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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -6

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राम के अस्तित्व, सांप्रदायिक राजनीति और इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर प्रख्यात इतिहासकार प्रो राम शरण शर्मा के व्याख्यान की छठी किस्त में इतिहासकारों द्वारा अपनायी गयी त्रुटिपूर्ण और एकांगी इतिहास दृष्टि की चर्चा की गयी है.

प्रो राम शरण शर्मा

रंभिक मध्यकालीन बिहार की विभिन्न प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से यह संकेत करती हैं कि बौद्धों और ब्राह्मण धर्म के अनुयायियों के बीच खुला और हिंसक टकराव रहा था. इन प्रतिमाओं में अपराजित सहित कई बौद्ध देवताओं को शैव देवों को पैरों से रौंदते हुए चित्रित किया गया है. धर्मग्रंथों में यह टकराव बौद्धों के खिलाफ शंकर द्वारा व्यापक पैमाने पर चलाये गये अभियान में प्रतिबिंबित होता है. यह सोचना गलत होगा कि बौद्धों का इस देश से सफाया केवल इस वजह से हुआ कि उनके खिलाफ वैचारिक प्रचार किया गया था. ऐसा लगता है उनका बाकायदा उत्पीड़न किया गया था. इससे उनके सामने केवल दो विकल्प बच रहे थे. या तो वे भाग कर दूसरे देशों में चले जायें या फिर सामाजिक विषमताओं से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम धर्म अपना ले. विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ), भागलपुर (चंपारण) और बांगलादेश में, जहां बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुसलिम आबादी है. बौद्ध भारत से वस्तुत: गायब क्यों हो गये इस बात को केवल इस आधार पर ही स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि उनका धर्म आंतरिक तौर पर परिवर्तित हो रहा था. इस प्रश्न पर विचार करने के लिए उनके प्रति मध्यकालीन हिंदू शासक वर्गों और धार्मिक नेताओं के दृष्टिकोण पर ध्यान देना होगा. जैनियों का भी उत्पीड़न किया जाता रहा था. लखनऊ संग्रहालय में रखी जैन देवी देवताओं की कई प्रस्तर मूर्तियां, विरूपित अवस्था में मिली हैं. स्पष्टत: ही यह काम इन मूर्तियों को वैष्णव जामा पहनाने के लिए कुछ वैष्णवों द्वारा किया गया था. जैनियों ने अपने कर्मकांडों और सामाजिक रीति-रिवाजों को काफी हद तक संशोधित करके, अपने को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी जीवन पद्धति के अनुरूप ढाल लिया. इस बात पर जोर देना गलत होगा कि हिंदू एक समेकित समुदाय थे. जाने-माने पुनरुत्थानवादी और मुस्लिम विरोधी इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार तक इस बात को मानते हैं कि हिंदू शासक वर्ग की कतारों में एकजुटता का अभाव था और वे अंतर्विरोधों से बुरी तरह ग्रस्त थे. उन्हें यह बात बहुत ही दुखद लगती है कि जब एक हिंदू राज्य पर मुसलमानों ने हमला किया तो एक पड़ोसी हिंदू राजा ने इस अवसर का लाभ उठा कर पीछे की तरफ से उस राज्य पर वार किया. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडियन पीपुल, खंड-5, प्रस्तावना, पृष्ठ 14-16).

विंध्याचल के दक्षिणवर्ती क्षेत्र तक में मुस्लिम खतरे को इतना कम करके आंका गया कि दक्कन के शक्तिशाली यादव शासकों ने गुजरात के चालुक्यों पर दक्षिण से ठीक उस समय हमला बोल दिया जब वे उत्तर में आये मुस्लिम हमलावरों के साथ जीवन-मरण के संघर्ष में लगे थे (वही पृष्ठ 14).

हिंदू धार्मिक नेताओं के बीच सांप्रदायिक असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण अयोध्या के मध्यकालीन इतिहास से लिया जा सकता है. जब तक औरंगजेब का शासन था, उसके लौह हस्त के नीच अयोध्या में सब कुछ शांत रहा. पर 1707 में उसकी मृत्यु के बाद हम वहां शैव संन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के संगठित दलों के बीच खुला और हिंसक टकराव देखते हैं. इन दोनों के बीच विवाद का मुद्दा यह था कि धार्मिक स्थलों पर किसका कब्जा रहे और तीर्थयात्रियों को भेंट और उपहारों में प्राप्त होनेवाली आय किसके हाथ लगे. 1804-05 की एक पुस्तक से इन दोनों संप्रदायों के बीच होनेवाले हिंसक टकरावों के बारे में उद्धरण दिये जा सकते हैं : उस समय जब राम जन्म दिवस का अवसर आया, लोग बड़ी संख्या में कौसलपुर में एकत्र हुए. कौन उस जबर्दस्त भीड़ का वर्णन कर सकता है. उस स्थान पर हथियार लिये जटाजूटधारी और अंग-प्रत्यंग में भस्म रमाये असीमित(संख्या में) संन्यासी वेश में बलिष्ठ योद्धा उपस्थित थे. वह युद्ध के लिए मचलती सैनिकों की असीम सेना थी. वैरागियों के साथ लड़ाई छिड़ गयी. इस लड़ाई में (वैरागियों को) कुछ भी हाथ न लगा क्योंकि उनके पास रणनीति का अभाव था. उन्होंने वहां उनकी ओर बढ़ने की गलती की. वैरागी वेशभूषा दुर्गति का कारण बन गयी. वैरागी वेशभूषावाले सारे लोग भाग खड़े हुए उनसे बहुत दूर (यानी संन्यासियो से) उन्होंने अवधपुर का परित्याग कर दिया. जहां भी उन्हें (संन्यासियों को) वैरागी वेष में लोग नजर आते, वे उन्हे भयावह रूप से आतंकित करते. उनके डर से हर कोई भयभीत था और जहां भी संभव हो सका लोगों ने गुप्त स्थानों में शरण ली और अपने को छिपा लिया. उन्होंने अपना बाना बदल डाला और अपने संप्रदाय संबंधी चिह्र छिपा दिये. कोई भी अपनी सही-सही पहचान नहीं प्रकट कर रहा था. (हैंसबेकर, अयोध्या, गोरनिंगनन, 1986, पृष्ठ 149 में श्रीमहाराजचरित रघुनाथ प्रसाद से उद्धृत)

उक्त उद्धरण मध्यकालीन धार्मिक हिंदू नेताओं द्वारा सहिष्णुता बरतने के मिथक का भंडाफोड़ कर देता है. हम लक्षित कर सकते हैं कि सदियों के मतारोपण से एक समेकित हिंदू समुदाय का निर्माण नहीं हुआ. आज तक भी तथाकथित अनुसूचित जातियां पशुओं का मांस खाती हैं, जिनमें गायें भी शामिल हैं तथा कुछ मामलों में अपने मृतकों को दफनाती तक हैं.

उत्पीड़ित वर्गो की ठीक यही वह कोटि है, जिसे महात्मा गांधी ने हरिजन की संज्ञा दी थी और बिहार और अन्यत्र गांवों में जिनके मकानों को मुख्यत: आर्थिक कारणों से जला कर राख कर दिया जाता है और जिनके परिवार के सदस्यों को भून डाला जाता है. एकदम हाल में जब बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोगों ने दक्षिण में ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया तो इससे हिंदुत्व के तथाकथित संरक्षकों के बीच बड़ा कोहराम मच गया.
इसी तरह, पुराणपंथियों के हिंसक प्रचार के बावजूद, मुसलमानों को समेकित समुदाय नहीं माना जा सकता. भारत में और अन्यत्र शियाओं और सुन्नियों के बीच खूनी टकराव सर्वविदित है. ईरान और इराक के बीच लंबे समय तक चले खूनी टकराव की तो चर्चा ही क्या. भारत में बहुत से ऊंचे दर्जे के और संपन्न मुस्लिम परिवार, हिंदुओं के उच्चतर तबकों और संपन्न परिवारों की तरह ही जुलाहों, पंसारियों और मुसलमानों के अन्य तथाकथित निम्न समुदायों को नीची नजर से देखते हैं. दंगा जांच आयोग की रिपोर्टो से पता चलता है कि दंगों के दौरान हिंदू और मुसलिम दोनों संप्रदायों के निम्न तबकों के लोग ही बड़ी संख्या में उत्पीड़न और खून-खराबों के शिकार बनते हैं. रमेशचंद्र मजूमदार मुसलमानों को हिंदुओं के साथ अनवरत रूप से वैरभाव में लिप्त एक समेकित धार्मिक समुदाय मानते हैं. महमूद गज़नी और तैमूर का भूत ऐतिहासिक रूप से उन्हें संत्रस्त किये रहता है. जैसाकि वह कहते है- 400 वर्ष पहले सुलतान महमूद के समय से भारत में कभी भी हिंदुओं के सोचे-समझे तौर पर किये गये ऐसे नृशंस हत्याकांड नहीं देखे गये (जैसेकि तैमूर के समय में). उसके धर्मोन्मादी सैनिकों ने अनियंत्रित हिंसा और बेरोक बर्बरता बरपा करने में कल्पना के सारे बांध तोड़ दिये और उसकी चरम सीमा वह थी, जब दिल्ली के मैदानों के बाहर एक लाख हिंदू कैदियों का नृशंस नरमेध रचाया गया. एक ऐसी घटना, जिसकी दुनिया के इतिहास में कोई मिसाल नहीं (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपुल, प्रस्तावना, पृष्ठ-24).
ऐसे वक्तव्य महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी और समरकंद के तॅमूर द्वारा मुस्लिम जन समुदाय और मध्य एशिया के शासकों पर ढहाये गये कहर को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य था दूसरे देशों की लूटपाट करना, अपना खजाना भरना तथा अपनी संपदा में वृद्धि करना. जब महमूद गजनी और मोहम्मद गौरी ने भारत पर चढ़ाई की, तब उसके आक्रमण के शिकार क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी वस्तुत: अस्तित्वहीन थी. लेकिन 10वीं-11वीं शताब्दियों तक लगभग पूरा मध्य एशिया इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो चुका था और फिर भी अपने इन सहधर्मियों को इन आक्रांताओ ने नही बख्शा. मध्य एशिया के मुसलमानों की उन्होंने जो लूटमार मचायी वह उत्तर भारत के हिंदुओं की उनके द्वारा की गयी लूटमार से व्यापकता और बर्बरता में कहीं कम नहीं थी.

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