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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -4

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राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की चौथी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा

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छ महत्वपूर्ण भारतीय इतिहासकार ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा बिछाये सांप्रदायिक जाल में फंस गये. 19वीं शताब्दी के दौरान मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करने की औपनिवेशिक नीति पर चलते हुए ब्रिटिश इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ताओं ने मुसलमान शासकों पर आरोप लगाया कि उन सभी ने समान और अनवरत रूप से हिंदू मंदिरों को नष्ट किया तथा हिंदुओं का दमन-उत्पीड़न किया ताकि मुसलिम राजाओं के शासन की तुलना में ब्रिटिश शासन की बेहतर छवि प्रस्तुत की जा सके. अंगरेज़ों द्वारा सांप्रदायिक इतिहास लेखन का सर्वाधिक स्पष्ट उदाहरण 1849 में भारत सरकार के सचिव एचएम इलियट की कलकत्ता से प्रकाशित पुस्तक, बिब्लियोग्राफिकल इंडेक्स : द हिस्टोरियंस ऑफ मुहम्मडन इंडिया के पहले खंड की उनके द्वारा लिखित प्रस्तावना में मिलता है. इलियट महोदय, जो बाद में चल कर डावसन के साथ सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासन से संबंधित आठ खंडोंवाली पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाइ इट्स हिस्टोरियंस के लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए, मुसलिम शासकों की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना करते हैं. उनका रोष यह है कि `अंगरेजों द्वारा गद्दी पर बिठाये गये मुसलिम राजा भी आलस और भोगविलास के गर्त में डूब गये तथा दुर्गुणों में वे कालीगुला या कोमोडोस से होड़ देने लगे.‘ इलियट के अनुसार मुसलिम शासकों ने हिंदू शोभायात्राओं, पूजा-आराधना आदि पर रोक लगा दी. मूर्तियों का अंग-भंग किया, मंदिरों को धराशायी कर डाला. लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन किया और बड़े पैमाने पर खून-खराबा किया, संपत्ति की लूटपाट की आदि. उन्होंने पुस्तक के पहले खंड में इन सभी असहनीय कार्रवाइयों के उदाहरण प्रस्तुत किये. इलियट ने जो तसवीर प्रस्तुत की है वह लगभग एक तरफा है और निर्लज्जताभरी दुर्भावना से प्रेरित है. इलियट को पूरी आशा थी कि एक बार उसकी पुस्तक छप जाये तो अंगरेजों को `अपनी सरकार के तहत अधिकतम व्यक्तिगत स्वतंत्रता भोगनेवाले बड़बोले बाबुओं की देशभक्ति और अपनी वर्तमान हालत के पतन को लेकर चीख-पुकार सुनने को नहीं मिलेगी.’ वह आशा प्रकट करते हैं कि `थोड़े से समय में ही’ वे अब `उस अंधकारपूर्ण अवधि के दिनो’ की वापसी के बारे में `आहें भरना’ बंद कर देंगे. बहरहाल इलियट को यहां तक यकीन था कि अपने शारीरिक और नैतिक गठन में त्रुटियों के कारण, जिन्हें न तो भोजन से और न शिक्षा से दूर किया जा सकता है. भारतवासी राष्ट्रीय स्वतंत्रता तक का प्रयास नहीं करेंगे.

उपनिवेशवादी पुरातत्वेत्ता भी इलियट की ही भावनाओं को दोहराते हैं. इस तरह 1891 में अयोध्या के स्मारकों की चर्चा करते हुए, ए फ़्युहरर अविवेक पूर्ण ढंग से इस कुप्रेरित स्थानीय परंपरा को अपना लेते हैं कि जन्मस्थान पर स्थित मंदिर सहित अयोध्या के तीनों मंदिरों को मुसलमानों ने ही ध्वस्त किया था. (द मोनूमेंटल एंटीक्विटीज एंड इंस्क्रिप्शंस इन दि नार्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध, आरकियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इलाहाबाद,1891 पृ 297). आगे वह कहते हैं कि `अधिकतर आधुनिक ब्राह्मण और जैन मंदिर अपने से भी प्राचीन उन मंदिरों की जगह पर अवस्थित हैं, जिन्हें मुसलमानों ने नष्ट कर दिया था’ (वही, पृ 296-97). इन अतिरंजनापूर्ण टिप्पणियों का कोई आधार नहीं है, जो उस समय की गयी थीं, जब सन सत्तावन के विद्रोह की स्मृतियां ताजी ही थीं तथा ब्रिटिशविरोधी वहाबी आंदोलन की अनुगूंजें अभी मंद नहीं पड़ी थीं. ऐसा लगता है कि डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर द्वारा मुसलमानों के सहायतार्थ दिये गये प्रवचन (इंडियन मुसलमांस, 1870) केवल शासकों तक ही सीमित थे और शैक्षिक जगत के उनके भाईबंदों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.


