स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं !??

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पाकिस्तान में श्रीलंकाई खिलाडियों पर कुछ दहशतगर्दों ने जो हमला किया उससे ये साफ़ हो गया कि पाकिस्तान में किस तरह से आतंकियों ने अपनी पैठ बना ली है| उनके वहां के स्थानीय नागरिकों और कुछ राजनितिक पार्टयों से शह भी मिली हो सकती है, से इंकार नहीं किया जा सकता | जिस तरह से अपने भारत में भी कुछ संस्थाए प्रत्यक्ष रूप से आतंक का पर्याय बन कर कभी गुजरात तो कभी कर्णाटक में अपनी दहशत फैलाती रहती है| (पढ़े मेरा लेख यहाँ चटका लगाकर) कुल मिला कर यह बहुत ही कायराना पूर्ण हरक़त थी और अल्लाह का लाख लाख शुक्र था कि क्रिकेट के खिलाडियों में से कोई हताहत नहीं हुआ| इससे एक बहुत बड़ा फर्क यह हो सकता है कि पाकिस्तान में घटी यह आतंकी घटना से सीधे रूप से खेल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और मुझे नहीं लगता कि भविष्य में कोई भी वहां खेलने जायेगा लेकिन यह दुर्भग्य भी हो सकता है कि क्रिकेट विश्व-कप की मेजबानी जो एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप) के देश करने जा रहे हैं वो ना छीन जाये |


मैंने हिंदुस्तान के दर्द (blog) पर देखा एक जनाब अपने दर्द का इज़हार कर रहे थे, एक नहीं दो नहीं अनेक पोस्ट एक साथ करके यानि जैसे जैसे दर्द उठा उन्होंने बयां कर दिया, दर्द होना भी चाहिए लेकिन उनका एक दर्द बड़ा ही ख़तरनाक उठा जिस पर मुझे यहाँ अपनी बात रखने पर मजबूर कर दिया | बात उन महाशय की नहीं है, मेरे से इससे पहले कई लोगों ने यही सवाल पूछा था | सबसे पहले तो मैं एक बात कहना चाहूँगा कि आतंकियों का कोई धर्म या मज़हब नहीं होता, चाहे वो प्रज्ञा हो, कर्नल हो, अफज़ल या मसूद (अ)ज़हर, सईद आदि| वो सब के सब किसी न किसी राजनैतिक पार्टियों के लिए काम करते हैं| जैसे भारत में भी है और पकिस्तान में भी है| ये सब जानते हैं|


तो मैं बात कर कर रहा था उन महाशय की एक टिपण्णी की जिसमे उन्होंने लिखा कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं | गलती उनकी नहीं है दर असल उन्होंने भी चन्द लोगों की तरह गलती कर बैठी ठीक उसी तरह जैसे एक नयी नवेली ब्रांड न्यू कार को एक अनाडी ड्राईवर चलाये और एक्सीडेंट कर बैठे और लोग दोष दे कार को, ड्राईवर की करतूत पर| अरे! कार को ड्राईवर से मत तौलिये |


इन्ही महाशय की तरह मुझसे एक जनाब ने मुझसे पूछा कि सलीम एक बात बताओ “अगर इसलाम दुनिया का सबसे अच्छा धर्म है तो आखिर बहुत से मुसलमान बेईमान, बेभरोसा क्यूँ हैं और अधिकतर मुसलमान रुढिवादी और आतंकवादी क्यूँ होते है? क्यूँ वो धोखेबाज़ और रिश्वतखोरी और घूसखोरी में लिप्त हैं?

मैं उन सबका जवाब देता हूँ बिन्दुवार- (कि मुस्लिम धोखेबाज़ होते हैं!?)


(1) मिडिया इसलाम की ग़लत तस्वीर पेश करता है-

(क) इसलाम बेशक सबसे अच्छा धर्म है लेकिन असल बात यह है कि आज मिडिया की नकेल पश्चिम वालों के हाथों में है, जो इसलाम से भयभीत है| मिडिया बराबर इसलाम के विरुद्ध बातें प्रकाशित और प्रचारित करता है| वह या तो इसलाम के विरुद्ध ग़लत सूचनाएं उपलब्ध करता/कराता है और इसलाम से सम्बंधित ग़लत सलत उद्वरण देता है या फिर किसी बात को जो मौजूद हो ग़लत दिशा देता है या उछलता है|

(ख) अगर कहीं बम फटने की कोई घटना होती है तो बगैर किसी बगैर किसी प्रमाण के मसलमान को दोषी मान लिया जाता है और उसे इसलाम से जोड़ दिया जाता है | मेरा मानना यह है, जैसा मैं पहले कह चूका हूँ कि आतंकियों का कोई धर्म या मज़हब नहीं होता, चाहे वो प्रज्ञा हो, कर्नल हो, अफज़ल या मसूद (अ)ज़हर, सईद| समाचार पत्रों में बड़ी बड़ी सुर्खियों में उसे प्रकाशित किया जाता है | फिर आगे चल कर पता चलता है कि इस घटना के पीछे किसी मुसलमान के बजाये किसी गैर मुस्लिम का हाथ था तो इस खबर को पहले वाला महत्व नहीं दिया जाता और छोटी सी खबर दे दी जाती है |

(ग) अगर कोई 50 साल का मुसलमान व्यक्ति 15 साल की मुसलमान लड़की से उसकी इजाज़त और मर्ज़ी से शादी करता है तो यह खबर अख़बार के पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित की जाती है लेकिन अगर को 50 साल का गैर-मुस्लिम व्यक्ति 6 साल की लड़की के साथ बलात्कार करता है तो इसकी खबर को अखबार के अन्दर के पन्ने में संछिप्त कालम में जगह मिलती है | प्रतिदिन अमेरिका में 2713 बलात्कार की घटनाये होती हैं और अपने भारत में हर आधे घंटे में एक औरत बलात्कार का शिकार होती है लेकिन वे खबरों में नहीं आती है या कम प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं| अमेरिका में ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि यह चीज़ें उनकी जीवनचर्या में शामिल हो गयी है | 

(2) काली भेंडें (ग़लत लोग) हर समुदाय में मौजूद हैं

मैं जानता हूँ कि कुछ मुसलमान बेईमान हैं और भरोसे लायक नहीं है | वे धोखाधडी आदि कर लेते हैं| लेकिन असल बात यह है कि मिडिया इस बात को इस तरह पेश करता है कि सिर्फ मुसलमान ही हैं जो इस प्रकार की गतिविधियों में लिप्त हैं | हर समुदाय के अन्दर कुछ बुरे लोग होते है और हो सकते है| इन कुछ लोगों की वजह से उस धर्म को या उस पूरी कौम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है जिसके वह अनुनायी है या जिससे वह सम्बद्ध हैं|

(3) कुल मिलाकर मुसलमान सबसे अच्छे हैं


मुसलमानों में बुरे लोगों की मौजूदगी होने के बावजूद मुसलमान सबसे कुल मिलाकर सबसे अच्छे लोग हैं | मुसलमान ही वह समुदाय है जिसमें शराब पीने वालों की संख्या सबसे कम है और शराब ना पीने वालों की संख्या सबसे ज्यादा | मुसलमान कुल मिला कर दुनिया में सबसे ज्यादा धन-दौलत गरीबों और भलाई के कामों में खर्च करते हैं | सुशीलता, शर्म व हया, सादगी और शिष्टाचार, मानवीय मूल्यों और और नैतिकता के मामले में मुसलमान दूसरो के मुक़ाबले में बहुत बढ़ कर हैं|


(4) कार को ड्राईवर से मत तौलिये

अगर आपको किसी नवीनतम मॉडल की कार के बारे में यह अंदाजा लगाना हो कि वह कितनी अच्छी है और फिर एक ऐसा शख्स जो कार चलने की विधि से परिचित ना हो लेकिन वह कार चलाना चाहे तो आप किसको दोष देंगे कार को या ड्राईवर को | स्पष्ट है इसके लिए ड्राईवर को ही दोषी ठहराया जायेगा | इस बात का पता लगाने के लिए कि कार कितनी अच्छी है, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उस के ड्राईवर को नहीं देखता है बल्कि उस कार की खूबियों को देखता है| उसकी रफ्तार क्या है? ईंधन की खपत कैसी है? सुरक्षात्मक उपायों से सम्बंधित क्या कुछ मौजूद है? वगैरह| अगर हम इस बात को स्वीकार भी कर लें कि मुस्लमान बुरे होते हैं, तब भी हमें इस्लाम को उसके मानने वालों के आधार पर नहीं तुलना चाहिए या परखना चाहिए | अगर आप सहीं मायनों में इस्लाम की क्षमता को जानने और परखने की ख़ूबी रखते हैं तो आप उसके उचित और प्रामादिक स्रोतों (कुरान और हदीसों) को सामने रखना होगा |


