स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़

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सलीम खान का एक छोटा सा प्रयास

>विश्वव्यापी और नित्य आदर्श सिर्फ़ पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल० की जीवनी है.

>विश्वव्यापी और नित्य आदर्श सिर्फ़ पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल० की जीवनी है.http://documents.scribd.com/ScribdViewer.swf?document_id=11511431&access_key=key-2enro0cfq3bihvb04y2k&page=1&version=1&viewMode=

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>अल्लाह का इस्लाम मानो, मुल्ला का नही

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पिछले दिनों मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान ने मुसलमानों को उपदेश देते हुए कहा था कि ‘अल्लाह का इस्लाम मानो, मुल्ला का नही‘ यानि उनके कहने का मकसद यह है कुरान पाक और रसूले अकरम हज़रत मोहम्मद स.अ.व. की हदीस (कही गई बातों) को ही सिर्फ़ माना जाए जिसमे सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह ताआला के आदेश, निर्देश और उपदेश पर आधारित है। उनकी इस बात से ऐसा भी लगता है कि वह भी अल्लाह का इस्लाम मानने वाले मुस्लमान हैं और मुल्लाओं की इस्लाम के सम्बन्ध में प्रचारित की जाने वाली बातों व कार्यों को गैर इस्लामिक समझते है। वैसे उनके इन ख़यालात, नज़रियात और एहसासात के मुख्या कारणों में मुल्लाओं के सम्बन्ध में जानकारी की कमी, निजी स्वार्थों को पुरा करने की हवस या मुसलमानों में सुधार लाने की कोशिश की ख्वाहिश भी मुमकिन है। वैसे जिस माहौल और व्यवसाय में वो हैं वहां इस्लाम तो अलग बात इंसानियत के तरीके पर भी चलते होंगे ये भी एक सवाल है.

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>जब इस्लाम मूर्ति पूजा के विरुद्ध है तो मुसलमान काबा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ क्यूँ पढ़ते हैं?

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काबा मतलब किबला होता है जिसका मतलब है- वह दिशा जिधर मुखातिब होकर मुसलमान नमाज़ पढने के लिए खडे होते है, वह काबा की पूजा नही करते. मुसलमान किसी के आगे नही झुकते, न ही पूजा करते हैं सिवाय अल्लाह के.
सुरह बकरा में अल्लाह सुबहान व तआला फरमाते हैं –
“ऐ रसूल, किबला बदलने के वास्ते बेशक तुम्हारा बार बार आसमान की तरफ़ मुहं करना हम देख रहे हैं तो हम ज़रूर तुमको ऐसे किबले की तरफ़ फेर देंगे कि तुम निहाल हो जाओ अच्छा तो नमाज़ ही में तुम मस्जिदे मोहतरम काबे की तरफ़ मुहं कर लो और ऐ मुसलमानों तुम जहाँ कहीं भी हो उसी की तरफ़ अपना मुहं कर लिया करो और जिन लोगों को किताब तौरेत वगैरह दी गई है वह बखूबी जानते है कि ये तब्दील किबले बहुत बजा व दुरुस्त हैं और उसके परवरदिगार की तरफ़ से है और जो कुछ वो लोग करते हैं उससे खुदा बेखबर नहीं.” (अल-कुरान 2: 144)

इस्लाम एकता के साथ रहने का निर्देश देता है:
चुकि इस्लाम एक सच्चे ईश्वर यानि अल्लाह को मानता है और मुस्लमान जो कि एक ईश्वर यानि अल्लाह को मानते है इसलिए उनकी इबादत में भी एकता होना चाहिए और अगर ऐसा निर्देश कुरान में नही आता तो सम्भव था वो ऐसा नही करते और अगर किसी को नमाज़ पढने के लिए कहा जाता तो कोई उत्तर की तरफ़, कोई दक्षिण की तरफ़ अपना चेहरा करके नमाज़ अदा करना चाहता इसलिए उन्हें एक ही दिशा यानि काबा कि दिशा की तरफ़ मुहं करके नमाज़ अदा करने का हुक्म कुरान में आया. तो इस तरह से अगर कोई मुसलमान काबा के पूरब की तरफ़ रहता है तो वह पश्चिम यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है इसी तरह मुसलमान काबा के पश्चिम की तरफ़ रहता है तो वह पूरब यानि काबा की तरफ़ हो कर नमाज़ अदा करता है.

