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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मुसलमानों की अक्षम्य गलती

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अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त करूणामय और दयावान है।

मुझे क्षमा करना, मेरे प्रिय पाठकों! मुझे क्षमा करना, मैं अपनी और अपनी तमाम मुस्लिम बिरादरी की ओर से आप से क्षमा और माफ़ी माँगता हूँ जिसने मानव जगत के सब से बड़े शैतान (राक्षस) के बहकावे में आकर आपकी सबसे बड़ी दौलत आप तक नहीं पहुँचाई उस शैतान ने पाप की जगह पापी की घृणा दिल में बैठाकर इस पूरे संसार को युद्ध का मैदान बना दिया। इस ग़लती का विचार करके ही मैंने आज क़लम उठाया है कि आप का अधिकार (हक़) आप तक पहुँचाऊँ और निःस्वार्थ होकर प्रेम और मानवता की बातें आपसे कहूँ।
वह सच्चा मालिक जो दिलों के भेद जानता है, गवाह है कि इन पृष्ठों को आप तक पहुँचाने में मैं निःस्वार्थ हूँ और सच्ची हमदर्दी का हक़ अदा करना चाहता हूँ। इन बातों को आप तक न पहुँचा पाने के ग़म में कितनी रातों की मेरी नींद उड़ी है। आप के पास एक दिल है उस से पूछ लीजिये, वह बिल्कुल सच्चा होता है।

एक प्रेमवाणी

यह बात कहने की नहीं मगर मेरी इच्छा है कि मेरी इन बातों को जो प्रेमवाणी है, आप प्रेम की आँखों से देखें और पढें। उस मालिक के लिए जो सारे संसार को चलाने और बनाने वाला है ग़ौर करें ताकि मेरे दिल और आत्मा को शांति प्राप्त हो, कि मैंने अपने भाई या बहिन की धरोहर उस तक पहुँचाई, और अपने इंसान होने का कर्तव्य पूरा कर दिया।
इस संसार में आने के बाद एक मनुष्य के लिए जिस सत्य को जानना और मानना आवश्यक है और जो उसका सबसे बड़ा उत्तरदायित्व और कर्तव्य है वह प्रेमवाणी मैं आपको सुनाना चाहता हूँ