(5) इस्लाम को उसके सही अनुनायी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के द्वारा जाँचिये और परखिये

अगर आप व्यावहारिक रूप से जानना चाहते है कि कार कितनी अच्छी है तो उसको चलने पर एक माहिर ड्राईवर को नियुक्त कीजिये| इसी तरह सबसे बेहतर और इस्लाम पर अमल करने के लिहाज़ से सबसे अच्छा नमूना जिसके द्वारा आप इस्लाम की असल ख़ूबी को महसूस कर सकते हैं– पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) हैं |

बहुत से ईमानदार और निष्पक्ष गैर मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस बात का साफ़ साफ़ उल्लेख किया है पैगम्बर सल्ल० सबसे अच्छे इन्सान थे| माइकल एच हार्ट जिसने ‘इतिहास के सौ महत्वपूर्ण प्रभावशाली लोग‘ पुस्तक लिखी है, उसने इन महँ व्यक्तियों में सबसे पहला स्थान पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को दिया है| गैर-मुस्लिमों द्वारा पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने के इस प्रकार के अनेक नमूने है – जैसे थॉमस कार्लाईल, ला मार्टिन आदि|


“मेरा मानना है कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता चाहे वो प्रज्ञा हो, कर्नल हो, अफज़ल या मसूद (अ)ज़हर, सईद आदि|” –

सलीम खान स्वच्छ सन्देश, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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>जगत गुरु- नराशंश महर्षि !

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“आप इतिहास के एक मात्र व्यक्ति हैं जो अन्तिम सीमा तक सफल रहे धार्मिक स्तर पर भी और सांसारिक स्तर पर भी 

यह टिप्पणी एक ईसाई वैज्ञानिक डा0 माइकल एच हार्ट की है जिन्होंने अपनी पुस्तक The 100 (एक सौ) में मानव इतिहास पर प्रभाव डालने वाले संसार के सौ अत्यंत महान विभूतियों का वर्णन करते हुए प्रथम स्थान पर जिस महापुरूष को रखा है उन्हीं के सम्बन्ध में यह टिप्पणी लिखी है। अर्थात संसार के क्रान्तिकारी व्यक्तियों की छानबीन के बाद सौ व्यक्तियों में प्रथम स्थान ऐसे महापुरुष को दिया है जिनका वह अनुयाई नहीं।


जानते हैं वह कौन महा-पुरुष हैं…….? उनका नाम मुहम्मद हैः

मुहम्मद सल्ल0 वह इनसान हैं जिनके समान वास्तव में संसार में न कोई मनुष्य पैदा हुआ और न हो सकता है जबहि तो एक वैज्ञानिक लेखक जब हर प्रकार के पक्षपात से अलग होकर क्रान्तिकारी व्यक्तियों की खोज में निकलता है तो उसे पहले नम्बर पर यही मनुष्य देखाई देते हैं।  ऐसा क्यों ? आख़िर क्यों मुहम्मद सल्ल0 को उन्होंने संसार में पैदा होने वाले प्रत्येक व्यक्तियों में प्रथम स्थान पर रखा हालाँकि वह ईसाई थे, ईसा अलै0 अथवा किसी अन्य इसाई विद्धानों को पहला स्थान दे सकते थे…..? वास्तविकता यह है कि आपने जो संदेश दिया था वह मानव संदेश था, उसका सम्बन्ध किसी जाति विशेष से नहीं था, वह अन्तिम क्षण तक मानव कल्याण की बात करते रहे और इसी स्थिति में संसार त्याग गए और इसी संदेश के आधार पर मात्र 23 वर्ष की अवधि में पूरे अरब को बदल कर रख दिया|  

प्रोफेसर रामाकृष्णा राव के शब्दों में – {आप के द्वारा एक ऐसे नए राज्य की स्थापना हुई जो मराकश से ले कर इंडीज़ तक फैला और जिसने तीन महाद्वीपों – एशिया, अफ्रीक़ा, और यूरोप- के विचार और जीवन पर अपना असर डाला} ( पैग़म्बर मुहम्मद , प्रोफेसर रामाकृष्णा राव पृष्ठ 3)

आइए ज़रा इस महान व्यक्ति की जीवनी पर एक दृष्टि डाल कर देखते हैं कि ऐसा कैसे हुआ?

मुहम्मद सल्ल0 20 अप्रैल 571 ई0 में अरब के मक्का शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार में पैदा हुए । जन्म के पूर्व ही आपके पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष के हुए तो दादा का साया भी सर से उठ गया जिसके कारण कुछ भी पढ़ लिख न सके। आरम्भ ही से गम्भीर, सदाचारी, एकांत प्रिय तथा पवित्र एवं शुद्ध आचरण के थे। आपका नाम यद्यपि मुहम्मद था परन्तु इन्हीं गुणों के कारण लोग आपको «सत्यवादी» तथा «अमानतदार» की उपाधि से पुकारते थे। आपकी जीवनी बाल्यावस्था हो कि किशोरावस्था हर प्रकार के दाग़ से शुद्ध एंव उज्जवल थी। हालांकि वह ऐसे समाज में पैदा हुए थे जहां हर प्रकार की बुराइयाँ हो रही थीं, शराब, जुवा, हत्या, लूट-पाथ तात्पर्य यह कि वह कौन सी बुराई थी जो उनमें न पाई जा रही हो? लेकिन उन सब के बीच सर्वथा शुद्ध तथा उज्जवल रहे। जब आपकी आयु चालीस वर्ष की हो गई तो ईश्वर ने मानव-मार्गदर्शन हेतु आपको संदेष्टा बनाया, आपके पास आकाशीय दूत जिब्रील अलै0 आए और उन्हों ने ईश्वर की वाणी क़ुरआन पढ़ कर आपको सुनाया। यहीं से क़ुरआन के अवतरण का आरम्भ हुआ, जो इश्वर की वाणी है, मानव-रचना नहीं। इसी के साथ आपको ईश्दुतत्व के पद पर भी आसीन कर दिया गया फिर आपको आदेश दिया गया कि मानव का मार्गदर्शन करने के लिए तैयार हो जाएं। अतः आपने लोगों को बुराई से रोका। जुआ, शराब, व्यभिचार, और बेहयाई से मना किया। 

उच्च आचरण और नैतिकता की शिक्षा दी, एक ईश्वर का संदेश देते हुआ कहा कि «हे लोगो! एक ईश्वर की पूजा करो, सफल हो जा ओगे»  

सज्जन लोगों ने आपका अनुसरण किया और एक ईश्वर के नियमानुसार जीवन बिताने लगे। परन्तु जाति वाले जो विभिन्न बुराइयों में ग्रस्त थे, स्वयं अपने ही जैसे लोगों की पूजा करते थे और ईश्वर को भूल चुके थे, काबा में तीन सौ साठ मुर्तियाँ रखी थीं। जब आपने उनको बुराइयों से रोका तो सब आपका विरोध करने लगे। आपके पीछे पड़ गए क्योंकि इससे उनके पूर्वजों के तरीक़े का खण्डन हो रहा था पर सत्य इनसान की धरोहर हीता है उसका सम्बन्ध किसी जाति-विशेष से नहीं होता। वह जिनके बीच चालीस वर्ष की अवधि बिताई थी और जिन्हों ने उनको सत्यवान और अमानतदार की उपाधि दे रखी थी वही आज आपके शत्रु बन गए थे। आपको गालियाँ दी, पत्थर मारा, रास्ते में काँटे बिछाए, आप पर पर ईमान लाने वालों को एक दिन और दो दिन नहीं बल्कि निरंतर 13 वर्ष तक भयानक यातनायें दी, यहाँ तक कि आपको और आपके अनुयाइयों को जन्म-भूमि से भी निकाला, अपने घर-बार धन-सम्पत्ती को छोड़ कर मदीना चले गए थे और उन पर आपके शुत्रुओं ने कब्ज़ा कर लिया था लेकिन मदीना पहुँचने के पश्चात भी शत्रुओं ने आपको और आपके साथियों को शान्ति से रहने न दिया। उनकी शत्रुता में कोई कमी न आई। आठ वर्ष तक आपके विरुद्ध लड़ाई ठाने रहे परन्तु आप और आपके अनुयाइयों नें उन सब कष्टों को सहन किया। हालांकि जाति वाले आपको अपना सम्राट बना लेने को तैयार थे, धन के ढ़ेर उनके चरणों में डालने के लिए राज़ी थे शर्त यह थी कि वह लोगों को अपने पूर्वजो के तरीके पर चलने के लिए छोड़ दे तथा उनको मार्गदर्शन न करें। लेकिन जो इनसान अंधे के सामने कुंवा देखे, बच्चे के सामने आग देखे और अंधे को कुंयें में गिरने से न रोके, और बच्चे को आग के पास से हटाने की चेष्टा न करे वह इनसान नहीं तो फिर मुहम्मद सल्ल0 के सम्बन्ध में यह कैसे कल्पना की जा सकती थी कि आप लोगों को बुराइयों में अग्रसर देखें और उन्हें न रोकें हांलाकि आप जगत-गुरू थे। 