काबा दुनिया के नक्शे में बिल्कुल बीचो-बीच (मध्य- Center) स्थित है:
दुनिया में मुसलमान ही प्रथम थे जिन्होंने विश्व का नक्शा बनाया. उन्होंने दक्षिण (south facing) को upwards और उत्तर (north facing) को downwards करके नक्शा बनाया तो देखा कि काबा center में था. बाद में पश्चिमी भूगोलविद्दों ने दुनिया का नक्शा उत्तर (north facing) को upwards और दक्षिण (south facing) को downwards करके नक्शा बनाया. फ़िर भी अल्हम्दुलिल्लाह नए नक्शे में काबा दुनिया के center में था/है.

काबा का तवाफ़ (चक्कर लगाना) करना इस बात का सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है:
जब मुसलमान मक्का में जाते है तो वो काबा (दुनिया के मध्य) के चारो और चक्कर लगते हैं (तवाफ़ करते हैं) यही क्रिया इस बात की सूचक है कि ईश्वर (अल्लाह) एक है.

काबा पर खड़े हो कर अजान दी जाती थी:
हज़रत मुहम्मद सल्ल. के ज़माने में लोग काबे पर खड़े हो कर लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने वास्ते अजान देते थे. उनसे जो ये इल्जाम लगाते हैं कि मुस्लिम काबा कि पूजा करते है, से एक सवाल है कि कौन मूर्तिपूजक होगा जो अपनी आराध्य मूर्ति के ऊपर खडे हो उसकी पूजा करेगा. जवाब दीजिये?

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>स्वच्छ संदेश की वेबसाइट पर आपका स्वागत है

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स्वच्छ संदेश की वेबसाइट पर आपका स्वागत है

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>हाथ से हाथ मिला कर कहें-हम सब एक हैं |

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दोस्तों, मैं सलीम खान ब्लॉग की इस असीमित दुनिया में बिल्कुल ही नया हूँ और मैंने अपना यह ब्लॉग इसी वर्ष यानि २००९ में बनाया है। ब्लॉग बनाने का मेरा मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ इतना है कि हम सभी मनुष्य एक उपास्य को ही अपना ईश्वर माने जिसे हम अल्लाह कहते हैं और कुरान को आखिरी ईश्वरीय ग्रन्थ साथ ही साथ मुहम्मद सल्ल० को ईश्वर यानि अल्लाह का अन्तिम दूत, नबी, पैगम्बर। लो भाई, ये तो वही बात हुई मैंने कहा और आपने मान लिया। आप कहेंगे कि सबूत लाओ, आप कहेंगे कि हम कैसे माने कि एक उपास्य को ही अपना ईश्वर माने जिसे हम अल्लाह कहते हैं और कुरान को आखिरी ईश्वरीय ग्रन्थ साथ ही साथ मुहम्मद सल्ल० को ईश्वर यानि अल्लाह का अन्तिम नबी। आप कहेंगे कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ में ऐसी कोई बात लिखी हो तब माने। तो जनाब अब आप जाग जाइये और अपने धार्मिक ग्रन्थों का मुताला करें, अगर आप हिंदू हैं तो वेदों और पुराणों को पढ़े अगर आप ईसाई हैं तो इंजील का मुताला करें । इंजील इतनी बार संशोधित हो चुकी है कि शायेद ही आपको इसका ओरिजनल एक पन्ना भी हाथ लगे लेकिन फिर भी आपको सबूत तो काफी मिलेंगे कि हम सब, इस दुनिया के सभी मनुष्य एक ही परमात्मा यानि ईश्वर यानि अल्लाह के उपासक होने चाहिए न कि दर्जनों खुदाओं के। एक बात और कहना चाहूँगा मैं इस स्वच्छ संदेश पर आप सभी एकेश्वरवादी, मानवतावादी, एक दुसरे से मुहब्बत करने वालों का हार्दिक दिल से स्वागत कर करना चाहता हूँ, आप सभी का इस स्वच्छ संदेश नामक ब्लॉग पर स्वागत है। आप के विचार, आपकी प्रिक्रियाओं और आलोचनों का स्वागत है। अगर आपके पास कोई ऐसे तथ्य, प्रमाण या विचार हो जो इस ब्लॉग के मकसद के करीब हो तो महती स्वागत है।

