स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>… तो उन्हें मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए!

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औरतों की आज़ादी का उनका दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं महिला-सशक्तिकरण का हिमायत करने वाला समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए हैं.

महिला-सशक्तिकरण के हिमायती जब तक उन्हें आधी नंगी न कर लें दम नहीं लेंगे।
इस्लाम ने औरतों को समाज में इज्ज़त से जीने का रास्ता मुहैया कराया है. संपत्ति में आधा हिस्सेदार बनाया. इस पर कुछ लोग “गिलास ख़ाली” की प्रवृत्ति के विरोधी कहते है कि इस्लाम में औरत का दर्ज़ा अच्छा नहीं है। मेरे एक लेख ‘छोटे वस्त्र: दुर्व्यवहार करने का न्योता’ के विरोध में कुछ लोगों का यह बयान आया कि हमें (लड़कियों को) अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आज़ादी होनी चाहिए। और अगर जिन्हें हमारे (लड़कियों के) छोटे और भड़काऊ कपडों पर आपत्ति हो रही है उनकी मानसिकता ही वासना से भरी हुई है। उनका कहना सही है क्यूंकि अगर वे छोटे वस्त्र पहनेंगी तो यह प्राकृतिक है कि विपरीत लिंग को कुछ न कुछ ज़रूर होगा. इसीलिए इस्लाम में मर्दों को यह सख्त हिदायत दी गयी है कि अगर उनकी निगाह किसी औरत पर पड़े तो उसे चाहिए कि अपनी निगाहें नीची कर के उनसे बात करें. साथ ही साथ औरतों के बारें में भी कुरआन में साफ़ तौर पर शालीनता से रहने का हुक़्म है इसलिए चाहिए कि औरतें उसी लिबास में रहें जिसमें उन्हें रहना चाहिए… न कि यह कह कर पल्ला झाड़ना चाहिए कि मर्दों के मन में वासना होती है।

अरे मोहतरमा ! यह वासना नहीं प्राकृतिक नियम है इसलिए हुक़्म है मर्दों को भी और औरतों को भी. और दोनों ही ईश्वरीय नियम से चलें तो प्राब्लेम कहीं नहीं होगी।

आखिर में मैं यही कहना चाहता हूँ कि अगर किसी मर्द ने आपत्तिजानक वस्त्र में देखा और उसे कुछ-कुछ नहीं हुआ तो उसे मनोचिकित्सक को दिखाने की ज़रूरत है…
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>मीकाईल (माईकल जैकसन) और नील आर्मस्ट्रोंग में समानता

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बीते गुरुवार (यौमुल खमीस) दिनांक २५/०६/२००९ को रॉक व् पॉप संगीत के महान जादूगर मीकाईल (पहले माईकल जैकसन) का रहस्यमय हालत में कथित रूप से हार्ट अटैक आने से निधन हो गया. मीकाईल पचास के थे. उनकी उपलब्धियों के बारे में यहाँ छापने के बजाये मैं कुछ दीगर बिन्दुओं पर आप सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ…
क्या आप जानते हैं कि मीकाईल (माईकल जैकसन) और नील आर्मस्ट्रोंग में क्या समानता है?
प्रमुख रूप से सामान्यतया यह कहा जा सकता है कि दोनों ने ही इस्लाम धर्म से प्रभावित हो कर इसे अपनाया और बाद में इसका जीवन पहले से बेहतर नहीं रह सका. एक तरफ तो ये दोनों विभूतियें अपने जीवन में उस मुक़ाम पर थीं जिसे केवल सर्वोच्च कहा जाता है. लेकिन इस्लाम कुबूल करने के बाद इनका क्या हुआ???
दरअसल दोनों ही ईसाई थे और यह जगज़ाहिर है कि पश्चिम में क्रिश्चियंस का ही बोलबाला है, लेकिन यह भी सोलह आने सच है कि दुनियाँ में अगर कहीं इस्लाम सबसे तेजी से फ़ैल रहा है वह देश भी अमेरिका ही है. दुनियाँ में इस्लाम 234% की दर से फ़ैल रहा है.
दी अरब-इजराईली न्यूज़पेपर “पैनोरमा” के छपी खबर के मुताबिक मीकाईल (माईकल जैकसन) ने इसलाम धर्म 21 नवम्बर 2008 को कुबूल किया था, मगर सच्चाई यह है कि मीकाईल (माईकल जैकसन) ने २००५ में ही यह प्रयास कर लिया था. इसके पीछे क्या कारण है यह किसी को नहीं मालूम?
ReligionNewsBlog.com के आइटम संख्या 17555 जो कि शनिवार, फरवरी 24, 2007 को पोस्ट किया गया था, के अनुसार मीकाईल (माईकल जैकसन) ने इसलाम धर्म क़ुबूल कर लिया है. हालाँकि उसी पेज पर अपडेटेड न्यूज़ २१ नवम्बर २००८ की भी है.

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा चाँद की ज़मीन पर सबसे पहले क़दम रखने वाले इंसान आज ७८ साल के हैं और ज़िन्दा हैं. जी हाँ, यह नील आर्मस्ट्रोंग ही हैं. जब नील आर्मस्ट्रोंग ने मिस्र की यात्रा के बाद जब इस्लाम कुबूल किया तब से ही वह गुमनाम से हो गए. बाद में अलग अलग तरह के कथन आये. आखिर क्यूँ?
माईकल जैकसन ने जब से इस्लाम क़ुबूल करने की सोची तब से ही उनके साथ असहयोग सा व्यवहार किया जाने लगा. ठीक उसी तरह से जैसे नील आर्मस्ट्रोंग के साथ हुआ था.

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>हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए

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आतंकवादी वह व्यक्ति होता है जो आतंक (भय) का कारण हो. जिसके आतंक अथवा भय से दूसरा डरे. एक चोर जब एक पुलिस वाले को देखता है तो उसे भय होता है. पुलिस वाला चोर की नज़र में आतंकवादी है. उसी तरह से हर एक मुस्लिम को असामाजिक तत्वों के लिए आतंकवादी ही होना चाहिए, मिसाल के तौर पर हर एक मुस्लिम को आतंक का पर्याय होना चाहिए, उनके लिए जो चोर हैं, डाकू हैं, बलात्कारी हैं…

जब कभी उपरोक्त क़िस्म के असामाजिक तत्व किसी मुसलमान को देखें तो उनके मन-मष्तिष्क में आतंक का संचार हो. हालाँकि यह सत्य है कि “आतंकवादी” शब्द सामान्यतया उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है जो जन-सामान्य में आतंक का कारण हो लेकिन एक सच्चे मुसलमान के लिए चाहिए कि वह आतंक का कारण बनें, चुनिन्दा लोगों के लिए जैसे असामाजिक तत्व ना कि निर्दोष के लिए. वास्तव में एक मुसलमान को जन-सामान्य के लिए शांति का पर्याय होना चाहिए.

एक ही व्यक्ति, एक ही कार्य के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) i.e. आतंकवादी और देशभक्त
भारत को जब फिरंगियों से आज़ादी नहीं मिली थी तब भारत देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ने वालों को ब्रिटिश सरकार आतंकवादी कहती थी. उन्हीं लोगो को उसी कार्य के लिए भारतीय देश भक्त कहते थे. इस प्रकार एक ही कार्य के लिए, एक ही व्यक्ति के लिए दो अलग-अलग लेबल (पैमाना) हुआ. एक उन्हें आतंकवादी कह रहा है तो दूसरा देश भक्त. जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के समर्थन में हैं वे उन्हें आतंकवादी ही मानते हैं वहीँ जो भारत पर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ थे वे उन्हें देश भक्त या स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं.