प्रकृति का सबसे बड़ा सत्य

इस संसार बल्कि प्रकृति की सब से बड़ी सच्चाई है कि इस संसार सृष्टि और कायनात का बनाने वाला, पैदा करने वाला, और उसका प्रबन्ध चलाने वाला सिर्फ और सिर्फ अकेला मालिक है। वह अपने अस्तित्व (ज़ात) और गुणों मे अकेला है। संसार को बनाने, चलाने, मारने, जिलाने मे उसका कोई साझी नहीं। वह एक ऐसी शक्ति है जो हर जगह मौजूद है, हर एक की सुनता है और हर एक को देखता है। समस्त संसार में एक पत्ता भी उसकी आज्ञा के बिना नहीं हिल सकता। हर मनुष्य की आत्मा की आत्मा इसकी गवाही देती है चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला हो और चाहे मुर्ति पूजा करता हो मगर अन्दर से वह यह विश्वास रखता है कि पालनहार, रब और असली मालिक केवल वही एक है।
मनुष्य की बुद्धि में भी इसके अतिरिक्त कोई बात नहीं आती कि सारे सृष्टि का मालिक अकेला है यदि किसी स्कूल के दो प्रिंसपल हों तो स्कूल नहीं चल सकता, एक गाँव के दो प्रधान हों तो गाँव का प्रबंध नष्ट हो जाता है किसी एक देश के दो बादशाह नहीं हो सकते तो इतनी बड़ी सृष्टि (संसार) का प्रबंध एक से ज्यादा खुदा या मालिकों द्वारा कैसे चल सकता है, और संसार के प्रबंधक कई लोग किस प्रकार हो सकते हैं?
एक दलील
कुरआन जो ईश्वरवाणी है उसने संसार को अपने सत्य ईश्वरवाणी होने के लिए यह चुनौती दी कि ‘‘अगर तुमको संदेह है कि कुरआन उस मालिक का सच्चा कलाम नहीं है तो इस जैसी एक सुरह (छोटा अध्याय) ही बनाकर दिखाओ और इस कार्य के लिए ईश्वर के सिवा समस्त संसार को अपनी मदद के लिए बुला लो, अगर तुम सच्चे हो। (सूर: बकरा, 23)
चैदह सौ साल से आज तक इस संसार के बसने वाले, और साइंस कम्पयूटर तक शोध करके थक चुके और अपना अपना सिर झुका चुके हैं किसी में भी यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि यह अल्लाह की किताब नहीं है।
इस पवित्र किताब में मालिक ने हमारी बुद्धि को समझाने के लिए अनेक दलीलें दी हैं। एक उदाहरण यह हैं। ‘‘अगर धरती और आकाश में अनेक माबूद (और मालिक) होते तो ख़राबी और फ़साद मच जाता‘‘। बात साफ है अगर एक के अलावा कई मालिक होते तो झगड़ा होता। एक कहता अब रात होगी, दूसरा कहता दिन होग। एक कहता कि छः महीने का दिन होगा। एक कहता सूरज आज पश्चिम से निकलेगा, दूसरा कहता नहीं पूरब से निकलेगा अगर देवी, देवताओं का यह अधिकार सच होता और यह वह अल्लाह के कार्यां में शरीक भी होते तो कभी ऐसा होता कि एक दास ने पूजा अर्चना करके वर्षा के देवता से अपनी बात स्वीकार करा ली, तो बड़े मालिक की ओर से ऑर्डर आता कि अभी वर्षा नहीं होगी, फिर नीचे वाले हड़ताल कर देते। अब लोग बैठे हैं कि दिन नहीं निकला, मालूम हुआ कि सूर्य देवता ने हड़ताल कर रखी है।
सच्ची गवाही
सच यह कि संसार की हर चीज गवाही दे रही है यह भली भॉति चलता हुआ सृष्टि का निज़ाम (व्यवस्था) गवाही दे रहा है कि संसार का मालिक अकेला और केवल अकेला है। वह जब चाहे और जो चाहे कर सकता है। उसको कल्पना और ख़्यालों में नहीं लाया जा सकता, उसकी मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। उस मालिक ने सारे संसार को मनुष्य की सेवा के लिए पैदा किया। सूरज इंसान का सेवक, हवा इंसान की सेवक, यह धरती भी मनुष्य की सेवक है, आग पानी जीव जन्तु, संसार की हर वस्तु मनुष्य की सेवा के लिए बनाई गयी हैं। इंसान को इन सब चीजों का सरदार (बादशाह) बनाया गया है, तथा सिर्फ अपना दास और अपनी पूजा और आज्ञा पालन के लिए पैदा किया है।
न्यायोचित और इंसाफ की बात यह है कि जब पैदा करने वाला, जीवन देने वाला, मारने वाला, खाना पानी देने वाला और जीवन की हर एक आवश्यक वस्तु देने वाला वह है तो सच्चे इंसान का अपना जीवन और जीवन से सम्बन्धित तमाम वस्तुएं अपने मालिक की मर्जी से, ओर उसका आज्ञाकारी होकर प्रयोग करनी चाहिये। अगर एक मनुष्य अपना जीवन उस अकेले मालिक की आज्ञा पालन में नहीं गुज़ार रहा है तो वह इंसान नहीं।

प्रस्तुतकर्ता – सलीम खान

Filed under: मुसलमान

4 Responses

  1. 'उदय' says:

    >… बहुत सुन्दर, प्रभावशाली, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति ।

  2. >… बहुत सुन्दर, प्रभावशाली, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति ।

  3. >धन्यवाद उदय जी, आते रहिएगा !

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