“फिर 21 वर्ष के बाद एक दिन वह भी आया कि आप के अनुयाइयों की संख्या दस हज़ार तक पहुंच चुकी थी और आप वह जन्म-भूमि (मक्का) जिस से आपको निकाल दिया गया था उस पर विजय पा चुके थे। प्रत्येक विरोधी और शुत्रु आपके क़ब्जे में थे, यदि आप चाहते तो हर एक से एक एक कर के बदला ले सकते थे और 21 वर्ष तक जो उन्हें चैन की साँस तक लेने नहीं दिया था सभी का सफाया कर सकते थे लेकिन आपको तो सम्पूर्ण मानवता के लिए दयालुता बना कर भेजा गया था। ऐसा आदेश देते तो कैसे ? उनका उद्देश्य तो पूरे जगत का कल्याण था इस लिए आपने लोगों की क्षमा का ऐलान कर दिया। इस सार्वजनिक एलान का उन शत्रुओं पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि मक्का विजय के समय आपके अनुयाइयों की संख्या मात्र दस हज़ार थी जब कि दो वर्ष के पश्चात अन्तिम हज के अवसर पर आपके अनुनायियों की संख्या डेढ़ लाख हो गई। “

इस का कारण क्या था ?

गाँधी जी के शब्दों में « मुझे पहले से भी ज्यादा विश्वास हो गया है कि यह तलवार की शक्ति न थी जिसने इस्लाम के लिए विश्व क्षेत्र में विजय प्राप्त की, बल्कि यह इस्लाम के पैग़म्बर का अत्यंत सादा जीवन, आपकी निःसवार्थता, प्रतिज्ञापालन और निर्भयता थी»  

मित्रो ! ज़रा ग़ौर करो क्या इतिहास में कोई ऐसा इन्सान पैदा हुआ जिसने मानव कल्याण के लिए अपनी पूरी जीवनी ही बिता दी और लोग 21 वर्ष तक उनका विरोध करते रहे फिर एक दिन वह भी आया कि उन्हीं विरोधियों ने उनके संदेश को अपना कर पूरी दुनिया में फैल गए और लोगों ने उनके आचरण से प्रभावित हो कर इस संदेश को गले लगा लिया……!!????  

तब ही तो हम उन्हें “जगत गुरु” कहते हैं।

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>क्या भगवान रजनीश ईश्वर है?

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कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है| कृपया मेरे शब्दों पर ध्यान दीजिये मैंने कहा कि “कुछ लोग कहते है कि भगवान रजनीश या ओशो रजनीश परमशक्तिसंपन्न ईश्वर है !???” 

मैंने पीस टी वी पर प्रश्नोत्तर काल में देखा था कि एक हिन्दू सज्जन ने कहा कि हिन्दू भगवान रजनीश को एक ईश्वर के रूप में नहीं पूजते हैं| मुझे ज्ञात हुआ कि हिन्दू भाई भगवान रजनीश को ईश्वर के रूप में नहीं देखते I 

लेकिन रजनीश के मानने वाले – समर्थको ने उनकी फिलोसोफी और आइडियोलोगी को बदल दिया है, लेकिन यह भी सत्य है कि उनके मानने वाले किसी धर्म विशेष के नहीं हैं बल्कि अलग अलग धर्मों के हैं | और रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक … one and only, और वह ईश्वर हैं!

मैं इस बात को आगे बढ़ता हूँ – कुरान के सुरः इखलास से और वेदों के अनुसार इसको जाँचता हूँ :

ईश्वर के अंतिम ग्रन्थ कुरान में सुरः इखलास में लिखा है कि –  

1- कहो! अल्लाह यकता है| (अर्थात ईश्वर एक है|)
2- अल्लाह निरपेक्ष और सर्वाधार है| 
3- न वह जनिता है और न जन्य | 
4- और ना उसका कोई समकक्ष | 

इसी तरह वेदों में लिखा है कि –

एकम ब्रह्मा अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति नास्ति किंचन ना अस्ति |

और  

ना तस्य प्रतिमा अस्ति |

(अ) सुरः इखलास में लिखा है- ‘क़ुल हु अल्लाह हु अहद’ –‘यानि, वह अल्लाह (ईश्वर) है, एक और केवल (यकता)| 

क्या रजनीश वन एंड वनली है? क्या रजनीश एक है और केवल एक? हम देखते हैं कि हमारे देश में फर्जी व्यक्ति अपने आपको भगवान-पुरुष इस तरह से बताते हैं कि जनता को ऐसा लगने लगता है कि वह ईश्वर है या ईश्वर का रूप है| ऐसे बहुत मिलेंगे अपने इस महान देश भारत में | रजनीश वास्तव में एक और केवल मात्र एक नहीं है| मनुष्य होने के बावजूद और केवल मनुष्य होने के नाते कोई यह घोषित कर दे कि वह ईश्वर है, गलत है | बिलकुल ही गलत है| फिरभी रजनीश के कुछ अनुनायी यह कहते है कि रजनीश बेजोड़ और सर्वोपरि है और मात्र एक, केवल एक… one and only.

(आ) आगे सुरः इखलास में लिखा है अल्लाह हुस् समद’– ‘अल्लाह निरपेक्ष है और सर्वाधार है’ 

क्या रजनीश निरपेक्ष और सर्वाधार है ??? ईश्वर अमर व अजर है | क्या रजनीश अमर या अजर थे? मैंने तो उनकी जीवनी में पढ़ा है कि उनको डायबिटीज़, अस्थमा और क्रोनिक बैकएच जैसी कई बीमारियाँ थी | वे जब अमेरिका की जेल में थे तब उन्होंने वहां की सरकार पर उनको को मारने की नियत से स्लो पोइसोनिंग का इल्जाम लगाया था | कल्पना कीजिये! परमशक्तिसंपन्न ईश्वर को ज़हर दिया जा रहा है! और तो और हम सब जानते हैं कि रजनीश की म्रत्यु हुई थी जैसे हम और आप मरते हैं और वह तो जलाये भी गए थे|
 
इस तरह से रजनीश अमर नहीं थे ना ही सर्वाधार, सर्वव्यापी | 

(इ) तीसरा वाक्य है ‘लम य लिद व लम यु लद’ – यानि ‘He begets not, nor is begotten’. वह (ईश्वर) न जनिता है न जन्य’|

अब हमें और आपको अर्थात सबको पता है रजनीश पैदा हुए थे| उनका जन्म भारत के जबलपुर शहर में हुआ था जैसे कि मेरा जन्म भारत के पीलीभीत जिले में हुआ था और आपका भी कहीं ना कहीं हुआ है अर्थात सभी मनुष्य की तरह वह भी पैदा हुए थे| उनकी माता थीं और उनके पिता भी| रजनीश बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे| मई 1981 में वे अमेरिका गए और अमेरिका के ओरेगोन शहर में बस गए जिसका नाम रखा उन्होंने ‘रजनीशपुरम’ | अमेरिका में उनके द्वारा किये गए किसी अपराध के लिए वह जेल गए और सन 1985 में अमेरिका से डिपोर्ट कर दिए गए| इस तरह से रजनीश भारत वापस आ गए और पुणे में ‘Rajneesh Neosanyas Commune’ की शुरुवात की जिसका नाम बाद में बदल कर ‘ओशो कम्यून’ |

अगर कभी वक़्त मिले तो पुणे जाईयेगा- ‘ओशो कम्यून’ में, वह आपको पत्थर पर लिखा हुआ मिलेगा कि “OSHO – never born, never died, only visited the planet earth between 11th Dec. 1931 to 19th Jan 1990”. ‘ओशो- ना कभी पैदा हुआ, ना कभी मरा, केवल 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच पृथ्वी पर आया था’| 

उस पत्थर पर एक बात लिखना शायेद भूल गए कि रजनीश अर्थात भगवन रजनीश को दुनिया के विभिन्न 21 देशों ने वीज़ा देने से मना कर दिया गया| सोचिये और कल्पना कीजिये – सर्वशक्तिमान ईश्वर धरती पर आता है और उसे वीज़ा की आवश्यकता पड़ती है! 