बहुत महत्वपूर्ण है किसी के बारे में इंसाफ करने से पहले या उसके बारे में राय कायम करने से पहले उसे स्वस्थ ह्रदय से सुना जाये, जाना जाये. दोनों तरह के तर्कों को सुना समझा जाये, हालातों को विश्लेषित किया जाये. उसके कृत्य के कारण और इरादे को भली प्रकार समझा और महसूस किया जाये, तब जाकर उसके बारे में राय कायम की जाये.

इस्लाम का अर्थ “शांति” होता है.
इस्लाम शब्द का उद्भव अरबी के “सलाम” शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है “शांति”.यह शांति का धर्म है और हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस्लाम के बुनियादी (fundamentals) ढांचें को माने और जाने और उस पर अमल करे और पूरी दुनिया में इसके महत्व को बताये. इस प्रकार हर मुस्लिम को इस्लाम के मौलिक (fundamentals) कर्तव्यों का पालन करते हुए fundamentalist होना चाहिए और terrorist* होना चाहिए.

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>नमाज़ का तरीक़ा

>नमाज़ का तरीक़ा http://d.scribd.com/ScribdViewer.swf?document_id=16776722&access_key=key-96k20yhtplcua30wzw0&page=1&version=1&viewMode=

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>ब्रह्मा, विष्णु और महेश के नए अवतार

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राकेश
उत्तर बिहार के तरियानी छपरा की पैदाइश. 15 बरस पहले मैनेजमेंट का ख़्वाब लिए दिल्ली टपका. दुसरे साल छात्र-आंदोलन की संगत में आ गया. वृहत्तर सामाजिक सवालों से रू-ब-रू हुआ. लिखने-उखने में दिलचस्‍पी थी. कुछ समय तक फ्रीलांसिंग, अनुवाद, इत्‍यादि के रास्‍ते शोध की दुनिया में उतरा. मीडिया, बाजार, शहर और श्रम पर माथापच्ची कर रहा है. तीन ‘मीडियानगर’ का संपादन कर चुका है. सराय और सफ़र के बीच डोलते हुए सामुदायिक मीडिया में दिलचस्पी जगी. प्रयोग जारी है और सहयोगियों की तलश भी. फ़ोन नं. है +91 9811 972 872 View my complete profile
(This post had been posted in a blog by Mr. Rakesh)

भारत के राजस्थान प्रांत के जोधपुर नगर में कुछ लोगों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की नयी तस्वीर जारी की है. ये तस्वीरें एक तरह से तीन महत्तवपूर्ण हिन्दू देवताओं के नए अवतार की घोषणा और नए युग के उद्घोष की कोशिश है. एक हिन्दी ख़बरिया चैनल पर भरोसा करें तो इन देवताओं की तस्वीरों से सुसज्जित कैलेंडर धड़ल्ले से बांटे जा रहे हैं.  
ख़बर और उसके साथ की झलकी देखकर बंदे को कुछ ठेस- सी लगी. होश संभालने के बाद अब तक ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जितनी भी तस्वीरें बंदे ने देखी है, ये वाली उन सबसे अलग थीं. पहले की तस्वीरों में ये त्रिदेव बड़े सौम्य और निरपेक्ष लग रहे थे. कल वाली तो बिल्कुल अलग थी. एक अज़ीब किस्म की पक्षधरता थी उसमें. चेहरा भी सामान्य नहीं लग रहा था. और तो और पहले की जो तस्वीरें बंदे को याद हैं उनमें वे इतने उम्रदराज़ भी नहीं लगते थे. कल वाले तो साठ पार के दिख रहे थे, बल्कि ब्रह्मा और महेश तो सत्तर से भी ज़्यादा के नज़र आ रहे थे. 
नए अवतरित इस त्रिदेव को बंदे ने पहले भी कई मौक़ों पर देखा है. या कहें कि सभा, संसद, सम्मेलन, यात्राओं, जलसों इत्यादि में ये अलग-अलग भूमिकाओं में दिखते रहे हैं. हो सकता है ये वे न हों, या फिर वे ही हों, या अपने पुण्य प्रताप और चमत्कारिक शक्ति के बल पर इन्होंने उनकी शक्ल धारण कर ली हो. पर बंदे ने जब ये शक्ल उस तस्वीर में देखी तो कई बातें, घटनाएं और दुर्घटनाएं उसके ज़हन को झकझोर गयीं. जैसे कि तस्वीर वाले ब्रह्माजी की शक्ल कुछ साल पहले भारत के उपप्रधानमंत्री सह गृहमंत्री और अब भारतीय संसद में विपक्ष के नेता से हू-ब-हू मिलती है. उसी तरह विष्णु वाली शक्ल आठ-दस बरस पहले तक हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के एक पूर्व, पूर्व मुख्यमंत्री, जिनके बाद अब तक उनकी पार्टी को सत्ता में आने का मौक़ा नहीं  मिल पाया है – से पूरी तरह मेल खाती थी. और महेश यानी बाबा भोले भंडारी की शक्ल देखकर तो बंदे को ‘/हार नहीं मानूंगा/रार नहीं ठानूंगा/काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं/गीत नया गाता हूं’/ याद आ गया. इन पंक्तियों के रच‍यिता तो कुछ साल पहले तक भारतीय गणतंत्र के प्रधानमंत्री थे. बंदे ने सुना है अपने प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम दिनों में इंडिया शाइनिंग अर्थात भारत उदय नामक प्रचार-अभियान पर इन्होंने कर-दाताओं के पैसों को जमकर बहाया था. तो महेशजी की शक्ल उसी इंडिया शाइनिंग के प्रणेता से मिलती-जुलती लगी.  
वैसे बंदे को कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है. बस ये लगता है कि अगर देवताओं को अवतरित होना ही था तो कम से कम इन शक्लों को न धारण करते. क्योंकि तस्वीर में जो ब्रह्मा है उससे मिलते-जुलते एक शख्सियत पर तो कई आरोप हैं. कुछ तो बेहद गंभीर हैं. अगर भारत के किसी आम नागरित पर ये आरोप लगे होते तो उस पर एक साथ दर्जन भर मुकदमे यहां की कच‍हरियों में  चल रहे होते. अब देखिए न, नए ब्रह्मा वाली शक्ल के इस शख्स पर दिसंबर 1990 में उत्तर प्रदेश की एक प्राचीन नगरी में एक मस्जिद-ध्वंस के षड्यंत्र का आरोप है, जिसके चलते इन पर मुकमदा भी चल रहा है, और एक बहुत पुराने आयोग के सामने कभी-कभार सशरीर पेश होकर इन्हें सफ़ाई भी देनी पड़ती है. पर ये भी कम चालाक नहीं हैं, जैसा कि अदालतों में आम तौर पर  देखा जाता है कि आरोपी और गवाह होस्टाइल हो जाते हैं – ये जनाब भी कुछ ऐसे ही हो जाते हैं. आरोप यह भी है एक बार 1989-90 में इस जनाब ने एक यात्रा निकाली थी और भड़काउु भाषण दिए थे जिसके चलते जगह-जगह दंगे भड़के और जान-माल की क्षति भी हुई. 2002 में गुजरात में इनकी पार्टी के शासन में एक ख़ास धर्म के लोगों का जमकर क़त्लेआम हुआ. कई स्वतंत्र जांच समितियों की रपट के मुताबिक़ चुन-चुन कर लोगों को जलाया गया था, गर्भवती महिलाओं के पेटों में तलवारें भोंक कर भ्रूण तक का ख़ून किया गया था. जान और अस्मत बचाकर भाग रही युवतियों को सिर पर केसरिया पट्टी बांधे ‘मर्दों’ ने खदेड़-खदेड़ कर पहले तो सामूहिक हवस का शिकार बनाया और फिर हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें सुला दिया था. इतिहास बताता है कि तब ये सख्श उपप्रधानमंत्री तो थे ही गृहमंत्री भी थे, पर इन्होंने इंसानियत के खिलाफ़ उस जघन्य अपराध की भर्त्सना भी नहीं की थी, कार्रवाई की बात तो दूर. और भी मौक़े आए जब इन्हें बोलना चाहिए था, न बोले. हालांकि मितव्ययी तो नहीं हैं. उडि़सा में कुष्ठरोगियों का इलाज करने वाले डॉ. ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को जब जिन्दा जला दिया गया तब भी  कैलेंडर वाले ब्रह्मा से मिलते-जुलते शक्ल वाले इस शख्स ने कुछ ख़ास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी.  
विष्णु से मिलते-जुलते शक्ल वाले का कहना ही क्या. ऐसा शासन चलाया कि आज तक उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी की वापसी नहीं हुई. अब तो सुना है कि बड़ा बवाल मचा है पार्टी में और उनके हेडक्वार्टर में भी. अकाल में अपनी पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए. जानकारों को मानना है कि इनकी चाल और इनका चरित्र तस्वीर वाले ब्रह्मा के शक्ल से मिलते-जुलते शख्स के चाल और चरित्र से अंतिम हद तक मेल खाता है. सिर्फ़ चेहरे में अंतर है. अध्यक्षासीन होते ही इन्होंने भी एक-आध यात्राएं निकालीं पर ज़्यादा माहौल न बिगाड़ पाए. कुछ अख़बारों ने तो टांय-टांय फिस्स ही कह दिया था.  
महेशजी, तस्वीर में छपे महेशजी से मिलते-जुलते शख्स के बारे में एक बड़े हिस्से में यह भ्रांति है कि वे आदमी -अच्छे हैं पर उनकी पार्टी ग़लत है. बंदे को नहीं मालूम वे कैसे हैं और उनकी पार्टी कैसी है, पर ये लगता है कि ग़लत पार्टी तो दूर की बाद ग़लत समूह में भी अच्छा आदमी दो पल से ज़्यादा नहीं टिक सकता है. कैलेंडर वाले महेशजी से मिलते-जुलते शक्ल वाले महानुभाव ने लगभग अपनी पूरी उम्र उस पार्टी में गुज़ार दी. यानी बंदे का कहने का मतलब ये कि ग़लत या सही पार्टी और व्यक्ति एक जैसे ही हैं. और ग़लत या सही क्यों, दोनों ही ग़लत क्यों नहीं? जोधपुर में बंट रहे कैलेंडर में छपे महेशजी से मिलते-जुलते चेहरे वाले व्यक्ति इस देश के प्रधानमंत्री थे तब मरे हुए गाय के नाम पर कुछ दलितों को खदेड़-खदेड़ कर पीटा गया था और मार दिया गया था. खुले आम कुछ खिचड़ी दाढ़ी वाले बाबाओं ने गाय को इंसान से ज़यादा क़ीमती बताया था, तब एक बार भी महेशजी से  मिलते-जुलते मुंह-कान वाले व्यक्ति ने उसका प्रतिवाद नहीं किया था. असल में, उनके बारे में बंदे की यही राय है कि पार्टी-वार्टी जो है सो है ही, तस्वीर वाले महेशजी जैसे दिखने वाले इंसान का व्यक्तित्व काफ़ी उथला रहा है.   
अपने शासनकाल में इस इंसान ने इंसानविरोधी कामों के लिए ख़ास व्यवस्था की थी, ख़ास तरह के लोगों को ख़ास-ख़ास मंत्रालय का जिम्मा दिया था. शिक्षा के साथ जो हुआ वो तो जगजाहिर ही है. अंधविश्वास, पुरोहिती और कर्मकांड को ऑफि़सियल बना दिया गया, विज्ञान-प्रदर्शनियों के उदघाटन के मौक़े पर देवी वंदना और नारियल फोडू कार्यक्रम होने लगे  (हालांकि बाद वाले कभी-कभार पहले भी होते थे). काफ़ी हद तक इस इंसान के बारे में यह भी सच है कि जनहित की बातों को मसखरी में उड़ा देना इसकी प्रवृत्ति रही है. अब भी इस सख्स का नाम कभी-कभार कुछ अनाड़ी उत्साहित पार्टी कार्यकर्ता अगले प्रधानमंत्री के रूप में उछाल देते हैं.  
बंदा तो तहे दिल से यही चाहता है कि ईश्वर की कृपा से उसने ग़लत तस्वीर देख ली हो या ख़बर ही प्लांटेड हो. बाई चांस ईश्वर की कृपा से दोनों में से कुछ नहीं हुआ तो बंदे की भावना को गहरी ठेस लगी है.

