैलाओ और उन्हें बताओ जो नहीं जानते, यह तुम पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) है.

ये मुशरिक़ (विधर्मी) क़यामत के दीन हमारी गिरेबान पकडेंगे और हमसे (मुस्लिम से) पूछेंगे कि अल्लाह त-आला ने तुम्हें हिदायत (आदेश और सत्यमार्ग) दे दिया था तो तुम लोगों ने हमें क्यूँ नहीं बताया. और यह भी कहा गया कि अगर किसी मुस्लिम के पड़ोस में कोई मुशरिक़ रहता है और वह उसी हालत में मृत्यु को प्राप्त होता है तो क़यामत के दीन अल्लाह त-आला मुशरिक़ से पूछेंगे कि तुम सत्यमार्ग पर क्यूँ नहीं चले जबकि हमने आखरी पैगम्बर के ज़रिये और आखिर किताब के ज़रिये तुम्हे हिदायत का रास्ता बतला दिया था. तो वह मुशरिक़ कहेगा कि ऐ अल्लाह, मेरे मुस्लिम पडोसी ने मुझे नहीं बताया. और अल्लाह त-आला उस मुशरिक़ को जहन्नम की आग में डाल देगा. इसी तरह अल्लाह त-आला उस मुस्लिम पडोसी से पूछेंगे कि तुमने यह जानते हुए कि इस्लाम की दावत फ़र्ज़ है तुम पर फिर भी अपने पडोसी को क्यूँ नहीं बताया? और उस मुसलमान को भी जहन्नम की आग में डाल देंगे.

यह कहना कि जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहाँ अल्पसंख्यक (दुसरे धर्म के लोगों) को अधिकार नहीं मिलते, बिलकुल भी गलत है, इस्लाम के प्राथमिक स्रोतों (कुरआन और सुन्नत) में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि दुसरे धर्म के लोगों को उनके रहन-सहन, धार्मिक आस्था और विश्वाश के प्रति गलत व्यवहार करे, बल्कि यह हिदायत ज़रूर है कि उन्हें सत्य मार्ग का रास्ता बताएं.

रही बात लोकतंत्र के सवाल का तो इसका जवाब थोडा बड़ा है फ़िलहाल इतना मैं बताना चाहूँगा कि हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के ज़माने में भी ख़लीफा लोगों का चुनाव होता था. सभी को अधिकार प्राप्त थे.

मैं अपनी पोस्ट कुरआन की इस बात (अध्याय ३, सुरह आलम-इमरान आयत (श्लोक) संख्या ६३) पर ख़त्म करना चाहता हूँ कि “आओ उस बात की तरफ जो हममे और तुममे यकसां (समान) हैं.

अल्लाह (ईश्वर) हमें सत्यमार्ग पर चलने की हिदायत दे.
सलीम खान

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