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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -3

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राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की तीसरी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा

मेशचंद्र मजूमदार (1888-1980) की रचनाओं में तो हिंदू पुनरुत्थानवाद का तत्व प्रबलतर दिखायी देता है. वे भारतीय जनता के इतिहास और संस्कृति पर बहुत से खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक के प्रमुख संपादक थे, जिसे पुनरुत्थानवादी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की देखरेख में बिड़लाओं की वित्तीय मदद से बंबई से भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित किया गया था. काल विभाजन की दृष्टि से हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ दि इंडियन पीपुल में उन कालों के बारे में अधिक खंड दिये गये, जिन्हें मजूमदार हिंदू गौरव और प्रभुत्व के काल समझते थे तथा उन कालों के बारे में कम खंड थे, जिन्हें वह मुसलिम प्रभुत्व के काल समझते थे. वह बृहत भारत के कट्टर पक्षपोषक थे. उन्होंने दक्षिणपूर्व एशिया की देशीय संस्कृतियों की उपेक्षा की और उसके हिंदूकरण पर जोर दिया. कहना न होगा कि मजूमदार इतिहास के प्रति सांप्रदायिक दृष्टि के मुखर प्रवर्तक थे. उनकी ऐतिहासिक दृष्टि तुर्क सल्तनत की स्थापना संबंधी उनकी टिप्पणियों से स्पष्ट होती है:

अब तक के भारतीय इतिहास में पहली बार दो एकदम अलग-अलग, लेकिन प्रमुख समुदाय और संस्कृतियां एक -दूसरे के बिल्कुल रू-ब-रू खड़ी थीं और भारत दो शक्तिशाली इकाइयों में स्थायी रूप से विभाजित हो गया था, जिनमें से प्रत्येक इकाई की अपनी विशिष्ट पहचान थी, जो दोनों के किसी भी प्रकार के विलयन या दोनों के बीच किसी भी तरह की धनिष्ठ स्थायी समन्वय के लिए उपयुक्त नहीं थी. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ दि इंडियन पीपुल-5, पृष्ठ-xxviii)

इस दृष्टि के आधार पर मजूमदार ने उन सभी लोगों को आड़े हाथों लिया है जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भाईचारे और सद्भाव के उदाहरणों का उल्लेख करते थे. उन्होंने हिंदु और मुसलमान शासकों के सम्मिलित शासन के पूरे विचार को ही कठोरता से ठुकरा दिया. उनके अनुसार :

प्रमुख हिंदू राजनीतिक नेता यह उद्घोषित करने की स्थिति तक बढ़ गये कि मुसलिम हुकूमत के दौरान हिंदू कतई शासित जाति नहीं थे. इस तरह के बेढंगे विचार, जिन पर 19वीं शताब्दी के प्रारंभ के भारतीय नेता हंस ही सकते थे, उस शताब्दी के अंत में राजनीतिक जटिलताओं के तकाजों के कारण इतिहास का अंग बन गये. (वही,पृष्ठ xxix)

इतना ही नहीं मजूमदार के अनुसार, हिंदू शासक राजवंशों के पतन के बाद, मुसलिम हमलावरों और शासकों ने मंदिरों और मठों का लगभग पूरी तरह विनाश किया. इस तरह उन्होंने हिंदू संस्कृति को पोषित और पल्लवित करनेवाले स्रोतों को नष्ट करके उसका लगभग सफाया ही कर डाला. उसका आगे का विकास रुक गया तथा उसके ऊपर लगभग अभेद्य अंधकार छा गया. वह हिंदू संस्कृति के विकास के ‘अचानक रुक जाने’ की चर्चा इस प्रकार करते हैः ‘अतीत के गौरव और संस्कृति की मशाल उत्तर में केवल मिथिला और दक्षिण में विजयनगर में ही जलाये रखी गयी. (वही पृष्ठ-xxxi).


मजूमदार का यह विचार कि मध्य एशिया से आये हमलावरों को सल्तनत काल के हिंदू विशुद्ध धार्मिक अथवा इसलामिक रूप में ही देखते थे, आधारहीन है. भारतीय लोग मध्य एशियाइयों और उनके शासन को नृवंशीय, सामाजिक और सांस्कृतिक समुदाय की प्रभुता के रूप में देखते थे. यही वजह है कि गाहड़वाल के अभिलेखों में तुरुष्कदंड का उल्लेख मिलता है, यानी ऐसा कर जो तुर्कों से लड़ने के लिए जनता पर लगाया गया था. क्षेत्रीय भाषाओं में अक्सर ही हमें तुरूकशब्द मिल जाता है और इससे ऐसे लोगों का बोध नहीं होता, जिनकी धार्मिक भिन्नता पर बल दिया गया हो. ‘मुसलिम’ और ‘इसलाम’ शब्द कदाचित ही प्रयुक्त हुए हैं. ऐसा भारतीय आर्य भाषाओं और साथ ही द्रविड़ भाषाओं, दोनों में मिलता है. दक्षिणवासी भी अक्सर सुल्तानों द्वारा भेजी गयी सेनाओं को तुर्क ही समझते थे. मजूमदार मिथिला में हिंदु संस्कृति की उदीप्त चमक की बात करते हैं पर मैथिली के महान कवि विद्यापति तो मिथिला के मुसलमानों के लिए हर जगह तुरुक शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इस तरह मध्य एशियाई आक्रामकों के संबंध में मध्यकालीन हिंदू धारणा उनके धर्म पर जोर नहीं देती थी. वह आधुनिक काल के मजूमदार द्वारा प्रतिपादित पूर्णत: सांप्रदायिक धारणा से बिल्कुल भिन्न थी.


