स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>हम ईश्वर की शरण चाहते थे: ऐ. आर. रहमान

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इस्लाम क़बूल करने का फ़ैसला मैंने अचानक नहीं लिया बल्कि इसमें हमें दस साल लगे इस्लाम कबूल करने का फ़ैसला मेरा और मेरी माँ दोनों का सामूहिक फ़ैसला था। हम दोनों सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में जन चाहते थे. आर. रहमान (भारत के मशहूर संगीतकार)

भारत के मशहूर संगीतकार ऐ आर रहमान को कौन नहीं जनता है? भारत ही नही विदेशों में भी अपने हुनर का डंका बजवाने वाले अल्लाहरक्खा रहमान के जीवन में उस वक्त एक नयी मोड़ आयी जब उन्होंने अपने परिवार समेत इस्लाम की शरण स्वीकार करी और इस्लाम के आगोश में आ गए. उनका कहना था कि इस्लाम कबूल करने के बाद जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदल गया. भारतीय फिल्मी दुनिया में मुस्लिम लोग कामयाबी पाने के लिए अपना हिंदू नाम रख लेते हैं लेकिन मेरे बारे में ऐसा बिल्कुल ही उल्टा हो गया क्यूंकि मैं था दिलीप कुमार और हो गया अल्लाहरक्खा रहमान. मुझे एक मुस्लिम होने पर फ़ख्र है. पिछली बार हज करने गए रहमान मीना (साउदी अरब का एक शहर) में दीनी (धार्मिक) माहौल में ऐसे लबरेज़ थे कि लग ही नही रहा था कि ये भारत के संगीत की दुनिया का बादशाह है. बकौल सैयद फ़ैसल अली जो कि अरब न्यूज़ के जानिब से थे ने उनसे साक्षात्कार लिया और यह देखा कि रहमान का व्यवहार दिलकश था. कभी मूर्तिपूजक रहे रहमान अब इस्लाम के बारे में एक विद्वान के से बात कर रहे थे. हज करते वक्त उनका कहना था कि अल्लाह ने उनके लिए हज आसान बना दिया. अरब की पाक ज़मीन पर गुज़ारे हर वक्त का इस्तेमाल मैंने अल्लाह की इबादत में किया है. रहमान अराफ़ात और मदीना में भी इबादत में जुटे रहे और अपने अंतर्मन को पवित्र किया. अपने हज के बारे में रहमान आगे बताते हैं: ईश्वर/अल्लाह ने हमारे लिए हज को आसान बना दिया. इस पाक ज़मीन पर गुज़ारे हर पल का इस्तेमाल मैंने अल्लाह की इबादत के लिए किया है. मेरी ईश्वर/अल्लाह से दुआ है कि वह मेरे हज को कुबूल करे.

उनका मानना है कि हज की एक-एक रस्म अपने अन्तर्मन को पवित्र करने के साथ-साथ अपने अंतर्मन से संघर्ष करने का सा है. छह जनवरी को उनका जन्मदिन पड़ता है और इस बार उनके जन्मदिन के लिए हज यात्रा अल्लाह का एक हसीन तोहफा था. उन्होंने कहा : मैं आपको बताना चाहता हूँ कि इस साल मुझे मेरे जन्मदिन पर बेशकीमती तोहफा मिला है जिसको मैं ज़िन्दगी भर भुला नहीं पाऊंगा. इस साल मदीने में इबादत करने का अल्लाह सुभान व तआला ने अनूठा इनाम दिया है| Read More…

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>……………………..जो तुम ना थे मेरे सनम

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जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था 
कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था
 
शाम से सुबह तक बस तेरी तलाश है  
तेरे बिना ज़िन्दगी मेरी जिंदा लाश है
 
तू नही तो ज़िन्दगी कैसी उदास है 
बुझती नही है ये भी कैसी प्यास है  

अक़्स-ऐ- आरज़ू लिए फिरते रहेंगे हम
पल-पल तेरी याद में मरते रहेंगे हम

मरासिम मुस्तकिल न सही, मिजाजे-आशिक़ी रहे
नगमा नहीं साज़ नही न सही तेरी मौसिक़ि रहे


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

Filed under: सलीमख़ान, स्वच्छसन्देश

>………………………………….काश !