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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -8

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राम के अस्तित्व और अयोध्या नगरी की ऐतिहासिकता पर दिये गये अपने लंबे व्याख्यान में इस बार प्रो राम शरण शर्मा राम और अयोध्या की ऐतिहासिकता के प्रमाणों के अभाव की चर्चा कर रहे हैं. आठवीं किस्त.
प्रो राम शरण शर्मा

सा पूर्व 1000-800 के ग्रंथ अथर्ववेद (10.2.31-33) में अयोध्या का सबसे पहला उल्लेख मिलता है और वह भी एक काल्पनिक नगर के रूप में. इसे देवताओं की नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आठ चक्रों से घिरी है और नौ प्रवेश द्वारों से सज्जित है, जो सभी ओर से प्रकाश में घिरे हैं. संयुत्त निकाय (नालंदा संस्करण, खंड-3, पृष्ठ-358, खंड-4,पृष्ठ-162) में, जो लगभग ईसा पूर्व 300 का पालि ग्रंथ है, अयोध्या को गंगा नदी के कि नारे बसा हुआ दरसाया गया है, जिसका फैजाबाद जिले में सरयु नदी के किनारे बसी अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नही है. आरंभिक पालि ग्रंथ इस विचार का समर्थन नहीं करते कि गंगा शब्द का इस्तेमाल सरयू सहित सभी नदियों के लिए आम अर्थ में किया गया है. वे मही (गंडक ) और नेरजरा (फल्गू) नदियों सहित, जिनके किनारों पर बुद्ध ने पर्यटन किया था, बहुत-सी नदियों का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं. इनमें सरभू अथवा सरयू का भी उल्लेख है, पर एक ऐसे संदर्भ में, जिसका अयोध्या से कुछ भी लेना-देना नहीं. वाल्मीकि रामायण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक, मुनीशचंद्र जोशी ने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढ़ निकाला. वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड ईसा की आरंभिक सदियों में रचा गया है. उसके अनुसार अयोध्या सरयू से अध्यर्घ योजना दूर है. यह सस्कृंत अभिव्यित बालकांड (22.11) में भी मिलती है और टीकाकारों के मुताबिक इसका अर्थ है 6 कोस अथवा 12 मील. वे इसका अर्थ डेढ़ योजन लगाते हैं. इससे पुन: उलझन उठ खड़ी होती है क्योंकि वर्तमान अयोध्या तो सरयू तट पर स्थित है. यह नदी पूर्व की ओर बहती है तथा बलिया और सारन जिलों में इसे पूर्वी बहाव को घाघरा कहते हैं. सारन जिले में जाकर यह गंगा में मिल जाती है. सरयू अपना मार्ग बदलती चलती है. जिसकी वजह से कुछ विद्वान बलिया जिले के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते हैं. सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा अयोध्या की अवस्थिति के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य से भी कठिनाइयां उठ खड़ी होती हैं. उनके अनुसार अयोध्या कन्नौज के पूर्व दक्षिणपूर्व की ओर 600 ली (लगभग 192 किलोमीटर) दूर पड़ती थी और गंगा के दक्षिण की ओर लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित थी. अयोध्या को लगभग गंगा पर स्थित बता कर चीनी यात्री संभवत: उसकी अवस्थिति के बारे में आरंभिक बौद्ध परंपरा की ही पुष्टि करते हैं.

ह्वेनसांग के अनुसार अयोध्या देश में 3000 बौद्ध भिक्षु थे और साधु-संन्यासियों व गैर बौद्धों की संख्या इससे कम थी. अयोध्या राज्य की राजधानी के विषय में बताते हुए वह एक पुराने मठ का जिक्र करते हैं, जो काफी समय से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का केंद्र बना हुआ था (सीयूकी, खंड-1,लंदन, 1906 पृष्ठ 224-25). इससे सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म के प्रभुत्व का संकेत मिलता है. फिर भी ह्वेनसांग का कहना है कि अयोध्या देश में 100 बिहार तथा 10 देव (ब्राह्मणों के अथवा अन्यों के ) मंदिर थे. इससे पहले ईसा की पांचवी शताब्दी में फाह्यान साकेत में बुद्ध की दातौन (दंत काष्ठ) का उल्लेख करता है, जो कि सात-एक हाथ ऊंची उगी हुई थी. हालांकि ब्राह्मणों ने इस पेड़ को नष्ट कर दिया था, फिर भी वह उसी जगह पर फिर से उग आया (जेम्स लेगी, ए रिकार्ड ऑफ बुद्धिस्ट किंगडम, आक्सफोर्ड, 1886, पृष्ठ 54-55). अयोध्या को परंपरागत रूप से कई जैन तीर्थंकरों अथवा धार्मिक उपदेशकों की जन्मस्थली भी माना जाता है और जैनी इसे तीर्थ मानते हैं. जैन परंपरा में इसे कोसल राज्य की राजधानी बताया गया है पर यह ठीक कहां स्थित है यह नहीं दरसाया गया. गुप्तकाल के बाद जाकर ही कहीं वर्तमान अयोध्या को राम की लोक विश्रुत अयोध्या के साथ जोड़ा जाने लगा. उस समय तक राम को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था.

अब तक विशेष रूप से अयोध्या का उल्लेख करने वाली मुहरों या सिक्कों का यहां पता नहीं चला है. हमें विभिन्न प्रकार के सिक्के जरूर मिलते हैं, जिन्हें अयोध्या सिक्कों के नाम से जाना जाता है, जो ईपू दूसरी शताब्दी से लेकर पहली शताब्दी और दूसरी शताब्दी ईस्वी तक के हैं. पर उन पर अयोध्या का नाम अंकित नहीं है. उदाहरण के लिए उज्जयिनी, त्रिपुरी, एरणु, कौशांबी, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, नालंदा आदि की पहचान या तो मुहरों या फिर सिक्कों के आधार पर स्थापित की गयी है. अयोध्या से प्राप्त पहली शताब्दी के एक शिलालेख में पुष्यमित्र शुंग के एक वंशज का उल्लेख है पर सिक्के और शिलालेख राम दाशरथिवाली अयोध्या की पहचान नहीं करा पाते. यह सचमुच निराशाजनक बात है कि पर्याप्त उत्खनन और अन्वेषण के बावजूद हम वर्तमान अयोध्या को गुप्तकाल से पूर्व कहीं भी राम के साथ विश्ववासपूर्वक नहीं जोड़ सकते.

रामकथा को हिंदी भाषा क्षेत्र में हालांकि रामचरितमानस ने लोकप्रिय बनाया, तथापि अवधी भाषा का यह महाकाव्य वाल्मीकि के संस्कृत महाकाव्य रामायण पर आधारित है. मूल राम महाकाव्य कोई समरूप रचना नहीं है. मूल रूप से इसमें 6,000 श्लोक थे, जिन्हें बाद से बढ़ा कर 12,000 और अंतत: 24,000 कर दिया गया. विषयवस्तु के आधार पर इस ग्रंथ के आलोचनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह चार अवस्थाओं से होकर गुजरा था. इसकी अंतिम अवस्था 12वीं शताब्दी के आसपास की बतायी जाती है और सबसे आरंभिक अवस्था ईपू 400 के आसपास की हो सकती है. किंतु यह महाकाव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ग विभक्त, पितृसतात्मक और राज्यसत्ता आधारित समाज के व्यवस्थित कार्यचालन के लिए कतिपय आदर्श निर्धारित करता है. यह शिक्षा देता है कि पूत्र को पिता की, छोटे भाई को बड़े भाई की और पत्नी को पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. यह इस बात पर बल देता है कि विभिन्न वर्णों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उन्हें उनका पालन अवश्य करना चाहिए और वर्ण-जाति संबंधी कर्तव्यों से भटक जानेवालों को जब भी जरूरी हो निर्मम दंड दिया जाना चाहिए और अंत में यह राजा सहित सभी को आदेशि करता है कि धर्म के जो आदर्श राज्य, वर्ण और परिवार के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निर्दिष्ट किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार चलें. विभीषण अपने कुल, जो गोत्र आधारित समाज के सदस्यों को एक साथ बांधे रखने के लिए सर्वाधिक आवश्यक था, के प्रति निष्ठा की बलि देकर भी धर्म नाम की विचारधारा में शामिल हुआ. वाल्मीकि द्वारा निर्दिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंड जैन, बौद्ध और अन्य ब्राह्मण महाकाव्यों और लोक कथाओं में भी दृष्टिगोचर होते हैं, महाकाव्य और लोक कथाएं भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में मानदंडों, अवस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, पर उनमें उल्लिखित कुछ ही राजाओं व अन्य महान विभूतियों की ऐतिहासिकता को पुरातत्व, शिलालेखों, प्रतिमाओं और अन्य स्त्रोतों के आधार पर सत्यापित किया जा सकता है. दुर्भाग्य से हमारे पास इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 1800 के बीच एक ऐसी अवधि, जिसे पुराणों की परंपरा पर काम करनेवाले कुछ विद्वानों ने राम का काल बताया है, अयोध्या में राम की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर सके.


सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता (सभी किस्तें)सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -8सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -7सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -6सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -5सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -4सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -3सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -2सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -1

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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -7

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क्या राम का वास्तव में कोई अस्तित्व था? क्या अयोध्या एक ऐतिहासिक नगरी है? प्रख्यात इतिहासकार राम शरण शर्मा अपने लंबे व्याख्यान के इस हिस्से में (और आगे के हिस्सों में भी) मुख्यतः इसकी चर्चा कर रहे हैं. सातवीं किस्त.

प्रो राम शरण शर्मा

तिहास में लूटपाट करनेवाले आमतौर कब्जे में आयी लूटपाट के मामले में अपने सभी उत्पीड़ितों से एक जैसा ही व्यवहार करते हैं. इसी तरह तैमूर ने मध्य एशिया में मुस्लिम आबादी पर उससे कहीं अधिक विध्वंस बरपा किया, जितना उसने भारत में किया था. 1398-99 में भारत में काफी मुस्लिम आबादी थी पर तब भी गैर मुस्लिम आबादी उससे ज्यादा ही थी. इस तरह हालांकि तैमूर के हमले प्रथमत: मुसलमान शासकों के खिलाफ लक्षित थे पर जो प्रजा उसके हमलों की शिकार बनी, उसमें स्वभावत: ही हिंदू भी थे. ऐसे अनेकानेक उदाहरण दिये जा सकते हैं कि जब सत्ता और लूट के माल का मामला होता था तो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही शासक वर्गों के सदस्य समान रूप से क्रूर सिद्ध होते थे. इसके विपरीत ऐसे बहुत से उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें हिंदु और मुस्लिम दोनों समुदायों के आम लोगों के बीच मौजूद सहिष्णुता की बात तो जाने दीजिए, हिंदु और मुस्लिम शासकों, दोनों ने सहिष्णुता दर्शायी. इसलिए मुस्लिम शासकों को क्रूर और हिंदू शासकों को दयालु व सहिष्णु शासकों के रूप में चित्रित करना गलत होगा. पर दुर्भाग्य से हिंदू संप्रदायवादी ऐसी ही छवि चित्रित कर रहे है तथा मुस्लिम कट्टरपंथी भी कोशिश में है कि इस मामले में उनसे पीछे न रहें.

सांप्रदायिक प्रचार का एक महत्वपूर्ण नमूना बाबरी मसजिद की दीवारों पर अंकित एकदम हाल के 30 भित्ति चित्र हैं. इस मसजिद में राम की प्रतिमा को जबर्दस्ती बिठाया गया है. जिस जिला न्यायाधीश के फैसले की वजह से संप्रदायवादी बाबरी मसजिद को कब्जे में ले सके, उसकी प्रतिमा बड़े ही उत्साहपूर्वक मसजिद के प्रवेश द्वार पर स्थापित की गयी है. उस के बाद से तो लगता है कि संप्रदायवादी राम की पूजा करने से अधिक उस न्यायाधीश की छवि को महिमा मंडित करने में संलग्न रहे हैं. दरअसल राम को अपने निकृष्टतम राजनीतिक दुराग्रहों को छुपाने के लिए आड़ बना लिया गया है. एक भित्ति चित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का कत्लेआम कर रहे हैं. इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मसजिद खड़ी की. आग लगानेवाली ऐसी झूठी बातें सांप्रदायिक भावनाओं को हवा देने के लिए प्रस्तुत की जाती हैं. यह प्रचार उतना ही झूठा है जितना यह विचार कि बाबर ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उसकी जगह पर बाबरी मसजिद बनवायी.

उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग के भूतपूर्व निदेशक, रामचंद्र सिंह ने अयोध्या में 17 स्थानों की खुदाई करवायी और ऋणमोचन घाट व गुप्तारघाट नाम के दो स्थलों का भी उत्खनन करवाया. उनके अनुसार वहां अधिकतर स्थानों पर ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से पहले आबादी होने के चिह्र नहीं मिलते. केवल मणिपर्वत और सुग्रीवपर्वत नाम के दो स्थानों को मौर्य काल का कहा जा सकता है. भारत सरकार के पुरात्तत्व विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक ब्रजवासी लाल ने कई बार अयोध्या के कई स्थलों का उत्खनन करवाया और इस उत्खनन से पता चला कि ईसा पूर्व सातवीं सदी भी कुछ पहले ही जान पड़ता है क्योंकि उत्तरी छापवाले पोलिशदार बर्तनों की तिथि को आसानी से उक्त काल का नहीं ठहराया जा सकता.

यह बात याद रखनी होगी कि अयोध्या में बस्ती होने की सबसे पुरानी अवधि के लिए हमारे पास कोई कार्बन तिथि नहीं है. वहां प्रारंभिक आबादी की अधिक विश्वसनीय तिथि कुछ मृण्मूर्तियों के अस्तित्व द्वारा मिलती है. इनमें से एक जैन आकृति है, जो मौर्य युग की अथवा ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के अंत और ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के के आरंभ की हैं. बहरहाल, मध्य गंगा क्षेत्र की कछारी भूमि में जितने स्थानों का उत्खनन किया गया, उनमें से अधिकतर स्थान ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी तक पर्याप्त रूप से बसे हुए प्रतीत नहीं होते. जो लोग राम की ऐतिहासिकता में विश्वास करते हैं, वे उनकी तिथि ईसा पूर्व 2000 के आसपास तय करके चलते हैं. यह इस आधार पर किया जाता है कि राम दाशरथि महाभारत युद्ध से लगभग 65 पीढ़ियों पूर्व हुए थे. आम तौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि महाभारत युद्ध ईसा पूर्व 1000 के आसपास हुआ था. इसलिए हमारे सामने पर्याप्त रूप से अयोध्या के बसने और अयोध्या में राम के युग के बीच 1000 वर्षों से अधिक का अंतर प्रकट होता है. इसी कठिनाई की वजह से कुछ विद्वान अयोध्या को अफगानिस्तान में बताने की कोशिश करते हैं
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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -6

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राम के अस्तित्व, सांप्रदायिक राजनीति और इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर प्रख्यात इतिहासकार प्रो राम शरण शर्मा के व्याख्यान की छठी किस्त में इतिहासकारों द्वारा अपनायी गयी त्रुटिपूर्ण और एकांगी इतिहास दृष्टि की चर्चा की गयी है.

प्रो राम शरण शर्मा

रंभिक मध्यकालीन बिहार की विभिन्न प्रतिमाएं स्पष्ट रूप से यह संकेत करती हैं कि बौद्धों और ब्राह्मण धर्म के अनुयायियों के बीच खुला और हिंसक टकराव रहा था. इन प्रतिमाओं में अपराजित सहित कई बौद्ध देवताओं को शैव देवों को पैरों से रौंदते हुए चित्रित किया गया है. धर्मग्रंथों में यह टकराव बौद्धों के खिलाफ शंकर द्वारा व्यापक पैमाने पर चलाये गये अभियान में प्रतिबिंबित होता है. यह सोचना गलत होगा कि बौद्धों का इस देश से सफाया केवल इस वजह से हुआ कि उनके खिलाफ वैचारिक प्रचार किया गया था. ऐसा लगता है उनका बाकायदा उत्पीड़न किया गया था. इससे उनके सामने केवल दो विकल्प बच रहे थे. या तो वे भाग कर दूसरे देशों में चले जायें या फिर सामाजिक विषमताओं से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम धर्म अपना ले. विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ), भागलपुर (चंपारण) और बांगलादेश में, जहां बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुसलिम आबादी है. बौद्ध भारत से वस्तुत: गायब क्यों हो गये इस बात को केवल इस आधार पर ही स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि उनका धर्म आंतरिक तौर पर परिवर्तित हो रहा था. इस प्रश्न पर विचार करने के लिए उनके प्रति मध्यकालीन हिंदू शासक वर्गों और धार्मिक नेताओं के दृष्टिकोण पर ध्यान देना होगा. जैनियों का भी उत्पीड़न किया जाता रहा था. लखनऊ संग्रहालय में रखी जैन देवी देवताओं की कई प्रस्तर मूर्तियां, विरूपित अवस्था में मिली हैं. स्पष्टत: ही यह काम इन मूर्तियों को वैष्णव जामा पहनाने के लिए कुछ वैष्णवों द्वारा किया गया था. जैनियों ने अपने कर्मकांडों और सामाजिक रीति-रिवाजों को काफी हद तक संशोधित करके, अपने को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी जीवन पद्धति के अनुरूप ढाल लिया. इस बात पर जोर देना गलत होगा कि हिंदू एक समेकित समुदाय थे. जाने-माने पुनरुत्थानवादी और मुस्लिम विरोधी इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार तक इस बात को मानते हैं कि हिंदू शासक वर्ग की कतारों में एकजुटता का अभाव था और वे अंतर्विरोधों से बुरी तरह ग्रस्त थे. उन्हें यह बात बहुत ही दुखद लगती है कि जब एक हिंदू राज्य पर मुसलमानों ने हमला किया तो एक पड़ोसी हिंदू राजा ने इस अवसर का लाभ उठा कर पीछे की तरफ से उस राज्य पर वार किया. (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडियन पीपुल, खंड-5, प्रस्तावना, पृष्ठ 14-16).

विंध्याचल के दक्षिणवर्ती क्षेत्र तक में मुस्लिम खतरे को इतना कम करके आंका गया कि दक्कन के शक्तिशाली यादव शासकों ने गुजरात के चालुक्यों पर दक्षिण से ठीक उस समय हमला बोल दिया जब वे उत्तर में आये मुस्लिम हमलावरों के साथ जीवन-मरण के संघर्ष में लगे थे (वही पृष्ठ 14).