यह कहना कि ‘इसलाम’ ने हिंदू संस्कृति को लगभग पूरी तरह से विनष्ट कर दिया था, इतिहास का एक और मिथ्याकरण है. अगर हम आंतरिक और बाहरी कारकों की अनुक्रिया में भारतीय संस्कृति के विकास और संश्लेषण की प्रक्रिया को देखें तो पता चलता है कि मध्यकाल में संस्कृति की निश्चित तौर पर प्रगति हुई. खुद मजूमदार ने सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों के महत्व पर जोर दिया है. यहां हम भारतीय इसलामी कला, वास्तु, साहित्य आदि के विकास की, जिससे इतिहास के विद्यार्थी भली-भांति परिचित हैं, अधिक चर्चा नहीं करेंगे. पर यदि हम केवल ब्राह्मण संस्कृति और संस्कृत साहित्य के अध्ययन की प्रगति तथा भारतीय आर्य और द्रविड़ भाषाओं के विकास की समीक्षा करें, तब भी मध्यकाल भारतीय इतिहास का निर्विवाद रूप से महान रचनात्मक काल सिद्ध होगा. सुलतानों और मुगल राजाओं के शासनकाल में ही बंगाल सहित भारत के प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र ने अपनी सांस्कृतिक पहचान विकसित की और इस तरह भारतीय संस्कृति के बहुरंगी वितान में अपना योगदान किया. असल में क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास की दृष्टि से मध्यकाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था. मजूमदार सोचते हैं कि हिंदू संस्कृति केवल दो अलग-अलग द्वीपवत क्षेत्रों में, उत्तर में मिथिला में और दक्षिण में विजयनगर में पुष्पित-पल्लवित हुई. पर संस्कृत की सबसे अधिक पांडुलिपियां हमें‘मुसलिम’ शासित राज्य कश्मीर से प्राप्त हुई हैं, जहां के पंडितों को फारसी और संस्कृत दोनों में समान रूप से प्रवीणता प्राप्त थी. अगर तर्क यह है कि नालंदा की समस्त बौद्ध पांडुलिपियां मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दी गयी थीं, तब गुजरात के सुलतानों के समय क्यों जैन पांडुलिपियों को भली-भांति संरक्षित रखा गया? ऐसी अधिकतर पांडुलिपियां, जिनके आधार पर प्राचीन भारतीय विरासत का उद्धार हुआ खास कर कश्मीर, पश्चिमी और दक्षिणी भारत तथा मिथिला और पूर्वी भारत में सुलतानों और मुगलों के शासन के दौरान, लिखी गयीं और संरिक्षत की गयीं. जिसे आधुनिक ‘हिंदू नवजागरण’ कहा जाता है, वह इन मध्यकालीन पांडुलिपियों के बिना संभव ही न हुआ होता.

तुर्क सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासनकाल में, मूल रचनाओं के अलावा न केवल महाकाव्यों, काव्यों, धर्मसूत्रों और स्मृतियां पर बल्कि श्रोतसूत्रों और गुह्यसूत्रों, दर्शन, तर्क शास्त्र, व्याकरण, खगोल विज्ञान, गणित आदि सहित वैदिक ग्रंथों पर भी अनेकानेक विद्वत्तापूर्ण टीकाएं लिखी गयीं. प्राचीन पाठों पर टीकाएं लिखने की प्रक्रिया में टीकाकारों ने काफी कुछ मौलिक योगदान किया. यही नहीं, तर्क शास्त्र की नव्यन्याय प्रणाली, जिसके लिए भारत प्रसिद्ध है न केवल मिथिला में विकसित हुई, बल्कि सुलतानों के शासन के अंतर्गत बंगाल में भी उसका विकास हुआ. धर्मशास्त्र के टीकाकारों ने समाज में हो चुके परिवर्तनों को यथोचित लक्षित किया और धर्मशास्त्र के प्रावधानों की तदनुसार व्याख्या करने का प्रयास किया. निश्चय ही भारत में उत्तर मध्यकाल के दौरान ठीक उस तरह की सामाजिक और आर्थिक प्रगति नहीं हुई, जिस तरह की ग्रति पश्चिमी यूरोप के देशों में हुई थी. किंतु यह बात लगभग संपूर्ण एशिया के बारे में सच है, जिसका कि केवल एक हिस्सा इसलामी शासकों के शासन के अंतर्गत था. फिर भारत में ही मुसलिम शासन को क्यों भला-बुरा कहा जाये? यह तो केवल सांप्रदायिक आधार पर ही किया जा सकता है.
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