यह साफ जाहिर है कि 19वीं शताब्दी के औपनिवेशिक इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता भारतीय इतिहासकारों को सांप्रदायिकता की घुट्टी पिलाने में सफल हो गये थे. यही कारण था कि बंगाल के प्रमुख इतिहासकारों ने पूर्वी भारत में ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना को वरदान समझा. हालांकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए समान रूप से उत्पीड़नकारी था, तो भी जदुनाथ सरकार जैसे महान इतिहासकार उसे परित्राणकारी कृत्य के रूप में देखते हैं. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके विचारों को आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव जैसे इतिहासकारों ने अपना लिया और उन्हें बेतुकेपन की हद तक खींच ले गये. श्रीवास्तव पाकिस्तान के निर्माण के लिए सिंध पर 712 में हुए अरबों के हमले को जिम्मेदार समझते है. यह बात सुविदित है कि सिंध पर अरबों द्वारा हमला भारत के इतिहास में निष्प्रभावी घटना थी. हालांकि अरबों ने भारतीय संस्कृति के कुछ तत्वों को पश्चिम में छितराया जरूर था पर सिंध पर उनके चार शताब्दियों के शासन ने भारतीय राज्यतंत्र संस्कृति और समाज पर कोई वास्तविक छाप नहीं छोड़ी.

बंगाल के कुछ अग्रणी शिक्षाशास्त्रियों और इतिहासकारों के दिमाग चूंकि सांप्रदायिक ढर्रे पर काम कर रहे थे. अत: वे इतिहास के एक ऐसे समेकित विभाग के बारे में नहीं सोच सकते थे, जिसमें इतिहास के सभी कालों और पहलुओं को पढ़ाया जा सके. स्पष्ट ही प्राचीन भारत के महिमामंडन के लिए ही पहली बार देश में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास तथा संस्कृति का अलग से एक विभाग खोला गया. इसी तरह हिंदू इतिहास के अध्ययन के समकक्ष इसलामिक इतिहास का एक विभाग भी खोला गया. यह महत्वपूर्ण है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए अनुशंसित पाठ्यक्रम में राजपूत इतिहास, मराठा आदि पर प्रबंध भी लिखे गये. इसके विपरीत अंगरेजों के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बंगाल में अनेकानेक विद्रोहों की मिसाले होने के बावजूद उनके संबंध में कोई पाठ्यक्रम नहीं अपनाये गये. अत: ऐसा लगेगा कि मुसलमानों को विदेशी मानने का विचार-हालांकि वे स्थायी रूप से देश में बस गये थे और देश की मिली-जुली संस्कृति का अभिन्न अंग बन गये थे- सांप्रदायिक ढर्रे पर ऐतिहासिक अध्ययनों के संगठन द्वारा पोषित किया गया और विधि सम्मत करार दिया गया. विश्वविद्यालयों में ऐतिहासिक और अन्य अध्ययनों का नमूना कलकत्ता ने ही बंगाल, बिहार व अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों के लिए प्रस्तुत किया. जब एकबार कलकत्ता में प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति का विभाग खुल गया तो बाद में चल कर बनारस और दूसरे विश्वविद्यालयों में भी ऐसे विभाग खोले गये. इसमें कोई संदेह नही कि इन विभागों के कई सदस्यों ने बहुमूल्य शोधकार्य किया पर इसके साथ इनमें से बहुत से विभाग बहुत दिन तक रूढिवाद और हिंदू सांप्रदायिकता के गढ़ बने रहे और उन्होंने प्राचीन भारत में जो कुछ भी हुआ उसकी प्राचीनता और अनूठेपन पर जोर दिया तथा प्रकारांतर से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू धर्म मूलत: इसलाम और अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है.
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