हिंदू धार्मिक नेताओं के बीच सांप्रदायिक असहिष्णुता का स्पष्ट उदाहरण अयोध्या के मध्यकालीन इतिहास से लिया जा सकता है. जब तक औरंगजेब का शासन था, उसके लौह हस्त के नीच अयोध्या में सब कुछ शांत रहा. पर 1707 में उसकी मृत्यु के बाद हम वहां शैव संन्यासियों और वैष्णव वैरागियों के संगठित दलों के बीच खुला और हिंसक टकराव देखते हैं. इन दोनों के बीच विवाद का मुद्दा यह था कि धार्मिक स्थलों पर किसका कब्जा रहे और तीर्थयात्रियों को भेंट और उपहारों में प्राप्त होनेवाली आय किसके हाथ लगे. 1804-05 की एक पुस्तक से इन दोनों संप्रदायों के बीच होनेवाले हिंसक टकरावों के बारे में उद्धरण दिये जा सकते हैं : उस समय जब राम जन्म दिवस का अवसर आया, लोग बड़ी संख्या में कौसलपुर में एकत्र हुए. कौन उस जबर्दस्त भीड़ का वर्णन कर सकता है. उस स्थान पर हथियार लिये जटाजूटधारी और अंग-प्रत्यंग में भस्म रमाये असीमित(संख्या में) संन्यासी वेश में बलिष्ठ योद्धा उपस्थित थे. वह युद्ध के लिए मचलती सैनिकों की असीम सेना थी. वैरागियों के साथ लड़ाई छिड़ गयी. इस लड़ाई में (वैरागियों को) कुछ भी हाथ न लगा क्योंकि उनके पास रणनीति का अभाव था. उन्होंने वहां उनकी ओर बढ़ने की गलती की. वैरागी वेशभूषा दुर्गति का कारण बन गयी. वैरागी वेशभूषावाले सारे लोग भाग खड़े हुए उनसे बहुत दूर (यानी संन्यासियो से) उन्होंने अवधपुर का परित्याग कर दिया. जहां भी उन्हें (संन्यासियों को) वैरागी वेष में लोग नजर आते, वे उन्हे भयावह रूप से आतंकित करते. उनके डर से हर कोई भयभीत था और जहां भी संभव हो सका लोगों ने गुप्त स्थानों में शरण ली और अपने को छिपा लिया. उन्होंने अपना बाना बदल डाला और अपने संप्रदाय संबंधी चिह्र छिपा दिये. कोई भी अपनी सही-सही पहचान नहीं प्रकट कर रहा था. (हैंसबेकर, अयोध्या, गोरनिंगनन, 1986, पृष्ठ 149 में श्रीमहाराजचरित रघुनाथ प्रसाद से उद्धृत)

उक्त उद्धरण मध्यकालीन धार्मिक हिंदू नेताओं द्वारा सहिष्णुता बरतने के मिथक का भंडाफोड़ कर देता है. हम लक्षित कर सकते हैं कि सदियों के मतारोपण से एक समेकित हिंदू समुदाय का निर्माण नहीं हुआ. आज तक भी तथाकथित अनुसूचित जातियां पशुओं का मांस खाती हैं, जिनमें गायें भी शामिल हैं तथा कुछ मामलों में अपने मृतकों को दफनाती तक हैं.

उत्पीड़ित वर्गो की ठीक यही वह कोटि है, जिसे महात्मा गांधी ने हरिजन की संज्ञा दी थी और बिहार और अन्यत्र गांवों में जिनके मकानों को मुख्यत: आर्थिक कारणों से जला कर राख कर दिया जाता है और जिनके परिवार के सदस्यों को भून डाला जाता है. एकदम हाल में जब बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोगों ने दक्षिण में ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया तो इससे हिंदुत्व के तथाकथित संरक्षकों के बीच बड़ा कोहराम मच गया.
इसी तरह, पुराणपंथियों के हिंसक प्रचार के बावजूद, मुसलमानों को समेकित समुदाय नहीं माना जा सकता. भारत में और अन्यत्र शियाओं और सुन्नियों के बीच खूनी टकराव सर्वविदित है. ईरान और इराक के बीच लंबे समय तक चले खूनी टकराव की तो चर्चा ही क्या. भारत में बहुत से ऊंचे दर्जे के और संपन्न मुस्लिम परिवार, हिंदुओं के उच्चतर तबकों और संपन्न परिवारों की तरह ही जुलाहों, पंसारियों और मुसलमानों के अन्य तथाकथित निम्न समुदायों को नीची नजर से देखते हैं. दंगा जांच आयोग की रिपोर्टो से पता चलता है कि दंगों के दौरान हिंदू और मुसलिम दोनों संप्रदायों के निम्न तबकों के लोग ही बड़ी संख्या में उत्पीड़न और खून-खराबों के शिकार बनते हैं. रमेशचंद्र मजूमदार मुसलमानों को हिंदुओं के साथ अनवरत रूप से वैरभाव में लिप्त एक समेकित धार्मिक समुदाय मानते हैं. महमूद गज़नी और तैमूर का भूत ऐतिहासिक रूप से उन्हें संत्रस्त किये रहता है. जैसाकि वह कहते है- 400 वर्ष पहले सुलतान महमूद के समय से भारत में कभी भी हिंदुओं के सोचे-समझे तौर पर किये गये ऐसे नृशंस हत्याकांड नहीं देखे गये (जैसेकि तैमूर के समय में). उसके धर्मोन्मादी सैनिकों ने अनियंत्रित हिंसा और बेरोक बर्बरता बरपा करने में कल्पना के सारे बांध तोड़ दिये और उसकी चरम सीमा वह थी, जब दिल्ली के मैदानों के बाहर एक लाख हिंदू कैदियों का नृशंस नरमेध रचाया गया. एक ऐसी घटना, जिसकी दुनिया के इतिहास में कोई मिसाल नहीं (हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपुल, प्रस्तावना, पृष्ठ-24).
ऐसे वक्तव्य महमूद गजनी, मोहम्मद गौरी और समरकंद के तॅमूर द्वारा मुस्लिम जन समुदाय और मध्य एशिया के शासकों पर ढहाये गये कहर को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य था दूसरे देशों की लूटपाट करना, अपना खजाना भरना तथा अपनी संपदा में वृद्धि करना. जब महमूद गजनी और मोहम्मद गौरी ने भारत पर चढ़ाई की, तब उसके आक्रमण के शिकार क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी वस्तुत: अस्तित्वहीन थी. लेकिन 10वीं-11वीं शताब्दियों तक लगभग पूरा मध्य एशिया इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो चुका था और फिर भी अपने इन सहधर्मियों को इन आक्रांताओ ने नही बख्शा. मध्य एशिया के मुसलमानों की उन्होंने जो लूटमार मचायी वह उत्तर भारत के हिंदुओं की उनके द्वारा की गयी लूटमार से व्यापकता और बर्बरता में कहीं कम नहीं थी.

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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -5

>इतिहास में बार बार हिंदू मंदिरों के लूटे और तोडे़ जाने का ज़िक्र आता है. इसके लिए सांप्रदायिक इतिहासकार और राजनीतिक दल शासकों के मुसलमान होने को ज़िम्मेवार ठहराते हैं. प्रख्यात इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा सांप्रदायिक राजनीति और राम के अस्तित्व संबंधी अपने व्याख्यान के इस चरण में उन्हीं मंदिरों की कहानी कह रहे हैं.
राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की पांचवीं किस्त.


प्रोफेसर आरएस शर्मा


र्तमान में पुनरुत्थानवादी विचारों को कुछ सांप्रदायिक मानसिकतावाले लेखक इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें समर्थन दे रहे हैं. यह दावा किया जा रहा है कि अतीत में दुनिया में जो कुछ भी अच्छा और महान रहा है, वह भारत से ही उद्भूत हुआ और यहीं से दुनिया के दूसरे भागों में फैला. लेकिन इतिहासकार, जिन्हें ठोस प्रमाणों को आधार बनाना होता है, ऐसे विचारों को स्वीकार नही कर सकते. बात चाहे विभिन्न प्रकार की धातुओं और सिक्कों के इस्तेमाल की हो या लेखन के प्रयोग और सभ्यता के ऐसे ही अन्य तत्वों की, हमें तो बड़ी ही सावधानी से प्रमाणों की छानबीन करनी होती है. जैसाकि पता चलेगा तमाम अति पुनरुत्थानवादी विचार ऐसे इतिहासकार प्रस्तुत करते हैं, जो हिंदू संप्रदायवादी और इसलामी रुढ़िपंथी विचारों से प्रतिबद्ध है.

भारत में संप्रदायवाद की समस्या को बुनियादी तौर पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंधों की समस्या के तौर पर देखा जाता है. यह समस्या इस तरह नहीं सुलझायी जा सकती कि एक धर्म विशेष को माननेवाले शासकों द्वारा दूसरे धर्म को माननेवाले शासकों और अधीनों के खिलाफ की गयी दमन-उत्पीड़न की कार्रवाइयों पर परदा डाला जाये. इतिहास बतलाता है कि शासक वर्ग चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, उनका यह विशेषाधिकार रहा है कि वे अपनी प्रजा को और अपने दुश्मनों को लूटें और उनका उत्पीड़न करें और जो मालमत्ता मिले उसकी मुख्यत: शासक वर्ग के ऊपरी तबकों के सदस्यों के बीच बंदरबांट कर लें. अगर इसलामी बादशाहों और राजाओं ने हिंदू मंदिरों की लूटपाट की तो इतिहासकार इस तथ्य को नजरअंदाज करके उनके प्रति कोई सद्भावना पैदा नहीं कर सकते. पर ऐसी लूटपाट के कारणों का विश्लेषण करना होगा और उनकी व्याख्या करनी होगी जैसा कि मोहम्मद हबीब ने अपनी पुस्तक सुल्तान महमूद आफ गजनीन में महमूद गजनी द्वारा की गयी लूटपाट के मामले में किया है. साधारण व्यक्ति भी इस बात को देख सकता है कि चाहे सभी हिंदू मंदिरसोमनाथ और तिरुपति के मंदिरों की तरह समृद्ध न रहे हों तो भी आम तौर पर मसजिदों के मुकाबले मंदिर कहीं अधिक समृद्ध हुआ करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में, सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां, 300 हजाम और बहुत से पुजारी थे. इस मंदिर के स्वामित्व में 10 हजार गांव थे. पर मसजिदों की वास्तु संबंधी बनावट ही ऐसी है कि संपत्ति संग्रह के लिए वहां कोई जगह नहीं होती. यह तो प्रार्थना के लिए एक खुली इमारत होती है. मंदिरो में संपदा के संचय के कारण ही कुछ हिंदू राजा कीमती धातुओ से बनायी गयी मूर्तियों को ध्वस्त करने और राजकोष के लिए धन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते थे. ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में कश्मीर के शासक हर्ष ने ऐसा ही किया था. उसने एक अधिकारी नियुक्त किया था, जिसका काम मूर्तियों को ध्वस्त करना था (देवोत्पाटन). ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में अंधविश्वासपूर्ण युक्तियों से भोले-भाले लोगों से पैसा उगाहने के लिए सुझाये गये उपायों से यह विचार खारिज हो जाता है कि हिंदू शासक वर्ग के लोग अपनी प्रजा के प्रति लगातार सहिष्णु रहते आये थे. पतंजलि केमहाभाष्य, यानी ईसा पूर्व 400 के लगभग के पाणिनी के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी पर ईसा पूर्व 150 के लगभग लिखित उनकी टीका के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि अपना खजाना भरने के लिए मौर्य शासक धातु मूर्तियों को पिघलाते थे. अत: धन की अदम्य लालसा के चलते मौर्यों और अन्य शासकों ने धार्मिक मूर्तियों की पवित्रता तक को नहीं बख्शा.

निश्चय ही अशोक ने जो कुछ किया वह कहीं अधिक श्लाघ्य और सराहनीय था, पर उसकी नीति से ब्राह्मणों को आर्थिक धक्का लगा. मौर्यों की सत्ता के रहे-सहे अवशेषों का सफाया करनेवाला और ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के अंत के आसपास ब्राह्मण राजवंश का संस्थापक, पुष्यमित्र शुंग दूसरी तीसरी शताब्दि के आसपास लिखित ग्रंथ दिव्यावदान में बौद्ध मतावलंबियों के घोर उत्पीड़क के रूप में प्रकट होता है. वह अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ स्तूपों को नष्ट करता, विहारों को जलाता, भिक्षुओं की हत्याएं करता, शाकल यानी आधुनिक सियालकोट तक आगे बढ़ता चला गया था. सियालकोट में उसने घोषणा की थी कि जो भी उसे एक बौद्ध भिक्षु का सिर लाकर देगा, उसे सोने के सौ सिक्के पुरस्कार में मिलेंगे. यह बात अतिरंजनापूर्ण भी हो सकती है, क्योंकि शुंग शासन के अंतर्गत बौद्ध स्तूपों का निर्माण भी किया गया था. लेकिन पुष्यमित्र शुंग और भिक्षुओं के बीच शत्रुतापूर्ण वातावरण से इनकार नहीं कि या जा सकता. हमें यह भी पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में गौड़ के शैव शासक शशांक ने उस बोधिवृक्ष को कटवा डाला था, जिसके नीचे बैठ कर बुद्ध को ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ था. सातवीं शताब्दी के उसके समकालीन राजा हर्ष को सहिष्णु शासक माना जाता है पर उसने भी उन ब्राह्मणों को कारावास में डाला और उनका संहार किया था जिन पर कन्नौज की सभा में बुद्ध के सम्मान में खड़ी की गयी मीनार को जलाने का षड़ंयत्र रचने का आरोप था. मध्यकाल के आरंभ में दक्षिण भारत के जैनियों और शैवों के बीच हमें खुली शत्रुता की बातें सुनने को मिलती हैं और परंपरागत कथनों से पता चलता है कि 8000 जैनियों को सूली पर चढ़ा दिया गया था. यह घटना मंदिर के उत्कीर्णनों में भी परिलक्षित है.
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>सांप्रदायिक राजनीति और राम की ऐतिहासिकता – भाग -4

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राम और कृष्ण के अस्तित्व, इतिहास के सांप्रदायिकीकरण और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर प्रोफेसर राम शरण शर्मा के व्याख्यान की चौथी किस्त.

प्रोफेसर आरएस शर्मा

कु
छ महत्वपूर्ण भारतीय इतिहासकार ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा बिछाये सांप्रदायिक जाल में फंस गये. 19वीं शताब्दी के दौरान मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करने की औपनिवेशिक नीति पर चलते हुए ब्रिटिश इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ताओं ने मुसलमान शासकों पर आरोप लगाया कि उन सभी ने समान और अनवरत रूप से हिंदू मंदिरों को नष्ट किया तथा हिंदुओं का दमन-उत्पीड़न किया ताकि मुसलिम राजाओं के शासन की तुलना में ब्रिटिश शासन की बेहतर छवि प्रस्तुत की जा सके. अंगरेज़ों द्वारा सांप्रदायिक इतिहास लेखन का सर्वाधिक स्पष्ट उदाहरण 1849 में भारत सरकार के सचिव एचएम इलियट की कलकत्ता से प्रकाशित पुस्तक, बिब्लियोग्राफिकल इंडेक्स : द हिस्टोरियंस ऑफ मुहम्मडन इंडिया के पहले खंड की उनके द्वारा लिखित प्रस्तावना में मिलता है. इलियट महोदय, जो बाद में चल कर डावसन के साथ सुल्तानों और मुगल बादशाहों के शासन से संबंधित आठ खंडोंवाली पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाइ इट्स हिस्टोरियंस के लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए, मुसलिम शासकों की कठोरतम शब्दों में भर्त्सना करते हैं. उनका रोष यह है कि `अंगरेजों द्वारा गद्दी पर बिठाये गये मुसलिम राजा भी आलस और भोगविलास के गर्त में डूब गये तथा दुर्गुणों में वे कालीगुला या कोमोडोस से होड़ देने लगे.‘ इलियट के अनुसार मुसलिम शासकों ने हिंदू शोभायात्राओं, पूजा-आराधना आदि पर रोक लगा दी. मूर्तियों का अंग-भंग किया, मंदिरों को धराशायी कर डाला. लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन किया और बड़े पैमाने पर खून-खराबा किया, संपत्ति की लूटपाट की आदि. उन्होंने पुस्तक के पहले खंड में इन सभी असहनीय कार्रवाइयों के उदाहरण प्रस्तुत किये. इलियट ने जो तसवीर प्रस्तुत की है वह लगभग एक तरफा है और निर्लज्जताभरी दुर्भावना से प्रेरित है. इलियट को पूरी आशा थी कि एक बार उसकी पुस्तक छप जाये तो अंगरेजों को `अपनी सरकार के तहत अधिकतम व्यक्तिगत स्वतंत्रता भोगनेवाले बड़बोले बाबुओं की देशभक्ति और अपनी वर्तमान हालत के पतन को लेकर चीख-पुकार सुनने को नहीं मिलेगी.’ वह आशा प्रकट करते हैं कि `थोड़े से समय में ही’ वे अब `उस अंधकारपूर्ण अवधि के दिनो’ की वापसी के बारे में `आहें भरना’ बंद कर देंगे. बहरहाल इलियट को यहां तक यकीन था कि अपने शारीरिक और नैतिक गठन में त्रुटियों के कारण, जिन्हें न तो भोजन से और न शिक्षा से दूर किया जा सकता है. भारतवासी राष्ट्रीय स्वतंत्रता तक का प्रयास नहीं करेंगे.

उपनिवेशवादी पुरातत्वेत्ता भी इलियट की ही भावनाओं को दोहराते हैं. इस तरह 1891 में अयोध्या के स्मारकों की चर्चा करते हुए, ए फ़्युहरर अविवेक पूर्ण ढंग से इस कुप्रेरित स्थानीय परंपरा को अपना लेते हैं कि जन्मस्थान पर स्थित मंदिर सहित अयोध्या के तीनों मंदिरों को मुसलमानों ने ही ध्वस्त किया था. (द मोनूमेंटल एंटीक्विटीज एंड इंस्क्रिप्शंस इन दि नार्थ वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध, आरकियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इलाहाबाद,1891 पृ 297). आगे वह कहते हैं कि `अधिकतर आधुनिक ब्राह्मण और जैन मंदिर अपने से भी प्राचीन उन मंदिरों की जगह पर अवस्थित हैं, जिन्हें मुसलमानों ने नष्ट कर दिया था’ (वही, पृ 296-97). इन अतिरंजनापूर्ण टिप्पणियों का कोई आधार नहीं है, जो उस समय की गयी थीं, जब सन सत्तावन के विद्रोह की स्मृतियां ताजी ही थीं तथा ब्रिटिशविरोधी वहाबी आंदोलन की अनुगूंजें अभी मंद नहीं पड़ी थीं. ऐसा लगता है कि डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर द्वारा मुसलमानों के सहायतार्थ दिये गये प्रवचन (इंडियन मुसलमांस, 1870) केवल शासकों तक ही सीमित थे और शैक्षिक जगत के उनके भाईबंदों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.

यह साफ जाहिर है कि 19वीं शताब्दी के औपनिवेशिक इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता भारतीय इतिहासकारों को सांप्रदायिकता की घुट्टी पिलाने में सफल हो गये थे. यही कारण था कि बंगाल के प्रमुख इतिहासकारों ने पूर्वी भारत में ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना को वरदान समझा. हालांकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए समान रूप से उत्पीड़नकारी था, तो भी जदुनाथ सरकार जैसे महान इतिहासकार उसे परित्राणकारी कृत्य के रूप में देखते हैं. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके विचारों को आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव जैसे इतिहासकारों ने अपना लिया और उन्हें बेतुकेपन की हद तक खींच ले गये. श्रीवास्तव पाकिस्तान के निर्माण के लिए सिंध पर 712 में हुए अरबों के हमले को जिम्मेदार समझते है. यह बात सुविदित है कि सिंध पर अरबों द्वारा हमला भारत के इतिहास में निष्प्रभावी घटना थी. हालांकि अरबों ने भारतीय संस्कृति के कुछ तत्वों को पश्चिम में छितराया जरूर था पर सिंध पर उनके चार शताब्दियों के शासन ने भारतीय राज्यतंत्र संस्कृति और समाज पर कोई वास्तविक छाप नहीं छोड़ी.

बंगाल के कुछ अग्रणी शिक्षाशास्त्रियों और इतिहासकारों के दिमाग चूंकि सांप्रदायिक ढर्रे पर काम कर रहे थे. अत: वे इतिहास के एक ऐसे समेकित विभाग के बारे में नहीं सोच सकते थे, जिसमें इतिहास के सभी कालों और पहलुओं को पढ़ाया जा सके. स्पष्ट ही प्राचीन भारत के महिमामंडन के लिए ही पहली बार देश में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास तथा संस्कृति का अलग से एक विभाग खोला गया. इसी तरह हिंदू इतिहास के अध्ययन के समकक्ष इसलामिक इतिहास का एक विभाग भी खोला गया. यह महत्वपूर्ण है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए अनुशंसित पाठ्यक्रम में राजपूत इतिहास, मराठा आदि पर प्रबंध भी लिखे गये. इसके विपरीत अंगरेजों के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बंगाल में अनेकानेक विद्रोहों की मिसाले होने के बावजूद उनके संबंध में कोई पाठ्यक्रम नहीं अपनाये गये. अत: ऐसा लगेगा कि मुसलमानों को विदेशी मानने का विचार-हालांकि वे स्थायी रूप से देश में बस गये थे और देश की मिली-जुली संस्कृति का अभिन्न अंग बन गये थे- सांप्रदायिक ढर्रे पर ऐतिहासिक अध्ययनों के संगठन द्वारा पोषित किया गया और विधि सम्मत करार दिया गया. विश्वविद्यालयों में ऐतिहासिक और अन्य अध्ययनों का नमूना कलकत्ता ने ही बंगाल, बिहार व अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों के लिए प्रस्तुत किया. जब एकबार कलकत्ता में प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति का विभाग खुल गया तो बाद में चल कर बनारस और दूसरे विश्वविद्यालयों में भी ऐसे विभाग खोले गये. इसमें कोई संदेह नही कि इन विभागों के कई सदस्यों ने बहुमूल्य शोधकार्य किया पर इसके साथ इनमें से बहुत से विभाग बहुत दिन तक रूढिवाद और हिंदू सांप्रदायिकता के गढ़ बने रहे और उन्होंने प्राचीन भारत में जो कुछ भी हुआ उसकी प्राचीनता और अनूठेपन पर जोर दिया तथा प्रकारांतर से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू धर्म मूलत: इसलाम और अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है.
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लेख सन्दर्भ

सलीम खान