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>(न तस्य प्रतिमा अस्ति) ईश्वर की कोई मुर्ति नहीं बन सकती।

>मानव जब अपने सामने किसी चीज़ को देख कर उस पर ईश्वर का अनुमान करने लगता है तब वह पथभ्रष्ट हो जाता है। जी हाँ ! बुद्धि से सोचना अच्छी बात है, और बुद्धि से ही ईश्वर का ज्ञान प्राप्त हो सकता है, हम क्या थे ? संसार क्यों है ? इसे किसने बनाया? हमारे और आप जैसे रूप रखने वाले मानव ने ? इन प्रश्नों पर दृष्टि डालने से स्वयं ज्ञात होता है कि हम सब को ईश्वर और श्रृष्टा केवल एक है और वही पूरे संसार को चला रहा है, तथा वही एक दिन इसे नष्ट भी करेगा, वही हमारे ऊपर हर प्रकार का उपकार करता है, वह दयालू और कृपाशील है।

मानव जब अपनी तुच्छ बुद्धि से ईश्वर के सम्बन्ध में अनुमान लगाना शुरू कर देता है तो वह उसे भौतिक रूप में देखने की चेष्टा करता है, कारणवश वह उसको मुर्ति आदि में सीमित करने लगता है। हालांकि ईश्वर जो सम्पूर्ण संसार का सृष्टिकर्ता है उसके सम्बन्ध में ऐसा सोचा नहीं जो सकता. (न तस्य प्रतिमा अस्ति ) ईश्वर की कोई मुर्ति नहीं बन सकती।

कुरान में साफ़ तौर पर लिखा है १- ईश्वर एक है। २-उसको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती। ३- उसके पास माता पिता नहीं। ४- न उसके पास सन्तान है। ५- उसकी पूजा में उसका कोई भागीदार नहीं।(क़ुरआन : सूरः अल-इख़लास)

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>मानवता का धर्म इस्लाम है

>लेखक : मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
मुझे पता चला कि जिस धर्म को संसार इस्लाम के नाम से जानता है वास्तव में वही धार्मिक मतभेद के प्रश्न का वास्तविक समाधान है। इस्लाम दुनिया में कोई नया धर्म स्थापित नहीं करना चाहता बल्कि उसका आंदोनक स्वंय उसके बयान के अनुसार मात्र यह है कि संसार में प्रत्येक धर्म के मानने वाले अपनी वास्तविक और शुद्ध सत्य पर आ जाएं और बाहर से मिलाई हुई झूटी बातों को छोड़ दें- यदि वह ऐसा करें तो जो आस्था उनके पास होगी उसी का नाम क़ुरआन की बोली में इस्लाम है।
क़ुरआन कहता है कि खुदा की सच्चाई एक है, आरम्भ से एक है, और सारे इनसानों और समुदायों के लिए समान रूप में आती रही है, दुनिया का कोई देश और कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ अल्लाह के सच्चे बन्दे न पैदा हुए हों और उन्होंने सच्चाई की शिक्षा न दी हो, परन्तु सदैव ऐसा हुआ कि लोग कुछ दिनों तक उस पर क़ाएम रहे फिर अपनी कल्पना और अंधविश्वास से भिन्न भिन्न आधुनिक और झूटी बातें निकाल कर इस तरह फैला दीं कि वह ईश्वर की सच्चाई इनसानी मिलावट के अनदर संदिग्ध हो गई।
अब आवश्यकता थी कि सब को जागरुक करने के लिए एक विश्य-व्यापी आवाज़ लगाई जाए, यह इस्लाम है। वह इसाई से कहता है कि सच्चा इसाई बने, यहूदी से कहता है कि सच्चा यहूदी बने, पारसी से कहता है कि सच्चा पारसी बने, उसी प्रकार हिन्दुओं से कहता है कि अपनी वास्तविक सत्यता को पुनः स्थापित कर लें, यह सब यदि ऐसा कर लें तो वह वही एक ही सत्यता होगी जो हमेशा से है और हमेशा सब को दी गई है, कोई समुदाय नहीं कह सकता कि वह केवल उसी की सम्पत्ती है।
उसी का नाम इस्लाम है और वही प्राकृतिक धर्म है अर्थात ईश्वर का बनाया हुआ नेचर, उसी पर सारा जगत चल रहा है, सूर्य का भी वही धर्म है, ज़मीन भी उसी को माने हुए हर समय घूम रही है और कौन कह सकता है कि ऐसी ही कितनी ज़मीनें और दुनियाएं हैं और एक ईश्वर के ठहराए हुए एक ही नियम पर अमल कर रही हैं।
अतः क़ुरआन लोगों को उनके धर्म से छोड़ाना नहीं चाहता बल्कि उनके वास्तविक धर्म पर उनको पुनः स्थापित कर देना चाहता है। दुनिया में विभिन्न धर्म हैं, हर धर्म का अनुयाई समझता है कि सत्य केवल उसी के भाग में आई है और बाक़ी सब असत्य पर हैं मानो समुदाय और नस्ल के जैसे सच्चाई की भी मीरास है अब अगर फैसला हो तो क्यों कर हो? मतभेद दूर हो तो किस प्रकार हो? उसकी केवल तीन ही सूरतें हो सकती हैं एक यह कि सब सत्य पर हैं, यह हो नहीं सकता क्योंकि सत्य एक से अधिक नहीं और सत्य में मतभेद नहीं हो सकता, दूसरी यह कि सब असत्य पर हैं इस से भी फैसला नहीं होता क्योंकि फिर सत्य कहाँ है? और सब का दावा क्यों है ? अब केवल एक तीसरी सूरत रह गई अर्थात सब सत्य पर हैं और सब असत्य पर अर्थात असल एक है और सब के पास है और मिलावट बातिल है, वही मतभेद का कारण है और सब उसमें ग्रस्त हो गए हैं यदि मिलावट छोड़ दें और असलियत को परख कर शुद्ध कर लें तो वह एक ही होगी और सब की झोली में निकलेगी। क़ुरआन यही कहता है और उसकी बोली में उसी मिली जुली और विश्वव्यापी सत्यता का नाम “इस्लाम” है।

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>इस्लाम का अध्ययन क्यों करें’

>इस्लाम सम्पूर्ण मानव जाति के लिए ईश्वर का परम उपहार हैं परन्तु न जानने का कारण लोग तुरन्त इस्लाम को दोषित ठहराने लगते हैं।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।
वास्तविकता यह है कि हम सदैव नकारात्मक सोचते हैं जिसका परिणाम है कि हमारे देश में नफरत फैल रही है। हमारा ज्ञान एक दूसरे के प्रित सुनी सुनाई बातों दोषपूर्ण-विचार तथा काल्पनिक वृत्तानतों पर आधारित है।
भई! इस्लाम तो सारे मानव का धर्म है बिल्क यह सनातन धर्म है इसी के अन्तिम दूत कल्कि अवतार हैं। जब तक इस्लाम का सकारात्मक अध्ययन न होगा हमारे हृदय से घृणा भाव समाप्त नहीं हो सकती। इसी उद्देश्य के अंतर्गत हमने इस्लाम के सकारात्मक परिचय की प्रयास की है। हमारी आशा है कि हमारे देशवासी विशाल हृदय से इस्लाम का अध्ययन करें।

मैं कहता हूं कि जब इस्लाम का अर्थ ही होता है (शान्ति) उसके अन्तिम दूत (कल्कि अवतार) मुहम्मद सल्ल0 सम्पूर्ण संसार के लिए दयालुता है तथा उन्होंने अपनी 63 वर्ष की जीवनी में सिद्ध कर दिया कि इस्लाम वास्तव में संसार के लिए शान्ति संदेश है।आपके प्रवचनों में आता है कि ( यिद किसी ने किसी गैरमुस्लिम की अकारण हत्या कर दी तो वह प्रलय के दिन स्वर्ग की सुगन्ध भी न पा सकेगा )उसी प्रकार क़ुरआन के हर अध्याय का आरम्भ ही इस श्लोक से होता है (आरम्भ करता हूं ईश्वर के नाम से जो बड़ा कृपाशील तथा दयावान है) तो फिर आप इस्लाम पर यह आरोप कैसे लगा सकते हैं कि यह धर्म आतंक फैलाता है। इस्लाम ही तो सम्पूर्ण संसार का धर्म है । इसी में सारे मानव की मुक्ति है और कोई धर्म मुक्ति का साधन है ही नहीं । बस आवश्यकता है कि आप इस्लाम के सम्बन्ध में पढ़ कर देखें।

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>About me… Saleem Khan

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मेरे बारे में (सन २००९ का लिखा हुआ)

  1. जन्मदिन 1 फ़रवरी, 1981 (Feb 1st, 1981)
  2. इमेल सम्पर्क का पता है सलीम एल के ओ एट जी मेल डॉट कॉम ( saleemlko@gmail.com)
  3. पैदा हुआ लखनउ के निशातगंज मोहल्ले में, बचपन बीता पीलीभीत (के एक छोटे से गाँव में नाम है-सिद्धनगर) (स्थाई पता) मे…….कई कई बार पीलीभीत से थोड़े थोड़े समय के लिये दूर हुए.लेकिन हर दूरी मे पीलीभीत से प्यार बढता गया. सन 1998 से लखनउ में रह रहा हूँ.  
  4. लेकिन अब पीलीभीत मे रहना मुश्किल, क्योंकि मुझे खेती करना पसंद नहीं.
  5. मैं पैदा हुआ सन्डे को (01 फ़रवरी 1981), सन्डे को मेरी शादी हुई (18 दिसम्बर 2005), सन्डे को ही मेरी बेटी की पैदाइश हुई (24 दिसम्बर 2006). ये सब खुशियाँ सन्डे को ही हुईं, एक बात और मेरी …….. भी सन्डे को ही हुई (02 नवम्बर 2008).
  6. साइकिल से सिर्फ एक बार गिरा, उससे लगी चोट अभी तक है बायें कंधे में,  लेकिन बाइक से कई बार गिरा और एक बार बड़ा फ्रेक्चर हुआ प्लास्टर चढा….
  7. बारिश मे भीगना बहुत पसन्द है, जाहिर बचपन मे कागज की नावें बहुत चलायी. हमारे वहाँ (पीलीभीत में)  हर साल बाढ़ आती है (थी) मैं उसमें कम गहरे गढ़हे में दुपट्टे से छोटी छोटी मछलियाँ पकड़ता था.
  8. बचपन मे मै बहुत शरारती नहीं था, मैं गाँव के शरीफों का सरदार था.
  9. मै अल्लाह मे विश्वास रखता हूँ.
  10. मै हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी और भोजपुरी भाषायें बोल लेता हूँ.
  11. लेकिन मेरे को उर्दू भाषा सबसे अच्छी लगती है.
  12. कालेज टाइम मे सिनेमा देखने कई खुद का बना रेकार्ड तोड़ा…..अब  एकदम बन्द.
  13. बचपन में गन्ना चूसने का बहुत शौक था अब तो लखनउ में एक भी नहीं वजह आप सब को पता है.
  14. जिन्दगी मे काफी उतार चढाव देखे……अपनों को बदलते देखा, गैरों को हाथ बढाते देखा…शायद यही दुनिया है.
  15. जिन्दगी हर रोज कुछ ना कुछ नया सिखाती है, बहुत कुछ सीखा…….नही सीख पाया तो बस किसी से नफरत करना.
  16. मेरा मानना है प्यार के लिये जिन्दगी कम पड़ती है, नफरत के लिये कहाँ जगह है इसमे?
  17. मै किसी को बाय बाय नही कर सकता, मुझे बहुत दुःख होता है किसी को बाय बाय करने मे. लेकिन अगर मेरा दिल दुखाया वो भी किसी अज़ीज़ और अपने ने तो मन करता है उसकी मैं वाट लगा दूँ.
  18. जीवन मे अपनी माताजी से बहुत प्रेरित रहा, अब वो तो नही रही.
  19. साफ्टवेयर, तकनीक और इन्टरनेट मे बेहद तेज हूँ, लखनउ मे मेरे प्रतिद्वन्दी लोग मेरे बारे मे कहा करते थे, कि “ये गंजो को पहले कंघा, फिर आईना और फिर बाल उगाने वाला तेल भी बेच सकता है.” लेकिन मैं हकीक़त में ऐसा नहीं था.
  20. व्यापार के लिये एकदम अनफिट, पिछले अनुभव तो यही बताते है, शायद कई बार दिल से डिसीजन लिये इसलिये.
  21. पढाई के साथ साथ नौकरी मे भी हाथ आजमाया.
  22. कहते है हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, अब मै किस का नाम लूँ? अब आप ही बताईये…ये भी सच ही है कि हर असफल आदमी के पीछे एक से ज्यादा औरतों का हाथ होता.
  23. नयी चीजें सीखने की लगन. परिश्रम से कभी पीछे नही हटे…..अरे..अरे…. ये तो मै अपनी तारीफ करने लगा.
  24. इस जीवन मे सब कुछ सम्भव है, सब कुछ……
  25. दोस्त एक भी नहीं. जो हैं वो सब … शायेद मैं यहीं सबसे ज्यादा अनलकी रहा.
  26. पहनने मे कोई खास पसन्द नही, जो मिला जैसा मिल ओढ लिया.
  27. राजनीतिक चर्चा से प्यार लेकिन राजनीतिज्ञों से बेहद चिढ, देश की तरक्की मे ये ही सबसे बढा रोड़ा बने है.
  28. भोजन मे मुगलाई खाना/व्यंजन काफी पसन्द.
  29. मै बेहद कोआपरेटिव हूँ, इतना कोआपरेटिव कि कभी कभी तो लोग शक करने लगते है. शक भी कैसा वही जो इंसानी फितरत में है नकारात्मक…
  30. सुबह सुबह जल्दी उठना पसन्द…… लेकिन क्या करें, आँख नहीं खुलती. हाँ आजकल रोजाना टहलने जरूर जाता हूँ, देखो कब तक चलता है ये सब.
  31. फेवरिट पास टाइम‍-पुरानी बातें करना. कभी कभी यही अपनों से झगडे कि वजह बन जाता है इसलिए अब कंट्रोल करता हूँ. पहले मैं पुरानी यादें याद किया करता था.  
  32. सपना-उस दिन का इन्तजार है, जब सभी भारतवासी आपस में मिलजुल कर रहना शुरू करेंगे.
  33. ब्लाग लिखने का मकसद, लोगों तक अपने विचार पहुँचाना और लोगो के विचारों तक पहुँचना. See Saleem’z Blog 
  34. बच्चों मे बच्चों जैसा बन जाता हूँ, बूढों मे बूढों जैसा और जवानो मे जवानो जैसा.
  35. मै मानता हूँ कि अनुभव ही सबसे अच्छा अध्यापक होता है.
  36. दुनिया मे सबसे कीमती चीज विश्वास है.

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लेख सन्दर्भ

सलीम खान