(ई) चौथा वाक्य (आयत) है व लम य कुल्लहु कुफुवन अहद “none besides the One True God, Allah (swt), ‘there is none like Him’. यानि :और ना कोई उसका समकक्ष”

अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | वेदों में लिखा है – ना तस्य प्रतिमा अस्ति” उसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती | इधर हम जानते है कि रजनीश एक इन्सान थे, उनका एक सिर था, दो हाँथ, दो पैर और बड़ी सी दाढ़ी भी | कल्पना कीजिये कि कोई कहे, “ईश्वर हज़ार गुना शक्तिशाली है अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर के मुकाबले”| अर्नाल्ड श्वार्ज़नेग्गेर जैसा कि आप जानते है दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक है| वह मिस्टर यूनिवर्स के खिताब से नवाज़ा गया था| अगर आप किसी भी चीज़, व्यक्ति आदि से ईश्वर के जैसा होने की कल्पना करते हैं वह चीज़ य व्यक्ति ईश्वर नहीं हो सकती चाहे उसे सौ गुना हज़ार गुना ज्यादा कहके क्यूँ ना कहा जाये य चेह कोई कितना भी बलशाली क्यूँ ना हो, उसकी तुलना करके आप ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकते, ना ही उसकी छवि अपने मस्तिष्क में बना सकते हैं | भले चाहे वह खली, दारा सिंह य किंग कोंग क्यूँ ना हो| 

“The moment you can compare the claimant to godhood to anything, he or she is not God.” ‘Wa lam ya kul lahu kufwan ahad’ ‘there is none like Him.’

वेदों में लिखा है – ना तस्य प्रतिमा अस्ति | “एकः ब्रह्म अस्ति, द्वितीयो नास्ति| नास्ति, नास्ति किंचन मात्र नास्ति”



अब आपकी टिप्पणियां ही बतायेंगी कि आप क्या राय रखते हैं?

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>सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है?

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“इस बार थोडा अलग मगर वास्तविकता के बेहद करीब, यह लेख आप ज़रूर पढ़े, मेरा निवेदन है कि आप ज़रूर पढें और पढने से ज्यादा समझें क्यूँकि केवल पढने से ज़रूरी है उसको पढ़ कर समझना | लेकिन होता क्या है कुछ लोग अगर उनके मतलब का लेख नहीं होता है तो उसे या तो पढ़ते ही नहीं हैं और अगर पढ़ते भी हैं तो बिना जाने बूझे अनाप शनाप कमेंट्स कर देते हैं | उदहारण स्वरुप अगर किसी ने लिखा कि मांसाहार खाना जायज़ है| तो उसके फलस्वरूप उस विषय के विरोध में बहुत कुछ अनाप शनाप बातें लिख डालते है | अपनी बातें बेतुके तर्कों से भर कर सिद्ध कर देतें हैं, मगर वहीँ कुछ लोग अपनी बात सही ढंग से लिखते हैं | मैं मानता हूँ कि मुझे अभी पूर्ण जानकारी हर एक विषय में नहीं है और मैं अभी लेखन में और ब्लॉग में नया और शिशु मात्र हूँ, मगर मुझे इतना पता है कि मैं जो लिखता हूँ वो सत्य है ! अब आप ज़रूर उद्वेलित होंगे कि वाह सलीम बाबू ! आप जो भी लिखते हैं वो सत्य है और बाकी सब झूठ| तो जनाब मेरा हमेशा की तरह एक ही जवाब मैं जो भी लिखता हूँ वो इसलिए सत्य है क्यूंकि मैं केवल वेदों, पुराण, भविष्य पुराण और कुरान, हदीश और बाइबल आदि में दिए गए विषयों की व्याख्या करता हूँ |”

खैर ! मैं बात कर रहा था सूअर का माँस खाना क्यूँ मना है?  


मैं इस विषय पर बिन्दुवार आपको सम्बंधित धर्म ग्रन्थों का हवाला देते हुए समझाने का प्रयास करूँगा कि सूअर का माँस खाना क्यूँ हराम (निषेध) है?

कुरान में सूअर का माँस का निषेध : 
हम सबको पता है कि सूअर का माँस मुख्य रूप से इस्लाम में बिल्कुल ही मना (हराम, निषेध) है | कुरान में कम से कम चार जगहों पर सूअर के माँस के प्रयोग को हराम और निषेध ठहराया गया है | हवाले के लिए देखें कुरान की आयतें 2:173, 5:3, 6:145 aur 16:115  
पवित्र कुरान की निम्न आयत इस बात को स्पष्ट करने को काफी है सूअर का माँस क्यूँ हराम किया गया है: “तुम्हारे लिए (खाना) हराम (निषेध) किया गया मुर्दार, खून, सूअर का माँस और वह जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो ” – कुरान 5:3
बाइबल में सूअर का माँस का निषेध:
ईसाईयों को यह बात उनके धार्मिक ग्रन्थ के हवाले से समझाई जा सकती है कि सूअर माँस हराम है | बाइबल में सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख लैव्य व्यवस्था (Book of Leviticus) में हुआ है-

“सूअर जो चिरे अर्थात फटे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता इसलिए वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है” “इनके माँस में से कुछ ना खाना और उनकी लोथ को छूना भी नहीं, ये तुम्हारे लिए अशुद्ध हैं|” -लैव्य व्यवस्था (11/7-8) 
इसी प्रकार बाइबल के व्यवस्था विवरण (Book of Deuteronomy) में भी सूअर के माँस के निषेध का उल्लेख किया गया है- “फिर सूअर जो चिरे खुर का होता है, परन्तु पागुर नहीं करता, इस कारण वह तुम्हारे लिए अशुद्ध है| तुम ना तो इनका माँस खाना और ना ही इनकी लोथ को छूना |”
व्यवस्था विवरण (14/8)  

सूअर का माँस बहुत से रोगों का कारण है:

ईसाईयों के अलावा जो अन्य गैर-मुस्लिम, हिन्दू या नास्तिक लोग है वे सूअर के माँस के हराम होने के सम्बन्ध में बुद्धि, तर्क और विज्ञानं के हवालों से ही संतुष्ट हो सकते हैं| सूअर के माँस से कम से कम सत्तर विभिन्न रोग जन्म लेते हैं| किसी व्यक्ति के शरीर में विभिन्न प्रकार के कीड़े (Helminthes) हो सकते हैं, जैसे गोलाकार कीड़े, नुकीले कीड़े, फीता क्रीमी आदि | सबसे ज्यादा घातक कीड़ा Taenia Solium है जिसे आम लोग फीताकार कीड़ा (Tapworm) कहते हैं | यह कीड़ा बहुत लम्बा होता है और आंतों में रहता है| इसके अंडे खून में सम्मिलित होकर शरीर के लगभग सभी अंगों तक पहुँच जाते हैं| अगर यह कीड़ा दिमाग में चला गया तो इन्सान की स्मरणशक्ति ख़त्म हो जाती है | अगर वह दिल में प्रवेश कर जाये तो इन्सान की ह्रदय गति रुक जाने का ख़तरा हो जाता है| अगर यह कीड़ा आँखों में पहुँच जाये तो इन्सान की देखने की क्षमता समाप्त कर देता है| अगर यह जिगर में में पहुँच जाये तो बहुत भारी क्षति पहुँचाता है| इस प्रकार यह कीड़ा शरीर के अंगों को क्षति पहुँचाने की क्षमता रखता है| एक दूसरा कीड़ा Trichura Tichurasis है| 
सूअर के माँस के बारे में यह भ्रम है कि अगर उसे अच्छी तरह पका लिया जाये उसके भीतर पनप रहे उपरोक्त कीडों के अंडे नष्ट हो जाते हैं| अमेरिका में किये गए एक चिकित्सीय शोध में यह बात सामने आयी है कि चौबीस व्यक्तियों में से जो लोग Trichura Tichurasis के शिकार थे, उनमें से 22 लोगों ने सूअर के माँस को अच्छी तरह से पकाया था | इससे मालूम हुआ कि सामान्य ताप में सूअर का माँस पकाने से भी यह घातक अंडे समाप्त नहीं होते ना ही नष्ट हो पाते हैं|  

सूअर के माँस में मोटापा पैदा करने वाले वाले तत्व पाए जाते हैं:

सूअर के माँस में पुट्ठों को मज़बूत करने वाले तत्व बहुत कम पाए जाते हैं, इसके विपरीत मोटापे को पैदा करने वाले तत्व बहुत ज्यादा पाए जातें हैं | मोटापा पैदा करने वाले ये तत्व खून की नाणीयों में दाखिल हो जाते हैं और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) और हार्ट अटैक (दिल के दौरे) का कारण बनते हैं| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पचास प्रतिशत से अधिक अमेरिकी लोग हाईपरटेंशन (अत्यंत मानसिक तनाव) के शिकार हैं और इसका मुख्य कारण है कि यह लोग सूअर का माँस प्रयोग करते हैं|

कुछ लोग यह तर्क प्रस्तुत करते है कि ऑस्ट्रेलिया में सूअर का पालन पोषण अत्यंत साफ़ सुथरे ढंग से और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए अनुकूल माहौल में किया जाता है| यह बात ठीक है कि स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनुकूल और स्वच्छ वातावरण में सूअरों को एक साथ उनके बाड़े में रखा जाता है| आप चाहे उन्हें स्वच्छ रखने की कितनी भी कोशिश करें परन्तु वास्तविकता यह है कि प्राकृतिक रूप से उनके अन्दर गन्दगी पसंदी मौजूद रहती है| इसलिए वे अपने शरीर और अन्य सूअरों के शरीर से निकली गन्दगी का सेवन करने से भी नहीं चूकते| सूअर संसार का सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है: सूअर ज़मीन पर पाए जाने वाला सबसे गन्दा और घिनौना जानवर है | वह जानवरों और इन्सान के बदन से निकलने वाली गन्दगी का सेवन करके जीता और पलता-बढ़ता है| इस जानवर को खुदा ने गंदगियों को साफ़ करने के उद्देश्य से पैदा किया है| गाँव और देहातों में जहाँ लोगों के लिए आधुनिक शौचालय नहीं है और लोग इस कारणवश खुले वातावरण (खेत, जंगल आदि) में शौच करते हैं, अधिकतर यह जानवर सूअर ही इन गंदगियों को साफ़ करता है|


सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है:

“इस धरती पर सूअर सबसे निर्लज्ज और बेशर्म जानवर है| केवल यही एक ऐसा जानवर है जो अपने साथियों को बुलाता है कि वे आयें और उसकी मादा के साथ यौन इच्छा को पूरी करें| अमेरिका में प्रायः लोग सूअर का माँस खाते है परिणामस्वरुप ऐसा कई बार होता है कि ये लोग डांस पार्टी के बाद आपस में अपनी बीवियों की अदला बदली करते हैं अर्थात एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से कहता है कि मेरी पत्नी के साथ तुम रात गुज़ारो और मैं तुम्हारी पत्नी के साथ रात गुज़ारुन्गा (फिर वे व्याव्कारिक रूप से ऐसा करते है)| अगर आप सूअर का माँस खायेंगे तो सूअर की सी आदतें आपके अन्दर पैदा होंगी | हम भारतवासी अमेरिकियों को बहुत विकसित और साफ़ सुथरा समझते हैं | वे जो कुछ करते हैं हम भारतवासी भी उसे कुछ वर्षों बाद करने लगते हैं| Island पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार पत्नियों की अदला बदली की यह प्रथा उच्च और सामान्य वर्ग के लोगों में आम हो चुकी है|”

अब आप ही बताईये और सोचिये आखिर क्यूँ इसे निषेध किया गया है ? यह जानवर सबसे गन्दा क्यूँ है? आपकी टिप्पणियों का स्वागत है!

सलीम खान स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़, लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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>पब संस्कृति, कट्टरता संस्कृति और हमारी संस्कृति

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पुनः प्रकाशित

पिछले दिनों 26 जनवरी के ठीक एक दिन पहले मंगलूर (कर्नाटक) में श्रीरामसेना के कार्यकर्ताओं ने कानून व्यवस्था की चिंता किए बिना जिस तरह से लड़कियों और औरतों को दौड़ा-दौड़ा के पीटा उससे सभ्यता और शालीनता के मानने वालों को बहुत ठेस पहुँची और दुःख पहुँचा। लड़कियों पर असभ्य हमले की इस घटना पर प्रदेश के मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया आने में 2 दिन लग गए। इसके अलावा पुलिस ने भी अपनी कार्यवाही में बहुत देरी की। कर्नाटक ने चर्चों पर अभी हमलों के ज़्यादा दिन नहीं बीते तब इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार बजरंगदल के प्रति जिस तरह से नरमी बरती गयी थी वह किसी से छिपा नही है। अतीत को देखते हुए इस बार भी श्रीराम सेना पर अंकुश लगाने के लिए राज्य सरकार की तरफ़ से कोई ठोस क़दम उठाये जायेंगे, कह पाना मुश्किल है। श्रीरामसेना पर पाबन्दी लगाने पर भी राज्य सरकार टालमटोल सा रवैया अपनाए हुए है। सरकार का बयान भी उस वक्त आया जब श्रीरामसेना के प्रमुख प्रमोद मुथलिक जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, उन्होंने राज्य सरकार की रूलिंग पार्टी को याद दिलाया कि राज्य में जो सरकार बनी है वो बनी ही है हिंदुत्व एजेंडे पर। मुथलिक ने राज्य सरकार को यह सलाह भी दे दी थी कि राजनितिक फायदे के लिए हिंदूवादी संगठनों को बेज़ा परेशान ना किया जाए। (‘हाँ मैं हिंदू हूँ’ -मेरा लेख पढ़े यहाँ क्लिक करके)

श्रीरामसेना के प्रमुख प्रमोद मुथलिक का कहना है कि हमें भारतीय संस्कृति को बचाना है और रक्षा करनी है और लड़कियो और औरतों को ग़लत हरकतों और अनैतिक गतिविधियों से बचाना है, इसलिए उनकी सेना ने पब पर हमला किया और वहां पर मौजूद लड़कियों और महिलाओं को दौड़ा दौड़ा कर खूब पीटा। भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर स्वयम्भू संगठनों के इस कृत्य को जायज़ नही ठहराया नहीं जा सकता लेकिन अफ़सोस इस तरह की घटनाओं पर कोई नही बोल रहा है और गुपचुप रूप से राजनैतिक समर्थन भी मिला हुआ है रूलिंग पार्टी ने कहा की पब पर हमला करने वालों से और श्रीरामसेना से उनका कोई रिश्ता या लेनादेना नही है लेकिन अगर वाकई ये सही है तो बजरंगदल, श्रीरामसेना जैसे इन संगठनों के हिंसात्मक कारनामों पर रूलिंग पार्टी को अपना रुख पुरी तरह से साफ़ करना चाहिए।

वास्तव में ऐसे लोगों को हिंदू कहना हिंदू धर्म संस्कृति का अपमान है श्रीरामसेना की गुंडा और दहशत फैलाने वाली फौज ने जो कुछ किया उसकी कड़ी आलोचना देश भर में हुई जो अख़बारों के ज़रिये हमने अपने सबने पढ़ी/देखी। (‘हाँ मैं हिंदू हूँ’ -मेरा लेख पढ़े यहाँ क्लिक करके)

हमारे यहाँ ये जो कट्टरता का ज़हर हर धर्म में फैलता जा रहा है, वह वास्तव में हमारे लिए किसी आत्मघाती मौत से कम नहीं है। वो जो ये सोचते है किवह ही सही हैं और बाकी सब ग़लत वो वास्तव में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं। उन्हें हमारे भारत, हमारे विश्व और हमारी इंसानियत बिरादरी की असलियत बिल्कुल भी ज्ञान नही है। वो इन्सान और इन्सान में भेद कर रहे हैं, वो अगर किसी अन्य वजह से भेद करते तो समझ में आता भी कि चलो उन्हें शयेद ज्ञान नहीं है असलियत का, मगर जनाब ये तो धर्म को लेकर आपस में बाँट रहें है जबकि दुनिया में जितने भी धर्म हैं या धर्म के ग्रन्थ हैं वो सब एक ही बात कहते है। ना यकीन हो तो अपनी अपनी किताबों और धर्मग्रन्थों के साथ साथ अन्य धर्म के ग्रन्थों का भी उदार मन से मुताला (अध्ययन) करें। सब पता चल जाएगा लेकिन नहीं आप ऐसा करना ही पसंद नहीं करेंगे, हो सकता है कि ये लेख पढ़ते पढ़ते बंद भी कर दे। मगर सच्चाई वाकई तो यही है, ज़रा अपने आप में झांकिए और पूछिये कि क्या हम सब एक नहीं हैं? (इस सम्बन्ध में मेरा लेख पढ़ें- स्वच्छ संदेश ब्लॉग पर)

इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिकता व पश्चिमी संस्कृति की अंधी दौड़ में आज की महिलाएं और लड़कियां तमाम मर्यादाएं लाँघ कर शर्म व लिहाज को भूल रही हैं कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसलिए यहाँ सभी को अपने तरीके से रहने, खाने-पीने, बोलने घुमने फिरने का समान अधिकार है। लेकिन भाई आज़ादी का यह मतलब नहीं कि आधुनिकता की अंधी गली में प्रवेश कर लिया जाए, ना ही श्रीराम सेना जैसे संगठनों को यह अधिकार है कि वह इस तरह से विरोध करें जो गैर कानूनी हो। आज की युवतियों, औरतों को यह समझाने की ज़रूरत है कि वह मर्यादा में रह भी आज़ादी और मनोरंजन का लुत्फ़ उठा सकती हैं, सलीकों से उनके ज़मीर को जगाया जा सकता है साथ ही उन्हें ये सोचने के लिए विवश किया जा सकता है कि वह अपनी शिक्षा के आधार पर यह तय करें कि भारतीय संस्कृति और पश्चिम की संस्कृति में क्या फर्क है। 

सच तो यह है की लड़कियों की पहली पाठशाला व घर में पहली टीचर माँ है बच्चों विशेष रूप से लड़कियों की परवरिश बचपन में ही करते समय अगर उन्हें मर्यादा में रहने, अपनी सभ्यता संस्कृति और परम्पराओं की शिक्षा देने के साथ ही उन्हें निभाने के लिए प्रेरित किया जाए, अच्छे बुरे की पहचान की आदत डाली जाए तो लड़कियों के क़दम हरगिज़ नहीं बहकेंगे, जिस तरह से आज जो देखने को मिल रहा है उसके लिए कहीं न कहीं ज़िम्मेदार परिवार के लोग, पैरेंट्स भी हैं, जो लड़कियों को ज़रूरत से ज़्यादा छूट दिए हुए हैं।

इस घटना के बाद पब कल्चर को लेकर जो बहस छिडी है उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि पब कल्चर कि जड़ों पर प्रहार करने कि ज़रूरत है जो लोग इनके खिलाफ हैं उनका विरोध पब में शराब पीती लड़कियों से नहीं होना चाहिए बल्कि शराब का विरोध करना/होना चाहिए। जो लोग नई अर्थव्यवस्था/पूजीवादी अर्थव्यवस्था के सक्रीय भागीदार हैं वह इसके दुष्परिणामों को समाज के लिए हानिकारक नहीं मानते। अरे! पूजीवाद तो रिश्तों, भावनाओं तक को कैश करा लेने से भी पीछे नही हटता उनकी निगाह में लड़कियों लड़के का सार्वजनिक रूप से बाँहों में बाहें डाल के शराब पीना या डांस करना कोई बुरी बात नहीं है औद्योगिकरण के अलग चरणों का पब संस्कृति या शराब खानों से सीधा सम्बन्ध शुरू से ही रहा है। देश कि अर्थ व्यवस्था वर्तमान समय में औद्योगिकरण के विशेष दौर से गुज़र रही है जहाँ उत्पादन और श्रम के नए तरीकों ने दिन-रात का अन्तर कम कर दिया है। ऐसा नहीं है कि शराब कोंई नई चीज़ है यह पहले भी पी जाती थी और अब भी पी जाती है, लेकिन अब बड़े पैमाने पर पी जाती है और आज कल ये स्टेटस सिम्बल बन चुका है, जिसके नतीजे में समाज में जो गिरावट आई है वो सबके सामने है।

“शराब अपने अपने आप में बहुत भयानक् चीज़ है, वेदों और कुरान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि शराब पीना हराम, वर्जित (prohibited) है। ना यकीन हो तो पढ़ कर देखलें।”

ऐ ईमानदारों, शराब, जुआं और बुत और पांसे तो बस नापाक (बुरे) शैतानी काम हैं, तो तुम लोग इनसे बचे रहो ताकि तुम फलाह (कामयाबी) पाओ. (अल-कुरान 5:90)

मनु स्मृति में पुरज़ोर तरीके से यह मना किया है कि मनुष्य को शराब नहीं पीना चाहिए बल्कि इस की सुगंध तक तो नही लेना चाहिए. (देखें मनु स्मृति 11.146-149)

ऋग्वेद में तो कई जगह पर शराब पीने को निषेध किया गया है, कहाँ गया है कि यह राक्षस, पिशाच और नरक जानेवालों का कार्य है जो ईश्वर के नजदीक बहुत बड़ा पाप है, जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है. 

तो भई! अब जाग ही जाइये तो अच्छा है, वरना विनाश तो निश्चित है.




आपका: सलीम खान संरक्षक स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़ लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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>पर्दा व स्त्री : भूतकाल में स्थिति

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“भूतकाल में स्त्रियों का अपमान किया जाता था और और उनका प्रयोग केवल काम वासना के लिए किया जाता था|”

इतिहास से लिए निम्न उदहारण इस तथ्य की पूर्ण व्याख्या करते हैं कि पूर्व की सभ्यता में औरतों का स्थान इस क़दर गिरा हुआ था कि उनको प्राथमिक मानव सम्मान भी नहीं दिया गया था –  

 
बेबीलोन सभ्यता

औरतें अपमानित की जातीं और बेबिलोनिया के कानून में उनको हक और अधिकार से वंचित रखा जाता था | यदि कोई व्यक्ति किसी औरत की हत्या कर देता था तो उसको दंड देने के बजाये उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया जाता था |  
 
यूनानी सभ्यता  
इस सभ्यता को प्राचीन सभ्यताओं में अत्यंत श्रेष्ट माना जाता है| इस ‘अत्यंत श्रेष्ट’ व्यवस्था के अनुसार औरतों को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था और वे नीच वस्तु के रूप में देखी जाती थी | यूनानी देवगाथा में ‘पान्डोरा’ नाम की एक काल्पनिक स्त्री पूरी मानवजाति के दुखों की जड़ मानी जाती है | यूनानी लोग स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले तुच्छ मानते थे | हालाँकि उनकी पवित्रता अमूल्य थी और उनका सम्मान किया जाता था, लेकिन बाद में यूनानी लोग अंहकार और काम वासना में लिप्त हो गए | वैश्यावृत्ति यूनानी समाज के हर वर्ग में आम रिवाज़ बन गयी थी |  
 
रोमन सभ्यता  

जब रोमन सभ्यता अपने गौरव के चरम सीमा पर थी, उस समय एक पुरुष को अपनी पत्नी का जीवन छिनने का अधिकार था | वैश्यावृत्ति और नग्नता रोमन सभ्यता में आम थी|  
 
मिश्री सभ्यता  

मिश्री सभ्यता स्त्रियों को शैतान का रूप मानते थे|  
इस्लाम से पहले का अरब

इस्लाम से पहले अरब में औरतों को नीचा मन जाता था और जब कभी किसी लड़की का जन्म होता था तो आमतौर पर उसे दफना दिया जाता था |

“इस्लाम में औरतों की जो स्थिति है, उस पर सेक्युलर मिडिया का ज़बरदस्त हमला होता है| वे परदे और इस्लामी लिबास को इस्लामी कानून में स्त्रियों की दासता के मिसाल के रूप में पेश करते हैं | जबकि यह बिलकुल ही झूठ है और पश्चिमी समाज का डर है, जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रहा है |”


सलीम खान,
स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़, लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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>जल की सुरक्षा, हमारी ज़िम्मेदारी !

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जल की सुरक्षा 
हमारी ज़िम्मेदारी

हम हिन्दुस्तानियों का ये फ़र्ज़ है कि हम पानी को बेजाँ खर्च न करें और न ही नदियों वगैरह को गन्दा करें. पानी बहुत अनमोल है. इसी पानी से हम जिंदा है और मैं, सन् 2005 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति जनाब ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा तैयार करी गई एक प्रेजेंटेशन यहाँ हाज़िर कर रहा हूँ. आप इस प्रेजेंटेशन को बड़े इत्मिनान से और दिल और दिमाग दोनों से देखिये और उसके बाद ख़ुद अपने मन से पूछिये…..आप अपने लिए क्या कर चुके है और क्या कर रहें हैं?

हर प्रकार की प्रसंशा उस ईश्वर के लिए है जिसमे उसने अपने अन्तिम ग्रन्थ कुरान में फ़रमाया- “हमने पानी से हर जीवित वस्तु को जीवन प्रदान किया” (अल-अम्बिया 30)
वास्तव में मानवों पर ईश्वर के उपकारों में से एक महान उपकार पानी है जैसा की पवित्र ग्रन्थ कुरान में ईश्वर का कथन है-

“फ़िर क्या तुमने उस पानी को देखा जिसे तुम पीते हो? क्या उसे बादलों से तुमने बरसाया अथवा बरसाने वाले हम हैं? यदि हम चाहें तो उसे अत्यंत खारा बना कर रख दें फ़िर तुम कृतज्ञता (शुक्र) क्यूँ नही करते” (अल-वाकिया 67-70)


पानी मानव के जीवन व्यतीत करने वाली चीजों में एक बहुमूल्य चीज़ है जिसका अनुभव छोटा बड़ा हर एक करता है. यह ऐसा उपकार है जिससे कोई भी चीज़ निर्लोभ नही हो सकती चाहे मनुष्य हो अथवा पशु अथवा पेड़-पौधे, खाने की चीज़ बनानी हो या पीने की, परिशुद्धता प्राप्त करनी हो या दवा बनाने की, कारीगरी हो या खेती बाड़ी का काम पानी के बिना यकीनन सम्भव नहीं.


इंसानियत चाहे कितनी भी तरक्की कर ले या तरक्की रुक जाए परन्तु वास्तविकता यह है कि पानी की ज़रूरत प्रतिदिन बढती ही जा रही है तथा हर ओर जल की सुरक्षा और बचत की परिचर्चाएं हर ओर हो रहीं है. पानी हर देश का मूल अर्थ और देश के विकास का आधार होता है उसकी उपलब्धि से मानवता प्रगति करती है जबकि उसके कम होने से बहुत साडी कठिनाईयों और आपदाओं का सामना करना पड़ता है. आज हर एक व्यक्ति पानी का दुरूपयोग कर रहा है. स्नानागार, शौचालय, घर और खेती तथा बागीचे की सिंचाई आदि में पानी की खपत ज़रूरत से ज्यादाः मात्रा में हो रही है.

अतः हम पर अनिवार्य है कि हम सब एक होकर जल कि सुरक्षा करें. उसे बेकार नष्ट न करें क्यूंकि किसी भी वस्तु का दुरूपयोग दरिद्रता और निर्धनता का कारण होता है.

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>यह एक प्रार्थना है, अनुरोध है, गुज़ारिश है साम्प्रदायिकता के सदस्यों से !

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यह एक प्रार्थना है, अनुरोध है, गुज़ारिश है साम्प्रदायिकता के सदस्यों से !

क्योंकि मैं भी एक भारतीय हूँ। भारत की धरती से प्यार करता हूं, इस पावन धरती की स्वतंत्रता में अपने पूवर्जों के बलिदान हमें याद हैं। फिर इतिहास ने यह भी देखा है कि हमने अपने देश में शताब्दियों से अनेकता में एकता का प्रदर्शन किया है। हर धर्म एवं पथ के मानने वाले शान्ति के साथ इस धरती पर रहते आ रहे हैं। इस नाते मैं अपनी भावना जो दिल की गहराई से निकली हुई है साम्प्रदायिकता के सदस्यों के नाम पेश करना चाहता हूं। 


आपने मुम्बई में रहने वाले यूपी बिहार के लोगों को मुम्बई से निकालने की योजना बनाई, पूना के लोहगाँव के मुसलमानों को आपने जन्म-भूमि से निकलने पर विवश किया। औऱ अब एक नया शोशा यह छोडा है कि मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहना छोड़ दें और भारत को दारुल हर्ब भी न कहें| 

प्रिय बन्धुओ! मैं यही समझता हूं कि आपको मनवता से प्यार है। इस नाते आपने शत्रुता में यह बात न कही होगी, शायद यह आपत्ती अज्ञानता के कारण है। अतः यदि आपने ऐसा बयान अज्ञानता के कारण दिया है तो इसका निवारण किए देता हूं।  

हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं  

जहां तक भारत को दारुल हर्ब कहने की बात है तो कोई मुसलमान अथवा इस्लामी विद्बान हिन्दुस्तान को दारुल हर्ब नहीं कहते। सब से पहले दारुल हर्ब क्या है इसे समझ लें।  

दारुल हर्ब वह धरती है जहां मुलमानों के लिए धार्मिक किसी प्रकार का काम करना वर्जित हो। वहां हर समय मुसलमान अपने जान तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में चिंतित हों। और ऐसा मुसलमानों के लिए भारत में नहीं है।”

दूसरी बात यह कि दारुल हर्ब को अर्थ युद्ध करने का स्थान नहीं। बल्कि जैसा कि मैंने कहा कि वह देश जहां गैर-मुस्लिम मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हों, और मुसलमानों को वहाँ कोई शक्ति प्राप्त न हो। इस अर्थ को सामने रखें और स्वंय सोच कर देखें कि मुलममानों के लिए भारत आखिर दारुल- हर्ब कैसे होगा? यही कारण है कि जब मेडिया में यह चर्चा आम हुई लो मुस्लिम समितियों की ओर से फत्वा भी आया कि हिन्दुस्तान दारुल-हर्ब नहीं।

जैसे दारुल-उलूम देवबंद तथा विभिन्न मुस्लिम विद्वानों ने बयान दिया कि हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं और न कभी हो सकता है।  

ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहना  

जहां तक ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहने की बात है तो यह याद रखें कि कोई भी मुलमनान किसी गैर-मुस्लिम को काफिर नहीं कहता। बल्कि काफिर कह कर पुकारने से मुहम्मद सल्ल0 ने मना किया है। 

दूसरी बात यह कि काफिर का अर्थ क्या होता है? उस पर भी ग़ौर करके देख लीजिए काफिर अरबी शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद करें को होगा (अमुस्लिल, अथावा गैर-मुस्लिम) अग्रेज़ी अनुवाद करें तो होगा (Non Muslim) अब आप ही बताएं कि एक व्यक्ति या तो मुस्लिम होगा अथवा गैर-मुस्लिम, तीसरी कोई संज्ञा नहीं। यदी कोई गैर-मुस्लिम होना पसंद न करता हो तो वह मुस्लिम बन जाए। समस्या का समाधान बस इसी में है।  

इस सम्बन्ध में लीजिए डा0 ज़ाकिर नाइक का उत्तर भी पढ़ लीजिए  

(काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है- अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस।)

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>क्या आतंकवाद पर केवल मुसलमानों का एकाधिकार है?

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क्या आतंकवाद पर केवल मुसलमानों का एकाधिकार है? (स्वच्छ सन्देश की एक रिपोर्ट )

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>अब न रहा वो सद्दाम का इराक !

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पश्चिमी मिडिया में लगातार छपी खोजी रपटों से मार्डेन हिस्ट्री की जघन्यतम हत्या की सच्चाई छन छन कर सुर्खियों में आई थी | जार्ज वाकर बुश, जो अब राष्ट्रपति नहीं रहे, ने विश्व बिरादरी से झूठ बोला था कि इराक के दिवंगत राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन (जिन्हें शहीद कर दिया गया था) नरसंहार के भयावह शस्त्रों के उत्पादन में जुटे थे | अमेरिका के वर्तमान रष्ट्रपति बराक़ हुसैन ओबामा ने चुनाव के समय यह कहा था कि उनके प्रतिद्वंदी जान मैक्कन की रिपब्लिकन पार्टी झूठ के पहाड़ पर खड़ी हुई है और अमेरिका की जनता ही इसका जवाब देगी | हुआ भी यही चुनाव के बाद की तस्वीर साफ़ है, अब वहां बुश की पार्टी हाशिये पर आ गयी और इसी के चलते बुश से पहले ब्रितानिया हुकुमत टोनी ब्लेयर के हाथो से निकल गयी और टोनी ब्लेयर को इराक पर गुमराह करने करने के कारण ही ब्रिटेन के प्रधानमत्री का पद छोड़ना पड़ा | उधर अमेरिका में मुस्लिम से ईसाई बने बराक हुसैन ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने लेकिन विश्व बिरादरी को ज्यादा खुश होने की ज़रुरत नहीं है कि बराक ओबामा के अमेरिका का राष्ट्रपति बन गए हैं| 
बुश का जो हाल हुआ वो तो होना ही था, इराकी पत्रकार ने जूता मारकर उनकी औकात बता दी | इतिहास के कठघरे में बुश अभियुक्त बन कर पेश होंगे, जब इराक पर अमेरिकी नरसंहार की खबर और ज्यादा पेश होंगी और तब से वर्तमान तक हजारों बेगुनाहों की जानों का ठीकरा बुश के सर फूटेगा, मैं तो इसे दुनिया की सबसे बड़ी आतंकी हमला कहूँगा, जो अमेरिका ने इराक पर किया| बुश क्या इससे पहले भी जैसा कि सबको पता है वियतनाम पर रिचर्ड निक्सन की बमबारी के वर्षों बाद उजागर हुई थी | आज सद्दाम हुसैन को राष्ट्रवादी शहीद का दर्जा और खिताब मिल चुका है | उनकी हत्या का प्रतिरोध और प्रतिकार इराक में रोज़ हो रहा है, अमेरिकी सैनिकों (आतंकी घुसपैठिये) और उनके अरब दलाल की बम विस्फोटों में मौतें इसके सबूत हैं| मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ क्या इराक पर अमेरिकी आतंकी हमले से पूर्व वहां इतनी ही अशांति थी, अवश्य आपका जवाब नहीं होगा और आप यह ज़रूर कहेंगे कि पहले वह बहुत खुशनुमा माहौल था | 
उन्नीस साल पहले सीनियर जार्ज बुश ने सद्दाम हुसैन पर पहले बमबारी की थी| प्रतिकार में सदाम हुसैन ने पुत्र और इराकी पत्रकार उनियां के प्रेसिडेंट उदय हुसैन ने इराक के होटलों के प्रवेश द्वार पर बिछे पायदान में बुश की आकृति बुनवा कर लगा दी | महाबली के अपमान का यह नायाब तरीका था | पितृऋण चुकाने का इसके बाद जूनियर बुश ने बिल क्लिंटन के बाद राष्ट्रपति निर्वाचित होते ही बदला लेने के लिए मौके तलाशे और इराक पर बमबारी कर दी | बहाना था इराक में नरसंहार के आयुधों का उत्पादन जो आजतक साबित नहीं हो सका |

सदाम हुसैन का अवसान भारत के लिए राष्ट्रिय त्रासदी थी क्यूंकि वह इस्लामी राष्ट्रनायकों में एक वाहिद सेकुलर व्यक्ति था | केवल चरमपंथी लोग ही उसकी मौत की पीड़ा से अछूते रहे | कारण ? दर्द की अनुभूति के लिए मर्म होना चाहिए | इराकी समाजवादी गणराज्य के दिवंगत राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अल तिकरिती पर चले अभियोग और फिर सुनाये गए फैसले को महज राजनैतिक प्रहसन कहा जायेगा| 

भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों को याद दिलाना चाहता हूँ कि सदाम हुसैन अकेले मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग माना और ऐलानिया कहा भी | अयोध्या कांड पर बाबरी मस्जिद शहीद हुई थी तो इस्लामी दुनिया में बवंडर मचा था तो उस वक़्त बगदाद शांत था| बकौल सद्दाम हुसैन “वह एक पुराणी ईमारत गिरी है, यह भारत का अपना मामला है| उन्हीं दिनों ढाका में प्राचीन ढाकेश्वरी मंदिर ढहाया गया| तसलीमा नसरीन ने अपनी कृति (लज्जा) में हिन्दू तरुणियों पर हुए वीभत्स ज़ुल्मों का वर्णन किया| इसी पूर्वी पकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा मुक्त करने पर शेख मुजीब के बांग्लादेश को मान्यता देने में सद्दाम सर्वप्रथम थे|

इंदिरा गाँधी की (1975) इराक यात्रा पर मेजबान सद्दाम हुसैन ने उनका सूटकेस उठाया था | जब राएबरेली लोकसभा चुनाव में वे हार गयीं तो इंदिरा गाँधी को बगदाद में स्थाई आवास की पेशकश सद्दाम ने की थी | पोखरण द्वितीय पर अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार को सद्दाम ने बधाई दी थी, जबकि कई राष्ट्रों ने आर्थिक प्रतिबन्ध लादे थे| सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के राष्ट्री अधिवेशनों में शिरकत करते रहे| भारत के राजनेताओं को ज़रूर याद होगा कि भारतीय रेल के लाखों कर्मचारियों को आकर्षक अवसर सद्दाम ने वर्षों तक उपलब्ध कराए| 

उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम में तो इराक से मिले ठेकों से खूब पैसा कमाया| 35 लाख भारतीय श्रमजीवी सालाना एक ख़राब रुपये भारत भेजते थे | भारत को इराकी तेल सस्ते दामों पर उपलब्ध होता था | इस सुविधा का भी खूब दुरूपयोग तत्कालीन रूलिंग पार्टी के नेताओं ने किया था| इराक के तेल पर कई भारतीयों ने बेशर्मी से चाँदी काटी| 

एक दैनिक हिंदी अखबार में एक संपादक श्री के. विक्रम राव ने अपनी इराक यात्रा की वर्णन में यह कहा था कि उसे इराक में के शहरों में तो बुरका नज़र ही नहीं आया था | उन शहरों में कर्बला, मौसुल, तिकरिती आदि सुदूर इलाके थे| माथे पर वे बिंदिया लगतीं थी और उसे हिंदिया कहती थीं| लेकिन पूरी तरह से पश्चिम का गुलाम हो चुका हमारा मिडिया तो वहां की ऐसी तस्वीर दिखाता कि पूछो मत |

अब की तस्वीर पर अज़र डालेंगे तो मिलेगा की सद्दाम के समय में हुई तरक्की में अब गिरावट आ गयी है बल्कि वह पतन पर है| टिगरिस नदी के तट पर या बगदाद की शादकों पर राहजनी अब आम बात हो गयी है | एक दीनार जो साथ रुपये के विनिमय दर पर था आज रुपये में बीस मिल जायेंगे और अब तो विदेशी विनिमय के दफ्तर यह कहते हैं कि आर बी आई के अनुसार इराकी मुद्रा विनिमय योग्य नहीं है | दुपहियों और तिपहियों को पेट्रोल मुफ्त मिलता था, शर्त यह थी कि ड्राईवर या गाड़ी मालिक उसे स्वयं भरे | और भारत में बोतल भर एक लीटर पानी दस रुपये का है| सद्दाम के इराक में उसके छते अंश पर लीटर भर पेट्रोल मिलता था | अमेरिका द्वारा थोपे गए कथित लोकतान्त्रिक संविधान के तहत इराक के सेकुलर निजाम की जगह अब अमेरिका के दलालों ने ले ली है, जिनमे कठमुल्ले भी हैं| 

लेकिन भाजपाई जो मोहमद अली जिन्ना को सेकुलर के खिताब से नवाजते हैं, सद्दाम हुसैन को सेकुलर नहीं मानेंगे | उसका कारण भी है सद्दाम हुसैन पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ते थे, वहां नमाज़ के वक़्त दुकाने और प्रतिष्ठान बंद हो जाते थे | सद्दाम हुसैन अपने साथ हर वक़्त कुरान की एक प्रति अपने साथ रखते थे| पैगम्बर मोहम्मद (इश्वर की उन पर शांति हो) के साथ साथ ईसा मसीह को भी इसलाम के पैगम्बर में से एक मानते थे| इसका उन्होंने खामियाजा भुगता | अमेरिकी पूंजीवादी दबाव में साउदी अरब के शाह नेशलिस्ट इराक को नेस्तनबुत करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी | साउदी अरब में प्यारे नबी मोहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के जन्मस्थली के निकट अमेरिकी सेना (हमलावर, आतंकवादी) को जगह दी और जन्मस्थली के ऊपर से जहाज़ उड़ कर प्यारे नबी के नवासे के कुरबानगाह पर बम बरसाए |

सद्दाम के डर के मारे अरबी शासकों के लिए यह भी था कि इराकी सेना ने कुवैत पर कब्जा किया है (कुवैत इराक का अभिन्न अंग था) और वह मज़हबी सुधार लाया था | पिछली सदी के चौथे दशक तक कुवैत इराक का अभिन्न अंग था| सद्दाम को दण्डित करने के कारणों की यूरोप अमेरिकी राष्ट्रों ने लम्बी लिस्ट बनाई मगर मुकदमा चलाया पच्चीस साल पुराना घटना के आधार पर | अपराध मडा दुजाईल प्रान्त में 148 शिया विद्रोहियों की (1982 में) हत्या करवाने का | 

मगर इतिहास करवट लेता है | सद्दाम हुसैन भी अब इमरे नाष की भांति इराकी देशभक्त और इस्लामी राष्ट्रवाद के प्रतिक बन रहे हैं, जैसे मिस्र के जमाल अब्दुल और तुर्क के मुस्तफा कमाल पाशा अतातुर्क हैं|

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान