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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -1

>प्रोफेसर रामशरण शर्मा प्राचीन भारत के इतिहास के प्रख्यात विद्वान हैं. वे उन इतिहासकारों में से हैं, जिन्होंने प्राचीन भारत के बारे में पुरानी धारणाओं और नज़रिये को बिल्कुल बदल डाला. इसीलिए वे हमेशा से भगवा ब्रिगेड के निशाने पर रहे हैं. उनपर कई जानलेवा हमले तक किये गये हैं. इस व्योवृद्ध इतिहासकार का एक लंबा व्याख्यान हम किस्तों में यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति के विभिन्न आयामों और राम-कृष्ण की ऐतिहासिकता पर विस्तार से चर्चा की है. यह व्याख्यान उन्होंने 1990 में काकतिया विश्वविद्यालय में हुए आंध्र प्रदेश इतिहास कांग्रेस के 14वें अधिवेशन में दिया था. इसका अनुवाद यश चौहान ने किया है. व्याख्यान का प्रकाशन पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने किया है.


साभार प्रस्तुति.

ज्यों-ज्यों और जब-जब सत्ता का संकट गहराता है, धर्म और सांप्रदायिक राजनीति की शरण में पूरी व्यवस्था चली जाती है. याद करिए 1991-1992 का दौर, जब देश पर आर्थिक उदारीकरण के रूप में नव उदारवाद थोपा जा रहा था, सांप्रदायिक राजनीति उफान पर थी. आम लोग लोग मंदिर-मसज़िद के चक्कर में पडे़ थे और देश में अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप मज़बूत हो रहा था. बाज़ार खोले जा रहे थे और लोगों की जेब तक बहुराष्ट्रीय पंजों की पहुंच संभव बना दी गयी थी. यह केवल एक उदाहरण है. उसके पहले और उसके बाद भी, जब-जब राजसत्ता संकट में फंसी है और उससे निकलना मुश्किल लगा है-धर्म ने उसकी मदद की है-यह एक ऐतिहासिक तथ्य है. अभी, जब सरकार को लगा कि वह परमाणु करार पर फंस रही है, रामसेतु सामने आया. यहां साफ़ होना चाहिए कि यह संकट तथाकथित वामदलों की तरफ़ से नहीं था, बल्कि वामदलों ने किसी भी तरह का संकट नहीं खडा़ किया, वे तो बस नूराकुश्ती करते रहे. उन्होंने वे असली सवाल खड़े ही नहीं किये जो इस करार के संदर्भ में किये जाने चाहिए थे. कुल मिला कर वाम दलों ने विरोध का दिखावा किया (उनसे हम इसके अलावा किसी और चीज़ की अपेक्षा भी नहीं करते). संकट यह था कि सरकार (मतलब यह पूरी व्यवस्था ही) लोगों के सामने इसके लिए बेपर्द हो रही थी कि उसने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिये थे और लोग देख रहे थे कि इस ‘महाशक्ति’ को एक अदना-सा अमेरिकी अधिकारी भी घुड़क सकता था. वाम दल अब नौटंकी करते-करते थक चुके थे और कोई दूसरी स्क्रिप्ट उन्हें नहीं मिल पा रही थी. रामसेतु इसी मौके पर त्राता के रूप में सामने आया.

मगर रामसेतु ने कई और सवाल भी खडे़ किये. इस पूरे प्रसंग पर लोगों ने यह कहा कि किसी की आस्था से छेड़्छाड़ ठीक नहीं. बिलकुल. आस्थाओं से क्यों छेड़छाड़ हो? यह ज़रूरी भी नहीं. कोई कुछ भी आस्था रखे, इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मगर जब इसी आस्था के नाम पर हज़ारों-लाखों का कत्लेआम किया जाने लगे (किया जा चुका ही है) तो इस आस्था को माफ नहीं किया जाना चाहिए. यह किसी की भी आस्था हो सकती है कि राम हुए थे, मगर इसे लेकर जब वह हत्याकांड रचने लगे तो फिर उसे यह बताना ज़रूरी है कि वह गलती पर है. ऐतिहासिक तौर पर यह साबित नहीं होता कि राम और कृष्ण का अस्तित्व था. कोई कुछ भी कहता और मानता रहे, वह मानने को आज़ाद है. मगर इससे इतिहास लिखनेवाले और वैज्ञानिक नज़रिया रखनेवाले अपनी धारणा क्यों बदलें? क्या एएसआइ यह मान ले कि राम का अस्तित्व था? भगवा ब्रिगेड तो यही चाहता है.

सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या

ब राजनीतिक उद्देश्य से धर्म के नाम पर उसके अनुयायियों को उभारा जाता है तब सांप्रदायिकता का उदय होता है. अपने संप्रदाय की सुरक्षा के नाम पर दूसरे संप्रदाय के लोगों को सताना भी सांप्रदायिकता है. भारत में संप्रदायवाद को खास तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की प्रकृति की रोशनी में देखा जाता है, हालांकि हाल में सिख धर्म के आधार पर संगठित समुदाय को भी जोरों से उभारने की चेष्टा चल रही है.


प्रकृति द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं को हटाने के लिए मानव को अनवरत संघर्ष करना पड़ता है, जिससे धार्मिक विश्वास, कर्मकांड और रीति-रिवाजों का उदय और विकास होता है. उसी प्रकार सामाजिक मसलों पर मानव के विरुद्ध मानव के संघर्ष में भी धर्म और कर्मकांड उभरते व विकसित होते हैं. जब लोगों के लिए प्रकृति द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों की युक्तिपूर्वक विवेचना कर पाना कठिन हो जाता है, तो वे चमत्कारिक और अंधविश्वासपूर्ण स्पष्टीकरणों का सहारा लेने लगते हैं. इन्हीं से जन्म लेते हैं, अनेकानेक देवी-देवता. ऋग्वेद में वर्णित अधिकतर देव प्रकृति की या तो उपकारी या फिर अपकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.


फिर जब किसानों, दस्तकारों और अन्य मेहतकशों की कमाई पर आधारित अपनी सत्ता और विशेषाधिकारों को बरकरार रखने में विशेषाधिकार-संपन्न लोग कठिनाई अनुभव करते हैं, तो वे कर तथा खिराज वसूल करने के लिए अंधविश्वास के इस्तेमाल के तरीके ढूंढ़ निकालते हैं. इसी तरह जब अभावों के बोझ से पिस रहे जनसमुदाय सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं, तो वे देवता को सहायता के लिए पुकारते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास कराया जाता है कि देवता ने मुक्त और समान मानव प्राणियों का सृजन किया है. इस तरह, धर्म का प्रयोग समाज के विशेषाधिकार संपन्न और सुविधाहीन वर्ग, दोनों करते हैं. पर यह कार्य अधिकतर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग करते हैं, क्योंकि उनकी विचारधारा, जैसाकि भारतीय स्थिति में दरसाया जा सकता है, प्रभुत्वपूर्ण विचारधारा में तब्दील कर दी जाती है और जनता के दिलो-दिमाग में गहरे बिठा दी जाती है.


प्राचीन और मध्यकाल के पूंजीवाद पूर्व के समाजों में धर्म ने वही भूमिका निभायी, जो भूमिका आधुनिक काल के पूंजीवादी और अन्य समाजों में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएं निभा रही हैं. इस कथन का आशय यह नहीं कि पूंजीवाद पूर्व के राज्य धर्म शासित राज्य थे. उनकी नीतियां अधिकतर शासक वर्ग के आर्थिक व राजनीतिक हितों से निर्देशित होती थीं और खुद धर्म का इस्तेमाल इसी प्रयोजन से किया जाता था. इस तरह बौद्ध, ईसाई और इसलाम जैसे धर्मों के उदय ने और भी स्वस्थ दिशाओं में समाज व अर्थतंत्र में सुधार लाने व उसे पुनर्गठित करने में सहायता पहुंचायी. धर्मों द्वारा प्रतिपादित सामाजिक मानदंडों ने बेहतर सामाजिक प्रणालियां निर्मित करने के लिए जनता को प्रेरित किया. पर यह बात समझ लेनी चाहिए कि प्रत्येक धर्म खास किस्म के सामाजिक वातावरण की उपज होता है. इस तरह, बौद्ध धर्म द्वारा आम तौर पर समस्त प्राणियों और विशेष कर गायों की रक्षा पर जो जोर दिया गया, उससे ऐसे समय में सहायता मिली जब लगभग ईसा पूर्व 500 के बाद, गंगा के मध्य मैदानी भागों में बड़े पैमाने पर खेती में लौह उपकरणों का इस्तेमाल होने लगा था. लेकिन बौद्ध धर्म ने उन वर्ण आधारित भेदों को नहीं मिटाया, जो समाज के विभिन्न हिस्सों के बीच अतिरिक्त उत्पाद (अधिशेष) के असमान वितरण के फलस्वरूप पैदा हो गये थे. ब्राह्मण धर्म ने गाय की रक्षा के विचार पर ध्यान केंद्रित करके बौद्ध धर्म के हाथ से पहल छीन ली. बड़ी ही चालाकी से उसने यह घोषणा भी कर डाली कि ब्राह्मणों का जीवन भी गाय की तरह अति पवित्र है और फिर इस विचार को पुर्नजन्म के विचार के साथ जनता के दिमाग में ठोंक-पीट कर बैठा दिया गया. स्पष्ट ही, गाय की रक्षा के सिद्धांत ने उन जनजातीय क्षेत्रों में हल आधारित कृषि और पशुपालन को काफी उन्नत किया, जो क्षेत्र विजित करके और भूमि अनुदानों के जरिये, ब्राह्मणों के प्रभाव के तहत आ गये थे. लेकिन अब कृषि तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति के साथ सुरक्षा में प्राथमिकता की दृष्टि से स्वभावत: ही, मवेशी काफी पीछे रह गये हैं. आज पवित्र गाय का सिद्धांत हमारी आर्थिक प्रगति में अवरोध बन जाता है. हम या तो ऐसे पशुओं का ही पेट भरें जो आर्थिक रूप से अलाभकारी और अनुत्पादक हैं और या फिर उत्पादक कार्यों में संलग्न इनसानों का ही. इस बात पर अनेक प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने जोर दिया है. इस प्रकार हम भौतिक जीवन और विचारधारा की शक्ति के तकाजों के बीच परस्पर क्रिया को देख सकते हैं. पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आरंभिक इतिहास में बौद्ध धर्म ने सकारात्मक भूमिका निभायी और समाज को गति प्रदान की.

इसी तरह ईसाई धर्म ने दास और स्वामी के बीच समानता के सिद्धांतों का प्रचार किया, दोनों को ईश्वर की दुनिया में एक ही कोटि का प्राणी घोषित किया, पर रोमन साम्राज्य ने इस दोनों के बीच मौजूद वास्तविक सामाजिक विभेद का उन्मूलन करने के लिए कुछ भी नहीं किया. इसलाम धर्म ने विभिन्न अरब कबीलों और जनजातियों को एक ही राज्य में जोड़ कर प्रगतिशील भूमिका अदा की और उनके बीच लगातार चलनेवाले कबीलाई झगड़े-फसादों को काफी हद तक कम कर दिया. उसने अमीर और गरीब के बीच समानता के सिद्धांतों का भी प्रचार किया और यह आग्रह किया कि जकात (दान) व करों के जरिये अमीरों को गरीबों की मदद करनी चाहिए. पर इसलाम भी अपनी जन्मभूमि में मौजूद सामाजिक वास्तविकता की उपेक्षा न कर सका और उसे अपने अनुयायियों को अधिकतम चार पत्नियां रखने की अनुमति देनी पड़ी. यह कबीलाई मुखियों द्वारा 20-30 या उससे भी अधिक पत्नियां रखने से निश्चय ही बेहतर था. हालांकि इसलाम मूर्ति पूजा के खिलाफ था, पर उसे भी इसलाम पूर्व के मक्का में स्थापित संगे असवद की पवित्रता को स्वीकार करना पड़ा. अत: धर्मों को उन सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, जिनमें वे जन्म लेते हैं.


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