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काश !

अगर आप मेरी ज़िन्दगी में ही न आती,
तो आपको खोने की नौबत ही न आती |

अगर आप मेरी खुशियाँ ही न बनतीं,
तो आपके ग़म की नौबत ही न आती |

अगर आपको देखकर ज़िन्दगानी न आती,
तो बे-मौत मरने की नौबत ही न आती |

अगर आरज़ू-ऐ-इश्क दिल में ही न उठती,
ख़स्ता-ख़स्ता बिखरने की नौबत ही न आती |

अगर दिल में उल्फ़त की रवानी न होती,
आपको बेवफ़ा कहने की नौबत ही न आती |

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>ईश्वर एक है, एक है, एक है !

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ईश्वर है तो देखाई क्यों नहीं देता?

ईश्वर कोई हमारे और आप के जैसे नहीं कि जिसे मानव का देख लेना सम्भव हो, वह तो सम्पूर्ण संसार का रचयिता और पालनकर्ता है, उसके सम्बन्ध में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह देखाई दे। बल्कि जो देखाई दे वह तो सीमित हो गया और ईश्वर की महिमा असीमित है। अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन में बताया गया है कि मूसा नामक एक संदेष्टा (ईश्वर की उन पर दया हो) ने जब ईश्वर से प्रार्थना किया कि “हे ईश्वर हमें अपना रूप देखा दीजिए” तो उत्तर आया कि तुम हमें देख नहीं सकते परन्तु तुम इस पहाड़ पर देखो यदि वह अपने स्थान पर स्थित रहा तो तेरे लिए हमे देखना सम्भव है। जब ईश्वर ने अपना प्रकाश प्रकट किया तो पड़ार टूकड़े टूकड़े हो गया और मूसा बेहोश हो कर गिर पड़े।(सूरः आराफ 143) मानव अपनी सीमित बुद्धि से जब सोचता है तो समझने लगता है कि ईश्वर कोई मानव के समान है जो देखाई देना चाहिए।
यह तो एक रहा! फिर संसार में विभिन्न चीज़ें हैं जो देखाई नहीं देतीं पर इंसान को उनके वजूद पर पूरा विश्वास होता है।
एक व्यक्ति जब तक बात करता होता है हमें उसके अन्दर आत्मा के वजूद का पूरा विश्वास होता है लेकिन जब ही वह धरती पर गिर जाता है,आवाज़ बन्द हो जाती है और शरीर ढीला पड़ जाता है तो हमें उसके अन्दर से आत्मा के निकल जाने का पूरा विश्वास हो जाता है हालाँकि हमने उसके अन्दर से आत्मा को निकलते हुए देखा नहीं।
जब हम घर में बिजली की स्विच आन करते हैं तो पूरा घर प्रकाशमान हो जाता है और हमें घर में प्रकाश के वजूद का पूरा विश्वास हो जाता है फिर जब उसी स्विच को आफ करते हैं तो प्रकाश चला जाता है हालाँकि हमने उसे आते और जाते हुए अपनी आँखों से नहीं देखा।
उसी प्रकार जब हवा बहती है तो हम उसे देखते नहीं पर उसका अनुभव करके उसके बहने पर पूरा विश्वास प्राप्त कर लेते हैं।
तो जिस प्रकार आत्मा, बिजली और हवा के वजूद पर उसे देखे बिना हमारा पूरा विश्वास होता है उसी प्रकार ईश्वर के वजूद की निशानियाँ पृथ्वी और आकाश स्वयं मानव के अन्दर स्पष्ट रूप में विधमान है और संसार का कण कण ईश्वर का परिचय कराता है क्योंकि किसी चीज़ का वजूद बनाने वाले की माँग करता है, अब आप कल्पना कीजिए कि यह धरती, यह आकाश, यह नदी, यह पहाड़, यह पशु और यह पक्षी क्या यह सब एक ईश्वर के वजूद हेतु प्रमाण नहीं? प्रति दिन सूर्य निकलता है और अपने निश्चित समय पर डूबता है, स्वयं इनसान का एक एक अंग अपना अपना काम कर रहा है यदि अपना काम करना बन्द कर दे तो इनसान का वजूद ही स्माप्त हो जाए। यह सारे तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि ईश्वर है पर उसे देखना इनसान के बस की बात नहीं।
जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास कर लेते हैं तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर यदि है तो वह एक है अनेक नहीं। क्योंकि हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि एक देश का दो प्रधान मंत्री नहीं होता, एक स्कूल का दो अध्यक्ष नहीं होता, एक सेना का दो कमानडर नहीं होता, एक घर का दो गारजियन नहीं होता। यदि हुआ तो क्या आप समझते हैं कि नियम ठीक ठाक से चल सकेगा? अब आप कल्पना कीजिए कि इतनी बड़ी सृष्टि का प्रबंध एक से ज्यादा ईश्वर से कैसे चल सकता है?
क़रआन जो ईश्वाणी है जो सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शन हेतू अवतरित हुआ है उसने अपने अवतरित काल में मानव को चुनौती दी कि यदि किसी को क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है या वह समझता हो कि मुहम्मद सल्ल0 ने इसकी रचना की है हालांकि वह न पढना जानते हैं न लिखना तो तुम में बड़े बड़े विद्वान पाए जाते हैं ( इस जैसी एक सूरः (छोटा अध्याय) ही बनाकर देखाओ और ईश्वर के सिवा पूरे संसार को अपनी सहायता के लिए बुला लो यदि तुम सच्चे हो)
(सूरः बक़रा 23)
लेकिन इतिहास गवाह है कि चौदह सौ साल से आज तक संसार के बसने वाले इसके समान एक श्लोक भी पेश न कर सके हैं और कोई भी आज तक प्रमाण न दे सका कि यह ईश्वर की वाणी नहीं है।
इस पवित्र ग्रन्थ में हमें ईश्वर ने यह प्रमाण दिया है कि (यदि धरती और आकाश में अनेक पूज्य होते तो खराबी और फसाद मच जाता) बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि संसार में दो ईश्वर होते तो संसार का नियम नष्ट भ्रष्ट हो जाता, एक कहता कि आज बारिश होगी तो दूसरा कहता कि आज बारिश नहीं होगी।एक राम दास को किसी पद कर आसीन करना चाहता तो दूसरा चाहता कि राम दास उस पद पर आसीन न हो ।
यदि देवी देवता का यह अधिकार सत्य होता तथा वह ईश्वर के कार्यों में शरीक भी होते तो कभी ऐसा होता कि एक दास ने पूजा अर्चना कर के वर्षा के देवता से अपने बात स्वीकार करा ली, तो बड़े मालिक की ओर से आदेश आता कि आज बारिश नहीं होगी। फिर नीचे वाले हड़ताल कर देते ।

अगर दो ख़ुदा होते संसार में
तो दोनों बला होते संसार में
ईधर एक कहता कि मेरी सुनो
ईधर एक कहता कि मियाँ चुप रहो।

स्वयं आप कल्पना कीजिए कि यदि दो ड्राईवर एक गाड़ी पर बैठा दिया जाए तो गाड़ी अवश्य एक्सिडेन्ट कर जाएगी। ईसी लिए मानना पड़ेगा कि इस संसार का सृष्टिकर्ता केवल एक है।

हाँ ईश्वर है… और 100 प्रतिशत है।

यदि हम कहें कि ईश्वर नहीं है तो हमें स्वयं को कहना होगा कि हम भी नहीं हैं, यदि हम हैं तो हमारा कोई बनाने वाला अवश्य होना चाहिए क्योंकि कोई भी चीज़ बिना बनाए नहीं बनती,और न ही वह स्वयं बनती है
मैं अभी कम्प्यूटर पर लिख रहा हूं, यदि मैं कहूं कि कम्प्यूटर को किसी ने नहीं बनाया, स्वयं बन कर हमारे सामने आ गया है तो आप हमें पागल कहेंगे।
उसी प्रकार यदि मैं आपसे कहूं कि एक कम्पनी है जिसका न कोई मालिक है, न कोई इन्जीनियर, न मिस्त्री । सारी पम्पनी आप से आप बन गई, सारी मशीनें स्वंय बन गईं, खूद सारे पूर्ज़े अपनी अपनी जगह लग गए और स्वयं ही अजीब अजीब चीज़े बन बन कर निकल रही हैं, सच बताईए यदि में यह बात आप से कहूं तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे ? क्यों ? इस लिए कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि बिना बनाए कम्पनी या कम्प्यूटर बन जाए।

अब हमें उत्तर दीजिए कि क्या यह संसार तथा धरती और आकाश का यह ज़बरदस्त कारख़ाना जो आपके सामने चल रहा है, जिसमें चाँद, सूरज और बड़े बड़े नक्षत्र घड़ी के पुर्ज़ों के समान चल रहे हैं क्या यह बिना बनाए बन गए?
स्वयं हम तुच्छ वीर्य थे, नौ महीना की अवधि में विभिन्न परिस्थितियों से गुज़र कर अत्यंत तंग स्थान से निकले,हमारे लिए माँ के स्तन में दूध उत्पन्न हो गया,कुछ समय के बाद हमें बुद्धि ज्ञान प्रदान किया गया, हमारा फिंगर प्रिंट सब से अलग अलग रखा गया, इन सब परिस्थितियों में माँ का भी हस्तक्षेप न रहा, क्योंकि हर माँ की इच्छा होती है कि होने वाला बच्चा गोरा हो लेकिन काला हो जाता है, लड़का हो लेकिन लड़की हो जाती है। अब सोचिए कि जब कोई चीज़ बिना बनाए नहीं बना करती जैसा कि आप भी मान रहे हैं तथा यह भी स्पष्ट हो गया कि उस में माँ का भी हस्तक्षेप नहीं होता तो अब सोचें कि क्या हम बिना बनाए बन गए ???????
कभी हम संकट में फंसते हैं तो हमारा सर प्राकृतिक रूप में ऊपर की ओर उठने लगता है शायद आपको भी इसका अनुभव होगा—ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि ईश्वर की कल्पना मानव के हृदय में पाई जाती है, पर अधिकांश लोग अपने ईश्वर को पहचान नहीं रहे हैं।
फलसफी बास्काल कहता है “ईश्वर को छोड़ कर कोई चीज़ हमारी प्यास बुझा नहीं सकती” शातोबरीन लिखता है “ईश्वर के इनकार की साहस मानव के अतिरिक्त किसी ने नहीं की”
लायतीह यहाँ तक कहता है कि “जो शब्द सृष्टा का इनकार करे उसके प्रयोग करने वाले के होंट आग में जलाए जाने योग्य हैं”
इस्लाम के सम्बन्ध में सब से बड़ा संदेह जो लोगों में पाया जाता हैं यह है कि इस्लाम एक नया धर्म है जिसे सब से पहले मुहम्मद साहिब ने सातवीं शताब्दी में मानव के समक्ष प्रस्तुत किया-
हालांकि यह बात सत्य के बिल्कुल विरोद्ध है, मुहम्मद सल्ल0 अवश्य सातवीं शताब्दी में पैदा हुए परन्तु उन्होंने इस्लाम की स्थापना नहीं किया बल्कि उसी संदेश की ओर लोगों को आमंत्रित किया जो सारे संदेष्टाओं के संदेशों का सार रहा।
ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो एसा नहीं है कि उसने उनका मार्गदर्शन न किया जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव का संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य ने अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें परन्तु सब से अन्त में ईश्वर ने मुहम्मद सल्ल0 को भेजा।
अब आप पूछ सकते हैं कि मुहम्मद सल्ल0 ने किस चीज़ की ओर बुलाया ? तो इसका उत्तर यह है कि उन्होंने मानव को यह ईश्वरीय संदेश पहुंचाया कि
(1) ईश्वर केवल एक है केवल उसी ईश्वर की पूजा होनी चाहिए उसके अतिरिक्त कोई शक्ति लाभ अथवा हान का अधिकार नहीं रखती
(2) सारे मानव एक ही ईश्वर की रचना हैं क्योंकि उनकी रचना एक ही माता पिता से हुई अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु कहते हैं और सतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, वह प्रथम मनुष्य ने जो धरती पर बसाए गए, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ।
(3) मुहम्मद सल्ल0 ने शताब्दियों से मन में बैठी हुई जातिवाद का खण्डन किया जो लोगों के हृदय में बैठ चुका था और प्रत्येक मनुष्य को समान क़रार दिया।
और जब मुहम्मद सल्ल0 ने वही संदेश दिया जो संदेश हर युग में संदेष्टा देते रहे थे। इस लिए इस्लाम को नया धर्म कहना ग़लत होगा।
फिर यह भी याद रखें कि इस्लाम में 6 बोतों पर विश्वास रखने का आदेश दिया गया है जिस पर सारे मुसलमानों का विश्वास रखना आवश्यक है। उसे हम ईमान के स्तम्भ कहते हैं यदि कोई मुसलमान उनमें से किसी एक का इनकार कर देता है तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा उनमें से एक है ईश्वर के भेजे हुए संदेष्टाओं पर विश्वास करना – अर्थात इस बात पर विश्वास करना कि ईश्वर ने हर युग तथा देश में मानव मार्गदर्शन हेतु संदेष्टाओं को भेजा जिन्होंने मानव को एक ईश्वर की पूजा की ओर बोलाया और मूर्ति जूजा से दूर रखा, पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था।
जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया।
वह विश्व नायक कौन हैं इस सम्बन्ध में आप जानना चाहते हैं तो आपको डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय की पुस्तक कल्की अवतार और मुहम्मद सल्ल0 तथा डा0 एम ए श्री वास्तव की पुस्तक ( मुहम्मद सल0 और भारतीय धर्म ग्रन्थ) का अध्ययन करना होगा जिसमें इन महान विद्वानों ने सत्य को स्वीकार करते हुए हिन्दुओं को आमंत्रन दिया है कि हिन्दू धर्म में जिस कल्कि अवतार तथा नराशंस के आने की प्रतीक्षा हो रही है वह सातवीं शताब्दी में आ गए और वही मुहम्मद सल्ल0 हैं । डॉ ज़ाकिर नायक के उन पुस्तकों को पढ़े जिन्होंने एक क्रन्तिकारी क़दम उठाते हुए सभी धर्मों ख़ासकर के हिन्दुज़्म और इस्लाम के बीच यकसानियत (समानताओं) के बारे में बहुत बड़े पैमाने पर लिखा है.
अंततः ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा, आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है ।
मुहम्मद सल्ल0 ने कभी यह दावा नहीं किया कि वह कोई नया धर्म लेकर आए हैं, वही इस्लाम जिसकी शिक्षा आदि पुरुष आदम (मनू ) ने दिया था उसी को पूर्ण करने के लिए मुहम्मद सल्ल0 भेजे गए। आज मानव का कल्याण इस्लाम धर्म ही में है क्यों कि इस्लाम उन्हीं का है, क़ुरआन उन्हीं का है तथा मुहम्मद सल्ल0 उन्हीं के लिए आए हैं। लेकिन अज्ञानता का बुरा हो कि लोग आज उन्हीं का विरोद्ध कर रहे हैं जो उनके कल्याण हेतु भेजे गए। मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूँ कि ग़लती हमारी हैं कि हम हिन्दू मुस्लिम भारत में शताब्दियों से रह रहे हैं पर हमने सत्य को आप से छुपाए रखा। और ज्ञात है कि यदि इनसान किसी चीज़ की सत्यता को नहीं जानता है तो उसका विरोद्ध करता ही है। अतः आप से निवेदन है कि मेरी बातों पर विशाल हृदय से निष्पक्ष हो कर चिंतन मनन करेंगे। तथा इस्लाम का अध्ययन आरम्भ करें।

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>उम्मीद ही ज़िन्दगी है !

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निराशा (नाउम्मीदी) मौत के बराबर है, आशा (उम्मीद) जीवन (ज़िन्दगी) है बल्कि उम्मीद ही ज़िन्दगी है जहाँ ज़िन्दगी है वहां उम्मीद है जहाँ उम्मीद नही वहां ज़िन्दगी भी नहीं इसलिए हमेशा अपने मन में उम्मीद की लौ जलाकर रखना चाहिए

एक बार एक सहाबी* के पास एक इन्सान आया वह बहुत ग़मगीन था, निराश था उसने सहाबी से कहा- वह मरना चाहता है, और खुद्कुशी कर लेगा इस ज़िन्दगी से वह नाउम्मीद हो गया है उसने अपनी बात कही और रो पड़ा उसका सोचना था की उसे वो रोकेंगे या उसको किसी समस्या का समाधान करने को उद्धत करेंगे, मगर उसे सहाबी की बात सुनकर झटका लगा
उसकी स्थिति देख कर सहाबी ने कहा- “तुम्हारा मर जाना ही बेहतर है, जो लोग निराशा (नाउम्मीदी) में जीया करते हैं, उनका जीवन मौत से भी बदतर है “
सहाबी की बात से वह दुखी हो गया, कहाँ तो वह सांत्वना की बात सुनने आया था कहाँ सहाबी ने उसे फटकारना शुरू कर दिया उन्होंने कहा- “आशावाद ही निर्माता है आशावाद ही किसी इन्सान का ज़हनी (मानसिक) सूर्योदय है इससे ज़िन्दगी बनती है यानि जीवन का निर्माण होता है, आशावाद से तमाम मानसिक योग्यताओं का जन्म होता है, आशावादी मनुष्य का जीवन ही सार्थक होता है अगर तुम आशावादी नहीं बन सकते हो, तो तुम्हारी ज़िन्दगी बेकार है, खुद्कुशी कर लो और इंसानियत का कलंक न बनो “


सहाबी का यह कथन एक कटु सत्य है क्या आप इनसे सहमत नहीं ?

“निराशा (नाउम्मीदी) मौत के बराबर है आशा (उम्मीद) जीवन (ज़िन्दगी) है बल्कि उम्मीद ही ज़िन्दगी है जहाँ ज़िन्दगी है वहां उम्मीद है जहाँ उम्मीद नही वहां ज़िन्दगी भी नहीं इसलिए हमेशा अपने मन में उम्मीद की लौ जलाकर रखना चाहिए “
—-
मेरा अंतर्मन मुझसे कहता है कि मैं इस क़ायनात की सबसे ज़हीन मखलूक इन्सान की बिरादरी से हूँ, मुझे ईश्वर/अल्लाह ने ज़िन्दगी बक्शी, ज़िन्दगी में तमाम नेमतें दीं, दुनियाँ में मेरा जन्म कीडों मकोडों की तरह रेंगने के लिए नहीं हुआ, मेरा जन्म गरीबी के नरक में सड़ने के लिए नहीं हुआ है मुझे ईश्वर/अल्लाह ने बनाया है किसी न किसी मक़सद के लिए, न कि यूँ ही मेरा इस दुनियाँ में पैदा होना किसी न किसी महान काम के लिए हुआ है मेरे लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है अपनी ज़िन्दगी में अपनी आरज़ू पूरी करने के लिए हर सम्भव प्रयास करना चाहिए क़ामयाबी ज़रूर मिलेगी|
(*सहाबी, वो हैं जिन्होंने हुज़ुरे अक़दस हज़रत मोहम्मद सल्ल० का साथ उनकी रहती ज़िन्दगी में हर मोड़ पर दिया था, जैसे हज़रत अबू बकर सिद्दीक रज़ि०, हज़रत उस्मान रज़ि०, हज़रत उमर रज़ि०, हज़रत अली रज़ि० वगैरह…)

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>जीवन की ये अभिलाषा

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जीवन की ये अभिलाषा
कभी न पूरी होने वाली आशा,
सागर, नदिया जीवन सारा
प्यास न बुझने की ये निराशा
जीवन की ये अभिलाषा
पूरी करने को अनवरत दौड़ रहा,
ख़त्म हो गया जीवन सारा
कुछ न पाने की ये निराशा

जीवन की ये अभिलाषा

कभी न पूरी होने वाली आशा,
न रहती अधूरी, गर हो जाती पूरी
————————————

इस आखिरी पंक्ति में मुझे समझ नही आ रहा क्या लिखूं?!!!

इतना मालूम है कि लिखी जाने वाली इस अधूरी पंक्ति में जो होगा उसका भावार्थ इस प्रकार होगा कि-

“अगर जीवन की सभी अभिलाषा पूरी हो जाएगी, सभी आशा पूरी हो जायेगी तो क्या मनुष्य जी पायेगा? क्या उसके पास अपनी सभी अभिलाषा और आशा पूरी हो जाने पर कोई अभिलाषा न बचेगी? अर्थात जीवन की सभी अभिलाषा पूरी हो जाने पर मनुष्य जी ही नहीं सकता, वह तो मृत समान है “

कृपया इन भावार्थ को एक लाइन में समेट कर बनाईये

Filed under: सलीमख़ान, स्वच्छसन्देश

>आरज़ू

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मेरी बातों का ज़रा सा भी लगे बुरा तुम्हे ‘आरज़ू’
कुछ न कहूँगा पर मुझे इस तरह सताया ना करो

हमें पता है कि मिलन की बेला अब ना आएगी
कम-अज़-कम मेरे ख्वाबों से तो जाया ना करो

याद-ओ- ख़्वाब ही बचे है मेरे ज़ेहन-ओ-तसव्वुर में
याद-ओ-ख़्वाब से तुम ‘प्लीज़’ मेरे जाया ना करो

लोग ज़ालिम है, समझ लेंगे निगाहों की हलचल
आँखों में अपने कभी मेरे लिए आंसू लाया ना करो

कोई जानेगा नहीं और कोई समझेगा भी नहीं
अपने दिल का हाल किसी को भी बताया ना करो

ज़ख्मे दिल पर कोई मरहम ना लगायेगा ‘आरज़ू’
रकीब क्या हबीब को भी ज़ख्मे दिल दिखाया ना करो

मैंने हाल ही में “मेरा अस्तित्व” ब्लॉग पर लिखी एक रचना पर यह टिप्पडी करी थी, वो रचना है,

हमारे ग़मों से घबराया ना करो,
हमारे आंसुओं पे आंसू बहाया ना करो ,
“भाव” के लूटेरों ने, खूब लूटा है हमें,
ऐसे में, फ़िर मिलने की आस बंधाया ना करो ।

सच बात तो ये है कि मुझे यह ब्लॉग “ज़िन्दगी की आरज़ू” बनाने का ख़याल “मेरा अस्तित्व” ब्लॉग को देखने और पढ़ने के बाद आया और मेरे लफ्ज़ और शाएरी इसी ब्लॉग की टिप्पडीयों से निकले, वैसे तो मैं जब हाई स्कूल में था तभी से शेर ओ शाएरी, ग़ज़लों और किस्से कहानियो का बहुत शौक़ था मगर शहर में आकर सब कुछ जैसे ख़तम सा हो गया था मगर अब इसे प्रेरणा कहें या पुराना शौक़ दुबारा जाग गया, जो भी है……..आपके सामने है।

Filed under: सलीमख़ान, स्वच्छसन्देश

>वो प्यार था ही नहीं !

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इन्सान किसी से मुहब्बत करता है,

अपनी आरज़ू का इज़हार भी करता है,
उस इज़हार का इक़रार भी होता है,
वक़्त के परों पर मुहब्बत जवान होती है……

मगर ये क्या……


मुहब्बत का जब परवान होना चाहिए, उरूज़ होना चाहिए,
उस वक़्त वो आपका साथ छोड़ देता है……तनहा और अकेला


मुझे यह बात बाद में समझ आई ……. कि

“मोहब्बत का एक उसूल होता है, आपसे प्यार करने वाला चाहे कितनी दूर क्यूँ न हो, उससे मिलने की परिस्थितियां कितनी भी नकारात्मक क्यूँ न हो भले ही आप उसे खुला छोड़ दें…अगर आपसे उसका प्यार सच्चा, वाकई सच्चा होगा तो वह ज़रूर वापस आएगा और अगर नहीं आया तो समझ लीजिये कि उसने आपसे कभी प्यार किया ही नहीं…………..”

वाक़ई !!!?

Filed under: सलीमख़ान, स्वच्छसन्देश

>ईश्वर एक है…

>हम इस दुनिया में रहते हैं, सभी इन्सान हैं. ये दुनिया, चाँद, सितारे, सूरज, पेड़, पहाड़, असमान वगैरह वगैरह…….. हम कुछ पूछेंगे और आप जवाब दीजिये–

क्या इस दुनिया को बनने वाला एक से ज़्यादा है?
इन्सान को बनने वाला, दुनिया बनाने वाला, चाँद, सूरज, सितारे बनाने वाला क्या अलग अलग है?
अगर नहीं,
तो ये कहना और दिल से मानना कि- दुनिया को बनाने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ एक है बिल्कुल सही है. हम सब एक ही ईश्वर/अल्लाह के द्वारा है, और उसी के लिए हैं. एक भ्रम मैं दूर करना चाहता हूँ- मेरे उक्त कथन का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं कि सब कुछ ईश्वर है, नहीं बल्कि सब कुछ ईश्वर का है, ईश्वर से है। वह निर्गुण होते हुए भी सभी गुणों से सुसज्जित है, उसे किसी की आवश्यकता नहीं, उसकी सबको आवश्यकता है.

उसने समय समय पर इस दुनियाँ में अपने संदेष्टा भेजे, कभी कहीं तो कभी कहीं. हमें उन संदेष्टाओं में से ज्यादातर के बारे में बिल्कुल भी पता नहीं. जो कुछ मौजूद है उसके अनुसार मोहम्मद (ईश्वर की उन पर कृपा हो) ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा थे और उनके बाद अब कोई भी ईश्वर का संदेश ले कर कोई नहीं आएगा.
मोहम्मद (ईश्वर की उन पर कृपा हो) अरब देश में पैदा हुए थे और वहां से उन्होंने ईश्वर का संदेश लोगों तक पहुँचाया, संदेश वही जो ईश्वर के पहले संदेष्टा आदम (अलैहिस्सलाम) का था, संदेश उनके बाद के संदेष्टाओं का था जिनमे से प्रमुख रूप से थे- इब्राहीम (अलैहिसलाम), इस्माईल (अलैहिसलाम), नुह (अलैहिसलाम), इसा (अलैहिसलाम) और अन्य. .. जारी

Filed under: ईश्वर

>याद तो आता हूँ ना !

>

कभी अगर शाम हो और तन्हाई का आलम हो,

सन्नाटे में चीरता हुआ एक एहसास दिल को तेरे,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें ‘आरज़ू’ |

सुबह सुबह जब खामोशी से नींद खुलती होगी,
फ़िर आँख खुलते ही मुझे नज़दीक न पाना,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें ‘आरज़ू’ |

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान